Public Program, Sarvajanik Karyakram

कोलकाता (भारत)

1995-04-12 Public Program, Kolkatta Hindi, 33' Add subtitles:
Download video (standard quality): Download video (full quality): View and download on Vimeo: View on Youku: Listen on Soundcloud: Download audio:
Transcribe/Translate/Verify using oTranscribe


1995-04-12 Public Program version 2, Kolkata, India (Hindi), 57' Add subtitles:
Download video (standard quality): Download video (full quality): View and download on Vimeo: View on Youku: Listen on Soundcloud: Download audio:
Transcribe/Translate/Verify using oTranscribe


Feedback
Share

Public Program

सत्य को खोजने वाले आप सभी साधकों को हमारा प्रणाम

इस कलियुग में मनुष्य जीवन की अनेक समस्याओं के कारण विचलित हो गया है, और घबरा रहा है। कलियुग में जितने सत्य को खोजने वाले हैं, उतने पहले कभी नहीं थे और यही समय है जबकि आपको सत्य मिलने वाला है। लेकिन ये समझ लेना चाहिए कि हम कौनसे सत्य को खोज रहे हैं ? क्या खोज रहे हैं? नहीं तो किसी भी चीज़ के पीछे हम लग करके ये सोचने लग जाते हैं कि यही सत्य है। इसका कारण ये है, कि हमें अभी तक केवल सत्य, अॅबसल्यूट ट्रूथ (absolute truth – परम सत्य) मालूम नहीं । कोई सोचता है कि ये अच्छा है, कोई सोचता है वो अच्छा, कोई सोचता है कि जीवन और ही तरह से बिताना चाहिए। तो विक्षुब्ध सारी मन की भावना और भ्रांति में इन्सान घूम रहा है। इस संभ्रांत स्थिति में उसको समझ में नहीं आता है कि,’आखिर क्या कारण है,जो मेरे अन्दर शांति नहीं है। मैं शांति को किस तरह से अपने अन्दर प्रस्थापित करूं । मैं ही अपने साथ लड़ रहा हूँ, झगड़ रहा हूँ, कुछ समझ में नहीं आता।’ यही कलियुग की विशेषता है और इसी कारण इस कलियुग में ही मनुष्य खोजेगा। पहले इस तरह की संभ्रांत स्थिति नहीं थी। मनुष्य अपने मानवता से ही प्रसन्न था। अब आप इस मानव स्थिति में आ गये हैं। इस स्थिति में अगर आपको केवल सत्य मालूम होता तो कोई झगड़ा ही नहीं होता, हर एक इन्सान एक ही बात सोचता ।

और कुछ भी समझाने से, बतलाने से, मनुष्य सिर्फ मानसिक हो जाता है, मेन्टल (mental- दिमागी) हो जाता है । पढ़-पढ़ करके, पढ़-पढ़ करके, भी मानसिक हो जाता और उसमें कोई शांति नहीं होती, उसमें कोई आराम नहीं मिलता, उसमें कोई चैन नहीं आता । तो सत्य क्या है, ये समझ लेना चाहिए। अब बात ये है कि मैं जो कुछ भी आपके सामने बात कहूँ इसे आप एकदम से मान्य मत करें क्योंकि अंधश्रद्धा से हम लोग पहले ही पीड़ित हैं। स्पेशली बंगाल में तो मैं सोचती हूँ कि यहाँ पर इस कदर तांत्रिक, ये-वो सब ने जकड़ डाला और जब हम देखते हैं कि जो धर्म के नाम पर भी जो बहुत बोलते हैं और चलते हैं वो भी पीड़ित हैं। वो भी बीमार हैं। उनको भी ये तकलीफ़ है, वो तकलीफ़ है और वो भी आपस में लड़ रहे हैं, झगड़ रहे हैं। इसका मतलब उन्होंने अभी तक सत्य को प्राप्त नहीं किया। सिर्फ उसके बड़े-बड़े इश्तिहार लगा के रखे हैं। तब मनुष्य घबराके ये पूछता है कि, सत्य है क्या? सत्य और प्रेम ये दोनों एक चीज़ हैं। आश्चर्य की बात है कि इसका मिलाप लोग समझ नहीं पाते। समझ लीजिये कि आप किसी को नितांत प्रेम करते हैं। तो आप उसके बारे में हर एक छोटी-छोटी बातें जान लेते हैं। पर ये परमात्मा का प्रेम है,ये दैवीय प्रेम है। इस प्रेम को सत्य मान लीजिये ऐसा मैं नहीं कहूँगी, पर ये सिद्ध हो सकता है। उसके लिये आपको इस मानव चेतना से, ह्यूमन अवेअरनेस (human awareness) से ऊपर उठना होगा तभी आप समझ पायेंगे कि सत्य और प्रेम एक ही चीज़ है । और ये दोनो ही चीज़, दोनो ही बातें, दोनो ही गुण ऐसे मनुष्य में होते हैं जिसने आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त कर लिया हो। और जिसने अभी तक आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त नहीं किया और जो सिर्फ ऊपरी-ऊपरी तरह से बातें करता है, काफ़ी लेक्चर देगा या काफ़ी कर्मकांड करायेगा उससे आज तक किसी का फायदा हुआ नहीं और न होगा। इसके लिये जरूरी है कि हम समझ लें कि सत्य क्या है। हम ये शरीर, बुद्धि,मन,अहंकार आदि उपाधियाँ नहीं, हम शुद्ध आत्मा है, ये सत्य है। क्योंकि हम कहते हैं,कि ये हमारा शरीर, ये हमारा मन, ये हमारी बुद्धि, हमारी, हमारी, हमारी, मेरी, मेरी, मेरी । ये ‘मैं’ है कौन? इसे जानना है। और ये ‘मैं’ ही शुद्ध आत्मा है। जो आपके हृदय में बिराजता है, वही शुद्ध आत्मा । उसको प्राप्त करना, उसका प्रकाश अपने चित्त में लाना ही एक तरह से आत्म का दर्शन है।

और दूसरा सत्य ऐसे है, कि जैसे आप देखते हैं कि चारों तरफ़ ये फूल हैं। कितने सुंदर फूल हैं। और ये फूल जिस पृथ्वी तत्त्व से निकले हैं, कितना चमत्कार है, कि हर एक तरह का फूल अलग अलग तरीके से आता है। और इसके लिये कुछ पैसा नहीं देना पड़ता। माँ का पृथ्वी तत्त्व जो प्रेममय है, वो अपने आप उसको पनपाता है, सुगन्धित करता है और रंगबिरंगों से भर देता है। ये एक महान आश्चर्य की बात है, कि हम इस बारे में सोचते ही नहीं, कि जीवित कार्य कैसे हो रहे हैं। जैसे किसी डॉक्टर से पूछे, कि तुम्हारा-हमारा हार्ट कौन चलाता है? हमारा हृदय कौन स्पंदित करता है? तो डॉक्टर ये कहेगा कि इसकी एक ऑटोनॉमस नर्वस सिस्टम (autonomous nervous system: स्वायत्त तंत्रिका प्रणाली) है। तो ये ऑटो (auto: स्वत: ) है कौन? स्वयंचालित संस्था है। तो ये स्वयं कौन है? वो स्वयं ही आपका आत्मा है। इसको प्राप्त कर लेना, उसका प्रकाश अपने अन्दर लाना ही आत्मसाक्षात्कार है। और इस चारों तरफ फैली हुई, परमात्मा की प्रेम शक्ति, जिसने ये सुन्दर फूल उगाये हैं, जो हमारे हृदय को भी चलाता है उससे एकाकारिता करना ही, ये योग है। यही योग है और इसका जन्मसिद्ध अधिकार आप सब मानव जाति को है। लेकिन इसको प्राप्त करने के लिए अगर कोई मूढ़ हो तो वो नहीं प्राप्त कर सकता। कोई बेवकूफ़ हो, वो नहीं। कोई उद्दाम, मगरूर हो, वो नहीं प्राप्त कर सकता। उसके लिये नम्रता चाहिये और माँग चाहिये कि हमें ये चीज़ चाहिये । हृदय से,प्रेम से अगर मनुष्य अपने को जरा सा भी देखे, तो वो अब एक अधूरा है और उसके अन्दर अनेक शक्तियाँ हैं जिसका प्रादुर्भाव, मैनिफैस्टेशन (manifestation:अभिव्यक्ति)हो सकता है। लेकिन उसके लिये मनुष्य को ये समझना चाहिये कि नम्रतापूर्वक आप इसे अपने हृदय से माँगे। क्योंकि अगर प्रेम की शक्ति माँगनी है, तो प्रेमपूर्वक ही माँगी जाती है। लड़ाई-झगड़े से और परेशान करने से ये शक्ति कभी भी प्राप्त नहीं हो सकती ।

इस शक्ति के बारे में आपको पहले बता ही चुके हैं वो, कि त्रिकोणाकार अस्थि में ये शक्ति कृण्डलिनी नाम की है। अब ये कोई नयी बात मैं नहीं कह रही हूँ। हमारे शास्त्रों में, छठी शताब्दि में, समझ लीजिये छठी शताब्दि में, शंकराचार्य आये, उन्होंने ये बात कही। लेकिन तेरह हजार पूर्व मार्कण्डेय ने कुण्डलिनी की बात की, पर सब संस्कृत भाषा में । इसलिये बारहवी शताब्दि में ज्ञानेश्वर जी ने इसकी बात की है। जब उन्होंने ज्ञानेश्वरी लिखी जो कि गीता पर टीका थी, उसमें छठे अध्याय में उन्होंने लिख दिया कि कुण्डलिनी शक्ति से आत्मसाक्षात्कार घटित होता है। तो उस वक्त के जो धर्ममार्तण्ड थे, उन्होंने कहा कि नहीं-नहीं ये निषिद्ध है; छठा जो है अध्याय है ये निषिद्ध है – किसी ने पढ़ा नहीं, लिखा नहीं। इस तरह से जो हमारे अन्दर निहित, छुपी हुई जो शक्ति है, जो कि हमें उस स्थिति में पहुँचा सकती है, वो पूर्णतया एक अंधकारमय, एक जिसको कहना चाहिये कि एक अज्ञानमय, इग्नोरन्स (ignorance) में छिप गयी। फिर हमारे यहाँ एक से एक बुद्धिमान लोग निकले- इंटलेक्च्युअल्स (intellectuals)। जिसके लिये कबीर ने कहा है कि,’पढ़ि पढ़ि पंडित मूरख भये’। पहले मैं सोचती थी कि पढ़-पढ़ के पंडित मूर्ख कैसे हो जायेंगे? ऐसे कैसे हो सकता है? लेकिन मुझे बहुत मिले ऐसे। उनसे बात करने से पहले वो ही बोले जाते थे। और क्या बोलते थे, भगवान जाने! ये किताब में लिखा है, वो किताब में लिखा है। मैंने कहा,’आपकी किताब में क्या लिखा है? वो बताईये।’ तो हम अपने से अनभिज्ञ, अपने से अपरिचित, दूसरों की ही बातें अपने खोपड़ी में भर लेते हैं। ये तो इंटलेक्च्युअल (intellectual: बौद्धिक) साइड(side) हो गयी, और दूसरी हो गयी भक्ति की साइड । तो उसमें भी एक तरह का नशा है, एक तरह का नशा है,चेतना नहीं है । दोनों चीज़ में एक तरह से वास्तविकता से दूर, असलियत से परे, रिअॅलिटी (reality: वास्तविकता) से बिल्कुल दूर हम खड़े हुए हैं।

अब आपको एक उदाहरण देंगे। आपके यहाँ ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ का बड़ा जोर चल रहा है। लेकिन शिकागो में मैं गयी थी। तो वहां शिकागो में उनके अब जो गुरु हैं वो आयें तो बिल्कुल पतली धोती पहन के और ऊपर एक बनियन पहन के आये और इतनी ठंड थी कि मैं तो शॉल में भी ठिठुर रही थी और वो भी ठिठुर रहे थे। मुझे मिलने आये। तो मैंने कहा कि,’आप ये क्या पहने के आये हो ? ये ऐसी पतली धोती क्यों पहने हुए हो भाई इतनी ठंड है। मैं तो माँ हूँ ना, तो दुःख लगा कि ये बेचारा धोती क्यों पहने है।’ तो कहने लगे कि, ‘बात ये है कि मेरे गुरु ने कहा,कि आपको धोती पहननी चाहिये,तभी आपका मोक्ष होगा।’ मैंने कहा,’अच्छा!’ हमारे भारत वर्ष में 80% लोग धोती पहनते हैं। बंगाल में तो और भी ज्यादा। इन सबका अगर मोक्ष होने वाला है तो तुमको स्थान कहाँ मिलेगा। फिर उसने बाल सब मुंडाये हुए थे बेचारे ने और एक चोटी रखी थी। सो मैंने कहा कि,’ये बाल क्यों मुंडवा लिये। कहने लगे कि,’गुरु ने कहा कि जब तक बाल नहीं मुंडवाओगे तब तक तुम्हारा मोक्ष नहीं हो सकता।’ उस पर कबीर ने बड़ा सुन्दर कहा है कि,’अगर बाल मुंडाने से आप स्वर्ग में जा सकते हैं, तो जिस मेंढे के हर साल दो बार बाल मुंडवाये जाते हैं वो आपसे पहले पहुँच जायेगा।’ और वो इसको मानते हैं, बड़ी श्रद्धापूर्ण रीति से। और मुझसे नाराज हो गये कि,’आपने मेरे गुरु विरोध में बोल रहे हैं। ‘नहीं’ मैंने कहा ‘मैं माँ हूँ नां! तो इसलिये पूछ रही हूँ कि ये अपनी दुर्दशा क्यों बनायी?” । फिर दूसरी बात समझने की है, कि उपवास करो- ये नहीं खाओ, वो नहीं खाओ, उपवास करो, सर के बल खड़े हो जाओ, ये करो|’काहे के लिये?’ कहने लगे ‘मोक्ष प्राप्ति के लिये|’ अगर परमात्मा आपके पिता स्वरूप, प्रेम स्वरूप हैं, तो कौन पिता चाहेगा, कि अपना बच्चा सर मुंडवा के, पतली सी धोती पहन कर के सर के बल खड़ा हो जाये अपने पिता से मिलने के लिये? बताईये कितनी अजीब सी बात है! कोई पिता चाहेगा, कि अपना बच्चा भूखा मरे और माँ, माँ को तो अगर सजा देनी है तो खाना बच्चे बंद कर देते हैं, हम खाना नहीं खायेंगे, तो हो गया ख़त्म माँ। कुछ भी गुस्सा होगा उनका तो उनका ख़त्म हो जाता है। आप तो माँ को अच्छे से जानते हैं। तो कौन ऐसा विचित्र तरह का आलंबन है जिससे आप इस मोक्ष को प्राप्त हो सकते हैं। आप जब मनुष्य हुए तो आपने कितना पैसा खर्च किया? आप कौन से तांत्रिक के पास गये थे, कि गुरु के पास गये थे, कुछ किया था? आप मनुष्य तो हो ही गये ना! तो कोई न कोई ऐसी अन्दर शक्ति है जिसे मैं प्रेम की शक्ति कहती हूँ, जिसको कि रिडेम्प्शन (redemption: उद्धार)की शक्ति कहते हैं। जिससे मनुष्य का उत्थान होता है। जिससे आज आप मनुष्य स्वरूप हो गये। अब अगर ये आपके अन्दर शक्ति है, समझ लीजिये अगर है,तो उसका उत्थान क्यों न किया जाए? अब इसके लिये आप पैसा- वैसा नहीं दे सकते। इसके लिये आप मुझे नहीं खरीद सकते। कोई अपने माँ को खरीदता है क्या? कम से कम अपने देश में तो कोई नहीं खरीदता है, अब परदेस की बात छोड़िये । तो इसको पाने की चीज़ क्या है? ये भी आपकी अपनी, व्यक्तिगत अपनी आपकी माँ है हर एक की । और आपके अन्दर जो भी कुछ है, आपका भूतकाल, आपका भविष्य काल, आपका सब कुछ इसमें टेप रेकॉर्डर (tape recorder) के जैसे भरा हुआ है। और वो जानता है। ये आपकी माँ, व्यक्तिगत आपकी अपनी- अपनी अलग-अलग माँ है, वो आपके कुण्डलिनी में स्थित है। और इसकी शक्ति को अगर जागृत करना है तो आप क्या पैसा दे सकते हैं। अगर समझ लीजिये इस पृथ्वी में आपको, पृथ्वी माँ के उदर में एक बीज आपको बोना है, तो वो अपने आप सहज, स्पॉन्टेनियसली (spontaneously: स्वाभाविक) पनप जाता है। उसके लिये क्या आप सर के बल खड़े हो, नहीं तो कुछ भी करो, उससे फायदा होगा! समझ की बात है।

जो जीवित कार्य है, वो सारा जीवित कार्य सहज होता है। सहज का अर्थ ‘सह’ माने आप ‘ज’ माने साथ- आपके साथ पैदा हुआ। ये योग का अधिकार है। इसे आपको प्राप्त कर लेना चाहिये। फिर उससे अनेक लाभ हैं। मुझे पता नहीं योगीजी ने आपसे क्या-क्या लाभ बताये। लेकिन एक संसार में अगर आप किसी से प्यार करते हैं तो आप नहीं जानते कि सूक्ष्म में उससे कितने लाभ होते हैं। अगर आप प्यार करते हैं, वो भी आप से प्यार करता है, तो दोनों के आदान-प्रदान में एक बड़ी सूक्ष्म सी सम्वेदना होती है, जो बहुत सुखदायी और शांतिमय होती है। पर आजकल ऐसा प्यार तो देखने को नहीं मिलता। ऐसे तो कोई व्याख्या भी नहीं कर सकता। ऐसे कोई सेंटिमेंट्स (sentiments: मनोभाव)नहीं होते। एक दूसरे को नीचे गिराने में, इसकी उसकी गर्दन काटने में ही हम लोग लगे हुए हैं। प्यार की तो बात छोड़िये। यहाँ तक कि जो बड़े भक्ति योग, फलाना-ढिकाना, प्रीच (preach:उपदेश देना)करते हैं और बिठा करके लोगों से भक्ति कराते हैं उन सब लोगों का ध्यान सिर्फ पैसा लेने पर है,ये समझ लेना चाहिये। इस पृथ्वी माँ को आपने कितना पैसा दिया है,जो ऐसे सुन्दर-सुन्दर फूल आपको दे रही हैं। पहली तो चीज़ है कि आप प्यार को खरीद नहीं सकते। खरीदा हुआ प्यार नहीं होता और प्यार की महिमा आप तभी जान सकते हैं, जब आप इस महान चैतन्य के प्यार में डूब जाये। आपकी बारीक बारीक चीज़ भी वो देखता है, सँवारता है ।

जैसे आज ही की बात बतायें कि नागपूर में बहुत अच्छे गाने वाले हैं, बजाने वाले हैं। तो मैंने कहा कि न जाने उनको बुला लें तो अच्छा रहेगा, यहाँ पर। क्योंकि बंगालियों का गाना तो बंगालियों ने सुना ही है। दूसरा कोई सुनाये तो अच्छा रहे। और देखिये सबेरे वो पहुँच गये अपने-आप से ही । मैंने कहा,’आप कैसे आयें?’ तो कहने लगे कि दुर्गापुर में हमारा प्रोग्राम है,वहाँ हमें जाना था तो हम आ गये यहाँ।’ सहज में ऐसी बातें होती है कि चमत्कार पे चमत्कार हो रहे हैं। आपको मैं बताऊंगी तो आपको विश्वास नहीं होगा कि चमत्कार जिसको हम कहते हैं वो चमत्कार नहीं है। क्योंकि ये परमात्मा का प्यार है। उसमें क्या चमत्कार हो सकता है, वो ही स्वयं चमत्कार हैं।

हमारी दादीजी एक किस्सा सुनाती थी। बहत मजेदार, कि एक इन्सान परमात्मा को मिलने चला। तो उसको रास्ते में एक आदमी मिला जो सर के बल खड़ा था और कह रहा था कि,”मैं कब से सर के बल खड़ा हूँ, मुझे भगवान कब दर्शन देंगे। तो जरा भगवान से जा के कहो, कि जरा जल्दी दर्शन दें।“ तो ये गये। रास्ते में दूसरा एक बिल्कुल पड़ा हुआ था, रास्ते के किनारे। तो उसने कहा कि,”भगवान ने आज मेरे खाने की व्यवस्था नहीं की। उनसे कह देना कि जरा मेरे खाने की व्यवस्था रखें।“ तो ये इन्होंने कहा कि, “अच्छा, हम कह देंगे भगवान से” तो ये जब भगवान के पास गये, तो उनका काम हुआ सो हुआ। उसके बाद भगवान ने पूछा कि,”भाई और कोई बात है?” कहने लगे कि, हाँ, एक बात है। वहाँ एक आदमी है बेचारा, सर के बल खड़ा है, आपका इंतजार कर रहा है। आप ऐसा क्यों नहीं करते, कि थोड़ी उस पे मेहरबानी कर दें।“ तो कहने लगे, “उससे कहो कि और थोड़े दिन करते रहो तो अच्छा रहेगा, हो जायेगी मुलाकात।“ उसके बाद दूसरे आदमी के बारे में कहा कि साहब “उसको तो खाना नहीं मिला। ऐसे रास्ते पे पड़ा है, कह रहा था, भगवान से कह देना। “अरे उनको खाना नहीं मिला, ये कैसे हो सकता है? एकदम उसका इंतजाम करो।“ तो ये अचंभे में पड़ गया, कि वो तो सर के बल खड़ा है तबसे उसकी कोई परवाह नहीं और ये ऐसे ही रास्ते पर ऑर्डर दे रहा है, और इसकी इतनी परवाह कर रहे हैं; अब ये प्रेम की बात है। तो उनसे परमात्मा ने कहा कि “अच्छा, तुम ऐसा करो, तुम नीचे जा रहे हो ना, तो दोनों से एक ही बात कहो।“ कहने लगा, “क्या बात” ? “कि मैं भगवान के यहाँ गया तो एक सुई के टोक में से, सुई के छेद में से उन्होंने एक ऊँट को निकाल दिया । बस, इतनी बात करना तुम।“ तो ये आये नीचे। पहले उनको वो मिला जो कि सर के बल खड़ा था। उससे कहा कि, “भाई अच्छा हम आयेंगे कभी, भगवान ने कहा है।“ “तो और क्या देखा तुमने भगवान के यहाँ?’ “अरे, मैंने बड़ा आश्चर्य देखा कि उन्होंने सुईं के छेद में से एक ऊँट निकाल दिया ।“ “अरे” कहने लगा “क्या झूठ बोल रहे हो? भगवान के यहाँ क्या हुआ ये मुझसे झूठ बता रहे हो”। अच्छा फिर वो जो दूसरा आदमी था उसके पास गया। “अरे, खाने का तो इंतजाम हो ही जाता, मैंने सोचा ऐसे ही बता दे। तो और क्या देखा तुमने?” तो उसने बताया कि, “एक आश्चर्य की बात है, कि एक सुई के छेद में से परमात्मा ने एक ऊँट को निकाल दिया है।“ अब इसमें जो सूक्ष्म बात है वो समझिये| तो वो कहता है कि, “इसमें आश्चर्य कौनसा है? अरे वो परमात्मा है। वो ऊँट तो क्या दुनिया ही निकाल दे। न जाने विश्व के विश्व निकाल दें। वो परमात्मा है तुम क्या समझते हो उनको।“ ये एक नितांत विश्वास क्योंकि आत्मसाक्षात्कारी आदमी को, उसका जो विश्वास होता है वो अंधा विश्वास नहीं होता है। वो साक्षात् में विश्वास, साक्षात्। कोई भी चीज़ अंधे से मान लेना ये मनुष्य के लिए शोभा नहीं देता। आप पहले इसका साक्षात् करिये। पहले आप सत्य को जान लीजिये और सत्य को जानने के बाद आप जानियेगा कि आप कितने महान और गौरवशाली हैं। अभी तो आप अपने बारे में कुछ जानते ही नहीं हैं।

जैसे कि किसी छोटे गाँव मे चले जाईये। जहाँ बिजली नहीं, कुछ नहीं और टेलिविजन ले जाईये। और उनसे कहिये कि देखो इसमें सब तरह की फिल्म आयेंगी , फोटो आयेंगे देखो। कहने लगेंगे, “ये डिब्बे में, इस डब्बे में।“ “हाँ, इसी डिब्बे में।“ जब उसका कनेक्शन हो जाता है, तब वो हैरान कि “इस डिब्बे में ये चीज़ कैसे आयी?” ऐसे हम भी अपने को एक डिब्बा समझते हैं। और खास कर बंगाल में मैंने देखा है, कि इन्सान बहुत निराश रहता है, हमेशा और रोने के ही गाने गाता है। रोने में ही रहता है। अब दिन बदल गये हैं। ये समझना चाहिये कि नया समय आ गया है। ये एक बड़ा एक विशेष समय, इसको मैं ब्लॉसम टाइम कहती हूँ। बसंत बहार कहती हूँ। लेकिन बहुत से से लोग इतने निराश हो गये। इतने निराशा में फँसे हये हैं । कि वो समझ ही नहीं सकते कि इस निराशा के बाद एक बड़ी भारी सुबह होनी जा रही है। जो सारे दुनिया में छा जायेगी। और वो आज का समय है। पर वर्तमान को हम नहीं जानते और वर्तमान असलियत है।

तो विचार उठे, नीचे गये, फिर विचार उठे, नीचे गये। उसके बीच में एक जगह है जिसे विलंब कहते हैं – पॉज़ (pause: ठहराव)। वो विलंब को हम नहीं पकड़ पाते जहाँ वर्तमान है। या तो आगे की बात सोचे या पीछे की। जैसे कि अभी इनको जाना है वापस| सोच रहे होंगे हैं कि अब ट्रैम(tram) मिलेगी कि नहीं, बस मिलेगी की नहीं, ये नहीं है, वो नहीं है। या तो पिछली बातें सोचते हैं। और अगर मैं कहूँ कि अभी आप वर्तमान खड़े हो जाईये, तो नहीं हो सकते। क्योंकि एक विचार उठा, ख़त्म हो गया, विचार उठा, ख़त्म और हम उसके ऊपर में नाचते रहते हैं। लेकिन जब कुण्डलिनी जागृत होती है तो ये विचार लंबाकृत हो जाते हैं, ऐसे। रिलॅक्स (relax: शांत) हो जाते हैं, लंबाकृत और उसके बीच में जो जगह बन जाती है और वर्तमान में आप खड़े हो जाते हैं और जब आपका चित्त वर्तमान में होता है, तो आप कुछ नहीं सोचते, निर्विचार। और निर्विचार में आनन्द झरने लग जाता है।

अब जैसे यहाँ एक बड़ा सुन्दर कार्पेट (carpet: कालीन) है,एक उदाहरण के लिये। तो मैं कहूँगी कि, “भाई,कितना सुन्दर है!” और अब अगर ये मेरा है तो ये मेरे लिये सरदर्द हो जायेगा कि खराब न हो जाये,ये नहीं,वो नहीं, इन्शुर (insure: बीमा कराना) करो ये सब जो होते हैं प्रॉब्लेम्स कोई चीज़ पाने के। और मेरा नहीं दूसरे का है, तो मैं ये सोचूंगी, कितने का मिला, कहाँ मिला, कब पायेंगे? लेकिन अगर हम निर्विचार इसे देखे, तो इसको बनाने में जिस कलाकार ने अपना आनन्द लूट लिया है, वही आनन्द सर से लेके नीचे तक ठण्डा-ठण्डा बहना शुरू हो जायेगा। और उस आनन्द में आप स्नात हो जाये। जब आप निर्विचार हो जाते हैं, तब आप अपने शांति में खड़े हो जाते हैं – शांति ।

ये कहने की बातें हैं इसे शांति के इन लोगों ने बड़े-बड़े ऑर्गनाइझेशन्स (organizations: संगठन) बनायें हैं। शांति में अॅवॉर्ड्स (awards: पुरस्कार) दिये, ये, वो। मैंने तो बहुत से लोगों को देखा है, जिनको बड़े शांति के अॅवॉर्ड मिले, इतने गरम होते हैं, इतनी गरम तबियत, कि उनसे अगर मिलना हो तो एक लकड़ी ले के जाईये साथ में, नहीं तो जा करके दो-चार झापड़ ही मार देगा आपको । कोई आप उनसे बात ही नहीं कर सकते, इतने गुस्सैल लोग। उनमें कोई प्रेम की झलक भी नहीं। वो क्या शांति देंगे और उनको इंटरनैशनल (international:अंतरराष्ट्रीय)अॅवॉर्ड मिले। पता नहीं किस तरफ से देखकर दिये उनको इंटरनैशनल अॅवॉर्ड। इस प्रकार हम लोग बिल्कुल भुलावे में रहते हैं। क्योंकि हमारे अन्दर की जब शान्ति प्रस्थापित होती है, तब हम समझते हैं कि शांत होना क्या होता है। जैसे कि आप पानी में खड़े हैं उनको आप परेशान हैं उसकी लहरों से। क्योंकि लहरे आ कर के आपको डरा रही हैं, कि कहीं डूब न जाये। पर अगर आप किसी नाव में चले जाये तो आप लहरें देख रहे हैं और आपको मजा आ रहा है, आपको घबराहट नहीं। और अगर आप तैरना जानते हैं, तो कूदते है नीचे और जो डूब रहे हैं उनको बचा लेते हैं। इसी प्रकार सहजयोग में आपकी प्रगति होती है। पहले आप निर्विचार समाधि में उतरते हैं, फिर आप निर्विकल्प समाधि में। कभी-कभी ये किसी-किसी को दोनों एकसाथ मिल जाते हैं। ये बड़ी आश्चर्य की बात है। दोनों चीज़ एकसाथ घटित होती है। और इसमें इन्सान जो है उस शांति को भी प्राप्त करता है और उन शक्तियों को भी प्राप्त करता है जो उसके अन्दर नहीं है। पर उसका कोई ये नहीं, कि उसके लिये बाल मुंडवा ले या उसके लिये भगवा वस्त्र पहने, कुछ नहीं। ये सारे भाव अन्दर होते हैं। आपको तो राजा जनक की कहानी मालूम है, मुझे नहीं बताना चाहिये। पर जैसे अब मैं गृहस्थ हूँ, मेरे पति ऐसे-ऐसे हैं। चलो, उन्होंने कहा तो कपड़े पहन लिये अच्छे, काफ़ी जेवर पहन लिए। जब किसी चीज़ को पकड़ा ही नहीं तो छोड़ेंगे क्या? अगर आपने पकड़ के रखा है तो आप छोड़ सकते हो। पर जब पकड़ा ही नहीं है तो छोडो क्या? इस तरह की स्थिति संन्यस्त अन्दर से होती है बाह्य से दिखाने की स्थिति नहीं होती। बाहर से कपड़े संन्यासी के और धंधे अन्दर चोरों के धंधे, इसका फायदा क्या? तो ये जो ढोंग है, ये सब ख़त्म हो जाता है। क्योंकि मानव अपनी इज्जत करने लगता है। अपना मान उसको होता है। उसके अन्दर एक तरह की चमक आ जाती है, कि मैं क्यों, मुझको क्या करना है?to और ये आत्मसाक्षात्कारी लोग ही दुनिया में बड़ा-बड़ा नाम करते हैं। जैसे अपने तिलक साहब, तिलक आत्मसाक्षात्कारी थे इसमें कोई शक नहीं है। अब्राहम लिंकन थे, वो आत्मसाक्षात्कारी थे। शास्त्रीजी थे वो आत्मसाक्षात्कारी थे। हम तो कहते हैं कि जो लोग आत्मसाक्षात्कारी नहीं वो कभी भी सत्य पे टिक ही नहीं सकते। आप कोई भी ऑर्गनाइझेशन (organization) ले लीजिये बस झगड़े शुरू आपस में। क्यों? क्योंकि असत्य पे खड़े हैं। इसलिये सब डांवाडोल हो रहे हैं। तो पहले आपको प्राप्त करना चाहिये कि अपने अन्दर की शांति । इस शांति को प्रस्थापित किये बगैर आप कोई भी विश्व में शांति नहीं कर सकते।

अब ये कहना है, कि जिसको जाना है अभी चले जाएं। जिस वक्त में हम जागृति का कार्य करेंगे, तब उठ के जाने की कोई जरूरत नहीं। दोनों हाथ हमारी तरफ करें। अब पहले तो आपको चाहिये, कि अब आप अपने को बिल्कुल तरह क्षमा कर दें । इस वक्त अपनी गलतियाँ, और पाप-पुण्य जोड़ने की जरूरत नहीं। और अब आँख बंद कर लें, चश्मा निकाल दें | जिनके पैर में जूते होंगे, वो जूते निकाल लें जो बैठे हैं ऊपर में लोग। अब लेफ्ट हैण्ड (left hand: बायां हाथ) मेरी ओर करें, इस तरह और सर झुका लें और सिर के ऊपर में आप अपना राइट हैण्ड (right hand: दायां हाथ) यहाँ पर जो तालू है, इसे ब्रह्मरन्ध्र भी कहते हैं कि जो ब्रह्म में एकाकारिता करता है ऐसा छेद- ब्रह्मरन्ध्र। अब इस पे राइट हैण्ड रखें। दूर, ऐसे। और अब देखें कि आपके ब्रह्मरन्ध्र में से ठण्डी या गरम, ठण्डी या गरम कोई हवा, जैसी चैतन्य की लहरियाँ आ रही है क्या। जिसको कि आदि शंकराचार्य ने सौंदर्य लहरी कहा था। नीचे सर झुकायें। अब मेरी ओर राइट हैण्ड करें और फिर से अपना सर झुकायें और लेफ्ट हैण्ड से, अब देखें सर पे हाथ नहीं रखें, सर से दूर, सर झुका के। लेकिन शंका नहीं करने की । आप ही के सर से ठण्डक आ रही है। शंका नहीं करनी है। सर झुकायें। अब अगर गरम आ रहा है, इसका मतलब ये है, कि आपने अपने को या दूसरों को क्षमा नहीं किया है। तो अभी आप क्षमा करें। और इस वक्त ये माँगना है कि, “माँ, हमें आत्मसाक्षात्कार दीजिये।“ आप मांगिये मन में कि, “माँ, कृपया आत्मसाक्षात्कार दीजिये।“ मैं जबरदस्ती नहीं कर सकती। मैं आपकी जो स्वतंत्रता है, उसको नहीं छू सकती। क्योंकि अगर स्व का तंत्र बताना है, तो उसके लिये जरूरी है कि आपकी इच्छा से सब होगा। तो अब फिर से राइट हैण्ड से आप देखिये और कहिये की, “माँ, मुझे मेरा आत्मसाक्षात्कार दीजिये।“ राइट हैण्ड से। अब दोनों हाथ आकाश की ओर करें और सर ऊपर की तरफ और यहाँ एक प्रश्न पूछे अपने मन में, विश्वास के साथ, “माँ, क्या ये परमचैतन्य की लहरें हैं?” प्रश्न करें,तीन बार। अन्दर अपने हृदय में पूछिये। “माँ, क्या ये परमचैतन्य की लहरें हैं?” सर पीछे थोड़ा । आत्मविश्वास के साथ पूछिये। शंका नहीं करनी है; अब हाथ नीचे करें। अब दोनों हाथ मेरी ओर करें, इस तरह से चश्मा पहन लें और मेरी ओर देखें और विचार नहीं करें। आपके विचार ठहर गये हैं- निर्विचार। यही निर्विचार समाधि है । अब जिन लोगों के हाथ में या उंगलियों में या ब्रह्मरन्ध्र से ठण्डी या गरम हवा आयी हो, वो दोनों हाथ ऊपर करें। वाह-वाह,जरा देखिये आप लोग, क्षणभर में सब पार हो गये, सब ने प्राप्त कर लिया । अब इसको आगे बढ़ाना है। आप सारे आत्मसाक्षात्कारी लोगों को हमारा वन्दन है