Birthday Puja

New Delhi (भारत)

1997-03-21 Birthday Puja, 55' Download subtitles: EN,PTView subtitles: Add subtitles:
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Birthday Puja Date 21st March 1997 Delhi Place : Type Puja : Hindi & English

आप सबको अनन्त आशीर्वाद | जब सब दुनिया सोती है तब एक सहजयोगी जागता है और जब सब दुनिया जागती है तो सहजयोगी सोता है। इसका मतलब ये होता है कि जिन चीज़ों की तरफ सहजयोगियों का रुख है उस तरफ और लोगों का रुख नहीं । उनका रुख और चीज़ों में है। किसी न किसी तरह से वो सत्य से विमुख हैं, मानें किसी को पैसे का चक्कर, किसी को सत्ता का चक्कर, न जाने कैसे-कैसे चक्कर में इंसान घूमता रहता है और भूला-भटका, सत्य से परे, उसकी ओर उसकी नज़र नहीं है। कोई कहेगा कि इसका कारण ये है, उसका कारण ये है कोई न कोई विश्लेषण कर सकता है। पर मैं सोचती हूँ अज्ञान! अज्ञान में मनुष्य न जाने क्या-क्या करता है। एक तरह का अंधकार, घना अंधकार, छा जाता है। जैसे अभी यहाँ अगर अंधकार हो जाए तो न जाने भगदड़ मच जाए, कुछ लोग उठकर भागना शुरु कर दें, कितने लोगों को गिरा दें, उनके ऊपर पाँव रख दें, उन्हें चोट लग जाए। कुछ भी हो सकता है। इस अंधकार में हम लोग जब रहते हैं तब हमारी निद्रा अवस्था है। लेकिन हम जब जागृत हो गए, जब कुण्डलिनी का जागरण हो गया और जब आप सत्य के सामने खड़े हो जाते हैं तो सत्य की महिमा का वर्णन कोई नहीं कर सकता। मैंने पूछा किसी से, ‘भई, सहज में तुम्हें क्या मिला?’ बोले, ‘माँ, ये नहीं बता सकते पर सब कुछ मिल गया।’ सब कुछ माने क्या ? मैं भी कहँगी कि आज के दिन मुझे सहज में सब कुछ मिल गया है। मैं जब छोटी थी तो अपने पिता से कहती थी कि मैं चाहती हूँ कि जैसे आकाश में तारेहैं ऐसे दुनिया में अनेक लोग तारे जैसे चमकें और परमात्मा का प्रकाश फैलाएं। कहने लगे, ‘हो सकता है। तुम सामूहिक चेतना जागृत करने की व्यवस्था करो और कुछ भाषण मत दो, कुछ लिखो नहीं, नहीं तो दूसरा बाईबल तैयार हो जाएगा, कुरान तैयार हो जाएगा और एक झगड़े की चीज़ शुरु हो जाएगी। सो इससे पहले तुम सामूहिक चेतना करो’ और सामूहिक चेतना का कार्य शुरु हो गया, अनायास, सहज में! लेकिन उसकी जो समस्याएं हैं वो मुझे आपसे आज बतानी हैं। बहुत आनन्द की चीज़ है कि सामूहिक चेतना हो गई और सब जगह लोग इतने ज्यादा मात्रा में, हर देश में, लोग सत्य को पा गए और उसमें ही आन्द में हैं। लेकिन कष्ट तब होता है, ये सोच करके, कि सामूहिक चेतना में हमने कोई चयन नहीं किया; दरवाजा खोल दिया हर तरह से लोग अन्दर आ गए और अपने साथ अपनी गन्दगी भी लेकर अन्दर चले आए। और जब ऐसे थोड़े से भी लोग आ जाते हैं तो वो बहुत नुकसान देते हैं। नामदेव वगैरह तो बिल्कुल जो पहले बड़े साधु-सन्त हो गए, जो अपने ही लोग हैं, उन्होंने तो साफ -साफ कह दिया था कि जो कि बुरे हैं वो अच्छे हो ही नहीं सकते%;3 उनकी आदतें ठीक हो ही नहीं सकतीं। उदाहरण के लिए उन्होंने कहा एक मक्खी लीजिए ; मक्खी एक तो आपके खाने पर बैठेगी तो भी मार डालेगी और अगर कहीं मर गई और पेट में चली गई तो भी आप मर जाएंगे। ये मक्खी नहीं ठीक हो सकती। उन्होंने कहा कि ऐसे मक्खी वाले बहत से लोग बहुत सा उनको गुड़ चिपकाने का शौक होता है और उसकी ओर दौड़ते ही रहते हैं । सो सहज में ये चीजें सब हमारी गिर

जानी चाहिएं। जब तक ये गिरती नहीं तब तक हम ऊँचे उठ नहीं सकते। पंखो में अगर कोई चीज़ लग जाए तो पक्षी भी नहीं उड़ पाते। इसलिए जो ये आनन्द का आकाश है जिसे कि कवियों ने रागांचल कहा है-माँ के प्यार का आंचल- इसमें आप एक पक्षी की तरह उड़ नहीं सकते, क्योंकि आपके पंखों में भी कुछ न कुछ अभी लगा हुआ है। आज का दिन शुभ दिन है और बहुत से लोग सोचते हैं कि बहुत बड़ा दिन है और इस दिन कोई विशेष कार्य हुआ; ऐसे लोगों ने कहा हुआ है। लेकिन आज के दिन एक विशेष कार्य आप लोगों को करना है। इतने सारे आपने गुब्बारे लगा रखे हैं, इससे इंसान खुश हो जाता है देखता है कि देखो रबड़ में भी कितनी शक्ति है कि वो हमें सुख और आनन्द दे सकता है, और वो भी एक बड़ी सौन्दर्यपूर्ण वस्तु बन सकता है। फिर हम तो मनुष्य हैं और मनुष्य में हम आज सहजयोगी हैं, पहुँचे हुए लोग हैं। सो इन लोगों की एक स्थिति आने के लिए क्या करना चाहिए ? अभी मेरा एक अनुभव हुआ जो मैं आपको एक कथा के रूप में बताती हूँ। मुझे बड़ा दुःख हुआ। मैं इसलिए ये सब हिन्दी में बोल रही हूँ क्योंकि ये ज्यादातर दोष हिन्दुस्तानियों में हैं। अंग्रेजों में इतना नहीं, परदेश में भी इतना | नहीं। उन लोगों को इस की अक्ल भी कम है। हमारे देश में पहले ये हमारी भारत माता, पूरी सम्पूर्ण, इसमें अनेक तरह के देश समाए हुए थे। आप जानते हैं इसमें बर्मा था, सीलोन था, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि अनेक देश समाए हुए थे। ये हमारी माँ है ‘भारत माता’। पर इसको लोगों ने काट-पीट लिया। किसलिए काटा-पीटा? वो ऐसी बात हो जाती है कि जैसे कोई लोग इस देश में ऐसे हो गए जिन्होंने सोचा कि ये हमारे देश के लीडर हो गए, ये बड़े आदमी हो गए तो हम क्यों न कुछ ऐसा करें कि हम भी बड़े हो जाएं। ये अगर प्रधानमन्त्री हो सकते हैं तो हम भी प्रधानमन्त्री हो सकते हैं। ईर्ष्या , पहली चीज, ईर्ष्या हो गई कि हमारा एक देश हो जाए, हम अगर विभाजन कर लें तो उतना हिस्सा हमको मिल जाएगा। उस पर हम राज-पाट करेंगे। जैसे बहुत से बड़े-बड़े परिवारों में ऐसा होता है कि लोग चाहते हैं हमारा अलग घर हो, हम अलग से रहें, हमारे बीवी- बच्चे हों, हम वहीं रहें और किसी से मतलब न रखें। तो विभाजन करने की एक प्रवृत्ति मनुष्य में है। और उसी के कारण, समझ लीजिए आप, बांग्लादेश बना तो मैं अभिभूत हो गई कि लोगों ने इतना सा बांगला देश माँगा! और इसलिए कि कुछ लोग चाहते थे कि हमारा राज्य हो। आप इस्लाम का नाम लो या किसी भी धर्म के नाम पर कोई न कोई बहाने से विभाजन कर डाला और आज बांग्लादेश का ये हाल है कि हमें लोग कहते हैं माँ आप मत जाओ नहीं तो आप की आँखों से अविरल अश्रु धारा बहती रहेगी इतनी दुर्दशा है। पाकिस्तान का क्या हाल है? सीलोन जिसको कि अब श्रीलंका कहते हैं उसका क्या हाल है? ये जो तोड़-तोड़कर देश के इन्होंने अलग भाग बनाए और सोचा कि अब इसमें हम राज करेंगे , अधिकतर उनके प्रधानमन्त्री वगैरह को वहीं के लोगों ने मार डाला। उनका खून कर डाला। सो ईर्ष्या से ईर्ष्या बढ़ती है और फिर इसी तरह के समूह बन जाते हैं और फिर लड़ते हैं कि यह तो हमें चाहिए। अभी भी अपने यहाँ बहुत चला हुआ है विभाजन का विचार| जैसे हमारे यहाँ कहीं विदर्भ है तो कहीं झारखण्ड है। ये बनाने से क्या मिलेगा ? किसको क्या मिला है विभाजन से? सहजयोग इसके बिल्कुल विरोध में है कि हम किसी चीज़ का विभाजन करें | हमको तो सबको जोड़ना है सहजयोग सारा समन्वय पर चलता है और अगर आपको समन्वय की कोई कल्पना नहीं है तो आप सहजयोग छोड़ जाएं वही अच्छा है। निकालते थे। मैंने कहा अभी एक बहुत भारी वारदात हो गई कि एक साहब सहजयोग में थे वो सबके भूत

बन्द कीजिए, ये भूत आपको पकड़ेंगे। पर उनको शौक हो गया। हो सकता है लोग उनको पैसा देते हों या बहुत बड़ा आदमी कहते हों, जो भी हो। जो भी हो उन्होंने अपना एक अलग ग्रुप निकाल लिया। सहजयोग के भी कुछ ऐसे लोग थे वो भी अलग हो गए। एक अलग ग्रुप बनाकर उन्होंने एक अलग से संस्था निकाली। हाँ, मेरे बारे में उनको कहते शंका नहीं थी, लेकिन और जो लोग हैं और लीडर जो हैं, किसी काम के नहीं । कुछ उसके दोष, कुछ उसके दोष, कुछ सबके दोष निकाल कर उन्होंने कहा कि हम बड़े शुद्ध आचरण के लीडर हैं, और हम माँ के भक्त हैं। मुझसे बिना पूछे, मुझसे इजाज़त लिए बिना, उन्होंने एक बड़ा ग्रुप बना लिया। मेरे फोटो खूब दिखाये दुनिया भर को। पता नहीं क्या धन्धा करते थे, मुझे तो पता ही नहीं कि क्या हो रहा था। और लीडरों को ये लीडर अच्छा नहीं वो लीडर अच्छा नहीं। अगर कोई खराब हो तो मैं खुद जान जाऊंगी। जब मुझे मानते हैं तो मुझ पर छोड़ देना चाहिए | मुझे तय कर लेने दीजिए कि लीडर अच्छा है या नहीं। लेकिन लीडर को तुम ऐसे हो, तुमने ये क्यों किया, तुम ऐसे क्यों करते हो? इसका अधिकार आपको नहीं है। अब कोई कहेगा लीडर क्यों है सहजयोग में। इसलिए है कि मेरा सम्बन्ध सबके साथ नहीं हो सकता, अगर बीच में एक इंसान रहे तो उसके माध्यम से मैं सबसे सम्बन्धित हो सकती हूँ। तो वो लीडर पर नाराज हो गए, ये लीडर ठीक नहीं, ये ऐसा है वैसा नहीं। उसका जो दोष हो, उसकी जो तकलीफ हो, उसको मुझे निकालना चाहिए न कि आपको। अगर आपको तकलीफ है तो आप मुझे लिखो। पर आप अगर ऐसे आदमी से कहें कि अच्छा अब आपको लीडर पसन्द नहीं है तो आप सहजयोग छोड़ दो, तो उसके साथ और ऐसे दस अधकचरे सहजयोगी जुट जाएंगे और फिर उस लीडर के लिए ये काम करने लगेंगे। इसी तरह का एक बन गया। उसमें ७० -८० लोग इस तरह के इकट्ठे हो गए जिनकी मैंने कभी शक्ल नहीं देखी , जिनका कभी | नाम नहीं सुना, मैं जानती नहीं कि ये सहजयोगी हैं। अब उन महाशय ने कह दिया कि मैं तो कल्कि का अवतार हूँ। चलो भई हो, मुझे कुछ नहीं कहना। हो जाओ और तुम सहज से हटो, बस, सहज में आपका कोई स्थान नहीं। इन लोगों ने उनको मान लिया कि ये कल्कि का अवतार है। उसी के ये लोग चरण छूने लगे थे, चरण छू महाराज, पैसा छू महाराज! सब तरह के महाराज होते हैं तभी ये बने। तो पैसे लिए इनसे। ये लोग जो दोष अपने लीडरों में दिखा रहे थे वही दोष उनके अन्दर थे। बहुत अच्छे से उनका प्रादुर्भाव हुआ और सब देखने लग गए कि ये क्या हैं? तो इस तरह की ईष्ष्या और महत्त्वाकांक्षा हो जाती है। लेकिन बेवकूफ जितने भी सहजयोगी थे छन कर उसमें चले गए। बड़ी कमाल की चीज़ है क्योंकि अन्तिम निर्णय है न। तो छन-छनकर ऐसे लोग इकटूठे हो गए और लीडर का चरित्र अच्छा नहीं तो फलाना अच्छा नहीं, तो वो पैसा खाता है, ये है वो है। सी बी आई से बढ़कर। मैंने कहा भई हद हो गई, मुझसे पूछो तो मेरा प्रमाणपत्र तो लो। लेकिन हम माँ आपको तो मानते हैं लेकिन मैं जो कर रही हूँं। उसको नहीं मानते। करते-करते ये बेवकूफ लोग गणपति पुले पहुँचे वहाँ इन्होंने मेरे ऊपर पत्थर फेंके, क्योंकि जब दुर्बुद्धि हो जाती है जब बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है तो आपको होश ही नहीं रहती कि आप बोल क्या रहे हैं कर क्या रहे है, जैसे शराबी आदमी हो जाता है उस तरह की हालत हो जाती है। और वहाँ पर उन्होंने हंगामा मचा दिया। प्रोग्राम में आ गए। मैंने देखा इतने खराब उनकी चैतन्य लहरियाँ, मैंने कहा बाप रे बाप ये सहजयोग में बैठने वाले हैं ? अपनी चैतन्य लहरियाँ ठीक करने की जगह दूसरों के चैतन्य लहरियाँ ठीक कर रहे हैं। तो ऐसे जो लोग सहज में लोग हैं उनको सहज छोड़ ही देना चाहिए क्योंकि सहज वो हैं नहीं। लेकिन अगर एक-आध माई का लाल खड़ा हो गया तो उसकी दुम पकड़कर बहुत से लोग सोचते हैं कि वो स्वर्ग में चले जाएंगे। कैसे?

सहज एक सामूहिक कार्य है, एक सामूहिक संस्था। इसमें किसी का नाक उधर, तो आँख उधर, किसी का हाथ उधर। तो ये चलने ही नहीं वाला क्योंकि चैतन्य को ये बात पसन्द नहीं है। फिर मैंने कहा कि तुम बगावत कर रहे हो, तो कहने लगे, ‘आप हमें गाली दे रहे हैं।’ मैंने कहा, ‘नहीं, मैं आपका वर्णन कर रही हैँ कि आप चैतन्य से बगावत मत करो।’ इसीलिए वहाँ भूकम्प आ गया और अब आगे क्या होगा? एक माँ की दृष्टि से मैंने कहा कि, ‘भई देखो, सत्य और परमात्मा जो है वो कोई तुमको क्षमा नहीं करेंगे, मैं तो माँ हूँ मेरी बात दूसरी है। वो तुमको नहीं छोड़ेंगे, तुम मेहरबानी करके सब धन्धे छोड़ कर दो।’ लेकिन लागी नाहीं छूटे वही बात है। उसी चक्कर में वो फँसे हैं। है देहरादून में बड़े जोरों आजकल मेंने सुना में ये काम हो रहा है। उधर झारखण्ड चल रहा है, इधर एक भूतखण्ड भी चल रहा है। अब अगर सहजयोग से इन दो-चार बदमाश लोगों को निकाल दिया जाए तो उनके साथ जुटने वाले भी बहुत से लोग हैं। और एक दूसरा ग्रुप बना लेंगे। पर उस ग्रुप के लिए मुझे हर्ज़ नहीं। कृपया चले जाएं और गंगा जी में डूब जाएं, मुझे उसमें कोई हर्ज नहीं। पर वो सहज में नहीं रह सकते और मेरा नाम नहीं ले सकते, मेरा फोटो नहीं लगा सकते। आज ये बात बड़ी दुखदाई लगी जब मैंने सुना कि जिस आदमी पर मेरा इतना विश्वास, जिसने इतना कार्य किया, उसी से कहने लगे, तुम ये मोटर कहाँ से ले आए? अरे भई वो काम करते हैं, धन्धा करते हैं, ये मुझे पूछना चाहिए और तुमको अगर कोई ऐसी खास शिकायत हो तो मुझे चिट्ठी लिखो। आज मुझे कहना नहीं था पर और कोई मौका नहीं था तो इस शुभ अवसर पर मुझे अशुभ बात कहनी पड़ी है। इस तरह के अगर धन्धे करने हैं तो अभी आप सहज से अपना आसन लेकर तशरीफ बाहर ले जाइये। उसमें मुझे कोई हर्ज नहीं। सहजयोग में किसी पर जबरदस्ती नहीं है, आप जानते हैं। मैंने तो कभी अपने घरवालों पर भी जबरदस्ती नहीं की कि तुम सहज करो। हालांकि मैं जानती हैँ कि इससे बढ़कर और कोई चीज़ नहीं है पर मैंने उनसे भी कभी नहीं कहा कि तुम सहज करो। करना हो तो करो नहीं तो मत करो, पर ऐसे धन्धे नहीं करना। इसका मतलब है आप कभी भी सहजयोगी नहीं हो सकते। एक तरह से सहज की दृष्टि से अपने लीडर से इस तरह से बर्ताव करना महापाप है और उसको लेकर ग्रुप बनाना तो उससे भी महापाप है। अगर आप लोग चाहें तो आप मुझे चिट्ठी लिखें में उस पर खबर करूंगी। मुझे तो चैतन्य पर फौरन पता चल जाता है कि वाकई में आप सच हैं कि वो और दुनिया भर की चीजें उसमें लिखते हैं। चिट्ठी भी आती है तो उसमें इतनी बकवास कि मैं उधर ध्यान ही नहीं देती। वो लीडर ऐसा है, वो लीडर ऐसा है। अरे आप कौन बड़े शुद्ध आत्मा हैं? आप अपने को तो देख लीजिए। देखना चाहिए। जब आप ही नहीं ठीक हैं तो आगे का क्या होगा? आपके बच्चे हैं और बच्चों के अलावा जो आपके आस-पास पड़ोसी आदि सब लोग रहते हैं, तो वो क्या सोचेंगे अगर आपका लीडर ऐसा है? तो क्या सोचेंगे आपके लिए भी? आप क्यों पीछे लगे हो? आपकी माताजी को अक्ल नहीं है, वो ऐसे लीडरों को चुनती हैं। इसी तरह की चीज़ें शुरु हो जाती हैं और सहजयोग खत्म हो जाता है। अभी तक तो कहीं इस तरह से खत्म नहीं हुआ। कोशिश हमने पूरी की थी कि डूबते हुओं को बचा ही लो। किसी तरह से बच जाएं तो अच्छा ही है। जितने सहजयोगी हों अच्छा है। मुझे ये भी लगता है कि सत्य पर बसा हुआ ये जो स्वर्ग है, स्वर्ग के जाने के लिए भी थोड़ी सी तैयारियाँ जरूरी हैं। और नहीं तो दूसरी बात ऐसी भी है कि वहाँ भी जगह कुछ कम होगी। तो नियति भी ऐसा कार्य कर रही है कि चलो ये फालतू

लोगों की काट-छाँट करो। लेकिन इस चक्कर में आपको आना नहीं चाहिए । अगर आप वाकई जागृत हों तो अपने प्रति जागृत हों, दूसरों के प्रति नहीं। अपने प्रति जागृत होकर देखो कि हमारे अन्दर कौन सी कमी है। किसी को कोई चक्कर, किसी को पैसा कमाने का चक्कर है। अब सहजयोग में पैसा कमाने लोग आते हैं। अगर उनसे कहें कि भई आप यहाँ पैसा कमाने के लिए नहीं आए हैं तो ये बात उनकी खोपड़ी में नहीं घुसती। पैसे का चक्कर भी आज मुझे कहना पड़ेगा कि कुछ लोगों में कुछ अक्ल ही कम है। पहले ईसा ने कहा था कि ‘पहला अन्तिम होगा और अन्तिम पहला’ ऐसा कोई दिखता नहीं है। जो शुरु-शुरु में सहजयोगी हमारे बम्बई में आए थे तो वो कहने लगे, ‘माँ कम से कम हमसे एक-एक हजार रुपए ले लो। मैंने कहा, ‘देखो बेटे, मुझे न तो पैसा गिनना आता है न ही मुझे रखना आता है, न ही मैं बैंक जानती हूँ। तो अपना अगर कोई बन जाए, जिसको कहना चाहिए, ट्रस्ट या कोई चीज, तब मैं फिर तुम लोगों से रुपए ले लूगी।’ इसलिए नहीं कि मुझे बड़ी ईमानदार बनना चाहिए, मुझे अक्ल ही नहीं है बेईमानी की, तो फिर किया क्या जाए? मुझे अगर गिनना ही नहीं आता पैसा तो मैं क्या करूं ? मुझे तो बैंक का चैक भी लिखना नहीं आता। वो तो छोड़ो हम बने ही और तरह से हैं। पर आप लोगो को ये सब आते हुए भी आप जानते हैं कि धर्म के नाम पर कोई अगर पैसा लेता कुछ है तो वह पछताएगा। पैसे का चक्कर बड़ा जबरदस्त है। तो इस बार हमने सोचा था कि बहुत बार हमने आपसे कहा भी, कि यहाँ की जो औरतें रास्ते में भीख माँगती हैं, बहुत सी मुसलमान औरतों को उनके पतियों ने छोड़ दिया है, वो रास्ते पर बच्चों को लेकर भीख माँगती हैं, और कहाँ-कहाँ से बाहर से, राजस्थान से, बिहार से औरतें यहाँ आई हुई हैं, इनका कुछ न कुछ भला करना चाहिए। इसलिए हमने एक संस्था बनाई है उसके लिए हमें पैसों की आपसे कोई जरूरत नहीं। हमने कभी किसी से भी पैसे के लिए नहीं कहा। हमारा इंतजाम हो जाता है। लेकिन मैंने सोचा कि आपको भी कुछ पुण्य मिले। तो मैंने कहा, ‘पाँच सौ रुपए रख दो, एक सौ आठ के बजाए।’ हो गया चिट्ठियों पर चिट्ठियाँ १०८ का ५०० कर दिया। अरे साल भर में आप को एक बार गर पैसा देना पड़े, कुछ पुण्य करने का ही नहीं क्या? सिर्फ लेने का है ? फिर लक्ष्मी तत्त्व आपमें कैसे दिखाई देगा ? लक्ष्मी तत्त्व में तो सिर्फ देना ही होता है। उस पाँच सौ के लिए लोग इतने पगला गए। पाँच सौ रुपए तो आप बाल कटाने के देते हैं नाई का कभी- कभी। ऐसी आफत मचा दी कि ५००रुपए? मैं समझ गई कि लोग अभी अधकचरे हैं। पहले जमाने में इतनी बात नहीं थी। श्रद्धा और त्याग और त्याग की भावना ही नहीं आती थी, मज़ा आता था। तो ये जो बात है हमारे अन्दर, अब भी हमारा चित्त वो पैसे पर है, हम तो १०८ ही देंगे नहीं तो हम आएंगे ही नहीं। मत आओ, बड़ा अच्छा है। निकल ही जाओ सदा के लिए। वो अच्छा है। क्योंकि सहजयोग भिखारियों के लिए नहीं है। पहले आप लोग ठीक हो जाइए फिर भिखारियों की मदद करिए। हम भिखारियों की मदद करते हैं। उसके लिए अगर कहा गया कि थोड़े से पैसे दे दीजिए तो आप लोग इतने क्यों नाराज़ हो रहे हैं? मैं तो, आप जानते ही हैं पैसे को छूती भी नहीं । मेरे को मालूम ही नहीं है। लेकिन एक कार्य निकाला है, उसके लिए अगर कहा गया कि १०८ के बजाय ५०० दे दीजिए तो आप सारे लीडरों पर बिगड़ गए। सब पर बिगड़ गए और मार आफत मचा दी। ‘माँ ये आपको किसने सलाह दी? अरे मुझे मशवरा देने वाला अभी पैदा ही नहीं हुआ। मैं तो अपने ही दिमाग से चलती हूँ। ये समझ लेना चाहिए। ऊपर से मैं भोली-भाली लगती हैँ, लेकिन अन्दर से मैं बहत चन्ट हूँ। इसलिए मुझे बेवकूफ बनाने की कोशिश नहीं

करना। अगर आप लोगों से जरा सा भी नहीं होता है सहजयोग के लिए देना, सालों बीत गए, हजारों लोगों को ठीक किया । इतने तो आप लोगों को बख्शीश में पैसे दिए, क्या क्या किया। सब कुछ किया । आप जानते हैं। पर इतनी सी चीज़ के लिए लोगों की नजर बदल गई। मुझे बड़ा दुःख लगा इस बात पर। पहले भी ऐसे ही होते रहा है। कितनी क्षुद्रता है। अब बम्बई में इस बार सबने कहा कि ‘माँ, आप यहीं पूजा कर लो,’ तो मैंने कहा, ‘भई पिछली मर्तबा का अनुभव बड़ा खराब हैं, जो पूजा हुई उसमें से एक चौथाई लोगों ने खाने के पैसे दिए, बाकी मैंने दिए पैसे!’ पूजा मेरी हुई और खाने के पैसे भी मैंने दिए! बम्बई के लोग तो खास हैं। हमारे महाराष्ट्र के ऐसे कंजूस लोग हैं, वो ब्राह्मणों को देंगे, सिद्धि विनायक को देंगे, पर यहाँ मुफ्त में खाने को आ गए। एक चौथाई लोगों ने खाने का दिया, एक तिहाई ने पूजा का दिया। ग्यारह ( ११) रुपए और सहजयोग में आ गए। इससे अच्छा कटोरा लेकर कहीं मस्जिद के सामने बैठ जाएं, वो ज्यादा अच्छा है। वहीं कुछ अल्लाह उनका भला करे तो करे। ऐसे ऐसे लोग सहजयोग में हैं और इसलिए मुझे कहने का है कि आपसे मुझे किसी प्रकार का दान या पैसे की आज तक जरूरत नहीं पड़ी लेकिन मैंने कहा कि, जरा देखें, testing करके, उस testing में मैं हैरान हो गई और कोई भी ऐसा गरीब नहीं है इसमें जो ५०० भी नहीं दे सकता। फिर ये कहा गया, जो नहीं दे सकता नहीं दे, तो फोन पर फोन आ रहे हैं कि साहब मेरा नाम आप काट दीजिए । मैं नहीं दे सकती क्योंकि मेरे पति कमा रहे हैं। कितना कमाते हैं? सात हजार (७०००) कमाते हैं पर मैं नहीं दे सकती। मेरे पति दे देंगे । पर अपनी तरफ से मैं नहीं दे सकती। जरा कुछ सेल निकाल दीजिए, वो होता है ना marketing कुछ sale हो जाए तो अच्छा है। किस किस को माफ करें। अरे भई कितना पैसा आने वाला है उससे क्या हमारा (गैर सरकारी धर्मार्थ संस्था) चलने वाला है? कुछ भी नहीं । पर आप लोगों की परीक्षा हो गई । आप लोग कितने गहरे पानी में हैं? पैसे के अन्दर से पहले चित्त निकालना हिन्दुस्तान के आदमी के लिए बहुत जरूरी है, अगर वो सहजयोग में है, नहीं तो आजकल जेल भरो आन्दोलन चला ही हआ है। पैसों में काहे को आपका इतना चित्त है? आपकी लक्ष्मी जी हमने जागृत कर दी। जितना आप दोगे, उतना ही आपको मिलेगा। देना इतने आनन्द की चीज़़ है जिसकी कोई हद नहीं। आप लोग मुझे कुछ देते हैं तो मैं तो इसलिए सिर्फ लेती हूँ कि आप लोग खुश होते हैं। मुझे किसी चीज़ की जरूरत नहीं। मेरे घर में कोई जगह नहीं है। मेरे घर कुछ रखने की जगह नहीं है। मैं कुछ नहीं कर सकती। पर आप मुझे देते हैं प्यार से और आप उससे खुश होते हैं। लड़ाई-झगड़ा करके मैं हार गई कि मुझे आप साड़ी मत दो, मुझे कुछ नहीं चाहिए, मुझे जेवर नहीं दो। मैंने यहाँ तक कह दिया मैं सब जेवर बेचने वाली हूँ। उसी से सारे काम हो जाएंगे । तो कहने लगे माँ आपको जो करना है करो , पर हम तो देंगे ही । ये आप की खुशी के लिए हम लेते हैं। हमें क्या लेना और क्या देना? कुछ लिया ही नहीं तो देना क्या ? लेकिन ये एक चीज़ हमारे अन्दर हिन्दुस्तानियों को समझनी चाहिए। हमने तो ऐसे लोग देखे हैं कि आपको आश्चर्य होगा , सिर्फ स्वतन्त्रता कमाने के लिए हमारे ही पिताजी के घर से सारी जमीन जायदाद सब बेच दिया। माँ ने हमारे सब जेवर बेच दिए, सब जेल ১ में गए। मुझे तो बिजली के झटके लगाए गए और बर्फ पर लिटाया। मुझे कुछ नहीं होता था। सब मजाक था लेकिन तो भी सब तरह की चीज़ें लोगों ने सहन की। दो-दो-तीन- तीन साल जेल में रहे और अब जेल में जा रहे हैं इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन इस वजह से कि पैसे खाए हैं। वो कहेंगे हम भी जेल में गए। जिन लोगों ने सहजयोग में

बहुत बदतमीजी करी है उनका हम छुटकारा करने वाले हैं, पक्की बात है। खबरदार किसी लीडर के खिलाफ किसी ने भी अगर आवाज उठाई तो उसको हम सहजयोग से छुट्टी कर देंगे। पूरी तरह से जान लें, इसमें शक नहीं है क्योंकि हमें तोड़ना नही हैं। आपका स्वार्थ है, आपका मतलब है, आपको और कोई धन्धा नहीं है तो पुलिस में भर्ती हो जाओ, सी.आय.डी बन जाओ। कुछ भी करो। सहज में क्यों आप आए। सहज के लायक ही नहीं हैं आप। आप आए कैसे सहज में ? आज के दिन ये सारी बातें करने की मैंने बड़ी धृष्टता की और मैं जब सो गई थी तभी मेरे मन में ये ख्याल आया कि आज क्या कहा जाएगा। ७४ साल की उम्र का बूढ़ा क्या कहे। बुट्टे लोगों का एक ही काम होता है कि अपने बच्चों को नसीहत दें। उनको भी कहें कि जिन्दगी क्या है और आप किसलिए सहज में हैं। सहज में आप अपना सर्वनाश करने के लिए नहीं आए क्योंकि सहज की अति साकरी गली कही जाएगी। इस तरह की है, अगर आपको आना है तो ये पता रखना चाहिए कि आप को इस सांकरी गली से चलना है जिसमें एक तरफ तो पहाड़ हैं। एक तरफ खाई है। सो इसमें चढ़ने के लिए अगर आप के अन्दर वो मन का बल, वो शक्ति, वो पावित्र्य, शुद्ध | इच्छा नहीं हो। तो होगा नहीं, आप आधे – अधूरे ही बैठ जाएंगे। ये पहाड़ी पर, जो आपने देखा है, गधे पर बैठ कर लोग चढ़ते हैं। वो गधे से पूछा कि भई कि तुम कैसे गधे हो गए? तो उसने कहा कि हम भी आप ही लोगों जैसे थे, लेकिन आधे-अधूरे रह गए तो भगवान ने हमको गधा बना दिया कि कम से कम गंधे के रूप में ऊपर पहुँच जाओ। ये सब कथायें आपने सुनी हैं, पढ़ी हैं। हमारे देश में तो इसका भंडार है । इसके वाङ्मय का भंडार है। इतनी कथाएं हो गई, वो ज्यादातर हमारे उपदेश के लिए हैं, समझाने के लिए थी कि गलत रास्ते पर चलने से क्या होता है । दुनिया भर की कथाएं हो गई हैं और उसमें से जो कथा हमें कुछ न कुछ सबक देती है वही कथा असली है। सो बार-बार मुझे लग रहा है कि आज के दिन मुझे कुछ अच्छा कहना चाहिए था लेकिन ये बात मेरे सामने इतने जोरों में खड़ी हो गई, इस शिव पूजा में, कि मैंने सोचा अगर मैं नहीं कहूँगी तो कैसे होगा और शिवजी की पूजा में आप कह भी नहीं सकते क्योंकि शिवजी तो सिर्फ क्षमा ही करते हैं पर वो भी किसी हद तक और जब वो बिगड़ते हैं तो , आप जानते हैं, वो क्या करते हैं। उनसे मुझे सबसे ज्यादा डर लगता है क्योंकि ये अगर घोड़ा बिगड़ गया तो वो आपको ठिकाने लगा देंगे। | सहजयोग का ज्ञान सारा आपको एक तरह से मुफ्त है क्योंकि पूर्व जन्म बहुत बड़ा था। पूर्व जन्म की आपके अन्दर जो सम्पत्ति है उसके बूते पर आपने ये पाया। लेकिन सहज में आकर के, सब पाकर के, सम्पत्ति पाकर के और आप अगर बेकार ही जाने वाले हैं तो बेहतर है इसको छोड़ दो और हमें भी बख्शो। सोच-सोचकर के आज कहा, वैसे में सोचती कम हँ, निर्विचार ही में हँ लेकिन तो भी, मुझे चिन्ता इसलिए है कि मैंने आपको अपना बेटा माना, आपको अपनी बेटी माना तो आपके जो दोष हैं उसके कारण जब आप मिटते जाएं, मुझसे देखा नहीं गया । मुझे बहुत कष्ट हुआ। सहजयोग में सब है आनन्द, शान्ति। आपके प्रश्न चूटकी बजाते ही ऐसे ठीक हो जाते हैं, आप लोग जानते हैं, आपको अनुभव है। मुझे कोई खास बताने की जरूरत नहीं है। परमात्मा आपको धन्य करें।

[Hindi translation from English talk]

अभी तक मैं भारतीय सहजयोगियों के लिए बोल रही थी। मेरा जन्मोत्सव मनाने के लिए आप सबको बहुत बहुत धन्यवाद। आपने अत्यन्त सुन्दर गुब्बारे लगाए हैं। इनको देखते हुए हम पाते हैं कि इनमे से बहुत से गुब्बारों की हवा निकल गई है। पश्चिमी देशों में ये एक समस्या है जो हमारे सामने खड़ी है । क्योंकि पश्चिमी संस्कृति के अनुसार अहं का होना भी महान उपलब्धि है और अहंग्रस्त जब हम होते हैं तो, मैं जानती हँ, व्यक्ति कैसा लगता है। जब वह अपने विषय में बात करता है, अपना गुणगान करता है तो वह अत्यन्त मूर्ख प्रतीत होता है। आपकी समझ में नहीं आता कि किस ओर देखें, क्योंकि उसकी मूर्खता पर हँसने को आपका मन करता है। अहं मूर्खता की ही देन है। मेरी समझ में नहीं आता कि क्या कहँ, अहं के लिए कौन सी उपमा दूं, क्योंकि यह गुब्बारा तो बस फूला हुआ है और आपको भी हवा में उड़ाता है। परन्तु जब यह फटता है तो आप धड़ाम से पृथ्वी पर गिरते हैं। एक सहजयोगी की तरह पृथ्वी पर नहीं आते, बिल्कुल समाप्त हो जाते हैं। आपका सारा घमण्ड व्यर्थ हो जाता है। आपकी खोपड़ी यदि घमण्ड से परिपूर्ण है तो आप कभी सहजयोग को नहीं समझ सकते। अहंग्रस्त लोगों को मैं जानती हूँ, वे सहजयोग में आए और अब भी वे सोचना चाहते हैं कि वे अन्य लोगों से कहीं अधिक जानते हैं । आत्मा के विषय में जानने के लिए आपको गहनता में उतरना होगा और गहनता में उतरने के लिए वे सब विचार त्यागने होंगे जो आपको हवा में उड़ाते हैं। कल्पना करें कि एक बहुत बड़ा गुब्बारा आपके साथ बंधा हुआ है, तो आप समुद्र की गहनता में किस प्रकार उतर सकते हैं? नहीं उतर सकते। इस प्रकार का अहं आपको हवा में उड़ा देता है, पूर्ण मूर्खता के क्षेत्र में। अंग्रेजी भाषा में शब्द Stupidity सारा अर्थ बता देता है। तब आप स्वयं को अनन्त मान बैठते हैं और मनमाने ढंग से आचरण करते हैं। परन्तु ऐसा करके आपको मिलता क्या है? इससे आपको कुछ नहीं प्राप्त होता। आपकी उपलब्धियों के कारण लोग आपसे ईर्ष्या करते हैं, आपको हानि पहुँचाना चाहते हैं, आपका कोई मित्र नहीं बनता, कोई आपकी चिन्ता नहीं करता। सहजयोग में लोग जानते हैं कि किस व्यक्ति को अहं की समस्या है। ऐसे व्यक्ति के विषय में बातें करते हुए मैंने लोगों को सुना है, वे कहते हैं, हाँ, हम उसे जानते हैं, भली -भांति जानते हैं । कुछ बहुत समय पूर्व एक बार पुणे में मुझे एक अनुभव हुआ। सभागार के मालिकों ने वहाँ कार्यक्रम की आज्ञा देने से इन्कार कर दिया क्योंकि श्रीमाताजी ब्राह्मण नहीं हैं। तो सहजयोगियों ने कहा कि ठीक है हम अखबारों में छपवा देते हैं कि क्योंकि श्रीमाताजी ब्राह्मण नहीं हैं हम उनका कार्यक्रम करने में असमर्थ हैं। घबराकर वे मान गए और मेरे कार्यक्रम में आए। सभागार का मालिक ऊपर गैलरी में बैठा हुआ था उसे कोई अजीब रोग था जिसके कारण वह चल भी नहीं पाता था। सहजयोगियों ने एकदम प्रोग्राम आरंभ किया, इन्होंने मुझे बताया भी न था कि सभागार के मालिकों ने कार्यक्रम का विरोध किया था। मेरे सामने बैठते ही ये मालिक थर-थर काँपने लगे। ओह माँ! मैंने कहा, ‘ये सब क्या है?’ वे कहने लगे कि, ‘हमने कुछ नहीं किया, हमने तो केवल इतना कहा था कि ये ब्राह्मणों का बाड़ा है और क्योंकि इस क्षेत्र में अधिकतर ब्राह्मण रहते हैं इसलिए आप यहाँ अपना कार्यक्रम नहीं कर सकते।’ मैंने कहा

‘सच, इतना ही कहा आपने?’ ‘हाँ इतना ही।’ वे कहने लगे कि, ‘उधर देखें, आपकी शक्ति से वे लोग भी काँप रहे हैं।’ मैंने उन लोगों से पूछा कि, ‘वे कौन हैं। क्या आप भी ब्राह्मण हैं?’ वे कहने लगे, ‘नहीं, हम ठाणे से आए प्रमाणित पागल हैं।’ मैंने कहा कि, ‘आप यहाँ कैसे आ गए?’ वे कहने लगे कि, ‘एक पागल व्यक्ति को आपने ठीक कर दिया था अत: हमारा सुपरिटेण्डेन्ट हमें यहाँ ले आया है, हम प्रमाणित पागल हैं।’ इन लोगों ने मेरी ओर देखा। मैंने कहा, ‘अब आप मुकाबला करें, आप भी काँप रहे हैं और वे भी कांप रहे हैं; अब देखें कि आपकी स्थिति क्या है!’ वे सब सहजयोगी बन गए। इतना ही नहीं ऊपर बैठे महाशय को मैंने आने को कहा। वह नीचे आया और उस दिन से अपना जीवन मुझे समर्पित कर दिया। उसने पुणे में बहुत सा काम भी किया। तो मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि जो भी व्यक्ति इस प्रकार की बात करता है कि सहजयोग में यह गलती है, ऐसा नहीं होना चाहिए, हमें इतने पैसे नहीं देने चाहिए थे, यह अगुआ अच्छा नहीं है आदि, तो ऐसे व्यक्ति को चाहिए कि एक पतला कागज अपने हाथ पर रखकर हाथ मेरे फोटोग्राफ की तरफ फैला ले। यदि हाथ के कंपन को आप रोक सकें तो आप ठीक हैं। आप सब इसे आज़मा सकते हैं, दोनों हाथों पर कागज रखकर आप इसे आजमायें। यदि दाएं हाथ पर कागज में कंपन है तो इसका अर्थ है कि श्रीमान अहं काँप रहे हैं और आप जानते हैं कि आपने सहजयोग में इसका इलाज किस प्रकार करना है। मोहम्मद साहब का धन्यवाद कि उन्होंने इसका इलाज करने कि विधि हमें बताई। हमारे अन्दर दो समस्याएं हैं, एक तो हमारे बंधन हैं और दूसरा हमारा अहं और अपने मन की सृष्टि हम इन्हीं दोनों से करते हैं, और इन्हीं दोनों के प्रभाव में हम खेलते हैं। अब आपको सावधान होना है। पहले अपने बाएं हाथ से देखें यदि बायें हाथ का कागज कांप रहा है तो आप बंधनग्रस्त हैं और यदि दायां हाथ कांप रहा है तो आप अहंकारी हैं। अब इनका इलाज करें, इन दोनों बाधाओं का इलाज करें। मेरे सम्मुख आपको चैतन्य लहरियाँ आएंगी क्योंकि मैं आपकी माँ हूँ। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि आप ठीक हैं। आप मेरे फोटों के सम्मुख आजमाएं, फोटो अधिक शक्तिशाली है। माँ होने के कारण मैं चहूँ ओर लीला करती हूँ, पर ये नहीं जानती कि मुझे क्या कहना चाहिए। हो सकता है मेरे बैठकर आप महसूस न कर सकें। फोटो के सामने बैठकर अपने दायें और बायें हाथ पर बारीक पेपर सम्मुख रखें। एक-एक हाथ आगे करके आजमाएं और स्वयं को परखें कि आप क्या हैं। आखिरकार आप सहजयोग में मेरा उद्धार करने के लिए नहीं आए। स्वयं को विकसित करने आए हैं और इसलिए आपको अपना सामना करना होगा और स्वयं देखना होगा कि आपके अन्दर क्या है जो इतना शक्तिशाली हैं, कष्टदायी है और आपको पतन और विनाश की ओर ले जा रहा है। सहजयोग आनन्द के सागर के सिवाय कुछ भी नहीं है । मैंने सोचा था कि मेरी गैर हाजिरी में भी आप सब आनन्द ले रहे होंगे। ये ठीक भी है, आप आनन्द लेते हैं। कई बार मैने देखा है, हवाई अड्डे पर जब मेरा जहाज देर से पहुँचता है, पाँच घंटे, चार घंटे-तो भी प्रायः सभी लोग अत्यन्त तरोताजा होते हैं। मैंने पूछा क्या हुआ? श्री माताजी हम सारी रात आनन्द लेते रहे। तो आप जिस चीज़ का आनन्द लेते हैं वह है सामूहिकता। अर्थहीन सीमाओं, जो आपने बनाई हैं, से मुक्त होकर आपको सामूहिकता का आनन्द लेना चाहिए। तब आप आनन्द को

देखें। हर समय आप आनन्द में तैरते रहेंगे। लोगों में एक प्रकार का विवेक है जो आत्मसाक्षात्कार से पूर्व नहीं हो सकता। मैं हैरान हूँ कि कुछ लोग कितने गहन हैं और सहजयोग को उन्होंने किस प्रकार अपनाया है। महान कहलाने वाले, महान असूलों के, परन्तु बहुत उग्र स्वभाव के, असहनशील लोग भी सहजयोग को इस प्रकार अपना लेते हैं क्योंकि उनके अन्दर इतनी गहनता है कि हर चीज़ सुगमता से आत्मसात हो जाती है। सभी लोग प्राप्त कर सकते हैं परन्तु व्यक्ति को अहं तथा बंधनरूपी अपने मस्तिष्क के दो पहियों से सावधान रहना है। भारत में सभी प्रकार के बंधन हैं। पश्चिमी देशों में सभी प्रकार के अहं हैं, भिन्न-भिन्न प्रकार के। मैं हैरान थी कि उसका सामना करने के लिए मैं क्या कहूँ! यह अत्यन्त सूक्ष्म चीज़ है जिसे लोगों ने अपने मस्तिष्क में बिठा लिया है। अत: आज आप लोगों के लिए यह निर्णय होना है कि अभी तक आप नन्हें बालक हैं और नन्हें बालकों की तरह अपने अन्तस की शांति, पावित्र्य और सौंदर्य को स्वीकार करने और आत्मसात करने के लिए आपके पास शुद्ध हृदय होना आवश्यक है। पवित्रता के बिना आप आनन्द नहीं उठा सकते। सहजयोग में यद्यपि बहुत लोग हैं, फिर भी प्राचीन सन्तों की पवित्रता को अभी हमें प्राप्त करना है। हमारे देश में भी बहुत से लोग हैं। उदाहरणार्थ कल ये लोग अली के भजन गा रहे थे। मुझे बहुत प्रसन्नता हुई क्योंकि कवे एक अवतरण थे। उनके पावित्र्य की महिमा लोग अब गा रहे हैं। तब उन्हें सताया गया और उनकी हत्या कर दी गई। और बहुत से सन्त हैं। दम-दम साहिब, निज़ामुद्दीन औलिया आदि। हमारे देश में इतने अधिक सन्त हुए जितने अन्य किसी देश में नहीं हुए। हमारे यहाँ ही इतने सन्त क्यों हुए? इसलिए नहीं कि हम कोई बहुत अच्छे लोग थे, परन्तु इसलिए कि हमें सुधारना था। कार्य होने थे इसलिए वे यहाँ अवतरित हुए। यह योगभूमि है। भारत में आप जहाँ कहीं भी जाएं मैं हैरान थी, हरियाणा में बहुत से महान सन्त हुए, परन्तु उन सबको सताया गया, कष्ट दिया गया, कभी उन्हें समझा नहीं गया। यह इतना कष्टदायी है और इससे आपके हृदय को चोट पहुँचती है कि किस प्रकार इन मूर्ख, अज्ञानी और अन्धे लोगों ने उन सन्तों को सताया। तो उन सब सहजयोगियों का यह कर्त्तव्य है कि खोज निकालें कि सन्त कौन है? सहजयोग में भी, मैंने देखा है, लोग दूसरों को कष्ट पहुँचाते हैं। आपको यदि सत्य की पहचान और सूझ-बूझ नहीं है, आपको यदि इस बात का विचार नहीं है कि सत्य क्या है, प्रेम क्या है, शुद्ध करुणा क्या है तो आप सहजयोगी नहीं हैं। स्थूल दष्टि से आप व्यक्ति को देखते हैं। उसके गुणों को नहीं देखते। एक तरफा। अब जब कि मैं इतनी वृद्ध हो गई हूँ, मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप अपनी दृष्टि अपनी ओर करें, अन्तर्दर्शन करें क्योंकि आप ही में लोग आपके चित्त को भटकाने का प्रयत्न करेंगे, उल्टी सीधी बातें कहने की कोशिश करेंगे। यह कहना 6. से कुछ अत्यन्त सुगम है कि वह बेईमान है, चरित्रहीन है, यह कहना बहुत आसान है। परन्तु आप क्या हैं? अब हमें समझना है कि समन्वयन ( एकीकरण) द्वारा सहजयोग को दृढ़ करना आवश्यक है । हम एकीकरण में विश्वास करते हैं। फूट डालने वाली कोई भी चीज़ जब आपके मस्तिष्क में आती है तो तुरन्त आप इसे निकाल फेंके। आज के दिन मैं आप सब से ये प्रार्थना करती हूँ कि कृपया अन्तर्दर्शन करें, बिना अन्तर्दर्शन के आप स्वयं का भी सम्मान नहीं कर सकते, स्वयं को भी प्रेम नहीं कर सकते। आप यदि स्वयं को प्रेम करेंगे तो अन्तर्दर्शन भी करेंगे और अपनी गलतियों को ढूंढ लेंगे। मान लो मुझे ये साड़ी पसन्द है तो इसके विषय में मुझे यदि कोई संदेह होगा या इस पर किसी प्रकार के धब्बे मुझे नजर आएंगे तो में इन्हें साफ करूंगी। इस बात का मुझे कोई गर्व नहीं होगा, इधर-उधर

जाकर मैं कहती न फिरूंगी कि देखिए मेरी साड़ी पर इतने धब्बे हैं। इसी प्रकार आपके अन्दर जो भी असहज स्वभाव है आपको उस पर गर्व नहीं होना चाहिए | और इस तरह से बातचीत भी नहीं करनी चाहिए। ईसा ने ऐसे लोगों को ‘कानाफूसी करने वाले’ कहा है। उन्होंने कहा कानाफूसी करने वालों से सावधान रहें। मैं कहूँगी कानाफूसी करने वालों को बाहर निकाल दें । केवल यही उपाय है। हिन्दी में उन्हें ‘बकवासी’ कहते हैं। वे वास्तव में बकवासी हैं अर्थात् वे अन्य लोगों के बारे में सभी प्रकार की उल्टी-सीधी बातें करते रहते हैं। अपने विषय में नहीं जानते कि वे क्या हैं। भारत में ये दोष, मैं स्वीकार करती हूँ, बहत अधिक है । ऐसा कहने पर मुझे खेद है क्योंकि मैं भी एक भारतीय हूँ। दूसरों की बुराई करने की आदत है, बस बैठ गए और गप-शप शुरु कर दी। वे सहजयोग की बात नहीं करेंगे, कितने लोग सहजयोग को भली भांति जानते हैं। कहने से मेरा अभिप्राय ये है कि मुझे उपाधियाँ देनी हों तो आपको कौन सी उपाधि दूँ? आप मुझे बताएं। आप को तो अपनी चैतन्य लहरियों का ज्ञान नहीं है । नि:सन्देह आप सहजयोगी हैं क्योंकि आप उत्थान प्राप्ति के जाल में फँस गए हैं। परन्तु वास्तव में कितने लोग इसमें विकसित हुए हैं? आप विकसित हो सकते हैं । मैं बार-बार आपसे कहती हैँ कि मुझे प्रसन्न रखें। इसके लिए आपको सभी घटिया किस्म की बातें त्यागनी होंगी। परन्तु एक दूसरे से समझने का प्रयत्न करें कि हम सहजयोग के विषय में क्या जानते हैं। परस्पर विचार विमर्श करें और अपने अनुभवों का वर्णन करते हुए सहजयोग को कुछ योगदान करें। बहुत से लोगों को काफी ज्ञान है। मैं ये नहीं कह रही कि वे कुछ नहीं जानते। परन्तु एक बुरा व्यक्ति सभी को उसी प्रकार खराब कर सकता है जिस प्रकार एक सड़ा हुआ सेब सेबों के पूरे ढेर को सड़ा सकता है। तो हमें क्या करना चाहिए? सड़े हुए सेब को बाहर फेंक देना चाहिए। ऐसा करना अत्यन्त आवश्यक है। मुझे लगता है कि ये सभी कुछ आपका साक्षी है, मौन साक्षी। जब मैं बड़े-बड़े पर्वतों को देखती हूँ कि ये महान सन्त हैं जो सब कुछ देख रहे हैं और विश्व में घटित होने वाली सभी घटनाओं को लिपिबद्ध कर रहे हैं, क्योंकि वे भी समझते हैं और जानते हैं। मुझे आपको बार-बार बताना है कि स्वयं को, अपने चक्रों को, अपने दोषों को देखने का समय आज ही है। इसी से आपको वह स्थायी आनन्द प्राप्त होगा जिसका वचन दिया गया था। आप निर्विचार समाधि को पा लेंगे और निर्विकल्प समाधि को भी, परन्तु अपने अहम् तथा बन्धनों के जाल में कभी न फँसे। आज के दिन मुझे आपको यही बताना है। आज के दिन जब आप मेरा जन्मोत्सव मना रहे हैं आप अपना जन्मोत्सव मनाएं। अपना जन्मोत्सव मनाएं और स्वयं देखें कि आपने क्या प्राप्त किया है और क्या प्राप्त करने वाले हैं । आपके लिए उत्सव मनाने का यही उपयुक्त समय है; तब आप मेरा जन्मोत्सव मनाएं । अपने जन्मोत्सव की अपेक्षा आप का जन्मोत्सव मना कर मुझे प्रसन्नता होगी। परमात्मा आपको आशीर्वादित करें |