7th Day of Navaratri, You all should depend on Paramchaitanya

Campus, Cabella Ligure (Italy)

Feedback
Share

                 नवरात्रि पूजा, “शुद्ध ज्ञान”

 कबेला (इटली), 27 सितंबर 1998

आप कल्पना नहीं कर सकते कि एक माँ, जिसके इतने सुंदर बच्चे हैं, उन्हें अपने परिवारों के साथ इतनी हर्षित मनोदशा में, अपने बच्चों को अच्छी तरह स्थापित देख कैसा महसूस करती है। आप सभी को इतना आनंद और परमात्मा के साथ पूर्ण एकाकारिता में देखकर बहुत संतोष होता है।

किसी व्यक्ति को केवल एक ही बात समझनी है, कि यद्यपि आप बहुत हैं, फिर भी, इस दुनिया की आबादी की तुलना में, हम बहुत कम हैं जो वास्तव में सच्चे ज्ञान, वास्तविक ज्ञान को जानते हैं।

बेशक, आप ज्ञानी लोग हैं। लेकिन साथ ही ऐसा ज्ञान जो सत्य से सुशोभित नहीं है, या जो सच्चा ज्ञान नहीं है, अर्थहीन है। वह सब कुछ हवा में गायब हो जाता है क्योंकि यह कृत्रिम है।

अपने कुंडलिनी जागरण से, आप सभी ने वह अवस्था प्राप्त कर ली है, जहाँ हम कह सकते हैं, आप जानते हैं। आप जानते हैं कि वास्तविक ज्ञान क्या है। लेकिन उन लोगों के बारे में सोचो जो नहीं जानते कि ज्ञान क्या है। हम, उदाहरण के लिए, हम कहते हैं कि हमारा ज्ञान प्रेम के अलावा और कुछ नहीं है। लेकिन व्यक्ति को विवेकबुद्धि को समझना चाहिए। तुम्हारे भीतर, ज्ञान जो प्रेम है, वह तुम्हारे अस्तित्व से उत्सर्जित हो रहा है। आपको जताने की जरूरत नहीं है। आपको सोचने की जरूरत नहीं है। आपको किसी प्रकार की कविता पढ़ने या किसी प्रकार के प्रेम-प्रदर्शन में जाने की आवश्यकता नहीं है। यह केवल शुद्ध प्रेम है जो उत्सर्जित होता है और यही ज्ञान भी है।

आपको इस से किस प्रकार सम्बंधित होना है, यह इस तरह से है। आपके पास खुद के बारे में जो ज्ञान है वह आपकी उंगलियों पर स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है; और दूसरों के बारे में भी। आप दूसरों के बारे में और अपने बारे में जानते हैं। यह आपके पास सबसे बड़ा, सूक्ष्म ज्ञान है। किसी अन्य को ऐसा ज्ञान नहीं है। आप लोगों के अलावा अपने बारे में या दूसरों के बारे में कोई नहीं जानता।

तो यह ज्ञान आपके पास आया है, जो अत्यंत सूक्ष्म, अत्यंत गोपनीय, पूर्ण रूप से गुप्त है। अगर आप किसी के बारे में जानते हैं, तो आप जानते हैं। दूसरे नहीं जानते कि आप उनके बारे में जानते हैं। और इसलिए यह ज्ञान जो तुम्हें मिला है, वह प्रेम के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। ज्ञान और प्रेम को एक साथ मिलाना बहुत कठिन है, क्योंकि ज्ञान का हमारा विचार बहुत अलग है। जो हम किताबों से पढ़ते हैं। आप किताबों से कैसे प्यार कर सकते हैं?

सामान्य मनुष्य के लिए प्रेम का जो अर्थ है  – हमारा लगाव। हमारे लिए, आप अज्ञानता वश लोगों से, बच्चों से, परिवार से, चीजों से लिप्त हो जाते हैं। आसक्त होने का अर्थ यह सिद्ध होता है कि हमारे पास ज्ञान नहीं है। यदि आपके पास ज्ञान है तो सभी आसक्तियां समाप्त हो जानी चाहिए और आपको एक वैश्विक व्यक्तित्व, समुद्र में एक बूंद सामान बनना चाहिए। उदाहरण के लिए, हम कई चीजों से लिप्त होते हैं, जैसे, हम अपने परिवार से लिप्त होते हैं। अगर परिवार में कुछ होता है तो हम बहुत परेशान हो जाते हैं, हम इसे सहन नहीं कर सकते। अगर हमारे बच्चों को कुछ हो जाता है, तो हमें भयानक लगता है, जैसे यह यह संसार आप पर गिरा जा रहा हो। फिर परिवार से आप आगे बढ़ते हैं, आप अपने दोस्तों से लिप्त होते हैं, अपने पड़ोसियों से, आप अपने देश से भी लिप्त होते हैं। अपने देश से लिप्तता भी अज्ञान है।

एक बार जब आप एक आत्म साक्षात्कारी हो जाते हैं तो आप अपने देश को स्पष्ट रूप से देखना शुरू कर देते हैं: इसमें क्या गलत है, इसे क्या अज्ञान है, यह किस अंधकार में मौजूद है और किस तरह से झगड़ा कर रहा है, अधिकारों और चीजों के लिए लड़ रहा है। लेकिन आपके भीतर जो ज्ञान है, उससे आप इतनी स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि आपके देश को क्या समस्या है। तब आप अपने प्रेम के माध्यम से उसे सुधारने का प्रयास करते हैं: अर्थात आपके ज्ञान की शक्ति आपका प्रेम है।

यदि आपके भीतर सारा ज्ञान है और यदि आप बस घर पर बैठकर ध्यान कर रहे हैं तो इसका कोई अर्थ नहीं है। आपको करना क्या है कि, लोगों को इसके बारे में जा कर बताना है: आपको अपने ज्ञान के बारे में अन्य लोगों, अपने दोस्तों, अपने परिवार और अन्य संबंधों से मिलना है। यदि आप ऐसा नहीं कर सकते तो आपका ज्ञान प्रेम के साथ नहीं है। यह दोनों के बीच ऐसा संबंध है। आपको हर किसी को यह बताने का मन करता है कि आपको अपना आत्मसाक्षात्कार मिल गया है। आपको सभी को यह बताने का मन करता है कि आप एक साक्षात्कारी आत्मा हैं। लेकिन उसमें आपको ऐसा महसूस होता है कि आप अपने अहंकार का इजहार कर रहे हैं। ठीक है, किसी अन्य विधि से, कुछ अन्य तरीकों से आप उन्हें व्यक्त कर सकते हैं कि आपके पास सच्चा ज्ञान है। जब तुम्हारे पास मिथ्या ज्ञान हो, तो तुम अहंकार को प्राप्त कर सकते हो। आप सोच सकते हैं कि, “मैं बहुत कुछ जानता हूं, मैं इसके बारे में जानता हूं, मुझे कालीनों का रंग, सभी रंग-सब कुछ पता है”। कोई भी मूर्खतापूर्ण बात, यदि आप जानते हैं, तो आपको लगता है कि आप बहुत बड़े हैं। यह मूर्खता की निशानी है, आपके दिमाग में भी, अगर आपको लगता है कि यह जानना बहुत बड़ी बात है।

हमें अब पता चला है कि, सारे संसार में सभी प्रकार के ज्ञान प्राप्त करके – हमने क्या हासिल किया? कुछ नहीं। युद्ध हो रहे हैं। हर तरह के विनाश आ रहे हैं। मैंने टेलीविजन पर यह [तूफान] जॉर्ज देखा। यह एक बवंडर है जो घूम रहा है और इतने सारे लोगों को मार रहा है। यह समझे बिना कि वह क्या कर रहा है, इतने सारे लोगों को नष्ट कर रहा है। लेकिन वह वहां है और वह बहुत अच्छा अभिनय कर रहा है। तो क्या ऐसा है की वह नहीं समझता है ? या ऐसा है कि वह समझता है और लोगों को सुधारने के लिए कुछ कर रहा है? यह भी, हमें पूरा विचार रखना चाहिए।

कल की तरह जब मैं यहाँ आयी तो बहुत तेज़ बारिश हो रही थी और फिर मैं बैठ गयी और यह अचानक रुक गयी। पूरा कार्यक्रम समाप्त होने तक रुकी रही। जब तक मैं बोलती रही, यह काम नहीं कर रही थी। लेकिन अचानक, जब आपने ताली बजाना शुरू किया, तो यह भी ताली बजाने लगी (कबेला में हैंगर पर पड़ने वाली कठोर बारिश वास्तव में ताली बजाने की तरह लग रही थी !!) बस यही था। तो प्रकृति भी जानती है कि तुम कौन हो। लेकिन आपको प्रकृति को जानना चाहिए, यही बात है, प्रकृति आपके स्तर, आपकी आध्यात्मिकता के अनुसार कार्य करेगी। हैरानी की बात है कि मैंने हमेशा महसूस किया कि आध्यात्मिकता के स्तर नहीं हो सकते। मुझे लगा कि एक बार जब आपको आत्मसाक्षात्कार हो जाता है, तो आप वहीं होते हैं। लेकिन बाद में मुझे पता चला कि मैं गलत थी – ऐसा नहीं है।

मैंने पाया कि, आत्मसाक्षात्कार होने के बाद भी, लोगों के उत्थान में कितनी रुकावटें थीं। बहुत सारे प्रलोभन थे जो उन्हें नीचे ही रख रहे थे। तो किसी भी व्यक्ति को अलग-अलग चक्रों, अलग-अलग नाड़ियों पर, किसी न किसी तरह से, अपने आपको परिपूर्ण बनाने के लिए काम करना पड़ा। क्योंकि भीतर की पूर्णता ही आपको इस ज्ञान का उपयोग करने का अधिकार देगी। जैसा कि मैंने आपको बताया, इसे करने के दो तरीके हैं।

दूसरे दिन मैंने तुमसे कहा था कि तुम्हें प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए। प्रतिक्रिया करना मानव स्वभाव है, यह बिल्कुल मानवीय है। लेकिन अगर आपको अलौकिक बनना है, तो आपको प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए। प्रतिक्रिया न करने से आप का उत्थान होगा, निश्चित रूप से आप प्रगति करेंगे। लेकिन अगर तुम प्रतिक्रिया करते हो, तो तुम विकसित नहीं हो सकते। क्योंकि आप अन्य चीजों के दबाव में काम कर रहे हैं जो आप स्वयं नहीं हैं। अब मान लीजिए, जैसा कि मैंने कहा, मैं इन कालीनों को देखती हूं, मुझे रंग और यह और वह पता है, और मैं इस पर प्रतिक्रिया करती हूं: ख़त्म! अगर मैं इस पर प्रतिक्रिया करती हूं तो मुझ में मूल्यांकन की कोई संवेदनशीलता नहीं होगी। लेकिन अगर मैं प्रतिक्रिया नहीं करती हूं, तो मुझे पता चलेगा कि इन कालीनों में वायब्रेशन है या नहीं: क्या वे चैतन्य उत्सर्जित कर रहे हैं या नहीं?

अब ये चैतन्य क्या हैं? वही प्यार है।

तो संचार इस प्रकार है। अगर आपके पास रोशनी है तो आप चीजों को देख सकते हैं। तो जब आप चीजों को देखते हैं, तो प्रकाश होता है और प्रकाश आपको अनुभूति देता है, आपको चीजों को देखने की दृष्टि देता है। उसी तरह जब तुम बुद्धत्व को प्राप्त होते हो, तो क्या होता है कि ये स्पंदन बहने लगते हैं—बिल्कुल प्रकाश की तरह, और उस प्रकाश में तुम उन चीजों को देख सकते हो जो अच्छी हैं और जो बुरी हैं। लेकिन कभी-कभी आप मुल्यांकन के वही मापदंड रखते हैं जो सामान्य इंसान करते हैं। जैसे आप किसी घर में जाते हैं, बहुत अच्छे घर में, बहुत अच्छे घर में – ये सब चीजें आपको बहुत खुश करती हैं। लेकिन असल में उस घर के बारे में क्या? उसके वायब्रेशन ठीक हैं या बुरे वायब्रेशन हैं, वहाँ रहने लायक है या नहीं?

दूसरे दिन की तरह उन्होंने मुझसे कहा कि ‘मिलान’ से थोड़ा आगे उन्हें ‘मिलान’ में एक बहुत अच्छी जगह किराए पर मिल सकती है, बहुत सस्ते में। मैंने कहा “यह इतना सस्ता क्यों है?” तुरंत मुझे उस जगह के वायब्रेशन  महसूस हुए। मैंने कहा “क्या तुमने उस जगह के वायब्रेशन को देखा?” उन्होंने जाकर देखा – यह सब जल रहा था (वायब्रेशन पर)। उन्हें पता चला कि वहां सालों से एक साथ साइंटोलॉजी थी। मैंने कहा “यह वह जगह नहीं है जहाँ आप रह सकें”। आप को बहुत पवित्र स्थान लेना है। गरीब आदमी की कुटिया भी इस तथाकथित आरामदायक जगह से अच्छी होगी।

तो आप जो कुछ भी कर रहे हैं उसे समझने के लिए हर समय वायब्रेशन का उपयोग करना होगा। उसमें भी, यह भ्रामक हो सकता है। कुछ लोग वायब्रेशन महसूस करते हैं और वे मुझसे कहते हैं “माँ, मैंने वायब्रेशन महसूस किया है और मैंने महसूस किया है कि मुझे इस आदमी से शादी करनी चाहिए”।

 मैंने कहा “क्या आपने वायब्रेशन महसूस किया 

– हाँ?”। “हाँ मैंने किया, बहुत कुछ, और मुझे इस आदमी से शादी करनी चाहिए”।

 जब मैं उस आदमी को देखती हूं, तो मुझे उसमें भूत दिखाई देते हैं – मैंने कहा “हे भगवान! इस महिला ने उसके बारे में किस तरह के वायब्रेशन महसूस किए हैं?”

तो आपके अनुमान में क्या है? कोई शुद्ध ज्ञान नहीं है। तो देखिए कि, वे परस्पर कितने संबंधित हैं: स्पंदन जो प्रेम है और, दूसरी चीज जो आपके पास होनी चाहिए वह है ज्ञान, शुद्ध ज्ञान, सच्चा ज्ञान। हम कह सकते हैं कि शुद्ध ज्ञान और सच्चा ज्ञान ऊर्जा की तरह है, बिजली की तरह है। और जिस तरह से आप इसे महसूस करते हैं, जिस तरह से आप इसे समझते हैं, वह अस्तित्व में है, वह प्रेम है।

लोग यह भी नहीं समझते कि ‘प्यार’ होता क्या है। वे किसी के पीछे पागल हो जाते हैं और कहते हैं कि “माँ, मुझे लगता है कि मैं उस व्यक्ति से प्यार करता हूँ” और 5 दिन बाद वे आकर कहेंगे – “माँ नहीं, मुझे उस व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है” . क्यों? क्योंकि आपको शुद्ध ज्ञान नहीं मिला है। आपने अपने वायब्रेशन से उस व्यक्ति में शुद्ध ज्ञान का अनुभव नहीं किया। अब देखें कि यह कितना जुड़ा हुआ है।

जैसे हम कह सकते हैं सूरज और सूरज की रोशनी, दोनों में क्या अंतर है? सूरज है, जब सूरज आता है तो धूप होती है। तो अंतर क्या है? या हम कह सकते हैं चाँद और चाँदनी: क्या फर्क है? इन दोनों बातों में कोई अंतर नहीं है। एक है चंद्रमा और दूसरा है प्रकाश।

तो ये सब बातें बहुत ही उलझाने वाली हैं। लेकिन हम यह नहीं समझते कि हम इसके बारे में कितने भ्रमित हैं। हम नहीं समझते कि हमारे वायब्रेशन हमें कैसे गुमराह कर सकते हैं। क्योंकि वायब्रेशन हैं, ठीक है। लेकिन कभी-कभी, भले ही वे गायब हों, बस अपने आप को सही ठहराने के लिए, आप कहेंगे, “मुझे वायब्रेशन आ रहे हैं और मुझे लगता है कि यह बहुत अच्छे है, उत्कृष्ट है!” और बाद में आपको पता चलेगा कि ऐसा नहीं है।

तो अब भी, जब हम साक्षात्कारी आत्मा हैं, तो आपको पता होना चाहिए कि हमें क्या घेर रहा है, जो हमारे चारों ओर है, वह क्या है जो हमें यह महसूस कराता है कि, “यह ठीक है, यह अच्छा है, कि इसे हमारे पास होना चाहिए”। एक बार जब हम यह समझना शुरू कर देते हैं कि: शुद्ध ज्ञान के वायब्रेशन बहुत अलग प्रकृति के होते हैं, तो आप उस व्यक्ति से लिप्त नहीं होते हैं, आप उस परिवार से लिप्त नहीं होते हैं, आप उस देश से लिप्त नहीं होते हैं – कुछ भी नहीं। बल्कि जो आप अनुभव करते हैं वह होता है आप तक आ रहा शुद्ध चैतन्य। यह वह बिंदु है जो बहुत भ्रमित करने वाला है – जब आप कहते हैं “मेरे वायब्रेशन अच्छे हैं, मुझे वे वायब्रेशन पसंद हैं,” जबकि आप गंदगी के सागर में कूद रहे होते हैं! कई लोगों ने मुझसे पूछा है “माँ, कभी-कभी हम गलतियाँ क्यों करते हैं?” तुम गलती नहीं करते, यह तुम्हारा अज्ञान है, जो अंधकार है। और इसलिए जब भी आप इसमें डुबकी लगाते हैं तो आप मुसीबत में पड़ जाते हैं। तो इसे समझने के लिए हमारे ज्ञान को पूरी तरह से प्रकाशित करना होगा।

जैसे हमारे घर में, मान लीजिए हमारे पास एक दीपक है जो गंदा है, तो आपको रोशनी नहीं मिल सकती। उसी तरह अगर हमारा दिल साफ नहीं है, खासकर हमारा दिल, अगर वह साफ नहीं है, तो हम यह मानते हुए कि यह सही है, ऐसा काम करना शुरू कर देते हैं, जिससे हम खुद को या दूसरों को चोट पहुँचाते हैं। मानव स्वभाव में यह एक बहुत ही सामान्य त्रुटि है कि गलत चीजों को सही के रूप में पहचाना जाए ताकि वे खुद को इतना महान, ऐसा दिव्य प्रदर्शित कर सकें।

जैसा कि मैंने अभी आपको बताया,  माना कि, ऐसे लोग हैं जो देश को बांटना चाहते हैं। सरल कारण, वे विभाजित करना चाहते हैं। अब वे विभाजित करना चाहते हैं क्योंकि वे अपना महत्व रखना चाहते हैं। जो चंद लोग अपनी अहमियत चाहते हैं, वे दूसरों को भड़काएंगे, उनसे कहें, “ठीक है, हमें आज़ादी मिलनी चाहिए. अगर हमें आजादी हो तो हमारे पास यह देश अपने लिए होगा, तभी हम अपना विकास कर सकते हैं। या देश का कोई हिस्सा जो अमीर है, जो बेहतर है, वे सोचेंगे कि “यह ठीक है, हमारे पास सारा पैसा हमारे लिए होगा, हमारे पास सब कुछ हमारे ही लिए होगा।” इसलिए वे विभाजन करते हैं।

वे धर्म के नाम पर, समृद्धि के नाम पर, चाहे कुछ भी हो, विभाजन कर सकते हैं। लेकिन अगर आप देश को विभाजित करते हैं, तो वास्तव में आप एक बड़ी समस्या का सामना कर रहे हैं क्योंकि आपने देखा है कि जहां भी लोग विभाजित होते हैं, वे एक प्रकार के अंधेरे, अंधेरी, कालकोठरी में गिर जाते हैं, जहां से वे बाहर नहीं आ सकते। कुछ थोड़े से लोग ऐसे भी होते हैं जिनका यह अहंकार होता है कि वे कुछ जमीन अपनी मालकियत की पास रखना चाहते हैं। लेकिन वे मरते हैं, न केवल मरते हैं, उनमें से कुछ की हत्या कर दी जाती है। और इस तरह, यह साड़ी सोच, कि “हमारे पास भूमि का अधिकार होगा” निकल जाती है।

तो इसी तरह हम छोटी-छोटी चीजों पर भी देख सकते हैं। छोटी-छोटी बातों में भी हमारी बहुत पहचान होती है कि “अगर मेरे पास यह चीज हो तो सब ठीक हो जाएगा।” आप समझ नहीं सकते कि कैसे लोग सिर्फ चीजों पर झपट पड़ते हैं और कहते हैं “हे माँ यह हमारी है, यह हमारी है, हमें यह अपने लिए करना चाहिए!” खुले तौर पर! वे यह कहना गलत नहीं समझते कि, “यह मेरा देश है, मुझे अपने देश के लिए करना चाहिए,” और दूसरा कहता है “यह मेरा देश है और मुझे अपने देश के लिए करना चाहिए।” जब तक यह है ‘मेरा’ ‘ और ‘मैं’, इसका मतलब है कि कोई ज्ञान नहीं है।

ज्ञान, जैसा कि मैंने तुमसे कहा था, शुद्ध ज्ञान, वह है जो तुम्हें शुद्ध प्रकाश देता है। शुद्ध प्रकाश का अर्थ है शुद्ध चैतन्य| अब वायब्रेशन भ्रामक हो सकते हैं, जैसा कि मैंने आपको बताया, या हो सकता है कि वायब्रेशन की मात्रा कम या अधिक हो। इसे देखने का एक तरीका और भी है, अंतर्मनन करना कि, “मैं कोई एक विशेष काम क्यों करना चाहता हूँ?” मानसिक भी – आप मानसिक समझ के मापदंड का भी उपयोग कर सकते हैं। “मैं इसे क्यों करना चाहता हूं?” “इसमें सभी लोगों के लिए क्या लाभ है?” यदि आप उस दृष्टीकोण से सोचना शुरू करते हैं, कि: “दूसरों के लिए क्या लाभ है? इससे उन्हें क्या हासिल होगा? मुझे यह क्यों करना चाहिए?” आप चकित रह जाएंगे, आप जो कर रहे हैं उसकी असली तस्वीर आपको मिल जाएगी।

इसलिए आपको अपने आप को हर समय ऐसी स्थिति में रखना चाहिए जहां आप स्वयं को देख सकें। आप स्वयं देखें, कि, “मैं ऐसा क्यों कर रहा हूँ? उद्देश्य क्या है?” कभी-कभी यह कुछ अनुबंधता हो सकती है, किसी तरह की मनोवैज्ञानिक चीज हो सकती है, कुछ भी हो सकती है। लेकिन अगर आप ध्यान से देखना शुरू करें, “मैं ऐसा क्यों कर रहा हूं?” आपको आश्चर्य होगा कि आपके वायब्रेशन आपकी उंगलियों पर खुद ही बताना शुरू कर देंगे।

लेकिन कभी-कभी वायब्रेशन इतने सतही रूप से आ रहे होते हैं, “आह, मुझे वायब्रेशन मिले!”, और ऐसा और वैसा| इस कारण से मैं बार-बार कह रही हूं कि, यद्यपि आप मेरे इतने अच्छे परिवार हैं और हम सभी बहुत आशिर्वादित हैं और हमारे पास इतना ज्ञान है, हमें बहुत विवेकवान होना चाहिए। कोई विवेक नहीं है। अगर विवेक नहीं है, तो हम कभी नहीं समझ सकते कि हम क्या कर रहे हैं।

अब इस विवेक को विकसित करने के लिए हमें क्या करना चाहिए? तुम देखो, हर बार, अगर मैं कुछ भी कहूँ तो वे आकर कहेंगे “माँ, हमें विवेक कैसे मिलता है? विवेक प्राप्त करने का उपाय क्या है?” आपके भीतर पहले से ही विवेक है, श्री गणेश पहले से ही हैं, जो आपको विवेक देते हैं। लेकिन आपको श्री गणेश को अपनाना चाहिए।

वहाँ मैं देखती हूँ, लोग श्री गणेश के इतने आदी हो जाते हैं कि वे उनकी पहचान खो देते हैं। पूरी तरह से। पूरी बात के बारे में उनमे बहुत दासता आ जाती हैं और फिर बस वे ऐसा मानते हैं कि वे बहुत आध्यात्मिक हैं, वे बहुत महान हैं। ये सभी झूठे विचार अच्छे नहीं हैं। क्या आपके गणेश जी आपको विवेक देते हैं? अब तुम को गिनना चाहिए: अब तक तुमने कितने विवेकपूर्ण  काम किए हैं? आपने बहुत ही समझदारी भरा फैसला कहाँ लिया? क्या आप कुछ करने के लिए विवेकवान हैं या आप इसे सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आप एक विशेष प्रकार के जीवन या विशेष प्रकार के उत्तर से पहचाने जाते हैं?

तो विवेक एक ऐसी चीज है जो आपको सबसे पहले पूर्ण शांति देती है। अगर आपका विवेक विकसित हो जाता है तो आप बहुत शांत हो जाते हैं। क्योंकि लोग जो कुछ भी कहें, जो कुछ भी करें, जो भी आक्रामकता वे करें, जो कुछ भी करें – आप शांत हैं। और आप दूसरे राष्ट्रों के अन्य लोगों की मूर्खता देखते हैं और आप समझते हैं कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं।

यह विवेक मनुष्य में इतनी महत्वपूर्ण चीज है क्योंकि जानवरों के पास उतना विवेक नहीं है जितना हमारे पास है। कभी-कभी, बेशक, कभी-कभी, हमारे पास जानवरों से भी कम होता है! लेकिन फिर भी, आप अनुभव से देखते हैं, हमें सीखना होगा कि हम गलतियाँ कर रहे हैं। हमने अब तक कितनी गलतियां की हैं। अब, क्या हम और गलतियाँ करने जा रहे हैं? या हम विवेकवान होने जा रहे हैं?

विवेकबुद्धि बाहर दिखाई नहीं देती। आप किसी व्यक्ति की तरफ देख कर ऐसा नहीं कह सकते कि, अमुक व्यक्ति विवेकपूर्ण है। लेकिन वायब्रेशन में आपको पता चल जाएगा कि, वह व्यक्ति बेहद विवेक वान है। वह बोले अथवा वह न बोले। यदि वह बोलता है तो वह आपको चोट पहुँचाए बिना इतनी गहरी, इतनी बुद्धिमान और इतनी अच्छी बात कहेगा। इस प्रकार का स्वभाव, यदि आप विकसित करते हैं, की प्रत्येक प्रश्न के लिए विवेक वान बनना है।

उदाहरण के लिए, कुछ लोगों को अपने बच्चों से बहुत लगाव होता है। इतना लगाव कि वे भूल जाते हैं कि वे इस दिव्य शक्ति के अभिन्न अंग हैं और वे हर तरह की चीजें करना शुरू कर देते हैं। दूसरे दिन मैं एक महिला से मिली जिसका बेटा बहुत बीमार था और वह उसे अस्पताल ले गई और डॉक्टरों ने उसे हर तरह की दवा दी और उसकी स्थिति और भी खराब हो गयी। फिर उसने मुझे फोन किया कि, “माँ मुझे नहीं पता क्या हुआ, मैं डॉक्टर के पास गई और डॉक्टर ने उसे यह और वह इलाज दिया, और बच्चे की स्थिति खराब हो गयी है”।

 “तो तुमने मुझसे पहले क्यों नहीं पूछा, तुम पहले अस्पताल क्यों गए?” विवेकबुद्धि का अभाव। और वहाँ, तुम क्यों नहीं पूछते?

हमारे यहां कबेला में एक मामला था। एक बच्चा था जो गिर गया और उसका हाथ टूट गया। अब माँ ने कोई समझदारी नहीं दिखाई और वह बच्चे को अस्पताल ले गई और डॉक्टर ने कहा “कल हम उसका ऑपरेशन करने जा रहे हैं और कुछ कृत्रिम हाथ अंदर डाल देंगे”। लेकिन पिता समझदार थे, उन्होंने कहा, “ठीक है, कल? आज तो नहीं न? फिर मैं बच्चे को घर ले जाऊँगा।” वह रात को करीब 3 बजे बच्चे को मेरे पास ले आया और मैंने कहा, “ठीक है।” मैंने इसे ठीक किया। अगले दिन जब वह उसे अस्पताल ले गया, तो डॉक्टर ने कहा, “लेकिन अब ऑपरेशन करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि उसका हाथ ठीक है!” आप अंतर देखें। एक व्यक्ति चिंतित है, वे मुझसे परामर्श करने, मुझसे पूछने के बजाय, तुरंत डॉक्टर के पास जाएंगे। वे सहजयोगी हैं, लेकिन वे जाकर डॉक्टर से कुछ करने को कहेंगे। ठीक है। एक बार जब डॉक्टर कुछ करने लगेंगे फिर वे मेरे पास आएंगे।

सहज योग के बारे में बहुत सारे चमत्कार हुए हैं, मुझे कहना होगा, और उसमें, आप देखते हैं, विवेक आपकी मदद करता है। बेशक मेरा ध्यान हमेशा वहाँ है, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन फिर भी आपको इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। आपको पूछना होगा।

एक दिन, आप देखिए, मैं बस बैठी थी और मैंने सोचा कि मैं न्यूयॉर्क के आश्रम में किसी को फोन करूँ। मैंने वहां पहले कभी फोन नहीं किया। तो मुझे फोन नंबर पता चला और हमने फोन किया और मैंने कहा “क्या बच्चा ठीक है?”। तो वहां के नेता को आश्चर्य हुआ, क्योंकि वह लड़का पानी में गिर गया था और काफी देर से पानी में था और वह सब पानी से भर गया था, यहाँ तक कि उसके दिमाग में भी पानी भर गया था। हमेशा की तरह कुछ डॉक्टर ऐसे भी थे जिन्होंने कहा कि वह जीवित नहीं रह सकता और अगर वह बच भी गया तो उसके दिमाग में इतना पानी है कि वह सामान्य नहीं हो सकता। तो अब मैंने कहा कि “चिंता मत करो!” मुझे नहीं पता था, किसी ने मुझे नहीं बताया। “चिंता मत करो! लड़का ठीक हो जाएगा, पूरी तरह से।” तो वे हैरान रह गए कि मैंने ऐसा कैसे कहा! सबसे पहले, मुझे कैसे पता चला कि लड़का गिर गया है, ऐसा कोई लड़का था। और फिर वे नहीं जानते थे कि मैंने कैसे कहा कि वह ठीक हो जाएगा। और वह ठीक था, वह बिल्कुल ठीक है। तो वे मेरे बारे में जानकर हैरान रह गए, माँ को कैसे पता चला कि एक लड़का है जो इतना बीमार है? यहां मैं कहूंगी कि यह शुद्ध ज्ञान है।

आप देखिए मेरा चित्त हमेशा आप लोगों के आसपास रहता है। हमेशा आपके साथ व्यवहार करना। और कैसे मैं यह सब जानती हूं क्योंकि मेरा यह चित्त वैश्विक है। तो आपको कुछ भी हो जाए, कोई भी परेशान करने वाली बात हो जाए, कोई भी, मुझे कहना चाहिए कि कोई विचलन होता है – मेरा चित्त वहां है। तुरंत मुझे पता चलता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है और मुझे नहीं पता कि मेरा चित्त उन विशेष स्थानों पर कैसे जाता है जो जीवन को बेहतर बनाता है – यह जरूरतमंद लोगों की मदद करता है। मैं इस चित्त के बारे में कुछ नहीं करती लेकिन यह चित्त ही विवेक है। वह विवेक जो चारों ओर फैलता है। उस ज्ञान से आप जानते हैं कि किसी अन्य व्यक्ति या किसी अन्य संगठन के साथ क्या गलत है जो सहज योग में है। आप सब कुछ जानते हैं। अगर आप जानना चाहते हैं तो, यह अलग बात है कि, यह सिर्फ आप जानते हैं। जैसे आप हर जगह फैले हुए हैं। उदाहरण के लिए, यदि आपको टेलीफोन करना है तो आपको टेलीफोन का उपयोग करना होगा – लेकिन मेरे लिए मुझे टेलीफोन का उपयोग नहीं करना पड़ता है, मुझे बस पता है।

तो यह एक शुद्ध निर्दोष विवेक से आया है। अबोध विवेक बिलकुल एक बच्चे की तरह, यह हर जगह है, और यह संचार करता है और यह बताता है कि मामला क्या है, समस्या क्या है। सहज योग से बहुत से लोग ठीक हुए हैं, कई ठीक हुए हैं। अब अगर वे कह सकते हैं, कि “माँ हम कैसे ठीक हो गए? हमने क्या किया है? क्या आपने हमारे चक्रों को देखा, क्या आपको पता चला कि हमारे साथ क्या गलत था?” नहीं, मैंने नहीं किया, मैंने नहीं किया, लेकिन मैं इसे छोड़ देती हूं, अपने विवेक में, मैं इसे परम चैतन्य पर छोड़ देती हूं कि वह काम करे।

यह मुख्य बात है: कि, क्या आप अपने विवेक में सब कुछ परमचैतन्य पर छोड़ सकते हैं? यदि आप नहीं कर सकते हैं तो अभी तक आपने अपने भीतर वास्तविक ज्ञान को महसूस नहीं किया है। यही वह स्तर है जहाँ कुछ लोग हैं। मैं अभी उन लोगों के बारे में इतनी निश्चित नहीं हूं जिन्हें आत्मसाक्षात्कार होता है कि वे सभी शुद्ध ज्ञान से इतने भरे हुए हैं। उनमें से कुछ हैं, लेकिन उनमें से सभी नहीं हैं। अनुभव के साथ वे सीखते हैं। लोगों से मिलने से वे सीखते हैं। लेकिन जहाँ तक विवेक, शुद्ध विवेक  … उनके लिए मुश्किल है क्योंकि वे पूरी तरह से परम चैतन्य पर भरोसा नहीं करते हैं। सब कुछ होता है, बस परम चैतन्य जानता है, समझता है, व्यवस्थित करता है, प्रेम करता है, सब कुछ करता है। यह वही ऊर्जा है। यह सब कुछ करता है। और यह कैसे प्रबंधित करता है! कैसे घटनाएँ, जिन्हें हम संयोग कहते हैं, वास्तव में परमचैतन्य द्वारा व्यवस्थित की जाती हैं।

जैसा कि मैंने आपको बताया था कि कल जिस तरह बारिश थी, बारिश आई और चली गई। इसमें विवेक है। सहज रूप से यह जानती है कि मैं यहाँ बैठी हूँ। जब कार्यक्रम शुरू होने जा रहा है यह रुक जाती है। फूल मुझे जानते हैं। तुम नहीं जानते, जब हमारे पास फूल होते हैं, वे इस (छोटे)आकार के होते हैं, मैं उनसे कुछ नहीं करती, वे बढ़ने लगते हैं और बढ़ने लगते हैं और ऐसे ही बहुत बढ़े हो जाते हैं। अब, कोई कहेगा, अब “माँ उन्हें कैसे पता?” क्योंकि वे प्राकृतिक हैं। हम अप्राकृतिक हैं। हमने जीवन के अंग-प्रत्यंग हो कर इतनी सारी कृत्रिमताएं अपना ली हैं। आप सभी प्रकार के शिष्टाचार देखते हैं, यह, वह । वह सब जरूरी नहीं है। ये सभी मूर्खतापूर्ण अभ्यास जो हमने अपनाए हैं, कभी-कभी हमें शुद्ध ज्ञान से दूर कर देते हैं। और जब कोई शुद्ध ज्ञान नहीं होता है, हम कुछ भी नहीं जानते कि क्या हो रहा है, हम बस छोटी-छोटी बातों के लिए भयभीत हो जाते हैं, किसी बात के लिए परेशान हो जाते हैं। मेरा मतलब है कि सहज योगियों को परेशान होते देखना बहुत आश्चर्यजनक है।

सौ लोगों में, यदि मान लें कि कोई समस्या है, तो, यदि आप एक सहजयोगी हैं, तो आपको केवल साक्षी होकर देखना होगा। यदि आप ऐसा नहीं कर सकते तो आप सहजयोगी नहीं हैं। लेकिन यह अभ्यास करने जैसा नहीं है, आप जानते हैं। जैसा कि वे कहते हैं, यदि आपको शिव की कृपा प्राप्त करनी है, तो आपको उनके नाम का 108 बार उच्चारण करना चाहिए।  तरीका ऐसा नहीं है! उन्हें यह पसंद नहीं है। आप देखिए, किसी को भी इस तरह का बड़बड़ाना पसंद नहीं है। आप देखते हैं कि, अगर कोई आपके दरवाजे के पास आ कर हर समय आपका नाम लेता है और आप उसे बाहर निकाल देंगे! तो  यह ठीक तरीका नहीं है, यह गलत विचार है कि आप किसी का नाम लेते रहें और वह देवता आपकी मदद करेंगे।

सबसे पहले आपको यह समझने के लिए पर्याप्त बुद्धिमान बनना होगा कि आप परम चैतन्य के अभिन्न अंग हैं। इससे सब कुछ कार्यान्वित हो जाएगा, और यह बहुत खूबसूरती से काम करता है। बेशक, कुछ लोगों का कठिन समय होता है, मैं यह नहीं कहती कि ऐसा नहीं होता है। लेकिन यह कठिन नहीं है, क्योंकि यदि आप परम चैतन्य के साथ एकाकार हैं, और आप जानते हैं कि परम चैतन्य यह कार्य कर रहा है, आप उस कठोरता, या बीमारी या अन्य कुछ भी महसूस नहीं कर रहे हैं।

सभी लोग जो मुझे अपनी समस्याओं के बारे में लिखते हैं, मुझे नहीं पता कि क्या कहूं। मैं केवल इतना कह सकती हूं कि “क्या आप परम चैतन्य में विश्वास करते हैं?” ठीक है, यह जानता है। यह जानता है कि क्या करना है। यह जानता है कि क्या सुधारा जाना है, यह जानता है कि क्या कहा जाना है। आप देखते हैं कि यह कविता बना सकता है, यह संगीत बना सकता है, यह सब कुछ बना सकता है। लेकिन क्या आप सब कुछ परम चैतन्य पर छोड़ देते हैं? यह विवेक का दूसरा बिंदु है। क्या आपके पास अनुभव करने के बाद भी सब कुछ परम चैतन्य पर छोड़ने का विवेक है?

जैसे एक महिला कार में जा रही थी और उसने अपनी कार पर पाया कि, उसके ब्रेक नहीं लग रहे थे और उसे नहीं पता था कि अब क्या करना है। अगर ब्रेक ज्यादा काम नहीं कर रहे थे तो वह कैसे मैनेज करेंगी? यह जर्मनी में था, सभी कारें बहुत तेजी से आगे बढ़ रही थीं और उसे नहीं पता था कि क्या करना है। तो उसने अपना सिर स्टीयरिंग व्हील पर रखा और उसने कहा “मैं इसे परम चैतन्य पर छोड़ती हूं”। उसने कहा कि वह इसे मुझ पर छोड़ती है। ठीक है, यह एक ही बात है। तो यह कहकर, क्या हुआ, उसने कहा, “माँ, मुझे नहीं पता, जब मैंने अपना सिर उठाया तो मैंने पाया कि मेरी कार सड़क के एक तरफ चली गई थी और कोई नहीं था।” सभी कारें गुजर रही थीं लेकिन किसी न किसी बल द्वारा इस कार को बहुत अच्छी तरह से वहां ले जाया गया।

तो विवेक परमचैतन्य के कार्य को समझने में ही निहित है। यह कैसे आपका मार्गदर्शन करता है, कैसे यह आपकी मदद करता है, कैसे यह आपकी रक्षा करता है, कैसे, परमचैतन्य पर निर्भर हो कर, आप बहुत खुशी से रह सकते हैं।

मुझे लगता है कि सहज योग में हमने बहुत कम सहजयोगियों को खोया है। वे लंबे समय तक जीते हैं, वे मरते नहीं हैं, और यदि आप उनके अनुभव पूछते हैं, तो यह बहुत आश्चर्यजनक है, यह कैसे कार्यान्वित होता है। अगर वे जीना नहीं चाहते हैं, तो वे गुजर भी सकते हैं। लेकिन अगर वे जीना चाहते हैं, तो परम चैतन्य अपने उपर ले लेते हैं और आप लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं। लेकिन लंबे समय तक जीने का मतलब यह नहीं है कि आप खुद को परेशान करते रहें, कि आप अपने पैसे का क्या करेंगे, आप कैसे रहेंगे, इसका स्रोत क्या होगा। जब ऐसी ये सभी बेतुकी बातें, चिंताएँ आपके पास आती हैं, ठीक है, तब परम चैतन्य कहते हैं, “ठीक है, चिंता करते रहो!” यदि तुम चिंता करते रहते हो, “ठीक है चिंता करते रहो!” कोई बात नहीं, क्या होगा? जो होना है, हो जाएगा। लेकिन यदि आप इसे परम चैतन्य पर छोड़ देते हैं तो परम चैतन्य हस्तक्षेप कर सकता है।

उन्होंने कई बार कहा, इसे ईश्वर पर छोड़ दो, परमात्मा पर छोड़ दो। परमात्मा से क्या मतलब है, मुझे नहीं पता कि परमात्मा से उनका क्या मतलब है। ईश्वर का अर्थ है परम चैतन्य, ईश्वर का अर्थ है दिव्य शक्ति देना, जो सब कुछ कार्यान्वित कर रहा है।

तो इसे देखने का एक और तरीका है, वह विवेक कि,  हमें समझना चाहिए, कि इस दुनिया का हर कण ईश्वर द्वारा बनाया गया है – दैवीय शक्ति द्वारा। और ये कण और सब कुछ पूरी तरह से परम चैतन्य के मार्गदर्शन और देखरेख में हैं। परम चैतन्य जिस चीज पर काम करता है, उसके तहत कुछ भी नहीं चल सकता है। यह कुछ इतना परस्पर जुड़ा हुआ है, विश्व स्तर पर यह इतना अधिक है कि लोगों को अहसास ही नहीं होता कि वे क्या कर रहे हैं, उन्हें क्या करना चाहिए था। मेरा मतलब है कि कई पैमानों पर आप पाते हैं कि कुछ हो रहा है। जैसे, मान लीजिए अब अमेरिका में कुछ हो रहा है। बस यह जानने की कोशिश करें कि अमेरिका ने दूसरे देशों के साथ क्या किया है – तुरंत आपको जवाब मिल जाएगा। इसलिए यह उन लोगों का भी पूरा ख्याल रखता है जो परम चैतन्य पर भरोसा रखते हैं, जो परम चैतन्य के हाथों में सब कुछ देते हैं। हम चीजों का जिम्मा पुलिस को देते हैं, हम डॉक्टरों को देंगे, हम कुछ सिविल लोगों, इंजीनियरों को कुछ काम करने के लिए देंगे | लेकिन वे गलतियाँ कर सकते हैं, वे समस्याएँ पैदा कर सकते हैं – लेकिन आप इसे परम चैतन्य पर छोड़ दीजिये। यह इतना उल्लेखनीय है कि मैंने अपने जीवन में देखा है कि हर समय यह मेरे लिए काम करता है।

मैं पुणे में एक घर बना रही थी और हमें एक स्लैब, एक बहुत, बहुत बड़ा स्लैब डालना था। इसके लिए हमें करीब 300 बोरी सीमेंट की जरूरत थी। तो मुझे सीमेंट मिला और मुझे लोग मिल गए लेकिन उन्होंने कहा कि सुबह जल्दी शुरू करो और आप अगली सुबह – 24 घंटे में खत्म कर सकते हैं। मैंने कहा ठीक है। तो, लगभग शाम 5 बजे, मैंने कहा “चलो चलते हैं, काम खत्म हो गया है”। उन्होंने कहा, “आपको कैसे पता?” मैंने कहा, “मुझे पता है, चलो चलते हैं और देखते हैं”। कल्पना कीजिए, यह 12 घंटे के बाद पूर्ण होने वाला था। यह पहले ही पूर्ण हो चुका था और सभी कार्यकर्ता घूम रहे थे। सभी ने कहा, “माँ, यह चमत्कार है, इतने कम समय में इतना बड़ा स्लैब कैसे बिछाया जा सकता है?” मैंने कहा, आप देखिए, उन्हें समझाने के लिए, मैंने कहा, “हनुमान ने काम किया होगा”। लेकिन ये सभी लोग, ये सभी देवता, उस परम चैतन्य के अभिन्न अंग हैं।

अब तुम माता की पूजा कर रहे हो। माँ की पूजा करना सबसे बड़ी बात है क्योंकि ये सभी देवता और सभी लोग उनके अधीन हैं। उनकी संतान उनकी आज्ञा के अधीन, उनकी इच्छा के अधीन।

तो, माँ की पूजा करने के लिए, जैसा कि आप गणेश के बारे में जानते हैं – कि माता ने कहा कि जो 3 बार धरती मां के चक्कर लगाएगा, मैं उसे एक उपहार दूंगी। तो श्री गणेश ने अपने विवेक में सोचा, “मेरी माँ से बड़ा कौन है? कोई और नहीं।” क्योंकि वह जानता था कि वह अपने भाई के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता, जिसके पास वाहन के लिए मोर है। तो उसने कहा, “मैं कैसे घूम सकता हूं और इस व्यक्ति को जीत सकता हूं?” तो सबसे अच्छा है विवेक को अपनाना। “मेरी माँ हर चीज़ से बड़ी है!” तो वह 3 बार अपनी माँ के आस-पास घुमे और उसे पुरस्कार मिला और दूसरा भाई अभी भी आगे यात्रा कर ही रहा था। जब वह वापस आया तो उसने पाया कि पुरस्कार पहले ही जा चुका है।

तो, मैं बार-बार कहूंगी – यह विवेक है जो मदद करता है। सब कुछ परम चैतन्य पर छोड़ देने का विवेक और यह एक आधुनिक व्यक्ति के लिए कुछ ऐसा है, जिसे समझना बहुत कठिन है। वह 2 + 2 की गणना नहीं कर सकता है। यह बहुत बुरा है! इन कंप्यूटरों और ऐसी ही चीजों की वजह से। जहाँ तक किसी गणितीय गणना की आवश्यकता है, यह बिल्कुल निराशाजनक है। अब मुझे कहना होगा कि मैं नहीं जानती कि किसी भी कंप्यूटर या कैलकुलेटर को कैसे उपयोग करना है, लेकिन अगर आप मुझसे ऐसे ही पूछें, “माँ, यह कितना होगा?” मैं कहूँगी “इतना” और वह ठीक हो जाएगा। यही होगा। लेकिन मैं इसके बारे में इतनी निश्चित हूं: यह उसके अलावा और कुछ नहीं हो सकता है और यह उसी तरह काम करता है। कभी-कभी, निश्चित रूप से, अगर मैं किसी व्यक्ति को गुमराह करने के लिए कुछ गलत बताना चाहूँ, तो मैं कुछ कह सकती हूं, लेकिन आमतौर पर मुझे पता है कि यह वह है। लेकिन मैं उस तरह से नहीं जानती जैसा हम सभी जानते हैं, मैं बस इसे जानती हूँ! यह वही है: बस इसे जानती हूँ। तो,  मैं यह नहीं कह रही हूं कि आप अपने विवेक को इस हद तक विकसित करें कि आप ऐसा कर सकें। लेकिन आपकी समझदारी। यदि आप अपने विवेक का उपयोग करना शुरू करते हैं तो यह हमेशा काम आएगा। आप जो कुछ भी करते हैं, उसमें विवेक के बारे में सोचें।

आपको मेरी सलाह यह है कि, आपकी माँ, जो पूरी दुनिया से प्यार करती हैं, जो आप सभी से प्यार करती हैं और उनकी भी परवाह करती हैं, जिन्हें आत्मसाक्षात्कार भी नहीं हुआ है की तरह – आपको भी सहज योग के लिए और लोगों को बनाने का प्रयास करना चाहिए।

लेकिन ऐसा करते समय अगर आप हर समय यह कहते हुए व्यवहार करना शुरू कर दें कि “तुम यह पकड़ हो रही है, तुम भूतग्रस्त हो, तुम यह हो, तुम वह हो।” मैंने कभी किसी से ऐसा नहीं कहा, इसलिए आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए। इसमें कोई प्रेम नहीं है, कोई समझदारी नहीं है। समझदारी यह बताने में है कि: आप भी उस व्यक्ति जैसे ही थे और अब आप जानकार हैं और इसलिए आपको अपने ज्ञान का उपयोग उस व्यक्ति को सही करने के लिए करना चाहिए, उसे नीचा दिखाने के लिए नहीं। और वह सुधार भी मौखिक नहीं। केवल अपने वायब्रेशन के द्वारा ही तुम दूसरे व्यक्ति को ठीक कर सकते हो।

अधिकांश सहज काम,  कभी-कभी मैंने देखा है कि इसलिए रुक जाता है, क्योंकि हम बहुत नियम बद्ध हैं, हम महान शिक्षकों की तरह बन जाते हैं, हम उन्हें कहानियां सुनाना शुरू करते हैं और फिर वे आपसे तंग आ जाते हैं।

इसलिए जब आप अन्य लोगों को संभाल रहे हैं, जैसा कि मैंने कहा, हमें ज्ञान फैलाना होगा। बहुत जरुरी है। हम इसे अपने पास नहीं रख सकते। लेकिन यह किसी भी नेतृत्व की महत्वाकांक्षा के लिए नहीं, किसी भी तरह की मान्यता के लिए नहीं है, बल्कि केवल अपने विवेक के उपयोग के लिए, अपने ज्ञान के उपयोग के लिए है, कि हम प्यार से दूसरों की मदद करना चाहते हैं। किसी मान्यता के लिए नहीं, किसी पद के लिए नहीं, कुछ भी नहीं। हम सिर्फ इसलिए करना चाहते हैं क्योंकि हम उनसे प्यार करते हैं।

और मुझे यकीन है कि यह बहुत प्रभावी ढंग से काम करेगा और जिस व्यक्ति की मदद की जाएगी या लोगों की मदद की जाएगी, वह बस आपके लिए बाध्य होगा क्योंकि उन्हें सच्चा ज्ञान मिलता है। लेकिन मान लीजिए कोई आपके पास आता है और कहता है कि “मुझे सच्चा ज्ञान पता है”। आपको कहना चाहिए “आप जानते होंगे, लेकिन मुझे यह जानना होगा कि आप क्या जानते हैं”। फिर तुम उस व्यक्ति से पूछो और वह तुम्हें एक बड़ा व्याख्यान देगा। आप कहते हैं, “नहीं, वह बात नहीं है”, बस मुस्कुराओ और कहो, “वह बात नहीं है।” बात यह है कि सच्चा ज्ञान आपके अस्तित्व का अंग-प्रत्यंग है। यह सिर्फ तुम्हारे भीतर है। यह कोई ठोस चीज नहीं है जिसे आपने पढ़ा है या आपने समझा है, लेकिन यह सिर्फ आपके भीतर एक प्रकाश बन गया है, और वह प्रकाश है।

इस के लिए आपको बहुत अच्छी तरह से शिक्षित होने या बहुत बुद्धिमान होने या बहुत उच्च पद पर होने की कोई आवश्यकता नहीं है – यह आवश्यक नहीं है। इस तरह आपका हृदय साफ होता है। यह दिल में बसता है। कल्पना कीजिए कि अन्य सभी ज्ञान मस्तिष्क में निवास करते हैं, जबकि शुद्ध ज्ञान हृदय में निवास करता है। यह बहुत आश्चर्य की बात है। लेकिन हम यह भी नहीं जानते कि असल में हमारा हृदय सिर पर राज करता है। हृदय के चारों ओर सात आभाएँ हैं जो मस्तिष्क को इस प्रकार नियंत्रित करती हैं कि हम परम चैतन्य के हाथों में कार्यरत होते हैं।

जब तक आपका हृदय स्वच्छ न हो, जब तक आपके दिल में एक ऐसे व्यक्ति की सुंदर छवि न हो जो बहुत, बहुत शुद्ध है – आप मानसिक रूप से कुछ भी नहीं कर सकते हैं।

अपने दिल से, अगर आपको करना है, तो आपका दिल बहुत साफ और बेहद बुद्धिमान होना चाहिए। यह वह बिंदु है जिसमें आपको अपने दिल में उतर कर झांकना है कि, क्या यह विवेक वान है? उदाहरण के लिए, किसी से बहुत अधिक लिप्त हो जाना, किसी के साथ बहुत अधिक तादात्म्य स्थापित करना। यह दर्शाता है कि आपका हृदय स्वच्छ नहीं है, इसमें कितने बंधन हैं। अपना हृदय खोलो, पूरी तरह से। और इसलिए कहते हैं कि देवी हृदय में, मध्य हृदय में निवास करती हैं। वह मध्य हृदय में इसलिए निवास करती है क्योंकि वह बहुत संतुलित है। वह मध्य हृदय में शक्ति के रूप में निवास करती है। और वह आपको वह सब देती है जो आप चाहते हैं। तुम्हारे भीतर वह स्थापित है, कई तरह से। आप उन श्लोकों को जानते हैं जिनमे वर्णन हैं, कि “वह ज्ञान की तरह हमारे भीतर स्थापित हुई है, वह हमारे भीतर स्मृति के रूप में स्थापित है, वह हमारे भीतर नींद के रूप में स्थापित है, वह हमारे भीतर भ्रम, भ्रांति के रूप में स्थापित है।” वह वो है जो हमें भ्रम में डालती है क्योंकि हम अभी तक पूरी तरह से सिद्ध नहीं हुए हैं। हमें परिपक्व बनना है – यानी बिल्कुल परिपक्व। जब तक हम परिपक्व नहीं हो जाते, यह माँ स्वयं आपको भ्रम में डालती है और इधर-उधर खेलती है ताकि आप सीख सकें कि कैसे बुद्धिमान होना है।

तो व्यक्ति को समझना चाहिए कि वह आपके साथ खेल रही है और आपको बहुत सावधान रहने की कोशिश करनी चाहिए और उसकी माया में नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि अगर वह आपको माया में डाल देती है, तो आप गोल-गोल घूमेंगे और आप कहीं नहीं पहुंचेंगे।

इसलिए भ्रांति की यह शक्ति भी बहुत महत्वपूर्ण है। यह भ्रम, आप इसे कह सकते हैं, या आप इसे ऐसी चीज कह सकते हैं जिसके द्वारा वह एक नाटक बनाती है जिसमें आप एक मूर्ख व्यक्ति की तरह बन जाते हैं। तो यह मूर्खता वगैरह जो इस भ्रांति से दूर किया जा सकता है जो वह पैदा करती है। भ्रांति की यह शक्ति मनुष्य के कारण है, जैसे वे हैं, क्योंकि वे सीधे आगे कुछ नहीं समझेंगे। इसलिए इसे तब तक चक्कर लगाना पड़ता है जब तक वे यह समझने के लिए एक बिंदु तक नहीं पहुंच जाते कि यह माता का खेल था जो उन्हें ज्ञान के तट पर ले आया।

इसलिए हमारे लिए यह देखना जरूरी है कि परम चैतन्य ने हमारे लिए कितना कुछ किया है। माँ ने हमारे लिए बहुत कुछ किया है। अब हम उनके द्वारा प्रदत्त इन सभी शक्तियों को जो उन्होने हमें पूर्ण प्रबुद्ध और विकसित होने के लिए दी हैं, प्राप्त करने के लिए, खुद क्या करने जा रहे हैं? हमने अब तक क्या किया है? ऐसा करने के लिए वैसे कुछ करना नहीं है, केवल एक प्रकार की गहरी भक्ति, गहरी समझ विकसित करना। और वह गहराई संभव है, बिल्कुल संभव है, क्योंकि अब तुम उस पूर्णता की ओर अग्रसर हो।

तो आज, कबेला में, अंतिम पूजा है और मैं आपको एक माँ के रूप में बताना चाहती हूँ, कि आप सभी को परम चैतन्य पर निर्भर रहना चाहिए। परम चैतन्य पर निर्भर रहना बहुत महत्वपूर्ण है। दूसरों पर दोष मढ़ने की भी कई लोगों की आदत होती है। जैसे “मैं इस व्यक्ति से पकड़ा गया, और उस व्यक्ति से पकड़ा गया।” आप केवल अपने आप में पकड़े गए हैं! ऐसे सभी विचार किसी काम के नहीं हैं। खुद का सामना करें, अपने बारे में जानें और आपको खुद को पूर्ण निपुण करना होगा, यह इतना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस समय लोग सोचते हैं कि कुछ बड़ा होने वाला है। मुझे नहीं पता, उनके अनुसार वर्ष 2000 कुछ महान होगा। लेकिन मुझे नहीं पता, क्योंकि यह सब मानव निर्मित है, यह सब वर्ष 2000 और वर्ष 3000 मानव निर्मित है। लेकिन मैं खुद, जैसा कि कई लोगों ने भविष्यवाणी की थी, कि संभवत: आपकी समझ और आपकी विवेकशीलता के कारण, मुझे यकीन है कि इस दुनिया में कुछ बड़ा हो सकता है और चीजों को आध्यात्मिकता की समझ के उचित स्तर पर लाया जा सकता है, क्योंकि यह अंतिम निर्णय है, और इस अंतिम निर्णय में, आपको एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है, जो मुझे यकीन है कि आप इसे कर सकते हैं, यदि आप भविष्य के लिए कुछ हासिल करने का निर्णय लेते हैं।

परमात्मा आपको आशिर्वादित करे|