Shri Ganesha Puja

Campus, Cabella Ligure (Italy)

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Shri Ganesha Puja. Cabella Ligure (Italy), 10 September 1995.

यदि कोई आपके पास मिलने के लिये आये तो क्या आपको मालूम है कि किस प्रकार से आपको जानबूझ कर अपनी ऊर्जा को उन पर प्रक्षेपित करना है ….. ये एक नई तरह की ध्यान विधि है जिसका अभ्यास आप सबको करना है…. अपनी ऊर्जा को उत्सर्जित करके अन्य लोगों तक पंहुचाना। इसमें आपको किसी से कुछ नहीं कहना है… बातचीत नहीं करनी है लेकिन सोच समझकर और जानबूझ कर इस ऊर्जा का अनुभव करना है …. मैं फिर से कह रही हूं कि जानबूझ कर। यह सहज नहीं है …. नहीं यह स्वतः है। लेकिन इसका आपको अभ्यास करना है। अपने अंदर के श्रीगणेश की अबोधिता की ऊर्जा को अन्य लोगों तक प्रक्षेपित करना है ताकि जब वे आपको देखें तो उनकी स्वयं की अबोधिता जागृत हो जाय।
उदा0 के लिये लंदन में हमें कुछ समस्या हो गई थी और सहजयोगियों ने मुझसे कहा कि माँ.. अभी भी कुछ लोग … कुछ पुरूष हमें देखते रहते हैं और कुछ ने कहा कि कुछ महिलायें भी हमें देखती रहती हैं। एक तरह से ये एक आपसी चीज घट रही थी। मैंने उनसे कहा कि आप लोग अपनी ऊर्जा को इस प्रकार से प्रक्षेपित करें कि इन लोगों का इस प्रकार का अभद्र व्यवहार पूर्णतया बंद हो जाय और उनको समझ में आ जाय कि उन्हें आपका आदर करना चाहिये और आपकी गरिमा का भी सम्मान करना चाहिये। ये बहुत कठिन भी नहीं है।
इसके विपरीत… जैसी कि आजकल की संस्कृति है कि पुरूष महिलाओं को और महिलायें पुरूषों को आकर्षित करने का प्रयास करती रहती हैं … तो ये भी कम हो जायेगी। आपकी ऊर्जा ही कम हो जायेगी। जैसे ही आप समझेंगे कि आप आत्मसाक्षात्कारी व्यक्ति हैं और आप एक प्रकार के गरिमामय लोग हैं…… आपका विशेष प्रकार का सम्मान है … आप कोई ऐरे गैरे लोग नहीं हैं……. आपके अंदर एक अत्यंत विशाल व शानदार व्यक्तित्व विकसित हो जाता है। इस शानदार व्यक्तित्व का लोगों पर अत्यधिक गहरा प्रभाव पड़ता है … अत्यधिक गहरा। अतः आपको इस सोचे समझे हुये प्रक्षेपण को प्रारंभ करना है। मुझे मालूम नहीं कि इसको किस प्रकार से किया जाना चाहिये क्योंकि मेरे साथ तो यह स्वतः ही घटित हो जाता है …… बस ये हो जाता है। परंतु आप भी इसे थोड़े से अभ्यास के साथ प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार के लोगों का सामना करने का प्रयास करें घृणा या अनादर के साथ नहीं बल्कि अपने शानदार व्यक्तित्व के साथ। यह व्यक्तित्व आपके पास है जो इतनी शान के साथ आपके अंदर बैठा हुआ है और लोगों को चैतन्य भी दे रहा है। यह संपूर्ण इकाई लोगों के अंदर कुछ कर रही है। ऐसी अपेक्षा करना कि आप सारे संसार को तुरंत ही बदल देंगे … तो मैं समझती हूं कि यह ठीक नहीं है क्योंकि आप तो जानते ही हैं कि संसार में कितनी आपाधापी है…. कितना अहंकार है… कितनी कंडीशनिंग हैं। लेकिन आपके अंदर से कुछ ऐसी चीज उठ कर जागृत हो सकती है कि आप अत्यंत गरिमा से लोगों से ऊपर उठ सकते हैं। जब आप अपने आप उठ खड़े हों तो आपको लोगों के साथ रूखेपन से पेश नहीं आना है …. नही किसी से अहंकारवश पेश आना है। आपको कुछ कहना भी नहीं है। एक शांत व्यक्तित्व ही इतनी सुंदरता से चैतन्य को उत्सर्जित कर सकता है … जो आपके पास हैं। आपके अंदर चैतन्य का विशाल भंडार है जो आपके चेहरे से ही परिलक्षित होता है … जैसा कि मैंने कहा कि आपके चेहरे चमक रहे हैं परंतु आपके अंदर जो अबोधिता है … उसके लिये आपको स्वयं पर गर्व होना चाहिये … अत्यंत गर्व। अभी भी लोग आपसे कह सकते हैं कि आपकी वेशभूषा ठीक नहीं है… या आप दिखने में सुंदर नहीं हैं या ऐसी ही कई अन्य बातें।
यह अजीब ही है कि लोग दूसरों को बहुत अच्छा देखना चाहते हैं …. हरेक व्यक्ति को लोग हीरो की तरह से देखना चाहते हैं तो आप लोग अब हीरो ही बन गये हैं और आध्यात्मिक रूप से आप उन सभी लोगों से कहीं उच्चावस्था को प्राप्त हैं। अतः ये प्रक्षेपण जब प्रारंभ होता है … मैं फिर से कह रही हूं कि सोच विचार कर तो आप लोगों को डरना नहीं चाहिये कि कहीं आपके अंदर अहंकार न बढ़ जाय … या किसी प्रकार की कंडीशनिंग आपके अंदर न आ जांय लेकिन सिर्फ इस समझ के साथ कि आपके अंदर इन शक्तियों की अभिव्यक्ति कितनी सुंदरता से हो रही है… बिल्कुल एक अबोध बच्चे की तरह से। एक छोटा सा बच्चा भी कई लोगों का मनोरंजन कर सकता है। तो बच्चे के अंदर ऐसा क्या है….. मात्र अबोधिता… जिस प्रकार से वह बात करता है … बोलता है … व्यवहार करता है… जिस तरह से वह अपना प्रेम प्रदर्शित करता है। यह वैसे तो बहुत साधारण है परंतु इसमें श्रीगणेश की अबोधिता का सार है।
कहीं भी कहीं भी यदि बच्चों को कुछ परेशानी होती है तो सारा विश्व उनके लिये चिंतित हो उठता है। पूरा विश्व उनकी समस्या को सुलझाना चाहता है। यदि कोई बच्चा कहीं कष्ट में है तो पूरे विश्व में ये बात फैल जायेगी कि फलां स्थान पर एक बच्चा परेशानी में है और सब उसके लिये चिंतित हो उठेंगे। जैसे ही लोग किसी बच्चे को देखते हैं तो उनके चेहरे के हाव भाव स्वयमेव ही बदल जाते हैं क्योंकि बच्चा बिना सोचे समझ ही अपनी अबोधिता को उत्सर्जित कर रहा होता है …. बिना किसी विशेष तरीके के वह अबोधिता को उत्सर्जित करता है … वह स्वतः ही ऐसा करता है। फिर आप बड़े होने लगते हैं .. आप उन लोगों के साथ बड़े होने लगते हैं जो उतने अबोध नहीं हैं। आप उनसे मिलते हैं। आप समाज से दूर नहीं भाग सकते हैं। आप उन लोगों से ही अपना तालमेल बिठाने लगते हैं जो श्रीगणेश की आलोचना करते हैं… ये इसी प्रकार की बातें करते हैं। शनैः-शनैः आपकी अबोधिता क्षीण होने लगती है और कई बार तो आप उन लोगों से स्वयं को कमतर समझने लगते हैं जो अबोधिता के विरोध में होते हैं। जब मैं लंदन में थी तो वे लोग मुझपर हंसा करते थे क्योंकि मैं अपने माथे पर कुमकुम लगाया करती हूं। लेकिन मैं सोचा करती थी कि उन्हें तो मालूम ही नहीं है कि मैं कुमकुम क्यों लगाया करती हूं। वे इतने अज्ञान है … बहुत ही अज्ञान हैं उन्हें तो ये भी पता नहीं है कि भारत में सभी विवाहित स्त्रियां कुमकुम लगाया करती हैं. कहीं-कहीं तो मुस्लिम स्त्रियां भी इसे लगाती हैं… वे तो मंगलसूत्र भी पहनती हैं। तो मैंने उनको कहा कि ये मेरे माथे पर लिखा है कि मैं विवाहित महिला हूं और यदि उन्होंने मुझे परेशान किया तो मेरे पति मेरे साथ है और वे उन लोगों को अच्छा सबक सिखा सकते हैं।