Shri Saraswati Puja

कोलकाता (भारत)

1992-02-03 Saraswati Puja Talk, Kolkata, India (Hindi), 43' Add subtitles:
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Shri Saraswati Puja 3rd February 1992 Date : Place Kolkata Type Puja Speech Language Hindi

[Original transcript Hindi talk, scanned from Chaitanya Lahiri]

में हमने उन्नति की है। इस कलियुग में माँ को पहचानना अति कठिन कार्य है। हम अपनी माँ को भी नहीं पहचान सकते, मुझे पहचानना तो बहुत कठिन है। परन्तु इस योग भूमि का आशीर्वाद आप में कार्य कर रहा है। मैंने देखा है कि इस क्षेत्र के सभी सहजयोगी अति गहन हो जाते हैं। परन्तु मैं हैरान हूँ कि जहाँ मैंने इतने वर्ष लगाए और इतना कार्य किया, वहाँ लोग इतने गहन नहीं हैं। उनकी सापूहिकता यहाँ की तरह सुन्दर नहीं है। इस भूमि की विशेधता यह है कि यहाँ सामूहिकता तथा प्रेम पूर्णतया निस्वार्थ है। मैं ये सब देख कर अति प्रसन्न हूँ और कामना करती हूँ कि पर इससे आगे भी एक अवस्था है जिसके विपय में हम सोचते ही नहीं, और इसी कारण यह असन्तुलन है आप दंखते हैं कि कला-साहित्य आदि बहुत है फिर भी लोग कहते हैं कि सरस्वती और लक्ष्मी का संगम नहीं है गहनता में जाने पर हम इस असन्तुलन का कारण जानना चाहते हैं। सहजयोग में सरस्वती और लक्ष्मी आज्ञा चक्र पर मिलती हैं। आप कार्य करते रहते हैं पर आपकी इच्छा के अनुसार फल नहीं मिलता। आज्ञा पर आकर आप जाने पाते हैं कि आपकी वह अवस्था क्यों नहीं प्राप्त हुई जो वहुत से कलाकारों को प्राप्त हुई। हम आप सब उन्नति करें। यहाँ महा सरस्वती की पूजा होना अति आवश्यक है देवी गरीबी में क्यों रह रहे हैं ? दोनों तत्वों को उचित दृष्टि से देखें के आशोवाद से यहाँ सब कुछ हरा भरा और दु:ख का कारण यह है कि यहाँ सरस्वती की पूजा बहुत से जोड़ने के लिए हममें शुद्ध दृष्टि होनी चाहिए। सीमित रूप से हुई। यहाँ सरस्वती की पूजा केवल कलात्मकता को बढ़ाने तथा विद्वान बनने के लिए की जाती है नि:सन्देह विद्वता और कला के क्षेत्र में यहाँ उन्नति हुई। यहाँ के लोग विशेष तरह से यदि वे गाते हैं तो वैसे ही गाते चले जायेंगे। अति बुद्धिमान तथा स्वाभिमानी हैं। परन्तु फिर भी यहाँ गरीबी क्यों है? अपने से अधिक वैभवशाली व्यक्ति के प्रति यहाँ ईर्ष्या क्यों हैं? व्यक्ति को समझना है कि हममें कहाँ कमी है। है। यहाँ पर गरीबी विना हम उन्नति नहीं कर सकते। कला (सरस्वती) को लक्ष्मी जिद्दोपना हमारी सबसे बड़ी कमजोरी हैं। इन्होंने यदि एक हाथी बनाया है तो हाथी ही बनाते चले जायेगे। किसी एक इसमें परिवर्तन करने के लिए कहें तो वे नाराज हो जायेंगे | आज्ञा चक्र पर बदि आप विचार करें तो आपको पता चलेगा कि जिद्दीपना आपको आज्ञा से ऊपर नहीं जाने देता। “हम सरस्वती का कार्यक्षेत्र शरीर का दायां भाग है। स्वाधिष्ठान बंगाली हैं। हम महान कलाकार तथा बुद्धिमान हैं”। हममें पर कार्य करके जब ये बाबीं ओर को जाती है तो कला-विवेक जिद्दीपना है कि हम बंगाली महान लोग हैं। मैं नहीं कहती कि आप कला को बिगाड़ें। पर आप सन्तुलित ढंग से तो कला की और साहित्य क्षेत्र में इन क्षेत्रों में बहाँ बहुत दखिए। मैं आपको व्यवहारिकता की बात बताती हूँ कि हममें प्रसिद्ध लोग हैं। कला परमात्मा की ज्योति हैं। आप इसे ने देख एक प्रकार का आलस्य हे जो हमें जिद्दी बनाता है। कोई नई बात सीखने में हमारे मस्तिष्क थोंडे से शिथिल हैं। इसी शिथिलता के कारण हम कुछ भी ऐसा नहीं सोख पाते जिससे हम लक्ष्मी से जुड़ सकें। जैसे मैंने जब कुछ दस्तकारों से पसों की बनावट में कुछ परिवर्तन करने को कहा तो उन्होंने कहा कि ऐसा करना सम्भव नहीं। हम इन्हें एसा ही बनायेंगे। आपकी इच्छा के अनुसार हम नहीं बना सकते। “आप कांई सलाह नहीं दे सकते”। अतः सूझबूझ हॉनी चाहिए तभी मस्तिष्क खुलेगा। जिद्दीपने का कुप्रभाव व्यक्ति के पूरे जीवन में आने पर परिवर्तन आता है। तब संहज हम केवल पढ़ने-लिखने के क्षेत्र में ही करते हैं और इस क्षेत्र हो में हम लक्ष्मी से जुड़ जाते हैं। आज्ञा चक्र को ठीक करने बढ़ता है कला के क्षेत्र में बंगाल बहुत प्रसिद्ध है । संगीत, ड्रोमा, मूर्तिकला सकें पर इसमें चैतन्य लहरियां हैं। सुन्दरतापूर्वक रचित तथा विश्व भर में मान्य सभी कुछ सौन्दर्य की दृष्टि से उत्तम है। यदि आप अपने हाथ इसकी ओर फैला्ें तो आपको इसमें से लहरियां निकलती हुई महसूस होंगी. विर्शषकर यदि इस कला की रचता किसी साक्षात्कारी व्यक्ति ने की हो। यहाँ के लोग अति श्रद्धालु हैं और कलाकृतियां अति सुगमता से सबकी समझ में आ जाती हैं। बंगाल के लोग अति कुशल हैं। परन्तु हमने स्वाधिष्ठान का एक ही भाग बिकसित किया है, दूसरे भाग को हमने अनदेखा कर दिया है। स्वाधिष्ठान का उपयोग पर पड़ता है। सहज ন

इसका मुझे क्या लाभ है? मैं तो जो हूँ बो हूं। मेरे प्रति श्रद्धा से आप ही को लाभ होता है। आप सहजयोग में आए और में के लिए आवश्यक है कि हम अपने अहं की ठीक करें। हिन्दु, मुसलमान, इसाई या ब्रह्म-समाजी होने की भावना आधारहीन है। मानव मात्र के अतिरिवत आप कुछ भी नहीं। आपने अपने पर लेबल लगा लिए हैं। न आप बंगाली हैं न मराठी। आप केवल मनुष्य हैं। लेबल लगाकर आप अपनी समस्याएं बढ़ाते हैं। ये लेबल इतने आवश्यक बन जाते हैं कि इनसे परे आप कुछ देख नहीं पाते। इस बन्धन से छुटकारा पाए बिना आप अन्धकार से नहीं निकल सकते। पश्चिम में भी यह समस्या है। आप यदि उन्हें कह दें कि यह वात अच्छी है तो वे बिना सोचे समझे इसका अनुसरण करने लगते हैं आलोचक वहाँ पर हर तरह की कला की आलोचना करते हैं। एक आलोचक दूसरे आलोचक की आलोचना करता है। कला का सृजन रुक गया है। लोगों में अहंकार बढ़ रहा है। सरस्वती तत्व से महासरस्वती तत्व को प्राप्त किया। मुझ विश्वास करने मात्र से ही आपको सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। आपकी स्वयं में विश्वास करना होगा तथा अपना उत्थान करना होगा। अब आप सहजयोग विज्ञान को समझ गए हैं। आपका दीप जला दिया गया है। इस दीप से आपने हजारों अन्य दीप जलाने हैं। मुझे प्रेम करना अच्छा है पर इससे आगे भी बहुत कुछ हैं। आनन्द से आगे एक ओर अवस्था है – निरानन्द। निरानन्द की वह अवस्था आपकी माँ को तब मिल पाएगी जब वह देख लेंगी कि उनके बच्चे उनसे भी आगे निकल गए हैं। पर इन छोटी-छोटी चीजों का मोह हमें त्यागना होगा। महाराष्ट्र के लोगों में व्यर्थ की चीजों से मोह बहुत अधिक है। हो सकता है कि यह पूर्व जन्म के पापों के कारण हो। सुकृत्यों के फल से तो तुरन्त हृदये खुलता है और एक फूल की तरह सुगन्ध सल्य-सार यह है कि हम सब एक हैं, एक विराट, एक पूर्णता। इसके विपरीत जाने से आप अकेले पड़ जाते हैं तथा सामूहिकता से अलग हो जाते हैं। यह ठीक है कि पेड़ का एक पत्ता दूसरे पत्ते जैसा नहीं होता फिर भी वे होते तो एक ही पेड़ बिखेरने लगता है। पर हैं । व सभी एक विराट के अंग-प्रत्यंग हैं। जब हम एक दुसरे से अलग हो जाते हैं तो हमारा सरस्वती तत्व महा सरस्वती तत्व नहीं बन पाता। महासरस्वती तत्व में जब आप रहने लगते हैं तो आप देख सकते हैं कि आप विराट हैं। ऐसी चाहते हैं कि सहजयोग फैले। पर इस दिशा में आपने क्या कार्य स्थिति में जब कलाकार कोई सृजन करता है तो लोग इसे हृदये से स्वीकार करते हैं। कला का जो भी कार्य हम करते हैं वह परमात्मा को समर्पित होना चाहिए। इस धाव से की गई सभी रचनाएं शाश्वत होंगी। परमात्मा को समर्पित सभी कविताएं, लड़के-लड़कियों से वह बहुत प्रभावित हुआ। अपनी इच्छाओं संगीत और कला कृतियां आज भी जीवित हैं। आज का फिल्म को कार्यन्वित कीजिए। कार्य शुरु होते ही इच्छाएं समाप्त हो संगीत आता है और समाप्त हो जाता है परन्तु कबीर और जायेंगी। जो पूरा हो सके ऐसी इच्छाएं आपको करनी चाहिएं ज्ञानेश्वर जी के भजन शाश्वत हैं। अपने आत्मसाक्षात्कार द्वारा उन्होंने महासरस्वती शक्ति से प्राप्त किया और फिर जो भी रचना उन्होंने की वह बेजोड़ थी। इन रचनाओं ने विश्व को एक सूत्र में बांधा। तो व्यक्ति को सरस्वती तत्व से महासरस्वती परन्तु धनी लोगों को तत्व की ओर जाना चाहिए क्योंकि सरस्वती तत्व यदि बीज है तो महासरस्वती तत्व पेड़ है। बिना इस बीज को वृक्ष बनाए बिना आप कुछ नहीं कर सकते। आप तो हाथ भी हिलाना नहीं महासरस्वती में व्यक्ति समर्थ और चुस्त होता है। महाकाली में आप इच्छा करते हैं तथा आत्मसात करते हैं । इन इच्छाओं को कार्यान्वित करना महासरस्वती का कार्य है। कुछ लोग किया? आपने कितने लोगों को आत्मसाक्षात्कार दिया? कितने लोगों से सहजयोग की बात की? एक अखबार वाले ने मुझे बताया कि शान्ति और मर्यादापूर्वक पोस्टर लगाते हुए सहजयोगीं क्योंकि असम्भव इच्छाएं करना भयंकर है। यहाँ पर बहुत लोगों की भी बहुत सी समस्याएं हैं। बे बताते हैं कि मजदूरों के कारण उनकी फंक्ट्रियां बन्द पड़ी हैं। याद रखना चाहिए कि मजदूर उनके अंग-प्रत्यंग हैं। उनके से लोग धनी हैं और बहुत से गरीब, धनी आप महालक्ष्मी से नहीं जुड़े सकते। आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति भी महालक्ष्मी का वरदान है। महासरस्वती, महाकाली तथा महालक्ष्मी तीनों शक्तियां आज्ञा पर मिलती हैं। वहाँ पर सूक्ष्म और आप उनका वेतन बढा देते हैं। और यह सब चलता रहता रूप में अहं भी है। अत: व्यक्ति को अन्तर्दर्शन कर देखनाह चाहिए कि सीमित स्तर पर रहते हुए मैं कैसे पूरे विश्व को संस्कृति को सीखिए। मजदूर बहुत बड़े दिल के होते हैं। पर प्रकाशित कर सकता हूँ। मैंने बहुत बार कहा है कि अपने यदि आप घमण्ड से उनसे बात करेंगे तो वे सबसे बड़े शत्रु भी अन्दर झांकिए। बहुत से लोग देवी की तरह मुझे पूजते हैं। पर जानते, बस कुर्सी पर बैठे रहते हैं मजदूरों के लिए आपने क्या किया? पैसे से तो सभी कार्य नहीं हो सकते। वे झंडा उठाते हैं ।। आपने उनके हित के लिए कुछ किया? सबसे पहले उनकी बन सकते हैं। उनके साथ रहिए, उन्हें मिलिए, उन्हें जानिए। मैं

मेरे पास आ जाइए। आप जितना अपनी शक्तियों का उपयोग करेंगे उतनी ही अधिक वे बढ़गी। स्वयं पर विश्वास रखिए। जब माँ ने कहा है तो अवश्य ही हममें वे शक्तियां होंगी। हमें चहिए कि इन शक्तियों को बढ़ायें। अब सहजयोग में गहनता तो आ गई है पर इसे इतना अधिक बांटा नहीं जा रहा। अब आपको सहजयोग देना है। जब आप इस कार्य में लग जायेंगे और महासरस्वती तत्व जागृत हो जाएगी तो इस देश की उन्नति देख आप आश्चर्यचकित रह जायेंगे। परन्तु पूर भारतवर्ष में इसे प्रकाशित उद्यम कहती हैं। उनके घर जाकर उनको समस्याएं पूछिए। उनके लिए आप इतना सा कीजिए और वे जीवन भर के आपके सेवक होंगे। हर बात पर पैसा देना आवश्यक नहीं। कुं यदि आप पैसे देंगे तो या तो वे दारू की दुकान पर पहुंचंगे या बुरी औरतीं के पास। अपना अंग-प्रत्यंग मानकर उनके दिलों को समझिए। तब आपकी मजदूर संबंधी समस्याएं समाप्त हो जायेंगी। यहाँ लोग सरस्वती तक ही सीमित हैं, महासरस्वती तक नहीं। आप सहजयोगी हैं। सभी कुछ स्वत: ही ठीक हो जाएगा। परन्तु आपको सहजयोग की राह पर चलना होगा। अपनी संकीर्णता को छोड़कर आपको विशाल होना होगा। अन्दर से उन्नते हुए बिना आप वाहर से विस्तृत नहीं हो सकते। आलस्य का यह रोग है। सहजयोगी किसी कार्य को न कर पा सकने के लिए बहुत बहाने करते हैं । उदाहरणतया “मुझे लोगों से या परिवार से डर लगता है” आदि। कायरों के लिए सहजयोग नहीं है। यहाँ पर इतनी काली विद्या और तांत्रिकों का प्रकोप है। मैं इसे साफ करती रही हूं। काली विद्या को दूर करने के लिए आपको विशेष ध्यान देना होगा और इसके लिए कार्य करना होगा । सहजयोग में ध्यान-धारणा अति आवश्यक है। प्रात: पाँच बजे यांच मिनट ध्यान कीजिए और रात का दस मिनट। इतने से ही आप शुद्ध हो जायेंगे और आपको आशीर्वाद मिल जायेंगे। हर समय आपको रास्ता दिखाया जा रहा है। आनन्द यह पूजा पूरे भारत के लिए हे क्योोंकि आलस्य का रोग देश में है। हम बिल्कुल भी चुस्त नहीं हैं। हमारी इच्छाएं लेते हुए आप विकसित हो रहे हैं। पूर तो बहुत दृढ़ हैं पर उनकी पूर्ति के लिए हम कुछ भी नहीं करते। एकत्रित होकर सोचिए कि सहजयोग फैलाने के लिए आप क्या कर सकते हैं। हमने बहुत कार्यो के लिए जमीन लोग अब भी सोचते हैं कि माँ से प्रेम करना, उनकी सेवा करना और प्रार्थना करना हो काफी है। अच्छी बात है। आपका हित भी होता है। माँ के प्रम में, हो सकता है, आप बहुत गहरे खरदी है मर वह पड़ी सड़ रही है। जब तक मैं भारत नहीं आती ये लोग एक छोटी सड़क बा एक झापड़ी तक भी नहीं बना सकते। मेरी समझ में नहीं आता कि इतने लोगों के होते हुए भी कोई कार्य नहीं होता। मेरे जाते ही आप सब अलग-अलग उतर गए हों। पर ऐसे गहरे घड़े का क्या फायदा जिससे कोई पानी न ले सके। आज्ञा पर यदि आप सोचें कि मैं क्या कार्य करू तो कोई लाभ नहीं। नि्विचारिता की अवस्था में आपको अन्दर से प्रेरणा प्राप्त होगी। यहाँ पर बहुत गहन लोग हैं, पर अब हमें वह गहनता दूसरों के साथ बांटनी होगी। तालाब में कमल खिलने पर तालाब के कीड़े उन पर गर्व करते हैं । पर इसकी उन्हें क्या लाभ। आप भी यदि उन कीड़ों की तरह हैं तो बेकार है। हो जाते हैं तथा मनमानी करते हैं। केवल दो-तीन लोग ही कार्य करते हैं । सहजयोग सामूहिक कार्य है, दो या तीन व्यक्तियों का कार्य नहीं। व्यक्ति को समझना चाहिए कि हर सहजयोगी सहजयोग का एक हिस्सा है। एक अंगुली पर जब चोट लगती है तो पूरे शरीर को दर्द महसूस होता है। सहज में सभी कुछ स्वचालित है। पर यह संकोर्णता तथा अज्ञानता कि कुछ न करने देगी। वेदो में लिखा है कि यदि आपको ज्ञान नहीं है तो वेदों का क्या लाभ। उन्होंने पंचमहाभूतों को जगाने का प्रयत्न किया। “मैं परिणामस्वरूप हमारे देश में विज्ञान आया। वैज्ञानिक खोज जो विशेष हैँ” आपको कुछ आपने इतनी गहनता प्राप्त की है और बहुत कुछ पा लिया यहाँ की गई वह आज की खोज से उत्तम है। सहजयोग में भी आप पंचमहाभूतों को वश में कर सकते हैं। पर आप लोग अब भी कहते हैं ” श्री माताजी मेरी माँ या भाई या परिवार बीमार है”। आप एक सहजयोगी हैं। आप चाहते हैं कि माँ सब कुछ करें। आप क्यों नहीं कर सकते? दूसरों को देने का प्रयत्न कीजिए। में बार-बार कहती हैँ कि आप स्वयं कुछ कीजिए। मैं तो ठीक करूंगी हो, पर आप मेरे से ज्यादा अच्छी तरह ठीक कर सकते हैं। अगर आप उन्हें ठीक नहीं कर सकते तो है। अब आप दूसरे लोगों को दें। कल आपको मेरे स्थान पर बैठ कर मेरा कार्य करना पड़ सकता है। ऐसा होने पर ही सहजयोग उन्नति करेगा। आज आप सबको मेरा आशोर्वाद है कि इस पूजा के बाद बहुत से लोग आगे बढ़े तथा सहजयोग को फैलाने का कार्य करें। आप सबको अनन्त आशीर्वाद।