Birthday Puja

मुंबई (भारत)

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Birthday Puja Date 17th March 1992 : Place Mumbai Puja Type Hindi & English Speech Language

[Original transcript Hindi talk, scanned from Hindi Chaitanya Lahari]

सहज” सहज समाधी लागो। सहज में ही आपके अन्दर ये भावना आ जाती है। हिन्दुओं में अब जो बताया गया है कि सबव में आत्मा है, एक ही आत्मा का वास है। फिर हम जात-पात हमारे देश में बहुत से सन्त हुए हमने सिर्फ उनको मान लिया क्याोंकि वा ऊँचे इंसान थे। किसी भी धर्मं में आप जाईये काई भी धर्म खराब नहीं। मैंन बुद्ध धर्म के वारे में पढ़ा तो बड़ा आश्चर्य हुआ कि मध्य मार्ग बताया गया था। लेकिन उसके कैसे कर सकते है? पहली बात तो यह सोचनी चाहिये कि वाद लोग उसको बायें में और दायें में ले गये जो दायें में ले गये वो पूरी तरह से सन्यासी हो गये, त्यागी हो गए। फिर डाकू भी था और बह एक मछुआरा था। उससे रामायण राम उन्होंने बड़े-बड़े कठिन मार्ग और उपद्रव निकाले। उन्होंने सोचा ने लिखा दिया। भीलनी के झूठे बेर खा के दिखा दिया। और कि बुद्ध सन्यासी हो गए थे तो उन्होंने भी सन्यास ले लिया। गीता का लेखक व्यास कोन था? वो भी एक भीलनी का अपनी सभी इच्छाओं का दमन कर लिया उन्होंने।इस तरह का स्वभाव व्यक्ति का अति उग्र, इतना ही नही आतताई भी बना देता हैं। उसमें बहुत क्रोध समा जाता है। क्रोध को दबाने से क्रोध और बेढ़ता रामायण जिसने लिखा वी कौन था? बाल्मीकी एक डाक था, नाजायज पुत्र था। ये सब उन्होंने यह दिखाने के लिये किया कि जाति-पाति से जो हम एक दूसरे को अलग कर रहे हैं ये जाति हमारे अन्दर की रूझान (झुकात्र) हैं। जिसका लगाव परमात्मा से है उसी को ब्राहमण कहा जा सकता है। उस हिसाब से बाल्मीकी ब्राहमण थे और व्यास भी ग्राहमण थे। ता कर्म के अनुसार अपने यहाँ जाति बहुत देर बाद मानी गई। जितने भी बड़े-बड़े अवतरण हुए उन्होंने जाति प्रथा की खण्डित कर दिखाया। कबीरदास जी क गुरू ब्राहमण थ। कबीरदास के गुणों के कारण उन्होंने उन्हें बहुत सम्मान दिया। महाराष्ट्र के महान कवि नाम देव जी दर्जी थे उनकी नौकरानी है। एसे लोग कभी-कभी ऊपरी-चेतना (Supro-conscious) में चल पड़ते हैं और उन्हें कुछ-कुछ ऐसी सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं जिससे वी दूसरे लोगों पर अपनी असर डाल सकते हैं। हिटलर के साथ यही हुआ। हिटलर के गुरु एक लाम्हा साहब थे और उस लाम्हा से उन्होंने सीखा किस तरह से लोगों को हम अभिभूत करें और उनको किस तरह से अपनाये। जा धर्म बुद्ध देव ने इतना ऊँचा बनाया था कि हम लोग निर्वाण को प्राप्त करें वो धर्म दायीं ओर तो कोई नीची जात की स्त्री रही होगी उसकी भी कविताएं बहक गया। दूसरा जिन लोगों ने सांचा कि नहीं हम लेफ्ट साईड में चलें तो उससे तांत्रिक पैदा हो गये। लद्दाख वगैरा में यदि कोई मर जाए तो उसके हाथ को पूजा करेंगे। नेपाल में भी मैने देखा हर जगह लेफट साईड इतनी ज्यादा बढ़ गई कि ये सब भूत प्रेत, शमशान पिशाच विद्या में पड़ गये। इस प्रकार दो जाते हैं उनके लिये हमें सावधान रहना चाहिए। उनके प्रति दया तरह के लोग बुद्ध धर्मी हो गये। बुद्ध का इससे कोई सम्बंध रखनी चाहिये क्यांकि वो अन्धे है। जैसे कबीर साहब ने कहा नहीं और बुद्ध धर्म का भी इन लोगों से कोई संबंध नहीं। इसाई कैसे समझाऊं सब जग अन्धा जो अन्ध लोग हैं वो ऐसे ही लागों ने भी ईसा के क्षमा के गुण को त्याग कर लोगों पर मनमाने अत्याचार किए। मुसलमान कुरान पढ़ कर तथा इसाई बाईबल पढ़ कर एक दूसरे को मारते हैं और सोचते हैं कि बडा भगवान का कार्य कर रहे हैं। मेरा ही धर्म अच्छा है और दूसरों का खराब। जब तक आत्मा की जागृति नहीं होती तब तक आप किसी भी धर्म को अन्दर शोषित नहीं कर सकते उसको अन्दर बैठा नहीं सकते। वो अन्दर आ ही नहीं सकता। वो वाह्य में ही रह जाता बाह्य में रह कर धर्म सत्ता या धन के पीछे दौड़ता है आत्मा को ओर नहीं बढ़ता। जब आत्मा का प्रकाश आ जाता है तो अकस्मात् आदमी उस तत्व को अपने अन्दर समाया हुआ पाता है। उसको कोई मेहनत नहीं करनी। हैं, हर तरह के लोग इसमें आये हैं और सब अपने-अपने धर्म ग्रन्थ साहिब में हैं। नामदेव जो की तो है ही। गुरू नानक जी ने इसको पहचाना क्योंकि वो भी एक पहुँचे हुए पुरुष थे। जो वहाँ पहुंच जाते हैं वो समझते हैं कि, कौन असल है और कौन नेकल। तो जो नकल में धर्म हो रहे हैं जिससे हम लोग घबड़ा अन्धे-पन में रहते हैं। कोई कहेगा मैं इसाई हूँ, कोई कहेगा मैं मुसलमान हूँ, कोई कहेगा में सिख हूँ। जैसे ही आप कहेँगें में ये हूँ आप अपने को अलग हटा लेते हैं। लेकिन सहजयोग में आप समझ गये हैं कि सब धर्मों का तत्व्व एक है। ज्याही हम धर्म को मानने लगते हैं। धर्मान्धता समाप्त हो जाती है। धर्म-धर्मान्धता ही आज का प्रश्न है। इसी के कारण विश्व में इतने झगड़े फैले हुए हैं। जब आपके अन्दर यह सत्य बैठ गया कि सभी धर्मों का तत्व एक है तो सारे झगड़े एक दम खत्म हो जायेंगे और वो तत्व आप लोगों में बैठ गया है । आपको पता है सहजयोग में मुसलमान हैं हिन्दु है इसाई हैं, सिख हैं, बौद्ध है। ন

को मान भी रहे हैं। पर जब वो अपने को मान रहे हैं तभी वो विश्व धर्म को मान रहे हैं। जब आपने एक विश्व धर्म को मान लिया उस विश्व धर्म में सारे ही धर्म हैं और सब धर्मों का मान करना यह सुझाता है। यही समझ की बात है। सब अवतरणों का मान करना, जितने भी आज तक बड़े-बड़े सन्त, साधु दृष्टा होता है कि आप अपने बारे में कुछ जानते ही नहीं। सब मुझ हो गये सबका मान करना विश्व निर्मल धर्म सिखाता है। ये ही को गौरव दिये जा रहे हो । ऐसे कौन से मैंने गौरव के काम सिर्फ कहने से नहीं होता समझाने से नहीं हो सकता। ये आत्मा के प्रकाश में अपने आप अन्दर बैठ जाता है। उसको शक्ति है वो जागृत हो गई और आपने अपनी आत्मा को प्राप्त फिर कहने की जरूरत नहीं होती। तब आप सोचिए कि आप सहजयोगी हो गये। सहजयोगी हो गये माने आप बढ़िया लोग कितनी गौरवशाली बात है कि आपने अपने गौरव को प्राप्त हो गये देखिये आप किसी का कत्ल नहीं कर सकते। आप किसी की कोई चीज छीन नहीं सकते आप चोरी चकारी कुछ लूटेंगे नहीं, किसी औरत को विधवा नहीं करेंगे, किसी के नहीं कर सकते। आप किसी की बुराई नहीं करते, आप किसी को नीचे खींचने का प्रयत्न नहीं करते या आप किसी भी मेरे कहने से नहीं। आप शराब नहीं पियेंगे, आप चरस नहीं प्रतिस्पर्धा में नहीं पड़ते। आपको ये नहीं लगता कि, मैं इसकी खायेंगे। क्या-क्या होता है दुनियाभर की गन्दगी? आप कांई खोपड़ी में जाकर बैठ जाऊं इसकी गर्दन काट लूं। जहाँ है वहाँ गन्दी जगह ही नहीं जाएगे। गन्दे चित्र नहीं देखेंगे , गन्दी किताब समाधान में आप बैठे हैं और अपने ही आप उन्नत हो रहे हैं । नहीं पढुेंगे। मुझे कहने की जरूरत नहीं। आप पढ़ंगे ही नहीं। आप किसी के साथ दुष्टता नहीं करते। देखिये, सास होती है कोई गन्दी बाद करेगा आप सुनेंगे ही नहीं। आपको अच्छा ही बहु होती है कभी बहु सास को सताती है कभी सास बहु को नहीं लगेगा। कितने शुद्ध हो गये हैं आप लोग! और अपनी सताती है। पर सहजयोग में ऐसा बहुत कम है । दिखाई नहीं शुद्धता को आप यत्न से रखते हैं। कोई ऐसी वैसी चीज होगी देता। ऐसे ही आपकी गृहस्थी में आदमियों की और औरतों की जो स्थिति है वह विशेष है। पति पत्नि में आपस में पूरी तरह से ऐसी एक-तारता है कि पति किसी और औरत की ओर हैं। वहुत से लोग बताते हैं मैं वहाँ गया था तो देखा वो सब देखता नहीं और स्त्री किसी और पुरुष की ओर देखती नहीं। इतनी शुद्धता बाह्य का आकर्षण जो लोगों को होता है वो आप नहीं रहे क्योंकि आप स्वाभिमान में हैं। आपको अपने स्व का अभिमान है। आपकी आंख ठहर गई, अब चंचल नहीं रही । इधर-उधर नहीं घूमती। अब तो आपके बच्चे, आपके माँ-बाप आपको देखते हैं तो वह भी आश्चर्यचकित हो जाते हैं, अभिभूत हो जाते हैं कि देखो कैसे हो गये ये लोग। ये चोरी नहीं करते, झूठ नहीं बोलते, मारते नहीं-पीटते नहीं, कोई दंगा है। बहुत ही पहले की वात है इटली में एक लड़की इंग्लैण्ड नहीं, फसाद नहीं, कुछ नहीं। इतने शांतिमय, इतने आनन्दमय आप सब लोग हो गये। लोग मुझसे कहते हैं कि आप इतनी बीमारी ठीक करते हैं, इतना कुछ करते हैं आप पैसा नहीं लेते। थीं। देखते-देखते एक ने दूसरे को देखा और न जाने क्यों और आप लोग कहाँ लेते हैं? आप लोग भी तो सहज का काम मुफ्त में ही कर रहे हैं । मैंने तो किसी को नहीं देखा कि सहज के काम के लिए आप लोग पैसा मांगते हैं या कुछ करते हैं। ने आत्मसाक्षात्कार दिया है? उसने कहा हाँ और तुम्हें भी दिया एक से एक कविताएँ आप लिखते हैं, एक से एक गाने आप गाते हैं। कोई भी मैंने देखा नहीं जो कहता हो कि, नहीं इस काम में मुझे पैसा चाहिये। कितनों को आपने जागृति दी, कितनों को आपने पार कराया है, कितने ही सेंटर्स आपने इनको रखें, कहाँ इनके। देखें? मैने कहीं सुना नहीं कि कोई चलाये हैं लेकिन मैंने कहीं नहीं सुना कि इसके लिये माँ तुमने इतनों को जागृति दी तो आप हमें उसका पैसा दीजिए या उसके लिये कोई आप हमें खिताब दीजिए कि इतने ।08 जागृति वाले या 008 जागृति वाले। ऐसा कुछ नहीं। इस पर आपको हंसी भी आती हैं कि ये सब क्या है? इन सब बाहुय चीजों से आप लोग अपने आप ही उठ गये और आप अपने बारे में कुछ जानते ही नहीं। मुझे तो यही देख-देख करके बड़ा आश्चर्य किये हैं? मुझे तो समझ में नहीं आता। आपके अन्दर अपनी किया। उस आत्मा की वजह से सब कुछ हो गया और किया। आप बंदुक लेकर किसी को मारेंगे नहीं, किसी का घर बच्चे का आप अपहरण नहीं करेंगे, कभी कर हो नहीं सकते। आप वहाँ से भाग निकलेंगे, मुझे नहीं चाहिये और अगर कहीं जाना ही पड़ गया तो उसे एक नाटक की तरह से आप देखते शराब पी-पी के कैसे घूम रहे थे। किस तरह से औरतों के साथ बातचीत कर रहे थे। और मुझे आ करके सब वर्णन बतात हैं। ये दृष्टि जो कि एक साक्षी स्वरूप की है वो आपके अन्दर आकस्मिक रूप से आ गई। है दूसरा आपस का प्रम-भाव इस्लाम में इस पर बहुत कुछ कहा गया कि आपस में प्रेम-भाव बंधुत्व और औरतों के प्रति भगिनीभाव की बात भी कही। इस कदर आपस में प्रेम भाव से गई थी। पता नहीं किस काम से गई थी और दूसरी एक फ्रांस से बहाँ पहुंची। दोनों जने एक रेस्तरां में कुछ खा रही उनको लगा इसमें कुछ बाईब्रेशन आ रहीं हैं। तो एक उठके दूसरे के पास गई और उससे कहती है क्या तुम्हें श्री माताजी है न? और बस फिर दोनों एकदम गले मिल गये कहीं भी जाके आप अमेरिका में जायें कहीं जायें बस सहजयोगी देखकर गदगद हो जाते हैं इन्हें कहाँ रखें, इनकी क्या सेवा करें, कैसे सहजयोगियों को किसी ने कहीं सताया। वहाँ आपस में इस कदर प्रेम उमड़ता है लोगां में, यदि किसी के कुछ चक्र खराब हो तो भी उसको अत्यन्त प्रेम से लोग देखते हैं स्वयं तकलीफ

सह कर भी उसे ठीक करते हैं। और मुझे बड़ा कभी-कभी आश्चर्य होता है कि कुछ-कुछ तो इनते ज्यादा पकड़े हुए लोग होते हैं तो भी कभी मुझसे आके शिकायत नहीं करेंगे कि ये बड़े पकड़े हुए हैं इनको सहजयोग से निकाल बाहर करें। मैने सिर्फ एक ही बात देखी है कि अगर कोई मेरी निन्दा करता है तब आप लोगों से बर्दाश्त नहीं होती। तब फिर आपकी बदाश्त सारी खत्म हो जाती हैं। ये तो मैंने देखा हुआ है और यही एक पहचान है कि आपको मुझसे बहुत प्रेम है। इतना ज्यादा प्यार आपने मुझे दिया है, इतना ज्यादा मुझे भरोसा हो गया है। मरा जो एक स्वपन था कि सारे संसार में जागृति हो जाए। जब तक जागृति नहीं होगी तब तक संसार के प्रश्न नहीं मिट सकते। क्योंकि हमारे वातावरण संबंधी, आर्थिक, परिवारिक जो सभी समस्याएं हैं इनकी जिम्मेदारी किसकी है? इंसान की है। इंसान ने ही ये प्रश्न खड़े किये हैं और यही इंसान अगर बदल जाये ओर इसके अन्दर बो विश्व बंधुत्व आ जाए तो झगड़ा किस चीज़ का करेंगे? अगर सभी एक चीज को मानते हैं सबको एक ही चीज मालूम है, तो झगड़ा किस बात का? और फिर ये जो सारे प्रश्न हैं लेकिन ये जरूर कहूंगी कि इस पूजा के पीछे में आप लोग हो । आप अगर ऐसे नहीं होते ता कितनी भी पूजाएँ हों (क्या मंदिरों हैं में कम पूजाएं होती हैं कितने-कितने स्वयंभू बने हुए कुछ कम होता है बहुत कुछ होता है) लेकिन किसी के अन्दर कुछ घुसता ही नहीं। जैसे के तैसे। जो करना है वो करंगे हो । जो गलत काम है वे करते ही रहेंगे। कुछ उनमें विशेषता नहीं है। लकिन सहजयोग एक बड़ी विशेष चीज है और आज देखिए इतने देशों में सहजयोग फैल गया, इतने देशों में फैल गया है मुझे बड़ा आश्चर्य हाता है। इतना तो मैने कभी नहीं सोचा था कि इतना हो जाएगा। सोचा था कुछ हो जाएंग लोग फिर बो आगे करते रहंगे। लेकिन मेरी जिन्दगी में इतने लोग इसे प्राप्त करेंगे ऐसा मैने कभी नहीं सोचा था। और जो मेर मन में एक स्वपन था वह वाकई आज साकार हो गया है। क्या अब जब कुछ भी आप करें, कुछ भी आप सोचें, किसी भी चीज में आप हाथ डाले, पहले याद रखना चाहिये कि हम योगीजन हैं। हम सर्वसाधारण नहीं हम योगीजन विशेष हैं और इसलिये हमको विशेषरूप से सबकी और नजर करना चाहिये और देखना चाहिये। जितने लोग हो सके उतकी योगी बनाना चाहिये। इसी से सारे संसार का भला होने वाला है जैसे हमारा भी भला हुआ। आज मेरे जन्म दिन पर यही कहना है कि आप लोगों का फिर से जन्म हो चुका है। हर जन्म दिन पर आय बढ़ती ही जाती है, आयु के साथ अगर आपमें प्रगल्भता न आये, परिपक्वता न आयें तो ऐसी आयु बढ्ने से कोई लाभ नहीं। आप भी अब सहजयोग में बढ रहे हैं लेकिन इसमें जरूरी है कि हमारे अन्दर प्रगलभता आये, परिपक्वता आनी चाहिये। जब आप धीरे-धीरे इसमें पक जाएंगे तब आप स्वयं ही एक बड़े भारी वृक्ष की तरह अनेक लागों का फायदा कर सकते हैं । आप सबमें ये शक्तियाँ आई हैं और मैं चाहती हूं कि मेरी सारी शक्तियाँ आप सब में आ जाएं और आप सब एक से एक बड़े हो जाएँ। माँ तो हमेशा यही सोचती है कि अपने बन्चों को अपने से भी कहीं अधिक ज्यादा सुख मिलना चाहिये। बड़ी खुशी की बात है कि आप लोग बड़े आनन्द में बैठे हुए हैं और उस निर्वाण का उपभोग ले रहे हैं जिसके लिये बहुतो ने अनेक प्रयत्न किये थे इतने सहज में सब आपने प्राप्त कर लिया यह भी पूर्व पुण्याई है। मेरा आप सब पर अनन्त आशीर्वाद तो है ही लेकिन हर समय ख्याल बना रहता है और जब आपको छोड़ कर जाते हैं तो ऐसा लगता है कि किसी ने मेरा दिल ही खींच लिया। फिर यही सोचती हूँ कि आगे जहाँ जाना है वहाँ कितने लोग खड़े होंगे। जब उनको देखते हैं तब फिर ये सारा कुछ ऐसा लगता है ठीक हैं। मुझे अभी तो लगता नहीं कि मैं कोई सत्तर साल की हो रही हूं। आप सबको देखकर के बहुत आनन्द से विभोर हूँ मैं। और ये सोचने का तो समय ही नहीं रहता कि उमर क्या हो रही है अपनी। ठीक हो जाते हैं । अब देखिये इतना सुन्दर आपका आश्रम बन गया, आप लोगों की इच्छा आप लोगों का मन ये चहुत बड़ी चीज़ हे अब आप जब भी अखवार पढ़ें तो सामुहिक तरह से आप इच्छा्े करें कि माँ पंजाब की सारी समस्या समाप्त हो जानी चाहिए। समाप्त हो जाएगी। कुछ न कुछ बन जाएगा आपको और भी कोई प्रश्न हो, दरिद्रता अपने देश में बहुत है। वो सिर्फ दरिंद्रता-दरिद्रता करने से नहीं जाएगी। नदी के बीच की धारा की तरह हम लोग बीच की धारा में है। हम लोग बड़े रईस भी नहीं है और बड़े गरीब भी नहीं हैं। जब बीच की धारा बढ़ती जाएगी तो इधर रईस भी इसमें आ जाएंगे और गरीब भी इसमें समाते जाएगें और इसी तरह से हमारे प्रश्न छूटेंगे। बहुत से लोग गरीबी चाहते ही हैं जिससे उनका बोलबाला बना रहे। अब आप लोग खुद अपनी शक्ल देखिये कि सबकी कितनी तजस्वी शक्लें हो गई। कोई अगर ऐयरपोर्ट पर देखते हैं तो कहते हैं ये किस देश से आये हैं? सबकी शक्लें इतनी तेजस्वी हैं। पर मैने बहुत सारे लोग देखें हैं जो कि गेरुआ वस्त्र पहन के सब बाल-वाल काट-कूट करके और खड़े हुए हैं। वहाँ देखने में तो ऐसा लगता है जैसे अभी अस्पताल में जाने बाले हैं। और कोई-कोई ऐसे दिखाई देते हैं कि क्रोधी जैसे कि उनसे दूरी से बात करें नहीं तो इतनी गर्मी आपको आएगी कि पता नहीं कुछ बात की तो झापड़ ही न मार दे। तो किसी में भी आप नहीं पाइयेगा इस तरह की शालीनता, इतना प्यार, इस तरह का प्रेम। ये किसी भी समाज में नहीं है, हमारे सहजयोग में है। इसके लिये आपका अभिनंदन होना चाहिये और आपकी विशेषता होनी चाहिये। आप लोग सब मेरी पूजा करते हैं उससे कहते हैं लाभ-वाभ होता है। जो भी होता हो उसके लिये में क्या करूं। आप सबको अनन्त आशीवाद