Easter Puja: You have to grow and take up the responsibility

Magliano Sabina Ashram, Magliano Sabina (Italy)

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1992.04.19 ईस्टर पूजा, टॉक, रोम, इटली डीपी

यह दिन हम सब के लिये हर्षित होने के लिए एक बहुत बड़ा दिन है और ईसा मसीह के इस पुनरुत्थान का आनंद लेने के लिए। ईसा मसीह का पुनरुत्थान हम सबका आज्ञा चक्र खोलने के लिये हुआ था। क्योंकि यह एक बहुत ही सूक्ष्म चक्र था जैसा की आप जानते हैं, बहुत जटिल। मनुष्य की जड़ता से परिपूर्ण विचारों के कारण और उनके अहंकार से, जिसने आज्ञा चक्र को बुरी तरह से बंद किया हुआ था, जिसमें से कुंडलिनी का निकलना पूर्णतय असंभव सा लगता था। इसलिए पुनरुत्थान का यह खेल खेला गया और ईसा मसीह मात्र चैतन्य थे और कुछ भी नहीं। वह मृत्यु से पुनर्जीवित हुए ऐसा कहा जाता है। ईसा मसीह की इस मृत्यु के कारण, हमें समझना होगा कि हमें हमारा पुनरूत्थान प्राप्त हो सका। हमने पुनरूत्थान प्राप्त किया और इसी के साथ जो कुछ भी भूतकाल में था वह नष्ट हो गया, अब समाप्त हो गया।

इसलिए हमारे भीतर जो पश्चाताप है, जो जड़ता है वो समाप्त हो चुकी है। किन्तु फिर भी यह बहुत आश्चर्य की बात है कि ईसाई राष्ट्रों में अहंकार उस प्रकार से कम नहीं हुआ जैसा कि होना चाहिए था। सम्भवतः यह हो सकता है कि यहाँ ईसा मसीह को कभी भी उचित प्रकार से पूजा नहीं गया। पश्चिमी देशों में अहंकार इतना प्रभावी है कि कोई नहीं देख सकता कि वो क्या कर रहे हैं और कितनी दूर जा रहे हैं। बिना कारण ही वो किसी ऐसी बात का पश्चाताप कर रहे हैं जो अवास्तविक हैं। किन्तु पश्चाताप हमारे अहंकार के लिए था। यह बहुत अचंभित करने वाला है कि कई बार जब आप देखते है कि कैसे ईसाई देशों ने अन्य देशों पर आक्रमण किया, उनकी प्रजाति को पूरी तरह से विध्वंस कर दिया, विनाश कर दिया, उन्हें पूरी तरह से समाप्त कर दिया। वो ईसाई थे, ईसा मसीह के अनुयायी जिनके हाथ में बाइबिल थी। क्या आप कल्पना कर सकते हैं? इस प्रकार की भयानक बातें इन तथाकथित ईसाइयों ने की है, ईसा मसीह के नाम पर। ऐसा क्यों हुआ, हमें समझना होगा, इस अहंकार ने पश्चिमी देशों को बहुत अधिक प्रभावित किया या उन देशों को जहाँ पर ईसाई धर्म का पालन हुआ। कहीं भी यदि वो ईसाई हैं तो वो बहुत आक्रामक, बहुत ही हिंसक हैं और उन्हें लगता है कि पूरा संसार उनका है। यहाँ तक कि हिटलर भी कैथोलिक धर्म में विश्वास रखता था। ईसा मसीह के इस महान बलिदान ने भी उन्हें कोई सबक नहीं सिखाया, जैसे कि यह सब उनकी स्मृति से ही चला गया हो, जैसे कि उनके लिए इसका कोई अर्थ ही न हो, इसने उन्हें कोई संदेश नहीं दिया हो और वो इतने अधिक हिंसक हो गए। इतना ही नहीं बल्कि उन्हें लगा कि उन्हें पूरे संसार पर राज करने का अधिकार है, सबको लूटने, सबको तबाह करने का। क्यों? क्योंकि वो ईसाई थे। यह ईसा मसीह के जीवन प्रसंग से कितना विपरीत है, जो तथाकथित मृत्यु के पश्चात पुनर्जीवित हुए थे। किन्तु अहंकार तो अभी भी बना हुआ है, इतना ही नहीं किन्तु यह फूल गया है, इस सीमा तक फूल चुका है कि आज हम देखते हैं कि ईसाई पूर्णतया मर्यादा विहीन हो चुके हैं|

जिस प्रकार से ईसाई गिरजा व्यवहार कर रहे हैं, चौंकाने वाला है। उनमें किसी भी प्रकार की नैतिकता नहीं बची है। उनके पास कानून के लिए कोई सम्मान नहीं है, परमात्मा के लिए कोई सम्मान नहीं है, पवित्रता के लिए भी कोई सम्मान नहीं है, जो ईसा मसीह का मुख्य संदेश था, ईसा मसीह का मुख्य गुण। इसने मुझे चोंका दिया जब मैं छोटी थी और मैंने देखा क्योंकि मैंने एक ईसाई परिवार में जन्म लिया था, मैंने पाया कि भारतिय ईसाई सबसे अधिक हठधर्मी, सबसे अधिक हावी लोग थे और इसने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया कि कैसे उन्होंने ईसा मसीह को महत्वहीन समझ लिया? और क्यों वो दूसरों पर हावी होने के लिए उनके नाम का प्रयोग कर रहे हैं?

दुर्भाग्य से उस समय हम पर अंग्रेजों का शासन था। अंग्रेजों ने भी पूरी बात को इस चतुराई के साथ प्रबंधित किया कि भारतीयों का मानना था कि ईसा मसीह का जन्म इंग्लैंड में हुआ था। वो अंग्रेजों की तरह कपड़े पहनते और स्वयं को साहिब कहते थे। वो बहुत ही अभिमानी व्यवहार करते थे और सरकार में उनके स्थान थे। उन्होंने सरकार से हाथ मिला लिया। उनकी भारतीयों के प्रति कोई निष्ठा नहीं थी। यहाँ तक कि जब मेरे पिता को गिरफ्तार किया गया तो उन्होंने हमें ईसाई समुदाय से बाहर फेंक दिया। उन्होंने मुझे स्कूल से बाहर निकाल दिया जब मैं मात्र छह – सात साल की लडकी थी, क्योंकि मेरे पिता एक कांग्रेसी थे।

तो ईसाई धर्म के इस पक्ष को अब तक किसी ने नहीं देखा, में व्यक्तिगत रूप से सोचती हूँ कि सभी ईसाई राष्ट्र अत्यंत क्रूर, अत्यंत हावी रहे हैं और आज सभी मामलों पर उनका नियंत्रण है| यह सूक्ष्म अहंकार, जो कभी कुछ सम्राटों की संपत्ति थी अब लोकतांत्रिक देशों के सभी आम लोगों में मिलता है और हम पाते हैं कि यह सभी देश विनाश से भर चुके हैं। ऐसा नहीं है कि यह मात्र युरोपीयों द्वारा किया गया बल्कि अमरीकी भी अत्यंत हावी और अत्यंत अहंकारी हैं, मूर्खता की हद तक। कल्पना कीजिए वो ईसा मसीह का अनुसरण करते हैं जो विवेक थे, विवेक का स्रोत थे और उनके शिष्य इतने बेवकूफ और मूर्ख निकले कि समझाया नहीं जा सकता। ऐसा क्यों होता है? तो हमें इसाई धर्म के इतिहास को देखना होगा।

जैसा कि आप जानते हैं उस समय पीटर नाम का एक व्यक्ति था, पीटर एक बहुत ही अहंकारी व्यक्ति था और एक बार  ईसा मसीह ने कहा था कि “आप एक शैतान हैं।” स्पष्ट रूप से कहा और यह भी कहा कि, “आप मुझे नकार दोगे”, तीन बार। यही वह समय है जब यह पॉल आया और उसने सोचा कि यह कब्ज़ा करने का बहुत अच्छा अवसर है, किसी ऐसे व्यक्ति पर जो एक कमज़ोर व्यक्ति है, जो शैतानी है, जो एक प्रकार से ईसा मसीह का विरोधी है और उसे पीटर मिल गया। एक बहुत बड़ा नौकरशाह होने के नाते उसने उसे आकृष्ट किया, उसे प्रबंधित किया और उसे अपने विश्वास में ले लिया और उससे कहा कि “आप मेरे साथ हाथ मिलाओ तब मैं आपको मुख्य व्यक्ति बना दूंगा” और फिर उसने अन्य सभी शिष्यों से कहा कि “आप इतने शिक्षित नहीं हो। मैं एक बहुत शिक्षित व्यक्ति हूँ और मुझे पता है कि क्या लिखना है, क्या नहीं लिखना है, इसलिए हमें उन सभी बातों को नहीं लिखना चाहिए जो आपने लिखी हैं, हमें इसे संशोधित करना चाहिए।

उसने बाइबल का संशोधन कर दिया, पॉल नाम के इस शैतान ने। इसने बाईबल का संशोधन किया। ईसा मसीह का पूरा कार्य इस शैतान के हाथों में चला गया। उसने इसका संशोधन आरंभ कर दिया और जब उसने संशोधित कर दिया, यदि उसे आप पढ़ते हो, तो आप आश्चर्यचकित हो जाओगे कि यह अहंकार से भरा हुआ है। उसका आयोजन अहंकार से भरा है जो कुछ भी वह लिखता है, पूर्णतया। किन्तु उसने कई ऐसी बातों को काट दिया जो वहाँ होनी चाहिए थी। ईसा मसीह ने कुंडलिनी के बारे में अवश्य उल्लेख किया होगा, मुझे विश्वास है। किन्तु इन सब बातों के बारे में एक भी शब्द नहीं है, उसने इन्हे हटा दिया, यद्यपि आपको फिर से जन्म लेना है और इन सब बातों को ईसा मसीह ने कहा था, मैथ्यू ने जोर दिया था। किन्तु उसने मैथ्यू के साथ लड़ाई की और वह निष्कलंक गर्भाधान को स्वीकार नहीं कर सका। उसे सच के बारे में बिल्कुल भी अनुमान नहीं था, वास्तविकता के बारे में, उन चमत्कारों के बारे में जो कि देवत्व के कारण घटते हैं। इसलिए उसने अस्वीकार कर दिया किन्तु तब भी मैथ्यू अपने सिद्धांतों पर टिका रहा। किन्तु जॉन भाग गया। उसने अपनी ही शैली आरंभ की हम जिसमें लोगों को नास्तिक कहते हैं और अन्य शिष्य, उनमें से थॉमस चले गए। इसलिए उन्होंने ल्यूक के सिद्धांतों और मैथ्यू के सिद्धांतों का संपादन किया और बहुत संघर्ष के साथ वो उसमें कुछ मूल चीज़ों को बना कर रख पाए।

तो यह शैतान ईसाई धर्म जैसे एक महान धर्म के क्षेत्र में प्रवेश कर गया और पूरी बात ही बेतुकी हो गयी और इस प्रकार बाइबल, जिसे वो अब अधिकार के रूप में प्रयोग करते हैं। उसमें ऐसे शब्द हैं कि लोग सोचना आरंभ कर देते हैं कि उनका कोई अन्त नहीं है। पहला वाला यह सुझाव देता है कि यदि आप, यदि आप एक गिरजा के सदस्य बन जाते हैं तो आप चुने गए हैं। किन्तु सबसे पहले उसने देखा कि यह लिखा जाना चाहिए कि पीटर इस गिरजा को आरंभ करेगा और उसी के पास चाबी भी होगी ऐसा स्वयं ईसा मसीह ने कहा है। उसे एक चट्टान पर बिढ़ाओ और वह गिरजा को आरंभ करेगा, असंभव! फिर मुझे मसीह के स्थान पर रख देना। क्या मैं एक दुष्ट व्यक्ति से ऐसा काम करने के लिए कहूँगी? क्या मैं समस्त देखभाल के लिए मात्र एक ही व्यक्ति को नियुक्त करूंगी? बाइबिल का यह भाग पूर्णतया ईशनिंदा है और इस प्रकार जब एक बार उसे वहाँ बिठा दिया गया, तब पीटर अपने ही अहंकार में खो गया, यह सोचकर कि उसके  जैसा कोई नहीं है। यह मात्र उसका कपट था जो सब कुछ प्रबंधित कर रहा था। यह सब उसके नौकरशाही मस्तिष्क के द्वारा किया गया था किन्तु पीटर ने यह खेल खेला क्योंकि वह मसीह का एक बहुत कमजोर शिष्य था। 

जैसा कि आप  जानते हैं वास्तव में हमारे पास बारह प्रकार के सहज योगी हैं और उन में से कुछ बहुत कमज़ोर है। वो कमज़ोर है क्योंकि उन में बहुत अधिक अहंकार है। वो किसी के साथ आगे नहीं बढ़ सकते। वो लोगों पर चिल्लाते हैं। वो दूसरों को परेशान करते हैं, वो किसी को अपने से अच्छा नहीं समझते हैं, वो सदैव आक्रामक रहते हैं, वो सामूहिक नहीं हो सकते। वो कभी भी एक दूसरे के प्रति प्रेम नहीं दिखाते। तो इस प्रकार के सहज योगी भी हैं, जो एक एक करके अपने रंग दिखा रहे हैं किन्तु उनमें से कुछ सीख रहे हैं और समझ भी रहे हैं कि यह सब गलत है ऐसा नहीं होना चाहिए। ईसा मसीह के पास यह सब करने के लिए कदाचित साढ़े तीन साल थे, किन्तु मुझे नहीं पता था कि इन बारह में से, एक ऐसा कपटी होगा, जिसे निश्चित रूप से एक ने पकड भी लिया, किन्तु यह पीटर इतना भयानक व्यक्ति हो सकता है कि अपनी स्वयं की महिमा के लिए, अपने स्वयं के हित के लिए वह बाइबल में ऐसे शब्द लिखेगा और इतना बड़ा अधिकार भी रखेगा।

मोहम्मद साहब के साथ भी ऐसा ही हुआ था। पहली बात यह कि मोहम्मद साहब ने कहा था कि कयामत का समय आएगा। इसका तात्पर्य है कि उन्होंने भविष्य की बात की थी। तो यह कैसे हो सकता है कि वो अंतिम थे? यदि वह अंतिम थे तो आपका पुनरुत्थान कैसे होगा? किन्तु पैगंबर की मोहर का तात्पर्य यह नहीं है कि अब यह बात निश्चित हो गई है कि कोई ईश्वर का दूत नीचे नहीं आ सकता। इसका तात्पर्य है मोहर, अर्थात् आप कह सकते है एक प्रकार का प्रतीक और वह आदि गुरु थे इसलिए उन्होंने स्वयं के लिए कहा “मैं प्रतीक हूँ।” उन्होंने यह नहीं कहा कि “मैंने मुहरबंद कर दिया है, किन्तु कुटिल लोग इन छोटे छोटे शब्दों का लाभ उठाते हैं और उनका उपयोग करना आरंभ कर देते हैं, अपने उद्देश्यों के लिए क्योंकि वो बहुत ही आत्मकेंद्रित होते हैं।

अतः दूसरे प्रकार के सहज योगी बहुत अधिक आत्मकेंद्रित हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार से बहुत आत्म केंद्रित है कि उन्हें पता है, मात्र अपनी पत्नीयों, अपने बच्चों और अपने घर और उन सब के बारे में। उनके लिए यह बहुत आवश्यक है अपने बच्चों के साथ व्यस्त होना। आप आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि कुछ लोग अपने बच्चों के साथ बंबई आए परन्तु दिल्ली में पूजा के लिए नहीं आए। वो किस प्रकार के सहज योगी हैं? इसलिए इस प्रकार के सहज योगी भी हैं जो कि सहज योग से अधिक अपने बच्चों के लिए चिंतित हैं, अपने मोक्ष से अधिक अपने परिवार के, अपने घर के बारे में चिंतित हैं। कुछ महिलाएं इसमें बहुत अच्छी हैं। वो अपने पतियों को आश्रमों से निकालने का प्रयास करती हैं। वो सामूहिकता से बाहर निकालने के बहाने ढूंढने का प्रयास करती हैं।

प्रत्येक क्षण हमारा आंकलन किया जा रहा है और आप स्वयं का आंकलन करें, स्पष्ट रूप से| इस समय दूसरों के बारे में मत सोचो जब मैं यह बोल रही हूँ, बल्कि स्वयं पर इसे लागू करो। आपको पता होना चाहिए कि ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया था और उन्हें किसने सूली पर चढ़ाया? वो यहूदियों द्वारा सूली पर नहीं चढ़ाए गए, यह एक अवधारणा है। वो सभी यहूदी जो मात्र गुलामों की तरह थे, कैसे ईसा मसीह को सूली पर चढ़ा सकते हैं? यह रोमन साम्राज्य था जो उस समय उन्हें सूली पर चढ़ाना चाहता था क्योंकि उन्हें लगा कि वह बहुत शक्तिशाली होते जा रहे हैं। 

(“कृपा बैठ जाईए”)

और जब उन्होंने ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाने का प्रयास किया तो उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि ईसा मसीह को सूली पर इसलिए चढ़ाया गया है क्योंकि यहूदी ऐसा चाहते थे। उन पर यह दोष डाल दिया गया था, मात्र उन लोगों को बचाने के लिए जो शासक थे और शासक सदैव ऐसा काम कर सकते हैं कि किसी को भी सूली पर चढाया जाए और किसी पर भी दोषारोपण कर दिया जाए। इसलिए ईसाई, प्रारंभिक ईसाई अधिकतर यहूदी थे। ईसा मसीह स्वयं एक यहूदी थे, इसलिए यह कहना कि यहूदियों ने ईसा मसीह को सूली पर चढाया, यह कैसे हो सकता है? इसलिए दोष यहूदियों पर डाल दिया गया था और तब ईसाइयों ने सोचा कि उन्हें यहूदियों से घृणा करने का पूर्ण अधिकार है क्योंकि ईसा मसीह को यहूदियों द्वारा सूली पर चढ़ाया गया था।

यह एक और विचार है जिसने पॉल महाशय के माध्यम से कार्य किया क्योंकि वह कोई दोष नहीं डालना चाहता था, रोमन प्रशासन पर। इसलिए पीलातुस अपने हाथों को धोता है और अपने हाथों को धोता है वह बहुत अर्थपूर्ण है, वो अपने हाथ धोते है। इसलिए वह ऐसा अपने अधिकार से नहीं कर रहा है बल्कि वह यह यहूदियों के अधिकारों के साथ कर रहा है। यह नाटक खेला गया था और फिर सभी ईसाई यहूदियों से घृणा करने में व्यस्त थे और यह सोच रहे थे कि उन्होंने ही ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया है। मेरा तात्पर्य है कि हजारों वर्ष हो चुके हैं जब ऐसा हुआ था और हजारों वर्षों में, किसी ने किसी को सूली पर चढ़ाया इस बात के लिए उनसे घृणा की जा रही हैं। मेरा तात्पर्य है कि उस प्रकार से तो सभी श्वेत जातियों से घृणा की जानी चाहिए। पीढ़ी दर पीढ़ी, यदि यही मापदंड है तो। क्योंकि उन्होंने मात्र एक आदमी को क्रूस पर नहीं चढ़ाया है करोड़ों- करोड़ लोगों को उन्होंने सूली पर चढ़ा दिया। क्या हम उनके बच्चों और उनके भी बच्चों को दोष देंगे?

अतः यह तीसरे प्रकार के सहज योगी हैं जो हर समय किसी और को दोष देने का प्रयास करते हैं, स्वयं को नहीं। ऐसे लोग जब दूसरों पर दोषारोपण करने लगते हैं तो कभी सुधर नहीं सकते। उन्हें आत्ममंथन करना चाहिए। किन्तु आत्मनिरीक्षण विद्यमान नहीं है, रूस के अतिरिक्त पश्चिमी देशों में। क्योंकि इस से निकलने का कोई मार्ग नहीं है। यह कहीं नहीं लिखा है कि आप स्वयं का आत्मनिरीक्षण करें।

मात्र तब जब आप गिरजा जाते हैं और किसी गूंगे और बहरे पादरी के सामने अपने पाप को स्वीकार करते हैं तब आप बच जाते हैं। इसलिए कोई आत्ममंथन नहीं करता। हमें स्वयं इसे देखना करना चाहिए क्या हम आत्ममंथन करते हैं या नहीं? या हम उस प्रकार के लोग हैं, सहज योगी जो इतने आत्मकेंद्रित नहीं हैं किन्तु वो हठधर्मी तथा स्वयं का गुणगान करने वाले लोग हैं, जो यह पता नहीं लगाना चाहते कि उनके साथ क्या गलत है।

अब हमारे पास एक और प्रकार है, चौथा प्रकार, जिसे देखना बहुत रुचिकर है कि वो घर में माताजी की पूजा कर रहे हैं किन्तु वो सामूहिकता में नहीं आ सकते। नहीं वो नहीं आ सकते, क्योंकि यह थोड़ा दूर है। किन्तु यदि उन्हें अपने पुत्र से मिलने जाना है तो वो मीलों दूर भी चलें जाएंगे। यदि उन्हें अपने परिवार के लिए कुछ करना है तो वो करेंगे। इतना ही नहीं बल्कि मान लीजिए कि उन्हें कोई व्यवसाय करना हो तो वो यात्रा कर लेंगे। सहज योग में किसी को भी नही कहा जाता अपनी नौकरी त्यागने को, अपना जीवन, जीवनशैली देने के लिए, इस प्रकार का कुछ भी नहीं है, किन्तु प्राथमिकता दिखनी चाहिए। वो अपने काम में बहुत व्यस्त हैं, कमाई के साथ जो कुछ भी कर रहे हैं और वो मात्र नाम कमाने के लिए बहुत परिश्रम कर रहे हैं, कलात्मक काम कर रहे हैं, संभवतः रचनात्मक काम, वो बहुत व्यस्त हैं, उनके पास स्वयं के लिए कोई समय नहीं है, परमात्मा के लिए समय नहीं है। इस प्रकार के लोग भी “ओह! हम माँ की पूजा करते हैं अपने रचनात्मक कार्यों से पहले हम माँ को प्रणाम करते हैं, उनसे सहायता लेते हैं और हम अपने कार्यों के लिए, अपनी रचनात्मकता के लिए उनसे पूर्ण सुरक्षा चाहते हैं”।

और कुछ सहज योगी ऐसे हैं जो अभी भी सोचते हैं कि धन बहुत महत्वपूर्ण है, अभी भी सोचते हैं| ऐसा नहीं है! सहज योग में हमें जब भी आवश्यकता होती है धन मिलता है। उनमें से कुछ, ” मैं एक व्यवसाय आरंभ कर रहा हूँ क्योंकि 0.001% मैं सहज योग को देना चाहता हूँ” और यदि आप कहते हैं “आप क्यों दे रहे हैं ?” यह सब आपका है माँ, 0.001%, यह सब आपका है। आखिरकार हम जो भी कर रहे हैं? यह सब आपका है।“

इस प्रकार की प्रवृति तब आती है जब आप सोचते हैं कि धन बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसे लोगों के लिए धन बहुत महत्वपूर्ण है जो इससे ऊपर परमात्मा को नहीं देख सकते। जो इस धन का सूक्ष्म लाभ नहीं देख सकते हैं। वो हर पाई की बहुत सतर्कता से गणना करते हैं, वो नहीं चाहते कि उनके परिश्रम से अर्जित धन उनकी आध्यात्मिकता के लिए व्यर्थ हो या हमारे पास ऐसे लोग हैं जो सहज योग की एक पुस्तक तक नहीं खरीदेंगे। एक टेप नहीं खरीदेंगे, वो इसकी नकल निकालेंगे, बचत आप जानते हैं ना, पाउंड बचाने के लिए या डॉलर बचाने के लिए। वो वह सब भी नही खरीदते जो आवश्यक है। वो एक चित्र तक नहीं खरीदते, किन्तु वो दूसरों से कहेंगे कि कोई इससे एक चित्र बना दे और हम उसे ले लें। ऐसा नहीं है कि खर्च करना आवश्यक है किन्तु प्रवृत्ति की बात है। यदि आप कुछ धन बचा सकते हैं तो बहुत अच्छा है, यदि आप कुछ समय बचा सकते हैं बहुत अच्छा है, किन्तु यह समय जो बचाया है वह क्या सहज योग के लिए है वो कदाचित ही समझते हैं।

यदि आप कुछ पढ़ये हैं, मैं बौद्ध धर्म पढ़ रही थी और मैं चकित थी वहाँ इतने सारे प्रतिबंध हैं कि यदि मैंने सहज योगियों पर एक भी लगा दिया आप सब भाग खडे होंगे। पहला यह है कि आप कोई लाभ नहीं कमा सकते, कोई लाभ नहीं। आप कोई भूमि नहीं खरीद सकते। आप दिन में मात्र एक बार ही अपना भोजन कर सकते हैं, आपको पूर्णतया शाकाहारी होना होगा। आप किसी की हत्या नहीं कर सकते। मेरा तात्पर्य है कि आप मनुष्य को मार सकते हो, क्योंकि यह नहीं लिखा है। किन्तु आप किसी भी जानवर को नहीं मार सकते, आप किसी भी मछली को नहीं मार सकते, आप एक मच्छर भी नहीं मार सकते। तो इस प्रकार का धर्म यहाँ है, जिसके बारे में वो कहते हैं कि बुद्ध ने इस के बारे में कहा था। मुझे नहीं लगता कि बुद्ध ऐसा कह सकते थे। इसलिए इन सभी महान अवतारों के अनुयायियों ने उन लोगों के साथ इतना गलत किया है जो हमारे लिए सुंदर धर्मों को लेकर आए और इसीलिए हम सत्य के मार्ग से पूर्णतया भटक रहे हैं। इसलिए जो लोग वास्तव में ईमानदार हैं और सत्य के मार्ग का पालन करना चाहते हैं उन्हें हर समय आत्ममंथन करना होगा और अपने भीतर यह पता लगाना होगा कि हम सत्य से कितनी दूर हैं।

तो अब हमारे पास एक और प्रकार के सहज योगी भी हैं, जो कुछ इस प्रकार के हैं मुझे कहना चाहिए कि जो त्योहारों का आनंद लेते हैं, आप देखें एक साथ मिलते हैं क्योंकि हमारे भीतर जुड़ाव की भावना है। हमें किसी न किसी से जुड़ा हुआ होना चाहिए। हमें इस समूह या उस समूह या उस समूह से संबंधित होना चाहिए। या तो आप ईसाई धर्म में जाएं या यहूदियों के पास या इस्लाम और या फिर राजनीति में। उदाहरण के लिए इंग्लैंड में वो आपसे प्रश्न पूछेंगे, “आपकी राजनीति क्या है?” मुझसे पूछा गया कि मेरी राजनीति क्या है। मैं इस प्रश्न को समझ नहीं पाई। सभी के पास राजनीति की छाप का होना आवश्यक है। मैंने कहा “इससे आपका क्या तात्पर्य है?

कहा, “क्या आप कम्युनिस्ट हैं?”

“नहीं नहीं मैं नहीं हूँ।”

क्या आप रूढ़िवादी हैं?”

“नहीं नहीं।”

“क्या आप समाजवादी हैं?”

“मैं नहीं हूँ।” ” तो फिर आप क्या हैं?”

“मैं एक मनुष्य हूँ।”

वो समझ नहीं सके कि मैं मात्र एक मनुष्य हूँ, अपने मस्तिष्क में बिना किसी राजनीति के। इसलिए संबंधित होने का विचार, मुझे इस पंथ या इस संप्रदाय से संबंधित होना चाहिए या इन तथाकथित धर्मों से। तो फिर आप सभी प्रकार की झूठी मर्यादाओं में सम्मिलित होना आरंभ कर देते हैं, सभी प्रकार के नियमों और विनियमों और बातों में आप स्वयं को बांधना आरंभ कर देते हो और आप बहुत प्रसन्न बहुत प्रसन्न हो। आप किन्हीं संप्रदायों से पूछते हो, “आप बिना दाड़ी मूछ क्यों हैं?” “ओह! हमारे धर्म में हमारा सिर मुंडा होना चाहिए।” “यह क्या है?” या ऐसा ही कुछ मूर्खतापूर्ण। जैसे आपके पास दाढ़ी होनी चाहिए या आपके पास मूंछे होनी चाहिए या कुछ जातिसूचक। समझ नहीं रहे हैं की वास्तविकता विविधताओं से भरी हुई है। विविधता होनी चाहिए। इस प्रकार यह एक सौंदर्यशास्त्र और सुंदर होने की भावना है। यदि आपके पास विविधता नहीं है तो आप एक व्यक्तित्व कैसे हो सकते हैं? ऐसा व्यक्ति जो इन व्यर्थ के बाहरी विचारों से बंधा हो, उस व्यक्ति का कोई व्यक्तित्व कैसे हो सकता है? यदि धर्म आपको एक व्यक्तित्व नहीं दे सकता है तो उचित होगा कि ऐसी चीज़ से दूर रहा जाए। यह आपको एक आंतरिक व्यक्तित्व देता है साथ ही एक बाहरी व्यक्तित्व भी देता है। और इस व्यक्तित्व का जब आप आनंद लेना आरंभ करते हैं तब ही कहा जाएगा कि आप एक सहज योगी हैं। जहाँ आपको नहीं कहा जाता है, चोरी न करने के लिए, किसी को चोट न पहुंचने लिए, किसी के साथ आक्रामक नहीं होने के लिए, अहंकारी नहीं होने के लिए, ऐसा कभी नहीं कहा गया, बल्कि एक व्यक्तित्व जो अपने आप को देखता है। किन्तु सामान्यतः लोग दूसरों को देखते हैं, स्वयं को नहीं।

यह भी पश्चिम की एक और समस्या है कि आप दूसरों को देखते हैं अपने आप को कभी नहीं। किन्तु यह सब चलता ही चला जाता है और चलता ही रहता है, जब तक हम वास्तव में अपने विचारों के दास नहीं बन जाते, किसी व्यक्तित्व को ले कर और हम प्रस्तुत करना आरंभ कर देते है, अपने अहंकार के माध्यम से उस व्यक्तित्व को और दिखाने की प्रयास करते हैं कि हम बहुत विशेष हैं। ठीक इसके विपरीत सहज योग है। इसे स्पष्ट रूप से समझने का प्रयास करें। हम सभी एक व्यक्तित्व हैं, आप सभी व्यक्ति हैं, आप सभी संत हैं और संत के रूप में सम्मानित किया जाना चाहिए। हमें आवश्यकता नहीं है, एक ही प्रकार का व्यक्तित्व रखने की। प्रत्येक को करना होगा—- मेरा तात्पर्य है कि कि यह होना चाहिये, विभिन्न प्रकार की बात करने की शैलियाँ, काम को करने की शैलियाँ, दिव्य प्रेम की अभिव्यक्ति की शैलियाँ। इसलिये हम एक प्रकार के सैन्य दल जैसे लोग नहीं बनते क्योंकि हम स्वतंत्र हैं। हम पूर्णतः स्वतंत्र हैं, क्योंकि हमारे पास प्रकाश है। हम जानते हैं कि हमें कहाँ तक जाना है, सही प्रणाली क्या है, किस पथ पर जाना है। ततक्षण ही आप जान जाते हो कि क्या सही है, यदि वह प्रकाश आपके अपने भीतर अच्छी प्रकार से प्रकाशित है तो आपको मुझसे पूछना नहीं है,  किसी से भी पूछ लें।

जब ऐसे लोग सामने आते हैं, तो समझते हैं कि सहज योग में पूर्ण स्वतंत्रता है, किन्तु, इसमें पूर्ण स्वतंत्रता इसलिए है क्योंकि आपके पास प्रकाश है। प्रकाश के आभाव में स्वतंत्रता व्यर्थ है, इसका कोई अर्थ नहीं है। आप सभी को चोट पहुंचाते हैं, आप सभी को परेशान करते हैं, सभी को यातना देते हैं। किन्तु प्रकाश के साथ, सर्वप्रथम हमारे साथ एक बड़ी बात हो जाती है कि जो धर्म इन महान देवदूतो और अवतारों द्वारा प्रचारित किए गए, स्वतः ही वो हमारा अभिन्न अंग बन जाते हैं। यहाँ यह है कि जापानी कहेंगे कि हम बौद्ध है और जितने चाहें उतने लोगों को मारते हैं या ईसाई जैसा मैंने कहा, उससे पूर्णतः विपरीत हैं जैसे वो हैं। तो फिर यथार्थ में आप एक सच्चे ईसाई और एक सच्चे मुस्लिम और एक सच्चे हिंदू बन गए हैं। और फिर आप अनुभव करते हो सभी धर्म वास्तव में सागर के एक भाग की तरह हैं और अब आप स्वयं को किसी विशेष धर्म की पहचान के साथ नहीं जोड़ते, बल्कि आप धर्म के सागर में कूद जाते हैं और वास्तव में एक प्रकार से आप सच्चे धार्मिक व्यक्तित्व बन जाते हैं।

मुझे आपको बताने की आवश्यकता नहीं है, आपकी नैतिकता के विषय में। आप बस देखते हैं, देखते हैं, आपने कैसे छोड़ दिया है, इनमें से कितनी ही गलत चीजों को जो आप किया करते थे। इतने सारे लोग मुझे लिखते भी थे, किन्तु मैंने उन्हें कभी नहीं पढ़ा, तो मैं सब कुछ जला दिया करती थी। मैं इसके बारे में जानने की इच्छुक नहीं हूँ। हम एक स्वतंत्र व्यक्ति हैं। उस स्वतंत्रता में, आप देखते हैं कि आपने इन सभी धर्मों को आत्मसात कर लिया है। आत्मसाक्षात्कार से पहले कोई भी, कोई भी धार्मिक नहीं हो सकता। वो दावा कर सकते हैं, वो एक ब्रैंड हो सकते हैं वो कुछ भी कह सकते हैं, किन्तु बाहरी रूप से, इतना ही नहीं वो उस धर्म के पूर्णतया विपरीत होते हैं जिसमें उन्हें आस्था होती है, पूर्णतः विपरीत और वो भटक जाते हैं, इतना ही नहीं, बल्कि धर्म के आधार को प्रदूषित करते हैं और धर्म का आधार उत्थान है। यदि धर्म आपको उत्थान पाने के लिए संतुलन नहीं दे सकता है तो यह उचित होगा कि हमारा कोई धर्म ना हो। नास्तिक अच्छे हैं जैसे रूसी, जिनका कोई धर्म नहीं है, जो मात्र अपने उत्थान के बारे में चिंतित हैं। हो सकता है कि इसी कारण से ईसा मसीह और महावीर परमात्मा के बारे में बात नहीं करना चाहते थे।

तो हमारे पास ऐसे लोग हैं जिनके भीतर प्रकाश है और वो स्वयं के प्रकाश के बारे में चिंता करते हैं  और वो चाहते हैं कि इस प्रकाश से वो सदैव प्रकाशित होते रहें और यह प्रकाश न मात्र उन्हें प्रबुद्ध करे, बल्कि दूसरों को भी प्रबुद्ध करें और वो इसके लिए कार्य करते हैं। वो एक प्रकार से उत्तरदायित्व लेते हैं। वो जंगल में जाकर ध्यान में नहीं बैठते हैं। नहीं, आपको कार्य करना है, आपको इस संसार में कार्य करना है। आपको सहज योग को दूसरों के लिए कार्यान्वित करना होगा। आपको उन्हें यह सुंदर अनुभूति देनी होगी, परमात्मा के साथ एकाकार हो जाने की। आपको इसका आनंद लेना होगा। सहज योग मात्र आपके आनंद के लिए नहीं है, जैसे कुछ शराबी एक साथ बैठकर शराब पीते हैं। यह आपका अपना कटोरा भरकर दूसरों को देने के लिए है, कई दूसरे जो वहाँ हैं।

इसलिए वो इस उत्तरदायित्व को लेते हैं और इसका आधार वह सत्य है जिसके बारे में वो जानते हैं। उन्हें नहीं लगता कि वो सहज योग पर एक दायित्व की तरह हैं। वो छोटी छोटी बातों के लिए मेरे पास नहीं आते “मैं अपने गंजे पिता के बाल कैसे उगा सकता हूँ?” जैसे बेतुके प्रश्न। यहाँ तक कि वो मुझे ऐसी बेतुकी बातें लिखते भी हैं। मैं आश्चर्यचकित हूँ, वो क्या सोचते है कि सहज योग एक ब्यूटी पार्लर की तरह है या क्या? उनका दृष्टिकोण बहुत अलग है?  महान ब्रह्मांड का दृष्टिकोण, महान ब्रह्मांड जिसे कि प्रबुद्ध किया जाना है। वो उसका अभिन्न अंग हैं और इस सार्वभौमिक धर्म को लोगों के जीवन में लाना है, आत्मसाक्षात्कार के माध्यम से, कुंडलिनी जागरण के माध्यम से। वह कठोर परिश्रम करते हैं, वो प्रयास करना नहीं छोडते, देखने के लिए कि लोगों को आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हो जाए। किन्तु यहाँ भी, थोड़ा सा एक सूक्ष्म अहंकार रहता है कि मैं यह कर रहा हूँ, मैं वह कर रहा हूँ।

इतने सारे लोग मुझसे पूछते हैं “माँ आप इतनी यात्रा करती हैं, आप इतना कार्य करती हैं, इस आयु में भी आप इतनी अच्छी प्रकार से कैसे निभा लेती हैं?” सर्वप्रथम मैं नहीं जानती कि मेरी आयु क्या है, मुझे चिंता नहीं है और दूसरा मैं कुछ नहीं करती। यदि मैं कुछ नहीं कर रही हूँ तो मैं कैसे थक सकती हूँ? मैं कुछ भी नहीं कर रही हूँ, जो कुछ भी है। यह सब कार्यान्वित हो रहा है, मैं मात्र देखती हूँ और आनंद लेती हूँ। इसलिए वो भी सोचते हैं “हम यह कार्य कर रहे हैं, हम वह कार्य कर रहे हैं” और इसके बारे में बहुत सचेत हो जाते हैं। तो फिर यह अहंकार महोदय, जो सूक्ष्म में अभी भी टिमटिमा रहा है, उसकी लौ बड़ी हो जाती है। यह एक ईसा मसीह विरोधी गतिविधि है, पूर्ण रूप से। तब मन का निर्माण आरंभ हो जाता है, आप देखिए, यह कार्यान्वित नहीं हो रहा है, यह ऐसा है, वैसा है। वह दूसरों की आलोचना करना आरंभ कर देते हैं। अभी भी दूसरों को देख रहे हैं, स्वयं को नहीं।

इसके बाद वो सहज योगी हैं जिन्हें ऐसा नहीं लगता। वो समझने लगते हैं कि परम चैतन्य ही सब कुछ कर रहा है और उनके माध्यम से कार्य कर रहा है। वो यन्त्र हैं और कभी कभी यदि यह विफल रहता है तो वो संदेह करना आरंभ कर देते हैं। “तो फिर यह कैसे माँ यह बात इस प्रकार से कैसे हो गई? यदि ऐसा है, तब यह कैसे कि गोर्बाचेव को राजनीति छोड़नी पड़ी?” मुझे यह समझाना होगा कि गोर्बाचेव को राजनीति क्यों छोड़नी पड़ी, कल्पना कीजिए। यह मेरा उत्तरदायित्व है। निःसंदेह हम परमात्मा से कोई भी प्रश्न पूछ सकते हैं। 

ऐसा मनुष्य सोचते हैं कि उन्हें अधिकार है,  परमेश्वर से कोई भी प्रश्न पूछने का, उन्हें कोसने का, जो कुछ भी वो चाहें परमात्मा को उसे कहने का, जैसे कि वह एक ऐसा व्यक्ति है जिसने आपका दायित्व लिया है। तो यह अभी भी थोड़ा सा लटका हुआ सा है जबकि वो बहुत समर्पित हैं यद्यपि मन में अभी भी कुछ संदेह है।

किन्तु फिर ऐसे लोग भी हैं जिन्हें किसी बात पर संदेह नहीं होता। वो समझते हैं कि परम चैतन्य है जो सहायता कर रहा है। वो जानते हैं कि इन सभी चमत्कारों के पीछे परम चैतन्य है। किन्तु उन सब से ऊपर वो हैं जो जानते है, कि निश्चित रूप से हमारे पास शक्तियाँ है और यह कि हम परमात्मा के साथ जुड़े हुए हैं। हमारे पास शक्तियाँ हैं। निःसंदेह कई बार वो भी संदेह करते हैं, क्या वास्तव में हमारे पास शक्तियाँ हैं।

 मेरा तात्पर्य है, मैं कुछ लोगों को जानती हूँ जिन्होंने कहा। 

मैंने कहा “आप वहाँ सहायता क्यों नहीं करते”?

“क्योंकि मुझे डर है कि मेरा अहंकार बढ़ जाएगा।”

“आप ऐसा क्यों नहीं करते”

“क्योंकि मेरा अहंकार बढ़ जाएगा।”

वो अपने अहंकार से भयभीत होते हैं इसलिए यह अहंकार बहुत सूक्ष्मता से पीछा करता है और अच्छा है कोई खतरा न उठायें, देखो बहुत अधिक नहीं, यह बहुत अधिक है। हमें धीरे धीरे करना चाहिए, इस प्रकार के विश्वास से नहीं कि मेरे पास शक्तियाँ हैं।

किन्तु ऐसे लोग हैं जो जानते हैं कि उन्हें आशीर्वाद मिला है, शक्तियों का और इन शक्तियों को खोजा जा सकता है, अधिक से अधिक अपने भीतर। उन्हें स्वयं पर विश्वास है, उन्हें सहज योग पर विश्वास है और उन्हें मुझ पर पूर्ण विश्वास है और इस परमचैतन्य पर और वो कार्यान्वित कर लेते हैं, बहुत सरल लोग हैं। वो अत्यंत सरल लोग है, वो बहुत ही सरल हृदय अबोध लोग हैं। मैंने गांवों में देखे हैं। मैंने कई यहाँ भी देखे हैं, इस प्रकार के कई बैठे हैं।

अतः यह बारह प्रकार सहज योगी के हैं जिनके बारे में मैंने बताया है, किन्तु वह एक है, वह एक ही है जो पूर्णतया सशक्त भी है। वो अपनी ही शक्तियों की खोज करते हैं। उस आत्मनिरीक्षण में वो देखते हैं और वो इसके बारे में सुनिश्चित हैं, कोई संदेह नहीं है। यही निर्विकल्प की स्थिति है। उन्हें कोई संदेह नहीं है अपने विषय में, मुझ पर विश्वास करने में, मेरी पूजा करने में, मुझसे कुछ प्राप्त करने में। किन्तु यह जान लो कि मैंने आपको भी बहुत महान बनाया है और आपको अपनी शक्तियों को विकसित करना है। मात्र मेरी शक्तियों पर निर्भर न करें। मात्र उन शक्तियों को लेने का प्रयास न करें जो आपकी माँ से हैं किन्तु उसी स्तर पर उठने का प्रयास करें। आप कर सकते हैं। मैं नहीं कहूँगी कितने कर पाएंगे, किन्तु प्रयास करो और उसके लिए सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात, पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात संपूर्ण विनम्रता है। निसंदेह आप मेरे प्रति समर्पित हो इसलिए आप विनम्र हो। मोहम्मद साहब ने समर्पण की बात कही थी। मैंने कहा कि स्वयं को स्वयं के लिए समर्पित कर दो। यदि आपका स्व, आत्मा है तो क्यों न स्वयं को स्वयं पर समर्पित कर दिया जाए। किन्तु उस आत्म को प्रकाशित करो। बस उस प्रकाश के साथ एकाकार हो जाओ। संपूर्ण जीवन एक प्रकाश होना चाहिए, प्रेम का प्रकाश, देवत्व का प्रकाश, सौंदर्य का प्रकाश। इसलिए आपको आत्मनिरीक्षण के माध्यम से कार्य करना होगा, आपके पास ये सभी शक्तियाँ अपने भीतर हैं। आपके पास बहुत शक्तियाँ हैं। निःसंदेह माँ पर निर्भर होना अच्छी बात है।

किन्तु अब आप विकसित हो जाइए, आपको विकसित होना है। आपको आगे बढ़ना होगा और दायित्व समझे बिना उत्तरदायित्व उठाना होगा। व्यक्तित्व ऐसा होना चाहिए 

मुझे आशा है कि हमें बाकी सभी शिष्यों से आगे जाना होगा। जब तक हम ऐसा नहीं करते, क्या हम, संभवतः मैं नहीं जानती, संभवतः हम सहज योग को डूबा देंगे, मूर्खता के एक अन्य सागर में। इसलिए हमें अपने व्यक्तित्व को भी विकसित करना होगा, अपने आत्मनिरीक्षण के माध्यम से, अपनी समझ के माध्यम से, वास्तविकता के अपने प्रमाणों के माध्यम से। मैं क्षमा प्रार्थी हूँ कि आज मुझे यह बातें कहनी पड़ी। किन्तु आज के अतिरिक्त इसके विषय में आप से बात करने का कोई और अवसर नहीं था कि कैसे ईसा मसीह के शिष्यों से इस पीटर और पॉल कंपनी ने छल किया था और मैं कई बार मनुष्यों के बारे में सोचती हूँ वो कैसे हैं और वो कितने चतुर और चालाक हैं और कैसे वो सहज योग को नीचे गिराने का प्रयास कर सकते है जो आज इतना महत्वपूर्ण है।

आज हमारे पुनरूत्थान का दिन है। हमें गुज़रना पड़ेगा, उच्च अवस्था तक पहुंचने के लिए इन बारह चरणों से और इसे वो चौदहवां चरण कहते हैं जो उच्चतम है, जहाँ आप मात्र एक साधन हैं, पूर्णतया असंवेदनशील, जो आप है उसके प्रति, परमचैतन्य के हाथों में खेलते हुए। आज अत्यधिक शुभ दिन है। यही ईसा मसीह की देन है। उन्होंने सूली पर चढ़ाना स्वीकार कर लिया क्योंकि उन्हें वह भूमिका निभानी थी और यह एक भयानक बात थी। किन्तु जब वो सूली को ले जा रहे थे तब वो उनके बारे में चिंतित थे, तब उन्होंने कहा, “मेरे बारे में चिंता मत करो, उचित होगा आप अपने बारे में चिंता करें”। बाइबल में इन सब विकृतियों के होते हुए भी बहुत सारी सच्चाई अभी भी है।

तो हमें किसी से घृणा इसलिए नहीं करनी है क्योंकि उन्होंने ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया है- यही वो कहते हैं। बल्कि उस प्रकार के अधिकार से घृणा करनी चाहिए यदि वह हमें मिलता है, जिसमे हमें दूसरों को सूली पर चढ़ाने का प्रयास नहीं करनी चाहिए। किन्तु सूक्ष्म अहंकार जो काम करता है, एक बहुत ही विचित्र तरीके से आरंभ होता है और सामूहिकता में यह दिखाई देने लगता है। इसे कम करने का प्रयास करें, कम करने का प्रयास करें और आप चकित हो जाएंगे जैसे ही यह ‘मैं’ समाप्त हो जाएगा सभी शक्तियाँ उभरनी आरंभ हो जायेंगी। यह एक बांसुरी की तरह है जिसके भीतर खोखलापन होता है, किन्तु यदि कोई बाधा है तो वह नहीं बजेगी। इसलिए हमारे जो भी विचार हैं, जो हमारी सभी झूठी मर्यादाएं थी, इन सब में हमारा तथाकथित अहंकार सबसे बुरा है कि,”मैं यह कर रहा हूँ” दूर होना चाहिए क्योंकि आप कभी भी आनंद नहीं ले सकते यदि आप उस प्रकार सोचते हैं तो। आप अपने कार्य का आनंद नहीं ले सकते, तब तक आप वास्तव में आनंद के सागर में नहीं कूद सकते जब तक आप में “मैं यह कर रहा हूँ” का भाव है। 

अब विद्यालय के बारे में भी वो कुछ प्रश्न कर रहे हैं किन्तु मैं पहले से ही कह चुकी हूँ कि विद्यालय चलाना एक बहुत बड़ा कार्य है और हमें पता चला है कि पश्चिमी बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली बहुत ही दुर्बल है, अत्यंत दुर्बल। संभवतः उन्हें प्रतिजैविक दवाएं दी गयीं थीं या फिर इस प्रकार का भोजन, डिब्बाबंद खाना संभवतः या संभवतः किसी प्रकार की कुछ संरक्षित चीजें दी गई। मैं नहीं जानती कि क्यों या संभवतः उन्होंने इन भूत की कहानियों को बहुत अधिक देखा है या संभवतः फिल्मों को या कुछ और है कि उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली बहुत बहुत दुर्बल है, छोटी सी बात पर वो पकड़ जाते हैं। यदि किसी अन्य व्यक्ति के साथ कुछ गलत है तो वो उसे पकड़ते हैं। यह हमने  एक नई बात जानी थी। इसके अतिरिक्त मुझे लगता है कि गर्मी से उनका मस्तिष्क गर्म हो जाता है क्योंकि पहले से ही वो अहंकार यात्राओं पर हैं।

इसलिए हमने निर्णय लिया है, उन्हें अब वाशी से धर्मशाला ले जाने का। धर्मशाला, आपको हैरानी होगी कि योगी ने दस एकड़ भूमि दान में दी है। इसके अतिरिक्त मैंने भी कुछ भूमि दान की है। इसके साथ ही भारतीयों द्वारा बहुत सारा धन दान किया गया है और हम एक विद्यालय का निर्माण करने जा रहे हैं। आप उस पर चिंता न करें, हम किस प्रकार का विद्यालय बनाने जा रहे हैं, हम वहाँ क्या करने जा रहे हैं, आपको इन चीजों को हमारे ऊपर छोड़ना होगा। यह एक बात है। तदनुसार क्योंकि उनका स्कूल आरम्भ होने वाला था, दिसंबर में, यह निश्चित नहीं था, यह तब पता चला जब अप्रैल का महीना आरंभ हुआ, बच्चे अस्वस्थ होने लगे। थोड़ी धूल के से ही उन्हें बहुत अधिक खांसी, एलर्जी, सभी कुछ होने लगा। तब हमने निर्णय लिया कि उन्हें ठंडे स्थान में रहने दें, इसलिए वो धर्मशाला में ही रहेंगे और उन्हें वहीं रहने दें।

अब सभी माता पिता के लिए, उन्हें एक बात जाननी होगी, यदि वो चाहते हैं कि उनके बच्चे ठीक से बढ़ें तो उन्हें व्यवस्थित करने के लिए उन्हें विद्यालय पर छोड़ना होगा। आप इसमें हस्तक्षेप नहीं करेंगे। निसंदेह क्योंकि पहले की योजना के अनुसार तीन महीने की छुट्टियां होनी थी, गर्मियों के समय में और वो धर्मशाला में होते किन्तु अब जैसा की ये वही पाठयक्रम कर रहे हैं उनके लिए कोई छुट्टी नहीं है और उनका स्कूल आरंभ हो गया है। इसलिए कृपया धर्मशाला न जाए। माता पिता तुरंत भाग रहे हैं। कृपया अपना टिकट रद्द करें। आप मात्र शेरी में अपने बच्चों से मिल सकते हैं जहाँ वो साढ़े तीन महीने तक रहेंगे। आप आएं और वहाँ रहें मात्र वही समय है जब आपको अपने बच्चों से मिलना चाहिए, सर्दियों के दौरान।

स्वास्थ्य के अतिरिक्त उनकी शिक्षा बहुत खराब है। उनमें से कई बच्चे आठ साल की आयु में भी ठीक से लिखना नहीं जानते। वो पूर्णतया उपेक्षित और सिर चढ़े हुए हैं। इसलिए स्कूल को उनकी देखभाल करने दें। वो पढ़ाई नहीं करना चाहते, उन्हें भविष्य की कोई समझ नहीं है। उन्हें कोई ज्ञान नहीं है कि वो इस धरती पर क्यों हैं। इसलिए उन्हें संभालने दें। कृपया, हो सकता है कुछ माता पिता कुछ समय से उनसे नहीं मिलें हों, किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि जैसे ही आपके पास पैसे या कोई प्रावधान हो, आप वहाँ के लिए दौड़ लगा दें। यह समझने का प्रयास करें कि आपको विघ्न नही डालना चाहिए, विद्यालय के अनुशासन में और बच्चों के अनुशासन में। क्योंकि यदि एक या दो माता पिता आ रहे हैं तो सभी बच्चों को बुरा लगने लगता है और उनकी एकाग्रता भंग हो जाती है।

इसलिए पहली बात जो आज हमें आत्मसात करनी है, ईसा मसीह का विवेक, बुद्धिमत्ता।  विवेक से आपको समझना चाहिए कि  “बच्चों को छोड़ दें।” हम अपने स्तर पर पूरा प्रयास कर रहे हैं, उनके लिए सर्वोत्तम करने का। हम अभी तक आपसे कोई सहायता नहीं मांग रहे हैं, अब तक हम इस पर काम कर रहे हैं। यह बहुत आश्चर्य की बात है कि यह बच्चे कैसे इतने बुद्धिमान हैं और वो चीजों को बहुत अच्छी प्रकार से समझते हैं, किन्तु बस वो एक स्थान पर बैठना नहीं चाहते। हर समय वो बाहर रहना चाहते हैं। वो पढ़ाई नहीं करना चाहते। इसलिए हमें ऐसे मार्ग एवं पद्धतियां खोजनी होंगी जिनके द्वारा उनमें आत्मसम्मान जाग्रत हो कि वो सोचें कि उन्हें जीवन में कुछ करना है। सबसे पहले तो पश्चिम में माता पिता अपने बच्चों के बारे में बहुत लापरवाह होने के लिए जाने जाते हैं। यहाँ तक की वो अपने बच्चों को मार भी देते हैं और यही सब। किन्तु सहज योग में वो बस गोंद की तरह जुड़ जाते हैं। एक ओर से उन्हें छोड दिया जाता है और वो पूरे परिवार के साथ चिपक जाते है, चिपक जाते हैं, वो इससे ऊपर नही उठ पाते और इस प्रकार का प्रेम, प्रेम की मृत्यु है।

इसलिए कृपया यह समझने का प्रयास करें कि ये सहज योग के बच्चे हैं और इनकी देखभाल की जा रही है। उनके लिए सब कुछ बहुत अच्छी प्रकार से कार्यान्वित हो जाएगा और अपने बच्चों के इस विकास का आनंद लेने के लिए विवेक रखें। यदि आपको इसके बारे में कोई समस्या है, तो आपको वहाँ के लोगों को परेशान नहीं करना चाहिए। आपका सारा ध्यान आपके बच्चे पर है, बहुत गलत बात है। मुझे लगता है कि वह व्यक्ति सहज योगी तो बिलकुल नहीं है। क्योंकि आप यह नहीं सोचते कि परमात्मा उनके लिए उत्तरदायी हैं। आपको लगता है कि आप उत्तरदायी हैं तो आप सहज योगी बिल्कुल नहीं हैं, किसी भी संयोग से। आप अपने बच्चों से प्रेम करते हैं किन्तु आप दूसरे बच्चों से प्रेम नहीं करते।

आप उनकी समस्याओं उनकी स्थितियों के बारे में चिंतित नहीं हैं। मान लीजिए एक माता पिता वहाँ जाते हैं, तो अन्य सभी बच्चों को बुरा लगेता है। फिर आप क्यों जाना चाहिए?

फिर उपहार भी भेजना, कुछ लोग उपहार, डिब्बाबंद फल भेजना आरंभ कर देते हैं। अब यदि कोई भी डिब्बाबंद फल भेजता है हम इसे समुद्र में फेंक देंगे। चॉकलेट, ऐसा कुछ भी भेजने की आवश्यकता नहीं है। यदि आपको कुछ भेजना है तो कुछ ऐसा भेजें जो उनके लिए अच्छा हो, पूरे विद्यालय के लिए। अन्यथा मत भेजें। मात्र अपने बच्चे के लिए कृपया न भेजें। आप सहज योगी हैं आप अन्य लोगों की तरह नहीं हैं। आप विशेष लोग हैं। इसलिए यदि आपको कुछ भेजना है, तो सभी बच्चों के लिए भेजें किन्तु चॉकलेट या ऐसी चीजें नहीं, जो उनके प्रतिरक्षा तंत्र को खराब कर देंगी क्योंकि वह पहले से ही बहुत खराब स्थिति में है। डिब्बाबंद फल आपको कभी नहीं भेजना चाहिए। किसी भी प्रकार का डिब्बाबंद भोजन हम उसे बाहर फेंक देंगे और यह इतना बुरा हो गया है कि हमें इन बच्चों के खाने के लिए डिब्बाबंद भोजन आयात करना पड़ा।” मुझे यह पसंद नहीं है। मैं यह नहीं खाऊंगा।”

इसलिए यदि आप वास्तव में अपने बच्चों को शक्तिशाली, स्वस्थ, बुद्धिमान, समझदार सहज योगी बनते देखना चाहते हैं तब, आपको स्वयं का विवेक होना चाहिए, माता पिता होने के लिए। ये सब साक्षात्कारी आत्माएं है जो आप से जन्मी हैं, विशेष आशीर्वाद। इसलिए उनके प्रति दयालू रहें, अच्छा व्यवहार करें। कठोरता, न मात्र बच्चों को कठोर क्रोध दिखाना है, बल्कि बहुत अधिक प्रेम दिखाना भी एक प्रकार की कठोरता है, क्योंकि इससे दूसरे बच्चों को दुख होता है। इससे आपके बच्चे को भी दुख होता है। क्योंकि वह बच्चा सोचने लगता है” ओह मैं कुछ बहुत विशेष हूँ। मुझे पढाई की आवश्यकता नहीं है। मुझे कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। इसलिए बच्चों के प्रति संतुलित व्यवहार रखना चाहिए।

किसी ने मुझसे कहा कि आपका लोगों का पहले से ही धर्मशाला जाने का कार्यक्रम है। मुझे खेद है, कृपया मत जाइए। वो अच्छा कर रहे हैं, उनकी देखभाल की जाती है। वहाँ उनके इस प्रकार के सुंदर व्यक्तित्व बनने की सभी संभावना है कि आपको उन पर गर्व होगा। समझने का प्रयास करें। यह समझने का प्रयास करें कि जो भी प्रयास सहज योग उनके लिए कर रहा है उसे पूरी तरह कार्यान्वित होना चाहिए। मुझे आशा है कि आप में से कोई भी उन्हें किसी भी प्रकार से परेशान नही करेंगे और जब आप पत्र लिखते हैं, तो आपको पत्र में सदेव लिखना चाहिए कि “मेरी इच्छा है कि आप बहुत अच्छी प्रकार से अध्ययन करें, बहुत अच्छी प्रकार से बढ़ें। आप एक अच्छे सहज योगी हैं”। इस प्रकार से, ना कि “में आपसे बहुत प्रेम करता हूं, मुझे आपकी याद आती है, में आपके लिए प्रातः से संध्या तक रोता रहता हूं।” यह कोई तरीका नहीं है। यह ग्रीक त्रासदी है।

इसलिए हमें उन्हें प्रोत्साहित करना होगा और यह कि आप अपने बच्चों को इस प्रकार से देखना चाहते हैं। उन्हें कुछ आत्मसम्मान दें, उन्हें स्वयं का एक दृष्टिकोण दें और आप देखेंगे कि यह बहुत उत्साहजनक होगा और शिक्षक बहुत आनंदित अनुभव करेंगे। क्योंकि कुछ पत्र जब शिक्षक पढ़ते हैं तब वो भी रोने लगते हैं। अपने बच्चों को यह सब बातें कहने की कोई आवश्यकता नहीं है। मेरा तात्पर्य है कि, आप बड़े हो गए हैं और एक बच्चा एक पत्र लाया “ओह! मेरे माता पिता दोनों रो रहे हैं। मुझे क्या करना है?”

मेरा तात्पर्य है कि वह दादा बन गया। इन सभी घटनाओं के साथ हमें सीखना है कि हम सम्पूर्ण संसार बदल रहे हैं, हम स्वयं को बदल रहे है और हमारे बच्चे हमारी सहायता करने के लिए सज्ज होने जा रहे हैं।

निसंदेह सभी बच्चे नहीं जा सकते क्योंकि उन्हें लगता है कि यह एक महंगा विद्यालय है या जो कुछ भी है। हम बाद में शुल्क कम कर सकते हैं,  अभी नहीं। क्योंकि उनके लिए बहत सारे कार्य किए जाने हैं। शिक्षकों की बहुत अनिवार्यता है, यही विवशता है। किन्तु यदि आप देखते हैं कि एक बार इन बच्चों का पूर्णतया विकास हो जाता है, जो एक प्रयोग है तब हम यहाँ कुछ विद्यालय आरंभ करने में सक्षम हो सकते हैं, कहीं न कहीं उचित प्रकार से जहाँ बच्चों को उचित प्रकार से शिक्षित किया जा सके। किन्तु यहाँ खर्च बहुत अधिक होगा, बस यही बात है। रोम के आश्रम में जितना खर्च करना चाहिये, आपको उससे अधिक खर्च करना पड़ता है। वो कुछ नहीं कर सकते। इसलिए खर्च के आधार पर यह एक जैसा होगा। इसलिए आपको इसके बारे में तर्कसंगत होना चाहिए और यदि संभव हो तो हमें किसी अन्य स्थान पर विद्यालय बनाने का प्रयास करना चाहिए। मुझे नहीं पता कि कौन सा देश उत्तरदायित्व लेगा। संभवतः रूस में, यह एक अच्छा विचार होगा, थोड़ा सस्ता। पहले वहाँ खाना हो जाए फिर हम इसके बारे में सोच सकते हैं। तो यह एक प्रयोग है और आप सभी को विद्यालय के लोगों की सहायता करने का प्रयास करना चाहिए।

अब क्या कोई और समस्या है जिस पर मुझे आपसे चर्चा करनी है, उचित होगा कि मुझे बताएं। इसलिए आज हम अपने पुनरुत्थान के बारे में बात कर रहे हैं, इन चौदह स्तरों के माध्यम से जो हमारे भीतर हैं, एक के बाद एक। तत्पश्चात हम इन सभी को भेद देंगे और उपर उभरेंगे, सुंदर कमल के रूप में। ईस्टर इसी के लिए है, सांकेतिक रूप से अंडे अर्पित किए जाते हैं और ये अंडे अर्पित किए जाते हैं ताकि यह अंडे पक्षी बन सकें। 

धन्यवाद!
परमात्मा आपको आर्शिवादित करे!