Mahashivaratri Puja

Sydney (Australia)


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श्रीशिवजी पूर्णतया अनासक्त हैं ……
(महाशिवरात्रि पूजा, सिडनी, 3 मार्च 1996)

सहजयोगियों के रूप में आपको छोटी-छोटी चीजों को ज्ञान होना आवश्यक है, बड़ी-बड़ी चीजों का ज्ञान होना भी आवश्यक है। उस महान दृष्टि के कारण जिससे आप परमात्मा के साम्राज्य में पहुंच चुके हैं। मैं कह सकती हूं कि आप वहां प्रवेश पा चुके हैं। मैं कह सकती हूं कि आपने वह अवस्था प्राप्त कर ली है। परंतु अभी भी आप वहां नहीं हैं। ये ऐसा ही है कि यदि मैं किसी से कहूं कि आप अब ऑस्ट्रेलिया में हैं लेकिन वह आस्ट्रेलिया में है ही नहीं लेकिन मैं कहूं कि तुम आस्ट्रेलिया में ही हो तो वह इसका विश्वास कर लेगा कि वह आस्ट्रेलिया में है। लेकिन यह गलत है। आपको आस्ट्रलिया में होना होगा और फिर आस्ट्रेलिया के बारे में जानना होगा कि वहां की जलवायु कैसी है … यह किस प्रकार का देश है आदि।
मुझे मालूम है कि यहां के माता-पिता को अपने बच्चों से बातचीत करना चाहिये। यहां पर माता पिता का बच्चों से बहुत अधिक संपर्क या मेलजोल नहीं है। बच्चों की देखभाल स्कूलों में काफी अच्छी तरह से की जा रही है और वे बच्चों के लिये काफी कुछ करना चाहते हैं लेकिन माता-पिता को भी इसमें उनके साथ कार्य करना चाहिये। जब बच्चे यहां पर आते हैं तो उन्हें देखना चाहिये कि बच्चे अननुशासित हों। माता-पिता का बच्चों से इतना जुड़ाव न हो कि बच्चे बिगड़ जांय। यदि आप बच्चों से आसक्त हो जायेंगे तो आप उन्हें बिगाड़ देंगे।
श्रीशिवजी का गुण यही है कि वह पूर्णतया अनासक्त हैं और आपको भी अपने अंदर इसी प्रकार की अनासक्ति को विकसित करना है … पूर्णतया अनासक्त भाव। लेकिन अनासक्ति का अर्थ किसी चीज की अनदेखी करना नहीं है।
मैंने आपको कई बार कहा है कि जिस प्रकार से पेड़ में उसका रस उसके विभिन्न भागों में जाकर वापस लौट आता है और फिर वाष्पीभूत हो जाता है या फिर धरती माँ में वापस चला जाता है ठीक उसी प्रकार से हमारी अनासक्ति को भी होना चाहिये। यदि आप अपने बेटे से आसक्ति पाल लेते हैं क्योंकि वह आपका बेटा है … या आप किसी से इसलिये आसक्ति पाल लेते हैं कि वह व्यक्ति आस्ट्रेलियन है या वह किसी परिवार विशेष या किसी खास क्लास का व्यक्ति है तो अभी आप बहुत ही सीमित व्यक्तित्व हैं। यदि आप पार होना चाहते हैं तो इन सभी सीमित विचारों को त्यागना होगा। ये सभी सीमित विचार आपके ऊपर काफी भार बढ़ा देते हैं और चाहे आप जितना चाहें या मैं जितना भी चाहूं आप निर्विचारता में नहीं रह सकते हैं। निर्विचारिता बहुत ही सुंदर अवस्था है जिसमें आप सबको रहना चाहिये। इस अवस्था में न तो आप किसी पर प्रभुत्व जमाते हैं और न आप किसी प्रकार का समझौता करते हैं। आप बस अपने पैरों पर खड़े होकर निश्चित रूप से यह जानते हैं कि आपको न तो किसी भी प्रकार का कोई विचार डिगा नहीं सकता है और न कोई आप पर किसी प्रकार का प्रभुत्व जमा सकता है। आप पूरी तरह से एक स्वतंत्र पक्षी की तरह से बन जाते हैं पूर्णतया एक पक्षी की तरह और फिर आपका कार्य सिर्फ उड़ान भरना मात्र रह जाता है… एक उड़ान निर्विचारिता की ओर और दूसरी निर्विकल्प की ओर और तीसरी परमात्मा के साक्षात्कार की ओर।
मैंने देखा है कि जो लोग मेरे बहुत ही ज्यादा करीब हैं वे भी इसे नहीं समझते हैं। वे इस प्रकार से व्यवहार करते हैं कि अब तो वे परमात्मा ही बन चुके हैं। वे इतने अहंकारी हैं कि मैं उन्हें देखकर हैरान हो जाती हूं और बाद में उन्हें सहजयोग छोड़कर जाना पड़ता है।
देखिये यदि मैं आपकी प्रशंसा भी करती हूं, या मैं आपको कुछ भी कहती हूं तो आपको इससे बहुत खुश नहीं होना चाहिये। यहां आपकी परीक्षा ली जा रही है। या कभी मैं आपकी कुछ आलोचना भी कर दूं कि ये ठीक नहीं है या उस चीज को ठीक करो तो आपको इस बात का बुरा नहीं मानना चाहिये क्योंकि माँ होने के नाते मुझे ऐसा कहना पड़ता है… ये मेरा कार्य है और आपका कार्य मेरी बात को मानना है क्योंकि मुझे आपसे कुछ भी नहीं चाहिये मुझे कुछ भी नहीं चाहिये। …
मैं तो केवल ये चाहती हूं कि आपको मेरी शक्तियां प्राप्त हों। मैं मानती हूं कि आप पूर्णतया मेरी तरह से नहीं बन सकते है परंतु कृपया मेरी सभी शक्तियों को प्राप्त करने का प्रयास करें और ऐसा करना मुश्किल भी नहीं है। यही परमात्मा का साक्षात्कार है। यही श्रीशिवजी या सदाशिव को जानना है। शिव के माध्यम से ही आप सदाशिव को जानते हैं। आप किसी परछांई को देखते हैं और उस परछांई से ही आपको पता चल पाता है कि परछांई का मूल स्त्रोत क्या है … कौन है ?
इस प्रकार से आप उस अवस्था में पंहुच पाते हैं जहां आप सोचते हैं कि आप परमात्मा के साम्राज्य में प्रवेश कर गये हैं या आप परमात्मा को देख सकते हैं … उनका अनुभव कर सकते हैं … उन्हें समझ सकते है और उन्हें प्रेम कर सकते हैं।
परमात्मा आपको आशीर्वादित करे।