Shri Krishna Puja – Witness State

Campus, Cabella Ligure (Italy)

1998-08-16 Krishna Puja Talk: He Gives You The Witness State, Cabella, Italy, 54' Download subtitles: CS,EN,JA,PT,ZH-HANS,ZH-HANTView subtitles:
Download video (standard quality): View and download on Vimeo: View on Youku: Transcribe/Translate oTranscribe

Feedback
Share

श्री कृष्ण पूजा। कबेला लिगर (इटली), 16 अगस्त 1998

आज हम श्री कृष्ण पूजा करने जा रहे हैं। श्री कृष्ण की शक्ति के बारे में यह एक बहुत महत्वपूर्ण बात है कि, यह आपको एक साक्षी भाव प्रदान करती है। यह बहुत महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि कलियुग और पूर्ण भ्रमित जीवन मूल्यों के इस समय में, सभी प्रकार की उथल-पुथल, इस से बाहर निकलने  के लिए एक बहुत ही जटिल स्थिति बनाती है। साक्षीभाव की अवस्था ध्यान के माध्यम से ही संभव है। आप निर्विचारिता में पहुँच जाते हैं। यह दोनों  संयुक्त है।

अब साक्षी अवस्था एक ऐसी अवस्था है जहाँ आप कोई प्रतिक्रिया नहीं करते। यदि आप प्रतिक्रिया करते हैं, तो समस्या शुरू होती है। यह समझना बहुत सरल है कि हम अपने अहंकार या अपने कंडीशनिंग के कारण प्रतिक्रिया करते हैं। अन्यथा प्रतिक्रिया करने का कोई और कारण नहीं है। कोई भी।

अब, उदाहरण के लिए, यहां एक सुंदर कालीन है। जैसे ही मैं इसे देखती हूं – अगर मैं अपने अहंकार का उपयोग करुं तो मैं सोचना शुरू कर दूंगी , “अब, उन्हें यह कहाँ से मिला? उन्होंने इसका कितना भुगतान किया? ” यह पहली प्रतिक्रिया है। फिर आप इस से आगे भी जा सकते हैं। क्रोध आ सकता है। ”वो इतना अच्छा कालीन क्यों लाए? इसे यहां लगाने की क्या जरूरत थी? ” इस प्रकार एक के बाद एक विचार चलता रहता है। अब अगर मैं अपनी अनुकूलताओं से इन चीजों को देखूँ, तो मैं कहूंगी कि यह रंग कृष्ण पूजा के लिए उपयुक्त नहीं है। इस कृष्ण पूजा के लिए उनके पास कोई और रंग होना चाहिए था। तो इस तरह के विचार एक से दूसरे से तीसरे तक जाते रहते हैं । लेकिन इसका मतलब है कि यह अनुकूलतायें हमारे भीतर ही निर्मित हैं।

हमारे अनुकूलताओं की सभी समस्याएं वास्तव में भयानक हैं। उदाहरण के लिए, जातिभेद  । अमरीका में जातिभेद  है – यह बहुत अधिक है – आप इसे महसूस कर सकते हैं, हालांकि वो नहीं कहते हैं। लेकिन अगर आप वहाँ इटली से जाते हैं, तो आप इसे महसूस करते हैं। यदि आप भारत से भी जाते हैं, तो आप इसे महसूस कर सकते हैं। अब, यह जातिवाद क्यों है? क्या कारण है? हम इतनी प्रतिक्रिया क्यों करते हैं ,  किसी अन्य समुदाय या किसी अन्य रंग  के लिए – जो कि सिर्फ सतही तौर पर सीमित है? अब तर्कसंगत के साथ आप यह समझाने में सक्षम हो सकते हैं, “हे भगवान, ये लोग, ये बिल्कुल बेकार हैं,” या “ये हमारे देश में आ गए हैं और हमें परेशान कर रहे हैं।” ये सारे संस्कार या कुसंस्कार (कण्डीशनिंगस) वहाँ  हैं। लेकिन आप देखें कि जब वो अप्रवासियों की बात करते हैं, तो अमेरिकियों को पता होना चाहिए कि वो स्वयं अप्रवासी हैं, सभी लोग । अमरीका कभी उनका देश नहीं था। और उन्होंने अन्य सभी रेड इंडियंस को बाहर फेंक दिया, उनकी जमीन छीन ली और बहुत अच्छे से – अब वो अमरीका के मालिक हैं। लेकिन प्रभाव यह हुआ कि जो लोग श्वेत-वर्ण नहीं हैं, वो सभी निंदित और प्रताड़ित होते हैं ।

अब, अगर वो स्वभाव से हिंसक हैं, तो यह हिंसा के संस्कार आते हैं। फिर वो एक-दूसरे को मारने लगते हैं। उन्होंने बहुत सारे लोगों को बेरहमी से मार दिया है, यह सोचकर कि उन्हें किसी भी देश में जाने, हर किसी को मारने और भूमि हड़पने का अधिकार है,  जो कि उनकी अपनी नहीं है। वास्तव में, भूमि किसी की भी नहीं होती है। लेकिन किसी को भी अधिकार नहीं है कि वह  किसी भी  भूमि पर जाए और  कब्ज़ा करने की कोशिश करे और उन लोगों को बाहर फेंक दे जो उस देश के नहीं हैं।

कल भारत का स्वतंत्रता दिवस था। और मैंने ध्वज को ऊपर जाते देखा , हमारे  राष्ट्रीय ध्वज को , और ब्रिटिश ध्वज नीचे आते हुए। यह सब इतने संघर्ष के बाद हुआ है, लोगों के इतने कष्टों उठाने के बाद। क्योंकि वो भारत आए, वहां अच्छे से स्थापित हुए ,और वहां के स्वामी बन गए। तो यह भी एक तरह का कुसंस्कार है जो कि सामूहिक रूप से आता है , कि आप किसी के देश में जाएं, वहां से लोगों को हटा दें और एक तरह से  उस जगह पर कब्जा कर लें और स्वामी बन जाएं। यह किसी के घर में जाने जैसा है – जो किसी और का है  और जो लोग अंदर हैं, जो अच्छे से  मालिक या स्वामी के रूप में वहां रहते हैं, उन्हें बाहर फेंक दिया जाता है। क्योंकि उनके पास बेहतर बुद्धि है,  शायद, उनमें धूर्तता अधिक है। इस धूर्तता से, यदि श्वेतवर्ण लोग सोचते हैं कि वो श्यामवर्ण लोगों पर शासन कर सकते हैं तो आप वहां नहीं है, जहाँ आप साक्षी भाव का विकास कर सकते हैं। क्या आप बच्चे को बाहर ले जा सकते हैं ,वह क्यों रो रहा है                 जरूर प्यासा होगा ,ठीक है 

तो इस तरह का संस्कार, महामारी (प्लेग) की तरह होता है और एक देश से दूसरे देश में जाता है, जहां कुछ लोग सोचते हैं कि वो बेहतर हैं और लोगों को नीचा दिखाते हैं। और वहां भी  ऐसे लोग हैं जो इस स्थिति को स्वीकार कर लेते हैं, इस व्यवस्था को स्वीकार कर लेते हैं, जहां उन्हें एक समान माना जाना चाहिए। मैं कहूंगी, अमरीका का उदाहरण लें क्योंकि यह अमरीकियों द्वारा प्रसिद्द किया गया है  और क्योंकि कृष्ण शासक हैं, कृष्ण अमरीका के शासक हैं। वो खुद, श्यामवर्ण थे, खुद अश्वेत वर्ण के थे। और उसी देश में जहां के वो शासक हैं, एक बड़ी बात यह है कि उन्हें इस बात का अहसास ही नहीं है कि यदि सभी अश्वेत, सभी एशियाई लोग उस देश से बाहर निकल जाते हैं, तो मुझे नहीं पता कि उनका क्या होगा। उनके सभी खेलों का प्रबंध अश्वेतों द्वारा किया जाता है। यदि आप किसी भी अमरीकी खेल को देखते हैं, तो 99 प्रतिशत  लोग अश्वेत हैं। फिर यदि आप संगीत भी देखते हैं, तो ये अश्वेत लोग, हालांकि उनके पास काला रंग है,  जो कि सब ठीक है , जैसे कि आपके पास श्वेत रंग हैं, उनके पास अश्वेत रंग है  लेकिन उनके पास एक आवाज है जो श्वेत लोगों के पास नहीं है। वे  इतना अच्छा गा सकते हैं कि कोई भी श्वेत लोग उनका मुकाबला नहीं कर सकते। यह वर्ण के प्रति पूर्ण न्याय है। अब यदि आप एशियाइयों को निकालते हैं, तो सभी डॉक्टर, सभी नर्स, सभी वास्तुकार, सभी अकाउंटेंट, वे  सभी गायब हो जाएंगे। अब, क्या बचेगा ?

आपको यह समझना होगा कि यह रंग ही है – जिसका कुछ भी लेना देना नहीं है – कुछ भी – आपकी बुद्धि से, आपके नैतिक मूल्यों से , आपकी आत्मा से । हम यहां अपनी आध्यात्मिकता को प्राप्त करने के लिए हैं। आत्मा रंग भेद  को नहीं समझती क्योंकि यह इतना सतही है और किसी की, वर्ण के आधार पर निंदा करना, बहुत क्रूरता है। यही अब प्रतिक्रिया के रूप में हो रहा है। हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। तो क्या होता है, कि आप  देखते हैं कि अश्वेत लोग प्रतिक्रिया कर रहे हैं। वो प्रतिक्रिया कर रहे हैं और उनकी प्रतिक्रिया बहुत खतरनाक हो सकती है। प्रतिदिन मैं पढ़ती हूँ कि उनकी  प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, इतनी बुरी तरह से ,  सिर्फ अमरीका में ही नहीं किन्तु सब जगह, अब वे  सोच रहे हैं कि उन्हें ऊपर उठना होगा और इस प्रभुत्व का विरोध करना होगा। 

लेकिन उनके अपने देश में, जहाँ उनके भी अलग-अलग वर्ण हैं- थोड़ी थोड़ी भिन्नता है , मुझे लगता है। वो सभी अश्वेत लोग हैं, लेकिन हो सकता है कि थोड़ी भिन्नता हो। तो वे  समूह बनाते हैं और एक-दूसरे का गला काटने लगते हैं। मैंने टेलीविजन में  देखा है कि वो कितनी बेरहमी से हत्या करते हैं। मुझे नहीं पता कि रंग  का क्या अंतर है, लेकिन किसी तरह उन्होंने समूह बना लिए हैं और यह समूह जाएगा, उस समूह को मार देगा और वह समूह आएगा और हत्या करेगा। यह कौरवों और पांडवों की तरह नहीं है। यह दो प्रकार के लोग नहीं हैं, बिल्कुल विपरीत। ऐसा नहीं है कि यहाँ नकारात्मक और सकारात्मक लोग है। नहीं हैं । वो सभी नकारात्मक हैं, चाहे वो श्वेत हों या अश्वेत। और वो आपस में झगड़ने और लड़ने लगते हैं।

अब यह हिंसा इतनी बढ़ रही है। मुझे लगता है कि हिंसा एकमात्र हथियार है, जिसका इस्तेमाल वो अब खुद को व्यक्त करने के लिए करते हैं। आप  देखते हैं कि यहाँ कुछ होता है, तो  कहीं न कहीं वहां वो बम विस्फोट करते हैं और कई निर्दोष लोगों को मारते हैं। यह बहुत, बहुत बड़ा अधर्म है, ऐसा करना । यहां तक कि थोड़ी सी भी हिंसा पाप है, और इस प्रकार की हिंसा, श्रीकृष्ण की दृष्टि में पूर्णतया दंडनीय है। अब, यह अहंकार द्वारा आता है। आप सोचते हैं कि अगर आप एक समुदाय से हैं, तो आप दूसरे समुदाय का वध कर सकते हैं, या ऐसा ही कुछ। मानव मन में एक विचित्र विचार आता है और आप तय कर लेते हैं कि आपको किसी अन्य व्यक्ति को मारने का अधिकार है। अब कोई कह सकता है कि यह घृणा से आता है, लेकिन घृणा अहंकार का परिणाम है। जब अहंकार क्रियाशील होता है, तो वह नफरत, अनधिकृत अधिकार, क्रोध, हिंसा जैसी चीजों को एकत्रित करता है। ये सब अहंकार के कारण बाहर आने लगते हैं, जो वास्तव में व्यक्ति को अंधा कर देते हैं। आप इस तथ्य के प्रति दृष्टिहीन हो जाते हैं  कि हिंसा करने की जरूरत नहीं है, किसी से घृणा करने की जरूरत नहीं है, इस अहंकार के कारण, जो की यहाँ है, किसी को मारने की जरूरत नहीं है।

अब कोई कह सकता है, “माँ, यह अहंकार मनुष्य में  कैसे उत्पन्न होता है?” बेशक, ज्यादातर यह प्रतिक्रियाओं के कारण होता है। इसके अलावा, यह गलत संस्कारों (कंडीशनिंग) के कारण भी है। यदि बच्चे को बचपन से बताया जाता है कि, “आपको इन लोगों से घृणा करनी चाहिए, उनसे घृणा करनी है। वो गलत लोग हैं, वो बुरे लोग हैं। ” तो वो बस ऐसा करने लगते हैं। जब वो बड़े होते हैं तो वो दिखाना शुरू कर देते हैं, कि नफरत अब एक कैक्टस की तरह है, बड़ी होती जा रही है और दूसरों को मार रही है।

मानव द्वारा इस तरह के व्यवहार का कोई औचित्य नहीं है। यदि वे  मानव हैं, तो उनके पास मानवीय गुण होने चाहिए। और यह जो है तभी संभव है जब आप सीख जाते हैं कि किस प्रकार केवल साक्षी रहना है और प्रतिक्रिया नहीं करनी है। उदाहरण के लिए, आप देखते हैं कि दो मुर्गे लड़ रहे हैं। आप उसका आनंद लेते हैं। दो मुर्गे लड़ रहे हैं। लोग आनंद ले रहे हैं। एक मुर्गा मर जाता है – वो बहुत खुश होते हैं, जैसे कि जो मर गया, उसने उनके माता-पिता को मारा था या ऐसा कुछ किया था । बहुत  आश्चर्यजनक। अब स्पेन में, अब भी  बैलों की लड़ाई हर साल चल रही हैं। हर साल, छह बार बैलों की लड़ाई । हर साल और हॉल में हमारे यहाँ से दस गुना अधिक लोग होते है। और हमेशा भरा हुआ रहता है। और अब महिलाओं ने बैलों की लड़ाई शुरू कर दी है। अब यदि बैल नहीं मरता है, तो वे, बैलों को सड़क पर जाने और लोगों को मारने की अनुमति दे देते हैं। इस तरह का हिंसक आनंद अब भी लोगों के मन में घूम रहा है। ऐसे लोगों को देखकर बहुत दुख होता है ,जो मानवता की बात कर रहे हैं, शांति की बात कर रहे हैं, खुशी की बात कर रहे हैं,  अभी भी इन हिंसक कार्यों का आनंद ले रहे हैं। या तो वो कर रहे हैं, या वो देखना चाहते हैं।

तो फिर आप उन फिल्मों और वस्तुओं पर जाते हैं, जो कि भयानक हिंसा पर बनी हैं और लोग इसका आनंद लेते हैं, ऐसी फिल्मों का आनंद लेते हैं और ऐसी फिल्में फिर से बनती हैं। अब, अगर आप सच में साक्षी स्थिति में बन जाते हैं, अगर आप साक्षी अवस्था में आ जाते हैं, तो क्या होगा? यदि आप ऐसी कोई भी चीज देखते हैं, जो हो रही है, तो वह ख़त्म हो जाएगी। यदि आप साक्षी अवस्था में हैं और उस स्तर पर हैं , तो आपके समक्ष कोई दुर्घटना नहीं होगी। यहां तक कि अगर कोई दुर्घटना होती भी है, तो आप उस व्यक्ति को बचा सकते हैं, आप उस व्यक्ति की सक्रिय रूप से मदद कर सकते हैं। यह बहुत छोटे पैमाने पर है। लेकिन बहुत बड़े पैमाने पर भी, आप इसे कर सकते हैं ,कुछ अदभुत ।

मुझे याद है कि मैं उस समय बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन हम सचिवालय के निकट एक घर में रहते थे, जहाँ उन्होनें एक हड़ताल की थी। और वो एक अलग महाराष्ट्र या ऐसा कुछ माँग रहे थे। पुलिस वहां खड़ी थी और मुख्यमंत्री के आदेश पर, वो सभी को गोली मार रहे थे, जो वहां आ रहे थे। जो भी उस सड़क से गुजर रहा था , वो उसे गोली मार रहे थे। वो सभी गोलीबारी के खेल का आनंद ले रहे थे। मैंने यह सब देखा और मैं इसे सहन नहीं कर पायी। मैं बस नीचे गयी और पुलिस को इसे रोकने के लिए कहा। वो रुक गये!

आप चकित हो जायेंगे। वो रुक गये। फिर मैं उन घायल लोगों को अपने घर में ऊपर ले गयी, उनके शरीर से गोलियां आदि सब निकालीं, एंबुलेंस को बुलाया और उन्हें बचाया। लेकिन उसके लिए, एक बात थी , मैं साक्षी अवस्था में थी, और इससे आप निर्भय हो जाते हैं।

कोई भी डर नहीं रहता, जब एक बार आप साक्षी भाव सीख जाते हैं। क्योंकि जब आप साक्षी भाव में नहीं होते, तब आप विचलित होते हैं , आप परेशान होते हैं , आप उत्तेजित होते हैं। आप ऐसे गलत तरह के लोगों से भी जुड़ सकते हैं। किन्तु अगर आप साक्षी-भाव की स्थिति में हैं, तो वह अपने आप में, एक शक्ति है। और यह साक्षी अवस्था आपको अन्य लोगों की बहुत सी कठिनाइयों से जीतने में मदद करती है।

एक संत के बारे में एक चीनी कहानी है। एक राजा अपने मुर्गे को उनके पास लाया और कहा, “आप मेरे मुर्गे को इस तरह प्रशिक्षित करिये कि वह जीत जाए।” उन्होंने कहा, “ठीक है।” तो  उन्होंने राजा के मुर्गे को एक महीने तक रखा। और जब कार्यक्रम शुरू हुआ, तो अलग-अलग जगहों से अलग-अलग मुर्गे आए और वो सभी लड़ने लगे। यह मुर्गा सिर्फ खड़ा रहा और देखता रहा, बस देखता रहा। और दुसरे मुर्गे  उससे भयभीत हो गए। वो समझ नहीं पा रहे थे कि यह कैसे अशांत नहीं है । वह सिर्फ देख रहा है, खड़ा है, वह कुछ नहीं कर रहा है। इसलिए वो सभी अखाड़े से गायब हो गए और उस मुर्गे को विजयी घोषित कर दिया गया। अहिंसा लाने का यह सबसे अच्छा तरीका है। हिंसक स्थानों पर, आप जाएँ और  स्थिरतापूर्वक खड़े हो जाईये, सामने हो रही सभी चीजों का सामना करते हुए। और वह साक्षी भाव कार्यान्वित होता है, कार्य करता है, और वहां चल रही हिंसा को रोकता है।

लेकिन साक्षी अवस्था, मानसिक स्थिति नहीं है। यह एक आध्यात्मिक उत्थान की स्थिति है जहां आप एक साक्षी बन जाते हैं। साक्षी अवस्था का अभ्यास करने का सर्वोत्तम तरीका है , किसी की आलोचना न करना। आलोचना नहीं करनी । मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो हर समय दूसरों की आलोचना करते रहते हैं। वो खुद की आलोचना नहीं कर सकते इसलिए वो दूसरों की आलोचना करना शुरू कर देते हैं, इतनी  कि वो यह भी नहीं देख पाते कि उनके साथ क्या गलत है। वो यह भी नहीं देख पाते कि उन्होंने दूसरों के साथ क्या गलत किया है क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्हें दूसरों की आलोचना करने का अधिकार है। और उनको इस आलोचना से अत्यंत आनंद प्राप्त होता है। दरअसल, आलोचना के योग्य कुछ भी नहीं है। आप सिर्फ अपनी तरफ दृष्टि रखें और देखें। बस यही आपका अधिकार है। आपको किसी व्यक्ति की या किसी भी चीज की आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है। लेकिन कुछ लोग सोचते हैं कि यदि आप आलोचना नहीं करेंगे, तो यह इस तरह से चलता ही रहेगा और कभी नहीं रुकेगा। ऐसा नहीं है। एक बार जब आप उस चीज़ की ऒर दृष्टि करते हैं – केवल दृष्टि , तो आपका चित्त स्वयं ही जागृत  हो जाता है। उस जागृत  चित्त से आप बस देख सकते हैं और वहां हो रही अनुचित बात को रोक सकते हैं। लेकिन हम हमेशा सचेत रहते हैं कि हम कुछ महान हैं और हमें यह करना है, वह करना है। इन परिस्थितियों में, क्या होता है कि आप एक और समस्या बन जाते हैं। क्योंकि आप कर क्या सकते हैं? आप कुछ नहीं कर सकते। लेकिन आप जो कर सकते हैं वो है साक्षी भाव से देखना। 

देखने से और केवल चीजों की ओर दृष्टि करने से, जैसी भी वो हैं , आप अपने अस्तित्व की बहुत ख़ास अवस्था विकसित कर लेते हैं। सर्वप्रथम, ऐसे सभी लोग जो सिर्फ साक्षी हैं , उनके साथ क्या होता है, यह बहुत दिलचस्प है , कि उनकी स्मृतिहानि बहुत कम होती है क्योंकि वो जो कुछ भी देखते हैं, वह उनके लिए एक तस्वीर की तरह हो जाता है , जैसे, हम कह सकते हैं, वो आपको रंग भी बता सकते हैं, उसकी तह, सब कुछ। वो जो कुछ भी देखते हैं, वह उनके दिमाग में एक तस्वीर की तरह होता है, और वो आपको सब हूबहू बता सकते हैं, जो उन्होंने देखा है। और आपकी याददाश्त नहीं खोती । किन्तु जब आप प्रत्येक चीज़ पर प्रतिक्रिया करते हैं, तो आपकी याददाश्त खराब हो जाती है। लोगों को प्रतिक्रिया करने की इतनी आदत है। जैसे मुझे एक सज्जन का पता है, उन्हें प्रतिक्रिया करने की आदत थी और मैं उनके साथ कार में जा रही थी । वो हर विज्ञापन, हर दुकान का नाम, हर व्यक्ति, हर एक चीज को पढ़ रहे थे और सब बता रहे थे कि वह कौन है, यह क्या है। मैं हैरान  थी, “इन सज्जन को देखो, ये बहुत बात कर रहे हैं । इनका क्या होगा?  ”लेकिन अंततः मैंने पाया कि ऐसे सभी लोग, जो हर समय प्रतिक्रिया करते रहते हैं, वास्तव में हो गए हैं, मुझे लगता है – बुढ़ापे में क्षीण हो जाते हैं या शायद भुलक्कड़ हो जाते हैं, बहुत भुलक्कड़ ।

परंतु  हमारा केवल यही नुकसान नहीं है। इस प्रकार के लोग, जब साथ में एक सामूहिकता में आते हैं, तो वो बहुत खतरनाक हो सकते हैं। क्योंकि उस तरह के स्वभाव के साथ, उन्हें कुछ करते रहना होता है। उन्हें अवस्य कुछ करना होता है  क्योंकि, आखिरकार, वो एक उद्देश्य के लिए एक साथ जुड़ते हैं या, हम कह सकते हैं, कुछ प्रतिक्रियाओं के लिए, जो उन सभी ने मिलकर निर्मित की हैं। छोटी चीजों में, बड़ी चीजों में, आप पाएंगे कि लोग ऐसा ही करते हैं। और कुछ लोग जो बहुत अधिक, इस तरह के व्यवहार में बहुत विकसित हैं, वो बहुत से लोगों को इकट्ठा कर सकते हैं और दूसरों को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचा सकते हैं।

मुझे हिटलर की छवि याद आ रही है । नौ साल तक यह व्यक्ति देखता रहा कि यहूदी क्या गलत कर रहे हैं। वह यह नहीं देख रहा था कि जर्मन लोग क्या गलत कर रहे हैं-वो समाज के लिए क्या गलत कर रहे हैं। और उस समय समाज भी बहुत खराब था क्योंकि उनके पास सभी प्रकार की स्वच्छंदता थी। अब वह सब लिख रहा था, “ये यहूदी ऐसे हैं, वो ऐसा करते हैं, वो पैसे लेते हैं, वो पैसे उधार देते हैं।” हर तरह की बातें उसके दिमाग में समा गईं। उसी के परिणामस्वरूप, उसने अपने अंदर एक प्रतिक्रिया निर्मित कर ली कि, “हमें किसी न किसी तरह यह देखना चाहिए, कि ये लोग जर्मनी से दूर चले जाएं।” लेकिन फिर उसने सोचा, “भले ही वो जर्मनी से चले जाएं , वो फिर से समृद्ध हो जायेंगे । तो, क्यों ना उनकी हत्या कर दी जाये ? ” मेरा मतलब है कि – इस हद तक – आप जानते हैं – कि आप ऐसी फिल्में नहीं देख सकते। जिस तरह का काम  हिटलर ने किया, आप उस प्रकार का कुछ भी नहीं देख सकते। लेकिन उसने ऐसा किया। और वो लोग जो  उसके अनुयायियों थे , उन्होंने  भी ऐसा किया – बिना किसी अड़चन के, जैसे कि यह बहुत खुशी या प्रसन्नता की बात थी, या शायद यह एक कर्तव्य था । वो हजारों-हजारों यहूदियों की हत्या जैसे भयानक कार्य के प्रति इतने कर्त्तव्य-बाध्य कैसे हो सकते थे? यहूदियों ने उनके साथ जो किया, वो उसे ठीक कर सकते थे। लेकिन वो इस तरह की हिंसा में क्यों लिप्त हुए और वे दुनिया के सभी यहूदियों को खत्म करना चाहते थे?

यह बहुत, बहुत खतरनाक हो सकता है क्योंकि एक बार जब आप अपनी साक्षी अवस्था को खोने लगते हैं, तो आप नकारात्मक सामूहिकता में गिर सकते हैं। और इस प्रकार यह नकारात्मक सामूहिकता, इतने बुरे रूप से कार्य करती है कि दुनिया के सभी संघर्ष, दुनिया की सभी समस्याएं, शायद, इसके साथ जुड़ जाती हैं। तो सहज योगियों के रूप में, हमें क्या करना चाहिए? हमें प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए। हमें प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए। यदि  आपको कुछ गलत दिखता है — ठीक है, आप उस पर ध्यान-धारणा करिये । आप ध्यान-धारणा करिये। अगर आपको कुछ भी गलत लग रहा है – ठीक है – उस पर ध्यान-धारणा करें। यदि कोई आपके प्रति कठोर है, तो उस समय प्रतिक्रिया न करें। बाद में, जब वह व्यक्ति शांत होता है ,तब आप उसे बताईये । क्योंकि उस समय जब वह इतना अस्थिर होता है – या होती है – अगर आप बताएंगे तो कुछ नहीं होगा। धीरे-धीरे – मैं यह नहीं कहती की हमेशा , आप ऐसे लोगों पर जीत हासिल कर सकते हैं। लेकिन धीरे-धीरे आप उन्हें समझाने में सक्षम हो सकते हैं कि यह गलत है – वो कार्य करना गलत हैं जो वो कर रहे हैं।

एक तरह से – आप देखते हैं – किसी भी मूर्खतापूर्ण कार्य पर प्रतिक्रिया करना भी बहुत आत्म-विनाशी हो सकता है। जैसे  कुछ लोगों में प्रतिक्रियाएं अन्तर्निहित होती हैं, जैसे आपने श्री क्लिंटन का व्यवहार देखा है। मेरा मतलब है कि आप समझ नहीं सकते कि – उनके स्तर के, उनके कद के व्यक्ति को ऐसी प्रतिक्रियाएँ करनी चाहिए। लेकिन यह उनके बचपन से ही होगा या मुझे नहीं पता कि उनमें यह कैसे विकसित हुई। अब वो मुसीबत में है। बहुत ही शर्मनाक है। यह भी – मुझे लगता है कि – शायद, प्रतिक्रियाओं के अतिभोग से आता है। आपको प्रतिक्रिया क्यों करनी है  किसी महिला को ?  मैं नहीं समझ सकती – या किसी आदमी को। और यह आज की संस्कृति की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है, विशेषतः सभी विकसित देशों में – जहाँ हर समय पुरुष महिलाओं को देखते रहते हैं , महिलाएं पुरुषों को देखती रहती हैं। किस लिए? शायद वो महिलाओं को देखते हैं क्योंकि वो देखना चाहते हैं कि कितनी महिलाएं उन्हें देख रही हैं। या वो पुरुषों को देखती हैं, शायद इसलिए कि कितने पुरुष उन्हें देख रहे हैं। क्यों? ये क्यों हो रहा है? क्योंकि उनमें कुछ हीन भावना है या फिर वो सभी का ध्यान आकर्षित करना चाहती हैं।

मेरा मतलब है, आजकल भयंकर हरकतें की जाती हैं, दूसरों का ध्यान आकर्षित करने के लिए, दूसरों की सहानुभूति लेने के लिए। मेरा मतलब है कि – यदि आप अपनी जागरूकता  के स्तर को देखें, कि यह कहाँ जाता है, तो आप आश्चर्यचकित होंगे। जैसे कि एक महिला ने सिर्फ दूसरों से सहानुभूति पाने के लिए अपने आठ बच्चों की हत्या कर दी । सोचिये, कि लोग ऐसे भयानक कार्य कर रहे हैं! अब यदि आप चाहते हैं कि दूसरे लोग प्रतिक्रिया करें, तो आप ऐसा करते हैं। वो चाहते हैं कि दूसरे लोग उनको देखें या प्रतिक्रिया दें – मुझे नहीं पता – या उनको महत्व दें – आप कह सकते हैं। लेकिन ऐसे खोखले महत्व का क्या फायदा? लेकिन लोग इसको खोज  रहे हैं। और यह आधुनिक जीवन की एक बहुत सामान्य बीमारी है। हर समय – आपको कैसा दिखना चाहिए, आपको कैसा प्रतीत होना चाहिए, आपको कैसे चलना चाहिए। सब कुछ इतना व्यर्थ और ऊर्जा का अपव्यय है।

परमात्मा ने मनुष्यों को बहुत बहुत  भिन्न बनाया है। उनमें से कोई भी प्रतिलिपि नहीं हैं, कोई भी नहीं। यहां तक कि प्रकृति में आप पेड़ों की पत्तियाँ देखते हैं, वो इतनी विशिष्ट हैं कि आप उन्हें एक दूसरी पत्तियों  के साथ मेल नहीं कर सकते हैं। तो इसी तरह इंसानों को बनाया जाता है – अलग प्रकार से । वो ऐसे ही बने हैं। आपको स्वीकार करना होगा। आप जो भी हैं, ठीक हैं। आप किसी अन्य व्यक्ति की तरह क्यों दिखना चाहते हैं? इस तरह की प्रतिक्रिया बेहद मूर्खतापूर्ण है, मुझे लगता है कि हम अपनी ऊर्जा और जीवन को पूर्णतयः निरर्थक चीजों  के लिए व्यर्थ कर रहे हैं।

अब सहज योगी होने के नाते, आप अत्यंत मूल्यवान हैं। आप मनुष्यों को, इन मूर्खतापूर्ण विचारों और तरीकों से मुक्त करने के लिए यहां आए हैं। जिस तरह से लोग व्यवहार कर रहे हैं ,  मुझे नहीं पता कि किसे दोष देना चाहिए , लेकिन अचानक हमारा चित्त बहुत विविधताओं में चला गया है। हमारी प्रतिक्रियाएँ बहुत ही  हास्यप्रद हो गई हैं। कोई नहीं जानता कि लोग इस तरह की प्रतिक्रिया क्यों करते हैं और फिर हम इस बात की चिंता क्यों करते हैं कि लोग क्या प्रतिक्रिया देते हैं। ये सभी बातें न केवल व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि सामूहिक स्तर पर भी हैं। फलस्वरूप, आप देखते हैं, जीवन के नए प्रकार के मूल्य स्थापित हो गए हैं।

उदाहरण के लिए, अब एक माँ – वह दावा करेगी कि उसके पीछे कितने आदमी दौड़ रहे हैं। या वह सोचती होगी कि वह एक बेहतरीन अभिनेत्री हैं। मुझे नहीं पता कि वो अपने बारे में क्या सोचते हैं। और जिस तरह से वो अपने बारे में बात करते हैं, वह कुछ विचित्र है। यदि वह एक माँ है, तो उसे एक अच्छी माँ बनना है और उसे एक माँ की तरह दिखना है, लेकिन वो इस प्रकार मग्न हैं, या वह इस आधार पर खड़ी हैं कि उन्हें आकर्षक बनना है, उन्हें रानी बनना है  या मैं नहीं जानती क्या – कि वो क्या पदवी चाहती हैं।

यही पुरुषों के साथ भी। आप देखिये – अगर आपके भीतर कुछ है, अगर आपके भीतर कोई गुण है, या क्या कोई ऐसी चीज है जो आपको एक महान व्यक्ति के रूप में योग्यता प्राप्त करा सकती है, वह दिखायी देगी। आपको प्रचार नहीं करना है। आपको इसे सर पर नहीं चढ़ाना है। कुछ नहीं। यह दिखाई देगा। अगर आप जनता की राय की परवाह नहीं करेंगे तो, मुझे लगता है कि आप बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं। अधिकतम निराशा गायब हो जाएगी।

सहज योग में भी, मैंने देखा है कि लोग बहुत दिखावा करना चाहते हैं। मुझे पता है कि कौन करता है। लेकिन उन्हें पता होना चाहिए। एक बार जब आप बाहर की ओर प्रतिक्रिया नहीं करते हैं, तो आप अंदर की ओर प्रतिक्रिया करना शुरू करते हैं और आत्मनिरीक्षण ठीक से शुरू हो जाता है। जब आप अपने आप को देखते हैं, तो आप आश्चर्यचकित होंगे कि आप कितनी सराहना करते हैं, आप कितने खुश हैं। अब अगर आप उससे थोड़ा और आगे जाते हैं, तो आप इन सब  चीजों के बारे में नहीं सोचते हैं, आप बस निर्विचार हो जाते हैं और आप एक ऐसे व्यक्ति के रूप में उठते हैं, जो कि आदरणीय है, लोग जिसकी संगत में रहना चाहते हैं, जिस से प्रेम करते हैं  और जिसकी  देखभाल करते हैं। इसलिए किसी को यह चिंता नहीं करनी चाहिए कि लोग क्या प्रतिक्रिया देते हैं, वो आपके बारे में क्या कहते हैं, वो आपके बारे में क्या सोचते हैं। आपको केवल  आत्मनिरीक्षण करना चाहिए और स्वयं ही देखिये । कुछ समय बाद, आपको आत्मनिरीक्षण की भी आवश्यकता नहीं है।

यह एक प्रकार की अवस्था है – जिसके बारे में मैं बात कर रही हूँ , जहाँ श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि, “मैं युद्ध नहीं करूँगा। इसलिए मेरे और सेना के बीच, मेरी सेना , आपको चयन करना होगा। ” तो कौरवों ने कहा, “नहीं, हम आपकी सेना लेंगे। आप हमें अपनी सेना दे दें, हम अपनी सेना को मजबूत करेंगे। ” लेकिन अर्जुन ने कहा, “मुझे सेना नहीं चाहिए। मुझे आप चाहिए । आप लड़ना नहीं चाहते, तो कोई बात नहीं।” क्योंकि यद्यपि वो वहां केवल साक्षी स्वरुप होंगे, वो युद्ध नहीं कर रहे होंगे , लेकिन उनकी शक्ति कार्य करेगी। उन्हें युद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन उनकी अपनी शक्ति – जो बाह्य रूप से शांत है , पर  कार्य करेगी। और इसी तरह हम युद्ध जीतेंगे।

इसलिए, आप सभी को साक्षी स्वरुप की इस शक्ति का विकास करना चाहिए। इसे विकसित करने का प्रयास करें – कि जब आप प्रतिक्रिया कर रहे हों, तो प्रतिक्रिया रोक दें। सब कुछ के बारे में प्रतिक्रिया करना बंद कर दें। आप आश्चर्यचकित हो जायेंगे। आप अपने आप को एक बहुत, बहुत शक्तिशाली व्यक्ति जान पाएंगे – माने – आपकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं रहेगी, आपकी कोई इच्छा नहीं रहेगी, आपकी  कोई विशेष रुचि  या कुछ ऐसा नहीं होगा। आप बस नाटक देख रहे होंगे। साक्षी भाव भी बहुत दिलचस्प है। क्योंकि तब आप हर चीज के पीछे के हास्यरस को समझते हैं । आप हर चीज के पीछे की मूर्खता को समझते हैं। आप यह भी समझते हैं कि लोग कैसे हिंसक हो गए हैं और आप बस उन पर हंसेंगे। आप परेशान, उत्साहित, कुछ नहीं होते। आप बस इस पर हँसिये। कुछ समय बाद, आप चकित हो जाएंगे। आपकी साक्षी अवस्था का उत्थान होगा। और जब सामूहिकता में आप सभी, उस साक्षी भाव पर होते हैं, तो आप बिना कुछ किए, बिना कुछ कहे, बिना कुछ कार्य किए, चमत्कार कर सकते हैं। केवल आपकी उपस्थिति, स्वयं, काम करती है। मैं यह नहीं कहती कि इसका प्रभाव सभी पर पड़ेगा। नहीं, नहीं कह सकती ।किन्तु अधिकांश लोगों पर ।

कोई भी व्यक्ति जो उस अवस्था में है, वही है जो  शांति लाता है, आनंद लाता है। मैं आपको एक सहज योगी की कहानी सुनाती हूँ, जो एक अन्य द्वीप पर जा रहे थे , वो एक द्वीप पर रह रहे थे – सहजयोग कार्य के लिए। और उन्होंने पाया कि पूरा आकाश काले, गरजने वाले बादलों से ढका हुआ था। तो उन्होंने बस इस तरह बादलों को देखा और कहा, “रुको, जब तक मैं वापस आता हूं। मैं माँ का काम करने जा रहा हूँ। ” वे  दूसरे द्वीप पर गए। उन्होंने कार्यक्रम किया। सब कुछ हुआ और जब वो वापस आए  तो वो सोना चाहते थे और अचानक बारिश होने लगी और बादल गरजने लगे। यहां तक कि प्रकृति भी समझती है। प्रकृति समझती है कि आप साक्षीभाव की उस महान अवस्था में हैं।

लेकिन अगर आप बहुत महत्वाकांक्षी हैं — सहज योग में भी मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो बहुत महत्वाकांक्षी हैं। वो नेता (लीडर) बनना चाहते हैं – मुझे नहीं पता और क्या-क्या । वास्तव में  यह सब एक मिथ्या है। वो सभी काल्पनिक चीजें प्राप्त करना चाहते हैं और काल्पनिक चीज़ों के बारे में चिंता करते रहते हैं। एक बार जब आप साक्षी भाव  सीख जाते हैं, तो आप मिथ्या को जान जाएंगे। आपको अर्थहीनता का ज्ञान हो जायेगा। आप माया को जान जाएंगे। इसलिए व्यक्तित्व की समस्याओं को दूर करने के लिए, सबसे उत्तम बात है साक्षीभाव होना । साक्षीभाव का अभ्यास करिये । सब कुछ। बात करने से पहले, साक्षीभाव का अभ्यास करिये । कोई भी टिप्पणी देने से पहले, बस साक्षीभाव में देखना शुरू कर दें। यह एक बहुत ही संतोषजनक प्रवृति है।

श्री कृष्ण के जीवन में, उनके पास  सबसे बड़ी शक्ति थी कि वो एक साक्षी व्यक्तित्व थे। बिना कुछ किए, बिना हाथ में तलवार लिए, बिना युद्ध की बात किये, वही हैं जिन्होंने पांडवों को युद्ध जीतने में मदद की। न केवल ये – बल्कि गीता के माध्यम से उन्होंने हमें यह बताने की कोशिश की – कि बुराई पर जीत प्राप्त करने के लिए हमें क्या करना है। संपूर्ण गीता, साक्षी अवस्था है, जिसके बारे में उन्होंने वर्णन किया है। यदि अब आप गीता पढ़ते हैं, इस दृष्टिकोण से, तो आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्रत्येक जगह वो एक साक्षी की तरह हैं , उस सबका वर्णन करते हुए, जो उन्होंने देखा। और वो आपको बताएँगे कि कैसे इस साक्षी भाव ने उनकी, मनुष्य को भी समझने में सहायता की।

वो एक व्यक्ति हैं – हमें कहना चाहिए – जो इतने बड़े व्यापारी नहीं थे । क्योंकि सर्वप्रथम उन्होंने आपको बताया कि कैसे स्थितप्रज्ञ बनें। स्थितप्रज्ञ वह है जो कि साक्षी अवस्था में है। यदि आप स्थितप्रज्ञ सम्बंधित सभी छंदों को देखते हैं, तो यह कुछ भी नहीं है, परन्तु एक व्यक्ति जो साक्षी अवस्था में है – वह कैसे रहता है, वह कैसे खुश है, वह चीजों को किस दृष्टि से देखता है। यह दिलचस्प है, बहुत दिलचस्प है। वो पहले वर्णन करते हैं – तेज लोगों  की तरह नहीं जो पहले बुरी बात का वर्णन करते हैं – लेकिन वह अच्छे से प्रारंभ  करते हैं । फिर वो अन्य चीजों की ओर जाते हैं और तब वो आपको तीन पहलू के बारे में  बताते हैं | 

पहले वो कर्म के बारे में बात करते हैं और बहुत से लोग उसी बिंदु पर अटक जाते हैं , कि हम जो भी कर्म कर रहे हैं, हमें उससे पुण्य मिलेगा । परंतु ऐसा नहीं है | उन्होंने ऐसा नहीं कहा। यदि आप उन्हें जानते हैं, तो आप को ज्ञात है कि उनका ये अर्थ कभी भी यह नहीं था। वो क्या  कहते हैं कि, “आपको जो भी कर्म करना है, आप कर सकते हैं, लेकिन परिणाम परमात्मा की शक्ति पर छोड़ दें। ” परिणाम परमात्मा से मिलते हैं। अब शायद कुछ लोग सोचते हैं कि उन्होंने अच्छे कर्म किए हैं, इसलिए उन्हें पैसा मिला है और उस पैसे से सभी प्रकार के बुरे कर्म करने लगते हैं। उन्होंने ऐसा नहीं कहा। उन्होंने कहा, “फल  परमात्मा पर छोड़ दें।” क्योंकि परमात्मा अच्छी तरह से जानते हैं कि आपके लिए क्या है। और इसलिए, यदि आपको लगता है कि आपने कुछ अच्छा किया है – आपने कहीं गरीबों की सेवा की है, आपने महिलाओं के लिए वास्तव में कुछ अच्छा किया है, या कुछ भी – उसका परिणाम, आप परमात्मा के श्री चरणों पर छोड़ दें। मतलब  कि आपने जो कुछ भी किया है, उसके लिए आप अहंकार को न बढ़ने दें। उन्होंने यह बहुत अच्छी तरह से लिखा है, लेकिन उन्हें समझने के लिए, एक बार फिर से साक्षी अवस्था होनी चाहिए कि उन्होंने कर्म के बारे में क्या लिखा है।

फिर उन्होंने ज्ञान के बारे में लिखा है। ज्ञान का अर्थ है, जहां आपको ज्ञात है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप किताबें पढ़ते रहें,  कभी नहीं। ज्ञान का अर्थ है यह जानना कि आप क्या हैं । इसका मतलब है कि आपको एक सहज योगी बनना है, जिससे कि आप चैतन्य के माध्यम से बहुत सी चीजों को जान सकते हैं। ज्ञान का मतलब किताबें पढ़ना नहीं है। किताबें पढ़ने से आप अधिक अज्ञानी हो जाते हैं। तो ज्ञान का अर्थ है कि आप  स्वः को जरूर  जान लें। यदि आप अपने स्वः को नहीं जानते हैं, तो आप कुछ भी नहीं जानते हैं। तो यहाँ बात आती है कि आपको अपना आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करना है, आपको अपना स्वः पता होना चाहिए। यह उन्होंने दूसरी बात कही है।

अंत में, वे  भक्ति के बारे में बात करते हैं । भक्ति श्रद्धा है। यह भी श्री कृष्ण की एक और युक्ति है, जिस तरह से उन्होंने भक्ति का वर्णन किया है। अब आप सड़क पर लोगों को “हरे रामा , हरे कृष्णा ” गाते हुए पाते हैं। एक शब्द में उन्होंने निष्कर्ष निकाला है, वो कहते हैं कि आपको अनन्य भक्ति करनी है । अनन्य का अर्थ है “जब कोई दूसरा न हो”। इसका मतलब है कि जब आप पूर्णतया परमात्मा में लीन हो जाते हैं। आप परमात्मा के साथ एकाकार हैं, तब  आपको भक्ति करनी चाहिए, अन्यथा मैं स्वीकार नहीं करता। वे  कहते हैं कि यदि आप मुझे  कुछ पत्ते  या फल या फूल देते हैं, तो मैं स्वीकार कर लूंगा ।मैँ स्वीकार कर लूँगा , लेकिन उनके लिए असली भक्ति तभी संभव है, जब आप परमात्मा के साथ एकाकार हो जाएं। अन्यथा यह सिर्फ एक दिखावा है। तो यह तीसरा भक्ति वाला भाग भी आत्म-साक्षात्कार के बाद आता है।

अब भक्ति में – आप देखते हैं – कि “क्या मूल्य है ” और “आपने इसके लिए कितना भुगतान किया है” और “आपने इसे कैसे खरीदा” ,इत्यादि नहीं है | यह महत्वपूर्ण नही है। इसके लिए एक महान उदाहरण है, श्री राम का, जब वो जंगलों में गए थे। वहां अनुसूचित जाती की एक बूढ़ी औरत थी – मतलब वह एक भीलनी थी – जैसा कि कहते हैं – ये लोग जंगलों में रहते हैं। तो  वह कुछ बेर ले आयीं और श्री राम को अर्पित किये। उसने  कहा कि, “मैंने इन सभी को चखा है और वो खट्टे नहीं हैं। इन सभी को मैंने चखा है।” अब भारत में किसी के चखने के बाद, लोग इसे कहते हैं, इसे खाया नहीं जा सकता । मेरा मतलब है कि हम किसी चीज़ को चख कर, किसी और को नहीं दे सकते। यह भारतीय संस्कृति के अनुसार नहीं है। लेकिन श्री राम ने ले लिए । उन्होंने ले लिए और  कहा, “कितने खूबसूरत फल हैं! मैंने ऐसे फल कभी नहीं खाये ! ” तब  लक्ष्मण को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने कहा, “मूर्ख औरत ! तुमने  ये फल खाए और यही तुम  श्री राम को दे रही हो । तुमने  ऐसा क्यों किया? ”  सीता जी देख रहीं थी। तो उन्होंने श्री राम से पूछा, “आप मुझे इनमें से कुछ फल क्यों नहीं देते?” उन्होंने दे दिए। सीता जी ने कहा, “हे प्रभु ! ये कितने अच्छे फल हैं! मैंने ऐसे फल कभी नहीं खाए हैं। ” तब लक्ष्मण का भी गुस्सा कम हुआ और उन्होंने कहा, “क्या आप मुझे कुछ फल दे सकती हैं ?” उन्होंने कहा, “क्यों? तुम इतने गुस्से में थे, मैं तुम्हें क्यों दूं? ” आखिरकार, वो उन्हें वह फल दे देती हैं । तो उन्होंने उन फलों में क्या देखा,  वह प्रेम था, जंगल में रहने वाली उस बूढ़ी औरत का प्रेम, उसका प्रेम जो कि महत्वपूर्ण था। इसलिए जब आप भी कुछ देना चाहते हैं, तो आपका प्रेम है, जो महत्वपूर्ण है। यह नहीं कि आपने कितना भुगतान किया, आपने कितना खर्च किया, कुछ नहीं, यह  प्रेम है जिसके साथ आप ऐसा करते हैं।

और वह प्रेम व्यक्त होना चाहिए। यदि ऐसी बातें हो सकती हैं, श्री कृष्ण के साथ भी वही हुआ। वो हस्तिनापुर आये – उन दिनों उसे हस्तिनापुर कहा जाता था, जहाँ ये कौरव राज करते  थे । और दुर्योधन राजा था। और उसने श्री कृष्ण से कहा , “आप आईये और हमारे साथ रहिये और भोजन कीजिये ।” श्री कृष्ण ने कहा, “नहीं, नहीं, मैं नहीं आ पाऊंगा।” वो एक अन्य व्यक्ति, विदुर के पास गए , जो एक दासी पुत्र थे। विदुर । क्योंकि विदुर एक साक्षात्कारी आत्मा थे। वो एक आत्मसाक्षात्कारी थे । इसलिए वो गए और उसके घर में खाना खाया, जहां उसने बहुत सादा खाना पकाया था। क्योंकि वह एक साक्षात्कारी आत्मा थे , उनके लिए ,उसके साथ भोजन करना सबसे अच्छा था।

तो आपका नैतिक मूल्य, प्रेम जैसी चीजों पर आधारित होना चाहिए। जहां आपको प्रेम मिल सकता है, आपको उस व्यक्ति से जुड़ जाना चाहिए। जहां आपको एक साक्षात्कारी आत्मा मिलती है, आपको उनसे जुड़ना चाहिए, न कि उन सांसारिक लोगों से, जो स्वयं को सबसे ऊपर और महान सोचते हैं । हो सकता है कि वो हों । लेकिन आपको, सहज योगियों के रूप में, लोगों के प्यार का सम्मान करना चाहिए, उसे समझना चाहिए और महसूस किया जाना चाहिए। लेकिन  अगर आपके पास साक्षी भाव नहीं है, तो आप देखेंगे कि इस आदमी के पास कितना पैसा है, उसके पास कितनी गाड़ियां हैं, उसने क्या कपड़े पहने हैं। इन सब बातों का विचार होगा । लेकिन साक्षी अवस्था में, आप समझ जाएंगे कि आपको इस व्यक्ति से चैतन्य महसूस होगा। आप समझ जायेंगे कि यह व्यक्ति आध्यात्मिक है। और इस तरह आप ऐसे व्यक्ति के साथ रहेंगे। आप कृत्रिम चीजों की ओर नहीं जाएंगे , बल्कि वास्तविक व्यक्तित्व की ओर जाएंगे।

परमात्मा आप सब को आशीर्वादित करें । धन्यवाद।