Mahashivaratri Puja: How To Get Detached and Ascend

Castle Mountain Camp, Wisemans Ferry (Australia)

1995-02-26 Mahashivaratri Puja Talk: How To Get Detached And Ascend, Sydney, Australia, 54' Download subtitles: EN,FR,JA,NL,PTView subtitles:
Download video (standard quality): View and download on Vimeo: View on Youku: Transcribe/Translate oTranscribe

Feedback
Share

                                              महाशिवरात्रि पूजा

 26 फरवरी 1995, ऑस्ट्रेलिया

आज हम यहां सदाशिव की पूजा करने के लिए एकत्रित हुए हैं। वह, जो हमारे भीतर परिलक्षित होता है, वह शिव है, जो शुद्ध आत्मा है। हमारे भीतर यह शुद्ध आत्मा सर्वशक्तिमान, सदाशिव भगवान का प्रतिबिंब है। यह सूरज की तरह है जो पानी में गिरता है और एक स्पष्ट प्रतिबिंब देता है। या फिर यह पत्थर पर गिरता है, यह बिल्कुल भी प्रतिबिंब नहीं देता है। माना की यदि आप के पास दर्पण हो, सूर्य न केवल दर्पण पर गिरेगा, बल्कि इसके प्रकाश को वापस प्रतिबिंबित करेगा। उसी तरह से इंसान में भगवान सर्वशक्तिमान का प्रतिबिंब आपके व्यक्तित्व के अनुसार व्यक्त किया गया है। यदि आपका व्यक्तित्व साफ और स्पष्ट, निर्दोष है, तो प्रतिबिंब दर्पण की तरह हो सकता है।

इस प्रकार संत लोग,  सर्वशक्तिमान ईश्वर को उचित तरीके से दर्शाते हैं, इस अर्थ में कि उनकी अपनी पहचान गलत चीजों के साथ नहीं है। जब ऐसी कोई पहचान नहीं होती है और जब कोई व्यक्ति बिलकुल शुद्ध आत्मा होता है, तो परमेश्वर का प्रतिबिंब दूसरों में परिलक्षित होता है।

सौभाग्य से आप सभी को अपना आत्म साक्षात्कार मिला है। इसका मतलब है कि सर्वशक्तिमान ईश्वर का प्रतिबिंब पहले से ही आपके चित्त में कार्यरत है। आत्मा की शक्ति से चित्त प्रकाशित होता है। आत्मा की शक्ति यह है कि यह एक प्रतिबिंब है। अर्थात, प्रतिबिंब की पहचान कभी दर्पण से या पानी से नहीं की जाती है। यह तब तक होता है जब तक सूरज चमकता है, और जब कोई सूरज नहीं होता है तो कोई प्रतिबिंब भी नहीं होता है। इसलिए जब आप सहज योग में हैं तो आपने अपने आप को साफ कर लिया हैं। आपकी कुंडलिनी भी आपको साफ कर चुकी है, और अब आप शुद्ध व्यक्तित्व वाले हैं। इसलिए यह प्रतिबिंब स्पष्ट और स्पष्ट है, और लोग इसे देखते हैं; इसे आपके चेहरे पर देखते हैं; वे इसे आपके शरीर पर देखते हैं; वे इसे आपके काम में देखते हैं; आपके व्यवहार में; सब जगहों में।

लोगों की मुश्किल यह है की वे विश्वास नहीं कर पाते है कि, वे सर्वशक्तिमान ईश्वर का प्रतिबिंब हो सकते हैं। मेरे ख्याल से उनके पास स्वयं के बारे में कुछ प्रकार के कॉम्प्लेक्स हैं कि, वे समझ नहीं पाते हैं कि वे अचानक कैसे सर्वशक्तिमान ईश्वर का प्रतिबिंब बन गए हैं, लेकिन उनके पास एक क्षमता है; और वे सर्वशक्तिमान ईश्वर के प्रतिबिंब बन सकते हैं, जिसके लिए उन्हें खुद पर विश्वास करना होगा, अपने उत्थान पर विश्वास करना होगा, यह मानना ​​होगा कि हम वह बन गए हैं।

सहज योग में विश्वास बहुत महत्वपूर्ण है। पूरे आत्मविश्वास के बिना आप अपनी उन्नति हासिल नहीं कर सकते। जो आपने मेरे व्याख्यानों में भी देखा है, मुझे उन्हें बताना पड़ता है कि,  हमें पूर्ण आत्म-विश्वास रखना है। लेकिन आत्मविश्वास का मतलब किसी भी तरह से आपके अहंकार, आपकी आक्रामकता से नहीं है। यदि आप आश्वस्त हैं, तो आप कम से कम आक्रामक हैं।

एक कहानी है, एक चीनी कहानी है, जो बहुत ही रोचक है: एक राजा चाहता था कि उसके मुर्गे उस किस्म की लड़ाई में जीत जाए, जिस में मुर्गा-लड़ाई होती है। तो किसी ने कहा कि एक संत है, अगर आप अपने मुर्गे को उसके पास ले जा सकते हैं तो वह उन्हें इतना मजबूत बना देगा कि वे निश्चित रूप से इस युद्ध को जीत लेंगे। इसलिए उसने अपना दो मुर्गे लेकर संत को दिये और उसने कहा, मैं चाहता हूं कि आप उन्हें इस युद्ध में लड़ने के लिए पूरी ताकत दें। एक महीने के बाद राजा आया और इन दोनों मुर्गों को ले गया, और उन्हें अखाड़े में डाल दिया जहाँ कई अन्य मुर्गे  भी थे। तो अन्य मुर्गों  ने इन दोनों मुर्गों से लड़ना और हमला करना शुरू कर दिया, लेकिन ये दोनों मुर्गे एकदम धैर्य से खड़े थे, बिल्कुल शांत और शांत। किसी भी तरह का हमला वे इसे एक मज़े के रूप में देख रहे थे, और सभी मुर्गे थक गए और वे मैदान से भाग गए, और इस तरह इन दो मुर्गों ने खेल को जीत लिया।

यह वही है जो की हमें समझना है, कि जो व्यक्ति निर्लिप्त है, उस पर कभी हमला नहीं किया जा सकता है। हमारे उपर कई हमले उनके द्वारा होते हैं जिनसे हम वशीभूत होते हैं। पहले हमारा परिवार, फिर हमारा देश, फिर हमारा धर्म, फिर हर तरह की चीज़, नस्लीयता; ये सभी पहचान वास्तव में हमें कमजोर बनाती हैं, क्योंकि हर समय वे हम पर हमला करते हैं और सहज योगियों के दिमाग में भ्रम पैदा करते हैं, मैंने देखा है। कारण, आपको सहज योग में विश्वास होना चाहिए और खुद पर विश्वास होना चाहिए, कि आप सही रास्ते पर हैं और अब आप बच गए हैं, और कोई भी आप पर हमला नहीं कर सकता है क्योंकि आपके पास दिव्य सुरक्षा है।

लोग किसी भी धर्म का पालन कर सकते हैं, वे किसी भी गुरु का अनुसरण कर सकते हैं, वे किसी भी चीज़ का अनुसरण कर सकते हैं, लेकिन उन्हें हर समय डर है कि हम पर हमला किया जाएगा, और वे उन चीजों को कहने से डरते हैं, जो उन्हें कहना चाहिए। यहाँ तक की उनके पास कोई विवेक नहीं है कि, वे जान सकें की क्या कहा जाना है। आप शुद्ध आत्मा हैं यदि इस उचित समझ के साथ उस पर विश्वास करें तो आपको आश्चर्य होगा कि आप जो कर रहे हैं उसके बारे में बहुत आश्वस्त होंगे। इस तरह हम कह सकते हैं कि हमें एक और बड़ा फायदा हुआ है – वह यह है कि हम सामूहिक हैं। हम सामूहिकता में जान सकते हैं कि हम कैसे व्यवहार कर रहे हैं। सामूहिकता में क्या प्रतिक्रिया है? समूह में से यह एक व्यक्ति है जो बहुत ही सूक्ष्म है, उसे बहुत ज्यादा बात करने की जरूरत नहीं है, उसे ज्यादा कहने की जरूरत नहीं है। वह ,मेरे द्वारा बताये गए मुर्गों की तरह खड़ा हो सकता है,बल्कि उसकी गहराई को महसूस किया जा सकता है। आप महसूस कर सकते हैं, उस क्षमता के व्यक्ति को कि, वह इतना गहरा व्यक्ति है, कि वह आक्रामक नहीं होना चाहता। वह अपने भीतर संरक्षित महसूस करता है।

इसलिए यह सुरक्षा हमें मानसिक रूप से नहीं बल्कि खुद के भीतर महसूस करना है, और एक बार आपके पास उस तरह का गुरुत्व, वैसी भावना रहती है, कोई भी आप पर हमला नहीं कर सकता है।

हमलावर व्यक्ति खुद असुरक्षित महसूस करता है; या शायद उसका पालन ठीक से  नहीं किया गया है; शायद वह अभी तक सहज योगी नहीं हैं। इसलिए आपको उस  व्यक्ति के बारे में सिर्फ एक दयालु दृष्टिकोण रखना होगा।

जैसे शिव थे, हमें कहना चाहिए कि सदाशिव का चरित्र ज्ञात है कि, वे ऐसे है जो किसी को भी क्षमा कर देते थे। जो कोई भी तपस्या करता है जैसे अपने सिर के बल खड़ा होना या एक पैर पर खड़ा होना या उपवास करना या सभी प्रकार की तपस्या करना, उनको इतनी अरुचि हो जाती कि, वह कहते थे: “ठीक है, तुम क्या चाहते हो? ले लो!” और उन्होंने कई राक्षसों को वरदान भी दिया जैसा कि आपने सुना है और इतने सारे राक्षसों को उन्होंने वरदान दिया, क्योंकि वह उनकी तपस्या से तंग आ गए।

सदाशिव द्वारा लोगों को आशीर्वाद देने के बारे में बहुत सारी कहानियाँ थीं। यहां तक ​​कि रावण, जो रावण के बारे में एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है, कि रावण ने बहुत तपस्या की। मुझे नहीं पता कि उसने क्या किया, वह अपने दस सिर के साथ कितना भूखा रहा होगा और क्या…, मेरा मतलब है, यहाँ अगर एक मुँह है तो आपको इतनी भूख लगती है – दस मुँह से! मुझे नहीं पता कि इस तरह तपस्या करने के लिए उसने क्या किया की शिव आज़िज आ गए, देखिए। उनकी करुणा इतनी महान है कि उन्होंने सोचा। इस आदमी को जो पसंद है वही उसे पाने दो।

तो रावण शिव के पास गया और शिव ने कहा: “तुम क्या चाहते हो? तुम यह सब खुद के ऊपर क्यों कर रहे हो? ” 

तो उसने कहा कि: “मुझे वर चाहिए”।

 उन्होंने कहा: “क्या वरदान ?” 

“पहले आप वादा करो कि मैं जो भी माँगूँगा, आप मुझे देंगे।”

उन्होंने कहा: “बेशक। अगर यह मेरी शक्ति में है, तो मैं दूंगा ”। 

यह एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है।

 तो उसने कहा: “मुझे आपकी पत्नी चाहिए।” 

चूँकि वह जानता था कि उनकी पत्नी आदि शक्ति है, और अगर उसे आदि शक्ति उसके साथ एक साथी के रूप में मिलती है, तो वह चमत्कार कर सकता है। 

तो उसने माँगा कि: “मुझे आपकी पत्नी मेरे साथी के रूप में मिलनी चाहिए”। 

अब, इस शैतान को देने के लिए इस तरह का निर्णय लेना, यह बहुत मुश्किल था, देखिये, लेकिन दया वश उन्होंने ऐसा किया। और वास्तव में इन सभी घटनाओं में आप  देखते हैं कि उनकी करुणा किस तरह से काम करती है।

परिणामस्वरूप यह निर्णय लिया गया कि उनकी पत्नी पार्वती को इस भयानक व्यक्ति के साथ जाना था। लेकिन पार्वती के भाई श्री विष्णु थे, जो कि श्री कृष्ण हैं, और उन्होंने स्वयं से कहा कि: “मैं अपनी बहन को इस शैतान के साथ जाने की अनुमति नहीं दे सकता। मुझे इसके बारे में कुछ करना चाहिए ”। सबसे अधिक शरारती श्री कृष्ण हैं। इसलिए उन्होंने ऐसा किया की उसे बाथरूम के लिए जाने का एहसास दिलाया गया। तो उसे शर्म महसूस हुई। उसने महिला को एक तरफ रख दिया और वह बाथरूम में चला गया।

 अब शिव ने उसे चेतावनी दी थी कि: “तुम बेहतर रूप से सावधान रहना, क्योंकि यह धरती माता इस महिला की माँ है, और उसे कभी धरती पर नहीं रखना चाहिए। आपको उन्हें हर समय अपनी पीठ पर रखना होगा। ” इसलिए जब वे एक निश्चित स्थान पर पहुँचे तो इन श्री कृष्ण ने एक शरारत की, और रावण को बाथरूम जाने की जरूरत लगी। तो उसने उन्हें नीचे ज़मीन पर रख दिया। जैसे ही उन्होंने उसे नीचे रखा, धरती माता ने उन्हें खींच लिया और वह समझ नहीं पाया की क्या करे ।

दूसरी बार फिर उसने कोशिश की। और वह फिर से शिव के पास गया और,

 उसने कहा: “अब देखिए आपने यह वादा किया था , और वह ऐसा कर रहा है”। तो, उन्होंने कहा, “मैंने आपको चेतावनी दी थी कि उसका भाई बहुत शरारती व्यक्ति है और वह कोई व्यवस्था करेगा, इसलिए बेहतर तुम सावधान रहना। इस बार आप उसकी बात नहीं मानें। जो भी हो ”, उसे जमीन पर मत रखो।

इसलिए हम कह सकते हैं, इस बार उसने एक और कोशिश की,  और अपनी पीठ पर ले गए। अचानक उसे एक छोटा लड़का मिला। यह श्री कृष्ण खुद उस पर हंस रहे थे। उसने पूछा : “तुम मुझ पर क्यों हंस रहे हो?” 

“अरे भाई, तुम इस बुढ़िया को अपनी पीठ पर क्यों ढो रहे हो? उसके पास कोई आभूषण नहीं है ”। 

उसने कहा: “वह देवी है”।

 उस ने कहा’ना’। उसके पास कोई आभूषण नहीं है। उसने कुछ नहीं पहना है। वह देवी कैसे हो सकती है? ” 

तो देखिये, भारत में … एक कहावत है जिसका हम उपयोग करते हैं कि, कोई महिला जिसके पास कोई आभूषण या कुछ भी न हो, वह ‘ लंका पार्वती ‘ जैसी रहती है। तो, वह उसे लंका ले जा रहा था। और जब उसने उसकी ओर देखा, तो जानते हो,उसने बिना दाँतों वाली एक बहुत बूढ़ी औरत को अपने उपर हँसते देखा। उसे ऐसा डर लगा कि उसने उसे फेंक दिया।  वह हैं महामाया!

तब तीसरी स्थिति थी, उसने जाकर कहा कि: “बेहतर हो आप अपनी पत्नी को बता दें कि, वह किसी की बात नहीं माने, और बेहतर आप यह सुनिश्चित करें कि, आप मुझे अपनी पत्नी प्रदान करते हैं”। उन्होंने कहा: “ठीक है, वह लंका में जन्म लेगी और तुम उससे शादी कर सकते हो”, और उसका नाम मंदोदरी था। अब महान कहानी आगे बढ़ती है। लेकिन यह मंदोदरी विष्णु की महान उपासक थी, और जिस समय उसे मारने के लिए राम खुद आए थे, । यह सब खुद मंदोदरी ने आयोजित किया था। क्योंकि वह जानती थी कि यदि श्री राम रावण को मारेंगे, तो उसे महिलाओं के बारे में इन विचारों से मुक्ति मिल जाएगी; जिस तरह से वह सीता के पीछे भाग रहा था और ऐसी सभी काम कर रहा था। वह वास्तव में चाहती थी कि कुछ ऐसा हो कि वह दूसरा जन्म ले, और उसे सुंदर महिलाओं के प्रति आकर्षण करने की इन धारणाओं से छुटकारा मिलना चाहिए, और जिस तरह से वह सीताजी को वहाँ ले आया था। वह पूरी तरह से इसके खिलाफ थी,लेकिन वह नहीं सुनता था। इसलिए युद्ध हुआ, और युद्ध में वह श्री राम के हाथों मारा गया।

यह सब प्रकरण श्री शिव की असीम अनुकंपा के कारण हुआ। देखने में उनकी करुणा कभी-कभी बहुत ही अतार्किक लगती है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा तर्क है। तर्क यह है कि वह जो कुछ भी करते है वह एक तरह से समस्या का समाधान लाता है|उदाहरण के लिए, एक युद्ध था, और युद्ध चल रहा था, और उस समय एक समस्या थी क्योंकि एक भयानक शैतान था जिसे श्री शिव द्वारा वरदान दिया गया था।

कि कोई तुम्हें मार न सके। इसी तरह उन्होंने आशीर्वाद जिसे वरदान भी कहते हैं, किसी अन्य संत को दिया था, जिन्होंने माँगा था कि,: “मैं अब सोना चाहता हूं और कोई भी मुझे परेशान नहीं करना चाहिए”। इसलिए उसे यह आशीर्वाद दिया गया कि: जो कोई भी आपकी नींद में खलल डालेगा, यदि आप उस व्यक्ति की तरफ केवल अपनी दृष्टी डालेंगे तो वह भस्म हो जाएगा। तो अब ये दोनों , जब युद्ध शुरू हुआ, तो देखिये की श्री कृष्ण ने सोचा कि, इस शैतान को मारने का सबसे अच्छा तरीका संत को मिले वरदान का उपयोग होगा।

तो उन्होंने खेल खेला। और उन्होंने युद्ध के मैदान से भागना शुरू कर दिया, और इसीलिए उन्हें एक ऐसे योद्धा के रूप में नाम दिया गया है जो युद्ध मैदान से भाग गया है (रणछोड़ दास – वह जो युद्ध के मैदान से भाग जाता है), और जब वह भाग रहे थे तो श्रीकृष्ण, उन्होंने एक शाल पहन रखा था। वह बस चुपके से गुफा में घुस गये और वहाँ यही संत सो रहे थे,  और उनके ऊपर अपनी शॉल डाल दी। इसलिए जब उन्होंने शाल को संत के ऊपर रखा, तो व्यक्ति, मेरा मतलब है, उक्त शैतान जो उनका पीछा कर रहा था, शैतानी व्यक्ति, वह उस स्थान पर पहुंचा और उसी शाल को देख कर उसने कहा: “ओह, तो अब तुम थक गए हो अब तुम यहाँ सो रहे हो। मैं तुम्हें ठिकाने लगा दूंगा ! ” – बिना यह जाने कि कौन सो रहा है। और उसने शाल खींच लिया, और यहाँ सोये हुए संत जाग कर उसकी ओर दृष्टी डालते हैं, और कहा जाता है कि, उनकी तीसरी आँख से वह भस्म हो गया । तो समस्या का हल इस प्रकार आ गया।

तो तीन शक्तियों का पूरा नाटक इसी तरह चल रहा है , बस यह सिद्ध करने के लिए कि आखिरकार सत्य की विजय होती है। पहले एक तरफ शिव की करुणा, उनकी भलाई है। फिर इसे बेअसर करने वाले श्री कृष्ण या कहें श्री विष्णु का नाटक ; और तीसरा ब्रह्मा का नाटक है जो चीजों की रचना करता चीज़ों को बनाता है।  केवल ऐसे वातावरण की रचना करने हेतु ताकि हम सभी को यह अहसास हो कि, हमारी मानवीय जागरूकता के लिए कुछ और भी किया जाना है, ये तीनों शक्तियां कार्यरत हैं। इन सभी ने हमारे अंदर सत्य की खोज की यह इच्छा विकसित की हैं।

अब एक तरफ शिव अत्यंत दयालु हैं, असुरों यानि राक्षसों के प्रति भी दयालु हैं। लेकिन दूसरी तरफ वह बेहद क्रूर हो सकते है। वह पूरे ब्रह्मांड को नष्ट कर सकते हैं। यदि लोग इतने पतनशील हैं, अगर लोग आध्यात्मिकता को नहीं अपनाते हैं, अगर उनकी अबोधिता पूरी तरह से खो जाती है, अगर लोग इस दुनिया में समस्याएं पैदा कर रही इन सभी गलत पहचानों से अलग नहीं होते हैं , तो वह पूरे ब्रह्मांड को नष्ट कर देते हैं । तो जैसा कि वह आदि शक्ति के काम के दर्शक हैं। वह उसे अनुमति देते है, मनुष्य की रचना करने , उन्हें आत्मसाक्षात्कार दिलाने, यह सब काम करने के लिए। लेकिन अगर वह पाते हैं की आदिशक्ति के बच्चे अर्थात उसके द्वारा बचाए गए लोग, दुर्व्यवहार या अपमान कर रहे हैं या किसी भी तरह से उसके काम को नष्ट कर रहे हैं, वह एक गुस्से में आ सकते हैं जिसके द्वारा वह पूरे ब्रह्मांड को नष्ट कर सकते हैं।

लेकिन मुझे नहीं लगता कि अब उनके लिए ऐसा करने का कोई मौका है, क्योंकि हमारे पास हर तरफ अब सहज योगी हैं। लेकिन मैं सहज योगियों के बीच जो पाती हूँ वह ऐसा है। कि कुछ सहज योगी बहुत तेजी से बढ़ते हैं। स्थिरता से, दृढ़ता से, वे अपने शिव तत्व के सिद्धांत को प्राप्त करते हैं। पहली उपलब्धि यह दिखाती है कि अंदर से वे निर्लिप्त होने लगते हैं। अब निर्लिप्तता मानसिक नहीं है। यह मानसिक नहीं है। ऐसा नहीं है कि हमें किसी तरह का सन्यास लेना है या हमें हिमालय जाना है, अपने परिवारों को छोड़ना है और ऐसा सब करना है। लेकिन निर्लिप्तता अपने भीतर है। जब वह निर्लिप्तता काम करना शुरू करती है, तो पहला संकेत यह होता है कि हम आनंदमय हो जाते हैं। हम प्रसन्नचित हो जाते हैं।

अब यदि आप किसी से भी पूछें: “आप दुखी क्यों हैं?”, तो वह अपनी पत्नी, शायद अपने घर, शायद अपने बच्चों, शायद अपने देश, शायद समाज, चाहे जो भी हो, के बारे में बात करेगा। इसलिए वह बिल्कुल परेशान हो जाता है, या शायद अपने आस-पास हो रही चीजों को देखकर बहुत दुखी होता है। अब वह एक आत्मसाक्षात्कारी  आत्मा है यह दुखी अवस्था उसकी मदद नहीं करेगी । अब जरूरत यह जानने की है कि,  आप समाज , परिवार, तथा पूरे देश  की इन सभी बुराइयों को लोगों में बदलाव ला कर ठीक कर सकते हैं | बुरा लगने से नहीं, अपितु ऐसा करते समय, मुख्य चीज जो आपके पास होनी चाहिए वह एक पूर्ण निर्लिप्तता है।

जब मैंने पहली बार सहज योग शुरू किया था मैं आश्चर्यचकित थी कि, जिस प्रकार से लोगों ने मुझे अपने ही देशवासियों, देश के लोगों  के बारे में बताया, मैं आश्चर्यचकित थी कि उन्होंने मुझे अपने स्वयं के धर्मों के बारे में जैसे बताया कि, किस तरह वे गलत काम कर रहे हैं। मुझे इतना नहीं पता था जितना कि उन्होंने मुझे बताया था, और मैंने समझा कि यह एक निर्लिप्तता है जो आई है कि वे स्पष्ट रूप से देख पा रहे थे कि; मेरे समाज के साथ, मेरे लोगों के साथ, मेरे संबंधों के साथ, मेरे परिवार के साथ, मेरे देश के साथ, पूरी दुनिया के साथ क्या गलत है। लेकिन ऐसा तभी संभव है जब आप उनमें से किसी एक के माध्यम से अपनी पहचान न बना लें। अन्यथा आप दोषों को कभी नहीं देख पाएंगे। आप कभी नहीं देख पाएंगे कि उस व्यक्ति के साथ क्या गलत है आप कभी भी पकड़ रहे चक्रों को नहीं देख सकते हैं।तो पहली चीज जो होनी चाहिए वह है निर्लिप्तता । अब मुद्दा यह है कि,निर्लिप्तता को कैसे हासिल किया जाए । कई लोग मुझसे पूछते हैं, “माँ, तुम कैसे निर्लिप्त हो जाती हो?” चूँकि,  मैं लिप्त ही नहीं हूं, इसलिए मैं पहले से ही अलग हूं। मुझे पता ही नहीं कि यह किस तरह से करना है। लेकिन आप लोगों के लिए मैं कहूंगी कि खुद को समझने के लिए आपको आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। यह जानने की कोशिश करें कि मैं किस चीज़ से लिप्त हूं। मैं क्यों दुखी हूँ? मैं किसके लिए चिंतित हूं? मुझे चिंता क्यों करनी चाहिए?

कुछ चीजें जो आप देखते हैं जो कभी भी बहुत महत्वपूर्ण नहीं थीं, वे कुछ सहज योगियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाती हैं। उदाहरण के लिए मुझे बताया गया था कि पश्चिम में लोग अपने बच्चों की इतनी परवाह नहीं करते हैं। लेकिन जैसे ही उन्हें आत्मसाक्षात्कार होता है कि वे बस अपने बच्चों से इस तरह लिप्त हो जाते हैं, जैसे कि कुछ गोंद के साथ। वे यह नहीं सोच पाते कि क्या उनके बच्चों के लिए अच्छा है। वे सोचते हैं कि,बच्चों के बारे में हर चीज़ उनका प्राथमिक कर्तव्य है। एक अन्य दिन, मुझे आश्चर्य हुआ जब मुझे बताया गया कि,वास्तव में यह माता-पिता हैं जो जन्मदिन की पूजा के बाद आना चाहते हैं। मैं चौंक गयी। मेरा मतलब है, बस  जन्मदिन पूजा आने ही वाली है।

तो माता-पिता पूजा के बाद क्यों आना चाहते हैं? जब मैंने योगी को बताया तो उन्होंने कहा: “माँ, हम बहुत खुश होंगे अगर वे यहाँ आते हैं, और उन्हें अवश्य आना  चाहिए”। उन्होंने कहा: “यह बच्चों की मदद करेगा, यह माता-पिता की मदद करेगा”। लेकिन अब पूरा ध्यान बच्चों पर जाता है, कि हमें बच्चों को वहीं छोड़ना चाहिए और हमें उनकी देखभाल करनी चाहिए, और यही एकमात्र काम है। इसलिए बच्चों के साथ लगाव निश्चित रूप से आपको ऐसे काम करने देगा, जो उचित नहीं हैं। तुम्हारे लिये अच्छा नहीं है। तो मैंने देखा है, सहज योग के बाद यह नया लगाव शुरू होता है। बहुत ही आम।

फिर एक और लगाव है, कहते हैं, अपने परिवार के लिए। आम तौर पर पश्चिम में ऐसी चीजें नहीं होती हैं। लोग अपने परिवार से ज्यादा लिप्त नहीं हैं, आप देखें। वे पीते हैं, वे सभी तरह की चीजें करते हैं। अचानक उन्हें आत्म-साक्षात्कार हो जाता है और यह एक बूमरैंग की तरह, वे परिवार में वापस आ जाते हैं। वे परिवार से, घर से, और हर चीज़ से इतने लिप्त हो जाते हैं की मैं समझ नहीं पाती हूँ | यदि आप पवित्र आत्मा बन रहे हैं तो आप निर्लिप्त हो जाते हैं, चूँकि आप सिर्फ एक प्रतिबिंब हैं, लेकिन सर्वशक्तिमान ईश्वर का प्रतिबिंब हैं। अन्य सभी की पहचान खत्म हो गई है। अब कोई कहे, कैसे? इसे कैसे छोड़ना है? मैंने उन्हें कभी नहीं छोड़ा। लेकिन फिर भी मैं कुछ बातों का सुझाव दे सकती हूं, जिन्हें आप आजमा सकते हैं।

पहला है ध्यान। आपको अपने बारे में पता लगाना चाहिए कि आपके साथ क्या गलत है, कौन सा पक्ष पकड़ रहा है, क्या यह दायाँ है या बाईं बाजू है? ध्यान में आप पता लगा सकते हैं। क्या आप पैसे से लिप्त हैं, क्या आप की लिप्तता व्यवसाय से हैं, क्या आप की लिप्तता अपने परिवार से हैं, क्या आप अपने देश से इस तरह लिप्त हैं,  जो सहज या आपकी सहज संस्कृति से नहीं है। फिर ध्यान लगाकर इस आसक्ति से छुटकारा पाने का प्रयास करें। आप जानते हैं कि दाएं और बाएं से कैसे छुटकारा मिलता है। यह लिप्तता आपकी उंगलियों पर प्रदर्शित होगा, और आपको स्वयं देखना होगा कि आप किस चक्र पर पकड़ रहे हैं, किस तरह से आप समस्या ग्रस्त हैं। और फिर आप एक बहुत ही सरल सहज उपचार करके इसे बहुत सरलता से दूर कर सकते हैं।

मुझे लगता है कि यहाँ हम असफल हो जाते हैं, कि एक बार हम किसी ऐसी चीज से लिप्त  हो जाते हैं तो हम जरा भी विचार नहीं कर पाते है कि हम लिप्त हो रहे हैं। हमें लगता है कि हम बहुत अच्छा काम कर रहे हैं क्योंकि अब हम इस व्यक्ति से प्यार करते हैं, उस व्यक्ति से प्यार करते हैं, शिव के गुण, दया का हिस्सा। आप लोगों से लिप्त होने लगते हैं। वह कोई करुणा नहीं है। यह किसी भी प्रकार की कोई करुणा नहीं है, ऐसे किसी भी चीज़ से लिप्त होना कोई करुणा नहीं है, और आपको शिव जैसी करुणा की प्राप्ति नहीं हो सकती है, हालांकि लोगों को लगता है कि हमारे भीतर यह शिव की करुणा है जो काम कर रही है।ऐसा नहीं है। क्योंकि उनकी वह करुणा बहुत शुद्ध है। यह ऐसा है जैसा मैंने आपको कई बार बताया है, यह पेड़ के उस रस की तरह है जो चढ़ता है और पेड़ के विभिन्न हिस्सों में जाता है, और फिर या तो यह वाष्पीकृत हो जाता है या धरती माता में चला जाता है। यह संलग्न नहीं है। अगर यह एक फूल या एक पत्ती या एक फल से लिप्त हो कर रूक जाता है, तो पूरे पेड़ को नुकसान होगा और फूल भी गायब हो जाएगा। तो किसी खास चीज, किसी खास विचार के प्रति इस तरह का लगाव, उचित नहीं है।

सहज योग में मैंने पाया कि लोग बहुत अनुकूलनीय हैं और समझते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए, लेकिन मुख्य बात ध्यान है। अपने हृदय में शिव तत्व पर,शिव के सिद्धांत पर ध्यान करते हुए, आप निश्चित रूप से निर्लिप्त हो सकते हैं, और तब अधिकतम आनंद होगा, आनंद अधिकतम होगा। मैंने देखा है कि लोगों की रुचि,  भोजन या कपड़े या घर वगैरह में है। आपकी रुचि हो सकती है, आपकी रुचि होनी चाहिए, लेकिन उस रुचि में आत्मज्ञान होना चाहिए, कि आप उससे लिप्त नहीं हो सकते।

कुछ लोग , जो दक्षिण भारत से हैं, वे उत्तर भारतीय भोजन पसंद नहीं करते हैं। जो उत्तर भारत के हैं उन्हें दक्षिण भारतीय पसंद नहीं हैं। यह एक बड़ी समस्या है। मैंने इंडियन एयरलाइंस में लोगों से पूछा: “आपके पास कोई मानक भोजन क्यों नहीं है?” उन्होंने कहा: “भारत का मानक भोजन क्या है? आप बताइए ,” लेकिन यह एक सवाल था। भारतीय स्वाद और भोजन के बारे में बहुत निराले हैं। इसलिए यह एक तथ्य है कि हमारे पास भारत में कोई भी मानक भोजन नहीं है। लेकिन इसी तरह, हम कई अधिक तरीकों से कह सकते हैं कि पश्चिम में लोग अनावश्यक चीजों के पीछे भागते हैं। वे केवल फैशन के वश में या मुझे नहीं पता कैसे काम करते हैं,  क्योंकि उनका व्यक्तित्व विकसित नहीं हुआ है। यदि आपका व्यक्तित्व विकसित  हो जाता है, तो आप उस दृष्टिकोण से सब कुछ देखते हैं, जो दूसरों की तुलना में बहुत ऊँचा हो, और आप दूसरों के साथ में खो नहीं जाते हैं। आप जो जानते हैं वह बहुत ऊँचा है, बहुत अधिक महान और बहुत अधिक आनंद देने वाला है। अब लोग सोचते हैं कि ये लगाव , बहुत खुशी देने वाले है। यदि आपको एक बच्चा  है और, एक पत्नी और सब कुछ प्राप्त है जो की , आनंद देने वाला है। तो,यह एक बहुत ही गलत विचार है। आनंद आपकी आत्मा के अपने स्रोत से आता है। चाहे आपके पति अच्छे हों, चाहे आपके बच्चे अच्छे हों या बुरे, जैसे भी वे हैं, वे आपको आनंद नहीं दे सकते।  केवल आप ही स्वयं का आनंद ले सकते हैं, और यही कारण है कि व्यक्ति बहुत क्षमाशील हो जाता है। जब कोई आपको नुकसान पहुंचा ही नहीं सकता है, तो आप किससे नाराज होने वाले हैं? यह सदाशिव की एक और बड़ी खूबी है, कि वह बेहद क्षमाशील हैं। वह उस एक बिंदु तक भी जाते हैं , जब तक वह आदि शक्ति रचित पूरी दुनिया को नष्ट नहीं कर देते। लेकिन अन्यथा वह बहुत, बहुत क्षमाशील है, और वह इसके बारे में बहुत संतुलित भी है।

एक बार आदि शक्ति पूरी दुनिया {जो बहुत पतनशील हो गयी थी }से बहुत नाराज हो गई, और उसने सब कुछ नष्ट करना शुरू कर दिया। तो, श्री शिव ने एक छोटे बच्चे को उनके पैरों के नीचे रख दिया, और इस तरह के झटके के साथ देवी की एक बड़ी जीभ बाहर आ गई और, उसने अपना विनाश रोक दिया। इसलिए उनके तरीके ऐसे हैं कि,जो व्यक्ति अपने भीतर शिव सिद्धांत विकसित करना चाहता हो , उसे बहुत क्षमाशील होना  चाहिए। मुझे पता है कि ऐसे लोग हैं जो बहुत क्रूर हैं और जो बहुत ही अत्याचारी हैं। यदि आप इसे सहन नहीं कर सकते, तो ठीक है, इसे समाप्त करें। मैं तुम्हारे साथ वहाँ खड़ा हूँ; लेकिन अगर आप इसे सहन कर सकते हैं तो इसे सहन करना और इसे वहन करने के इस अनुभव से गुजरना बेहतर है, क्योंकि इसे सहन करना अधिक मुश्किल नहीं है,इससे बाहर निकलने के बजाय ।

उदाहरण के लिए, एक महिला मेरे पास आई, और उसने कहा: “मैं अपने पति को तलाक देने जा रही हूं”।

 मैंने बोला क्यूँ?” 

“क्योंकि वह बहुत देर से घर आता है और मैं उससे बहुत कम मिल पाती हूँ”।

 लेकिन मैंने कहा, “जब तुम तलाक ले लेती हो तो तुम उसे बिलकुल भी नहीं पा सकोगी ! क्या तर्क है? कम से कम अभी तुम उसे देख पाती हो, जो भी है, जब भी, जितना भी समय है। लेकिन यह तलाक इसका कोई हल नहीं है। यदि तुम उसे तलाक देती हो तो तुम उसे कभी नहीं देख पाओगी।तो ऐसे तलाक का क्या फायदा?” ऐसी कई सारी चीजें एक बार एक निर्लिप्त व्यक्ति होने पर समझी जा सकती हैं, कि आप को किसी भी चीज़ से लिप्त नहीं रहना हैं। अब अगर आप किसी से लिप्त नहीं हैं तो आप पर कौन आक्रामक हो सकता है? कोई नहीं कर सकता। केवल एक चीज जब आपको लगता है कि आपको विरोध दर्ज करना है, तो आपको करना चाहिए। लेकिन निर्लिप्तता के साथ। विरोध दर्ज करने में भी पूरी तरह से पूर्ण निर्लिप्तता महत्वपूर्ण है।

आज हमारे सामने मुख्य समस्या कुछ और है कि,हम सभी को उत्थान करना है,  समान शक्ति के साथ उत्थान करना है। कुछ पक्षियों के बारे में एक कहानी है जो एक जाल में फंस गए थे, इसलिए उन्होंने फैसला किया कि हमें इस जाल से बाहर निकलना चाहिए, और उन्होंने कोशिश की। सबने निकलने की कोशिश की| हर किसी ने निकलने की कोशिश की। लेकिन कोई भी व्यक्तिगत रूप से यह काम नहीं कर सका था। इसलिए उन सभी ने एक साथ उड़ान भरने का फैसला किया, 

 कहा,”एक, दो, तीन, चलो!” और उन्होंने पूरा जाल अपने साथ उड़ा लिया, फिर उन्होंने चूहों से अनुरोध किया कि “कृपया आयें और हमारे जाल को काट दें।”, और उन्हें मुक्त कर दिया गया। तो अगर ऐसा चूहों और पक्षियों के बीच हो सकता है, तो हमारे बीच क्यों नहीं? इसलिए सामूहिकता में, आप चकित होंगे कि सामूहिकता में हम एक-दूसरे के साथ कैसे सहायक और आनंदित हो सकते हैं।

अब माना कि, आपकी माँ, पिता, बहनों, किसी के साथ कुछ ठीक नहीं  है, कोई बात नहीं है। आखिरकार आपके पास सामूहिकता के साथ यहां आनंद का महासागर है, और यदि आपकी समस्या को हल करना चाहते हो, तो सामूहिक रूप से आपकी समस्याओं को हल किया जा सकता है। इसलिए हमें सामूहिकता पर निर्भर रहना होगा। सामूहिक के साथ एक होने के लिए बहुत कुछ है। मुझे लगता है कि एक बार जब आप सहज के समुद्र में कूद जाते हैं, तो आनंद स्वयं आपको एक साथ खींच लेता है। एक दूसरे से मिलना एक ऐसी प्रसन्नता की बात है। सहज योगियों के बारे में हमारे पास बहुत सारे अनुभव हैं, जिन्होंने मुझे बताया है कि कैसे वे अचानक सहज योगियों को पाकर कितने प्रसन्न हुए थे, और उन्हें कैसा लगा। तो सहज योगियों के बीच यह गठबंधन वास्तव में सबसे प्रसन्नता का स्त्रोत्र है, और यही वह स्रोत है जिसे कहना चाहिए, हमारा साथ मिलकर एकाकार होना। एक बार जब आप एक दूसरे का आनंद लेना शुरू करते हैं…

मैंने आपको एक बार भारत में एक महान कवि की कहानी सुनाई थी, जिसका नाम नामदेव था, जो एक दर्जी था। और एक और था जो एक …… कुम्हार था। कभी-कभी मुझे अंग्रेजी शब्दों याद नहीं आते है। यह कुम्हार एक और कवि था और उसे गोरा कुम्हार कहा जाता था। इसलिए जब नामदेव उनसे मिलने गए – तो एक संत को केवल एक संत से ही मिलने का मन करता है – उनकी ओर देखा, और वह बस वापस खड़े हो गए और फिर उन्होंने एक सुंदर श्लोक कहा। उनका कहना है कि: “मैं यहाँ पर निराकार चैतन्य के दर्शन को आया था, लेकिन यहाँ चैतन्य रूप धारण किये है:: निर्गुणचा भेंटी आलो सगुणाशि ।” मैं निराकार को देखने आया था, चैतन्य को देखने के लिए लेकिन यहाँ वह इस रूप में है कि मैं इसे देखता हूँ ”।

केवल एक संत ही दूसरे संत के लिए ऐसा कह सकता है। इस तरह की सराहना, यह सूक्ष्म प्रशंसा केवल दो संतों के बीच, या कई लोगों के बीच ही संभव है। वे यह नहीं देख रहे थे कि वह मिट्टी पीट रहा था; वह एक गंदी धोती पहने हुए था, वह काम कर रहा था। उसने कभी इन सब चीजों को नहीं देखा। उसने कभी उसके शरीर, चेहरे या किसी भी चीज़ को नहीं देखा, लेकिन उसने उनमे जो दिव्यता व्यक्तिगत रूप से  प्रकट हुई थी उसे पहचान लिया ।

अन्य सहज योगियों के प्रति भावना की यह संवेदनशीलता वास्तव में आपके भीतर विकसित होनी चाहिए। तब आप निरर्थक, सतही बातों की परवाह नहीं करेंगे , और यह शिव के महान सिद्धांतों में से एक है। वह परवाह नहीं करते है अब देखिए, उनके बाल बिल्कुल उलझे हुए हैं, वह तेजी से दौड़ते हुए बैल पर दौनो पैर फैला कर बैठ जाते है, उनकी शादी के लिए जा रहे है। क्या तुम कल्पना कर सकती हो? और उनके सभी दोस्त, उनके सभी अनुयायी किसी के पास केवल एक आंख है, दूसरे के पास केवल एक हाथ है, एक ऐसा ही झुका हुआ है, क्योंकि उनके लिए बाहर का व्यक्तित्व मायने नहीं रखता है। जो मायने रखती है वह है,आध्यात्मिकता । चाहे आपके पास एक आंख हो या चाहे आपके पास एक टेढ़ा शरीर हो, इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उन के लिए वे सभी अपने ही लोग हैं, क्योंकि कुछ भी सतही उनका ध्यान आकर्षित नहीं करता है, अपितु,बस केवल एक व्यक्ति में स्थित देवत्व। हमारे पास उनके सिद्धांत को समझने के बहुत सारे तरीके हैं, चूँकि वह सर्वव्यापी है। यदि आप किसी के लिए करुणा महसूस करते हैं तो यह कार्यान्वित होती है। यह निश्चित रूप से काम करता है। हाल ही में मैक्सिको में एक तरह की लाइलाज बीमारी का मामला सामने आया था। और वह महिला, जो मैक्सिकन थी, जो UN में काम कर रही थी, वह अभी भी UN में काम कर रही है, उसने मुझे दो पत्र लिखे, कि माँ मैं अपने बेटे को खोने वाली हूँ क्योंकि उसे यह भयानक बीमारी है। मेरा मतलब है, बस उसने मुझे लिखा था। मुझे सिर्फ उसके लिए ऐसी करुणा महसूस हुई, चूँकि उसने एक पत्र लिखा था, जिससे मेरी आँखों में आँसू आ गए। और कल्पना करो, उन आँसुओं ने उस लड़के को ठीक कर दिया है! (एक तरफ हिंदी में) ने उस लड़के को पूरी तरह से ठीक कर दिया, और उसने मुझे एक पत्र लिखा, धन्यवाद आदि। मैं आश्चर्यचकित थी, चूँकि मेरी करुणा मानसिक नहीं है। यह बस वहाँ है, बस बहती है और कार्यान्वित होती है।

उसी तरह आप भी वो बन सकते हैं। मैं चाहती हूं कि, आपके पास मेरी सभी शक्तियां हों। लेकिन पहली करुणा है। और एक सहज योगी किसी अन्य व्यक्ति के साथ बुरा व्यवहार नहीं कर सकता है, चाहे वह सहज योगी हो या सहज योगी नहीं हो, यह महत्वपूर्ण नहीं है। लेकिन कोई भी अन्य सहज योगियों पर आक्रामक नहीं हो सकता है। यहाँ तक कि,यदि आप कहते हैं कि वह एक गैर सहज योगी हैं, तो भी सहज योगी को कभी भी आक्रामक नहीं होना चाहिए। यह सहज योगी की निशानी नहीं है। सहज योगी अलग हैं।

जैसे एक अन्य दिन किसी ने कहा, मैंने कहा: “आप बहुत गर्म स्वभाव के हैं”।

 “हां हां मैं हूं। जब कोई मुझे उकसाता है ”। 

मैंने कहा: “हर कोई जब उसे उकसाया जाता है तो केवल क्रोधित होता है। केवल पागल ही ऐसे होते हैं जो उकसावा होने पर क्रोधित नहीं होते, आप देखते हैं। इसलिए अगर आपको उकसाया जाता है और आपको गुस्सा आता है, इसमें ऐसा कुछ भी खास नहीं है। जब आप उकसाए जाते हैं तो हर कोई उस तरह से क्रोधित हो जाता है। लेकिन अगर आप कहते हैं कि अगर आप उकसाए गए तो भी आपको गुस्सा नहीं आएगा, उस तरह की स्थिति बहुत अलग है।

इसलिए मुझे लगता है कि आधुनिक समय में आज के पूरे माहौल में, एक बड़ा संघर्ष चल रहा है, जो शिव की संस्कृति नहीं है।  मुझे कहना चाहिए शिव की संस्कृति है, सहज संस्कृति। यदि आप सहज योगी हैं, तो आप में करुणा होनी चाहिए, दूसरों की भावनाओं को समझना चाहिए; और न केवल सहज योगियों, बल्कि गैर सहज योगियों की भी देखभाल करने की तत्परता होनी चाहिए, तभी आपकी करुणा प्रभावी होगी।

अब जैसा कि आप जानते हैं, आज की सभ्यता की सबसे बड़ी समस्या पश्चिमी संस्कृति बर्बादी की तरफ चली गयी है। वे जा रहे हैं, मेरा मतलब है कि जब आप अखबार पढ़ते हैं तो जिस तरह से चीजें हो रही हैं,आप चौंक जाते हैं| मुझे नहीं पता कि उनके विनाश से पहले कितने लोगों को इसका एहसास होगा। यह वास्तव में आत्म-विनाशकारी है। एक तरफ यह स्वयं के प्रति पक्षपाती और रियायती समाज है, जो कार्यरत है। अब दूसरी तरफ मुझे लगता है कि इस्लामी संस्कृति इसका विरोध करने की कोशिश कर रही है। यह सही है। इसका विरोध करने की उनकी कोशिश सही है। लेकिन जिस तरह से वे विरोध कर रहे हैं वह समस्याएं पैदा कर रहा है। यदि आप किसी पर जुल्म करते हैं – “यह मत करो, वह मत करो” – तो वे इसे बहुत अधिक करेंगे।

मैं एक उदाहरण दूंगी, कि यदि आप भारत के उत्तर में जाते हैं, तो संस्कृति अधिक इस्लामी है, और लोग बहुत ही अनैतिक हैं और हर समय महिलाओं को देखते हैं, सभी नहीं, बल्कि कई; कहने को हालांकि वे हिंदू हैं या कमसे कम ऐसा वे कहते हैं , लेकिन फिर भी उनमें ये सभी बुरी आदतें हैं, जो इस्लामी दमन से आई हैं। जब एक महिला पूरी तरह से ढकी होती है और कोई भी उसे नहीं देख सकता है, तो लोग बहुत अधिक उत्सुक हो जाते हैं। मेरे पास कुछ लोग थे जो बंबई आए थे और कोई मेरे साथ यात्रा कर रहा था, और वह सड़क पर हर महिला को देख रहा था। मैं बताती हूं, मैंने कहा: “तुम्हारी गर्दन अब टूट जाएगी, जिस तरह से तुम चल रहे हो”। लेकिन वहां यह एक आम बात है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि यह जिज्ञासा बहुत दूर तक जाती है और लोग बेहद अनैतिक बन सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हम पश्चिम में हैं।

तो आपकी इच्छाओं का दमन भी गलत है। साथ ही यह संस्कृति, जो बाहरी रूप से दबाती है, लेकिन भीतर से लोग बहुत अनैतिक हैं। एक बार मैं रियाद से लंदन जा रही थी और मैं नींद में चली गई । जब मैं उठी, तो मैंने देखा कि वहाँ कुछ अन्य ही  लोग बैठे थे, जो बहुत छोटी स्कर्ट पहनी महिलाओं के साथ थे – सभी बो -टाई बांधे हैं और इसलिए मैंने एयरहोस्टेस से पूछा। 

मेंने कहा: “क्या हम कहीं रुक गए?” 

उसने कहा: “नहीं, नहीं, हम सीधे जा रहे हैं”। 

मैंने पूछा: “फिर ये लोग कौन हैं?” 

“वही”। “वे बहुत बदल गए हैं!” मेरा मतलब है, मैं आश्चर्यचकित थी कि उन्होंने इतने लंबे, ये चादर और वह सब पहने हुए थी, और अब यहां वे इन सभी अजीब कपड़े के साथ हैं। मैं समझ नहीं पाई। यही हुआ भी। दमन द्वारा बनाई गई जिज्ञासा भी स्वस्थ नहीं है।

सहज योग में दमन का कोई सवाल ही नहीं है। तुम अबोध हो जाते हो, बस निर्दोष हो जाते हो। यही शिव का सिद्धांत है। यह सहज संस्कृति मध्य में है। इसके पास न तो बहुत अधिक उच्छृंखलता है और न ही बहुत अधिक दमन है, लेकिन यह मध्य  में है, जो है, शिव का सबसे बड़ा सिद्धांत अबोध होना है। और यह मासूमियत बस तुम में निखरती है। मैंने देखा है। आप लोग, जो कुछ भी आपने पहले किया होगा, लेकिन मैं देख रही हूं कि आप बहुत शुद्ध हैं। आपके पास बर्ताव करने के ये बेवकूफी भरे विचार नहीं हैं जो इतने पश्चिमी हैं।

इसके अलावा, बहुत सारे इस्लामिक लोगों को मैंने देखा है जो सहज योग में आए हैं, बहुत, बहुत सहज हो गए हैं और बहुत अच्छे जीवन जी रहे हैं। हमारे पास कुछ ईरानी हैं जिन्होंने मुझे अपने पाप-स्वीकार के पत्र भेजे थे, और मैं हैरान थी। मैंने उन्हें कभी नहीं पढ़ा क्योंकि यह मेरे लिए अति होता । और अब मैं पाती हूँ कि, उस तरह से वे सबसे अधिक नैतिक लोग हैं। तो एक अति पर जाना गलत है, या दूसरी तरफ जाना भी गलत है। लेकिन मध्य में सहज में रहना यह समझने का सबसे अच्छा तरीका है कि नैतिकता जीवन के लिए कितनी महत्वपूर्ण है । और वह तुम्हारी अबोधिता से आती है। और यह श्री गणेश का गुण है, जो शिव के पुत्र हैं, लेकिन श्री शिव के भोलेपन के कारण उनका गुण है।

अब मुझे लगता है कि शिव के अगले व्याख्यान में मैं आपसे अबोधिता की बात करूंगी, लेकिन इसके लिए आपको निर्लिप्तता को समझना होगा। वह निर्लिप्तता  जो भीतर विकसित होनी चाहिए। इसके लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है, लेकिन ध्यान के माध्यम से आप अपने भीतर उस निर्लिप्तता को विकसित कर सकते हैं, जो वास्तव में प्रसन्नता देने वाला होगा। शिव के कई गुणों का वर्णन किया जा सकता है, और मुझे लगता है कि इतने सारे व्याख्यानों में मैंने आपको उनके बारे में बताया है।

मेरा सिर्फ इतना कहना है कि आपके आश्रमों में सामूहिक ध्यान भी होना चाहिए। एक अच्छा विचार होगा यदि, आप सामूहिक ध्यान की कोशिश कर सकते हैं, तो अच्छा होगा। लेकिन आपको किसी को वायब्रेशन नहीं देना है आपको दूसरों के चक्रों की देखभाल नहीं करनी । आप सिर्फ अपने आप की परवाह कर लें कि, आपके साथ क्या गलत है।

और अब जो कुछ भी आपके उत्थान के लिए समाधान है, आपको उसे करना चाहिए, क्योंकि पूरी दुनिया की जिम्मेदारी सहज योगियों पर टिकी हुई है। यह आप जानते हैं, कि सहज योग के बिना कोई रास्ता नहीं है। मानवता को सभी प्रकार की समस्याओं से बचाने के लिए सहज योग इस धरती पर आया है। तो यह आपकी जिम्मेदारी है कि आप खुद को उचित स्थिति में रखें, जहां तक ​​सहज योग का संबंध है। अपने बाएं और दायें बाजू की पकड़ से छुटकारा पाएं, और फिर सहज योग का प्रसार करें , धमाकेदार शब्दों या आक्रामकता से नहीं, बल्कि प्यार और करुणा के साथ। मुझे यकीन है कि हमने बहुत कुछ किया है, हमने बहुत कुछ हासिल किया है, लेकिन यहां वहाँ अभी भी कुछ बिंदु हैं और जिन्हें सुधारना मेरे लिए बहुत अप्रिय काम है। लेकिन जो कुछ भी है मुझे यह कहना है कि यह काम कर रहा है, और हर किसी को खुद की तरफ देखना चाहिए और खुश महसूस करना चाहिए कि कहाँ से हम आये हैं और कहाँ तक हमें जाना है|

परमात्मा आप को आशिर्वादित करे!