Mahashivaratri Puja

मुंबई (भारत)

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Mahashivaratri Puja Date 19th February 1993 : Place Mumbai Type Puja Speech Language Hindi

[Original transcript Hindi talk, scanned from Hindi Chaitanya Lahari]

आज यहां पर हम लोग शिवजी की पूजा करने के लिये है कि जिसपे भी दृष्टि पड़ जाए वो ही तर जाता है। जिसके एकत्रित हुए तरफ उनका चित्त चला जाए वो ही तर जाए। कुछ उनको े पूजा एक बहुत विशेष पूजा है क्योकि मानव का अन्तिम लक्ष्य यही है कि वो शिव तत्व को प्राप्त करें। करने की ज़रूरत ही नहीं है ये सब खेल है। जैसे बच्चों शिव तत्व बुद्धि से परे है। उसको बुद्धिध से नहीं जाना जा सकता। के लिए खेल होता है परमात्मा के लिए भी वो सारा एक जब तक आप आत्म-साक्षात्कारी नहीं होते, जब तक आपने खेल है वो देख रहे हैं। उस भोलेपन में एक और चीज नीहित अपने आत्मा को पहचाना नहीं, अपने को जाना नहीं, आप शिव हैं। जो भोला आदमी होता है, सत्यवादी होता है अच्छाई से तत्व को जान नहीं सकते। शिवजी के नाम पर बहुत ज्यादा आडम्ब, अन्धता और अन्धश्रद्धा फैली हुई है। किन्तु जो मनुष्य ले रहा है तब उसको बड़े जोर से क्रोध आता है। उसका आत्म साक्षात्कारी नहीं वो शिवजी को समझ ही नहीं सकता क्रोध बहुत जबरदस्त होता है। चालाक आदमी होगा वो क्रोध क्योंकि उनकी प्रकृति को समझने के लिये सबसे पहले मनुष्य को घुमा देगा, ऐसा बना देगा कि उसकी जो प्रमुख किरणें को उस स्थिति में पहुंचना चाहिए जहां पर सारे ही महान तत्व अपने आप विराजें। उनके लिए कहा जाता है कि वे भोले शंकर वो हंसते ही रहता है ये क्या मैरे ऊपर वार कर सकता है। हैं। आजकल बुद्धिवादी बहुत से निकल आए हैं संसार में, और ये शिवजी का जो गुण है वो हम सहजयोगियों में आना जरूरी अपनी बुद्धि की उड़ान से जो चाहे वो ऊट पटांग लिखा करते है। इस वक्त हम छोटी-छोटी बातों को सोचते रहते हैं इनके हैं और फिर कहते हैं कि ये शिवजी तो भोले हैं किसी का लिए क्या करना चाहिए। इसकी योजना कैसी करनी चाहिए। भोला होना बुद्धिवादियों के हिसाब से तो एकदम ही बेकार जैसे शिवजी ने शक्ति पर सब छोड़ दिया है आप लोग भी चीज है। आजकल आदमी जितना चालाक और धूर्त होगा वो सब कुछ शक्ति पर छोड़ सकते हैं लेकिन वो भी फिर एक यश्स्वी हो जाता है। तो इनका भोलापन कैसे समझा जाए? स्थिति आनी चाहिए। वो भोलापन आपके अन्दर आना चाहिए। आजकल के लोग सोचते हैं कि जो आदमी भोला होता है वो इस भोलापन का मतलब ये है कि किसी तरह की नगन्य है, बेवकुफ है। लेकिन शिवजी का भोलापन ऐसा है नकारात्मकता आपके अन्दर आ ही नहीं सकती। इसलिए आप कि जहां वो सब कुछ हैं। समझ लीजिए कि ज़रूरत से ज्यादा कोई श्रीमन्त रईस आदमी हो जाए और उसको विरक्ति आ में परेशान क्यों हैं। जहर पीना है तो जहर पी लेंगे होना क्या जाए और उसका लोग धन उठा के ले जाएं तो लोग कहेंगे है। जो बिल्कुल विशुद्ध है, जिसमें किसी भी चीज का असर अजीब भोला आदमी है जिसका लोग घन चुरा रहे हैं, उसपे ही नहीं आ सकता, जो समर्थ है, जिसकी शक्तियां स्वयं ही कोई असर ही नहीं। लेकिन जब उसको विरक्ति आ गई और उसकी रक्षा कर रही हैं उसको यह बात है कि क्या करे उस घन का उसके लिए महात्म्य ही नहीं रहा तो वो अपने क्या न करें। ये शक्ति हमारे अंदर शिव तत्व से आती हैं शिव भोलेपन में बैठा है और भोलेपन का मजा उठा रहा है। जब सब चीज अपने आप हो ही रही है, सब कुछ कार्यान्वित ही कुण्डलिनी जो है वो शक्ति है चक्र जो हैं ये सीढ़ियां इन है। तो शिवजी का उसमें कार्य भाग क्या रहता है। वे भोलेपन सब सीढियों से चढ़ के आफ्को प्राप्त एक ही करना है । वों से सब चीज देखते रहते हैं। वो साक्षी स्वरूप हो करके और है शिव तत्व। सारे देवी देवताओं को एक विचार है कि आप शक्ति का कार्य देखते रहते हैं। शक्ति ने सारी सृष्टि रचाई और सबको शिव तत्व पे पहुंचा दें। ये उनका कार्य है और वो शक्ति ने ही सारे देवी- देवता बनाए और उनके सारे कार्य बना उस कार्य मे पूरी तरह से लगे हुए हैं वो ये नहीं पूछते कि दिए। उनकी नियुक्ति हो गई और अब शिवजी को क्या काम इसमें हमारा क्या होगा? हमारी स्थिति क्या है? कहां बैठे? है। शिवजी को बस देखना मात्र है । और फिर देखने में ही मनुष्य के जैसे नहीं सोचते। वो अंग प्रत्यंग उस शिव के ही सब कुछ आ जाता है। उनके भोलेपन का असर है तो यह रहता है, वो जब देखता है कि कोई बहुत ही दुष्ट उनसे मुठभेड़ हैं वो कुछ शान्त हो जाएं। लेकिन भोला आदमी जो होता है भोले हैं सांप लोटे रहे हैं तो सांप को लौटने दो। आप बेकार तत्व को प्राप्त करनके लिए आत्म साक्षात्कार होना चाहिए। हैं और शिव तत्व पर मनुष्य को पहुंचाने के लिए कार्य तत्पर ন

रहना उनका स्वभाव है। उनको कुछ भाषण देने की ज़रूरत है? किन्तु ये विश्वास हमारे अन्दर बैठना बड़ा मुश्किल है। नहीं, उनको कुछ बताने की ज़रूरत नहीं। उनका जो काम है आत्म-साक्षात्कार के बाद आप सहजयोगी हो गये लेकिन वो भी एक अकर्म सा है। वो बंधे हुए हैं वो अपना काम पूरी तरह से करते हैं। वो सोचते ही नहीं कि कुछ काम कर कोई साहब जा रहे है तो कहेंगे कि मां कफ्फ्यू है हम कैसे रहे हैं। ये सारा प्रकाश विजली से आ रहा है और जड़े होने जाएं। आज तक ये बंबई शहर में कोई भी सहजयोगी को के कारण उसमें कोई शक्ति नहीं कि वो सोचे। और क्योंकि नुकसान नहीं हुआ। आप भूल गये आप सहजयोगी हैं। आपके ये सब देवता लोग निर्विचारिता में बैठे हुए हैं वे भी कुछ सोचते आगे पीछे देव-दूत गण सब लगे हुए हैं लेकिन जैसे आपका नहीं और जानते भी नहीं कि उनमें क्या शक्तियां हैं। जैसे खाने विश्वास उठा वो भागे वहां से। कोई कहेगा कि मुझे ठगा की चीनी सबको मिठास देती है, पर वो नहीं जानती कि उसके जा रहा है , तो ठगता रहे। वो तुम्हें मारने आ रहा है, तो अन्दर मिठास है। इसी प्रकार सहजयोगी जब कार्यरत होते हैं आने दो। वो तुम्हारा कुछ विगाड़ रहा है तो बिगाड़ने दो। तो वो ये नहीं जानते कि हमारे अन्दर ये शक्ति है इसलिए आगे होगा क्या? जाओ मरो। जब विश्वास बना रहा तो आप हम कार्यरत हैं जिस वक्त: आप लोगों के दिमाग में ये बात चले जा रहे हैं किसी को आप दिखाई ही नहीं देंगे और आई कि हमने ये कार्य किया, वो कार्य किया हम लीडर हो दिखाई देंगे तो भी पार हो जायेंगे | ऐसे नाना विध प्रश्न हमारे गए, हम वो हो गए तो आप सहजयोगी नहीं। सहजयोग में मनुष्य अकर्म में आ जाता है। वो करते रहता है। दिखने को लगता की असुरक्षा की भावना हमारे अन्दर बनती है। और उसकी हैं कर्म कर रहे हैं पर उसको ज्ञात नहीं होता कि वो कुछ वजह से हमारे विश्वास टूटते जाते हैं। कर्म कर रहा है। उसको मालूम नहीं होता कि वो प्यार कर रहा है, पर लोग जानते हैं कि वो बहुत प्यार करता है। शिव योगी होने के लिये परम विश्वास की ज़रूरत हैं जैसे र अन्दर आते हैं क्योंकि हम मानव हैं अभी और सभी तरह दूसरी बात कि हमसे कोई गलतियां नहीं होती, ऐसी भी बात नहीं है। कुछ गलतियां होती हैं। उन गलतियों के इस प्रकार हमें समझ लेना चाहिए कि आत्म-साक्षात्कार होने के फलस्वरूप एक तरह का हमारे अन्दर भय आ गया क्या है। एक है जो आप स्वयं हैं सो हैं और आप अपने है। लेविन शिवजी की विशेषता ये है कि वो क्षमाशील है। क्षमा के सागर हैं। आपने गलतियाँ की तो कुछ नहीं। आप को देखने की जो क्रिया है, देखना मात्र जो है एक तीसरी उनके दरवाजे में बैठे हैं तो पूरी तरह से क्षमा कर देतें हैं आपको। तब आपको भय क्यों होगा। दूसरा, वरदान उनको देखने वाले, एक जो आपको दिखाई दे रहा है और एक जो है निर्भयता। बिल्कुल निर्भय होना चाहिए। उनकी कोई सेना देखने की चीज है। ये तीनों ही चीज खत्म हो सकती है। नहीं है। आपने तो जाना ही है कि जिस वक्त अपनी बारात कैसे? कि अगर आप ही अपना आईना बन गए फिर आप लेकर वो पहुंचे थे तो पार्वती जी को तो शर्म आ रही थी। अपने को देखते रहते हैं, आप अपने को जानने लगे। यही कोई लंगड़े कोई पागल दिखने वाले हिप्पियों जैसे लोग अजीब तुकाराम ने कहा कि आपने अपने को जान लिया फिर और से अजीब लोगों को लेकर पहुंचे बारात में। मतलब ये शारीरिक जानने की ज़रूरत ही क्या है? तब ये तीन दायरे कूद कर कुछ भी अवस्था हो और जन साधारण के लिए ऐसे लोग आप स्वयं में स्थिर हो गए। यही स्थरता जब पूरी तरह से कुछ विक्षिप्त से लगे विचित्र से लगे लेकिन उनके अन्दर बन जाती है तब कहना चाहिए कि शिव तत्व स्थिर हैं क्योंकि शिवतत्व है। इसलिए शिव के लिए कोई भी पैसा धन की वो अटूट और अटल है। इस शिव तत्व में जब आप बैठ जरूरत नहीं। उनके मंदिररों में सोने चांदी के चढ़ावे की जरूरत जाते हैं तो आपको ऐसा नहीं लगता कि आप कुछ कर रहे नहीं। मुक्त बैठे हैं। किसी भी चीज में ऐसी शक्ति नहीं कि हैं। आप अपने में ही समाये रहते हैं। फिर आप ये भी नहीं उनकी शोभा बढ़ाये। ऐसी कोई संसारिक दृष्टि से मूल्यवान सोचते हैं कि मुझे कुछ और करना चाहिए। जैसे आजकल वस्तु शिवजी के लायक नहीं। इस तत्व को हमारे अन्दरआना बहुत से लोग कहते हैं कि हम बोर हो गए। क्योंकि आप बहुत-बहुत जरूरी है। आज समाज में आप अगर देखें तो अपने को देख नहीं सकते। आप अपने साथ रह नहीं सकते। पैसे का मूल्य जरूरत से ज्यादा है। हर आदमी पैसे का ही आप अपने साथ पांच मिनट बैठ जाएं तो आपको ऐसा लगता मूल्य देखता है। किस चीज में पैसा मिलेगा। क्या करने से है कि भाग खड़े हो। मेरे लिये तो अपने साथ बैठना सबसे पैसा मिलेगा? और पैसे के मूल्य में सभी चीज वो बेचनें बड़ी बात है। इस रस को जब आप प्राप्त करते हैं तब एक को तैयार हैं। पैसे नष्ट भी हो सकते हैं दुष्ट कर्मों में भी भोलापन आपके अंदर आ जाता है अगर आत्मा है और जिसे डाल सकते हैं, लेकिन शिव तत्व में बैठा हुआ मनुष्य उसकी कोई भी नष्ट नहीं कर सकता तब ये कौन नष्ट कर सकता किसी चीज की इच्छा नहीं होती। इच्छारहित होता है क्योंकि माल को शीशे में देख रहे हैं। वो आपका प्रतिबिम्ब हैं। और प्रतिबिम्ब चीज है। इस प्रकार आप तीन दायरों में घूम रहे हैं। एक ा ा ल

शरीर की कोई हमारे ऊपर आक्रमण करती है। ऐसे ही हम जड़ से पैदा अपने आत्मा से ही उसकी आत्मा संतुष्ट है। चिंता नहीं होती। शरीर के आराम की उसको चिंता हुए पहले तो ये आत्मा का झगड़ा इस जड़ से ही प्राप्त नहीं होती। कहीं भी सुला दीजिए उसको। कुछ भी खाने को हुआ और अब भी ये जड़ बीच-बीच में खींचता रहता है। दे दीजिए, नहीं तो मत दीजिए। और फिर जब ये दशा आ इसीलिए पहले जमाने में लोगों ने बताया था कि उपवास जाती है तो वो सभी चीजों पर अधिकार करती है। जैसे आपने करो, सन्यास लो, घर बार छोड़ के भाग खड़े हो जाओ और ऐसे आदमी को खाने को नहीं दिया। लेकिन वो एक नजर मर जाओ। लोग सोचते थे कि अनेक जन्मों में इस तरह फिरा दे तो हजारों आदमियों को खाना दे सकता है। उनके के तपस्या करने से आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त होंगे। लेकिन शरीर को कोई आराम नहीं है। लेकिन उनकी नजर दाता है। जिसपे पड़ जाए वो नजर दान में से भरपूर हो जाए। अब ये कौन सी शक्ति है जिससे वो सबका कल्याण करते हैं ? बनाओ और फिर उसके नीव को बनायेंगे क्योंकि अगर बहुत ये है परम चैतन्य। और उसका जो स्पन्दन है उसे शंकराचार्य लोगों की परार कराना है और जिसकी ज़रूरत है तो यही ने स्पन्द कहा है। इस स्पन्द की शक्ति उनके शरीर से बहती तरीका हमने ठीक समझा। और हिमालय में जाए बगैर, अपने रहती है और जिस आदमी को वो छू जाती है उसी का कल्याण हो जाता है। जिस भूमि पे वो पड़ जाती है वो भूमि बहुत ने आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त किया। ये तो बात सही है। ज्यादा फल फूल देने वाली हो जाती है। जिस स्त्री में पड़ और आपमें स्पन्द की शक्ति भी आ गई। यहां तक तो कुण्डलिनी जाएगी वो बड़ी सुबुद्धि वाली हो सकती है। जिस पर पड़ ने काम कर लिया। अब आगे आपको काम करना है। और जाए उसका भला हो सकता है। स्पन्द ऐसी चीज है अच्छाई ही आ सकती है। कोई आदमी आपको मारने को शीशा हो गए तो आप अपने को देखिए । पहले तो अपनी आए, उसका परिवर्तन हो सकता है। कोई आपको सताने आए ओर नजर होनी चाहिए कि मैं अब भी एक सर्व साधारण उसको सुबुद्धि आ सकती है। एक तरह कि जो परिवर्तन की मानव के जैसे रह रहा हूँ। शराब छूट गई। सिगरेट छूट गई। शक्ति इस स्पन्द में है ये हमारे लिए बड़ी समझने की बात है। इसलिए हर आदमी को आपको क्षमा कर देना चाहिए। शांत हो गया। चेहरे पे भी मासूमियत आ गई। लेकिन अब आप क्यों उससे बदला ले रहे हैं, कोई जरूरत नहीं। आप सहजयोगी हैं ये स्पन्द पे छोड़ दीजिए। इसे लहरियों पे छोड़ अपने मजे में रख सकता हूँ या मैं बोर हो जाता हूँ? क्या दीजिए। सब समझते हैं सोचते हैं, सब पूरी तरह से व्यवस्था मैं अपने में मजा पाता हूँ? मैं अपने में ही आनन्द को प्राप्त करते हैं। इस शक्ति को आपने प्राप्त किया है ये आपमें से अव्याघ बह रही है। इस शक्ति को आपने आजमाया है कि इससे कितना फायदा होता है। अब जो लोग बुद्धि से उस चीज में अटका हूँ? और जिन चीजों में आप अटके इसको जानना चाहें वो नहीं जान सकते। लेकिन आपने तो हैं उसमें अटकते ही जा रहे हैं अगर आप भोले हैं तो कोई अनेक चमत्कार देखे हैं, और ये कितनी ऊंची, कितनी प्रचण्ड, कितनी बड़ी शक्ति है, जो कार्यान्वित है और आपको मदद अटके हुए थे वो आपको मिल नहीं रही और फिर से वो कर रही है। और आप इसके अधिकार को प्राप्त हो रहे हैं। ही मानवीय जीवन शुरू हो जाएगा। लेकिन गर आप इन चीजों उस वक्त हमें ये सोचना चाहिए कि शिव तत्व हर चीज को देख लें आज हमें ये चीज अटका रही है, ये चीज हमारे पुर, पूरे पर्यावरण पर चल सकता है आजकल पर्यावरण का बड़़ा भारी संकट संसार पर छाया हुआ है। जितने सहजयोगी दृष्टि करने से ही ये चीज चली जाएगी अगर हमें एक होंगे उतना पर्यावरण शुद्ध हो जाएगा। अपने आप ही शुद्ध हो नया संसार बनाना है, एक बहुत सुंदर संसार, ऐसी माँ की उसक आज का सहजयोग ऐसा है जहां पहले आप अपने आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त करो। कि पहले मंदिर का कलश परिवार को छोड़े बगैर और आफत उठाए बगैर ही आप लोगों क जिससे वो काम ये कि पहले तो आअपनी ओर देखना है जब आप गाली मुंह से निकलना बंद हो गया और स्वभाव भी बहुत भी क्या मै अपने को देख सकता हूँ? क्या में अपने को कर सकता हूँ? और क्यों नहीं कर सकता? इस पर आप बुद्धि से विचार कर सकते हैं। क्या अब भी मैं इस या चीज आपको अटकाएगी ही नहीं। और जिन चीजों में आप अंदर है तो देखने से ही ये चीज गिर जाएगी। इसकी ओर इच्छा है कि एक विशेष तरह की पीढ़ी तैयार करें जो खालिस जाएगा। इसके अधिकार पथ पे आने के लिए सबसे पहले हमें हों। इसके बारे में अनेक साधु संतों ने इच्छा की थी। वो ये जान लेना चाहिए कि अब हम मानव स्थिति में नहीं। हम अब दैवी स्थिति में आ गए हैं। तो मानव स्थिति की जो तत्व को ठीक करें। हमारे अन्दर गलतियां हैं जो खींच है, उससे हमें छुट्टी मिलनी चाहिए। ये मानव स्थिति हमें नीचे खींचती है। और बार-बार घुसी हुई है। जैसे आज़कल हिन्दू, मुसलमानों का झगड़ा चल अगर आपने करना है तो ये जरूरी है कि आप अपने शिव शिव तत्व में आप जान लेंगे कि अभी क्या-क्या चीज

रहा है। कोई हिन्दु हो जाने से शिव तत्व नहीं पाता। न मुसलमान और जैसे ही वो इस तत्व में आ गए उनके सब प्रश्न अपने होने से पाता है न ईसाई होने से, न कुछ होने से पाता है। आप ही हल हो गये शिव तत्व में शक्ति ही ऐसी है, वो ये सब बाह्य के आडम्बर हैं। लेकिन जब आपमें शिव तत्व सारे प्रश्नॉं को हल कर देती है उनके प्रश्न अपने आप ही प्राप्त होता है तो आप श्री राम को भी मानते हैं और आप हल हो गये जो लोग शराब पीते थे, दुनिया भर की चीजें मुहम्मद साहेब की भी पूजा करते हैं। जब तक आप शिव तत्व बेचारे करते थे, दल-दल से निकल कर वो आकर किनारे पर को प्राप्त नहीं होते इन धर्म के आडम्बर से आप निकल नहीं बैठ गये पर हम लोग अभी भी किसी न किसी चक्कर में सकते। अन्दर से उनकी भी पूजा उतनी ही होनी चाहिए जितनी घूमते ही रहते हैं । इस चक्कर को खत्म करना चाहिए। आज श्री राम की। जो रहीम है वो ही शिव है। जो रहमान है, जो शिव रात्रि के दिन विशेषकर अपने शिव तत्व पे उतरिये ताकि अकबर है वो ही विष्णु है। तब फिर ये अन्दर की जो भावनाएं वो आपको सारे गुणों से अलंकृत कर दे। शिव तत्व में ऐसे हैं ये ऐसे विकसित हो जाएंगी कि आपके अन्दर से धर्म की गुण हैं कि सहज में ही आपके अन्दर धर्म आ जाएगा, सहज सुगंध बहेगी न कि वैमनस्य। पर ये चीज घटित होने के लिए में ही आपके अन्दर सुबुद्धि आ जाएगी, सहज में ही सारा ज्ञान मुझे तो सहजयोग के सिवा ओर कोई मार्ग नहीं दिखाई देता। आपके अन्दर आ जाएगा। सहज में ही आपमें माधुर्य आ जाएगा। जब तक सहजयोग नहीं होगा। तब तक लोग ऐसी पूजा करेंगे? सहज में ही परिपक्वता आ जायेगी न जाने कितने ही गुण क्या मुसलमान राम की पूजा करेंगे? या हिन्दु मुहम्मद साहिब सहज में आपके अन्दर आ सकते हैं। लेकिन पहले ये जान की पततिर करेंगे। हम लोग तो करते हैं । मुहम्मद साहेब की भी, लेना चाहिए नम्रतापूर्वक, कि अभी हम उस तत्व पे उतरे के पूजा अली की भी फातिमा बी की, बुद्ध की, महावीर की पूजा नहीं? हमें उतरना है। और दूसरी ये कि सारी ही शक्तियां सहज करते हैं, क्योंकि ये सब पूजनीय है। हम कौन होते हैं किसी में हमारे से प्रस्फुटित हो रही हैं कुछ करना नहीं पड़ेगा। इस को बड़ा छोटा कहने वाले। पर जब शिव तत्व के सागर में तरह से हमें अपनी ओर देखना चाहिए कि मेरे पति, मेरे बच्चं आप घुल जाते हैं तब आप को पता होता है कि ये सब शिव सहजयोग नहीं करते, नहीं करने दो, ये तो आन्तरिक चीज है के ही अंग-प्रत्यंग हैं। ये सब अपने ही हैं। ये सब हमारे ही जिसको पाना है वो ही पा सकता है। जबरदस्ती तो नहीं कर अन्दर है। जब तक इस तरह की धारणा हमारे अन्दर नहीं सकते सहजयोग की। आप अपने को देखो। अपने को जानना, होती तो हो सकता है कि सहजयोग का कार्य कुछ कम तेजी अपने को देखना, यही आत्म-साक्षात्कार है। फिर आपको से चले। लेकिन सहजयोग ठोस चीज है । असली चीज है। और देखकर लोग सहजयोग में उतरेंगे। और इस परम तत्व को पाने ये जो बाह्य की चीजें हैं ये थोड़ी देर के लिए आई, गई। मारा के बाद आप लोग इतने शक्तिशाली हो जाएँगे कि न जाने कितने पीटी हुई सब कुछ हुआ। आश्चर्य की बात ये है कि विदेश लोगों का आप परिवर्तितत कर दें, ये संसार बदल दें। ये संसार में सहजयोग इतने जोर से फैल रहा है। वे लोग बहुत ही गहन बदलने के लिए है। कोई कहेगा यहाँ प्रजातंत्र है और प्रजातंत्र है। रोज ध्यान करना, रोज अपनी ओर नज़र करना। इन लोगों कि ये खराबियाँ हैं। खराबियाँ प्रजातंत्र की नहीं, खराबी इन्सान से हमें सीखना चाहिए। इन्होंने तो कभी शिवजी का नाम भी की है जो शिव तत्व को प्राप्त नहीं करता। नहीं सुना था। ईसा मसीह के सिवाय इन लोगों ने कभी शिवजी का नाम भी नहीं सुना था। फिर ये इतनी गहनता में कैसे उतरे? है। उसमें बिगाड आना ही हुआ क्योंकि उसमें बिगड़ने के हम लोग रोज़ ही सुनते रहते हैं। मंदिरों में जाके घंटियों बजाते तत्व हैं। लोग आचार बनाते हैं घर में, उसे बहुत सफाई करके, हैं, चर्च में जाके प्रार्थना करते है। और सब ठनठन गोपाल। घोकरं, सुखाकर ताके उसमें कीड़ा वगैरह कछ नहीं रह जाए। और ये लोग जिन्होंने कभी भगवान को भी नहीं याद किया ये जैसे आचार खराब हो जाए वैसे ही हमारा हाल हैं। एऐसे होगा। इन लोगों में ये गहनता कैसे आ गई? रूस के एक गाँव ये लोग हैं कहां? कोई सा भी आप सवाल बनाओ, कोई में 22,000 सहजयोगी बैठे हैं। तो ऐसे हम लोगों में कौन सी सी भी आप चीज बनाओं, यही होने वाला है क्योंकि उसके खराबी आ गई है कि जिसके कारण हम उस गहनता में नहीं अंदर की डे हैं। उसके अन्दर दोष है। जब तक मनुष्य के उतर पाते। उसकी वजह ये है कि रोज हम अपने को देखते अन्दर दाष रहेगा ये जो भी चीज बनाता रहेगा उसमें दोष नहीं। पहले अपने को देखना चाहिए। अपनी ओर नज़र करनी आना ही है। थोडे दिन चलता है जैसे गांधी जी ने सत्याग्रह चाहिए। ये नज़र इन लोगों में कहाँ से आई ये मैं नहीं बता चलाया था तो थोडे दिन चला। पर उनमे भी बड़े अजीब-अजीब सकती। लेकिन परिणाम देखिए वो बड़े गहन लोग हैं। कभी दोष हुए। मैं तो जानती हूं उनको। पर तो भी जोश था देश मुझसे ये नहीं कहेंगे कि हमारे पैसे का क्या होगा, बच्चे, मां को स्वतंत्र कराने का, ये करने का वो करने का। लड़ पड़े। बाप, रिश्तेदारों का क्या होगा। बस पूछेंगे कि माँ मेरा क्या होगा। अब तो ऐसा लगता है कि स्वतंत्रता मिल के ये हो क्या कोई सी भी चीज आप ले आओ वो खराब होनी ही द

बीमार थे तो उनके क्रियाक्रम में कोई िश्तेदार रहा है। खासकर तो मुझे ये वन्देमारतम पर बहुत दुख हुआ। मर गए। वों बहुत आखिर आपकी मां की स्तुति किसी भी भाषा में हो आखिर वगैरह नहीं आए। सब सहजयोगियों ने अपने तरफ से किया। मेरी स्तुति आप नहीं जानते कितनी भाषाओं में होगी। आपको एक चीज कहीं हो जाती है वहां तो दुनिया भर से लोग दौड़ने क्या बुरा लगना चाहिए? ये ‘वन्दे मातरम’ तो एक मंत्र है लगते हैं। कोई ये नहीं सोचता कि मेरा रिश्तेदार हैं । ये तो जिसको लेकर के ये देश स्वतंत्र हुआ। मेरे पिताजी झंडा लेकर सब निर्वान्य प्रेम है कि ये सहजयोगी है और हम भी सहजयोगी के चले थे, उच्च न्यायालय में तो उनको गोली मार दी गई। है। एक दूसरे को मदद करने के लिए, एक दूसरों को सँवारने खून बहता रहा पर फिर भी वो चल के ऊपर गए और के लिए आपको जो मोड़ते हैं, खींचते हैं वो शिव तत्व हैं। झंडा फहराया। नारा लगाया ‘वंदे मातरम ‘। हम सबके दिल चिंता लगी रहती है कि दो सहजयोगी ठीक रहें। ये जो चिंता दहल गए। इस तरह की चीज इस देश में हो रही है कि है इसमें कोई लेन-देन की बात नहीं, इसमें कोई लाभ सोचा वंदे मातरम बंद कर दो। अरे ये देश क्या है तुम कुछ जानते नहीं जाता पर एक ही तकलीफ है। ये जो नितांत, आपस ही नहीं। स्व का तंत्र जानते नहीं स्वतंत्र हो गए। इस तरह की जो खींच है जो आत्मीयता है ये आप शिव तत्व से से हमारे अन्दर की जो गहन उदात्त भावना है उसे पाने वाले प्राप्त कर सकते हैं। ओर किसी भी तत्व से आप प्राप्त नहीं शिव हैं। जो हृदय में प्रेम है और जो सबके प्रति एक आत्मीयता कर सकते। इसीलिए मनुष्य को शिव तत्व में उतरना चाहिए। है वो देने वाले शिव हैं। जो हमें ऐसी शक्ति देते हैं । हमारा प्रेम और हमारी आत्मीयता बड़ी आह्वाद दायिनी चीज है। जैसे भूखे मर रहे हैं, मुसलमान हैं। और बड़ी तकलीफ की बात वंदे मारतम कहते ही एक आह्वाद भर जाता है। वो शिव है कि खाने पीने को नहीं। बर्फ पिघला कर वो पानी पी तृत्व की देन है। आज शिव जी की स्तुति गाते हुए आह्वाद आपमें आया। हैं इतनी दुर्दशा में लोग हैं और किसी को उनके प्रति आत्मीयता ये शक्ति शिव ने हमें दी है। इसलिए उन्हें आनन्ददायक कहते नहीं। कोई लोग सोचते नहीं कि वो मर रहे हैं। मुसलमान हैं। आनन्द में जो निरानंद है, सिर्फ आनन्द, उसमें अनेक देशों में इतना पैसा है, लेकिन कोई नहीं जाता उनको बचाने। तरह के आनन्द हैं। ये आहवाद जो है ये हमारे भावनाओं से जिस दिन संसार में शिव तत्व प्रस्थापित होगा ये सब ठीक जुड़ी है। भावनाओं में उभरता है जैसे एक फूल से उसकी हो जाएगा। ये झगड़े ही सब खत्म हो जाएंगे। कहते है कि सुगन्ध मुखरित होती है उसी प्रकार हमारे हृदय में जो भावनाएँ 8-9 साल में ही ये सब घटित होना है। देखिए कितने लोगों है किसी चीज के प्रति अच्छी, उदार, प्रेममय, सुन्दर, ऐसी की समझ सहज तक पहुंचती है? इतनी समझदारी लोगों में भावनाएँ हैं। शुद्ध भावनाएँ हैं। उस भावना की जो सुगन्ध है है कहाँ? आप लोगों पे निर्भर हैं कि आपके शिव तत्व के वो ही आह्वाद है। हम उसी आह्वाद में आन्नदमय होते हैं। प्रकाश से दुनिया प्रभावित हो जाये और ये जो हमें आफतें और फिर किसी चीज की ज़रूरत नहीं रहती। इसको उभारने दिखाई वाले, इसको जतन से रखने वाले और उचित समय पर इसका पूरी तरह से नष्ट हो जाएं। अनुभव लेने वाले ये शिवजी ही हैं क्योंकि वे स्पन्द के माध्यम से हमें देते हैं अभी भी किसी बड़े साधु संत का नाम लो अंदर फिर स्थापित हो जाए। ये ही एक प्रार्थना शिवजी से तो सारे बदन पे रोम खड़े हो जाते हैं। एकदम से ये स्पन्द, करनी है कि शिव तत्व को आप हमारे अन्दर स्थातिप कर ये लहरियाँ दोनों बहना शुरू हो जाती हैं अब ये बुद्धि वादियों दें। बहुत लोग पैसे कमा लेते हैं। बड़े-बड़े पदों पर चले जाते को क्या समझाएं? ये तो आधे गधे हैं, और जो कुछ बचा हैं बड़े-बड़े खिताब उन्हें मिलते हैं, सब कुछ होता है। ये वो घोड़े। इनके अन्दर तो आप कुछ घुसा ही नहीं सकते तो मिलते ही रहते हैं। लेकिन आज की जो क्रान्ति है, आन्दोलन और धुसाओ भी मत। आप को चाहिए कि आप अपना ही है, वो क्रान्ति मनुष्य के परिवर्तन की और सारे संसार को जीवन इतना सुन्दर बनाओ कि ये पीछे रह जाएं और ये देखें ठीक करने वाली है। उसके लिए कोई त्याग नहीं करने का कि ये समाज क्या है। अपने बुद्धि चातुर्य से इन्होंने कुछ कि मैंने ये त्याग किया मैंने वो त्याग किया। अपने आप छुट लोगों को अपने अन्दर फँसा लिया। कितने लोगों को फैसाया, गए। जळू सब कुछ छूट गया तब फिर परेशानी किसी चीज कितने झगड़े चलते रहते हैं। लेकिन आपका अगर समाज ऐसा की? इस शिव तत्व में आप सब लोग उतरें ऐसा ही हमारा ना आपने होगा कि बोस्निया में दो सौ हजार लोग सुना रहे हैं। जब लोग मर जाते हैं तो उन्हीं का गोश्त खा रहे ह रही हैं, जो मनुष्य की ही मूर्खता से पैदा हुई हैं, आज शिवजी से यही मांगना है कि ये शिव तत्व हमारे बने जो आज बना हुआ है, आपस में हमारे कोई झगड़े नहीं आशीर्वाद है। ऊँच-नीच नहीं। किसी ने बताया कि दिल्ली में कोई सहयोगी परमात्मा आप पर कृपा करें।