Diwali Puja: Sahaj Yog ki shuruvaat

(भारत)

1995-10-29 Diwali Puja Talk, Sahajyog ke Suruvat, Nargol India, 47'
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Diwali Puja – Sahajayog Ki Shuruvat Date 29th October 1995 : Place Nargol Puja Type Speech Language Hindi

ये तो हमने सोचा भी नहीं था इस नारगोल में २५ साल बाद इतने सहजयोगी एकत्रित होंगे। जब हम यहाँ आये थे तो ये विचार नहीं था कि इस वक्त सहस्रार खोला जाए। सोच रहे थे कि अभी देखा जाय कि मनुष्य की क्या स्थिति है। मनुष्य अभी भी उस स्थिति पे नहीं पहुँचा जहाँ वो आत्मसाक्षात्कार को समझें। हालांकि इस देश में साक्षात्कार की बात अनेक साधू-संतों ने सिद्धों ने की है और इसका ज्ञान महाराष्ट्र में तो बहुत ज़्यादा है। कारण यहाँ जो मध्यमार्गी थे जिन्हें नाथ पंथी कहते हैं, कि नाथ लोग उन लोगों ने आत्मकल्याण के लिए एक ही मार्ग बताया था; आत्मबोध का। खुद को जाने बगैर आप कोई भी चीज़ प्राप्त नहीं कर सकते हो, ये मैं भी जानती थी। लेकिन उस वक्त जो मैंने मनुष्य की स्थिति देखी वो बहुत विचित्र सी थी। कि वो जिन लोगों के पीछे में भागते थे उनमें कोई सत्यता नहीं। उनके पास सिवाय पैसे कमाने के और कोई लक्ष्य नहीं था। और जब मनुष्य की स्थिति ऐसी होती है कि जहाँ वो सत्य को बिल्कुल ही नहीं पहचानता उसे सत्य की बात कहना बहुत कठिन है और लोग मेरी बात क्यों सुनेंगे? बार-बार मुझे लगता था कि अभी और भी मानव को बड़ना चाहिए। किन्तु मैंने देखा कि कलयुग की बड़ी घोर यातनायें लोग भोग रहे हैं। एक तो पूर्वजन्म में जिन्होंने अच्छे कर्म किये थे, उन लोगों को भी वो लोग सता रहे थे, जिन्होंने पूर्वजन्म में बूरे कर्म किये थे। उसमें ऐसे भी लोग थे जो पूर्वजन्म के कर्मों के कारण बहुत त्रस्त थे, बहुत तकलीफ में थे और कुछ लोग ऐसे थे कि जो वही पूर्वजन्म के कर्म लेकर के राक्षसों जैसे संसार में आये। और वो किसी को छलने में, सताने में, उसकी दर्दशा करने में कभी भी नहीं हिचकते थे।

तो दो तरह के लोग तो मैंने देखे खास, एक वो जो पीड़ा देते है और दूसरे जो पिड़ीत है। अब ये सोचना था कि इसमें से किसकी ओर नज़र करें। जो लोग पीड़ा देते थे वे बहुत अपने को सोचते थे कि ‘मैं तो बहुत ही सम्पूर्ण इन्सान परफेक्ट (perfect) हूँ।’ उनमें तो ये कल्पना ही नहीं थी कि ये दूसरों को तकलीफ दे रहे हैं, परेशान कर रहे हैं। और दूसरे जो लोग पीड़ित थे वो

बर्दाश्त कर रहे थे। शायद मजबूरी की वजह से हो, या उनको कभी भी ये मालूम ही नहीं था कि इस तरह की जो प्रतिक्रिया करता है उसका प्रतिकार करना चाहिए, उसका विरोध करना चाहिए। उस वक्त यही सोच रही थी कि मनुष्य कब ये सोचेगा कि ‘हमें बदलना है, हमारे अन्दर एक परिवर्तन आना है। क्योंकि दोनो ही अपने तरह से खुद को समझा बुझाकर चुके थे। कुछ लोग ज़्यादा तकलीफ देते थे और कुछ लोग कम। और कुछ लोग ज़्यादा तकलीफ बर्दाश्त करते थे और कुछ लोग कम, ऐसी समाज की स्थिति थी। चाहे वो भगवान के नाम पर हो, चाहे वो राष्ट्र के नाम पर हो और चाहे वो राजनैतिक हो या जिसे कहते हैं हम लोग इकोनोमिकल (economical) हो। किसी की गरीबी तो किसी की बहुत अमीरी, इस प्रकार, इस देश में एक तरह की छलना चल रही थी। जिसको कि में समझती थी कि जब तक मनुष्य बदलेगा नहीं, जब तक वो अपने को पहचानेगा नहीं, जब तक वो अपने गौरव और अपनी महानता को पायेगा नहीं तब तक वो ऐसे ही काम करता रहेगा। ये सब मेरे दिमाग में था ही, बचपन से ही और मैं ये सोच रही थी कि इस मनुष्य को समझना जरूरी है।

तो पहले तो मैंने मनुष्यों का बहुत अभ्यास किया, तटस्थ रहके, साक्षी रूप रहकरके मैंने समझना चाहा कि मनुष्य क्या है, पिछले इसमें क्या-क्या दोष हैं। कौनसी-कौनसी खराबी हैं और किसलिए वो इस तरह सोचता है। तब उस नतीजे पे मैं पहुँची कि मनुष्य के अन्दर एक तो या तो अहंकार बहुत ज़्यादा है और या तो उसके अन्दर में है प्रति अहंकार, जिसे हम कहते हैं कि कंडिशनिंग (.. अष्पष्ट) । और इन दोनो की वजह से उसके अन्दर में सन्तुलन नहीं, बैलन्स नहीं। जब तक सन्तुलन नहीं आयेगा तब तक कुण्डलिनी उठेगी कैसे? ये भी एक बड़ा भारी प्रशन है। लेकिन जब मैं यहाँ नारगोल में आयी तो वो कुछ विचित्र कारणों के कारण। कि एक बहुत दुष्ट राक्षस यहाँ पर एक अपना शिबिर लगायें बैठा था और उसने हमारे पति से कह कहकर भेजा है कि उनको जरुर भेजिए, उनको जरूर भेजिए। मुझे वो आदमी जरा भी पसंद नहीं। फिर तो भी पति के कहने से मैं आयी और शायद जिस बंगले में अभी रह रही हूँ, शायद उसी में वास्तव में वहीं रहे थे। उससे पहले दिन की बात है कि मैं जब एक पेड़ के नीचे बैठे देख रही थी उनका तमाशा तो मैं हैरान हो गयी कि ये महाशय सबको मन्त्रित करके मेसमराइज कर रहे थे । कोई लोग चीख रहे थे, तो कोई लोग कुत्ते जैसे भौंक रहे थे तो कोई जो है शेर जैसे बड़े दहाड़ रहे थे। मेरी समझ में आ गया कि ये इनकी पूर्वयोनीयों में ले जा रहा है और इनके जो कुछ भी चित्त चेतन है, उसे हम कहते हैं सबकॉन्शस माइंड, उसको जगा रहा है, तब मैं, घबरा गयी। मैंने ऐसे बहुत झूठे लोगों को भी पहले देखा था कि ये करते क्या हैं। ये तो पता होना चाहिए न कि ये करते क्या हैं, किस तरह से क्या धंधा करते हैं। और इन सबको मैंने एक चीज़

से देखा कि ये बड़े भयभीत लोग हैं। इसके साथ बंदुके रहती थी, इसके साथ इनके गार्डस रहते थे। मैंने सोचा कि ये अगर कोई परमात्मा का कार्य करते हैं तो उन्हें इन सब चीज़ों की जरूरत क्या है। और बेतहाशा पैसा लूट रहे थे। करोड़ों में इन्होंने पैसे लूटे लोगों से झूठ बोलकर। तो ये तो दो बातें मेरी नज़र में आयी। मैंने सोचा ये तो कलयुग की ही महिमा है कि ऐसे दष्ट लोग अब भी पनप रहे हैं। अब इसका इलाज यही है कि जब मनुष्य की जो चेतना जागृत हो, उसके अन्दर सुबुद्धि आये और वो समझ लें कि ये सब गलत चीज़ है और ये सब करने से कोई लाभ नहीं है। तिसरे मैंने ये देखा कि जिस समाज में मैं रहती थी उस समाज में लोग हर मिनट ऐसा काम करते थे कि जिससे उनका नाश हो जाए। जैसे शराब पीना, औरतों के पीछे भागना और तरह-तरह की चीज़ें। और बहुत ही ज़्यादा पैसे, का लगाव इन लोगों को है। और बात करते वक्त वो लगता नहीं था कि वो नैचरल बात कर रहे हैं, कुछ अज़ीब सा बन-ठन के ड्रामा करके बात करते थे। मैं सोचती थी कि मनुष्य को क्या हो गया है। ऐसे क्यों गुलामी में फँसा हुआ है और इस तरह के गलत काम करता है। लेकिन में किससे कहती, मैं तो बिलकुल अकेली थी।

उस वक्त जब हम यहाँ आये तो यही मेरी एक उलझन थी कि क्या किया जाय? यहाँ आने पर जब मैंने देखा कि ये राक्षस लोगों को मेस्मराइज कर रहा था तब मेरी समझ में आया कि अब अगर सहस्रार नहीं खोला गया किसी तरह तो न जाने लोग कहाँ से कहाँ पहुँच जाएंगे । और इनके जो असर हैं, इसके जो साधक हैं, जो परमात्मा को खोज रहे हैं, सत्य को खोज रहे हैं न जाने कहाँ जा सकते हैं। तब जब देखने के बाद दूसरे दिन सबेरे मैं रातभर वहीं समुद्र के किनारे रही अकेली थी, बड़ा अच्छा लगा। कोई कुछ कहने वाला नहीं। और तब मैंने ध्यान में जाकर अपने अन्दर देखा और सोचा अब सहस्रार खोला जाय। और जैसे मैंने ये इच्छा की कि अब सहस्रार का भ्रमरंध्र खुल जाए। ये इच्छा करते ही कुण्डलिनी को मैं अपने अन्दर देखती क्या हूँ कि जैसे टेलिस्कोप होता है उस तरह से वो खट-खट करती हुयी ऊपर तक चली गयी। उसका रंग ऐसा था जैसे कि जितने भी यहाँ पर आप लोगों ने दिये लगाये हुए हैं, इन सब दियों का रंग मिला लीजिए, इस तरह का। जैसे कि जब लोहा तपता है तो उसका रंग और तब मैंने देखा कि उसके अन्दर उस कुण्डलिनी का जो बाहर का यन्त्र था वो इस तरह से उठता गया। हर एक चक्र पे खटखट आवाज आयी और कुण्डलिनी जाकर और ब्रह्मरंध्र को छेद गयी। तो मेरे छेदने की तो कोई बात नहीं थी। लेकिन मैंने देखा कि विश्व में अब बहुत आसान हो जाएगा। और उस वक्त मुझे ऐसा लगा कि ऊपर से जो कुछ भी शक्ति थी वो मेरे अन्दर पूरी तरह से, एक ठण्डी हवा जैसे चारो तरफ से आने लग गयी। तब मैं समझ गयी कि अब कार्य को शुरू करने में कोई हर्ज नहीं क्योंकि जो उलझन थी वो खत्म हो गयी। अनिश्चिंत, बिलकुल निश्चिंत हो कर के मैंने

सोचा कि अब समय आ गया। आखिर होगा क्या? ज़्यादा से ज़्यादा लोग मारेंगे, पीटेंगे। ज़्यादा से ज़्यादा हसेंगे, मज़ाक करेंगे। और उससे आगे वो सबको मार डालेंगे। इसमें डरने की कोई बात नहीं है, ये जो करना ही है। इसी कार्य के लिए हम आये हैं इस संसार में। क्योंकि सामूहिक चेतना को, कलेक्टिव कॉनशियशनेस को जगाना, मैंने सोचा कि जब तक लोग आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त नहीं करते, अपने को नहीं जानते तब तक ये कार्य असंभव है। और सब दुनियाभर की चीज़ें कर लो इससे कोई फायदा नहीं। इसलिए इस कार्य को मैंने सबसे पहले एक काफ़ी बूढ़ी स्त्री थी जो कि हमें बहुत मानती थी, वो पार हो गयी, तब मुझे सन्तोष हुआ। मैंने कहा चलो एक तो पार हुये। इस कलयूग में किसी को पार करना कोई आसान है? जब एक पार हुई तब मुझे लगा, कि हो सकता है कि और बहुत से पार होंगे। और सामूहिक चेतना के लिए चेतना देना तो बहुत आसान था। एक इन्सान को पार कराना बहुत आसान था। एक आदमी को ठीक करना बहुत आसान था। पर कलेक्टिवली, सामूहिक के लिए कार्य करने के लिए कि जो मैंने मनुष्यो के बारे में अनुभव किया था उस पर थोड़ासा काम था। काम ऐसा कि जब मैं देखूं कि किसी आदमी में एक दुर्गुण है, या उसके अन्दर कोई तकलीफ है या उसके अन्दर कोई कंडिशनिंग है तो उसको निकालने के लिए क्या करना चाहिए। क्योंकि एक आदमी को एक परेशानी दूसरे को दूसरी तिसरे को, तीसरी। अगर सामूहिक कार्य करना है तो एक ही जागरण से सबको लाभ होना चाहिए, सबको फायदा होना चाहिए। अभी मैं आपको समझा नहीं सकती कि कम समय है, कि सामूहिक चेतना का जो कार्य किसी ने आज तक नहीं किया, ये बात सही है। वो मैंने बहुत ध्यान-धारणा से प्राप्त किया। अपनी कुण्डलिनी को चारों तरफ घूमा के, अपने कुण्डलिनी को बार-बार लोगों पर उसका असर डाल के। और बिल्कुल इस मामले में कोई भी नहीं जानता था मेरे अन्दर क्या शक्तियाँ हैं? मैं कौन हूँ? कोई नहीं जानता। हमारे घर में भी कोई नहीं जानता। और ससूराल में भी कोई नहीं जानता था, मैके में भी कोई नहीं जानता था। और मैंने कभी किसी से बताया भी नहीं। क्योंकि बताने से भी खोपडी में जाना तो आसान चीज़ नहीं है। इन्सान की खोपडी ऐसी है, मैंने देखी है। जिसमें तो कोई भी विचार घूसना बहुत मुश्किल है। सब अपने ही घमण्ड बैठे हुए हैं, सब अपने को कुछ न कुछ समझ रहे हैं । अब इनको कौन बतायें? जैसे कबीर ने कहा, ‘कैसे समझाऊँ सब जग अँधा’ मुझे तो लगा अँधा नहीं है पर अज्ञानी है, एकदम अज्ञान का भण्डार। और ये इतना सूक्ष्म ज्ञान इनको कैसे दिया जाए? लेकिन कुण्डलिनी उस लेडी की, उस देवी की जब जागृत हुई तो मैंने देखा कि उसके अन्दर एक सूक्ष्म शक्ति आ गयी। और वो उस सूक्ष्म शक्ति से मुझे समझने लगी। उसके बाद बारह आदमी पार हुए। और पार होने के बाद हैरान हो गए क्योंकि उनकी आँखो में एकदम चमक आ गयी। और वो देखने लगे सब चीज़ को। एक अजीबोगरीब सम्वेदना उनके अन्दर आ गयी। जिससे वो महसूस करने लगे। शुरुआत के बारह लोगों के हर एक चक्र पर मैंने अलग- अलग काम किया। क्योंकि जो नींव में जब चीज़ पड़ती है वो मजबूत होती है। उसकी मजबूती करने के

लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है। क्योंकि हालांकि उनकी कुण्डलिनी जागृत हो गयी थी। पर आप जानते है कि कुण्डलिनी के जागृत करने के बाद भी उसको ठीक दशा में ले जाने के लिए ध्यान-धारणा आदि करनी पडती है। और उसको बिठाना पड़ता है। इन बारह आदमीओं पर मैंने बहुत मेहनत की। और उस मेहनत के फलस्वरूप ये जरूर मैंने जान लिया कि अगर ये बारह आदमियों की बारह प्रकृतियाँ और उनको साथ में बिठा के किस तरह से, कहना चाहिए कि आत्मा की जो प्रकाश शक्ति है उसको किस तरह से संगठित करना चाहिए। उसको किस तरह से जैसे की हम सुई में फूल पिरोते है तो वो समग्रता किस तरह से आनी चाहिए? इन बारह आदमियों की अलग-अलग प्रकृतियों को किस तरह से एक सूत्र में बाँधा जाएं? और जब उनकी जागृति हो गयी तब मैंने देखा कि उनके अन्दर, सबके अन्दर एकसूत्रता बँधती जा रही थी। धीरे-धीरे बँधती जा रही थी। थोडी बहुत मेहनत भी करनी पड़ी। लेकिन किसीको बताने के लिए, जनता-जनार्दन को बताने के लिए मैंने सोचा अभी उसके लिए अभी आसान नहीं है। लोगों को समझने की बात नहीं है।

फिर (..अष्पष्ट) जहाँगीर हॉल में एक प्रोग्राम का आयोजन किया। वहाँ मैंने पहले बताया कि कितने राक्षस आए, कितने राक्षसिनी आयी, ये लोग क्या करेंगे? तो सब घबरा गये। कहने लगे कि अगर ऐसे माताजी बात करेंगी तो इनको कोई भी कैसे मदद करेगा। तो सबने काम से बताया कि ऐसी बातें आप मत करिए, नहीं तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। मैंने कहा, ‘अभी तक तो मुझे मारने वाला कोई पैदा नहीं हुआ, और आप लोग निश्चिंत रहिए।’ धीरे-धीरे ये जो छोटी-छोटी सरिताएं थीं सबके अन्दर, छोटी-छोटी नदियाँ थीं कुण्डलिनी की, उनको मैंने कहा कि, ‘आप लोग सब मेरी कुण्डलिनी पर ध्यान दो’। तो ध्यान करते ही वो निर्विचार हो गये। और निर्विचार होते ही साथ, उनको ये लगे कि मेरे साथ उनका बड़ा तादातम्य है। फिर ये निर्विचारिता बढ़ने लगी, धीरे-धीरे सामूहिकता का एक नया प्रकाश हुआ। ये पहले मैंने (..अष्पष्ट) जहाँगीर हॉल में देखा। हिन्दुस्थानी लोग जो है, भारतीय लोग जो हैं, ये इस भूमि में इसलिए पैदा हुएं हैं कि ये बड़े ही धार्मिक हैं। बहुत ही सुन्दर इनका जीवन रहा होगा। क्योंकि हिन्दुस्थान में इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती। बहुत जल्दी लोग पार हो जाते थे। शुरुआत में जरूर थोडा बहुत समय लगा। लेकिन परदेस में तो हाथ टूट जाते हैं। किसी की कुण्डलिनी उठाना मुझे ऐसा लगता है कि पहाड उठाया जा रहा है। और फिर धडक से नीचे गिर जाती है। उठाओ और फिर धडक से गिर जाओ। और फिर जब कलेक्टिवली, सामूहिक में तो बड़ी मुश्किल! और अजीबो-गरीब सवाल पूछना , ये और वो, दुनियाभर की बातें। जब मैं उसका जवाब देती तो हैरान हो जाते। ये इतना जानती कैसे हैं! इनको ये सब मालूम कैसे है? और ये मेरी बड़ी मेरी परिक्षा

करते हैं, क्योंकि अहंकार बहुत ज़्यादा है। अब धीरे-धीरे ऐसी चीजें, जैसे लण्डन में पहली मर्तबा सात सहजयोगी आएं। वो सातों ही हिप्पी थे पहले और ड्रग्ज लेते थे, उनसे वो सहजयोगी बन गये। इससे मतलब ये तो हुआ कि एक तरह का सहारा मिल गया, निश्चिंती हो गयी कि सहजयोग से लोग ड्रग्ज छोड़ रहे है। लेकिन अब ये ड्रग्ज अॅडिक्ट को ठिकाने लगाना कोई आसान बात नही है। उससे एक अच्छाई आ गई, क्योंकि उन पे जो हमने मेहनत करी उससे एक अनुभव आ गया कि कठिन से कठिन भी कोई इन्सान हों, जब उसकी इच्छा होती है कि उसे योग प्राप्त होना चाहिए, उसे आत्मज्ञान होना चाहिए। इच्छामात्र अगर हो तो वो पार हो जाता है। तब मैं सबसे कहती थी कि आप हृदय से इच्छा करो कि आपको आत्मसाक्षात्कार चाहिए। बस, उसी पर लोग झट से पार हो गये। उसमें अनेक देशों के अनुभव हैं मेरे पास। इससे जैसे रशिया है या युक्रेन है या रुमानिया। ये देशों का मेरे ख्याल से हमारे देशों से कभी सम्बन्ध रहा होगा जबरदस्त। और यहाँ से नाथ पंथी जो है, मच्छिंद्रनाथ, गोरखनाथ ये गये होंगे कभी। क्योंकि इनके यहाँ जो चीजें मिली, मुझे उससे पता हुआ कि ये लोग कुण्डलिनी के बारे में इसा से भी तीन सौ साल पहले से जानते हैं। तब ये समझ में आया कि ये लोग इतनी जल्दी पार कैसे हो जाते हैं।

महाराष्ट्र में बहुत काम किया नाथ पंथीयों ने और मैंने भी बड़ी मेहनत की। पर दू:ख की बात ये है कि जो चीज़ नॉर्थ इंडिया में हम कर पाएं वो महाराष्ट्र में अभी भी मैं नहीं कर पाई। समझ में नहीं आता जहाँ पर संतों ने अपना खून बहाया और हर एक महाराष्ट्रीयन को मालूम है की नाथ कौन थे उन्होंने क्या कार्य किया नाथपंथीयों ने क्या कार्य किया ? और पता नहीं क्यों जो चीज़ मैंने नॉर्थ इंडिया में पाई, पहले तो मैं दिल्ली को बिल्ली ही कहती थी, सालों मेहनत की वहाँ भी लेकिन उसके बाद जो सहजयोगी वहाँ मिले हैं। जिस तरह से सहजयोग फैल रहा है, इससे मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। इतना प्रवाह देख कर के ये आश्चर्य होता है कि जहाँ पर इतना संत-साधुओं ने काम किया है, इतनी मेहनत की है और बचपन से हम लोग यही सिखते आएं है, पढ़ते आएं है, यहाँ पर सब लोग यही बातें करते हैं उस महाराष्ट्र में सहजयोग उतना गहरा नहीं फैला, जैसा कि नॉर्थ में फैला। इसका क्या कारण हो सकता है? एक ही मुझे लगता है कि जब पहले ही से सब चीज़ मालूम है तो उसके प्रति जो है अवज्ञा हो जाती है। उधर इनडिफरन्स हो जाता है। संस्कृत में एक श्लोक है ‘अति परिचयात अवज्ञा’ ‘संतत गमना अनादरो भवति, प्रयागवासी कृपे स्नानं समाचरेत’ कि जब बार-बार आप कहीं जाते हैं, बार-बार आप किसी से मिलते हैं तो आपका अनादर होने लगता है, फिर आपका आदर नहीं रह जाता। क्योंकि प्रयाग में रहने वाले लोग, अलाहाबाद में रहने वाले लोग गंगाजी में नहाने की जगह, जो त्रिवेणी का संगम

है, वो लोग घर में जो कुँआ है उसमें नहाते हैं । और लोग दुनियाभर से जाते हैं वहाँ जाते हैं, आफ़ते उठा कर के नहाने। यही बात शायद है कि जो इतनी मान्यता सहजयोग को नॉर्थ इंडिया में है। यहाँ भी, ऐसा नहीं कि यहाँ सहजयोगी नहीं, महाराष्ट्र में भी बहुत सहजयोगी हैं और बहत कार्यान्वित भी हैं पर सहजयोग के प्रति जो समर्पण चाहिए वो मैंने तो कभी नहीं देखा पता नहीं शायद पहले। समर्पण का मतलब है कि ये हमें सहजयोगी पद जो मिला है उस सहजयोगी पद को हम किस तरह से इस्तमाल करें। वो सिर्फ हम अपने ही लाभ के लिए, अपनी ही तकलीफ के लिए, अपने ही परिवार के लिए सोचते हैं या सारे संसार के लिए सोचते हैं ये कुछ समझ में नहीं आता। महाराष्ट्र की जो संस्कृती है और जो महाराष्ट्र के धर्म की इतनी गहन छाप, उस महाराष्ट्र में सहजयोग इतना नहीं फैला है। और गुजरात में जहाँ नारगोल में जहाँ हमने ब्रह्मरन्ध्र खोला वहाँ तो बहुत की प्रॉब्लेम । गुजरात के लोग तो मेरी समझ में ही नहीं आते। बहुत मेहनत की गुजरात भी गए, गुजरात में पर सबसे ज़्यादा महाराष्ट्र मे मेहनत की है। क्योंकि आज यहाँ महाराष्ट्रीयन लोग बहुत है।

मुझे कहना ये है कि सहजयोग को बढ़ाने के लिए सबसे पहले आप ध्यान-धारणा करें। और गहरे, जब गहरे आप उतर जाते हैं तब आपको लगता है कि मैं ही क्यों इसका मज़ा उठाऊँ? और लोग भी इसका मज़ा उठायें। और जब ये भावना अन्दर आती है तो सहजयोग फैलता हैऔर उसके बाद मनुष्य जो है अपने जीवन में यही सोचता है कि दूसरों को सुख देना, दुसरों को आनन्द देना इससे बढ़के और कोई चीज़ नहीं। और सब चीज़ों को भूल जाते हैं। ये जब होता है तब सहजयोग फैलता है। रात-दिन वही चिंतन, रात-दिन वही सोचना, इसमें मज़ा आता है। आज मैं यहाँ देखकर मैं बहुत खुश हुई कि सारे दुनिया से यहाँ लोग आएं इसके अलावा और भी लोग जो कहना चाहिए कि परदेस से तो आएं है और यहाँ लोग आए हैं और दिल्ली वरगैरा से भी इतने लोग यहाँ आए हैं। कम से कम एक बड़ी मुझे आनन्द की बात लगती है कि इस कठिन जगह आप लोग कैसे सब पहुँचे? ये तो प्रेम की महति है, और ये तो सिर्फ प्रेम है आपका। ये बहुत बड़ी चीज़ है। लेकिन इसमें बस फर्क ये है कि जिस तरह से सहजयोग है, अब देखिए, कोल्हापूर में कितनी मेहनत की। कोल्हापूर में बहुत मेहनत करी लेकिन कोल्हापूर में सहजयोग बहुत कम है, आश्चर्य की बात है! ऐसा क्यों होता है? उन्होंने कहा पंढरपूर में ८०० सहजयोगी हैं, पर ऐसा वहाँ नहीं है। गाजियाबाद में जाओ तो १५,००००, फिर आप और फरिदाबाद में जाओ १६,०००। फिर आप हरियाणा में जाओ तो वहाँ २५,०००, वहाँ तो हजारों की बात है। और महाराष्ट्र में कि ८०० आदमी यहाँ हैं, ५०० आदमी वहाँ हैं, ७०० आदमी वहाँ। इसका कारण क्या है मैं आजतक नहीं समझ पाई। यही अगर सोचना है, यही सोच सकते हैं कि यहाँ पर आत्मज्ञान,

आत्म बोध, महानुभाव पंथ आदि अनेक चीज़ें इतनी ज़्यादा असलियत की हो गयी कि अब इधर ध्यान ही नहीं। ऐसे इन लोगों को महाराष्ट्र में पैसे की ललक नहीं है। जैसे आप लोगों को गुजरात में, उत्तर प्रदेश में भी, उत्तर भारत में भी काफी पैसों की ललक है। महाराष्ट्र में ये बात नहीं। सुबह से शाम वो भगवान के चार बजे उठकर के ध्यान करना, ये करना, वो करना चलेगा। पर उसमें एक तरह की निगरानी की बात नहीं है। उसमें हृदय से करें, भक्ति से करें। और उस भक्ति को बाँटने की कोशिश करें, ये महाराष्ट्रीयन्स को करना चाहिए। बारह महिने में महाराष्ट्र में ही हमारे गणपतीपूले का प्रोग्राम होता है और महाराष्ट्र में काफी अच्छे सहजयोगी हैं गहरे, बहुत गहरे। यहाँ की युवा शक्तियाँ भी बहुत अच्छी हैं। लेकिन तो भी मैं कहूंगी कि जिस तरह से सहजयोग नॉर्थ में फैला है। अब जहाँ देखो बारह पतक्तीं में है, हमारा संसुराल वहाँ है। हर जगह, हर एक गाँव में, हर एक जगह। जहाँ एक आदमी पहुँच गया, सब सहजयोगी बन गया। जैसे कोई सूखी हुई लकड़ी रहती है उसमें जरासी चिनगारी पड़ जाए तो आग लग जाती है इस तरह से। ये आखिर किस कारण इतने जोरो में बह रहा है, समझ में नहीं आता। और जो हो जाते है तो कोई सवाल नहीं, कुछ नहीं। पर महाराष्ट्र में सवाल बहुत पूछेंगे क्योंकि पोथियाँ सब पढ़ बैठे हैं। घर में रोज एक-एक को, आप देखिए, किसी महाराष्ट्रीयन्स के यहाँ कम से कम दस गुरुओं के फोटो हैं । उसमें से सच्चे शायद एकाद -दो ही हो। और सब तरह की मुर्तियाँ हैं। गणेशजी का वास है यहाँ। चार यहाँ गणेशजी बैठे हुए हैं। उसे कहने चाहिए, उसे तो अष्टविनायक कहते है। पर चार मैं इसलिए कह रही हूँ कि एक-एक गणेश के दो-दो अॅसपेक्टस या दो-दो तरिके, विशेष अलग-अलग यहाँ पर है। अब उसके बारे में महाराष्ट्रीयन्स जानते हैं। वहाँ जाएंगे, गणेश पूजा करेंगे वो। फिर यहाँ आकर तीन देवियों का प्रादर्भाव है। ये सब होते हुए भी वहाँ जाएंगे। वहाँ मंदिरों में जाएंगे। महालक्ष्मी मंदिर में जाएंगे रोज, वो सब करेंगे। और अब जब सहजयोग में आएं हैं तो अब छुट्टी हो गयी। कुछ भी नहीं करना है। ये बड़े आश्चर्य की बात है।

आज क्योंकि यहाँ बहुत से महाराष्ट्रीयन आएं है। मैं बताना चाहती थी कि देखिए दिल्ली से न जाने कितने लोग, इतने लोग महाराष्ट्र से कहीं नहीं जाएंगे। मराठी में इनको ‘घरकोंबड़े’ कहते हैं। माने वो बस अपने ही देश में। बम्बई वाले आपको कभी नहीं दिखाई देंगे पूना में जा कर काम करते हुए। और पूना वाले तो, उनको एक तरह का भूत चिपका हुआ है। मैं इसलिए कह रही हूँ कि ये सब बात खुले आम कहने से कभी-कभी ठीक हो जाती है। खुले आम कहना है कि महाराष्ट्र में जो सहजयोग का ठिकाना हुआ है उससे तो इनके जो (..आठवले?.. अष्पष्ट) जो है वो अच्छे, बकते है सिर्फ लेकिन लाखों लोग लाएं। गुजरात का तो क्या कहना। इनको तो ऐसे-ऐसे गुरुओं को पकड़ें है। पर महाराष्ट्रीयन्स को क्या हुआ। जिसमें रामदासस्वामी ने सब गुरुओं की चर्चा की और उसमें बताया है, इतना ही नहीं सबसे तो मैं कहँगी ध्यान दें, इतना साफ़

सहजयोग समझाया है, रोज वही गाते हैं। और नामदेव ने जो लिखा हुआ है जोगवा का गाना वो रोज देहातों में गाते हैं कि ‘हमको माँ तुम योग दों।’ पर वो योग करने के लिए तुमको फुरसत नहीं है। आप किसी गाँव में जाओ वहाँ खूब भीड़ हो जाएगी, जब मैं जाऊँगी। उसके बाद अगर दो आदमी भी मिल जाए तो बड़ी हैरानी। तो मैं ये कहूँगी कि महाराष्ट्रीन लोगों को चाहिए कि कुछ इन लोगों के लिए प्रार्थना करें। हवन करें, कुछ न कुछ ऐसी सामूहिक चीज़ करें जिससे महाराष्ट्र की जागृति वैसी हो जाए जैसे उत्तर भारत में हुई है, जैसे कि रशिया में हुई है। वैसे समर्पित जो हैं वो बहुत अच्छे हैं। लेकिन अभी सहजयोग क्यों बढ़ता नहीं ये मेरी समझ में नहीं आया। बहुत धीरे -धीरे, कोल्हापूर जगह में न जाने कितनी बार पूजाएं हुई। देवी का मन्दिर बहुत सुन्दर है, सब कुछ है पर वहाँ पर इतनी गहनता नहीं। उसके लिए सामूहिक रूप में सब लोग ध्यान दें क्योंकि महाराष्ट्र बहुत बड़ा देश है, बहुत ऊँचा देश है। और धर्म के दृष्टि से जो है सो है, पर आध्यात्म के दृष्टि से बहुत ऊँचा देश है। और इसलिए सबको चाहे कि वो महाराष्ट्र के लिए थोडीसी जागृति की बातचीत करें। ऐसे कोई झगड़ा नहीं है, कोई परेशानी नहीं है। लेकिन जो सहजयोग बढ़ना चाहिए वो न जाने आजतक तो इतना बढ़ा नहीं। हो सकता है आगे ठीक हो जाए। अब जो आप लोग इतने यहाँ आएं हैं, जैसे न जाने क्यों एक अजीब तरह की अनुभूति हुई। किस तरह से पच्चीस साल में इस छोटीसी जगह में आप लोग आएं।

पच्चीस साल तक हमने मेहनत की ये बात मैं जानती हूँ, मेहनत बहुत की। पर पच्चीस साल के बाद इतने लोग इस नारगोल का माहात्म्य समझेंगे और यहाँ आएंगे ये कोई आश्चर्य की बात नहीं। ‘नारगोल’ हमारे सहजयोग में मतलब होता है सहस्रार, सहस्रार। और जब मैं यहाँ आईं यहाँ की वनश्री देखी वगैरा और बहुत तबियत खुश हो गयी और एकदम अन्दर से जैसे लगा कि इस प्रकृति की किसी बड़ी भारी आशीर्वादित जगह हम आयें बहुत अच्छा लगा और जब, वो तो मे (May) का महिना था लेकिन मुझे बिलकुल नहीं गरमी लग रही थी जब सहजयोगी आते हैं तो ठीक है उनकी गर्मी में खिंचती रहती हूँ लेकिन यहाँ कोई सहजयोगी नहीं थे, कुछ गर्मी नहीं लगी और जब सहस्रार तोड़ा तो मैंने देखा कि कोई इसके बारे में कुछ जानता भी नहीं है। ज्यादातर गुजराती लोग थे उसमें महाराष्ट्रीयनस कम थे और महाराष्ट्र में ही जो चीज़ इतनी खुल करके लिखी है कितनी ही किताबें लिखे हैं आप देखियेगा, असली किताबे लिखी हैं, झूठ नहीं है, जो सत्य है वही लिखा हुआ है, चक्रों पे लिखा हुआ है कुण्डलिनी पे लिखा हुआ है, सबकुछ इतना लिखने पर भी यहाँ उस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद लोग उसका इस्तेमाल अगर करें तो न जाने कितना बढ़ जाएगा, कितना यहाँ सहजयोग बढ़ सकता है। अब हमारी जो सहजयोग की प्रणाली है वो इतने लोगों में फैल गयीं इतनी गहरी पहुँची जो आपने ड्रामा देखा है उससे समझ

गये होंगे। इस ड्रामा में उन्होंने दिखा दिया अपने दिमाग से सोचकर के कि ‘माँ क्यों आईं?’ कि सब लोगों ने कहा कि हमने बहुत मेहनत करी। हमने पूरी कोशिश करी कि इन्सान जो है वो आध्यात्म में आ जाएं और परमात्मा की ओर उसकी नज़र जाए और उसको किसी तरह से योग प्राप्त हो पर कुछ चीज़ बनी नहीं है इसलिए अब हम देवी से कहते हैं अब तुम ही अवतरण लो आदिशक्ति से कहते हैं कि तुम ही अवतरण लो, तुम ही अवतरण लेकर के जो तुमने ये संसार बनाया है उसको ठीक करो। है बिलकुल पते की बात है इसमें कोई शक नहीं है। और हुआ भी ऐसे है और बना भी ऐसे है। सारा जो कार्य है इस तरह से बड़े सुचारू रूप से बन रहा है और जिस वक्त में इस भ्रमरान्ध्र को तोड़ा था उस वक्त सोचा भी नहीं था मैंने कि मेरे जीवित रहते हुए इतना मैं कार्य देख सकुँगी पर ये कुण्डलिनी की महिमा और परम चैतन्य का कार्य है। परम चैतन्य से तो मैं खुद हार गई, कि पता नहीं क्या करते रहते है, हालांकि ये मेरी शक्ति है, लेकिन ये परम चैतन्य आप देख रहे हैं, ये तरह-तरह के फोटोग्राफ्स मेरे बना रहे हैं, तरह-तरह के चमत्कार दिखा रहे हैं, पचासो तरह के चमत्कार।

वैसे मैक्सिको में एक स्त्री थी, वो यू.एन. (UN) में काम करती थी, न्यूयॉर्क में। वहाँ मुलाकात हुई थी उसकी। उसके बाद वो पार भी हो गयी थी और वो मैक्सिको चली गयी थी, वहाँ नौकरी मिल गयी यू.एन. में। उसने चिठ्ठी लिखी कि मेरे लड़के की तबियत बहुत खराब हो गयी है। छोटा लड़का है, उमर में बहुत छोटा है और ये बिमारी हमारे खानदान में होती है, जब लोग बिलकुल बुढ्ढे हो जाते हैं। पर इस बच्चे को इतनी छोटी उमर में हो गयी और अब ये बच नहीं सकता, इसके लिए माँ मैं क्या करूँ। ऐसे तीन चिट्ठीयाँ उसने लिखी है। ये परम चैतन्य की बात बता रहे हैं और चौथी चिठ्ठी में उसने लिखा कि लड़का अपने आप से ठीक हो गया है। वो हॉवर्ड युनिवर्सिटी में पढ़ता था। एकदम ठीक हो गया। उसकी बिमारी एकदम ठीक हो गयी। डॉक्टर ने कहा कि ‘किया क्या तुमने ? वो कैसे ठीक हो गया? तो ये परम चैतन्य जो है, तो इससे बढ़कर कोई डॉक्टर भी नहीं है। जिस तरह से ये काम करते हैं ये कमाल है तो अब किसी ने पूछा कि ‘ये गणेश जी दूध पी रहे हैं, ये क्या है ये!’ मैंने कहा कि भाई, ये परम चैतन्य, कृतयुग में आ गये हैं और कार्य कार्यान्वित अगर …….है। अब ये करे सो कम है। गणेशजी को दूध पिलायेंगे, वो शिवजी को दूध पिलायेंगे, इसको कुछ कह सकते हैं ! कौनसी बात जो है जो परमचैतन्य नहीं कर सकते हैं? हर तरह का वो काम करते हैं। एक साहब थे केनेडा में ये भी काफी पुरानी बात है। तो उन्होंने मुझे चिट्ठी लिखी कि माँ, मेरे पास पैसे नहीं हैं और इस कार्य के लिए मुझे इतना रूपया चाहिए | मैंने कहा, ‘अच्छा, कोई बात नहीं ठीक है।’ फिर दूसरे दिन उसने मुझे फोन किया क

उसमे रूपया रखा था। मैंने कहा हे भगवान मैंने तो रूपया भेजा नहीं इसको रूपया कहा से मिल गया। उसने कहा कि जितना मुझे चाहिए था एक्झॅक्टली उतना मुझे मिल गया। ऐसे तो बहुतों को अनेकों अनुभव आयें। अनेक अनुभव आ रहे हैं क्योंकि परम चैतन्य जो है वो आशीर्वाद स्वरूप है। हर जगह आपको आशीर्वाद देगा, शांति देगा, प्रेम देगा, हर तरह से आपको सम्भालेगा, सबकुछ है। लेकिन उनकी जो चाल है न उसमें बहुत स्पीड़ आ गयी है। मेरे खुद ही समझ में नहीं आता है कि ये इतने कार्य कैसे कर लेता है।

अमेरिका जैसी जगह जहाँ कि लोगों को बिलकुल भी कहना चाहिए कि सुझबुझ ही नहीं है, अध्यात्म में। इस टाईम अमेरिका में इतना बड़ा प्रोग्राम हुआ, इतने बड़े हॉल में, लोगों को बैठने की जगह नहीं थी और पाँच मिनट में सब लोग पार हो गये, पाँच मिनट में। वही फिर लॉस एंजलिस में भी हआ। मैं हैरान हो गयी कि ये लोग इतने मूर्ख हैं इनके साथ ऐसे कैसे हो गया है? पाँच मिनट में, फिर केनेडा गये, वहाँ भी पाँच मिनट में पार हो गये, फिर उससे आगे गये वहाँ भी पाँच मिनट में पार हो गये। कुछ समझ में आया नहीं कि क्यों और क्या है? तो परम चैतन्य की कृतियाँ भी इतनी बढ़ गयी हैं। इतने तरह-तरह के हो गये हैं कि कोई समझ ही नहीं सकता है कि क्या बात है। और ये किस तरह से घटित होता है ये कल कोई मुझसे पूछे तो मैं नहीं बता पाऊँगी। अब किसीने मेरा फोटो लिया कि मैं चाहती हूँ कि जिस तरह से माँ के बारे में कहा जाता है कि उनके चरणों में चाँद है और सर पे सूरज। वैसा फोटो मुझे चाहिये और वाकई में वैसा फोटो आ गया। आप लोग जिस चीज़ की इच्छा करें वो हो जाता है। इसको क्या कहना चाहिये? इस परम चैतन्य की अपनी शक्ति जो है इतनी सुचारू रूप से चलती है और इस कदर जानती है, हर एक की तकलीफ, परेशानियाँ बड़े प्यार से, दुलार से उसको ठीक कर देती है। इस परम चैतन्य की जो महती है आज तक आपने आदिशक्ति की पूजा की है, उसी वक्त आपने उस परमशक्ति की भी, जिसे कि परम चैतन्य कहते हैं, रूह कहते हैं उसकी पूजा की है। यहाँ पर जब मैं आईं तब मैंने उसी वक्त उसी का प्रादूर्भाव सब जगह पर देखा है और सोचा कि यहाँ कुछ न कुछ देवी ने आशीर्वाद दिया हुआ है पहले ही। और वाकई में यहाँ इतने जल्दी, खट से जो ये कार्य हुआ, इतना बड़ा, इतना महान, वो मेरी समझ में नहीं आया कि ऐसा इतनी जल्दी क्यों हो गया। ये वही परम चैतन्य है।

अब कहिये कि मेरी शक्ति है लेकिन मैं ही मेरी शक्ति को नहीं जानती हूँ ऐसा हाल हो गया है। इतने जोरों में दौड़ रही है कि समझ में नहीं आता कि अब क्या करेगी और आगे क्या करना है।

मतलब ये है कि ये जो शक्ति है, ये इतनी अब आतुर है, इतनी लालाहित है कि संसार में ये जो विश्व का परिवर्तन है, ग्लोबल ट्रान्सफौर्मेशन ( global transformation) है उसको करने में बिलकुल देर नहीं करता है, पर जो इसमें आयेंगे और जो इसके लिए करेंगे वो ही प्राप्त कर सकता है। अब महाराष्ट्र की यही बात मैं आपको बताने जा रही हूँ कि ये शक्ति कार्यान्वित हो रही है। बड़े जबरदस्त और आप लोगों को सबको चाहिए कि इसे पूरी तरह से आप लोग जान ले, समझ लें इस शक्ति की, जो कार्य करने की जो प्रणाली है उसे समझ लें और उसके माध्यम से आप काम कर सकते हैं। और अगर वो आप इस्तेमाल करना शुरू कर दें तो इस शक्ति को तो हर कार्य को आप कर सकते हैं।

तो अगर कोई आदमी आपको सत्ता रहा है तो उसको भी एक तरह से बंधन दे सकते हैं कोई कार्य करना हो उसको उसको बंधन दे सकते हैं, सिर्फ बंधन। और बंधन में क्या करते हैं आप कि ये जो शक्ति आपके अंदर से बह रही है उस शक्ति को ही आप लपेटते हैं। और उस शक्ति को उस जो भी आपको प्रश्न हैं जो भी आपके लिए एक प्रॉब्लम है उसको आप बंधन दे देते हैं वो शक्ति उसपे कार्यान्वित होती है। आपके पास ये शक्ति है आप इतने शक्तिशाली हैं अगर आप उसको इस्तेमाल करे तो न जाने कहा से कहा पहुँच जायेंगे पर मनुष्य खोया हुआ है और पार होने के बाद भी, अभी जब तक हम लोग इसको, वो चीज़ विशेष न समझे तब तक सहजयोग फैलना बड़ा मुश्किल हो जाएगा। रूमानिया देश जिन्होंने कभी सुना ही नहीं कि आदिशक्ति नाम की क्या चीज़ है; ऐसा मैं सोचती हूँ। वहाँ सहजयोग इतने जोर से फैला है बड़ा आश्चर्य होता है कि वहाँ ५००० सहजयोगी एक शहर में हैं । अब तो और भी बढ़ गये। वही चीज़ इस महाराष्ट्र में होना चाहिए और बार-बार मुझे इसकी चिंता लगी रहती है कि ये चीज़ महाराष्ट्र में क्यों नहीं होती है। क्यों नहीं सहजयोग इस तरह से फैल रहा है जैसा फैलना चाहिए। बड़े-बड़े शहर हैं बड़ी – बड़ी जगह हैं, वहाँ ये कार्य होना है। तो आज के दिन एक बहुत बड़ी बात हुई है कि पचीस साल इस चीज़ से झूँजते -झूँजते इस दशा में हम आ गये हैं कि यहाँ पर इस जगह आप लोग आये हैं इसका गौरव बढ़ाने, इसकी महत्ता बढ़ाने और इसको पुनीत करने, मेरे लिए कोई शब्द नहीं है। मैं सोचती हूँ तो जी मेरा भर आता है। आप लोगों के लिए कि कहाँ-कहाँ से आप लोग यहाँ आये है। |

I am sorry I have to speak in this language because most of the people only know this knowledge. And some of them know only Marathi but they know something about Hindi Language. But I am sorry I don’t know French and I don’t think in this lifetime I will be able to learn it. So, I had to speak in this language which you can get translated and understand. I told them how I came here just by chance and there I found somebody trying to use mesmerism on people. That was the time I

decided we have to open the Sahasrara. And that is what I did in a very Sahaj manner. I must say just I desired that now the Sahasrara must be opened that’s all. I did not do anything. And once the Sahasrara was opened I was amazed How I also knew how the human beings can give realizations to others. Even human beings could give collective realization. Of course, they have to use the photograph. This we can say that is niralumb. What is niralamb? Means we should not have any alamban, niralamban (without any alamban) depending on anything. But it is Nira, Niralamban. I am Neera so that is also there, see it is a very confusing word. So, this is what it is. You have to use my photograph I don’t know so far anybody who has been able to give up the photograph and called himself a sahaja yogi. I don’t compulsorily say you must have my photograph, but they know the positive side of it. That is why they use it. I am told so many times about this realization. That’s how you have come to this far fletched place. I am very much thankful to you.

May God bless you!