9th Day of Navaratri, Reintrospect Yourself

Campus, Cabella Ligure (Italy)

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                      नवरात्रि पूजा

कबेला (इटली), 24 अक्टूबर 1993।

आज हम यहां देवी की पूजा करने के लिए एकत्रित हुए हैं। देवी के कई रूप हैं, लेकिन वह शक्ति का अवतार हैं। आदि शक्ति इन सभी अवतारों को शक्ति देती है और इसलिए हमारे पास कई देवी हैं।

अलग-अलग समय पर वे इस धरती पर आए और जो साधक लोग थे उनके उत्थान के लिए वह सब किया जो आवश्यक था। विशेष रूप से जिसे हम जानते हैं, जगदम्बा, दुर्गा। वह सत्य के सभी साधकों की रक्षा करने और सभी बुरी ताकतों को नष्ट करने की कोशिश कर रही थी, क्योंकि मनुष्य अपने उत्थान के बिना सत्य को नहीं जान पाते हैं, और इसलिए वे जो कुछ भी करने की कोशिश करते हैं वह एक मानसिक प्रक्षेपण (कल्पना)है, और यह मानसिक प्रक्षेपण, यदि यह सत्य पर, धर्म पर आधारित नहीं होता है, इसका पतन होता है। संस्कृत में इसे ग्लानी कहते हैं। जब यह ग्लानी होती है, तब अवतारों का जन्म होता है-समस्या को हल करने के लिए।

देवी के सभी अवतारों के दौरान शैतानी ताकतों का भी बहुत अधिक अवतार हुआ है, उन्होंने अवतार लिया था, और देवी को उनसे युद्ध करके उन्हें नष्ट करना पड़ा था। लेकिन यह विनाश केवल विनाश की ख़ातिर नहीं था कि बुरी ताकतों को नष्ट कर दिया जाए, बल्कि बुरी ताकतें हमेशा साधकों को नीचे गिराने की कोशिश करती हैं, संतों को नीचे गिराने की कोशिश करती हैं, उन्हें नुकसान पहुंचाने की कोशिश करती हैं, कभी-कभी उन्हें नष्ट भी कर देती हैं। ये सभी विनाशकारी शक्तियाँ सामान्य रूप से एक ही समय पर नहीं आती हैं। अलग-अलग समय पर, संभालना आसान होता है। लेकिन अवतार का उद्देश्य उन लोगों को बचाना है, जो साधक हैं, क्योंकि वे आध्यात्मिकता के क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण लोग हैं। बाकी सब धूल के सिवा और कुछ नहीं, किसी काम के नहीं, बेकार हैं। यदि वे सत्य की खोज नहीं कर रहे हैं, तो परमेश्वर की दृष्टि में वे केवल बेकार जीवन हैं जो आ गए हैं और समाप्त हो जाएंगे। उनका कोई मूल्य नहीं है और उनकी कोई गरिमा नहीं है, उन्हें किसी चीज की समझ नहीं है।

तो ईश्वरीय प्रेम के न्याय में हमारे पास दो प्रकार के लोग हैं: एक जो सत्य के खोजी हैं और दूसरे जो नहीं हैं। वे अच्छे लोग हो सकते हैं, वे बढ़िया लोग हो सकते हैं, वे हो सकता है बहुत सारे अच्छे कार्य कर रहे हों, सामाजिक कार्य, यह कार्य, मिशनरी कार्य, हर प्रकार का कार्य जो वे कर रहे हों, लेकिन यदि वे सत्य की खोज नहीं कर रहे हैं तो वे उस श्रेणी में नहीं आते जहां ईश्वर को अवतार लेना है। इसलिए साधकों की महत्ता, महत्व को समझने का प्रयास करें। और यही तुम खोज रहे हो – खोज रहे हो। बहुत कम व्यक्ति। यदि आप साधकों का प्रतिशत लें, तो यह बहुत ही कम है । लेकिन यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि, मान लीजिए … सोने का एक छोटा हिस्सा स्टील के टीले से कहीं अधिक मूल्यवान है। उसी प्रकार आध्यात्मिकता के विकास में साधक कहीं अधिक मूल्यवान होता है । सारा ब्रह्मांड बना, सारा वातावरण बना, सारा विकास किस लिए हुआ? कि मनुष्य को सत्य का ज्ञान होना चाहिए।

लेकिन आधुनिक वातावरण में एक बहुत बड़ा अभिशाप है, मुझे लगता है कि सबसे बड़ी बुराईसभी शुंभ, निशुंभ वगैरह से बड़ी और सबसे ख़राब भौतिकवाद है क्योंकि भौतिकवाद आपको स्थूल बना देता है। तुम्हारी खोज में भी जब तुम उत्थान कर रहे होते हो, तो सूक्ष्मता से वह भौतिकवाद तुम्हें पकड़ लेता है। मैं यह नोटिस कर रही थी! जब लोग सहज योग में आते हैं, तो वे अपने आप में गहराई में जा रहे होते हैं, वे समझ रहे होते हैं कि मैं क्या कह रही हूं, वह सारा आंतरिक ज्ञान जिसे वे जानना चाहते हैं, जिसे आत्मज्ञान कहा जाता है। आत्मज्ञान का मतलब दो चीजें हैं: आत्मा के बारे में ज्ञान और अपने बारे में ज्ञान। यह सब वे पता लगाते हैं और वे जानते हैं कि यह क्या है।

यह वह अवस्था है जिसके लिए लोग हर तरह के काम करते रहे हैं, हिमालय पर जा रहे हैं, बिना ज्यादा कपड़ों के ठंड में ध्यान कर रहे हैं, कुछ फलों के साथ गुफाओं में रह रहे हैं। वे सभी प्रकार की तपस्या करते थे क्योंकि खोज इतनी गहरी, इतनी जरूरी थी और वे खोज की उस शक्ति से बाहर नहीं निकल सकते थे। लेकिन आधुनिक समय में भौतिकवाद उस लालसा, उस समर्पण को पीछे कर देता है। जब वे साधक होते हैं तो यह लोगों के लिए पागल हो जाने जैसा होता है।

मैंने देखा है, सहज योग में आने से पहले, लोग बहुत पैसा खर्च करते हैं, विभिन्न स्थानों पर जाते हैं, हिमालय जाते हैं, नेपाल जाते हैं, जापान जाते हैं, वे सभी जगह जहां वे घूम रहे हैं। लेकिन सहज योग में आने के बाद, जब वे आत्मा बन जाते हैं, तो आपकी नई जागरूकता के विकास के लिए, प्रगति मंद हो जाती है। साथ ही यह भी समझना चाहिए कि जब इतनी दौड़-भाग करने के बाद आपको कोई कीमती चीज मिलती है, तो आप उसके साथ स्थापित हो जाते हैं, और आप उसके बारे में बहुत संतुष्ट महसूस करते हैं। वह हिस्सा ठीक है। लेकिन बाद में क्या? आपका विकास रुकना नहीं चाहिए और वह रुक जाता है, क्योंकि इसका एक मुख्य कारण भौतिकवाद है। भौतिकवाद के कारण आपका स्वयं पर विश्वास भी कम होता है।

अब जैसा कि आपने देखा कि देवता देवी से प्रार्थना करते हैं और उन्होंने आकर सभी नकारात्मक शक्तियों को मार डाला। कारण यह था कि देवताओं की तीव्र इच्छा ने उन्हें अवतार लेने के लिए मजबूर किया। उत्थान  करने की इतनी गंभीर इच्छा कि उन्हें कभी-कभी भोजन भी नहीं मिला, पानी भी नहीं मिला और उन्होंने अपने उत्थान के लिए इतनी मेहनत की जो नकारात्मक शक्तियों से परेशान थी। तो उनका आह्वान हृदय से इतना व्यग्र और वास्तविक और ईमानदार था कि देवी को उन्हें बचाने, उनकी रक्षा करने, उनकी देखभाल करने के लिए इस धरती पर जन्म लेना पड़ा।

लेकिन जैसा कि हम देखते हैं, एक बार जब आप अपनी मंजिल पर पहुंच जाते हैं, आप महसूस करते हैं, “अब बेहतर होगा कि स्थापित हो जाएँ।” अब हम किस तरह का समझौता करते हैं? यदि, बोध प्राप्त करने के बाद, आप पूर्ण हैं, आप समग्रता में हैं, आप वास्तविकता के साथ पूर्ण रूप से एक हैं, कुछ भी करने को नहीं है – आप एक संत बन जाते हैं। और संत को किसी विज्ञापन की जरूरत नहीं, किसी चीज की जरूरत नहीं। उनका संदेश फैलता है, लोग उन्हें देखते हैं और जानते हैं कि वह एक महान संत हैं।

कई संतों ने तो घर भी नहीं छोड़ा। भारत में एक बहुत ही आम कहावत है: अपना तकियाआपको नहीं छोड़ना चाहिए, जिस तकिए पर आप आराम कर रहे हैं, आपको नहीं छोड़ना चाहिए। यह मानदंड था किसी गुरु का। जिन्हें खोजना है, उन्हें गुरु के पास आना चाहिए और कम से कम छह, सात मील ऊपर चढ़ना चाहिए, फिर गुरु किसी से नहीं मिलते। वह तुम्हें थप्पड़ मार सकता है, वह तुम्हें पीट सकता है, वह तुम्हें उस ऊंचे पहाड़ से गिरा सकता है। वह आपकी परीक्षा कई तरीकों से लेगा, अंततः वह एक व्यक्ति को बोध देने के लिए चुन सकता है। तो यह लालसा, यह व्यग्रता से प्रयास हर समय था।

अब, तो हम इस आधुनिक समय में सहज योग पर आते हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि सहज योग न केवल बहुत आसान है, बल्कि यह बेहद लाड़-प्यार करने वाला भी है। आप जानते हैं कि आपको साक्षात्कार मिल गया है, आप सभी जानते हैं कि आप दूसरों से बेहतर हैं, कि आपने इतनी सारी समस्याओं से छुटकारा पा लिया है और अब आप स्वयं के गुरु बन गए हैं। तब स्वयं ले प्रति और अपने साथियों के प्रति आपकी जो जिम्मेदारी है वह कम हो जाती है क्योंकि आप अपने आप से बहुत संतुष्ट महसूस करते हैं।

दूसरे दिन किसी सहज योगिनी ने मुझे फोन किया। मेरा मतलब है कि वे मुझे हर चीज के लिए रिंग करते हैं। उसने कहा कि “मैं डॉक्टर के पास गई और उसने विकिरण डाला और उन्होंने पाया कि मैं गर्भवती थी, तो मुझे बच्चे के बारे में क्या करना चाहिए?” इतनी छोटी सी बात के लिए वे मुझसे पूछेंगे। “हमारे बेटे का नाम क्या होना चाहिए? यह क्या है, वह क्या है?” मेरा मतलब है कि मुझे किसी भी पुजारी की तुलना में बहुत अधिक काम करना है। छोटी-छोटी, छोटी-छोटी बातों को लेकर वे चिंतित रहते हैं। ठीक है, वह हिस्सा ठीक है, कि मुझे आपको बताना है कि ऐसी परिस्थिति में क्या करना है या हमें क्या करना चाहिए। अगर वे ट्रेन चूक जाते हैं, तो वे मुझे फोन करेंगे, “माँ, हम ट्रेन चूक गए, अब क्या करें?” तो मुझे उनसे कहना है, “ठीक है, उसे एक बंधन दे दो।” यह भी मुझे उन्हें बताना है। या मान लें कि उनके पिता बीमार हैं, उन्हें दिल की बीमारी है, तो वे मुझे फोन करेंगे “मेरे पिता बीमार हैं, उन्हें दिल की बीमारी है, वह सहज योगी नहीं हैं, आप इसके बारे में क्या कर सकती हैं?” तो माताजी को उनके उस पिता पर चित्त देना होगा जो सहजयोगी नहीं है। छोटी-छोटी बातें वे मुझे लिखते हैं, ऐसी छोटी-छोटी बातें जो आप सोच भी नहीं सकते कि जैसे वे समझते कि मैं यहाँ किस लिए हूँ? फिर भी मैंने यह कभी नहीं कहा कि मुझसे पूछना बेवकूफी है, तुम्हें मेरा समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। कभी नहीँ।

लेकिन अब यह देखा जाना चाहिए कि यदि आप स्वयं को साक्षात्कारी आत्माओं के रूप में महत्व नहीं देते हैं, तो आप मेरे समय या स्वयं मुझे भी महत्व नहीं दे सकते हैं। इस भौतिकतावादी रवैये के कारण यह अवतार पूरी तरह से बर्बाद हो सकता है। इस आधुनिक समय में, मुझे नहीं पता कि मनुष्य के साथ क्या गलत हो गया है क्योंकि आपके जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज उत्थान करना और विकसित होना है। पूरी बात का एक व्यापक दृष्टिकोण लें – यह ब्रह्मांड क्यों बनाया गया था, आपको मनुष्य के रूप में क्यों बनाया गया था, इन सभी चीजों को करने की क्या आवश्यकता थी, किसलिए किया गया है। यदि आपके पास पूरी चीज के बारे में बहुत बड़ी दृष्टि है, तो अपनी स्थिति का पता लगाने की कोशिश करें, “मैं कहाँ हूँ?” और फिर, कैसे ईश्वर ने मुझे चुना है और अब मैं एक सहजयोगी बन गया हूं। तो अब, ‘मेरी ज़िम्मेदारी क्या है?’ – वह, देखना होगा।

लेकिन इसके विपरीत, मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो कह रहे हैं कि “मेरा स्थानांतरण हो गया है।” तो वे फोन करेंगे और पूछेंगे “माँ, हमें अपनी कुर्सी ले जानी चाहिए या नहीं?” इससे पता चलता है कि उनको खुद की कोई कीमत नहीं है और मेरी भी कोई कीमत नहीं है। दोनों तरीके। क्योंकि वे इतनी छोटी-छोटी बातों में, ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें पूछते हैं, कि यह समझना असंभव है कि सहजयोगी ऐसे प्रश्न कैसे पूछ सकते हैं।

जिस परिप्रेक्ष्य में हम देख सकते हैं, देवी के, वे इस धरती पर अलग-अलग रूपों में, अलग-अलग समय पर, सत्य के साधकों को बचाने और सत्य के साधकों के उत्थान को पूर्णता प्रदान करवाने के लिए आती हैं। क्या तुम कल्पना कर सकती हो! कलियुग से पहले देवी के अवतार से बहुत बड़ा फ़र्क। जबकि अब यह बहुत अलग बात है कि आप इस धरती पर सहजयोगी बनने के लिए आए हैं। आपके पास एक शरीर, एक मन, भावनाएँ, सब कुछ होना चाहिए, जो बस आध्यात्मिकता से आवेशित किया गया है, आपकी आध्यात्मिकता से चार्ज होता है। सामान्य रूप से होना चाहिए। क्योंकि आप कितने वर्षों से ईश्वर को खोज रहे हो? फिर, कि तुम यहाँ आए, कितना संयोग है! तो यह क्या है? जब आपको इतना बड़ा लाभ है कि आप अपनी खोज के कारण सहज योग में आ गए हैं, और अब आपको इससे संतुष्टि मिली है, तो आपकी क्या जिम्मेदारी है? कि अवतार स्वयं इस धरती पर आया है, ना केवल आपकी रक्षा करने के लिए, आपको पोषण देने और राक्षसों को मारने के लिए – ही नहीं! अपितु वह इस धरती पर आपको हर उस चीज के बारे में बताने के लिए आई है जो अंदर से सूक्ष्म है और आपको यह बताने के लिए कि आपका संबंध कैसा होना चाहिए, बाहर भी होना चाहिए और अंदर भी।

आप कभी भी सत्य से जुड़े नहीं थे, आप इस सर्वव्यापी शक्ति से कभी नहीं जुड़े थे, आप कभी भी सर्वशक्तिमान ईश्वर से नहीं जुड़े थे। तो समझना होगा कि कितनी बड़ी घटना हुई है, कि मुझ में से ही यह कुंडलिनी निकली है और उसने इन उच्च केंद्रों को छुआ है। कैसे? यह पहले नहीं किया गया था, नहीं, वे सिर्फ संरक्षित थे, उनकी देखभाल की गई थी। कहीं नहीं लिखा है कि देवी ने लोगों को साक्षात्कार दिया है, कहीं नहीं! वह जिम्मेदार है, वह दे सकती है। ऐसा उनका एक नाम भी है कि, मेरा मतलब है, एक नहीं बल्कि कम से कम दस ऐसे नाम हैं: कि वह तुम्हें तुम्हारा निर्वाण देती है, कि वह तुम्हें तुम्हारी स्वतंत्रता देती है, कि वह तुम्हें स्वतंत्रता से परिचित कराती है। ये सब बातें लिखी हुई हैं लेकिन अब जो हो रहा है वह यह है कि लोग अभी तक अपने जीवन के मूल्य को आधुनिक समय में नहीं समझ पाए हैं।

देखिए लोग किस तरह सवाल पूछते हैं, देखिए कैसे लोग हैं, पूछताछ चल रही है, लोग किस तरह परेशान हैं। “अब मेरा बच्चा बड़ा हो गया है, मुझे क्या करना चाहिए?” “आपको क्या करना चाहिये? बच्चा बड़ा है, उसे स्कूल भेजो, जो अच्छा लगे वही करो!” “माँ, क्या आप कृपया बताएंगी कि बच्चे को कहाँ रखा जाए?” फिर आप बच्चे को डालते हैं – “क्या आपने स्कूल की माँ को देखा है?” “नहीं, मैंने नहीं किया!” “फिर तुम जाओ और स्कूल का निरीक्षण करो” !! कल्पना कीजिए कि माँ काली यह कर रही हैं! उन्होंने दो अच्छे कड़े थप्पड़ मारे होंगे, मैं आपको बताती हूंजिसने भी ऐसा कहा होगा उसे । आप इससे क्या समझे हैं? लेकिन मातृत्व को उस विस्तृत सीमा तक काम करना होता है। आप अपने बच्चे के लिए ऐसा नहीं करेंगे, मुझे पता है। लेकिन जब बच्चों की बात आती है तो वे क्या कर रहे हैं? अभी भी भौतिकतावादी हैं।

आज विशेष रूप से यह दशहरा का एक बहुत ही महान दिन है, जैसा हम कहते हैं। यह वह दिन है जब, जैसा कि आप जानते हैं, रावण को जलाया गया था। जगह-जगह रावण के पुतले जलाए जाते हैं। जब श्री राम आए तो यह किया गया था। उनकी जीत। लेकिन उनकी जीत में ऐसा नहीं था कि उन्होंने सहजयोगी बनाया या उन्होंने आत्मसाक्षात्कार दिया- नहीं! उनकी जीत थी कि उन्होने रावण का वध किया। वह उस समय आज की तैयारी के लिए, आज की घटनाओं के लिए किया गया था। यह बहुत पहले किया गया था कि वे दिन आएंगे जब लोगों के पास श्री राम की जीत की उचित मूल्य प्रणाली होगी। लेकिन ऐसा नहीं होता, ऐसा नहीं होता, क्योंकि माताजी निर्मला देवी का यह अवतार बहुत अलग है, बहुत मायावी है- महामाया। तो आप को स्वयं आपकी जिम्मेदारी पर छोड़ा गया हैं, जो आपको पसंद है वह करें। आप जो चाहें कर सकते हैं!

तो वे मुझसे पूछेंगे “माँ, हमें एक समस्या है,” मैंने कहा “क्या?” “हमें नहीं पता कि हमें किस तरह की कुर्सियाँ खरीदनी चाहिए?” हर छोटी-बड़ी बात के लिए वे माँ से पूछा करेंगे, लेकिन ज़रूरी चीज़ों के लिए कभी नहीं। पूरी बात का एक तरह-का अजीब इस्तेमाल शुरू हो गया है। वह जो इतना महान है, इतना महत्वपूर्ण है, उसका उपयोग बिल्कुल बेहूदा चीज के लिए किया जाता है।

तो अवतारों के बीच अंतर देखें। लोगों को बचाने, माया के दलदल से निकालने के लिए इस धरती पर एक अवतार आता है। लेकिन एक और अवतार आया है जो सिर्फ बात करने के लिए नहीं है, बल्कि आपको अपना आत्मसाक्षात्कार देने के लिए और फिर आपकी छोटी, छोटी चीजों की देखभाल करने के लिए है।

तो जब इस महिला ने फोन किया और मुझसे पूछा, “मुझे क्या करना चाहिए? कृपया माँ मेरा इलाज करें।” यह उन दिनों के भक्तों और आज के भक्तों के तौर-तरीको के बीच एक बहुत ही बड़ा फर्क है। बहुत बड़ा अंतर है! मैंने कहा तुमने जब यह सब किया तब तो तुमने मुझसे कभी नहीं पूछा  ! कोई फर्क नहीं पड़ता। अब आपने जो कुछ भी बेहतर किया है, मैं बच्चे को देखती हूं, बच्चे की देखभाल करती हूं, बच्चे को ठीक करती हूं, सब कुछ, लेकिन तुम साथ आओ। लेकिन तब मुझे एहसास हुआ कि यह महिला अपने बच्चे से कितनी लिप्त है। और मैंने नेता को फोन किया और उन्होंने कहा, “यह भयानक लिप्तता है। यह बच्चे के लिए एक भयानक लगाव है!”

तो अब एक बकवास से दूसरी बकवास की ओर! इस अवतार को कई तरह के काम करने होते हैं। मेरा मतलब है, श्री गणेश की ६४ कलाएं, ६४ विशेषज्ञता भी इसे हल करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। यह इतना जटिल क्यों है? आत्म-साक्षात्कार देने के बाद यह आपके लक्ष्य की ओर और आपके विकास की ओर एक सीध में आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन ऐसा क्यों है कि इतनी जटिल बकवास आपको हर समय परेशान कर रही है? तुम अब क्या चाहते हो? हमें खुद से पूछना चाहिए, “आप क्या चाहते हो?” “मुझे एक बच्चा चाहिए।” सहज योग के बाद आपको कुछ भी नहीं चाहिए। आप एक बच्चा क्यों चाहते हैं, इतने सारे बच्चे हैं। आप उनकी देखभाल कर सकते हैं। “मुझे चाहिए” चला जाता है, आपके दिमाग से दूर चले जाना चाहिए कि, “मुझे यह चाहिए और मुझे वह चाहिए।”

यह चाह अब खत्म हो गई है। आप जो चाहते थे, अपना आत्म-साक्षात्कार। उसके बाद जो घटित हुआ वह अब है, अब मैं जो चाहता हूं वह अधिक महत्वपूर्ण है। मेरा मतलब है, जो मैं चाहती हूं कि आप वास्तव में भौतिकतावाद से अलग हो जाएं। इसका मतलब यह नहीं है कि आप हरे राम हरे कृष्णवाले लोगों की तरह बन जाएं, नहीं, नहीं नहीं! वे निर्लिप्त नहीं हैं। वे बहुत लिप्त हुए लोग हैं। लेकिन वैराग्य एक ऐसी अवस्था है जहां कोई भी चीज आपको बांध नहीं सकती, कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है, सबसे महत्वपूर्ण चीज है आपका आध्यात्मिक उत्थान। इस उद्देश्य से अधिक आपको कुछ भी आकर्षित नहीं कर सकता। आज वास्तव में यही आवश्यक है, जिसे सहजयोगियों को समझना चाहिए।

सहजयोगियों की तुलना में, लोगों किन चीज़ों से गुजरे है, मेरा मतलब है, जब मैं इसे पढ़ती हूं, तो वास्तव में मुझे भयानक लगता है। यहां सब कुछ सुविधा है, सुविधाजनक है – साथ आएं अच्छे भोजन का आनंद लें, अच्छी कंपनी, यह एक त्योहार चल रहा है! सब कुछ ठीक से आयोजित है। और अगर कुछ कमी है,तो वह मैं होऊंगी जो आयोजकों को बताएगी कि यह क्या है? आपको यह करना चाहिए था, आपको वह करना चाहिए था।”

अब हम उस बिंदु पर आते हैं जहां हमें समझना होगा कि हम क्या चाहते हैं। शुंभ निशुंभ को मारने से क्या फायदा? इस कैथोलिक चर्च को मारने का क्या फायदा? क्या फायदा? क्योंकि आप जड़ हैं, आप एक ही स्थान पर चिपके हुए हैं, कोई प्रगति नहीं है। तो इन सब चीजों को हर समय करने और उस सारी नकारात्मकता को नष्ट करने का क्या फायदा? उद्देश्य क्या है? यह बहुत मनमानी है हर कोई कहता है, “माँ, आपने उन्हें अनुमति दी है, आपने उन्हें लाइसेंस दिया है, इसलिए अब वे वैसे ही कर रहे हैं जैसे वे हैं।” दूसरी एक लड़की मेरे पास आई, उसका बच्चा बहुत बीमार था, मैंने उससे पूछा “क्या आप ध्यान करते हैं?” वह चुप रही। मैंने कहा, “मैं यह पता लगा सकती हूं कि आप ध्यान नहीं करते क्योंकि मुझे पता है कि यह क्या है। कि तुम ध्यान भी नहीं करते!”

तो आज की मुख्य बात यह है कि दशहरा का दिन है, जब लोग अपने गांवों की सीमाओं को पार करते हैं और माता-पिता के लिए सोना लाते हैं। वह ऐसी  कहानी है। अब आपको क्या करना है कि इस भौतिकतावाद की सीमा को पार करना है, इस बेतुके बौना करने वालाबल जो आप पर काम कर रहा है, और जो कुछ मैंने कहा है उसे पार करना है और सहज योग की सीमाओं से सोना, जो कि अमिट चीज है, को लाना है। .

आप में से कितने लोग वास्तव में कार्य के क्षेत्र में हैं? आप में से कितने लोग इस बारे में लोगों को बता रहे हैं? आप इस बारे में क्या कर रहे हैं? मैं आपसे बात क्यों कर रही हूं और भारतीयों से इस तरह क्यों नहीं कर रही हूँ क्योंकि उनका रवैया अलग है, उनका रवैया भौतिकतावादी नहीं है, यह आध्यात्मिक है। वे अपनी आध्यात्मिक उन्नति चाहते हैं जिसके लिए वे बहुत कष्ट उठाते है, वे केवल उस अवस्था में जाने के लिए चीजों को करने के लिए लीक से हट कर भी चले जाते हैं जहां वे आसानी से समर्पित हो सकें। यह समर्पण अवस्था आनी ही चाहिए|

उदाहरण के लिए, आपको एक समस्या है, जैसे कि आपकी कोई छुट्टी नहीं है और आप पूजा के लिए आना चाहते हैं – उदाहरण के लिए कहें। मैं सिर्फ एक उदाहरण दे रही हूं। अब पूजा में आना है तो आ जाओ। न केवल आपको नौकरी मिलेगी, बल्कि आपको पदोन्नति भी मिल सकती है। लेकिन आपको अपने उत्थान में कोई विश्वास नहीं है, आपको यह भरोसा नहीं है कि आप चुने हुए हैं। भौतिकतावाद के कारण यह गायब है।

हाल ही में अमेरिका में, हमारे पास एक बहुत ही महान सहज योगी हैं – डेव डंफी। मैंने उनसे कहा, “बेहतर होगा कि आप अमेरिका के लिए एक नेता के रूप में पदभार ग्रहण करें, क्योंकि यह सज्जन ठीक नहीं हैं और आप बेहतर तरीके से कार्यभार संभाल सकते हैं”। उसने तुरंत कहा “ठीक है माँ।” अब वह होनोलूलू में रहता है। हमारे कार्यक्रम और सब कुछ एलए – लॉस एंजिल्स के माध्यम से किया जाता है और यह काफी अजीब लग रहा था कि मुझे उसे वहां आ जाने और वहां काम करने के लिए कहना पड़े।

अब, हम कहाँ हैं? हम वे लोग हैं जिन्हें सारी शक्तियाँ प्राप्त हैं। आपको आशीर्वाद दिया गया है। लेकिन हम अभ्यास नहीं करना चाहते, हम यह नहीं जानना चाहते कि हमारे पास कौन सी शक्तियां हैं। अपने बच्चों के लिए चिंतित, हम कौन सी साड़ी पहनने जा रहे हैं, या इस बारे में चिंतित हैं कि नेता कौन है और नेतृत्व के बारे में हमें क्या करना चाहिए। ये सब चीजें हमारी मदद नहीं करने वाली हैं। आप उसके लिए यहाँ नहीं हैं! समझने की कोशिश करें। आप यहां आत्मा बनने और फिर आत्मा के प्रकाश को फैलाने के लिए हैं। अन्य कुछ मायने नहीं रखता है!

एक बार जब आप ऐसा करना शुरू कर देंगे, तो आप चकित रह जाएंगे कि विश्वास काम करता है। यह अंध विश्वास नहीं है, यह अंध विश्वास नहीं है। आपको मुझे बताने की भी जरूरत नहीं है, यह सिर्फ कार्यान्वित होता है। कुछ दिनों की बात है, आप जिस चीज के लिए तरस रहे थे, उसके कई परिणाम आपको मिल सकते हैं। मैं भौतिक, सतही बातें नहीं कहती, आपको वे मिल सकते हैं। लेकिन सवाल बना रहता है। कोई, कहो, अपना जीवन तथाकथित, सहज योग के लिए समर्पित करना चाहता है, तो आप क्या करते हैं? यदि आप समर्पित करते हैं तो आप क्या करते हैं? पहली चीज है आपका विश्वास। आपको पता होना चाहिए कि किसी भी चीज़ में आपका विश्वास कैसा है। आप वास्तव में इस पर विश्वास करते हैं या नहीं? यदि आप इसमें विश्वास करते हैं, तो आपने इसके बारे में क्या किया है?

तो इस स्तर पर आपको आत्मनिरीक्षण करना होगा। आप क्या कर रहे हो? हम क्या करने के लिए हैं? हमें कहाँ तक जाना है? यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण समय है और आप यहां बैठे हुए अत्यंत महत्वपूर्ण आत्माएं हैं, लेकिन, यदि आप अपने सिस्टम और अपने आप को महत्व नहीं देते हैं, तो परमात्मा को आपकी चिंता क्यों करनी चाहिए? परमेश्वर को आपको विचार देने का प्रयास क्यों करना चाहिए? वह आप में, उस तरह के व्यक्तियों में भी कोई दिलचस्पी लेने की कोशिश क्यों करे?

तो अब, मुझे आपको बस इतना बताना है कि, इस पूजा के दिन, यह ऐसा संयोजन है कि यह दशहरा है, मैं यहाँ हूँ और आप इसे देवी पूजा का अंतिम दिन भी कह सकते हैं। हमें अपने भीतर देखना होगा, आत्मनिरीक्षण करना होगा “मैंने सहज योग के लिए क्या किया है? मेरे बच्चों की देखभाल के अलावा, पति के लिए खाना बनाना, बस इतना ही?’ पुरुष भी ऐसा ही सोच सकते हैं – “हमने क्या किया है? हमने सहज योग के लिए क्या किया है?” बस “मैं राजनेताओं से मिलना चाहता हूं, बस मैं इस व्यक्ति से मिलना चाहता हूं, मैं उस व्यक्ति से मिलना चाहता हूं।” किस लिए? उन्हें आकर आपसे मिलना चाहिए! लेकिन आपका खुद पर विश्वास बहुत कमजोर है। मुझे लगता है कि इस सब गिरावट का मुख्य कारण खुद पर विश्वास है। यह विश्वास एक ऐसी चीज है जिसे आप जानते हैं कि यह ऐसा है।

आपने मेरी तस्वीरें देखी हैं, आप इसके बारे में आश्वस्त हैं। आश्वस्त होने के लिए कुछ भी नहीं है! लेकिन यह विश्वास आपके दिल से एकाकार नहीं है। यह बस आपके अस्तित्व के साथ एकाकार नहीं है, यह बाहर है। “ठीक है माँ वो करेगी, माँ ये करेगी, माँ ये करेगी।”

लेकिन अब सब कुछ मुझे ऐसा लग रहा है, मुझे आपको अनिवार्य रूप से किसी प्रकार की तपस्या करने के लिए कहना है। आप किसी से पूछते हैं, “क्या आप ध्यान करते हैं?” “नहीं, मां, नहीं।” बहुत स्पष्ट रूप से! “नहीं माँ हम नहीं करते”। “तो तुम यहाँ क्या कर रहे हो?” “मेरे घुटनों में कुछ दर्द है, इसलिए मैं आपके पास आया हूँ,” ठीक है! “लेकिन मैं ध्यान नहीं करता – मैं बहुत ईमानदार हूं, मैं ध्यान नहीं करता। मुझे सिर्फ घुटनों में दर्द है, कृपया इसे ठीक करें, मैं ध्यान नहीं करता।”

आप में से कितने लोग वास्तव में हर रात ध्यान करते हैं? गुइडो ने कहा कि, “माँ, अगर आप ऐसा कहेंगे, तो वे कहेंगे, ‘ठीक है, हम रात में करेंगे, लेकिन सुबह नहीं, क्योंकि माँ ने कहा है कि रात में करो।‘ ‘”

इसमें कोई ईमानदारी नहीं है, कोई उत्साह नहीं है… इसके बारे में किसी भी तरह के उत्साह की उम्मीद नहीं है। “ठीक है, आज नहीं तो कल देखेंगे! माँ ऐसे कहती है, ज़रूरी नहीं, ज़रूरी नहीं, ठीक है!तो आप खुद को संतुष्ट करें! लेकिन हानि किसकी होने वाली है? मैं नहीं, मुझे सहज योग की आवश्यकता नहीं है। क्या मुझे है? मैं आपके सहज योग के लिए सारी तपस्या कर रही हूँ।  कुछ तपस्या इसके बारे में आप लोग करें , क्या विचार है?

तो अब मैं जो कहना चाह रही हूं कि, आपको अपनी अनुभूति मिल गई है, अब आप समझ की उस महान स्थिति तक पहुंच गए हैं, आंतरिक ज्ञान की भी और आत्मा और सर्वशक्तिमान ईश्वर के साथ अपने संबंध के बारे में भी। यह सब अब आप जानते हैं, बहुत सी बातें जो आप जानते हैं! इसके बावजूद यह अभी तक नहीं है हुआ है कि, जो यह आपके दिल से, आपकी सच्ची इच्छा से होना चाहिए।

यह किसी को भी, स्वयं को धोखा देने में मदद नहीं करता है – कभी नहीं! इसलिए मैं x, y, z के लिए कुछ नहीं कह रही हूं। मैं आप सभी के लिए कह रही हूं। अपने आप को धोखा देने की कोशिश मत करो। आप यहां इतने महान उद्देश्य के साथ हैं, यह उद्देश्य सामूहिक है और हमारे मन को इन सभी निरर्थक विनाशकारी ताकतों से मुक्त करना है और फिर इसे चारों ओर फैलाना है, इसके बारे में बात करना है।

मेरा अपना विश्वास यह है कि, सहज योगियों को ऐसा एहसास करने के लिए कुछ होना चाहिए कि हमारे भीतर जो कुछ है, जो संभावित है, जो अभी प्रकट होने वाला है, उस पर काम करना कितना महत्वपूर्ण है। यह जिम्मेदारी है, चाहे आप यहूदी हों, ईसाई हों या किसी भी चीज से कोई फर्क नहीं पड़ता, यह सब बाहर है।

लेकिन जो आपको करना है, कि आप जागरूकता के एक नए क्षेत्र में आ गए हैं, एक उच्च जीवन के एक नए क्षेत्र में जहां आप अपने सम्पूर्ण आंतरिक स्व को जानते हैं, आप यह सब जानते हैं कि क्या अच्छा है और क्या नहीं। सब कुछ, यह सब जानने के बाद भी, अगर तुमने उन्नति नहीं की , तो तुम किसे दोष दोगे?

तो अब हम इस कलियुग के महत्व को समझने के लिए एक बिंदु पर आते हैं, जहाँ आपकी माँ आपकी मदद करने के लिए यहाँ हैं और साथ ही आपको बहुत कोमलता से, मधुरता से सब कुछ बताने के लिए, आपकी देखभाल करने के लिए। दरअसल मैं किसी पर एक मिनट से ज्यादा गुस्सा नहीं कर सकती। तो आपको मधुरता से समझाने के लिए कि आपको क्या करना चाहिए था और आप क्या कर सकते हैं और आपको क्या करना है। ये सब बातें मैंने वास्तव मेंतुमसे कहती रही होती, हर समय, मैं तुम्हें बहुत ही मधुरता से घेरती रही हूं और तुम्हें समझाती रही हूं कि यह तुम्हारी अपनी शक्ति है जो तुम्हारे भीतर है और जिसका तुम्हें ध्यान रखना है। और इसे बढ़ाओ, और तुम्हारे पास इतनी सारी किताबें या समझने के तरीके भी हैं।

लेकिन यह आंतरिक ज्ञान जो आपके पास है, उसका कुछ ऐसा हुआ है कि, मुझे इन चीजों का बनाने का एक आंतरिक ज्ञान है, लेकिन मैं ऐसा नहीं करता। यह इतना सरल है। मैं बस नहीं करता! मेरे पास आंतरिक ज्ञान है, ठीक है! मैं एक पीएच.डी. लेकिन मैं पागल हूँ – ऐसा ही है!

सहज योग में बहुत से लोग मानसिक रूप से बहुत अच्छी तरह से सुसज्जित हैं, मुझे पता है, लेकिन जहां तक ​​सहज योग का संबंध है, वे नहीं हैं। तो मैं अभी आपको चेतावनी दे रही हूँ! यह ऐसा है जैसे क्राइस्ट ने कहा है, “कुछ बीज जो अंकुरित हुए थे, सड़क पर गिर गए और सूख गए और मर गए।” अब हर समय न्याय का दौर चल रहा है। जब मैं आपसे बात कर रही हूं, तो यह सब न्याय चल रहा है। तो हर रात आपको ध्यान करना है और फिर सोचना है कि आज रात आपने क्या किया है, आज, पूरे दिन, हमने क्या हासिल किया है?

लेकिन वे गणना कर रहे हैं! “मान लीजिए कि मैं वहां 5 बजे जाती हूं तो मुझे 7 बजे वापस आना होगा अन्यथा मैं बिंदु से चूक जाऊंगा। मैं इस व्यक्ति, उस व्यक्ति को नहीं देखूंगा।” तो, सब कुछ उसी तरह काम करता है – समय के साथ, निरर्थक बातों के महत्व के साथ। लेकिन जिसे जो कार्यान्वित करना है वह है आपका विश्वास कि, “मैं ऐसे काम करने जा रहा हूं जो सत्य हैं, जो समझदार हैं, जमीन से जुड़े हैं और मैं खुद को पूरी तरह से स्वतंत्र रखने जा रहा हूं और मैं केवल मेरी ही नहीं, बल्कि अपने आंतरिक अस्तित्व बल्कि दूसरों के आंतरिक अस्तित्व की भी देखभाल करने जा रहा हूं।

आज की विशेष पूजा वास्तव में दाईं ओर की है, मैं कहूंगी कि दशहरा एक दाईं ओर की पूजा है क्योंकि आप श्री राम और उनके धनुष और हर चीज की पूजा करते हैं। लेकिन इस अवतार के बारे में सोचें। चौदह वर्ष वह जेल गये। वह किसी खास कारण से वहां गए थे। मेरा मतलब है, अगर कोई एक साल के लिए भी चला जाए तो यह सिरदर्द है। यह एक जेल नहीं है, लेकिन हम इसे जंगल में कह सकते हैं जहाँ कि वह चले गए यह उनके लिए एक जेल की तरह था। वह एक राजा के बेटे थे जिसके पास रहने, सोने के लिए कोई जगह नहीं थी। वह जहाँ भी जाते उन्हें अपनी छोटी सी झोंपड़ी बनानी पड़ती थी। तो वह वहाँ गये। तो उन्हें ऐसा करना पड़ा! उन्होने ऐसा क्यों करा? क्योंकि उसे खुद पर भरोसा था। वह श्री राम हैं और उन्हें इन चीजों को अच्छी तरह से करना है। उन्हें अपने आप में विश्वास था और उसे सर्वशक्तिमान ईश्वर में विश्वास था कि वह जो कुछ भी कर रहा है, वह ईश्वर की इच्छा के अनुसार कर रहा है। और मुझे यही करना है – समाप्त!

मुझे परवाह नहीं है कि मुझे रावण का सामना करना है या मुझे इसका या उसका सामना करना है। मुझे परवाह नहीं है! मैं एक सहज योगी हूं, मुझे परवाह नहीं है। मेरा काम सहज योग का प्रसार करना है, ठीक है। मेरा काम खुद को शुद्ध करना और खुद को जानना है! यह मेरा काम है, मेरा काम है और यही मुझे करना है। मुझे स्कूल में प्रवेश मिले या नहीं, इसकी मुझे कोई परवाह नहीं है। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी को हवाई जहाज से जाना है तो उसे टिकट मिले या नहीं।आपको विश्वास नहीं होगा कि आप खुद में अपना विश्वास दिखाते हैं, आपको प्रवेश मिल जाएगा, आपको टिकट मिल जाएगा।

आप जो चाहते हैं वह वहां है। यह सब वहाँ है। आपको इसके लिए प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है, आपको इसके लिए परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, यह बस वहीं है। ऐसा ही है, मेरा मतलब है, मेरा सारा जीवन यह होता रहा है। बेशक, मेरा विश्वास जिब्राल्टर की तरह ठोस है, मेरा मतलब है, कोई सवाल नहीं, क्योंकि मैं जानती हूं कि मैं क्या हूं और मुझे पता है कि मुझे क्या करना है। तो मेरे लिए मुझे कोई दिक्कत नहीं है। मुझे पूरा विश्वास है और मैं सभी को जानती हूं और मैं कह सकती हूं कि मैं एक उड़ती हुई चिड़िया को पहचान सकती हूं। मैं यह प्रदर्शित नहीं भी करूँ। कभी-कभी मैं कह सकती हूं “ठीक है, यह अच्छा है, यह, वह।” लेकिन मैं निश्चित रूप से जानती हूं कि मैं क्या हूं और मुझे क्या करना है! उसी तरह आपको अपने बारे में जानना होगा क्योंकि यह लोगों की एक अलग श्रेणी है जो आप हैं।

आप वह नहीं हैं जिन्हें ईश्वर से सुरक्षा की आवश्यकता है, जिन्हें माता से सुरक्षा की आवश्यकता है- नहीं! आपको दूसरों को सुरक्षा देनी होगी। तुम देखो, तुम्हें दूसरों को प्रकाश देना है, तुम्हें उन्हें मार्ग दिखाना है। तो आप यहां उस उद्देश्य के लिए हैं, न कि घर पाने, या आयकर रियायत पाने के लिए हैं। आप उसके लिए नहीं हैं। वह सब बकवास को तुम भूल जाओ। जॉली वेल, उन्हें आपको रियायत देनी ही होगी! मैं ऐसे ही रहती हूं, बिल्कुल।

जब मैं यात्रा कर रही होती हूँ तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि टिकट है या नहीं।सीट है या नहीं। मैं परेशान नहीं हूं, मैं बिल्कुल परेशान नहीं हूं। ठीक है, मैं यात्रा कर रही हूँ, मुझे नहीं लगता कि मैं यात्रा कर रही हूँ। मैं बस यही सोचती हूं कि मैं वहां हूं, बस। मैं बहुत सी ऐसी बातें कहती हूं जो इतनी आडंबरपूर्ण लगती हैं और इतनी अहंकारी लगती हैं। जैसे मैंने कहा कि यह कैथोलिक चर्च खत्म होने वाला है। मैंने ऐसा कहा …अगर यह कोई और होता तो वह कहता “शायद…शायद…”

अब, तो व्यक्ति को अपनी भाषा, शैली बदलनी होगी, और हमारी समझ यह होनी चाहिए कि हम एक कठोर व्यक्ति हैं। जहाँ तक स्वयं का संबंध है हम कठोर हैं, दूसरों के साथ हम दयालु, कोमल और मधुर हैं। लेकिन जहां तक ​​हमारा संबंध है हम कठोर हैं!

एक बार ऐसा हुआ कि हमारा स्थानांतरण हो गया, और हम एक घर में चले गए, हालांकि बहुत बड़े घर में, लेकिन सोने के लिए कुछ भी नहीं था। एक पलंग काफी छोटा था, मेरे पति उस पर सो रहे थे। वह बस ऐसा नहीं कर सकते। मैंने कहा “ठीक है, एक चुनौती लो!” मैं जमीन पर सो गयी। अगले दिन शरीर में दर्द हुआ। मैंने अपने शरीर से कहा ठीक से व्यवहार करो! पत्थरों पर भी सोना सीखना चाहिए।” और एक महीने तक मैं जमीन पर सो रहीथी, फिर भी।

तो आपको अपने शरीर के साथ कठोर होना होगा, आपको अपने मन के प्रति  कठोर होना होगा जो आपको भौतिकतावादी विचार देता है या आध्यात्मिकता में आपकी प्रगति को रोकता है। अब, बचाव के रास्ते  निकालते हैं।

अंतत: आप अंतिम बिंदु पर आते हैं जहां आप विचार नहीं करते जैसे, भौतिक जीवन और आप मानसिक जीवन या तथाकथित आध्यात्मिक जीवन या कुछ के बारे में भी नहीं सोचते हैं। लेकिन आप सोचते हैं कि यह ठीक है, आप इससे मुक्त हैं और अब आप एक बहुत, बहुत स्वतंत्र व्यक्ति बन गए हैं और आप जो चाहें कर सकते हैं। मान लीजिए कि आप ऐसी अवस्था में पहुँच जाते हैं, तो आप बस बैठ जाते हैं, “ओह, मैं उस अवस्था में पहुँच गया हूँ, समाप्त हो गया।” लेकिन हम भरोसा कैसे करें? इस बात का क्या प्रमाण है कि आप उस अवस्था में पहुँच गए हैं? आपको प्रदर्शित करना होगा! यह नहीं दिखाता है! लेकिन वे कहते हैं “आह! हम हैं माँ।”

सहज योग में भी एक मिथक है, वह वरिष्ठ। “वह एक बहुत वरिष्ठ सहज योगी हैं।” मेरा मतलब है कि मुझे समझ नहीं आ रहा है, यह क्या है? सहज योग में वरिष्ठता कैसे हो सकती है? वरिष्ठता नहीं हो सकती, कोई सवाल नहीं! जैसे, कोई समुद्र में प्रवेश करता है, कुछ लोग युगों से समुद्र के किनारे के पास खड़े हैं क्योंकि वे तैरने से डरते हैं, और कुछ लोग जो कल ही आए हैं वे शायद कूद कर आगे बढ़ रहे हैं और समुद्र का आनंद ले रहे हैं। तो वह वरिष्ठ कैसे है? सहज योग में हमारे पास यह वरिष्ठता का काम नहीं है! कोई वरिष्ठता नहीं है। फिर एक और मिथक भी है, शायद यह एक बहाना है, मुझे नहीं पता कि क्या कहूं, लेकिन यह कहना एक बहुत ही सामान्य बात है कि “वह एक वरिष्ठ सहज योगी है” या “आखिरकार, वह एक वरिष्ठ सहज योगी है।” मैं नहीं समझ पाती – यह कहना ऐसा है जैसे, “यह गधा वरिष्ठ है, दूसरा गधा नहीं।”

फिर एक और बात जिससे हम बहुत अधिक पीड़ित हैं, बहुत आम (हंसते हुए), वह यह है कि “माँ ने ऐसा कहा।‘” कोई भी कहेगा “अरे हाँ, माँ ने मुझसे कहा, उन्होने मुझे बुलाया और उन्होने कहा।” उन्होने क्या कहा “ओह! आप बहुत महान सहजयोगी हैं, आप यह हैं, आप ऐसे हैं कि आप वैसे हैं।

अब दो संभावनाएं हैं। एक, मैंने उसे मूर्ख बनाने के लिए कहा होगा – मैं महामाया हूं – या शायद मैंने यह सब सिर्फ यह देखने के लिए कहा होगा, उसके अहंकार को लाड़ करो ताकि वह सहज योग में आ जाए और मेरे सिर को खाने के अलावा कुछ महत्वपूर्ण करे। तो “माँ ने ऐसा कहा। इतने महान सहजयोगी, मैं ऐसा और वैसा हूँ!बहुत आडम्बर पूर्ण शब्द! वह बहुत ही आडंबर पूर्ण भाषा का प्रयोग करते थे। तब लोग कहते हैं “आह! क्या सहज योगी है!”

तो एक सहज योगी का आकलन (हंसते हुए) उस बात से नहीं आता जो वह दावा करता है बल्कि वह जो हासिल करता है उससे आता है। मैंने देखा है कि कुछ सहज योगी बेहद घमंडी भी होते हैं। अत्यंत अहंकारी। खुद का कोई पार नहीं जानते। ऐसा सब वहाँ है। मैंने इस तरह के कई सहज योगियों को देखा है, कि, वे बहुत अहंकारी हैं और वे यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे कितने महान लोग हैं – हम्प्टी डम्प्टीज़, जैसा कि वे इसे कहते हैं। ठीक है, लेकिन किसी ऐसे सहज योगी के बारे में क्या जो ऐसा नहीं है, उसकी शैली क्या है? वह बस देखेगा, वह सब कुछ देखेगा, बस आनंद उठाएगा और जो हो रहा है उस पर हंसेगा। “ये आदमी इस तरह जो बात कर रहा है। उसके इस तरह बात करने का क्या मतलब है।” जो व्यक्ति सहजयोगी है, वह एक रत्न है, एक रत्न है, और रत्न है जिसके लिए आप उसे कहीं भी, किसी भी जगह पर ले जा सकते हैं, लोग कहेंगे “वह एक रत्न है।”

मेरी अपनी शैली यह है, कि जब मैं किसी व्यक्ति या सहज योगी को कहीं भी देखती हूं, तो सबसे पहले मैं अपने भीतर जाती हूं-पहली बात, मुझे नहीं पता कि आप ऐसा कर सकते हैं या नहीं लेकिन मैं कर सकती हूं। और फिर मैं उस व्यक्ति को बहुत अलग नजरिए से देखती हूं और समझती हूं। क्योंकि ये सारी शक्तियाँ आपके साथ भी हैं। यह केवल मेरी शक्तियाँ नहीं हैं, आप सभी के पास ये शक्तियाँ हैं, लेकिन आप और मुझ में केवल इतना ही अंतर है कि मुझे अपने आप में पूर्ण विश्वास है और आपको अपने आप पर कोई विश्वास नहीं है।

इसलिए हम एक चौराहे पर हैं जहां हमें यह समझना होगा कि कौन ऊपर जाएगा और कौन नीचे जाएगा। हमें यह पता लगाना होगा कि वह कौन है जो कुछ हासिल करने जा रहा है, और उस व्यक्ति की तुलना में मैं कहाँ खड़ा हूँ? ऐसा कहा जाता है कि आपको भुगतना पड़ता है, आपको यह करना होता है और आपको वह करना होगा – ऐसा कुछ भी नहीं, परमात्मा की कृपा से, वैसा कुछ भी नहीं।

तो, अब, यह क्या है? एक सहज योगी का क्या होगा? आप कैसे जानेंगे कि सहज योगी कौन है? आपको कैसे पता चलेगा कि कौन सिर्फ जुबानी सेवा कर रहा है? एक ही तरीका है कि आप विकसित हों, आप एक दर्पण की तरह हो जाएं और आप खुद देखें कि वह किस तरह का व्यक्ति है, और आप खुद भी देखें कि आप क्या हैं।

आज का व्याख्यान वास्तव में एक प्रकार सेबिल्कुल प्रेरित व्याख्यान है! और यह वही है जिसने आपको बताना चाहिए कि – आज हमने जो कुछ किया है वह ऐसा है – अपने स्वयं के मूल्यों को समझना, अपने स्वयं के जीवन के बारे में। हमें समझना चाहिए कि हम इस धरती पर क्यों हैं, हमारा उद्देश्य क्या है और हमें हासिल क्या करना है।

आप इसे देखें … मैं आपको अपने दिल से अपने सभी आशीर्वाद देती हूं और मैं चाहती हूं कि आप मेरे आशीर्वाद को परमात्मा की इच्छा की महान रोशनी के रूप में स्वीकार करें।

यह समझने की कोशिश करें कि आपका जन्म किस महत्वपूर्ण समय पर हुआ है और आप परमात्मा के इतने अच्छे, सुंदर लोग बन गए हैं।

परमात्मा आप को आशिर्वादित करे!