Shri Ganesha Puja

(भारत)

1994-12-31 Ganesha Puja Talk, Kalwe, India, 21'
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श्री गणेश पूजा कळवा, ३१ दिसंबर १९९४

अ जि हम लोग श्री गणेश पूजा करेंगे। श्री गणेश की पूजा करना अत्यावश्यक है। क्योंकि उन्हीं की वजह से सारे संसार में पावित्र्य फैला था। आज संसार में जो-जो उपद्रव हम देखते हैं उसका कारण यही है की हमने अभी तक अपने महात्म्य को नहीं पहचाना। और हम लोग ये नहीं जानते की हम इस संसार में किसलिए आये हैं और हम किस कार्य में पड़े हुए है, हमें क्या करना चाहिए? इस चीज़ को समझने के लिए सहजयोग आज संसार में आया हुआ है। जो कुछ भी कलियुग की घोर दशा है उसे आप जानते हैं। मुझे वो बताने की इतनी जरूरत नहीं है। परन्तु हमें जान लेना चाहिए कि मनुष्य जो है धर्म से परावृत्त हो गया है। जैसे कि उसकी जो श्रद्धाऐं थीं वो भी ऊपरी तरह से आ गयी । उसमें आंतरिकता नहीं। वो समझ नहीं पाता है कि श्री गणेश को मानना माने क्या? अपने जीवन में क्या चीज़ें होनी चाहिए। लेकिन ये बड़ा मुश्किल है। कितना भी समझाईये, कुछ भी कहिये लेकिन मनुष्य नहीं समझ पाता है कि श्री गणेश को किस तरह से हम लोग मान सकते हैं। गर वो एक तरफ श्री गणेश की एक आशीर्वाद से प्लावित है, नरिष्ठ है कि वो बड़े पवित्र है। वो सोचते हैं। ऐसी बात नहीं। अगर आप बहुत इमानदार आदमी है तो ठीक है। लेकिन नैतिकता में आप कम है तो गलत है। अगर आप संसार के जो कुछ भी प्रश्न है उसकी ओर ध्यान नहीं देते तो भी आपमें सन्तुलन नहीं है। और उनकी जो शक्तियाँ हैं वो अगर अपने अन्दर जागृत करना है तो वो कुण्डलिनी के ही द्वारा जागृत हो सकती है और कोई उसका रास्ता नहीं। उनकी जो विशेष चार शक्तियाँ हैं। उसमें से जो और भी अतिविशेष है वो है सुबुद्धि, सुज्ञता, ये शक्तियाँ हमारे अन्दर प्रज्वलित होने के लिए हमें चाहिए कि हम कुण्डलिनी का जागरण करके अपने अन्दर के गणेश को सन्तुष्ट कर लें। गणेश की नाराजगी भी नुकसानदेह हो सकती हैं। उनका स्वभाव तो एक तरफ तो बहुत शान्त, बहुत ठण्डा, और दुसरी तरफ, दुसरा जब वो देखते हैं कि मनुष्य किस गलत रास्ते पर चल पड़ा है तो उससे इस कदर नाराज़ होते है जैसे कि मैंने पुना में तीन बार कहा था कि आप गणेश जी स्थापना करके उसके सामने ये गन्दे डान्स, डिस्को, और ये सब गन्दे गाने गाईयेगा तो वो जरूर आप पर नाराज़ हो जाएंगे।| और चीज़ों की ओर चलते हैं। पहले परदेसीओं को म्लेंच्छ कहते थे। उनकी इच्छा सब मल की ओर जाती थीं | लेकिन अब हम लोग भी म्लेच्छ हो रहे है। गन्दे-गन्दे गाने हमें अच्छे लगते हैं, गन्दे-गन्दे पिक्चर हम देखते हैं। गन्दे-गन्दे वार्तालाप करते हैं, जबान से गन्दी भूकम्प होगा। और वही बात हुई। भूकम्प हो गया। अब आपको ध्यान देना चाहिए कि हम कौनसी-कौनसी गन्दी बातें करते हैं। ये सब गणेशजी को बिल्कुल पसन्द नहीं। हमारी भाषा शुद्ध होनी चाहिए। हमारे विचार शुद्ध होने चाहिए और हमारे शौक भी शुद्ध होने चाहिए। ये अब धीरे-धीरे अपने यहाँ आने लग गया है। इस तरह की जब हम अपने अन्दर भावना रखते हैं तभी हम अपनी इज्जत करते हैं। तभी हम सोचते हैं कि हमारी जिन्दगी का कोई महात्म्य है। हम कोई रास्ते पे पड़े हुए लोग नहीं है। हम भारतीय है। और भारत में जन्म लेने के लिए अनेक वर्षों की तपस्या चाहिए। अनेक वर्षों के पुण्य के बात ही आप भारतवर्ष में जन्म लेते हैं। आपका जीवन ऐसी उछली चीज़़ों के लिए नहीं है। ये समझने के कोशिश करनी चाहिए। इधर जाएंगे, सिद्धीविनायक मैं देखती हूँ लाइन लगी हुई है। पर आप गणेशजी के लिए क्या करते हैं? अगर आप लोग ये गन्दे काम पसन्द करना ना करें तो यह सब खत्म हो जाएगा। गन्दी जगह जाना, खाना खाना, गन्दी बाते करना ये सब चीज़ें अपने यहाँ बड़ी ही सामान्य तौर पर करने लग गये हैं। मैं अभी देखती हूँ कि रास्ते पर खड़े-खड़े लोग खा रहे हैं कहीं, कहीं जा रहे हैं, गन्दी बातें कर रहे हैं, औरतों पे रिमार्कस कर रहे हैं, गन्दी निगाह से देख रहे है। ईसा ने तो ऐसा कहा था कि अगर आप एक आँख से दो बार किसी औरत की तरफ देखें तो अपनी आँख निकालकर फेंके। अगर आपने एक हाथ से कोई गन्दा काम किया है तो हाथ काटे । मैने ऐसा कोई ईसा देखा नहीं अब तक जिसका आँख निकला हो या हाथ कटा हो । पर वो अपने को ईसाई कहते है, नाम भर, असली में तो नहीं। और हमारे देश में खास करके लिखा हुआ है कि सबमें एक ही आत्मा का वास है। वो किसी भी जाति-पाति का नहीं हो सकता। जात जो है मनुष्य के जन्म के अनुसार नहीं बनायी गयी थी, वो उसके कर्म के अनुसार बनायी गयी थी| और जो लोग जात को ले कर के और इतना महात्म्य देते हैं वो भारतीय हो ही नहीं सकते। इसलिए जानना चाहिए की हम लोग कितने ऐसे काम करते है जो बिल्कुल धर्म के विरुद्ध में है । और जब हम ऐसा कार्य करते हैं तो हमारे अन्दर गणेश जी नाराज हो जाते हैं गणेश जी का नाराज़ होना भी बड़ा ही दुःखप्रद है

क्योंकि उनकी नाराज़गी से अनेक ऐसी बीमारियाँ हो जाती हैं कि वो किसी तरह से, उसका कोई उपाय ही नहीं है, जिसको इनक्यूरेबल कहते हैं। ऐसी बीमारियाँ हमें हो जाती हैं। इसलिए गणेश जी को हमेशा प्रसन्न रखना चाहिए । सबसे पहले तो इस पृथ्वी को, जो उनकी माँ है, उस पृथ्वी तत्व को, जिससे वो गढ़े हुए है उसको बहत मान देना चाहिए । पहले जमाने में, अभी होता होगा कि उठने से पहले जमीन को पैर से छूते थे तो माँ से क्षमा माँगते थे कि ‘तुझे मैं पैर से छूता हूँ, मुझे क्षमा करें।’ इतना हमारे यहाँ मान था। आजकल तो कोई माँ-बाप का ही मान नहीं रखता तो जमीन का कौन रखेगा। हर एक चीज़ को नमस्कार करना, हर एक के प्रति श्रद्धा में होना ये अपने देश का एक विशेष स्वरूप है। अब वो सब स्वरूप नहीं रहे। ना बच्चे माँ-बाप को मान करते हैं, ना पति पत्नी की पर्वा करते हैं, ना पत्नी पती की पर्वा करती है। कोई भी, संसार के जितने रिश्ते है वो बड़े मान -पान से चलने चाहिए और इस प्रकार नाना धर्म अपने देश में बताये गये। राष्ट्रधर्म बताया गया है। अब विलायती चीज़ें लेना, विलायती कपड़े लेना, विलायती डान्स करना और विलायती कन्सेप्ट चीज़ें उठा लेना ये कोई बड़ी अकल की बात नहीं है। हम सिर्फ विलायती लोग सिख सकते है । हम उन्हें सीखा सकते हैं क्योंकि अपनी संस्कृति इतनी उँची है वो भी श्री गणेश के आधार पर। खास कर इस महाराषट्र में अष्टविनायक बैठे हुए हैं। महागणेश बिठाये हुए है। और यहाँ पर इस कदर गन्दगी मैं देखती हूँ तो मुझे बड़ा आश्चर्य होता है कि लोग भूल गये कि वो कहाँ बैठे हुए है। वो कहाँ आयें हैं। तो अपनी आप इज्जत करें । अपने को आप समझे। जब आप अपनी आत्मा हुए को पहचानेंगे तो आप आश्चर्यचकित होंगे कि आपके अन्दर अनेक शक्तियाँ है। पर वो शक्तियों को आपने जगाया नहीं। इसलिए दुनियाभर की गरीबी यहाँ, दुनियाभर की परेशानियाँ और दुनियाभर की गन्दगी आ गयी है। आवश्यक है कि श्री गणेश जी पूजा जो हम बाह्य में करते हैं वो अंदर में भी करें। और देखें की हम में गणेश जी के कौनसे गुण आये है और ऐसी कौनसी हमारी विशेषता है कि उनके आशीर्वाद से हम प्रसादित हो । ऐसे हमारे में गुण आने चाहिए। एक दुसरे की इज्जत करना, एक दुसरे का मान रखना ये सारी चीजें बतायी गयीं लेकिन सोचते हैं कि ये क्या ? परदेस में ऐसा कौन करता है और परदेस में तो इतनी समृद्धि है । आजकल तो उनकी समृद्धि की हालत खराब हो गयी | जिस चीज़ को समृद्धि समझते थे अब समझ गये की वो कोई खास चीज़ नहीं और वो भी उसमें भी गिरे जा रहे है। उन लोगों की जो भी बातें है वो बड़ी बाह्य है। रास्ते उनके साफ-सुधरे हैं लेकिन दिल खराब है। उनके यहाँ जो-जो चीज़ें मैंने देखीं वो ये कि अन्दर बिल्कुल गन्दगी है और बाह्य में दिखाने के लिए सब अच्छा है। और सारा इन्तजाम वहाँ पर बिगड़ने का है। कोई बच्चा अगर वहाँ जाए तो उससे शराब नहीं छूट सकती। उसको सिगरेट पिलायेंगे, उसको गन्दी जगह ले जाएंगे | डिस्को में ले जाएंगे, ये करेंगे, वो करेंगे इस कदर वहाँ गन्दगी है की घोर-घोर कलियुग बसा हुआ है। हम लोग सोचते हैं कि वो लोग बड़े सुख में है। माँ-बाप कहाँ से सुखी होंगे जिनके बच्चे ड्रग्ज लेते हैं। हम लोगों को अगर ठीक रास्ते पर रहना है और अपने अन्दर के आनन्द को उठाना है, जो सबसे बड़ी हमारे पास सम्पत्ति है तो जरूरी है कि हमारे पावित्र्यता को बचायें। और अपने को करके अपना जो व्यवहार है वो एक शान से बिठाये। ये नहीं कि भिखारी बन के और गन्दगी से अपने को मलते बहुत ही समझबूझ रहें। हिन्दुस्थानियों की जो बड़ी प्रशंसा है, अभी एक मुझे चायनिज साहब मिले थे , तो कहने लगे कि, ‘अच्छा वही वो सम्पदा है जिसके बारे में बहुत सालों से सुना था, पढ़ा था कि हिन्दुस्थान में अध्यात्म की सम्पदा बड़ी जबरदस्त है।’ हम अध्यात्म की सम्पदा है इसमें कोई शक नहीं। पर उधर रुझान होनी चाहिए। रुझान तो हम लोग म्लेच्छ हो गये। मल के ओर ही हमारी इच्छा जाएगी। जो चीज़ हमें मलीन करेगी उधर ही हम दौड़ेंगे। तो ये जो सुन्दरता अपने अन्दर है वो कैसे प्रगट होगी । वो कैसे दिखेगी । इसलिए जरूरी है कि श्री गणेश की पूजा करते वक्त आप ध्यान रखें की आप अन्दर भी श्री गणेश की स्थापना कर रहे हैं नहीं तो वो भी नाराज होने में बड़े कठिन है । उनको समझाना बहत मुश्किल है वो किसी चीज़ को पवित्रता से ऊँचा नहीं मानते। उनके सामने कोई बहस नहीं चलती। उनको कोई चीज़ से समझाया नहीं जाता। उन्होंने जो पवित्रता के बन्धन बनाये है, उसमें रहने से हमें भी सुख मिलता है हुए और वो भी प्रसन्न रहते है।

आज पूजेमध्ये सगळ्यांनी निश्चय करायचा, की आम्ही आपलं आयुष्य श्री गणेशाच्या चरणी घेऊ आणि पवित्रता आपल्यामध्ये आणू. त्या पवित्रतेत आम्ही आमच्या मुलांनाही सोडणार नाही. त्यांनाही आम्ही चांगल्या मार्गावर ठेवू. त्यांनाही वाहून आम्ही चांगले शिक्षण देऊ आणि वळण लावू. त्यात घाबरू नये. शिस्त ही मुलांना लावलीच पाहिजे. जर शिस्त तुम्ही तुमच्या मुलांना लावली नाही तर ती तुमच्या डोक्यावर बसतील. म्हणून मी निक्षून सांगते जर तुम्हाला गणपतीबद्दल खरच प्रेम असेल तर तुम्ही आपल्या मुलांना सांभाळले पाहिजे. भलतं प्रेम काही कामाचं नाही. त्याने मुलं खराब होतील आणि तुम्हाला फार त्रास होईल. म्हणून या वेळेला त्यांना जी शिस्त पाहिजे ती दिलीच पाहिजे. त्यासाठी थोडसं वाईट वाटत कधी कधी, की मुलांना आपण बोलतो किंवा मुलांचं असं झालं वगैरे, पण तसं काही वाटून घेतलं नाही पाहिजे. हे कर्तव्य आहे आणि आपलं कर्तव्य हे केलचं पाहिजे असं समजून जर केलं तर ही जी समोर येणारी वाईट पिढी आहे ती आपण टाळू शकतो आणि त्याला आपण मार्गावर आणू शकतो. हा जो समाज बिघडत चालला आहे, त्याला जर ठीक करायचे असेल तर सर्वप्रथम पालकांनी लक्ष द्यायला पाहिजे. त्यात शिक्षक काही करू शकत नाहीत. पालकांनी लक्ष दिले पाहिजे आणि मुलांना हे समजवून सांगितले पाहिजे की, ‘तुम्ही उद्याची पिढी आहात’ आणि तुम्हाला या समाजाला सांभाळायचे आहे. त्या घाणेरड्या समाजात जायचे नाही. त्या सिनेमावाल्यांचे सुद्धा दिवाळं वाजवलं पाहिजे म्हणजे ते असले घाणेरडे पिक्चर काढणार नाहीत, घाणेरडं शिकवणार नाहीत आणि घाणेरड्या गोष्टी मुलांमध्ये येणार नाहीत. इतकं होईल की मुलांना हे नकोच असं म्हणतील. आत्ताची मुलं ही फार चांगली मुलं आहेत. जन्मत:च पार झालेली पुष्कळ मुलं आपल्या देशात आहेत. पण त्यांना जर नीट वळण लावलं नाही, त्यांना वाईट काय? चांगल काय ? समजलं नाही तर ती मुूलं तीच ती वाईट कामं करत राहणार. म्हणून आज श्री गणेशाच्या याच्यात तुम्ही आपल्या मनात ठरवून घ्यायचं की आम्ही माताजींना दाखवून देऊ की आमची मुलं आणि आम्ही, आमचं घरद्वार आणि आमचा समाज हा गणेशाला प्रसन्न करणारा झाला पाहिजे. मला पूर्ण आशा आहे की तुम्ही इकडे लक्ष द्याल. बाहेरून गणेशाची स्तुती करण्यात काही नाही, बाहेरून त्याची प्रार्थना करण्यात किंवा त्याच्या देवळात जाऊन घंटा वाजवण्यात काही अर्थ नाही. आपल्या हृदयात घंटा वाजली पाहिजे. ती जेव्हा वाजेल तेव्हाच हे पावित्र्य पसरेल आणि त्या पावित्र्याने सगळ्यांचे भले होईल आणि उत्तम होईल. सगळ्यांनी सहजयोगात जागृती घेतलेली आहे. तुम्ही जर सगळे सहजयोगी आहात तर तुम्हाला जास्त सांगायला नको. बाकीचे जे लोकं आहेत, नातलग, तुमचे मुलं -बाळं, लेकी सुना सगळ्या, ‘सगळ्यांना सहजयोग हा आला पाहिजे’ असा निश्चय करूनच आज जायचंय. आणि तसं घडेल. तुमची इच्छा असली तर हळदीकुंकु करून त्यांना बोलवून हे सांगा की सहजयोग घ्या. सहजयोगाशिवाय मार्ग नाही. आणि तुम्हाला पाहून ही ते सहजयोग घेतील अशी व्यवस्था आहे. तेव्हा श्री गणेशाला जे रुचेल, त्याला आवडेल असंच आपण केलं पाहिजे. नुसतं त्याला मोदक देऊन काय फायद्याचं? मोदकामध्ये काय ते पाहिले पाहिजे. मोदकामध्ये जर तुमची सदिच्छा असली, तुमची जर शुद्ध इच्छा असली तरच त्याला ती पसंत आहे, नाहीतर बाकीचे मोदक तर त्याला काही नको. तेव्हा आता शुद्ध इच्छा ठेवायची आणि शुद्ध इच्छा म्हणजे कुंडलिनी आणि ही शुद्ध इच्छा म्हणजे अशी की आम्हाला सहजयोगात पूर्णपणे उतरू द्या. तसंच आमच्या घराण्यातील सर्व लोकांना सहजयोगाचा लाभ होऊ दे. पण सगळ्यांना अनंत आशीर्वाद !