Birthday Puja

New Delhi (भारत)

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जन्म दिवस पूजा दिल्ली मार्च 21, 1992

हमारे देश में बहुत से सन्त हुए हैं हमने सिर्फ उनको मान लिया क्योंकि वो ऊंचे इन्सान थे। अब किसी भी धर्म में आप जाईए, कोई भी धर्म खराब नहीं है। जैसे अभी बताया कि बुद्ध धर्म है। मैंने बुद्ध धर्म के बारे में, पड़ा तो बड़ा आश्चर्य हुआ कि मध्य मार्ग बताया गया था लेकिन उस के बाद लोग उसको left (बाएँ) में और right (दाएँ) में ले गए। जो दाएँ मे ले गए वो पूरी तरह से सन्यासी हो गए, ascetic (त्यागी) हो बुद्ध गए। फिर उन्होंने बड़े बड़े कठिन मार्ग और उपद्रव निकाले। उन्होने सोचा कि क्योंकि सन्यासी हो गऐ थे, बहुत कठिन मार्ग से उन्होंने इसे प्राप्त किया। इसलिए हमें भी उसी मार्ग पर चलना चाहिए। पर उसकी इतनी कठिन चीजें उन्होने कर दीं, कि ज़मीन पर सोना, ठंड उसी में बहुत से लोग खत्म हो गए। एक ही मरतबा खाना में रहना आदि। उन्होंने अपनी जो कुछ भी निसर्ग में दी हुयीं जरूरतें थीं, उन्हें पूरी तुरह से, दबा. दिया। इस. तरह के दबाव डालूने से मनुष्य का स्वभाव बहुत उत्तेजित सा हो जाता है। इतना ही नहीं aggressive (आततायी) भी हो जाता है । उस में बहुत क्रोध समा जाता है ।क्रोध को दबाने से क्रोध और बढ़ता है और ऐसे लोग कभी कभी supra conscious (ऊपरी चेतना) में चल पड़ते हैं और उन्हें कुछ-कुछ ऐसी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं जिससे वो दूसरे लोगों पर अपना असर डाल सकते हैं। हिटलर के साथ यही हुआ। हिटलर के गुरू एक लामा साहब थे और उस लामा से उन्होंने सीखा कि किस तरह से लोगों को अभिभूत करें और उन्हें किस तरह से अपनाएँ। तो जो धर्म देव ने इतना ऊंचा बनाया था कि हम लोग निर्वाण को प्राप्त करें वो धर्म right side की ओर बहक गया। दूसरा जिन लोगों ने सोचा कि नहीं हम इसमें left side (बाएं ओर) में चलें, तो उससे तांत्रिक पैदा हो गए। इस के अलावा बहुत बुद्ध

सी ऐसी जगह हैं जैसे लददाख वगैरा। वहाँ तो यदि कोई मर जाए तो उसके हाथ की करेंगे। हर जगह, नेपाल में भी मैंने देखा हर जगह left side इतनी ज्यादा बढ़ पूजा गई कि सब भूत-प्रेत, शमशान विद्या में पड़ गए। इस प्रकार दो तरह के लोग र्मी हो गए। बुद्ध का इससे कोई सम्बन्ध नहीं और बुद्ध धर्म का भी इन लोगों से कोई ६ बुद्ध सम्बन्ध नहीं। यही चीज़ आप देखिए तो ईसाई धर्म में भी है। पहले तो इन लोगों ने यह सोचा कि हम लोग अपने अन्दर अधिकार (power) को प्राप्त करें। सो crusades हुए, लोगों को मारा, पीटा, अत्याचार किए। जो ईसा मसीह ने सिखाया था क्रूस पर भी जाकर तुम सब लोगों को माफ कर दो। अभी भी चल रहा है अत्याचार । आर्मीनियनों (Armenians) ने, अभी आप लोगों ने सुना होगा अजरबैजान ( Azerbaizan )* मुसलमानों को मारा। हजारों की संख्या में। और जिस वक्त वे (Armenians) उनको मारने निकलते थे तो पहले बाईबल पढ़ते थे। और बाईबल पढ़ कर उनको मारने जाते थे, मानों जैसे भगवान उनके साथ ही हैं, और वो बड़ा भगवान का कार्य कर रहे हैं। और फिर यह सोचना कि हमारा ही धर्म सबसे अच्छा है और मुसलमान सबसे खराब हैं। यही हाल मुस्लमान का है। यदि आप मुसलमान धर्म के बारे में पढ़िएगा तो सोचिएगा कि बहुत ही अच्छा धर्म है, बढ़े कमाल की चीज़़ है । और उनके जो बुद्धिवादी लोग हैं वो ये भी कहते हैं कि मुस्लमानों में जो मुस्लिम हैं उनमें, और इस्लाम में, बहुत अन्तर है। लेकिन वो कहते हैं कि पढ़े लिखे नहीं हैं, पढ़ने लिखनें से ठीक हो जाएंगे। पढ़े लिखे होने से भी- पढ़ी पढ़ी पंडित मूर्ख भयो। वो कुछ होने नहीं वाला। जब तक आत्मा की जागृति नहीं होती, तब तक आप किसी भी धर्म को शोषित नहीं कर सकते। उसको अन्दर बैठा नहीं सकते। वो अन्दर आ ही नहीं सकता। वो बाह्य में रहता है और जब वो बाह्य में रह जाता हैं तो इस तरह से वो बहक जाता है। या तो वो power oriented (सत्ता उन्मुख) होता है या money oriented होता है, पैसे की ओर दौड़ता है। वो आत्मा की ओर नहीं दौड़ता, spirit oriented नहीं होता। जब आत्मा का प्रकाश आ जाता है तो अकस्मात् आदमी उस तत्व को अपने अन्दर समाया हुआ पाता है। उसको कोई मेहनत नहीं करनी “सहज”, ‘सहज समाधि लागो।’ सहज में ही आपके अन्दर ये भावना आ जाती है। हिन्दुओं में अब जो बताया गया है कि

स्व में आत्मा है, एक ही आत्मा का वास है। फिर हम जात पात कैसे कर सकते हैं? पहली बात तो यह सोचनी चाहिए। रामायण जिसने लिखा वो कौन था? बाल्मीकी, एक डाकू या, एक डाकू भी था और एक मछुआरा भी था। उससे रामायण राम ने लिखवा देवा भीलनी के झूठे बेर खा के दिखा दिया। और गीता का लेखक, व्यास कौन था? दो भी एक भीलनी का नाजायज़ पुत्र था। ये सब उन्होंने इसलिए किया, यह दिखाने के लिए किया, कि जाति -पाति से जो हम एक दूसरे को अलग कर रहे हैं ये हमारे अन्दर का रूझान (झुकाव) है। जिसका झुकाव परमात्मा की ओर है, उसी को ब्राह्मण कहा जा सकता है। उस हिसाब से बाल्मीकि ब्राह्मण थे और व्यास भी ब्राह्मण थे। कर्म के जाति अपने यहाँ बहुत देर के बाद मानी गई। अनुसार और उसको बार-बार, जो-जो, बड़े -बड़े अवतरण हुए उन्होंने, खंडित करते गये। उन्होंने जाति-प्रथा को खंडित कर दिखाया। आप कबीर दास जी के बारे में जानते हैं कि उनके गुरू ब्राह्मण थे। और एक दिन वो जाकर उनके रास्ते में लेट गए। जब इनके (गुरू क) पाँव उनको लगे, तो उन्होंने (कबीरदास जी न) उनके पांव पकड़ लिए। क्योंकि वो पहुँचे पुरुष थे, उन्होंने (गुरू जी न ) कहा, ठीक है । वे उन्हें (कबीर दास जी को) अपने साथ ले गए और उन्हें अपना शिष्य मान लिया। और उनके गुणों के कारण उन्हें बहुत सम्मान दिया। इसी प्रकार महाराष्ट्र के महान कवि नामदेव जो कि दर्जी थे। उनकी नौकरानी तो कोई नीची जाति की स्त्री रही होगी। उसकी भी कविताएँ ग्रन्थ साहिब में हैं। और नामदेव जी की तो हैं ही गुरू नानक जी ने इनको पहचाना, क्योंकि वो भी एक पहुँचे हुए पुरष थे। जो वहाँ पहुँच जाते हैं, वो समझते हैं, कि कौन असल है और कौन नकल। तो जों धर्म नकली हैं जिससे हम लोग घबरा जाते हैं उनके लिए हमें दयार्द्र होना चाहिए। उनके प्रति दया रखनी चाहिए क्योंकि वो अन्धे हैं। जैसे कबीर साहब ने कहा ‘कैसे समझाऊँ सब जग अंधा’। जो अन्धे लोग हैं वो ऐसे ही अन्ध पन में रहते हैं। कोई कहेगा मैं ईसाई हूँ, कोई कहेगा मैं मुसलमान हूँ, कोई कहेगा मैं सिख हूं। जैसे ही आप कहेंगे, मैं ये हूँ आप अपने को अलग हटा लेते है। लेकिन सहजयोग में आप समझ गए हैं कि सब धर्मों का तत्व एक है। हम सब धर्मं को मानते हैं। जैसे ही हम सब धर्मों को मानने लग गए, तब ये जो fundamentalism जो आज का प्रश्न है, आज का प्रश्न यही है – धर्मधमान्धता – उसमें जो आज झगड़े सारे विश्व में फैले हुए हैं, एकदम खत्म हो जाएंगे।

जैसे ही आपने यह सोच लिया कि सब धर्मों का तत्व एक ही है, पर सोचने से भी नहीं होगा, ये अन्दर आत्मसात होना चाहिए। ये हमारे अन्दर बैठना चाहिए, और वो आपके अन्दर बैठ गया है, सारे विश्व में बैठ गया है। आप को पता है सहजयोग में मुसलमान हैं, हिन्दु हैं, ईसाई हैं, सिख हैं, बौद्ध हैं, हर तरह के लोग इसमें आए हैं और सब अपने-अपने धर्म को मान भी रहे हैं। पर जब वो अपने को मान रहे हैं, तभी वो विश्व धर्म को मान रहे हैं । जब आपने एक विश्व धर्म को मान लिया, उस विश्व धर्म में सारे ही धर्म हैं और सब धर्मों का मान करना विवेकशीलता है। यही समझ 6. की बात है। सब अवतरणों का मान करना, जितने भी आज तक बड़े-बड़े सन्त, साध J, दृष्टा हो गए, सबका मान करना। यह सिर्फ कहने से नहीं होता, समझाने से नहीं हो सकता। यह आत्मा के प्रकाश में अपने आप अन्दर बैठ जाता है। उसको फिर कहने की ज़रूरत नहीं होती। तब आप सोचिए कि आप सहजयोगी हो गए। सहजयोगी हो गए, माने आप बढ़िया लोग हो गए। आप किसी का कत्ल नहीं कर सकते। आप किसी की कोई चीज़ छीन नहीं सकते, आप चोरी-चकारी कुछ नहीं कर सकते । करते ही नहीं। आप किसी की बुराई नहीं करते, आप किसी को नीचे खींचने का प्रयत्न नहीं करते या आप किसी भी प्रतिस्पर्धा (competition) में नहीं पड़ते। आप को यह नहीं लगता कि मैं इसकी खोपड़ी में जा कर बैठ जाऊँ, मैं इसकी गर्दन काट लूँ, जहाँ हैं वहाँ समाधान में आप बैठे हैं और अपने ही आप उन्नत हो रहे हैं। आप किसी के साथ दुष्टता नहीं करते। देखिए, सास होती है, बहु होती है, कभी बहु सास को सताती है तो कभी सास बहु को सताती है। पर सहजयोग में ऐसा बहुत कम होता है। दिखाई ही नहीं देता। ऐसे ही आप की गृहस्थी में आदमियों की और औरतों की जो स्थिति है, वह विशेष है। पति पत्नी में आपस में पूरी तरह से ऐसी एक – तारता है कि पति किसी ओर औरत की तरफ देखता नहीं और पत्नी किसी ओर पुरूष की तरफ देखती नहीं। इतनी शुद्धता है। हमारे यहाँ कितने ही सहजयोगी हैं, कितनी ही सहजयोगिनियां हैं। कोई बहुत खूबसूरत है, कोई नहीं है। कोई बहुत खूबसूरत आदमी है कोई कुछ हैं। ये जो बाह्य का आकर्षण लोगों को होता है, वो आपमें नहीं हैं क्योकि आप स्वाभिमान में हैं । आपको अपने स्व का अभिमान है। आप की आँख अब ठहर गई है, आप की आँख

अब चंचल नहीं रही। आप की नज़र ही इधर उधर नहीं घूमती। आपके दिमाग में ही यह बात नहीं आती, अब तो आपके बच्चे, आपके माँ-बाप आपको देखते हैं तो वे भी आश्चर्य चकित हो जाते हैं, अभिभूत हो जाते हैं कि देखो कैसे हो गए ये लोग। ये चोरी नहीं करते, झूठ नहीं बोलते, मारते नहीं, पीटते नहीं , कोई दंगा नहीं, फसाद नहीं, कुछ नहीं। इतने शांतिमय, इतने आनन्दमय, आप सब लोग हो गए। लोग मुझ से कहते हैं कि आप इतनी बीमारी ठीक करते हैं , इतना कुछ करते हैं आप पैसा नहीं लेते । और आप लोग कहाँ लेते हैं? आप लोग भी तो सहज का काम में ही कर रहे हैं। मैंने तो किसी को नहीं देखा कि सहज के काम के लिए आप मुफ्त लोग पैसा माँगते हैं या कुछ करते हैं । एक से एक कविताएँ आप लिखते हैं, एक से एक गाने आप गाते हैं। कोई भी मैंने देखा नहीं जो कहता हो कि नहीं इस काम में मुझे पैसा चाहिए। कितनों को आपने जागृति दी, कितनों को आपने पार कराया है , कितने ही केन्द्र (Centre) आपने बसाए हैं लेकिन मैंने कहीं नहीं सुना कि इसके लिए “माँ इतनों को हमने जागृति दी तो आप हमें उसका पैसा दीजिए या उसके लिए आप हमें कोई खिताब दीजिए कि इतने 108 जागृति वाले या 1008 जागृति वाले। ऐसा कुछ नहीं। इस पर आपको हंसी भी आती हैं कि ये सब क्या है? इन सब बाह्य चीजों से आप लोग अपने आप ही उठ गए और आप अपने बारे में कुछ जानते ही नहीं। मुझे तो यही देख-देख करके बड़ा आश्चर्य होता है कि आप अपने बारे में जानते ही नहीं। सब मुझ ही को गौरव दिए जा रहे हो । मैंने गौरव के ऐसे कौन से काम किए हैं? मुझे तो समझ में नहीं आता। आपके अन्दर अपनी शक्ति है वो जागृत हो गई और आपने अपनी आत्मा को प्राप्त किया। उस आत्मा की वजह से सब कुछ हो गया और कितनी गौरवशाली बात है कि आपने अपने गौरव को प्राप्त किया। आप बंदूक लेकर किसी को मारेंगे नहीं , किसी का घर लूटेंगे नहीं, किसी औरत को विधवा नहीं करेंगे, किसी के बच्चे का आप अपहरण नहीं करेंगे। कभी कर ही नहीं सकते। मेरे कहने से कुछ नहीं। आप शराब नहीं पिऐंगे। आप चरस नहीं खायेंगे। क्या क्या होता है दुनिया भर की गंदगी? आप कोई गंदी जगह ही नहीं जाएंगे। आप कोई गंदे चित्र नहीं देखेंगे। गन्दी किताब नहीं पढ़ेंगे। मुझे कहने की जरूरत नहीं। आप पढ़ेंगे ही नहीं। कोई गन्दी बात करेगा, आप सुनेंगे ही नहीं। आप को अच्छा ही नहीं लगेगा । कितने शुद्ध हो गए हैं आप लोग। और अपनी को आप कितने यत्न से रखते हैं। इस यत्न को आप शुद्धता

लोगों ने समझा ही नहीं। कोई ऐसी वैसी चीज़ होगी, आप वहाँ से भाग निकलेंगे, मुझे नही चाहिए। और अगर कहीं जाना ही पड़ गया, तो उसे एक नाटक की तरह से आप देखते हैं। बहुत से लोग बताते हैं, मैं वहाँ गया था तो देखा वो सब शराब पी-पी के कैसे रहे थे। किस तरह औरतों के साथ बातचीत कर रहे थे । और मुझे आकर घूम के सब वर्णन बताते हैं। ये दृष्टि जो कि एक साक्षी स्वरूप की है, वो आपके अन्दर अकस्मात् आ गई। दूसरा आपस का प्रेम-भाव। इस्लाम में इस पर बहुत कुछ कहा गया कि आपस में प्रेम भाव, बंधुत्व और औरतों के प्रति कही। इस कदर आपस में प्रेमभाव है। बहुत ही पहले की बात है, सिसिली (इटली) में एक लड़की इंगलैंड से गई थी। पता नहीं किस काम से गई थी। शायद पर्यटन के लिए गयी थी। दूसरी और एक लड़की फ्रांस से वहाँ पहुँचीं। दोनों जने एक ही रेस्तरां में कुछ खा रही थीं। देखते-देखते एक ने दूसरे को देखा और न जाने क्यों उनको लगा इससे कुछ vibrations (चैतन्य) आ रहीं हैं, तो एक उठके दूसरे के पास गई और उससे कहती है “क्या तुम्हें श्री माता जी ने आत्मसाक्षात्कार दिया है?” उसने कहा, हाँ, और तुम्हें भी दिया हैं न?” और बस फिर दोनों एक दम गले मिल गए। अमेरीका में जाएँ, कहीं भी जायें बस सहजयोगी देखकर गुदगदू हो जाते हैं। सोचते हैं इन्हें कहाँ रखें, इनकी क्या सेवा करें, कैसे इनको रखें? मैंने कहीं सुना नहीं कोई सहजयोगियों को किसी ने सताया । कोई भी कहाँ से भी आए, यहाँ तक कि कुछ कुछ लोग फायदा उठाते हैं, झूठ-मूठ कह कर तो भी उनकी खातिर तवज्जो करेंगे । ये भी नहीं पूषछेंगे कि तुम कहाँ से आए, तुम्हारे पास कोई आथोरिटी वगैरा है, कोई चिट्ठी वैगरा है? कोई भी पहुँच जाए बस सेवा में लग जाएँगे। एक बार एक साहब मद्रास में गए और कहा, “हमको श्री माता जी ने भेजा है। और हम यहाँ काम करने आए हैं।” उसने कहा हमें एक घोड़ा ला दो। तो सहजयोगियों ने उसे एक घोड़ा ला दिया। उसने और भी माँगा, जो उन लोगों ने उसे ला दिया। बाद में मुझे मालूम हुआ कि यह दुष्ट sisterhood (भगिनी भाव) की बात भी १) कुछ अपने आप ही गया हुआ था और मेरा उससे कोई सम्बन्ध नहीं था। इस प्रकार प्रेम उमड़ता है लोगों में। दूसरा यह कि हर एक आदमी में कभी न कभी, कोई न कोई चक्र खराब रह भी गया, तो भी उसको अत्यन्त प्रेम से लोग देखते हैं। हाँ, जब तक कि उसकी हालत बहुत खराब न हो। स्वयं तकलीफ सह कर भी उसे ठीक

करते हैं। उसकी तकलीफ स्वयं सहते हैं और मुझे कभी-कभी बड़ा आश्चर्य होता है । कि कुछ कुछ तो इतने पकड़े हुए लोग होते हैं, तो भी कभी मुझ से आकर शिकायत नहीं करेंगे कि ये बड़े पकड़े हुए हैं, इनको सहजयोग से निकाल बाहर करें। मैंने सिर्फ एक ही बात देखी है कि अगर कोई मेरी निन्दा करता है, तब आप लोगों से बर्दाशत नहीं होती। तब फिर आपकी बर्दाशत सारी खत्म हो जाती है। ये तो मैंने देखा हुआ है और यही एक पहचान है कि आपको मुझसे बहुत प्रेम है। इतना ज़्यादा प्यार आपने मुझे दिया है, इतना ज़्यादा मुझे भरोसा हो गया है। मेरा जो एक स्वप्न था कि सारे संसार में जागृति हो जाए। जब तक जागृति नहीं होगी, तब तक संसार के प्रश्न नहीं मिट सकते। क्योंकि हमारी वातावरण संबन्धी, आर्थिक, राजनैतिक, पारिवारिक आदि जो समस्याएं हैं इनकी जिम्मेदारी किसकी है? इंसान की है। इंसान ने ही ये प्रश्न खड़े किए हैं। और यही इंसान अगर बदल जाए और इसके अन्दर वो (universality) विश्व बंधुत्व आ जाए तो झगड़ा किस चीज़ का करेंगें? अगर सभी एक चीज़ को मानते हैं, सबको एक ही चीज़ मालूम है, तो झगड़ा किस बात का? और फिर ये जो सारे प्रश्न हैं, ये भी अपने आप ठीक हो जाते हैं । अब देखिए इतना सुन्दर आपका आश्रम बन गया। आप लोगों की इच्छा, आप लोगों ये बहुत बड़ी चीज़ है। अब आप जब भी अखबार पढ़े तो सामूहिक रूप से इच्छा करें कि माँ पंजाब की सारी समस्या समाप्त हो जानी चाहिए। समाप्त हो जाएगी। का मन, कुछ न कुछ बन जाएगा। आपको और भी कोई प्रश्न हो, जैसे दरिद्रता अपने देश में बहुत है। वो सिर्फ दरिद्रता दरिद्रता करने से नहीं जाएगी। नदी के बीच की धारा की तरह हम लोग, बीच की धारा में हैं। हम लोग बड़े रईस भी नहीं हैं और बड़े गरीब भी नहीं हैं। जब बीच की धारा बढ़ती जायेगी तो इधर रईस भी इसमें आ जाएँगे और गरीब भी इसमें समाते जाएँगे और इसी तरह से हमारे प्रश्न छूटेंगे। बहुत से लोग गरीबी चाहते ही हैं कि हो, जिससे उनका बोलबाला बना रहे। अब आप लोग अपनी शक्ल देखिए कि सबकी कितनी तेजस्वी शक्लें हो गईं। कोई अगर एयरपोर्ट पर देखते हैं तो कहते हैं, ये किसके शिष्य हैं? सबकी शक्लें इतनी तेजस्वी हैं। पर मैंने बहुत सारे लोग देखे हैं जो कि गेरूआ वस्त्र पहन के सब बाल-वाल, काट-कूट करके और खड़े हुए हैं। और वहाँ देखने में तो ऐसा लगता हैं खुद

जैसे अभी अस्पताल में जाने वाले हैं। और कोई-कोई ऐसे क्रोधी दिखाई देते हैं कि उनसे दूरी से बात करें, नहीं तो इतनी गर्मी आपको आएगी कि पता नहीं कुछ बात की तो झापड़ ही न मार दें। तो किसी में भी आप नहीं पाईयेगा, इस तरह की शालीनता, इतना प्यार, इस तरह का आपस का प्रेम। ये किसी भी समाज में नहीं है, हमारे सहजयोग में है। इसके लिए आपका अभिनन्दन होना चाहिए और आपकी विशेषता होनी चाहिए। आप लोग सब मेरी पूजा करते हैं। उससे कहते हैं फलां लाभ-वाभ होता है। जो भी होता है, हा , उसके लिए मैं क्या करूँ लेकिन ये ज़रूर कहूँगी कि इस पूजा के पीछे में आप लोग हो। आप अगर ऐसे नहीं होते तो कितनी भी पूजाएँ हों। (क्या मंदिरों में कम पूजाएँ होती हैं। कितने स्वयंभू बने हुए हैं । क्या कुछ कम होता है? बहुत कुछ होता है।) लेकिन किसी के अन्दर कुछ घुसता ही नहीं। इतना करते हैं। अभिषेक वगैरह देवी पर। पर हैं जैसे के तैसे। जो करना है, वो करेंगे ही। जो गलत काम है वो करते ही रहेंगें। कुछ उनमें विशेषता नहीं है । लेकिन सहजयोग एक बड़ी विशेष चीज़ है और आज देखिए, इतने देशों मे सहजयोग फैल गया कि मुझे बड़ा आश्चर्य होता है। इतना तो मैंने कभी नहीं सोचा था कि इतना हो जाएगा। सोचा था हो जाएँगें कुछ लोग, फिर वो आगे करते रहेंगे। लेकिन मेरी जिन्दगी में इतने लोग इसे प्राप्त करेंगे ऐसा मैंने कभी नहीं सोचा था। और जो मेरे मन में एक स्वप्न था वह वाकई आज साकार हो गया है। अब जब कुछ भी आप लोग करें, कुछ भी आप सोचें, किसी भी चीज़ में आप हाथ डालें, पहले याद रखना चाहिए कि हम लोग योगीजन हैं। हम सर्वसाधारण नहीं, हम योगीजन विशेष हैं और इसलिए हमको विशेष रूप से सबकी और नज़र करनी चाहिए और देखना चाहिए। और जितने लोग हो सकें उन्हे योगी बनाना चाहिए। इसी से सारे संसार का भला होने वाला है, जैसे हमारा भी भला हुआ। आज मेरे जन्म-दिन पर है। यही कहना है कि आप लोगों का फिर से जन्म हो चुका हर जन्म दिन पर आयु बढ़ती ही जाती है। आयु के साथ अगर आपमें प्रगल्भता न आए, परिपक्वता न आए तो ऐसी आयु बढ़ने से कोई लाभ नहीं। आप भी अब सहजयोग में बढ़ रहे हैं लेकिन इसमें ज़रूरी है कि हमारे अन्दर भी प्रगल्भता आए, परिपक्वता ( maturity ) आनी चाहिए। जब आप धीरे धीरे इस में पक जाएँगे तब आप स्वयं ही एक बड़े भारी वृक्ष

की तरह अनेक लोगों का फायदा कर सकते हैं। आप सब में ये शक्तियाँ आयी हैं और मैं चाहती हूं कि मेरी सारी शक्तियाँ जो कुछ भी आप सोचते हैं, आप सब में आ जाएँ। और आप सब एक से एक बड़े हो जाएँ। माँ तो हमेशा यही सोचती हे कि अपने बच्चों को अपने से कहीं अधिक ज्यादा सुख मिलना चाहिए। बड़ी खुशी की बात है कि आप लोग बड़े आनन्द से बैठे हुए हैं और उस निर्वाण का उपभोग ले रहे हैं जिसके लिए बहुतों ने अनेक प्रयत्न किए थे। इतने सहज में आपने सब प्राप्त कर लिया, यह भी आपके पूर्व पुण्याई है। मेरा आप सब पर अनन्त आर्शीवाद तो है ही लेकिन हर समय ख्याल बना रहता है, हर जगह का, और जब आपको छोड़ कर जाते हैं तो ऐसा लगता है कि किसी ने मेरा दिल ही खींच लिया। फिर यही सोचती हूँ कि आगे जहाँ जाना है वहाँ कितने लोग खड़े होंगे। जब उनको देखते हैं तब फिर ये सारा कुछ ऐसा लगता है कि ठीक है। यहाँ के बच्चे वहाँ हैं और वहाँ के बच्चे भी हैं और सारा कुछ जो है पूरी तरह से तृप्त हो जाएगा। इस तरह से चल रहा है और सफर बहुत है । मुझे अभी तो लगता नहीं कि मैं कोई सत्तर साल की हो रही हूँ। आप सब को देखकर के बहुत आनन्द से विभोर हूँ मैं। और ये सोचने का तो समय ही नहीं रहता कि उमर क्या हो रही है अपनी। आप सब को अनन्त आशीर्वाद।