8th Day of Navaratri: Be Aware Of Your Own State

Campus, Cabella Ligure (Italy)

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                                                नवरात्रि पूजा

 कबेला लिगरे (इटली), 20 अक्टूबर 1996

आज एक विशेष दिन है, जैसा कि आप जानते हैं कि हम देवी की पूजा कर रहे हैं, जो इस धरती पर नौ बार पहले आई थीं, सभी राक्षसों और सभी नकारात्मकता को मारने और सभी भक्तों को आराधना करने के लिए राहत देने के लिए। उसके सभी कार्यों का वर्णन पहले ही किया जा चुका है। इसके बावजूद वे पाते हैं कि, नए प्रकार के शैतान, नए प्रकार के नकारात्मक लोग, वापस आ गए हैं। शायद होना ही था। शायद यही होना था, आखिर यह कलियुग है और जब तक वे ना हों,  कलियुग का नाटक नहीं किया जा सकेगा। तो इस ड्रामा को पूरा करने वे आए थे। लेकिन इस बार बहुत अलग तरह का युद्ध होने जा रहा है। यह शांतिपूर्ण लोगों का युद्ध होने जा रहा है और शांतिपूर्ण लोग जीवन के हर क्षेत्र में सबसे सफल लोग हैं, यहां तक ​​कि युद्ध में भी। पहले ऐसा कार्यान्वित नहीं हुआ करता था।

वे कहते हैं कि जब चंगेज खान आया, तो वह गया के पास, बौद्ध के एक बहुत बड़े मठ में गया, और उन सभी को मार डाला, वहां लगभग 30,000 बौद्ध थे, और उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा और वे सभी मारे गए। इसलिए लोगों ने बौद्ध धर्म में अविश्वास करना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा, “यहां किस तरह का बौद्ध धर्म है, बुद्ध ने उन्हें क्यों नहीं बचाया। ऐसी है मानवीय सोच है। बुद्ध को इन 30,000 लोगों को बचाना चाहिए था जो शांतिपूर्ण थे, जो इस तरह से विरोध कर रहे थे कि,कोई प्रतिरोध नहीं था, और इसलिए वे सभी चंगेज खान नामक इस भयानक व्यक्ति द्वारा मारे गए थे। लेकिन आपको आश्चर्य होगा कि इस कलियुग में इस चंगेज खान की कई लेखकों ने प्रशंसा की है, और उसके बारे में किताबें लिखी गई हैं। वह मुसलमान नहीं था, बल्कि किसी तरह का सनकी था। उसने कई मस्जिदों को खत्म कर दिया, उसने कई खूबसूरत इमारतों को नष्ट कर दिया और साथ ही वह भारत आया और वहां थोड़े समय के लिए शासन किया। वह सब एक इतिहास है।

उसी तरह ईसाई और गैर-ईसाइयों के बीच, मुस्लिम और गैर-मुसलमानों के बीच युद्ध हुए हैं। तमाम तरह के युद्धों के बारे में हमने सुना है, जहां सिर्फ श्रद्धावान लोग खो गए- असली लोग खो गए, जिसने पूरी आस्था से भगवान की पूजा की, वे हार गये। इतने सारे लोग नास्तिक बन गए और उन्होंने कहा कि ईश्वर जैसा कुछ भी नहीं है, उनकी दिव्य शक्ति जैसा कुछ भी नहीं है, यह कभी अस्तित्व में नहीं था, हम मूर्ख थे, यह सब पालन करने वाले हम मूर्ख थे। और जो धर्म के प्रभारी थे उन्होंने इसका पूरा फायदा उठाया और कहा कि ये लोग पापी लोग थे, ये लोग ईश्वरीय लोग नहीं थे और इस तरह वे हमारे द्वारा मारे गए और हम विजयी हुए। उनकी जीत का विचार था, कि वे सफल हुए हैं और कितने लोग हमारे द्वारा मारे गए हैं।

तो हम कलियुग में आते हैं, और कलियुग में सूक्ष्म तरीके से वही बात शुरू हो गई है, अलग तरह से, यह शुरू हो गया है कि उन लोगों के बीच एक बड़ा युद्ध चल रहा है जो ईश्वर विरोधी हैं और जो अपने उद्देश्य के लिए ईश्वर का उपयोग कर रहे हैं। बहुत बेईमान, बहुत भ्रष्ट, बहुत क्रूर लोग और वे ईश्वर के झंडे का उपयोग कर रहे हैं, वह बैनर जिसका उन्हें उपयोग करने का कोई अधिकार नहीं है। फिर सहजयोगी हैं, जिन्हें अपनी अनुभूति हो गई है और उन्हें उनसे लड़ना है।

अब पिछले युद्धों और इस युद्ध में बहुत अंतर है। उन युद्धों में, आप उन सभी को देखते हैं जिन्हें विजयी होना चाहिए था – यह देवी माँ की सभी नौ लड़ाइयों के बाद था – जो नकारात्मकता सामने आई और जो सफल हो गई, उसे बहुत विश्वास होने लगा कि हमने वह हासिल कर लिया है जो हम चाहते थे। लेकिन कलियुग में, कलियुग के आलोक में, उन सभी ऐतिहासिक जीतों को शर्मनाक माना जाता है, कुछ बहुत ही आक्रामक और अर्थहीन। इसका  अब हर जगह वर्णन किया जा रहा है। जैसे गोरी चमड़ी वाले लोग अमेरिका गए और बाकी सभी को वहीं मार डाला। अब यह बात सामने आ रही है। ये सभी लोग जो खुद को विजयी समझते थे – उनके बच्चे, उनके पोते, उनकी संतान – उनसे शर्मिंदा हैं, यह कहने में शर्म आती है कि वे अंतिम युद्ध तक उनके पूर्वज थे।

यह जागरूकता, जो आई है यह आधुनिक समय की, इस कलियुग की असली जीत है कि, वह सब कुछ जिसे खेल के एक अंग के रूप में स्वीकार किया गया था, जीवन शैली के रूप में, आप ऐसा कह सकते हैं उसे अब आधुनिक समय में हर जगह चुनौती दी जा रही है। जो कुछ भी आक्रमण है, जो कुछ भी उत्पीड़न है, जो कुछ भी क्रूर है, अब उसे दंडित भी किया जाता है। आप देखते हैं कि कितने ही युद्ध अपराधी भाग गए होंगे लेकिन कई मुकदमे चले है, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, कोई भी चंगेज खान को मुकदमे में नहीं ले गया। अब बहुत ही सूक्ष्म तरीके से इन सभी आक्रामक लोगों को अब डर लगने लगा है कि कहीं उनसे पूछताछ न हो जाए और उन्हें प्रताड़ित किया जाए. यह शुरू हुआ, मुझे नहीं पता कहाँ, लेकिन निश्चित रूप से कलियुग की शुरुआत में।

अगर आपको याद हो तो इस देश में मुसोलिनी नाम का एक बड़ा आक्रामक आदमी था और आखिरकार उसे फांसी पर लटका दिया गया। जर्मनी में हिटलर और हिमलर वगैरह, नाम के बहुत शक्तिशाली व्यक्ति थे। भगवान जाने उनके साथ क्या हुआ, जर्मन उनका नाम भी लेना नहीं चाहते, वे सभी उनसे शर्मिंदा हैं। तब हमारे पास इंग्लैंड में कोई था, वारेन हेस्टिंग्स, जो भारत आया था, उसे जेल में डाल दिया गया था। ऐसा पहले कभी नहीं किया गया। अगर नेपोलियन ने लोगों पर हमला किया, तो उसने सोचा कि वह बहुत विजयी है, लेकिन वह इसे जारी नहीं रख सका, उसे इसके परिणाम का सामना करना पड़ा। आप देखते हैं कि कोई भी, जो आक्रामक रहा हो, जो हावी रहा हो, जो बहुत क्रूर, राक्षसी रहा हो, उसे ज्यादातर अपने जीवनकाल में ही दोषी ठहराया गया है। अब, यदि उनके जीवनकाल में नहीं, तो बाद में, उनकी आलोचना हुई है, और उनका किसी “नायक” की तरह कुछ सम्मान नहीं है, लोग उनकी मूर्तियां खड़ी नहीं करना चाहते हैं।

इसलिए लोगों के मन में जागरूकता आई है। स्टालिन जैसे व्यक्ति की तरह, जिसने कभी रूस पर शासन किया था, आज आप स्टालिन की एक भी मूर्ति नहीं देख सकते हैं, यह आधुनिक समय है। आधुनिक समय की शक्ति को देखें, और यह उन लोगों के लिए भयावह है जो सोचते हैं कि वे जो कुछ भी कर रहे हैं, उसके साथ चलाते रह सकते हैं। उन्हें बहुत जल्द यह समझ में आने वाला है कि उन्हें यह सब बकवास बंद करनी होगी, नहीं तो उन्हें परिणाम भुगतना होगा। जिन पर उनका दबदबा है, उन्हें नहीं बल्कि जो हावी हो रहे हैं, उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। वे शारीरिक रूप से पीड़ित होंगे, वे मानसिक रूप से पीड़ित होंगे, वे भावनात्मक रूप से पीड़ित होंगे, और उनकी प्रसिद्धि भी कीचड़ में होगी।

तो आज की देवी माँ की शक्ति की जीत, एक बहुत बड़ा काम कर रही है कि – बेनकाब करना, और यह भंडाफोड़ सार्वजनिक रूप से उन लोगों की निंदा करेगा जो गलत कर रहे हैं। अगर आप उस नजरिए से देखेंगे तो आप समझ जाएंगे कि अब हम कैसे विजयी हुए हैं।

आप में से बहुतों को बहुत दुख हुआ कि मुझे पुरस्कार नहीं मिला। इस पुरस्कार से मुझे और आपको भी कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं आपको बता दूं। क्योंकि आप जब में पुरस्कृत नहीं थी तब मेरे पास आये हैं , और बिना किसी पुरस्कार के ही बहुत से लोग आएंगे। लेकिन, अगर आप गौर करें तो, इस बार पहली बार अवॉर्ड पाने वाले लोगों की निंदा की जाती है. अब भी वे इसके खिलाफ लिख रहे हैं, अब भी आलोचना कर रहे हैं। तो जो रहे हैं, उन्हें लगा कि वे बहुत होशियार हैं, लेकिन अब स्मार्टनेस खत्म हो गई है और मुझे नहीं पता कि यह कब तक चलेगा। क्योंकि आज भी अगर आप कोई अखबार खोलेंगे तो उसमें कुछ न कुछ मिलेगा, कि उन्होंने कितनी मूर्खता से ऐसा किया है, उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि आखिर किस कारण उन्होंने ऐसा किया। न केवल चुनने वाले लोगों की आलोचना की जाती है, बल्कि चुने गए लोगों की भी आलोचना की जाती है।

अब, सहजयोगियों के रूप में, हमें यह जानना होगा कि उस समय की चेतना और इस समय की जागरूकता में क्या अंतर है। उस समय उन राक्षसों को मारना जरूरी था – उन्हें खत्म करो, लेकिन वे फिर से मंच पर आ गए हैं।

अब, इस समय, जब की कलियुग है, उनका पर्दाफाश किया जाता है, उनकी निंदा की जाती है, उन्हें जेल में डाल दिया जाता है और अब उन्हें सार्वजनिक रूप से दंडित किया जाता है। तो सामूहिक जागरूकता को इतनी बड़ी जीत मिली है, मुझे लगता है, इन लोगों पर, जिनके लिए इतने सारे लोग आए, मारे गए और बिना किसी सजा के मारे गए, बिना किसी मानहानि के। चलिए अब समझते हैं कि चेतना क्या है और जागरूकता क्या है।

यह एक सूक्ष्म विषय है, जो मुझे लगता है कि आप सभी समझ सकते हैं। चेतना यह है कि जब तुम्हे सचेत किया जाता है, तो तुम उसके प्रति सचेत हो जाते हो। जैसे यहाँ मेरा हाथ है, ठीक है, लेकिन आम तौर पर मुझे इस बात का अहसास नहीं होता कि मेरे पास एक हाथ है। अगर कोई आदमी सो रहा है, तो उसे होश नहीं है कि वह सो रहा है। जब आप कहते हैं कि आपका हाथ है, मैं सचेत होती हूँ, या कोई चीज मुझे चुभती है, तो मैं सचेत होती हूं अन्यथा मैं इसके बारे में अनभिज्ञ हूँ। मैं अपनी आंखों को लेकर बिल्कुल अनभिज्ञ हूं, मैं सब कुछ देख रही हूं। लेकिन मान लीजिए कि मैं अंधी हो गयी, मैं देख नहीं सकती, तो मैं अपनी आंखों के प्रति जागरूक हो जाती हूँ कि, जो आंखें मुझे मिली हैं उनके माध्यम से अब मैं नहीं देख सकती। तो एक बार जब तुम कहते हो कि यह हाथ है, चेतना है। यह हम कह सकते हैं, हाथ के बारे में ज्ञान है, कि आप हाथ के बारे में ज्ञान प्राप्त करते हैं। लेकिन एक बार जब तुम हाथ के प्रति सचेत नहीं होते, तो वह ज्ञान विलीन हो जाता है। तो, यह कहना कि अज्ञान है या ज्ञान है, दोनों एक ही बात हैं। आप अपने हाथ के प्रति सचेत नहीं हैं, इसलिए आप इसके बारे में काफी अनभिज्ञ हैं। अब मान लीजिए कि कोई कहता है “तुम्हारे हाथ बहुत सुंदर हैं”, कोई इस तरह की टिप्पणी करता है, तो मैं अपने हाथ के प्रति सचेत हो जाती हूँ, जो सुंदर है, अन्यथा मुझे कभी नहीं पता था कि वे सुंदर थे।

तो, आम तौर पर सभी इंसान उस स्तर पर रहते हैं – कि किसी को आपको बताना होगा। अब, किसी ने कहा “आपने बहुत अच्छी साड़ी पहनी है”, ठीक है। फिर मैं इसे देखती हूं, “हां, यह बहुत अच्छी है, मुझे कभी नहीं पता था”। तो, किसी को आपको बताना होगा, तब आप सचेत हो जाते हैं, अन्यथा आप नहीं हैं। तो, हम सभी मनुष्य, उस स्तर पर, ऐसे ही हैं।

अब, जागरूकता क्या है? वह अलग बात है। इसका मतलब है, अगर मैं देखती हूं कि कोई मुझ पर हमला कर रहा है, तो मैं अपना हाथ सामने रखती हूं – इस तरह, इसका मतलब है कि मुझे पता है कि मेरे पास एक हाथ है – मैं सचेत नहीं हूँ लेकिन मैं जागरूक हूँ  मुझे पता है कि मेरे पास एक हाथ है, मुझे इसका इस्तेमाल करना है| जैसे यहाँ इटली में तुम हर समय अपने हाथों का प्रयोग करते रहते हो, ऐसे ही। इसका मतलब है कि आप जानते हैं, आप जानते हैं कि आपके पास हाथ हैं, कि आपको कुछ अधिक जोरदार ढंग से व्यक्त करने के लिए उनका उपयोग करना है। तो एक तरह से हम अपने शरीर के बारे में भी जागरूक हैं, हम दूसरों के बारे में जागरूक हैं, हमें दूसरों के बारे में ज्ञान है, हम जानते हैं कि दूसरा व्यक्ति किस प्रकार का है – जब तक आप स्वयं आत्मसाक्षात्कार ना पा लें।

आत्मज्ञान के बाद क्या होता है? यह बहुत दिलचस्प है। आत्म-साक्षात्कार के बाद आप इन दोनों चीजों, चेतना और जागरूकता से आगे निकल जाते हैं। क्योंकि आप विचारों से परे जाते हैं। तुम विचारों से परे हो गए हो, इसका मतलब क्या? – क्रोध, सभी प्रकार के विचार, सभी प्रकार की आक्रामकता, सब कुछ आपके मन से संचालित या कार्यान्वित होता है। तो अगर आपका मन खो जाए, तो आप क्या करेंगे? अब कोई मन ही शेष नहीं है। आप वास्तविकता के साथ मौजूद हैं। तो संवाद करने के लिए कोई मन है ही नहीं – हम इसे निर्विचार जागरूक कहते हैं – इसका क्या मतलब है?। हमने एक शत्रु (मन)को त्याग कर अपने सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त की है, जो हमारा मन था। सुझाव देने वाला कोई ‘मन’ अनुपस्थित है, आपको बताने वाला कोई ‘मन’ मौजूद ही नहीं है। तो एक बार जब ‘मन’ नहीं होता, तो आप खो जाते हैं (समुद्र में विलीन हो जाते हैं – निर्विचारिता में)।

अब कहा जा रहा है कि आप अपने आप से एक प्रश्न पूछें “मैं कौन हूँ”। यह प्रश्न पूछते ही तुम निर्विचार हो जाते हो, खो जाते हो, इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकते। अन्यथा आप कह सकते हैं, मैं एक महिला हूं, मैं यह हूं, मैं वह हूं, मैं बिशप हूं या मैं पोप हूं, मैं यह हूं, मैं वह हूं। लेकिन एक बार जब आप एक साक्षात्कारी आत्मा हो जाते हैं, तो आपको कौन बताएगा कि आप कौन हैं, क्योंकि जो आपको बताता है वह ‘मन’ है, जो अब मौजूद नहीं है, कोई विचार नहीं है। यानी आप अपने आप में ही घुल जाते हैं। यही हकीकत है। लेकिन आप भी जागरूक हैं। अब, यह एक और बात है। यदि आप अपने आप से एक प्रश्न पूछते हैं, तो आप वहां नहीं हैं, लेकिन आप जागरूक हैं। अगर आपकी नाभी पकड़ रही है, तो तुरंत आप जान जाते हैं कि मेरी नाभी पकड़ रही है, मुझे लीवर हो गया है। आपको सवाल पूछने की जरूरत नहीं है। या कोई आपके पास खड़ा है, बायाँ स्वाधिष्ठान, हे भगवान, यह है। अगर कोई बहुत क्रोधित और गर्म स्वभाव वाला है, तो तुरंत आपको उस व्यक्ति से ऐसी गर्मी महसूस होगी – हे भगवान, मैं इस आदमी से दूर भाग जाऊं। तो यह एक नया क्षेत्र है जिसमें आपने प्रवेश किया है – वास्तविकता, जिसके बारे में आप पहले कभी जागरूक नहीं थे।

अब, मान लीजिए कोई बहुत बुरा आदमी आपके पास खड़ा है। वह चोर हो सकता है, वह हत्यारा हो सकता है, कुछ भी। आप इसके प्रति सचेत भी नहीं होंगे, सामान्य रूप से जागरूक होने की तो बात ही छोड़िए। लेकिन एक बार जब आप एक साक्षात्कारी आत्मा हो जाते हैं, तो आप समग्र के प्रति जागरूक हो जाते हैं – यही वास्तविकता है। सामूहिकता में क्या समस्याएँ हैं, आप सामूहिक के प्रति जागरूक हो जाते हैं। आप पूरी दुनिया की समस्याओं से अवगत हो जाते हैं। अब यह जागरूकता बहुत अलग है।

पहली जागरूकता, जैसा कि मैंने आपको बताया, इस प्रकार है कि,  अगर कोई तुमसे कहे कि तुम ऐसे यह और वैसे हो, तो तुम इसके प्रति जागरूक हो जाते हो। इस बारे में किसी व्यक्ति द्वारा आप को बताना भी नहीं पड़ता है, बस यहीं है। आप वहां हैं, आप जानते हैं कि यह क्या है। और यही आपने इस आधुनिक समय में हासिल किया है। जो आधुनिक समय का वरदान भी है कि हम अब जानते हैं कि हम कौन हैं।

तुम हमेशा कहते हो, हम पवित्र आत्मा हैं, कल भी मैंने यह सुना था। क्या आपको यकीन है? कौन सी बात तुम्हे इस का भरोसा देती है कि,  तुम शुद्ध आत्मा हो? मेरा मतलब है कि, आपने अपनी आत्मा को नहीं देखा है, क्या देखा है? आपने खुद को नहीं देखा है जो आप हैं। फिर तुम कैसे कहते हो कि, तुम पवित्र आत्मा हो? यह बस आप कुछ कह रहे हैं, क्योंकि मैं ऐसा कह रही हूं। लेकिन तुम शुद्ध आत्मा हो, क्योंकि शुद्ध आत्मा का जो भी वर्णन दिया हुआ है कि, वह ईश्वरीय शक्ति के प्रति जागरूक है। यह ईश्वरीय शक्ति से अवगत है और इसी तरह आप शुद्ध आत्मा हैं। क्योंकि अपने व्यक्तित्व के शुद्ध आत्मा स्वरूप से ही, आप इस सर्वव्यापी शक्ति के प्रति जागरूक हो सकते हैं। यह सभी शास्त्रों में, सभी धर्मग्रंथों में, हर जगह लिखा है। और जो तुम अपने बारे में जानते हो कि तुम आत्मा हो क्योंकि, आप अपने चक्रों के बारे में जानते हैं। आप अपनी नाड़ियों के बारे में जानते हैं।

अब जो हुआ है कि आप खुद से अलग हो गए हैं और आप खुद को देख सकते हैं। आप अपने आप को बहुत स्पष्ट रूप से देखते हैं और आप स्वयं को वर्तमान और भूत और भविष्य के रूप में देखने लगते हैं। अतीत में, जो मैं था, तुम देखो तुम चौंक गए हो, हे भगवान, मैं ऐसा था। आप इसे इस वर्तमान स्थिति के माध्यम से देखते हैं, वर्तमान स्थिति में आप देखते हैं। तब तुम उसे भूलना शुरू करते हो, अतीत को भूल जाएँ, अतीत को भूल जाते हैं। फिर भी आपके पास भविष्य है, फिर आप भविष्य के बारे में सोचने लगते हैं। पहला भविष्य वे अपने बच्चों, अपनी पत्नियों – सहजयोगियों के बारे में भी सोचते हैं। मेरे बच्चों का क्या होगा, मेरी पत्नी का क्या होगा? तब वे सोचते हैं, सहज योग का क्या होगा? फिर वे सोचते हैं कि माताजी का क्या होगा? वे भी सोचते हैं कि इस दुनिया का क्या होगा? क्योंकि आपकी जागरूकता का विस्तार हुआ है। अब आप सीमित दायरे में नहीं हैं। आप अपने बच्चों के बारे में सोच सकते हैं, आप अपनी पत्नी के बारे में सोच सकते हैं, आप पूरी दुनिया के बारे में भी सोच सकते हैं और दुनिया की सभी समस्याओं के बारे में सोच सकते हैं।

तो आप उस अवस्था में पहुँच गए हैं, ठीक है – उस अवस्था तक हम हैं। अब वह कौन सी चीज है जो इस सब को शामिल कर लेती है, या आपको समाधान देती है, जैसे, आपके बच्चों के लिए, आपके परिवार के लिए, आपकी पत्नी के लिए, सभी के लिए – समाधान क्या है? आपकी माँ केवल समस्याएँ ही नहीं, समाधान भी देने में विश्वास करती हैं। क्योंकि, इन दिनों, वे समस्याएँ अब मौजूद नहीं हैं जो नवरात्रि में थीं – कि आप अपने हाथ में तलवार ले सकते हैं और जाकर किसी को मारें – नहीं, ऐसा नहीं है, यह संभव नहीं है।

तो, आज की समस्याएं जैसी हैं, जैसा कि हम देखते हैं, हमारे अंदर, हम समस्याओं को देखते हैं, हम इसके बारे में जागरूक हैं और हम इसके बारे में कुछ करना चाहते हैं। चाहे हम अतीत में हों, वर्तमान में हों या भविष्य में, हम समस्या देखते हैं। तो अब उपाय क्या है? हमारे पास कोई हथियार नहीं है, लड़ने के लिए कुछ भी नहीं है। हम यह भी नहीं जानते, बहुतों को तो यह भी नहीं पता कि हाथ में तलवार कैसे पकड़नी है। और बहुत से लोग इसे पकड़ना भी नहीं चाहते हैं क्योंकि वे इतने करुणामय हैं, करुणा के सागर में बहुत अच्छे से आनंद ले रहे हैं। वे अपनी करुणा और दूसरों की करुणा, अपनी माता की करुणा का आनंद ले रहे हैं। लेकिन फिर समस्या का समाधान कैसे करें? समस्या का समाधान किया जा सकता है यदि आप स्वयं अपने भीतर वास्तव में शक्तिशाली बन जाएं। आपका चित्त कहाँ है? आपको अंदर की ओर गति करना होगा। आपका चित्त कहाँ है? आपको बहुत शक्तिशाली बनना है। मैंने अपना काम किया है, मैंने तुम्हें आत्मसाक्षात्कार दिया है, तुम इतने विकसित हो गए हो। मैंने तुम्हें समझाया है, इस बार मैंने तुम्हें सब कुछ बता दिया है। मैंने तुम्हें ढेर सारा प्यार दिया है, प्यार का सागर, मुझे कहना चाहिए, जैसा कि आप इसे कहते हैं, जो भी हो। लेकिन अब तुम्हें अपना पोषण करना है, तुम्हें अपने भीतर शक्तिशाली बनना है।

तो आप किस तरीके से शक्तिशाली बन सकते हैं? पहले आपको विश्वास होना चाहिए कि आपने अपने मानव व्यक्तित्व को पार कर लिया है और अब आप एक अतिमानव बन गए हैं। सबसे पहले यह आना ही चाहिए, इसे ही हम आस्था कहते हैं। यह श्रद्धा झूठा विश्वास नहीं है, यह अंध विश्वास नहीं है कि आप किसी चीज में विश्वास करते हैं, बल्कि यह एक सच्चाई है। मैंने, सौ बार, मैंने तुमसे कहा है, कि तुम्हें सबसे पहले अपने उत्थान में, सहजयोगियों के रूप में अपनी स्थिति में श्रद्धा रखना होगी। इसके लिए ध्यान बहुत जरूरी है, बहुत जरूरी है। ध्यान के बिना आप स्वयं पर पूर्ण श्रद्धा  नहीं कर सकते। क्योंकि “मैं कौन हूँ” कहकर आप स्वयं को नहीं जान सकते? तुम नहीं कर सकते। अब आप यह प्रश्न पूछने का प्रयास करें – मैं कौन हूँ? तुम खो जाओगे।

तो फिर आस्था क्या होनी चाहिए, क्योंकि जब आप यह सवाल पूछते हैं कि “मैं कौन हूं?”, तो आप खो जाते हैं। तो, आप एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाते हैं जहाँ मुझे आपको बताना होता है कि श्रद्धा मानसिक नहीं है, यह भावनात्मक नहीं है, यह भौतिक नहीं है, बल्कि यह आपके अपने अस्तित्व  की एक अवस्था है जिसे हम आध्यात्मिक अवस्था कह सकते हैं। आध्यात्मिक अवस्था में, कुछ भी आपको परेशान नहीं कर सकता, कुछ भी आप पर हावी नहीं हो सकता, कुछ भी आप पर हावी नहीं हो सकता, क्योंकि वह अवस्था यदि आपके पास है, अर्थात आप वास्तविकता के अभिन्न अंग हैं, तो आप परमात्मा के राज्य के सम्मानित सदस्य हैं। तब आप सबसे सम्मानित व्यक्तित्व हैं। तब तुम देवता के समान हो, फिर तुम गण के समान हो। उस अवस्था में, जब आप होते हैं, यह एक अवस्था होती है, मैं फिर से कहती हूँ, मानव अवस्था से परे, आप अत्यंत शक्तिशाली हैं।

भारत में एक महान सूफी निज़ामुद्दीन के बारे में एक कहानी है। एक भयानक राजा था, मुझे लगता है कि गॉडशाह, उसने खुद का नाम रखा था| और वह निज़ामुद्दीन, उन्होंने जाकर उसे बंदगी नहीं किया और वह बहुत क्रोधित हुआ | पर उन्होंने, “मैं केवल परवरदिगार को नमन कर सकता हूं” और किसी को नहीं। इस शाह ने कहा, “अगर तुम कल आकर मुझे बंदगी  नहीं करोगे, तो मैं तुम्हारा गला काट दूंगा”। और उसी रात इस राजा का गला काट दिया गया। यह एक कहानी है, लेकिन यह एक वास्तविक कहानी है। किसी ने आकर उसका गला काट दिया, वह निजामुद्दीन साहब नहीं थे, वह ऐसा नहीं करते थे। तो उस अवस्था में, यदि आप पहुँचते हैं, जिसे हम कहते हैं, वह श्रद्धा की अवस्था है, श्रद्धा की एक अवस्था है जो प्रबुद्ध, प्रबुद्ध आस्था है। यह एक नए प्रकार का तंत्र है। अर्थात् तुम समग्र के अंश बन जाते हो; इसका मतलब है चाँद, तारे – तुम देखो। मैं तुमसे कहती हूं, मैंने सूरज से कभी नहीं कहा कि उसे पूजा के लिए उपस्थित होना चाहिए – पिछली बार, इस बार – मैंने उसे कभी नहीं बताया, बताने की कोई जरूरत नहीं है, सब कुछ हो गया है। मैं इन सभी चैतन्य को क्रॉस बनाने या इन सभी चमत्कारी तस्वीरों को दिखाने के लिए नहीं कहती, मैं उन्हें नहीं बताती, बताने की कोई जरूरत नहीं है। वे इसे बस अपने आप ऐसा करते हैं, मुझे कभी-कभी आश्चर्य होता है कि उनके पास अपने स्वयं के कैसे सरल तरीके हैं, वे चीजों को कैसे प्रबंधित करते हैं, मैं खुद हैरान हूं। मैंने उन्हें यह नहीं बताया कि जिन दो व्यक्तियों को इस पुरस्कार के लिए चुना गया था, उनकी हर समाचार पत्र द्वारा इतनी निंदा की जानी चाहिए।

यह सब स्वचालित रूप से काम करता है, यह बस काम करता है। केवल एक चीज, अगर मेरे पास कुछ है, बस पूर्ण, पूर्ण आस्था है कि मैं उस अवस्था में हूं और इसलिए पूर्ण धैर्य है – सबूरी। पूर्ण धैर्य। और यही हमें सीखना है। यह सब किसी भी हाल में होगा, क्योंकि आप सब उस अवस्था में हैं। केवल ध्यान महत्वपूर्ण है, बहुत महत्वपूर्ण है। मेरे लिए नहीं, आप सबके लिए। अगर आप सभी अभी ध्यान कर सकते हैं, तो हर दिन सिर्फ 10 मिनट के लिए, यह आपकी बहुत मदद करेगा। अब हमारे पास ये सभी मूर्तियाँ क्यों हैं? – माता, हनुमान, और गणेश, क्राइस्ट। क्योंकि शुरू से ही मनुष्य ऐसी किसी भी चीज़ को नहीं समझ सकता जिसका कोई रूप न हो। वे तब तक गहरे नहीं जा सकते जब तक कि कोई रूप न हो। लेकिन वे किसी भी पत्थर का उपयोग करने के एक और चरम तक चले गए, कोई भी वस्तु को ईश्वर स्वरूप मानने में। लेकिन अब आपके पास विवेक है, आप जानते हैं कि किसकी पूजा करनी है, किसको उच्च व्यक्तित्व के रूप में माना जाना है, जो आप जानते हैं। लेकिन इससे पहले, वे सभी प्रकार के लोगों की पूजा करते थे – जैसे अब लोग पोप की आराधना करते हैं, आप जानते हैं कि, बहुत अच्छी तरह से। लेकिन अब क्या करें, वे न केवल अंधे हैं, वे न केवल अनजान हैं, बल्कि उन्हें इसका होश भी नहीं है। वे उस स्तर पर हैं जहाँ आप उन्हें बता भी नहीं सकते हैं|

तो आप एक नए प्रकार के लोग हैं, मुझे कहना चाहिए, जिन्होंने इससे लड़ने, इससे संघर्ष करने, पूर्ण सत्य के बारे में जानने की कोशिश की है। जब तक आप पूर्ण सत्य को नहीं जान लेते, तब तक आप कहीं नहीं हैं, आपके पास कोई विवेक नहीं है, आपके पास कोई समझ नहीं है, आपके पास कोई ज्ञान नहीं है। लेकिन एक बार जब आप पूर्ण सत्य को जान लेते हैं, तो आपको किसी भी तरह से आधे इधर आधे उधर नहीं होना चाहिए। यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है। जैसे, एक बीज अंकुरित हुआ है, वह न बीज है और न ही वृक्ष। अगर यह विकसित नहीं होता है, तो यह बेकार है। आपकी जागरूकता के साथ ऐसा होता है, मैं फिर से आपकी चेतना, जागरूकता की बात कर रही हूं – और तब आप न तो यहां हैं और न ही वहां हैं।

कई लोग हैं जो सहज योग में आते हैं, शायद कुछ शांति पाने के लिए। लेकिन मुझे पत्र मिलते हैं, मेरे पिता बीमार हैं, मेरी मां बीमार है, मेरी बहन बीमार है और फिर नहीं तो मेरा पति मुझसे लड़ रहा है, मैं तलाक मांग रहा हूं या तीसरा मैंने अपना सारा पैसा खो दिया है, मेरे पास कुछ पैसे होना चाहिए । चौथा, मैं एक महान कलाकार हूं, लेकिन मेरी कला नहीं बिक रही है। ये सारी बेवकूफी भरी समस्याएँ वे लाते हैं। मेरे बच्चे अच्छे नहीं हैं, वे दुःख दायी हैं, फिर मेरी पत्नी मुझसे लड़ रही है, मेरी माँ मुझसे लड़ रही है, भाई मुझसे लड़ रहा है। अब मैंने कहा, ये किस तरह के सहजयोगी हैं?

वास्तविकता के साथ एकाकार होने की स्थिति का अर्थ है कि पूरी वास्तविकता आपके चरणों में है, यह पूरी आपके लिए काम करती है। अब एक बार तुम उस अवस्था की एक झलक भी देख लेते हो,  मैं तुमसे कहती हूं, तुम अपने भीतर कितने शांत हो जाते हो। अगर तुम कहते हो कि मैं राजा हूं, मैं राजा हूं। अगर तुम कहते हो कि मैं भिखारी हूं, मैं भिखारी हूं। उस अवस्था को क्या फर्क पड़ता है, जो सबसे शुद्ध सोने के समान है, जिसे कलंकित नहीं किया जा सकता है। ऐसी मनोस्थिति हमें विकसित करनी होगी, यह हमारे लिए बड़ी चुनौती है। हम सहजयोगी हैं – ठीक है, हमें आत्मसाक्षात्कार हो गया है – ठीक है, हम बहुत अच्छा गा सकते हैं – ठीक है, हमने अच्छी स्थिति हासिल की है – ठीक है, हम अच्छी तरह से विवाहित हैं – ठीक है, हमारे अच्छे बच्चे हैं, हमारे पास सब कुछ है, हमें नौकरी मिल गई, यह, वह – अब। अचानक एक नकारात्मक शक्ति आपको परेशान करने के लिए आती है – तो क्या? तो क्या हुआ? नहीं तो तुम्हें कैसे पता चलेगा कि तुम क्या हो? अगर अंधेरा नहीं है, तो आप कैसे जानेंगे कि आप प्रकाश हैं? यह आपकी अपनी अवस्था के लिए एक चुनौती है कि आप किस अवस्था में हैं। अवस्था शब्द इतना व्याख्यात्मक नहीं है, संस्कृत में यह स्वरूप है। स्वरूप। स्व स्वयं है और रूप रूप या अवस्था है। यह अवस्था प्राप्ति आप सभी के लिए यह कहकर संभव है कि – “यह नहीं, यह नहीं, यह नहीं, यह नहीं”। वैसे भी आपका ‘मन’ उस स्थिति में पहुंच गया है कि ‘मन’ नहीं है, आप ऐसा कर सकते हैं। लेकिन आपको एक ऐसे व्यक्तित्व का विकास करना होगा जिसे यह अहसास हो कि,  आप क्या हैं। लेकिन उस बोध में, तुम उसके प्रति केवल जागरूक होते हो, उसके प्रति सचेत नहीं होते।

मैं हूँ, उदाहरण के लिए, मैं ऐसी ही हूँ। मुझे पता है कि मैं आदि शक्ति हूं, मैं जागरूक हूँ, मुझे पता है, लेकिन जब आप “माताजी” कहते हैं, तो मैं भी “जय श्री माताजी” कहती हूं – मैं यह भूल जाती हूं कि मैं वही हूं जिसके बारे में आप बात कर रहे हैं। वास्तव में यही अवस्था होना चाहिए कि,  आप जागरूक हैं, हाँ, आप इस अर्थ में जागरूक हैं, मुझे नहीं पता कि कैसे कहना है, लेकिन मुझे पता है कि मैं वह हूं। यदि आप मुझसे पूछें “माँ, क्या आप आदि शक्ति हैं?” मैं कहती हूं, “हां, मैं हूं”। क्योंकि मैं जानती हूं कि मैं हूं। लेकिन जब आप “जय श्री माताजी” कहते हैं, तो मैं भूल जाती हूं कि मैं आदि शक्ति हूं और मैं आपके साथ “जय श्री माताजी” भी कहती हूं। मैं भूल जाती हूं, और मुझे बताना पड़ता है, “नहीं, नहीं, आप ऐसा नहीं कह सकती”। यह बहुत दिलचस्प  है। अब तुम मुझे यहाँ रानी की तरह बिठाते हो और मुझे उपहार देते हो, यह चीज़, वह चीज़ – ठीक है। वह आपका विचार है। लेकिन मेरे लिए, आप देखिए, मैं अपने आप में पूर्ण हूं – मुझे ऐसा लगता है। (हिंदी) मैं अपने आप में खो गयी हूँ। ठीक है आप ऐसा करते हैं, ठीक है, अगर आप ऐसा करते हैं, भले ही आप इसे नहीं करते हैं, यह ठीक है। मेरे लिए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, इससे आपको फर्क पड़ सकता है, लेकिन मेरे लिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसे, मैं कहती रही हूं, अब मुझे कोई उपहार मत दो, मुझे कोई उपहार मत दो, इन सभी दिनों में। तो एक ही तर्क है कि पूरे साल हम आपको एक ही बार देते हैं, तो आप क्यों विरोध करें, क्योंकि आप हमें खुशी देती हैं। ठीक है अगर आपको लगता है कि यह आपको आनंद देता है, तो आप इसे कर सकते हैं, लेकिन मेरे लिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि, मुझे नहीं लगता कि मैं वहां हूं। मैं तुम्हें यहाँ बैठे हुए देख रही हूँ, ठीक है, वे सब साक्षात्कारी आत्माएँ हैं, ठीक है। लेकिन मैं आप ही में से एक हूं। मुझे नहीं लगता कि मैं बहुत खास हूं। लेकिन अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मैं कहूंगी, ठीक है मैं आदि शक्ति हूं। लेकिन मुझे नहीं लगता कि आदि शक्ति भी बहुत विशेष है। क्योंकि मेरे पास मन नहीं है, परन्तु अन्यथा मुझे नहीं लगता कि मैं कोई खास हूं। क्योंकि कोई कुछ है, तो क्या। अब मान लीजिए, सूर्य ही सूर्य है, तो क्या, वह सूर्य है। अगर कोई आदि शक्ति है, तो वे आदि शक्ति हैं, तो क्या। लेकिन आपके लिए यह श्रेयस्कर है, क्योंकि आप साक्षात्कारी रूप में पैदा नहीं हुए थे। आपको अपना आत्मसाक्षात्कार हो गया है, इसलिए आप विशेष हैं, आप महान हैं, आपने कुछ हासिल किया है। मैंने कुछ हासिल नहीं किया है, मैं ऐसी ही रही हूं और मैं ऐसे ही रहूंगी। चाहे मैं शैतानों से लड़ूं, या तुम्हारे सामने बैठूं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं ऐसी ही रहूंगी। लेकिन मेरे लिए आप महान हैं क्योंकि आपने इसे हासिल किया है।

आज इस नवरात्रि के दिन आपको देखना, इतने सारे लोग मेरी पूजा करने बैठे हैं। इतने सारे लोग यहाँ हैं, इतने सहजयोगी, यह इतना उल्लेखनीय है, यह मेरी उपलब्धि नहीं है, मैं आपको बताती हूँ। यह तुम्हारी चाहत (खोज़) है। क्योंकि मैं इस धरती पर पहले भी कई बार आ चुकी हूँ – यह तो आप जानते ही हैं। लेकिन हमारे पास ऐसा कभी नहीं था, इतने सारे आए और सूली पर चढ़ाए गए, मर गए, यह, वह – लेकिन मेरे पास इस क्षमता के लोग कभी नहीं थे।

तो फिर हम उसी बिंदु पर आते हैं, कि हमें अपने बारे में जागरूक होना चाहिए – अपने आप में पूर्ण श्रद्धा। अगर आपके पास खुद के प्रति कुछ श्रद्धा है, तो आपके पास मेरे लिए भी श्रद्धा होगी। क्योंकि हम अलग नहीं हैं। अगर आप मानते हैं कि यह पानी है, तो हर जगह पानी है तो मैं मानती हूं कि यह पानी है, है ना। क्योंकि मैं जानती हूं कि यह पानी है, इसलिए दुनिया में जहां कहीं भी पानी है, मैं जानती हूं कि वह पानी है। तो अगर आप जानते हैं कि आप एक सहज योगी हैं, कहीं भी एक सहज योगी है, तो आप जानेंगे कि एक सहज योगी है, वह एक सहज योगी है। लेकिन जहां तक ​​आपका संबंध है आप भूल जाते हैं कि आप कितने महान हैं और आप कहाँ तक आ गए हैं। मुझे आप पर बहुत गर्व है, आप नहीं जानते, लेकिन चूँकि मैं एक विनम्र शख्सियत हूं, मुझे नहीं पता कि कैसे दिखावा करना है। तो मेरे इतने अच्छे बच्चे हैं, इतने सारे, इतने प्यारे, वे भक्त जिनके लिए उसने इतने सारे राक्षसों का वध किया और वह सब। वे आपके जैसे नहीं थे , आप बहुत बेहतर हैं, बहुत अधिक उच्च गुणवत्ता वाले हैं। लेकिन इस बारे में आपको जागरूक  होना चाहिए कि आप ऐसे लोगों की तरह व्यवहार नहीं करें जो बहुत ही अल्प विकसित प्रकृति के थे, आप बड़े हो गए हैं, आप समृद्ध हो गए हैं और अब फल बन गए हैं यह हम देख सकते हैं।

मुझे नहीं पता कि वास्तव में आपके लिए क्या करना है, लेकिन अपने आप में विश्वास रखें, तो आप देखेंगे कि आपको वास्तविकता में कितना विश्वास होगा। कि वास्तविकता हर कदम, हर पल आपके साथ है। कोई डर नहीं, कोई उपलब्धि की भावना नहीं, कुछ भी नहीं। अब सब हो गया, खत्म। जब 5 सहजयोगी थे, तब मैं प्रसन्न थी था, जब इतने सारे हैं, तो मैं प्रसन्न हूँ। लेकिन जब मैं इतने सारे लोगों को देखती हूं, तो मुझे लगता है कि इतनी सारी शक्तिशाली शख्सियत हैं जो वास्तविकता के साथ एक हैं।

यह सामूहिक एकाकारिता, ऐसा कभी नहीं था। और इसलिए, मैं कहूंगी कि इस दिन, हमें जो करना है वह अपने भीतर के शैतानों को मारना है, बस इतना ही। यदि आप वास्तव में मेरी पूजा करना चाहते हैं, तो आपको यही सोचना होगा कि आपके भीतर कौन से शैतान हैं, बस इतना ही। तो आपको बाहरी शैतानों के लिए चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, वे आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

परमात्मा आप को आशिर्वादित करे!!!