Shri Krishna Puja: Freedom Without Wisdom Is Dangerous

New York City (United States)

Feedback
Share

08.06.1997

न्यू जर्सी, यू.एस. ए 

श्री कृष्ण पूजा – स्वतन्त्रता 

बिना सद्बुद्धि स्वतन्त्रता भयंकर है

आज हमने श्री कृष्ण पूजा करने का निर्णय लिया है श्री कृष्ण की भूमि में, यद्यपि यह श्री कृष्ण की भूमि है

लोग मुझसे पूछते हैं कि लोग आध्यात्मिक क्यों नहीं हैं?

ऐसा कैसे है कि वे विभिन्न प्रकार  के खोज-प्रयासों में उलझ जाते हैं जो सत्य की ओर नहीं ले जाते हैं। 

ऐसा क्यों है कि अमेरिका में लोग इतने सतर्क नहीं हैं कि वे पहचान सकें कि सच्चाई क्या है और उन्हें क्या पाना है?

श्री कृष्ण का समय, जैसा कि आप जानते हैं, श्री राम से कम से कम दो हजार (साल) बाद था।

और श्री राम ने बहुत से अनुशासनों का सृजन किया

मानवों के अनुसरण करने के लिए जिन्हें उन्हें उत्थान के मार्ग पर पालन करना था। 

समय के अनुसार सब कार्य होते हैं। इसलिए लोग बेहद हठी और अनुशासित थे, 

और ऐसा हुआ कि लोगों ने सत्य के साथ संपर्क खो दिया।

वे अपनी पत्नियों को छोड़ देते, अपनी पत्नियों के साथ बुरा व्यवहार करते, 

श्री राम के नाम पर सभी प्रकार की बातें करते क्योंकि हमेशा मनुष्य कुछ ऐसा करने लगते हैं जो सही नहीं है।

दूसरा पक्ष उन्होंने कभी नहीं देखा कि 

कैसे राम, सीताजी के पीछे चले गये उन्हें खोजने के लिए, और उन्होंने 

भयानक राक्षस रावण के साथ युद्ध किया अपनी पत्नी को वापस लाने के लिए। 

तो दूसरा पक्ष लोग कभी नहीं देखते।केवल यह पक्ष उन्होंने देखा कि वह अपनी पत्नी के साथ बहुत सख्त थे और अगर पत्नी किसी समारोह में रुक गई ,

तो उन्हें (पति को) बहुत गुस्सा आया, वह उसपर चिल्लाए और उसे घर से बाहर निकाल दिया, और यह सब बातें।

इस तरह श्री कृष्ण आए। हमेशा अवतार एक के बाद एक आते हैं, स्वयम् को सही करने के लिए ही।

जब श्री कृष्ण ने पाया कि यह दूसरा रूप है, अहंकार का – 

कि पुरुषों ने सोचा कि वे बहुत शक्तिशाली लोग हैं, और वे जो चाहें कर सकते हैं, 

और उनके पास अपनी पत्नियों को जाँचने की पूरी शक्ति है ।

इसीलिय श्री कृष्ण एक नए परिवर्तन के साथ आए, या मुझे कहना चाहिए, जीवन के बारे में एक नई विचारधारा के साथ। उन्होंने स्वतंत्रता की बात की, उन्होंने परित्याग (abandonment) की बात की,

और उन्होंने कहा कि जीवन आनंद के लिए है। राधा आनंद का स्रोत थीं।

 “रा” ऊर्जा है, “धा” का अर्थ है, जो ऊर्जा धारण रखती हैं। वह आनंद का स्रोत थीं, 

और उनका (श्री कृष्ण) विचार था, जीवन का आनंद लेना ही जीने का सबसे अच्छा तरीका है।

और इसीलिए उन्होंने कहा कि आपको होली खेलनी चाहिए,

आपको आनंद उठाना चाहिए, आपको रास करना चाहिए, 

जिसके द्वारा आप सामूहिक नृत्य और स्वतंत्रता का आनंद लेते हैं।

तो लोगों ने सोचा कि यही तरीका है जीने का। 

पूर्णतः मुक्त रहना, जैसा आप चाहते हैं वैसे जीना, विशेष रूप से अमेरिका में।

उन्होंने सोचा कि जीवन का आनंद लेना मतलब पूर्ण परित्याग (उन्मुक्तता) है: 

कोई अनुशासन नहीं, कोई बंधन नहीं, आप अपनी पत्नी को आठ बार तलाक दे सकते हैं और पति को दस बार। बहुत समय पहले इस तरह का जीवन शुरू हो गया था।

लेकिन यह वास्तव में अमेरिका में   विकसित हुई। इस तरह की संस्कृति की फलना इस स्तर पर आ गया है 

कि अब हम यह नहीं जानते कि परिवार-प्रणाली का क्या होगा,

इसके आनंद के पक्ष का क्या होगा। इसके अतिरिक्त यहाँ लोग इसके दूसरे पहलू को भूल गए। 

आदि शक्ति ने सर्वप्रथम श्री गणेश की रचना की।श्री गणेश  बुद्धिमता के स्रोत हैं,

वे मंगलता (शुभता) के स्रोत हैं। उनके माध्यम से हम शुभता को समझते हैं।

और वह एक बच्चे हैं। वह एक शाश्वत बालक हैं। और परित्याग का यह व्यवहार

बहुत विनाशकारी है, यदि आपमें   सतसत विवेक बुद्धि ना हो। प्रथम आवश्यकता थी कि सतसत विवेक बुद्धि  को अपने भीतर स्थापित करना।  परन्तु हम एक तरह का सिद्धांत या एक तरह की जीवन-प्रणाली शुरू कर देते हैं, 

बिना सोचे समझे कि क्या हममें बुद्धिमत्ता है भी या नहीं?

क्या हम बुद्धिमताका विकास किए बिना जीवन की इस प्रणाली का पालन करने में सक्षम हैं? 

लेकिन सबसे बुरा यह था कि जब स्वतंत्रता जीवन का मापदंड बन गई। 

लोग बेहद आक्रामक और अहंकारी हो गए। पहला उत्तर हमेशा आपको यह मिलेगा, “क्या गलत है?”

आप उनसे पूछते हैं, “आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?””क्या गलत है?”

“मेरा मतलब है, यह गलत है क्योंकि यह शुभ नहीं है।”

“शुभता क्या है?” यह होता है 

बिलकुल वैसे ही जैसे आप उन्हें कह सकते हैं, बिना दिमाग के लोग, बुद्धिहीन लोग| 

“बुद्धिहीन” का अर्थ है, बुद्धिमत्ता न होना। मस्तिष्क की शक्ति जो है यह बुद्धिमता है। 

तो जीवन एक विनाशकारी गड्ढे (कुएं) में बहना शुरू हो गया, हमें कहना चाहिए, उस स्तर पर जहाँ से कोई वापसी नहीं है।और हर प्रकार की गंदगी को एक आशीर्वाद के रूप में स्वीकार किया गया, 

और कोई यह नहीं सोचेगा कि यह गलत है, यह मानव जीवन के लिए नहीं है।

यहाँ तक कि जानवर भी सब ऐसे नहीं होते। इसके अतिरिक्त आई शराब पीने की मूर्खता।

मुझे नहीं पता कि उन्होंने शराब की खोज कैसे करी

लंबे समय पहले, बहुत लंबे समय पहले, लेकिन वे कहते हैं कि 

यह (मदिरा) मंथन से निकली और समुद्र-मंथन से, सुरों और असुरों द्वारा, राक्षसों द्वारा और देवों द्वारा।अवश्य कोई चाल होगी इन राक्षसों को मदिरा पिलाने की,

और किसी न किसी तरह से अमृत कुंभ प्राप्त करने की, ताकि ये राक्षस मदिरा पीने से बहक जाएँ, और फिर देवों को उनका अधिकार मिल जाएगा, 

जो कि अमृत था, जो कि अमृत्व था। यह एक कारण हो सकता है

कि यह (शराब) समुद्र में से उत्पन्न किया गया था,

या सभी चौदह चीजों में से एक थी जो समुद्र से निकली। 

तो एक तरह का विरोधात्मक, विपरीत गुणवत्ता वाली चीजों का निर्माण हुआ।

एक और चीज उनके द्वारा बनाई गई- वह वेश्याएं थीं। कोई यह पूछ सकता है कि वेश्याएं उस मन्थन से क्यों निकलीं, क्योंकि अब आपके पास स्वतंत्रता है।

आपको चुनने की स्वतंत्रता दी गयी, और इसलिए आपके पास

पूर्ण दूरदृष्टि होनी चाहिए कि क्या चुनाव करना है? क्या मंगलमय (शुभ) जीवन, एक पवित्र जीवन,

एक दिव्य जीवन का चयन करना है या विनाशकारी जीवन का चयन करना है।

यह विरोध आगे आया, क्योंकि आपकी स्वतंत्रता का सम्मान करना था,

यह बहुत महत्वपूर्ण था।

मानव जागरूकता के विकास में, यह बहुत महत्वपूर्ण था

मानव की स्वतंत्रता का सम्मान करना।क्योंकि जानवर, अगर आप देखें, उनके पास कोई स्वतंत्रता नहीं है:

एक सांप एक सांप होगा, एक बिच्छू एक बिच्छू होगा, एक शेर एक शेर होगा।

वे अपने स्वयं के स्वभाव, गुणों के अनुसार होंगे। 

आप उनसे ऐसा कुछ नहीं करवा सकते जो अन्य जानवर कर रहे हैं।हम इन सभी अलग-अलग जानवरों की योनियों से गुज़रे हैं और अब हम इंसान हैं, और अब हमारे पास स्वतंत्रता है।

अब स्वतंत्रता क्यों, कोई पूछ सकता है –

क्योंकि इन दिनों वे हर बात के लिए आपसे ऐसे सवाल पूछते हैं

 स्वतंत्रता की जरूरत क्यों है? जैसा कि मैंने आपको हमेशा पहले बताया है कि स्कूल में

वे आपको दो प्लस दो चार सिखाते हैं, और आपको इसे याद रखना होता है।

लेकिन जब आप बड़े होते हैं और जब आप कॉलेज जाते हैं, 

तब आपको अपने आप सब कुछ समझने की स्वतंत्रता होती है। 

इसी तरीके से, आपकी जागरूकता को उस स्तर पर लाना था

जिससे आप अपनी स्वतंत्रता का विवेकपूर्ण उपयोग कर सकें।

अब, आपके आगे प्रलोभन होंगे।आप किसी व्यक्ति को कैसे आंक सकते हैं कि वह दृष्टिहीन (अंधा) है या दृष्टिहीन नहीं है? 

मान लीजिए आप किसी दृष्टिहीन व्यक्ति से पूछते हैं, “क्या यह फूल है?” 

वह इसे महसूस करेगा, कह सकता है, “नहीं, नहीं, यह मधुमक्खी है।” 

इसलिए उसके पास अपनी आँखें होनी चाहिएँ देखने के लिए,

और एक बार आप उसे आँखें दे देते हैं तो वह उन्मत (आपे से बाहर) हो जाता है।

वह नहीं जानता क्या करना है, उसके लिए क्या अच्छा है।

इसलिए उसने वे सब चुना जो उसके लिए बिल्कुल अच्छा नहीं था, 

उसके लिए शुभ नहीं था, और उसके विकास के लिए हानिकारक था।

इसलिए शराब पीना शुरू हुआ, और पीने के साथ आप यह नहीं जानते कि हम कैसे परित्यक्त हो जाते हैं।

मैंने लोगों का सुना है, कि वह अपने रिश्ते की भावना खो देते हैं,

भाइयों, बहनों, माताओं, सबके साथ, अगर आप नशे में हैं।

इतने सारे शराबीयों ने मुझे यह बताया है।यही कारण है कि इस देश में विचित्र प्रकार के रिश्ते हैं –

कोई समझ नहीं सकता, यह कैसे हो सकता है? परन्तु ऐसा है।(शराब) पीने से, ये सभी चीजें हुई हैं

कि वे नहीं जानते कि कौन आपकी बहन है, कौन आपकी पत्नी है, कौन आपकी मां है।

भारत में भी हैं पर विभिन्न प्रकार की चीज़,कि वे अपनी मां के साथ दुर्व्यवहार करेंगे, 

अपनी बहन के साथ दुर्व्यवहार करेंगे, अपनी पत्नियों के साथ दुर्व्यवहार करेंगे।

इसके विपरीत। 

परन्तु यहां वे दुर्व्यवहार नहीं करते, वे प्यार करते हैं, लेकिन बहुत विकृत (दूषित) तरीके से।

आप दो देशों में प्रतिक्रिया देखते हैं। इसलिए यह बहुत बढ़ गया, और आज हम एक ऐसे देश को देखते हैं। अमेरिका को जो पूर्ण रूप से अव्यवस्थित है।

तो यह स्वतंत्रता बिना किसी सदबुद्धि (विवेक) का विकास हुए, 

एक भयानक अहंकार की वृद्धि करना प्रारम्भ करती है। जब शुभता छोड़ दी जाती है तब श्री गणेश सो जाते हैं

जैसे ईसा मसीह के रूप में, जो श्री गणेश के अवतार हैं, वह भी     परवाह नहीं करते।

इसलिए ईसा मसीह का शासन समाप्त हो गया है। 

तो जो शासन करता है वह अहंकार है, यह अहंकार जो सोचता है कि वह स्वतंत्र है।

यह नहीं जानता कि यह सभी प्रकार के शत्रुओं से बंधा है जो 

बहुत भयानक प्रकार के है। श्री कृष्ण के समय उन्होंने कहा था

कि सबसे बुरा शत्रु इंसानों में होता है क्रोध,      

लेकिन मुझे लगता है कि आधुनिक समय में इंसानों का सबसे बुरा शत्रु

है लोभ (लालच) और ईर्ष्या।लालच का इन दिनों कोई अर्थ नहीं रह गया। मेरा मतलब है, 

आप उस व्यक्ति से क्या कहेंगे जिसके पास तीन हजार जूते हैं – 

मेरा मतलब है, जूतों के जोड़े? पागल ही होगा।

हर तरह की चीजें हैं, आप जानते हैं। लालच में आप देखते हैं इन दिनों।

आप नहीं जानते लोग वास्तव में कैसा व्यवहार करते हैं। कोई समझा नहीं सकता।

मैं किसी व्यक्ति के बारे में जानती हूं जिसके पास पांच हजार कुत्ते हैं।

वह उन कुत्तों के साथ क्या कर रही है, मुझे नहीं पता, परन्तु उसके पास हैं।

सभी देशों की तरह, अमेरिका में भी मुझे लगता है कि यहाँ बदतर है, 

बहुत ज़्यादा बुरा है। 

अब आप इसे कुछ भी कह सकते हैं, उपभोक्तावाद या वैसा कुछ भी, 

या आपकी अर्थव्यवस्था, जो मुझे लगता है, बहुत दोषपूर्ण है, 

यह मनुष्य को नहीं समझती

यह जो कुछ भी है, यह कभी भी हित नहीं कर सकता, 

न ही उस व्यक्ति के लिए जो सोचता है वह धनवान है, 

या उन लोगों के लिये जिनका वह शोषण कर रहा है।

जहां तक आध्यात्मिकता की बात है, वे सभी दिव्यता के क्षेत्र से दूर हैं।

अब दिमाग अहंकार से काम करने लगता है।अहंकार एक कंप्यूटर की तरह हावी हो जाता है, 

और यह उन तौर तरीकों का सुझाव देना शुरू करता है

जिनके द्वारा आप कितना पैसा कमा सकते हैं।इसलिए जब आप पैसा कमाना शुरू करते हैं,

तो फिर से वही अहंकार मिस्टर ईगो (अहंकार) आपको बताता है

खुद को कैसे नष्ट किया जाए इस पैसे से। पैसा होने पर वे हर तरह के काम करते हैं।

मेरा मतलब है, वह धन लक्ष्मी प्रसाद नहीं है; 

यह किसी प्रकार का धन है

जो राक्षस या शैतान की तरह बन जाता है और जो आपको बर्बाद कर देता है। 

यह आपको सभी प्रकार के गलत स्थानों पर ले जाता है।

यह आपको ऐसे भयानक सिद्धांतों तक ले जाता है

कि कोई भी व्यक्ति ऐसे सिद्धांतों को स्वीकार नहीं करेगा।

यह अहंकार आपको महसूस कराता है कि – आह, हाँ, आप एकदम उत्तम (परफ़ेक्ट) हैं,

आप सब कुछ जानते हैं, आप जो भी कर रहे हैं वह सबसे अच्छा है।

लेकिन वह सब करने से, क्या होता है? आप बेचैन हो जाते हैं, आप सो नहीं पाते।

अब यहां समस्या यह है कि

लोगों को यह तथा-कथित (टेन्शन) तनाव और दबाव है।हमारी युवावस्था में हमने कभी यह शब्द नहीं सुना, 

परेशानी (तनाव) क्या है दबाव क्या है? अभी भी भारत में बहुत कम लोग इसके बारे में जानते हैं।

क्योंकि आप स्वयं ही, स्वयं को नष्ट कर रहे हैं। तो इस पैसे से, कहते हैं, आप किसी महिला को लुभाना चाहते हैं

एक बहुत ही निम्न स्तर की चीज। तब आप उसके पीछे भागेंगे, उसे यह देंगे, उसे वह देंगे, 

और अपना सारा पैसा खर्च करेंगे जब तक आप दिवालिया नहीं हो जाते।

और फिर आप बैठ जाते हैं और रोना शुरू कर देते हैं। और यह एक आम कहानी है।

मुझे नहीं पता वे ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनाते, 

वास्तव में यह दिखाने के लिए कि पैसे के पीछे भागने वाले व्यक्ति के साथ क्या होता है, 

और वह उस पैसे को खर्च करता जाता है।

वह नहीं जानता कि क्या करना है, आप देखते हैं; पैसा भी उसे खाता है, मुझे लगता है। 

दूसरी ओर ऐसे लोग हैं जो बेहद कंजूस हैं।

तो उनके सभी – केवल पैसे के कारण ही, वे इतने अधिक लालची हो जाते हैं

कि वे अपना पैसा सात तालों और चाबियों में बंद रखते हैं।

अब, वे संसार में देखते हैं कि ऐसे लोग हैं

जो बहुत पीड़ित हैं, जिन्हें इतनी समस्याएं है। हम उन पर कुछ पैसा खर्च क्यों नहीं करें? 

तो फ़िर एजेंट पैदा हो जाते हैं, स्विस बैंक की तरह। स्विस बैंक हमारे लोभ (लालच) का परिणाम है, पूर्णतः हमारे लोभ का; 

क्योंकि हमारे पास इतना पैसा है कि हमें पता नहीं इसका अब हम क्या करें, 

इसलिए हमने इसे स्विस बैंक में डाल दिया।स्विस बैंक कहता है, “ठीक है, हम इसकी देखभाल करेंगे।” क्योंकि हम लालची होने के साथ-साथ कंजूस भी हैं। 

मेरा मतलब है, कंजूस लोग साथ में पागल (क्रैक्पॉट) हैं, मुझे कहना चाहिए,

जिस तरह से वे रहते हैं। लेकिन वे लोग भी जिनके पास पैसा है

वास्तव में मूर्ख (पागल/क्रैक्पॉट) हैं। उनमें न स्वाभिमान की भावना है, न आत्म-सम्मान की।

कल्पना कीजिए, अस्सी, नब्बे साल की वृद्ध महिलायें 

शेकडान्स (झटके वाला नृत्य) के लिए जाते हुए, जैसा मैने आपको बताया था।

क्योंकि उनके पास पैसा है, उन्हें लगता है कि उन्हें ऐसा करना चाहिए, 

युवा लोगों के साथ प्रतिस्पर्धा करना चाहिए, क्योंकि उनके पास पैसा है।

अगर उनके पास पैसा है, अगर उन्हें मिल जाता है बिना किसी, मुझे कहना चाहिए

धोखा दिए बिना या किसी को छले बिना, यदि यह वास्तव में अच्छा पैसा है तो उन्हें इसे किसी अच्छे कार्य के लिए देना चाहिए

और अच्छाई का प्रसार करने की कोशिश करनी चाहिए।

परंतु पैसा खुद कुछ बहुत बुरा प्रतीत होता है, जैसे ज़हर, 

क्योंकि या तो यह पैसा आपको पागल कर देता है

कि इसे कैसे खर्च किया जाए, या ऐसे पागल करता है कि इसे कैसे सुरक्षित रखा जाए।

जैसे कि यह पैसे आप को गुलाम बनाते हैं, 

और उस गुलामी में आप बहते चले जाते हैं, बहते चले जाते हैं, बहते चले जाते हैं।

मैंने देखा है कि जब लोग बात करते हैं, आप नहीं जानते कि वे इस तरह से बात क्यों करते हैं 

तब आपको पता चलता है कि उनके पास एक बैंक अकाउंट (बैंक में खाता) है,

इसलिए वे इस तरह से बात कर रहे हैं। यदि आपके पास बैंक में खाता नहीं है तो वे ऐसे बात नहीं करेंगे। 

मेरा मतलब है, उससे भी ज्यादा। इस देश में अपार धन है, 

सभी प्रकार का पैसे का लेन-देन, अदल-बदल और मेल और यह और वो, 

और आप पैसो से क्या करें? 

क्योंकि श्री कृष्ण कुबेर हैं। वह देवता हैं, या हम कह सकते हैं कि वह धन के ईश्वर हैं।

परंतु इसके साथ साथ, वह एक बहुत नटखट भगवान हैं। आप स्पष्ट रूप से देख सकते हैं: 

यह श्री कृष्ण का देश होना चाहिए 

जहाँ अपार धन है। इसके साथ-साथ आप देखते हैं भयंकर चीजें हो रही हैं, 

पूरे संसार में सबसे बुरी। मेरा मतलब है, कोई भी अमरीका वासियों (अमेरिकियों) को हरा नहीं सकता, वे कहते हैं, 

मूर्खता में, अश्लीलता में, अभद्रता, शोषण में। तो यह धन का अभिशाप है मानव पर, 

जिसे समझना चाहिए, कि स्वतन्त्रता बिना विवेक (  सत सत विवेक बुद्धि) के 

सबसे खतरनाक चीज है उपयोग करने के लिए। स्वतंत्र न होना बेहतर है यदि आपके पास  बुद्धिमता नहीं है। क्योंकि भगवान जाने आप क्या करेंगे

यदि आपके पास स्वतंत्रता हो और  बुद्धिमता नहीं।

मैंने यहां देखा है, सुना है उन महिलाओं के बारे में जो अपने बच्चों की हत्या कर रही हैं।

 कहीं भी आपको ऐसी बात नहीं मिलेगी, जैसे छोटे बच्चों की हत्या करना।

अब यह पैसा आपको कैसे इतना नीरस बना देता है कि आपके पास बिल्कुल, 

मैं कहूँगी, कोई प्रेम नहीं, कोई भावना नहीं। सिर्फ हत्या करने की ख़ातिर भी, लोग यहां हत्या करते हैं। अब – एक और चीज़ है जो यह पैसा करता है – यह एक असमानता उत्पन्न करता है।

कुछ ऐसे हैं जो बहुत अमीर हैं, कुछ ऐसे हैं जो बहुत गरीब हैं।

तो जो बहुत गरीब हैं वे उन लोगों के विरुद्ध हैं जो बहुत अमीर हैं।

वे समझ नहीं सकते कि इन लोगों

के पास इतना पैसा क्यों है? इसलिए उन्हें लगता है कि यह अधिकार है

उनसे वह सब पैसा छीनना और अपने लिए उपयोग करना।

परंतु वही पैसा उन्हें भी नष्ट कर सकता है, इसलिए उस पैसे को हिंसा से छीनना या उसे हड़पना, 

इससे आपको कोई आशीर्वाद नहीं मिलने वाला।

तो धन का उद्देश्य क्या है? यह जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है उन लोगो के लिए, जो श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं।श्री कृष्ण के जीवन में, हमने देखा

कि जो महिलाएँ छाछ और मक्खन बना रही थीं, वे सब-कुछ मथुरा लेकर जा रही थीं, 

जहाँ मथुरा में यह क्रूर शासक कंस राज कर रहा था।और वे वहां सभी सैनिकों को देती थीं।

वह (श्री कृष्ण) नहीं चाहते थे कि वे ऐसा करें।क्योंकि वे बहुत अधिक धन वसूल करतीं,

उन्हें बहुत अधिक भुगतान किया जाता, इसलिए ये महिलाएं इसके बारे में लालची थीं।

अपने स्वयं के बच्चों को (मक्खन) देने के बजाय, अपने परिवार को देने के बजाय, वे सब इकट्ठा करती थी और मथुरा ले जाती थी।

बचपन से ही श्री कृष्ण पत्थर मारते थे

उन घड़ों पर और उनके घड़े तोड़ देते थे, क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि वे मथुरा तक जाए

उन भयंकर सैनिकों को खिलाने के लिए। यही है जो हमें सीखना है, 

कि यदि हमारे पास,  कहने को, प्रचुर मात्रा धन या कुछ और है, 

तो आपको यह सोचना होगा कि आप इसके साथ क्या कर सकते हैं

और यह   किस प्रकारआनंद ला सकता है, सही तरह के लोगों के साथ साझा करके। 

पब में नहीं, नहीं, नहीं, मेरा यह मतलब नहीं है, 

परंतु   सह भाजन करना उनकी जरूरतों के लिए और जो  वह चाहते हैं। 

वास्तव में श्री कृष्ण के  शिष्य को आत्म-संतुष्ट व्यक्ति होना चाहिए।

उनके जीवन को देखिए, वह कितने आत्म-संतुष्ट थे।

उनके बारे में हर प्रसंग (घटना) स्वयं में उनकी    एकाकारिता दर्शाती है।

उदाहरण के लिए, जब अर्जुन ने उनसे पूछा कि 

“आप युद्ध के लिए हम पांडवों के साथ क्यों नहीं सम्मिलित होते?” आधुनिक समय में प्रतिस्पर्धात्मक जीवन में आप देखते हैं, यदि आप उन भाग-दौड़ को देखें, तो वे जीतने के लिए बहुत व्याकुल हैं,   उच्चतम पदवी   पाने के लिए भी।

फिर सभी बड़े, बड़े राजनेता

अन्य राजनेताओं को गिराने की कोशिश कर रहे हैं, अपनी  सत्ता प्राप्त करने के लिए।

परंतु श्री कृष्ण ने क्या कहा, कि “मैं आपका सारथी बनूंगा।

मैं आपका रथ चलाऊंगा, परंतु मैं अपना हथियार नहीं उठाऊंगा किसी के खिलाफ।”

आज हम उनके समान कोई हो,  यह सोच भी नहीं सकते, देखिए, लोग कभी यह नहीं कहेंगे कि “ठीक है, मैं नीचे स्तर पर रहूंगा और  आप सिंहासन पर ।”

बहुत मुश्किल है ऐसे एक भी व्यक्ति को देखना

जो श्री कृष्ण के समान व्यवहार कर सकता है।क्योंकि चाहे वह एक सारथी हैं

या वह वही हैं जो अर्जुन था, या वह सम्पूर्ण घटनाक्रम के कप्तान (अधिपति) थे, 

वह जानते थे कि वह क्या थे। उन्हें क्या जरूरत थी

यह बनने की या वो बनने की, और वो? परंतु इन दिनों, आप देखते हैं, 

कुछ बनने के लिए ऐसा संघर्ष चल रहा है। कोई बनना चाहता है, कह सकते हैं, प्रधान मंत्री

यह उच्चतम है, मुझे लगता है, मुझे नहीं पता। परंतु फिर कुछ लोग प्रधानमंत्री को (स्थान से) हटाना चाहते हैं।

फिर चपरासी से ऊपर शुरू करते हुए ऊपर शिखर तक, हर कोई चाहता है

कुछ उच्चतर, उच्चतर, उच्चतर और उच्चतर।

यह एक और बहुत ही सूक्ष्म प्रकार का लोभ (लालच) है

जो हमारे  मन में काम कर रहा है। सहज योग में भी मैंने देखा है कि लीडर्ज़ (संयोजक) – 

अब निश्चित रूप से शांत हो गए हैं, बहुत बेहतर, परंतु इतनी भयानक लड़ाई हुआ करती थी

लीडर बनने के लिए

यह सब एक मिथक (मिथ्या) है, वास्तविक मिथक है, परंतु वे झगड़ा करते थे।

और वे पत्र पर पत्र लिखते थे। समूह थे- 

एक समूह दूसरे समूह के विरुद्ध लिखेगा,

दूसरा समूह इस समूह के विरुद्ध लिखेगा,

और मैं सिर्फ हंसती थी, क्योंकि इसमें कोई सत्यता नहीं है।

नेतागिरी कोई सत्य नहीं है, यह सिर्फ एक मज़ाक (परिहास) है।

परंतु यहां तक कि अगर मैं उन्हें बता दूँ कि यह एक परिहास (मज़ाक) है, 

वे नहीं समझेंगे कि यह मज़ाक है और उन्हें इतना गंभीर नहीं होना है, 

और इसके लिए झगड़ा नहीं करना। धीरे-धीरे यह शांत हो गया 

बेहतर, बहुत बेहतर, यह इतना ज़्यादा बुरा नहीं है। लेकिन यह जो है, यह लोभ है।

यह गलती थी, मुझे लगता है, श्री कृष्ण की,

कि क्रोध के बजाय उन्हें लोभ को सबसे बुरी चीज़ रखना चाहिए था।

वास्तव में, आप देखें, ये अवतार मनुष्यों के बारे में अधिक नहीं जानते,

और उन्हें नहीं पता होगा कि वे (मनुष्य) किस सीमा तक जाएँगे

ऐसा ही होता है मेरे साथ भी । परंतु वे इस बात से बिल्कुल अनभिज्ञ हैं

कि ये मनुष्य क्या हैं, आप उन्हें क्या बताते हैं, वे उसका क्या अर्थ निकालेंगे।

उनका दिमाग इतना  शार्प  होता है

कि वे  अपने लिए वही अपना लेते हैं जो गलत है। 

और जो भी उनके लिए सही है, उसे कभी नहीं देखते। श्री राम ने कुछ कोशिश की – उसका कोई लाभ नहीं हुआ। श्री कृष्ण ने कुछ कोशिश की – उसका कोई लाभ नहीं हुआ।

तो अब हम आते हैं श्री ईसा मसीह  पर । आजकल जो लोग कुछ और ही हैं वे

ईसा मसीह के उत्साही शिष्य हैं। उनमें किसी प्रकार का कोई  बुद्धिमता नहीं है।

पागलों की तरह वे  चल रहे हैं। आप पढ़ते हैं वहाँ उनके संगठनों के बारे में, 

आप पढ़ते हैं उन बातों के बारे में जो वे करते हैं, 

 आप आश्चर्यचकित होते हैं; आप देखें, वे ईसा मसीह के शिष्य कैसे हो सकते हैं?

किसी भी तरह से उनको ईसा मसीह पर कोई अधिकार नहीं है, पहली बात

क्योंकि वे ईसा मसीह के बारे में कुछ भी नहीं जानते।

पहले जानना और फिर उनके गुणों को आत्मसात् करना

कुछ चीजें, बहुत, बहुत, मुझे कहना चाहिए, असंभव चीज़ है इन दिनों।

कुछ लोग कहेंगे, “वह एक गरीब परिवार में क्यों पैदा हुए थे? 

उनका जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था – उन्हें मिस्टर फोर्ड (बड़े उद्योगपति) के घर पैदा होना चाहिए था।” कुछ कहते हैं -मेरा मतलब है, आप देखते हैं, दोष ढूंढना और आलोचना करना

अब केवल यही चीज़ बची है हमारे लिए

क्योंकि आप और तो कुछ कर नहीं सकते, इसलिए। तब वे कहेंगे, “उन्होंने स्वयं को सूली पर क्यों चढ़ाया?” उन्होंने आपको सूली (क्रूस) पर नहीं चढ़ाया। उन्हें आपको सूली पर चढ़ा देना चाहिए था, परंतु वास्तव में उन्होंने खुद को   सूली पर चढ़ाया, वही उनकी गलती थी।

मनुष्यों के लिए भी बहुत कठिन है

अवतारों को समझना, क्योंकि वह उनके बिल्कुल विपरीत है। वे बहुत अलग चीज़ें हैं, इसलिए इंसान समझ नहीं सकता। अब वे उनका नेतृत्व करने के लिए हैं, 

वे उन्हें बताने के लिए हैं कि क्या किया जाना है; 

परंतु जिस तरह से वे (इंसान) अवतरणों को समझते हैं, आप देखें, यह कितना अर्थहीन (बेतुका) है।

उदाहरण के लिए, आप जानते हैं कि शिकागो (अमेरिका का एक शहर) में मैं हरे रामा पंथ के प्रमुख से मिली।एक और पहेली थी वह मेरे लिए, वास्तव में,

क्योंकि वह एक बहुत पतली धोती में आए थे 

और बहुत ठंड थी, और वह मेरे सामने कांप रहे थे। तो मैंने कहा, “सर, आपने इतनी पतली धोती क्यों पहन रखी है? आप कांप रहे हैं, मुझे बहुत खेद है। ”उन्होंने कहा, “क्यों? मेरे गुरु ने मुझे बताया है कि मेरे पास एक पतली धोती होनी चाहिए।”

“क्यों?” “स्वर्ग जाने के लिए, अपना उत्थान पाने के लिए। “मैंने कहा, “वास्तव में? उन्होने आपसे ऐसा कहा? परंतु श्री कृष्ण ने कभी पतली धोती नहीं पहनी। “

“किंतु मैं श्री कृष्ण नहीं हूँ,” उन्होंने कहा

देखें कैसे मानव  अपनी बुद्धि से बचने की कोशिश करता है। 

तो अब, उन्होने अपना सर मुंडवा  रखा था और एक बड़ी सी चोटी थी पीछे।

मैंने उनसे पूछा, “आपने अपना सर क्यों मुंडवाया है?”

तो उन्होंने कहा, “क्योंकि मेरे गुरु ने मुझसे कहा कि तुम्हें अपना सर मुंडवाना होगा

अगर तुम्हें स्वर्ग जाना है तो।”तो मैंने कहा, “परंतु श्री कृष्ण ने अपना सर नहीं मुंडाया।”

“नहीं, नहीं, किंतु वह अवतार थे।मुझे अपना सर मुंडवाना होगा इसलिय (क्योंकि) मुझे स्वर्ग जाना है।” इसलिय मैंने उनसे कहा, “देखिए, कबीर ने कहा है,

‘यह भेड़ को मुंडा जाता है और ऊन उतारी जाती है प्रत्येक साल में दो बार। 

और यदि वे सभी स्वर्ग जाती हैं तो आपके लिए जगह कहां बचेगी?’ “

अतः वह मुझे कभी समझे ही नहीं। वह मुझसे बहुत नाराज़ हो गए, 

और उन्होंने मुझसे कहा, “माँ, आप मेरे गुरु के बारे में बुरा कह रही हैं।”

मैंने कहा, “मैं बुरा नहीं कह रही। मैं तुम्हारी माँ हूँ, मैं सिर्फ पूछ रही हूँ 

कि यह पतली धोती पहनने का क्या फायदा, बस इतना ही। 

एक माँ को पूछने का अधिकार है।” वह बहुत क्रोधित हुए, वह चले गए। 

और वह इन ‘हरे रामा’ वालों के प्रमुख हैं! तो अवतार को समझने के लिए भी 

आपको एक आत्मसाक्षात्कारी होना चाहिए, अन्यथा आप नहीं समझ सकते, 

क्योंकि वे बहुत निरर्थक लगते हैं।बिना कोई भी प्रश्न पूछे यदि आप आत्मसाक्षात्कारी बन सकते हैं 

यदि आप प्रश्न पूछते हैं तो यह एक स्तर (डिग्री) कम है

बिना पूछ-ताछ करे यदि आप अपना आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करते हैं, 

बिना किसी प्रश्न के, तब आपको उच्चतम अंक मिलते हैं। 

परंतु यदि आप, पूछताछ करने के बाद और यह चीज़ और वो चीज़

तो आपके अंक कम हैं, क्योंकि  आपकी बुद्धि बहुत क्रियाशील है, 

और जिस व्यक्ति  की बुद्धि क्रियाशील है 

वह   बुद्धि से परे की कोई चीज़ प्राप्त नहीं कर सकता। 

आपको इसे प्राप्त करना होगा  बुद्धि से परे।

यह एक बात है कम से कम यदि आप सभी समझ लें, 

मुझे लगता है मेरा काम हो गया। श्री कृष्ण द्वारा प्रयोग की गई सभी तरकीबें,

श्री राम द्वारा लगाए गए सभी अनुशासन, सभी गुरु जिन्होंने अपने स्तर पर  भरपूर कोशिश की आपको बताने की 

कि क्या करना है, केवल आपको योगी बनाना है

आपको  बुद्धि से परे ले जाकर।

और फिर क्या होता है? फिर आप इस सर्वव्यापी शक्ति से   जुड़ जाते हैं 

जो आपकी देखरेख कर रही है, जो आपकी रक्षा करती है, जो आपकी सहायता करती है; 

 हर प्रकार से आप पूर्णता इंचार्ज हो जाते हैं इस परमचैतन्य के   । 

अब मान लीजिए कि मैं अमेरिका की नागरिकता नहीं लेती

अवश्य ही चाहे मैं कभी न लूँ, किंतु मान लीजिए. तब यह सरकार मेरी इंचार्ज  नहीं है। 

परंतु यदि मैं लेती हूं, तो निश्चित रूप से वह मुझसे कर लेंगे, सभी प्रकार की चीजें करेंगे, 

कोई बात नहीं, किंतु कम से कम वे इंचार्ज  होंगे। 

परंतु यह परमचैतन्य जब यह  नियंत्रण करता है, तो यह प्रेम है, पूर्णतः प्रेम है: 

प्रेम जो सोचता है, समझता है, समन्वय करता है, सहयोग करता है,  कार्य करता है, 

और अत्यंत संवेदनशील है। 

यह  कार्यान्वित होता है – मुझे आश्चर्य होता है, कभी-कभी बहुत आश्चर्य होता है जिस तरह से यह   कार्य करता है, 

बिना चूके, बिना किसी भूल के। आपको बताना भी नहीं पड़ेगा, क्योंकि आप वहां (उस स्थिति में) हैं। परंतु यह विश्वास करना कि हम वहां हैं, यह भी एक कठिन कार्य है। 

सभी अनुभवों के साथ आपको विश्वास होना चाहिए कि आप वहां हैं, 

परंतु यह भी सर्वथा कठिन कार्य है।इसलिए जब हम कहते हैं कि वे स्थापित सहज योगी हैं, 

तो हमारा मतलब यह है कि, वे सम्पूर्ण रूप से एक हैं, 

परमचैतन्य के सम्पूर्ण प्रभार (प्राधिकरण) के तहत।यही हमें  बनना है।

यदि आप इस देश को बचाना चाहते हैं, तो आपको ऐसा होना होगा। 

कोई तर्क नहीं, कोई स्पष्टीकरण नहीं, कुछ भी नहीं; 

कोई लड़ाई नहीं, कोई हड़ताल नहीं, कुछ भी नहीं। किसी इश्तहार (विज्ञापन) की आवश्यकता नहीं है।

आप ही हैं जो सहज योग का विज्ञापन करेंगे।

आप में से हर एक को यह समझना चाहिए कि आपका जीवन

अत्यंत महत्वपूर्ण है इस मोड़ पर। और आपको बनना है वह विशेष व्यक्ति जो – ईश्वरीय प्रेम को प्रतिबिम्बित (reflects) करता है।

आप सबको अनंत आशीर्वाद||