Ardha Matra Volume 5 two interviews or talks New Delhi (भारत)

अर्धमात्रा वॉल्यूम ५ कथावाचक : अनादिकाल से मानव सत्य की खोज में पर्वतो की बर्फीली चोटियों से ले कर [unclear] कठिन परिश्रम करता रहा| भारत की पावन भूमि सत्य साधको की योगभूमि रही है| उन्होंने पाया की सारे ब्रह्माण्ड को चलने वाले अनगिनत शक्तियाँ एक परा शक्ति का अंश है, इस पराशक्ति को उन्होंने आदिशक्ति का नाम दिया |आदिशक्ति प्रभु के प्रेम की असीम शक्ति है जिसे मानव आपने जीवन में हर पल मह्सूस करता है|  प्रभु के प्रेम में आत्मविभोर होकर मानव प्रभु के प्रति पूर्णता समर्पित हो जाता है, प्रभु के साथ एकाकारिता को ही योग कहते है|  नचिकेता तथा मर्कंद्ये ने कठिन तप कर इस दिव्यज्ञान को बाल्यकाल में प्राप्त किया | योग की हर विधा पर दिया गया भगवान श्री कृष्ण का ज्ञान, आज भी मानव को सत्य की साधना को करने को प्रेरित करता है | मानव जिस आनन्द एवं शांति की खोज में लगा है वह सत्य उसे केवल तार्किक श्रद्धा से प्राप्त हो सकता है, इस बात से कदापि इंकार नही किया जा सकता कीपृथ्वी पर जितने भी अवतरण हुए, जितने भी धर्मं बने , पंथ बने, जितने भी संत-पीर हुए वे मात्र सात्विक श्रद्धा के आविष्कार थे| कर्म-कांड से परे, रिती-रिवाजों से हट कर एवं रुढियों से उठकर [unclear] जिस शक्ति की ओर संकेत करती है वह शक्ति केवल मानवता का प्रतीक है |  महाराष्ट्र के महान संत ज्ञानेश्वरजी ने ज्ञानेश्वरी का छ्ठे अध्याय में दिव्य ज्ञान को सरल एवं सुन्दर मराठी भाषा में व्याख्या कर के जन-जन तक पहुँचने का महान Read More …