Public Program

New Delhi (भारत)

1996-12-03 Public Program, 45' Add subtitles:
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Public Program Date 3rd December 1996: Place Delhi Public Program Type Speech Language Hindi

[Original transcript Hindi talk, scanned from Hindi Chaitanya Lahari]

सत्य को खोजने वाले आप सभी साघकों को हमारा नमस्कार। तो इस भारत वर्ष में अनादिकाल से सत्य की खोज होती रही है, ये हमारे शास्त्रों से ज्ञात होता है। अनेक मार्गों से हमने सत्य की खोज की। अपना देश एक विशेष रूप से अध्यात्मिक है उसका कारण ये कि अपने देश में बहुत सी बातें सुलभ हैं। हम जानते नहीं कि हमारा देश कितना समृद्ध है और कितना पावन है, और यहाँ के लोग कितने सरल और मलरहित हैं। विदेश के लोगों को हम लोग मलेच्छ कहते थे क्योंकि देखते थे कि ये लोग जो यहां आये इनकी सारी इच्छायें ही मल की ओर जाती थी। हमारे जमाने में, क्योंकि अब तो हम बुड्ढे हो गये हैं; तो ये देखा जाता था कि ये जो लोग बाहर से आये हैं, ये कितने उथले हैं, इनकी सारी दृष्टि कितनी उथली है, इनकी जो इच्छायें होती थी वो कितनी उथली हैं। धोरे धीरे अपने दंश पर भी इस पश्चिमात्य संस्कृति की बड़ी जबरदस्त पकड़ आने लगी। उसका कारण यह था कि तीन सौ वर्ष हुए हमारी खोपड़ी पर ये लोग लद गये और हम लोग धीरे-धीरे ये समझने लग गये कि ये बड़े महान हैं जो हमारे देश में आये हैं और हमारे ऊपर राज कर रहे हैं। वास्तिवकता में इन्होंने सबको बेवकूफ बना-बना कर ही अपना कार्यसाध्य किया। दूसरे कर्मकाण्डों की वजह से अनेक तरह की विचित्र-विचित्र रीतियां-कूरौतियां हमारे समाज में आ जाने के कारण हम लोग संस्कृति विहीन बनते गये। हमारी संस्कृति मिटती गई। विशेषकर उत्तर हिन्दुस्तान में मैं कभी भी नहीं सोच सकती थी कि इतने साधक सामने होंगे। इसका कारण हो सकता है कि पूर्वजन्म के आप बहुत बड़े साधक रहे हों और आपने बड़ी साधना की हो जो आप आज सत्य जानने के लिये आतुर हो गये हैं नहीं तो हर तरह के धर्ममार्तण्डयों ने, तथा झूठे लोगों ने इतनी गलत-गलत बातें देश में फैला दी थी और उसके पीछे इतने लोग लग गये थे। आज ऐसा समय आ गया है कि लोग सोचते हैं कि सत्य को ही पाना चाहिये। सत्य की परिभाषा क्या है? जो जानना है वो सत्य क्या है? ये अगर मैं आपको बताऊँ तो आपको विश्वास नहीं कर लेना चाहिये क्योंकि मैं कह रही हूँ। किन्तु इसे परखना चाहिये। सत्य यह है कि आप ये शरीर, बुद्धि, मन, अंहकार और कुसंस्कार आदि नहीं हैं, किन्तु आप स्वयं साक्षात तुम परमात्मा को नहीं पहचान सकते। इसलिये पहले अपने को पहचानना चाहिये, मायने पहचानना जो है वो एक विशेष स्थिति है। आज आप मानव स्थिति में है और मानव स्थिति से आगे और कोई स्थिति ज़रूर होनी चाहिये नहीं तो आजकल का जो हम संसार में उपद्रव देख रहे हैं और जो हर तरह की नष्ट-মष्ट व्यवस्थायें दख रहें हैं तब इसका कोई न कोई ऐसा मार्ग तो होगा ही जिससे मनुष्य का उद्धार हो जाये। उनके उद्धार की बात तो सब साधु-सन्तों ने कही और जितने भी बड़े-बड़े अवतरण हुये उन्होंने कही। फिर वो उद्धार कब होगा और कैसे होगा? सहज प्रणाली की बात मैने कही ऐसी बात नहीं। अनादिकाल से इसे सहज कहा जाता था। जो ये प्राप्त करना है यह है सहज। पर पहले जमाने में एसे-ऐसे लोग हो गये जो गलत रास्ते पर लोगों को ले जाते थे ये किताब पढ़ों तो हो जायेगा, गंगाजी में नहओ तो हो जायेगा, नहीं तो और कुछ उपद्रव करो तो हो जायेगा। ऐसी नानाविध उपकरणों से आच्छादित कर दिया पूरी तरह से ढक दिया, उनके दिमाग में भर दिया। अब जैसे छोटी सी चीज़ है, ‘सत्य नारायण की पूजा’। अब लोग उसमें दिमाग भी नहीं लगाते कि नारायण तो स्वयं सत्यस्वरूप हैं, उसमें सत्य लगाने की क्या ज़रूरत है? अन्धे जैसी ये सारी प्रथायें हमारे यहां होती रहीं। ये हिन्दु घर्म में हुआ ऐसा नहीं, ईसाईयों में इससे भी ज्यादा और उससे भी ज्यादा मुसलमानों में। लकीर की फकीरी जो पकड़ ली उससे उनका उद्धार तो नहीं हो सकता, कभी भी नहीं। लेकिन जो कहा गया है कि तुम्हारे ही अन्दर जो है उसे खोजो, उसको प्राप्त करो उस चीज़ को सब भूल जाते हैं एक तो स्त्रियाचार, ये नहीं खायेंगे, वों नहीं खायेंगे, सर मुंडायेंगे और शरीर पर कुछ कपड़ा नहीं रखेंगे। ये सब करने से हमें परमात्मा प्राप्त होने वाला नहीं। एक सादी-सरल बात को सोचना चाहिये कि परमात्मा आपके पिता हैं, कोई भी पिता चाहेगा कि, मेरा बेटा भूखा मरे और जो पिता के पिता, सारे पिताओं के पिता हैं, जिनसे की पिता का स्वभाव, हम पितृत्व की प्राप्त करते हैं वो परमात्मा ये चाहेंगे कि आप अपने सर मुंडाओ और भूखे मरो! किन्तु मनुष्य धर्म के मामले में सोचता ही नहीं कि जो हम धर्म पालन कर रहे हैं उससे क्या लाभ? उससे हमने क्या प्राप्त किया? हम तो जानते है कि जितने धर्मावलम्बी हैं जो धर्म के लिये बहुत कठिन से कठिन तपस्या-वरगैरह करते है। वो इस कदर गुस्सैल होते हैं कि उनके पास जाना मुश्किल है और अगर जाइये तो कोई लकड़ी-वकड़ी साथ लेकर जाइये क्योंकि उनको तो बात-बात पर गुस्सा आता है। अभी मैने एक पुस्तक में लिखा आत्मास्वरूप हैं। आत्मा क्या है? आत्मा उसी परमात्मा का आप में आया हुआ प्रतिबिम्ब है, वो आप हैं; वो आपको बनना है और बाकी जो कुछ है वो सब व्यर्थ हैं। क्योंकि जब तक आपने अपने को नहीं पहचाना तब तक आप किसी भी चीज़ की यथार्थता (Reality) नहीं जान सकते। मोहम्मद साहब ने कहा है” अगर तुमने अपने को नहीं पहचाना

बड़ी लांच्छना। वो जमाना था उस जमाने में जैसी ज़रूरत थी उन लागा ने वो-वो बात की। पर उनको अदल-बदल करके, ये वो करके आर दूसरी बाते सामने लाकर के और परमाल्मा के नाम पर लड़ना इससे बढ़कर के कोई पाप नहीं। दूसरा को मारना। भगवान के नाम पर पीटना, भगवान के नाम पर। जो परमात्मा क्षमाशील, दयाशील, करुणा की सागर हैं उनका नाम लेकर के एसा दारूण कार्य करना किसी भी धर्म की लाच्छना है। किस चीज़ के लिये लड़ रहे थे, कोई जमीन के लिये लड़ रहा है। ऐसे लॉग जो निराकार में विश्वास करते हैं वो जमीन के लिये लड़ रहे हैं। अरे जब आपका निराकार में विश्वास है तो ये जमीन के लिये लड़ रहे हो? छाड़ो। लेकित ये सब कहने से भी कुछ नहीं होन वाला। जिन्हांने एसा कहा वो निण्फल हुआ। किसी न सुना थोड़े ही, किसी ने माना नहीं। ऐसे भापा हो रह गई, बातं हो रह गई लेकचर ही कि इसका कारण क्या है इसका वैज्ञानक (Scientific) कारण क्या है, वैज्ञानिक कारण ये है कि हमारे अन्दर जो जीन्स हैं उसका (data base) आधार है उसमें तोन चीजं हैं एक तो कार्बोहाइड्रेट, एक नाइटरोजन, एक फास्फीरस। जिस वक्त हमारे अन्दर तपस्विता घुम जाती हैं तब जल-जल कर हमारा पानी खत्म हो जाता है। ये जो पंशियां (Cells) हैं इसका पानी खत्म हो गया। अगर फास्फोरस को आप पानी से निकाल लीजिये ती वो तो भड़क जायेगा ही, और इसलिये लोग भड़क जात हैं । तो इस कदर की तपस्विता बहुत ही शान्ति के विरोध में है क्योकि शारीरिक ही ऐसी क्रिया है। आपने सुना होगा कि पहले जमाने में दुबशा ऋषि थे जो शाप देते थे। उनको सिर्फ शाप देना ही आता था। उन्होंने किसी का उद्धार-वुद्धार किया, मैने सुना नहीं। ये आध्यात्म नहीं है, आत्मा का प्रकाश एक तरफा नहीं चलता चारो तरफ फैलता है और एंसा आदमी अपनी शान्ति में अपने गौरव में शान्त रहता है। ये स्थिति आने के लिये कोई भी चीज छोड़ने की जरूरत तहीं। जो भी कुछ संसार में है वा वहां अपनी जगह है। जैसे ही आप अपनी आत्मा को प्राप्त करेंगे, कुण्डलिनी के जागरण से यह जब घटित होगा तव आप देखेरी कि सब के साथ आपका तदातम्य है। ऐसी-एसी कविताये सुझंगी, इतनी सूक्ष्म, एसी-एसी बातं, दिमाग में आयेगी जो आपने कभी सांचा भी नहीं कभी आपने देखा भी नहीं, कभी आपने गौर भी नहीं किया। आपके व्यान में भी बो चात नहीं आई। इस स्थिति को प्राप्त करने के लिये पहले नानातिध उपचार लोग करते थे. गुरुओं को मानत थे, बहुत कोशिश करते थे पर नहीं बनता था। ये चात बिल्कुल मही है कि कुण्डलिनी का जागरण बहुत कठिन, है। एक बार किसी ने आरी रामदास स्वामी, जो कि शिवाजी के गुरु थे. उनसे पूछा कि कृण्डलिनी का जागरण कितनी दर में होता है तो उनका जवाब था कि ‘तत्क्षण’। उसी क्षण लेकिन लने वाला भी चाहिये और देने वाला भी चाहिये। तो लेने वाले तो मुझे दिखाई दे रहे हैं, सामने बैठे हैं। और ये जमाना एसा आगया इस जमाने में आदमी एक कशमकश में इतना ज्यादा है। ये जमाना ही कलयुग की घोर कलाओ से तरस्त मानव का एक बहुत हो जालिम जमाना है। एक-दूसरे से बैर रखना, एक-दूसरे का तकलीफ देना, एक-दूसरे पर जबरदस्ती करना, वी चाह घर-गृहस्थी में ही, वाहे बाह्य में हो, वो राजकारण में हो कि और किसी भी प्रांगण में हो, ये कार्य होता है। और बहुत से लोगों को ये एहसास ही नहीं होता कि हम गलत काम कर रहे हैं, कि हम किसी पर जबरदस्ती कर रहे हैं या किसी को हम मार रहे हैं पीट रहे हैं । और ये हर एक धर्म में हो रहा है। एसा काई धर्म नहीं जहां मार-पीट नहीं, जहां आफत नहीं और लोग इन बातों को मानने को तैयार नहीं है कि उनका धर्म सारं धमों से ऊचा नहीं है, कोई विशेष धर्म नहीं है। अगर आपका धर्म एसा विशेष है तो क्यों मर रहे हो? क्यों एमसी हालत हो रही है? क्यों तकलीफ में पड़े हो? हमारा घर्म सबसे ऊँचा है? आप अगर कल दूसरे धर्म में पैदा होते तो उस घर्म के लिये आप ये सब बातें कहते। यानि रह गया। लेकिन उसका कोई असर नाहीं। कारण ये कि मनुष्य अंधकार से अज्ञान में पड़ा हुआ है । जग अन्धा” वही बात थी ये दिल्ली, मैं आपसे कहती, में पहले सावती थी यहां सर पटकता बिल्कुल बेकार है। लेकिन उसी दिल्ली में, मरी जीवित अवस्था में में देखती हैं, न जाने किन शब्दो में, अपने आनन्द का वार्णन कर सकती हो इस जगह जहां कण्डलिनी का नाम किसी ने सुना नहीं था, किसी से कुण्डलिनी की बात करो वो कहते थे कि आप Horoscope कुण्डली देखते हैं में अपना Horoscope (कुण्डली) लेकर आता हैँ। सो में कहती थी यहां कसे होंगा? कुछ मालुमात नहीं। लेकिन बाद में मैंने पाया कि यहांकोई पुर्वजन्म के वहत बड़े साधु-संत रहे होंगे, खोजने वाले हॉंगें. एसे बड़े ही कोई धार्मिक लाग होगे जो इस दिल्ली में आ गये और अब उनको ये इच्छा हो रही है कि हम अपनी आत्मा को प्राप्त करं। वां जो उनकी पूर्वजन्म की एक आस थी बो आस जागृत हो गई नहीं तो में समझ नहीं पाती। मेरी शादो दिल्ली में हुई, में तो साचती थी कि है भगवान क्या शहर है यहां तो लोग सिवा कंपड़े के और जंवर के और पैसा के और सत्ता के बात ही नहीं करते। काई बात हो नहीं करते और पूछते ही नहीं। उसी दिल्ली में आज आप लोग अपने आत्मासाक्षात्कार के लिये आये हाए है। ये परग भाग्य है इस देश का। इसका सीभाग्य है, क्योंकि भारतवर्ष एक बहुत महान देश है एक योगभूमि हैं। लेकिन हम इसके बारे में कुछ जानते हो नहीं। जब हम इस देश के बारे में कुछ जानते हो नहीं तो इसमे हम प्रम कैसे करें, इसके प्रति हम जागरुक कसे होंगे ? में लन्दन जैसी जगह में रहती थी, वहां का इंग्लेंड देश इतना सा है उसमें कुछ कहना चाहिये कि हिन्दुस्तान जैसे बहुत कम लोग हैं हरेक आदमी चणा-चण्ा जानता है। हरंक बात मानता है। और वड़े गौरव से वहां कोई है तहीं गौरवशाली, सच बात तो यह है। मैंन किसी से पूछा कि ये तुम कहां से कांच का बर्तन खरीद लाये तो उसने बताया कि वो फला जगह है North में ऐसा है और बेवो फैक्टरी है और उसमें बनता है। मैं हैरान हो गयी वहां पड़ोसी आपस में बात नहीं करते। पर हर आदमी जानता है कि ये दश है। हर एक चीज को जानता है चाहे वो पढ़ा हो, नहीं तब कबीर ने कहा, “कैसे समझाऊँ सव धर्म को लेकर लड़ना ये परमात्मा के लिये बड़ी भारी लांच्छना है। बहुत

हो। एक देवीजी थी देहात में। हम उनके यहां गये वो ये नहीं जानती थी कि रूस (Russia) कहां है, पर लन्दन के बारे में, हालांकि देहात में रहती थी, सारे देश के बारे में, देश क्या है, वो इतना छोटा सा, सारे देश के बारे में एक-एक चीज, एक-एक बात जानती थी और अपने यहां तो हम लोग सब साहब हो गये, रहते हैं हिन्दुस्तान में, या क्या हो गया पता नहीं? किसी के बारे में कोई बात किसी को मालूम नहीं। अड़ोसी-पड़ोसियों की बस बुराई करते थे ये मैं पहले की बात बता रही हूं और कुछ पूछो तो हमें नहीं मालूम। बहुत गुस्से से मैंने कहा भई फलाने कहां रहते हैं? अरे वो क्या क्लर्क हैं क्या? वा तो पता नहीं, वो तो क्लरकों की बस्ती है। तो आप कौन हैं? मैं हैड क्लर्क’ हूं। मैंने कहा ठीक हैं इस प्रकार इतना घमंड लोगों में था, इतना घमंड और जहां-तहां छोटी-छोटी बातों पर सबको बड़ा अपने बारे में मैं ये हूं मैं वो हूं। मैं फलाना हूं, मैं ढिकाना हूँ। पुरानी दिल्ली में, वही हाल नई दिल्ली में! और किस बात का घमंड था सां मुझे मालुम नहीं, लेकिन एक तरह का ऐसा वातावरण था, संभात जिसे कहते हैं, Ilusion, संभ्रात सबको कोई न कोई lusion में बैठा हुआ था। मैं ये हूं, में वो हूं मैं वैसा हूँ । अगर आप पुरानी दिल्ली में जाईये और पूछिये कि फलानी दुकान कहां है? क्यां साहब हमारी दुकान क्या बुरी है? यहां बैठिये आप। अरे भई आप ऐसी बात कर रहे हैं तो कोन बैठेगा? इस कदर करामकश इस कदर आपसी बैर, इस कदर आपसी बुराई! वही दिल्ली आज सुव्यवस्थित होना चाहता है। आपस में प्रम करना चाहता है। उस एकाकारिता को प्राप्त करना चाहिए जो परमात्मा की देन है। इससे आप ही बताइये मुझे क्या लग रहा होगा? बहुत दुनिया देखी है। और इन दिल्ली वालों को मैं हजार बार नमस्कार करती हैँ। अब आप लोग अपनी जिम्मेंदारियां भी समझ ले। आप ऐसे शहर में रहते हैं कि जिससे अपने भारतवर्ष की शीहरत सारी दुनिया में जानी जाती है। दिल्ली में जो कुछ भी होता है वो सारी दुनिया में जाना जाता है। क्या हो रहा है यहां पर? यहां के लाग केसे हैं? एक आदमी अगर सत्य और प्रेम दोनों चीज एक हैं। जिसने सत्य को जाना वा प्रम से ही जान सकते हैं । जैसे आप किसी को प्रिम करते हैं तो उसके बारे में आप क्या जानते हो कि इनको क्या अच्छा लगता है। वया बुरा लगता है। क्या कहना चाहिए और क्या नहीं कहना चाहिए, क्या खाते हैं, क्या पीते हैं, सब चीज आप जानते हैं। उनक बोलने का इशारा क्या है? सब चीज आप जानते हैं। और उसके लिए लगन रहती है। ता जब आप प्रेम से सत्य को जानियेगा तभी वो सत्य है। और अगर आप चाहें कि आप प्रेम को हटा दें तो सत्य बुझ जाएगा, सत्य रह नहीं सकता। क्योंकि सत्य की जो शिखा है उसकी जो दीप्ति है वो प्रेम के ही तेल पर चलती है। और प्रेम का मतलब ये नहीं कि हां भई मैं तो अपनी लड़को से घ्यार करता हूं, मैं लड़के से प्यार करता हूं, में भाई से प्यार करता हैं। मैं घर से प्यार करता हूं, ये प्यार नहीं है। इसके लिए एक शब्द संस्कृत में “निर्वान्य” निर्लेप मायने अलिप्त detached! और आप लांग कहेंगे कि माँ प्रेम अगर निलेप हो जाए तो बहुत सी बातं छूट जाएंगी। ऐसा नहीं है। एक पेड़ की ओर देखिए उसके प्रम की धारा, उसका रस सारं पेड़ में चढ़ता है। हर जगह, उसके मूल में आ जाता है, उसकी शाखाओं में जाता है, पत्तों में जाता है, फूलां में जाता है, फलों में जाता है। लेकिन रुकता नहीं। या तो वो विलीन हो जाता है आकाश की ओर या वापिस पृथ्वी में चला जाता है। वो किसी जगह रुकता नहीं। गर वो रुक जाए तो समझ लीजिए जैसे उसे एक फल पसन्द आ गया या एक फूल वड़ा पसन्द आ गया तो वो पेड़ हो मर जाएगा और फल एल सभी मर जाएंगे। इसलिए जिसका जो देना है उसका वो देना चाहिए। जिसको जो रस देना है बो अपने घर मं गृहस्थी में, समाज में अपने देश में और सारे विश्व में जिसकी जो दना है वो दीजिए। लेकिन उसमें लिपट न जाइये। उसमें लिपटना जो है वो एक तरह से कहना चाहिए जिसे अंग्रेजी obsession कहते हैं चिपकना, अब वी कोई सी भी चीज हो उसमें प्रेम की शक्ति क्षीण हो जाती है बढगी नहीं। कहते हैं उदार चरितणाम वसुधाएव कुटुम्बकम्” सारी वसुधा ही, सारी ध रा ही उसका कुटुम्ब है। ये प्रम की महिमा है। इस प्रेम की महिमा को अगर आपने जान लिया तो आपको आश्चर्य होगा कि आत्मा कं दर्शन से ये घटित होता है, मैंन देखा है कि जब लोग सहजयोग में आते हैं तो सबसे पहले वो देखते हैं कि मरे अन्दर क्या त्रृटियां है? मुझे आकर बताते हैं कि माँ ये देखिये मैं महामुर्ख हूं, मैंने ऐसी-ऐसी मुरखता करी। ये की। मैंने कहा अच्छा अपना confession मझे दे दो, तुम लिख कर रख दो। फिर मैं ऐसा बना, मैंने उसे ठगा, मैंने उससे जबरजस्ती करी। ये सब मुझे बताते हैं। पहले मुझे दिखाई नहीं देता अब तो माना मेरे सामने मेरा ये आत्मा एक शीशा बन कर खड़ा हो गया है और अव मुझे मेरी गलतियां सामने आ रही हैं। और मैं सोचता हूं कि मैं इतना दिल्ली में मर जाए तो सारी दुनिया में शौहरत हो जाएगी पर 25 आदमी और कहीं मर जाएं तो उससे कोई मतलब नहीं। तो इसका मतलब ये तो हो गया कि आप महत्वपूर्ण हैं। और आपका महत्व ये है कि इस देश के प्रतिनिधि हैं इस योगभूमि के इस भारतवर्ष के आप प्रतिनिधि हैं। आज आप आत्मसाक्षात्कार के लिए आए हैं या बहुतों को हो भी गेया होगा। किन्तु ये समझ लेना चाहिए कि जो-जो आत्मसाक्षात्कारी हैं उनका अपना-अपना एक विशेष स्थान होता है। और दिल्ली बालों का भी एक विशेष स्थान में मानती हूँ कि राजधानी में आप बैठे हैं और इस राजधानी में जो आत्मसाक्षात्कारी हों जो आत्मा को प्राप्त करें, उनके अन्दर एक विशेष वैभवशाली शक्ति का प्रदर्शन होना चाहिए। और वो वैभवशाली शक्ति है प्रेम और सत्य। सत्य और प्रेम दोनों एक हैं। जब आप सत्य को जानंगे तो आप अपने आप ही शान्त हो जाएंगे। जब आपने सत्य को जान लिया तब फिर विक्षुब्ध होने या disturb होने की कौन सी बात है? कुछ भी नहीं। क्योंकि आप जानते हैं सत्य क्या है। पर खराव था। तो मैंने कहा अच्छा जो हो गया सौ बीत गया। भूतकाल ता है नहीं, छोड़ो उसे खत्म हो गया अब वर्तमान में तुम खड़े हो। वा सब स्वच्छ हो गया और जिस तरह से कमल गंदै पानी से निकल कर सुरभित होकर ऊपर आ जाता है और सारे वातावरण को सुरभित करता

आया था कि एक शान्ति के दूत को मार डाला। आंखों में आंसू। कहां वो इन्होंने उन्हें कभी देखा भी नहीं, जाना भी नहीं कौन था, कौन नहीं। है उसी प्रकार अब तुम हो गये। भूल जाओ। इसलिए जो गत है जो भूत है उसे भूल जाओ। पर वो भूल ही जाता है बाद में। धीरें-धीरे उसकी प्रगति होती है तो भूल जाता है। मैं Russia में थी, तब वहां coup (राज्यविप्लव) हुआ, तो मैंने सहजयोगियों से कहा कि अरे तुमको कोई घबराहट नहीं हो रही, तुम्हारे यहां कू हुआ हैं पता नहीं कोन राज्य में आये, क्या हो! कहने लगे माँ हम तो परमात्मा के साम्रान्य में वैठे हैं, हमको क्या डरना? साफ कह दिया उन्होंने। हम तो परमात्मा के साम्राज्य में बैठे हैं। ये एक स्थिति है, ये बकवास से नहीं होता। लोग बड़ी-बड़ी बातें करेंगे, ये करेंगे वो करेंगे ऐसे नहीं। सबसे बड़ा गुण मनुष्य में जो आता है कि वो निर्भयता से अपने को देखता है, उसको भय नहीं लगता। वो ये नहीं सोचता कि मैं ये कैसे सोचू कि मैं क्या हूँ। क्योंकि वो अपने से अलग हटकर है। वो जो पुराना था वो उतर गया, और अब नया सामने आ रहा है, और ये जो नया जीव सामने आ रहा है ये अल्यंत सुन्दर है और गौरवशाली है। स्वाभिमानी है। ये नहीं कि ये अपने को सबके पर अखबार में पढ़ा होगा। इस प्रकार एक सारे ही विश्व के साथ तदात्मय। विश्व का जो आत्मा है’ विश्वात्मा ‘ उससे एकाकारिता वटित होती है। और जो वो आत्मामुखी है वही मनुष्य अपने अन्दर महसूस करता है। ऐसा वो विशाल हृदय हो जाता है। उसको अपनी छोटी-छोटी बातें, छोटी-छोटी यातनायें नहीं समझ आतीं। वो ये नहीं सोचता कि मुझे ये तकलीफ है, ये परेशानी है, बिल्कुल नहीं सोचता। उसको लगता है कि ये विश्व के प्रश्न कैसे ठीक होंगे? ये विशालकाय हैं। और फिर ऐसे आदमी के अन्दर शाक्ति आ गयी, वो भी परमात्मा की शक्ति। जब वो ये सोचने ही लग गया, वो प्रश्न भी ठीक हो जाता है। उसकी इस विशालता से वो प्रश्न भी अपने आप हल हो जाता है। यहुत से लोगों को मैंने देखा है कि माँ देखिये ऐसा हुआ एक बार कि हमें बड़ा प्रश्न पड़ा कि फलाने देश में ऐसी लड़ाई हो गई। तो हम लोगां ने सोचा कि प्रार्थना करे, ध्यान (Meditate) करें, कुछ करें, इच्छा करें ता दूसरे दिन अखबर में आया कि सब शानि्ति हो गयी अब कोई विश्वास नहीं करेगा कि एसा कोई कर सकता है। लेकिन क्यों नहीं विश्वास चरण-छू महाराज बने, ये बात नहीं। इसमें अपना स्वाभिमान है और उस स्वाभिमान में जो स्व है वही आत्मा है। इसी ‘स्व’ के तन्त्र को जानना ही सहजयोग है। जिसने इस स्व के तन्त्र को जाना वही स्वतं्र करता मनुष्य? क्यांकि मनुष्य अपनी विशालता को अपने बड़प्पन का जानता नहीं। जब तक उसमें अपने को पहचाना नहीं, वो अपना बड़प्पन केसे जानेगा? वो कैसे जानेगा कि वो क्या चीज है, उसकी गरिमा क्या है और उसकी शक्तियां क्या हैं। आत्मदर्शन के बाद ही आपको ये सब हो जाता है। स्व का तन्त्र का मतलब ये कि अपने आत्मा के तन्त्र को जानना। अभी तक तो हम इस बुद्धि से या अपने संस्कारों से, पढी हुई बातों से चिपके हुये थे। अब हमारे अन्दर आत्मा का जागरण हो गया है और उस जागरण से हम सब कुछ स्पष्ट देख रहे हैं पहले तो अपने को देखिये, फिर अपने समाज को देखिये। अब हमारे यहां बहुत से लोग हर एक घर्म से आये हैं, मुसलमान है, हिन्दु हैं, इसाई हैं, बौद्ध हैं, महावीर के लोग हैं, सब तरह के लोग इस सहजयोग में आये हैं। और सबसे पहले मैने ये देखा कि उन्होंने अपने समाज के बारे में मुझे बताया । जैसे कोई जैनी आये तो उन्होंने बताया माताजी ये जैनियों का दिमाग ठीक करो। कोई सिक्ख आये तो उन्होंने बताया भई सिक्खों का दिमाग ठीक करो। कोई ईसाई आये तो उन्होंने कहा कि मां इन ईसाईयों को कब ठीक करोगी आप? हर एक में मैने ये चीज़ देखी कि फौरन वो अपने से हटकर के अपने समाज को देखने लगते हैं, अपने घर को देखने लगता है, फिर देश को देखने लगते हैं और फिर पूरे विश्व को, सारे नोबल प्रश्नों को लेकर के वो उलझ जाते हैं कि मां अब ये प्रश्न है। अब वहां ये हो रहा है। आपको कुछ न कुछ करना होगा। आपको देखना होगा। मैने कहा कि अब तुम पूरे दुनियाभर की परेशानी मुझ पर डाल रहे हैं। आप ही कर सकते हैं इसको आप करिये, आपको ठीक करना है। ये आदमी ठीक नहीं उसको ठीक करिये। इस तरह से उलझ गये, किस चीज़ में कि जो सारे विश्च का प्रश्न है बताईये एक सर्वसाधारण मनुष्य, एक खेतीहर है वो सिर्फ अपनी खेती की बात करें तो समझ में आता है, पर वो भी देखकर के कहने लगा कि अच्छा ये राबिन को मार डाला इन लोगों ने। क्यों मार डाला? मां आप इनकी शान्ति के लिये कुछ करें। इनकी शान्ति का ठिकाना लगाओ मै हैरान हो गई कि इसने कहा से पढ़ा। क्या अखबर में आया था? अखबार में प्राप्त हो सकता है। कुण्डलिनी के बारे में तो आप जानते हैं, चक्रों के बारे में भी आप जानते हैं कि क्या है। चक्रों के जागरण से क्या अभिव्यक्ति होती है। अभी अगर हम ये बात करें कि इसमें ये तंदरुस्ती अच्छी होती है उससे वो तंदरुस्ती अच्छी होती है तो लोग कहेंगे कि आप क्या अस्पताल खोलें बैठी हैं? सिर्फ अपनी तंदरुस्ती अच्छी करना ये सब सहजयोग का कार्य नहीं है। ये जमाने अब गये पहले जो आता था वो अपने दूर-दूर के सम्बन्धियों को रोग मुक्त करने को कहता था। फलाना शराब पी रहा है उसे आप ठीक कर दो। अब वो नहीं रहा। अब मुझे हैरानी होती है कि मनुष्य कितना विशाल हो रहा है इस देश में । इस विशालता का प्राप्त कर रहा है। अब आप ही सोचिये एक जमाने में इस देश में ऐसे लोग थे, ऐसे मनन करने वाले थे, ऐसे द्रप्टा लोग थे जो विश्व के प्रश्न को लेकर चलते थे। छोटे-छाटे ओछे सवालों के पीछे नहीं दौड़ते थे। अब इन लोगों की आप व्याख्यायें सुने, इन लोगों का दर्शन ले तो इसी देश में ऐसे महान लोग हो गये जिन्होंने हमेशा महान बातें सोची, महान कार्य किये। अब हम लोग पता नहीं कैसे, किस गर्त में फंस गये हैं। कि उस महानता को असंभव समझते हैं। हो ही नहीं सकता। हम ऐसे कैसे हो सकते हैं? क्यों नहीं? वो जो एक जमाने में लोग थे जो लोग एक जमाने में इन अंग्रेजों से लड़ सकते थे, जिन्होंने देश के लिये इतना त्याग किया, क्या आज हमारे देश में वापिस नहीं आ सकते? वां और कौन से देश में जायेंगे, जिन्होंने इतना प्यार किया वो क्या इस देश में

स्वरूप हो जायेंगे। उसके लिये ध्यान करना और ध्यान में उतरना होगा। उथलेपन से सहजयोग नहीं किया जा सकता। इसका मज़ा तब आता है जब आप आध्यात्म में डुबकियां लगाते हैं। उसमें पेर गहरे बैठ जायें, तभी आपको सहज का मजा आयेगा और तभी आप समझ जायेंगे कि आप क्या हैं, और आप कितने विशाल हैं। और सब होते हुये भी अन्दर से आप में एक तरह कि ऐसी शान्ति और समाधान विराजमान रहेगा कि उस शक्ति के द्वारा ही आप अपने चित्त से ही चीज़ ठीक कर सकते हैं। ये मैं आपको बता सकती हूँ कि आपका चित्त ही इतना सुन्दर हो जायेगा कि उस चित्त का जहां भी ध्यान जाये उस चित्त से आप बहुत सी चीजें ठीक कर सकते हैं। तो थोड़ा सा अपने संकीर्ण वातावरण से निकलकर, अगर आपको और ऊँची दशा में लाना है, ध्यान धारणा ज़रूर करें। ध्यान ही से सब चीज़ व्यवस्थित होती है। अब ये ही बात है कि हसमे लोगों ने कहा कि आदमी लोग तो त्याग किया, देश के लिये फिर से जन्म नहीं ले सकते ? जिन्होंने इतना बहुत सारी यातनायें सहीं, देश के लिये, आज वो लोग फिर सहजयोग में से जागृत होंगे। मुझे पूर्ण आशा है कि वो अपने देश को प्यार करेंगे और देश की व्यवस्था ठीक करेंगे, शान्ति, अमन आदि सब चीजें लायेंगे। उसके बाद जब ये देश ठीक हो जायेगा तो और भी देश देखा-देखी ठीक हो जायेंगे। हमारे सामने तो विश्व के प्रश्न है हीं, किन्तु ये सोचना है कि इसमे कौन-सा देश अगुआ होता है। कौन सा देश इसका झण्डा उठाता है। कौन से देश के लोग ये कहते हैं कि हम एक ऐसा आदश देश बना कर दिखायेंगे, जहां लोग ऊँचे, आध्यात्मिक स्तर पर, हमारे सहजयोग आध्यात्म का ये मतलब नहीं कि बीवी को छोड़, बच्चों को छोड़ और जंगल में भाग विल्कुल भी नहीं। अपने ही अन्दर अपने दर्शन करके इस उच्च स्थिति को प्राप्त करना, इस विशेष स्थिति, जो हमारे लिये बनी हुई है, जिसे हम प्राप्त कर सकते हैं ऐसी कोई कठिन बात नहीं, ऐसा कोई त्याग भी किसी चीज़ का करने की जरूरत नहीं, सिर्फ मूर्खता का त्याग करना है, सिर्फ दुर्वुद्ध का त्याग करना है। और संकीर्णता जो आपको स्वार्थी स्वभाव (Self isntemprament) है. उससे दूर भागना है। उसको समझना चाहिये, कि ये मेरे अन्दर एक संकीर्ण बात है। उसके बाद आप देखियेगा कि अपने आप आपके प्रश्न बहुत ध्यान करते हैं और औरतें कम करती हैं। आश्चर्य की बात है। मैं एक औरत ही हूँ, मैं भी स्त्री हूँ, और मेरा भी घर है, मेरे बच्चे हैं। सब कुछ है। सबको चलाते हुये भी ध्यान से ही मैने ये क्रिया प्रणाली ढूंढ निकाली कि हज़ारों लोग पार हो सके तो मैं ये विनती करु कि औरतें अगर घर में ध्यान करें तो बच्चे भी ध्यान करेंगे बच्चों को संभालने के लिये ध्यान करना ज़रूरी है। पति तो करे ही क्योंकि पति तो जो है वो चालना करता है घर की। और स्त्री जो है उसका रक्षण करती है। तो अगर पति ने ध्यान-धारणा करी तो पत्नी भी करें, बच्चे भी करे। फिर सबसे बड़ी सहजयोग की बात ये है कि ये सामूहिक है, अकेले नहीं कि मैं अपने घर में पूजा करता हूँ मां तो भी मुझे बीमारी हो गई। अकेले में नहीं। जो सामूहिकता में आप आयेंगे, सामूहिक में सहजयोग को मानंगे तब आज का, वर्तमान का सहजयोग है। वो जमाने गये जब एक आदमी कहीं पार हो जाता था हजारों को पार करना है, लाखों को करोड़ों को पार करना है। तो हमें सामूहिक होना पड़ेगा और सामूहिकता की शक्ति बहुत ज़बरदस्त है। मुझे खुशी है कि दिल्ली ने सहजयोग को अपने सिर-आँखें पर उठा लिया है और समझा है। इतने संवैदनशील इतने Sensitive लोग इस दिल्ली में हैं। बड़ी हैरानी की बात है कि जिस महाराष्ट्र में इतने संत-साधु हो गये वहां के लोगों को इतनी अकल नहीं, में यह देखकर हैरान हूँ। वो लोग सोचते हैं कि हमें सब मालूम है। सब हमने जाना है। वहां नवनाथ हुये सब बेकार गये। वहां इतने साधु-संत हुये सब बेकार गये। और इस तरह से जो आप लोगों ने इसको समझाया, बनाया, इसको बढ़ाने के लिये अपना व्यक्तिगत Individual ध्यान भी करना चाहिये और सामूहिक ध्यान में समावेश करना चाहिये। मैं मानती हूँ कि हमारे पास जगह की कमी है। और उसके लिये कुछ करना चाहिये। धीरे-धीरे सब कुछ हो जायेगा। लेकिन जहां भी सामूहिक आप हो जायेंगे फिर आप और कोई बात करेंगे ही नहीं, सहज की ही बात करेंगे। अभी तो शुरुआत है और इससे आगे हर जगह हमारा प्रोग्राम होने वाला है। जो लोग आ सकते हैं ज़रूर आयें। आप सबको अनन्त आशीर्वाद। जो हैं खुलते जायेंगे। आप परमात्मा पर विश्वास करते हैं। क्या सोचते हैं कि आप मंदिर में गये नमस्कार कर लिया, गुरुद्वारे गये नमस्कार कर लिया। उससे नहीं होने वाला। अन्दर में ये विश्वास जो हम करते आये हैं वो धर्म हमारे अन्दर नस-नस में बस जाता है। इस धर्म की महिमा ऐसी है कि इस धर्म के कारण अनेक महात्मा इस देश में आये। मैं तो कहती हैँ कि इससे ज्यादा तो किसी देश में हुए ही नहीं। इसका मतलब अपना भारत वर्ष एक महान योगदान सारी दुनिया को दे सकता है। मैं अभी चीन गई थी, तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि चीन के लोग वैसे तो सार्वजनिक रूप से चाहे हमारे विरोध में हों, कहते हैं हम तो हिन्दुस्तान से बहुत कुछ अपेक्षा रखते हैं। बहुत कुछ आशा करते हैं। मैंने कहा क्या? बोलें आध्यात्म हम जानते हैं कि वहाँ आध्यात्म की खान है। लेकिन अभी तक किसी ने वो बताया नहीं। हमारा जो स्टॉल था उसमें लाइने पे लाइने, कतारें पे कतारें लगी हुई थीं, जहां लोग आकर पूछते थे कि क्या है ‘सहजयोग? पेपर तक में आया। अमेरिक भी हैरान हो गये कि इसमें क्या रखा हुआ है। यहां क्यों इतने लोग इकट्ठा हो रहे हैं। और आप देख रहे हैं आपके सामने इतने लेग बैठे हैं; विदेश के भी, जो कि आज सहजयोग को प्राप्त करके भारत की गौरवगाथा गा रहे हैं। आपको भी इस ओर नज़र करनी चाहिये। सहज में आपको पार तो होने में कोई मुश्किल नहीं है क्योंकि आप तैयार हैं, जैसे कोई बीज होता है। आप उसको पृथ्वी माता में डाल दीजिये, तो वो पनप जाता है, क्योंकि बीज में भी शक्ति है और मां में भी शक्ति है। लेकिन उसके बाद वृक्ष होने में देर लगती है। वो जरूरी है क्योकि आपकी विशालता तभी दिखाई देगी जब आप वृक्ष