Shri Bhoomi Devi Puja

New Delhi (भारत)

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Shri Bhoomi Puja   

Date:  April 7, 2000   

Place: Noida   

श्री भूमि देवी पूजा  

सत्य को खोजने वाले आप सभी साधकों को हमारा प्रणाम। मैंने तो इतनी आशा नहीं की थी कि आप इतने लोग इतनी बड़ी तादाद में इस जगह आएंगे और इस कार्य को समझेंगें। एक बार एक प्रोग्राम में हम जा रहे थे, ये दौलताबाद उस जगह का नाम है।  उससे गुज़र के एक सामने जाना था, रास्ते में गाडी खराब हो गई। वो भी योग ही है, सहज में ही गाडी खराब हो गई। सो उतर के देखा तो वहां बहुत सी औरतें, सौ से भी अधिक, अपने बच्चों समेत। बहुत से बच्चे, उनसे कई गुना ज्यादा। वहाँ एक नल फुटा था उससे पानी ले रहीं। इतनी धूप, बड़े फटे से कपड़े पहने हुए किसी तरह सर पे चुन्नी लिए हुए।  मुझे समझ में नहीं आया कि क्या हो रहा है। तो मैने उनसे पूछा कि आप लोग यहाँ क्या कर रहे हो?  यहाँ कैसे आये?  तो उन्होंने कहा कि हम सब मुसलमान औरतें हैं और हमारा तलाक हो गया। और ये हमारे बच्चे हैं और जो महर थी वो बहुत ही थोड़ी थी उसमें तो एक महीना भी चलना मुश्किल था। लेकिन किसी तरह से हमें यहाँ काम मिल गया तो हम यहाँ गिट्टी फोडते हैं। और रहते कहाँ हो?  तो कहने लगी सामने जो आपने देखें हैं कुछ टिन थे, के टुकड़े थे, टूटा-फूटा सा एक मकान तो नहीं कह सकते, उसी में हम लोग सब रहते हैं।  बाप रे! मैंने कहा, वहीं पता नहीं क्यों, मुझे बहुत रोना आया और एक पत्थर पे बैठ कर मैं रोने ही लग गई।  उस रोने से कुछ फरक तो नहीं पढ़ना था ।  लेकिन मेरे अंदर एक भावना आयी कि  हमारे देश में इतनी संस्कृति है, इतनी पवित्रता भी है। और औरतें अपने चरित्र को बहुत ऊँची चीज समझती हैं। सब कुछ होते हुए भी हमारे देश में इतनी दुर्दशा क्यों है?  सो ये ही ख्याल आया कि जहाँ की माताएँ ही इस प्रकार पीड़ित होंगी, तो उनके बच्चों का क्या हाल होगा?  वो किस तरह से अपने बच्चों को पाल सकती हैं? और उनको कौन सी शिक्षा दे सकती हैं?  तब मेरे मन में ये विचार आया कि ऐसी एक कम से कम एक संस्था ऐसी बननी चाहिए कि जहाँ इस तरह की औरतें जिनका कोई सहारा नहीं है, जो किसी तरह से जी रही हैं, उनके लिए कुछ न कुछ सहारा बनाना चाहिए। 

अब इसे काफी साल हो गए लेकिन सहजयोग में भी बहुत मैं व्यस्त रही। और उत्तर प्रदेश तो मेरा ससुराल है। वहाँ जो मैंने देखा कि औरतों की कोई इज्ज़त नहीं है। औरतों को काई मानता नहीं, सब हावी। अगर कोई औरत जबरदस्त है तो वो ही जी सकती है। जो डोमिनेट (Dominate) कर सकती है, वो ही जी सकती है। और जो औरत सीधी सरल है उसको खूब दबाया जाता है हर तरह से, उसका विल्कुल ख्याल नहीं। वो मरे चाहे जिए, अगर मर गई तो लोग उनको दावतें देंगे कि फिर से शादी कर लो।

सब देख के मैं तो हैरान हो गई क्योंकि महाराष्ट्र में ऐसी हालत नहीं है। और जो एक बार विधवा हो गई तो विधवा ही बनी रही बैचारी।  सो तो मेरे अनुभव की बात थी तो मैंने कहा कि ऐसी संस्था सबसे पहले उत्तर प्रदेश में बनना चाहिए। और बड़े आनंद की बात है कि उत्तर प्रदेश में ही यह संस्था शुरु हो रही है। इसमें तो  हर हालत ये ही चाहेंगे कि जो औरतें अपने पैर पर खड़ी नहीं हैं, और मोहताज हैं, हर चीज़ के लिए।  उनमें एसी शिक्षा देनी चाहिए कि वो अपने पैर पर खड़ी हो जाए। और अपने बच्चों का पालन पोषण कर सकें, उनको इक्जत मिलें। पर इसी से सब कुछ होने वाला नहीं है। ये एक समझ लीजिए बहुत छोटे पैमाने की बात है। लेकिन तभी होगा जब यहाँ के समाज में स्त्री का स्थान बनेगा। यहाँ के पुरुष इस बात को समझेंगे कि उनका अपने घर की औरतों के तरफ, बच्चियों की तरफ क्या कर्त्तव्य है और क्या उन्हें करना चाहिए। उनका जीवन बहुत एकोँगी है उसको बदलना चाहिए। और उनको अपनी फेमिली (Family) अपने बाल-बच्चे अपनी पत्नी, माँ सबको बहुत प्यार से देखना चाहिए और समझना चाहिए। अगर यहाँ आप सब इतने लोग हैं। सब पुरुषों ने ये अगर कसम ले ली कि हम औरतों की इज्जत करंगे। और कोई विधवा हो जाता है, आदमी तो कभी होता ही नहीं विधवा। लेकिन गर कोई औरत विधवा हो जाए तो उसकी दुर्दशा है, इतनी बेचारो को दुर्दशा कर देते है । औरतें ही खुद, औरतें ही उनको कहती हैं कि ये तो तुम्हारा दुर्भाग्य है, तुम्हारा ही कुछ है।   और यहाँ तक कि तुमने अपने पति को खा लिया है, ऐसा भी कहती हैं। ये तो मैंने अपने कान से सुना है। इसीलिए पहले शायद औरतें घबराहट से सती हो जाती होंगीं। और अगर कोई युवती विधवा हो जाए और देखने में अगर वह सुन्दर हो तो बस फिर तो उसकी कोई भी खैर नहीं है। 

तो पहले तो विचार मैंने कहा कि सहजयोग में अगर कोई ऐसी विधवा आए तो उसका विवाह जरूर करा देना चाहिए।  पर अपने देश में कौन करेगा और करेगा भी तो उसे सत्रह बातें सुनाएगा। पुरुष होना ही वो सोचते हैं कि वो कोई विशेष रूप के अधिकारी हैं कि जो चाहे सो करें। लेकिन ये नहीं जानते कि ये नर्क की गति है। ये बहुत बुरी बात है दूसरों के साथ दुष्टता करना ही बुरी बात है। किन्तु अपनी पत्नी है, जो कि आपके सारे सुख का साधन है। उसके साथ इस तरह से व्यवहार करना, तो अपनी संस्कृति का नहीं है यह काम। भारतीय संस्कृति का कोई अधिकार (अष्पष्ट) में यह कहा जाता है कि “यत्र नारयाः पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवता” जहाँ स्त्री पूजनीय हो तभी वहाँ पर देवता आ सकते हैं।  इतना ही नहीं पर स्त्री को भी पूजनीय होना चाहिए। 

इतने विपत्ति में, इतने तकलीफ में आज हमारे देश को नारी है, उसी वजह से हमारे देश में कभी भी अच्छा सामराज्य आ नहीं सकता। कुछ अच्छा हो ही नहीं सकता। क्योंकि सारी देवियां आजकल नवरात्री भी है ऐसी बातों से बहुत नाराज हैं। और वो कोई भी आशीर्वाद नहीं देंगी आपको। लक्ष्मी से ले कर, हर एक देवी कोई भी आपको आशीर्वाद नहीं देंगी।  अगर आप अपनी पत्नी का ख्याल न करें और उसको समान तरीके से न रखें। इसीलिए हमारे देश में इस कदर हर तरह की परेशानियाँ हैं।  मैं तो सोंचती हूँ कि गर ये चीज़ ठीक हो जाएँ तो हमारी हर तरह की परेशानियाँ ठीक हो जाएँगी । क्योंकि साक्षात् लक्ष्मी का वरदान इसी से मिलता है। घर की गृहलक्ष्मी को जो लोग नहीं मानते तो उनको क्या अधिकार है कि लक्ष्मी के आशीर्वाद से वो प्लावित हों। 

अब इस मामले पर एक और  मैंने वीडियो (Video) पे देखा था कि उन्होंने विधवाओं को दिखाया था।  जो बृंदावन में और उधर गोकुल में रहती हैं। कृष्ण तो सोच रहे होंगे कि पता नहीं ये कहाँ से बेचारियों के साथ ज्यादती हो रही है। वो विधवाएँ हैं और उनकी बेचारियों की इतनी दुर्दशा है कि सारे दिन वो गाना गाएं और एक रुपया उनको मिलता है। और उनको हर तरह से वहाँ के लोग इस्तेमाल करते हैं। पर ऐसी मैंने सोचा फिल्म देखने से किसी में जागृति नहीं आई। बहाँ पाँच लाख औरतें हैं इस तरह की। किसी के मन में धारणा नहीं आई ।  इतना पैसा कमा रहे हैं, ये कर रहे हैं, वो कर रहे हैं, कि जा करके उनका कुछ कल्याण करें।  उनके लिए कोई चीज़ बनाए माने मनुष्य इस कदर संवेदनशील नहीं है, बिल्कुल भी, उल्टा ही है।  उसके मन में ये भी भावना नहीं आई कि इस फिल्म को बहुत दिखाया गया। फिर मैंने कहा ऐसी फिल्म को दिखाने से कोई फायदा नहीं। अब एक थी आई थीं यहाँ बाई, यहाँ वो आई थीं  दिखाने के लिए, वो तो सिर्फ बदनाम करने के लिए। उनकी पब्लिसिटी बहुत हो गई, वो फिल्म दिखाने से क्या होगा?

इन लोगों के पास इतने पैसे हैं तो क्यों न ये विधवा के आश्रम और ये कायदे के बनाएं। आज हैं दो चार, लेकिन वो कायदे के नहीं है। तो एसे आश्रम क्यों न वनाए जाएँ जहाँ इन औरतों का पालन पोषण तो हो कम से कम। बहुत सी औरतें तो इसोलिए अपनी आत्महत्या कर लेती हैं कि ऐसे जीने से अच्छा हम आत्महत्या कर लें। एक तो स्त्री के लिए विवाह बिल्कुल करना ही चाहिए। और विवाह के बाद अगर उसके पति गर नहीं रहे, तो गए फिर। फिर उसका जीना मुश्किल और उस पर हर हर तरह की आफत। हर तरह की आफत इस देश में हैं।  और देश में इसलिए नहीं है क्योंकि उनमें नैतिकता नहीं है। कोई अगर औरत विधवा हो गई तो वो घूमघाम के अपना पति ढूंढ लेगी, नहीं तो कुछ कारोबार ढूंढ लेगी। ये अपना ऐसा देश है कि पदमिनी के साथ 32,000 औरतें होम कुण्ड में कूद पड़ीं, अपनी आबरू बचाने केलिए, अपनी इज्जत बचाने के लिए। तो इस इस देश में फिर औरतों के लिए कौन सा मार्ग बचा हुआ है अपनी इज्जत से वो रह ही नहीं सकती।  उनकी तो इतनी बुरी दशा है कि इससे मैं सोचती हूँ कि किसी को अगर कोई रोग हो जाये तो कम से कम वो किसी अस्पताल में जा सकता है। उसके लिए कोई न कोई व्यवस्था हो सकती है।  

पर ये बताइये कि इस तरह की जो औरतों की जो पीड़ाएँ है वो किस तरह से आप कम कर सकते हैं?  इतना दु:ख और कोई सहानुभूति तक नहीं। यहाँ तक कि अगर एक विधवा स्त्री को आपने देख लिया, तो बड़ा आपके लिए अपशगुन हो गया। कोई विधवा स्त्री है तो उसके हाथ का, खाना नहीं खाने का। ये अपना समाज ये नहीं जानता कि ये कहीं शास्त्रों में लिखा नहीं है। श्री राम ने स्वयं मंदोदरी का विवाह विभीषण से करा दिया था। अनेक उदाहरण हैं, श्री राम ने किया, जिनको आप इतना मानते हैं। वो जब विधवा हो गई तो उसका विवाह उन्होंने विभीषण से करा दिया।  तो फिर कहेंगे कि हाँ यहाँ तक ठीक है और नहीं तो इससे आगे कहीं नहीं शादी कर सकते। अब आप ही सोचिये कि अगर आपकी माँ, बहन, बेटी, उनकी दुर्दशा हो रही है तो ऐसे समाज से तो भगवान बचाए रखे।  बेहतर है कि ऐसा कोई समाज ही न हो, और अगर है तो सबको जीने का, आनंद से रहने का, पूर्ण अधिकार है।

सो मैं चाहूँगी कि आप में से जो भी कोई लोग हैं जिन्होंने कभी भी अपने घर में या बाहर में औरतों को सताया हो, तो उनको विल्कुल बदल जाना चाहिए। और अपने को दोषी समझना चाहिए कि हमने एक अनाथ असहाय औरत को सताया है। अपनी पत्नी को भी जिसने सताया है, अपनी बेटी को जिसने सताया है।  वो सभी बहुत बड़े दोषी हैं और मैं ये नहीं बता सकती कि उनका क्या हाल होगा।

क्योंकि अब सत्ययुग की शुरूआत हो रही है और हरेक के लिए जरूरी है कि वो धर्मपथ पे रहे। और धर्म में सबसे बड़ी चीज है प्रेम। और जो अपनी पत्नी ही को ही प्रेम नहीं कर सकता तो वो किसको प्रेम करेगा?  अपनी बेटो से ही प्रेम नहीं कर सकता वो किसको प्रेम करेगा? उसका दोष यही है कि वो स्त्री है। और अगर दुनिया में स्त्री नही न होती तो आपकी माँ कहाँ से आती और आप कहाँ से आते?  इसके प्रति बहुत तीव्र संवेदना आनी चाहिए। अच्छा महाराष्ट्र में भी काफी बाल विधवा वगैरा का प्रभाव था, इतना नहीं पर तो भी। पर वहाँ पर ऐसे-ऐसे लोग हो गए: जैसे तिलक थे, गोखले थे. रानाडे थे। इन्होंने सबने विधवाओं से विवाह किया और उन्होंने वहाँ पर बहुत चेतना लाई है, रिफॉर्म्स (reforms) किए। वहाँ पर पूना में जैसे कि औरतों का एजुकेशन (education) एकदम (free) फ्री है।  ग्रेजुएशन (graduation) तक उनको एक पैसा नहीं देना पड़ता। उससे भी ज्यादा यहाँ कार्य करने की जरूरत है क्योंकि यहाँ उससे कहीं अधिक बुरी दशा है। यहाँ के लोगों में जागृति लाना और उनमें चेतना लाना बहुत जरूरी है। उसी की जगह अगर औरत जबरदस्त है तो उसका राज होता है। बहुत सी औरतों ने सिख लिया है बेहतर है हम जबरदस्त बन जाएँ, इससे कोई फायदा नहीं है।  

औरत का तो कार्य ही है कि सब चीज़ को आत्मसात करे क्योंकि पृथ्वी जैसी उसकी अपनी शक्तियाँ हैं। किन्तु अपनी शक्तियों को जगाएं और उससे सृजन करें और अपने दम पर  खड़ी हों और स्वाभिमान से रहें। किसी तरह की भी बातें करने से यह कार्य नहीं होने वाला। इसको घूरी तरह से समझ लेना चाहिए कि ये महापाप है और ऐसे गलत काम करने नहीं देने चाहिएँ।  तभी हमारे देश में परिवर्तन आ सकता है। सिर्फ सहजयोग में आने से कोई फायदा नहीं है। सब लोगों को, सहजयोगी हों या नहीं हों, आपके पड़ोस में ही अगर कोई किसी औरत को मार रहा है तो आपको जाकर उसे छुड़ाना चाहिए। कोई शराब पी कर के और घर में दंगा मस्ती कर रहा है तो उसको ठिकाने लगाना चाहिए। ये आपका सामाजिक कर्त्तव्य है और जब तक ऐसी जागृति आप लोगों में नहीं आएगी तब तक ये कार्य नहीं हो सकता। 

दूसरी बात खुद औरतीं की ऐसी है कि इनमें इतना ज्यादा स्वाभिमान है कि ये हर हालत सह लेंगी, किन्तु इनसे किसी विधवा से कहो कि तुम शादी कर लो तो हो गया बस। हमारे यहाँ एक सहजयोगिनी थी, देखने में बहुत सुन्दर थी और तीन बच्चे थे। बड़ा लड़का कोई 15-16 साल का होगा अब वो कमाने के लिए कहीं भी जाए कहीं भी काम करे, बस आदमी उसके पीछे पागल। अपनी बीबी के पीछे में नहीं है, दूसरे की बीबी है और वो विधवा है तो चलो उसके पीछे। तो उनसे मैंने कहा कि, बहुत गोल घुमा के मैंने कहा कि, मेरे ख्याल से ये जो आपके प्रश्न हैं इसके लिए अच्छा है कि आप शादी चाहिए तो वो तो बेहाश हो गई। सुनते ही साथ ही बेहोश हो गई कि माँ आपने एसी बात कैसे कही?  जब उन्हें होश आया तो उन्होंने मुझसे कहा कि “माँ आपने कौन सा मुझमें ऐसा दोष पाया जो आपने इतनी कड़ी सजा सुनाई। अरे भाई इसमें कौन सी तुम्हें में सजा सुना रही हूँ?  माने ये भी हमारे अंदर इतना ज्यादा संस्कार और Conditioning है औरतों में।   विधवा हो गए, ये हमारे समाज की देन है, विधवा हो गए तो गए। अब इसके बाद हम विवाह नहीं कर सकते, हम कुछ नहीं कर सकते, हम करेंगे तो बस बेकार। कौन समझाए?  तब फिर मैंने उनके लड़के को समझाया कि तुम अपनी अम्मा को समझाओ। वो कहीं नहीं रह सकती थी, क्योंकि सुन्दर दिखने में थी और विधवा थी। तो एक साल बाद उनकी खोपड़ी में बात आई, जब उनपे काफी आफतें आ गई तब एक साल बाद उनको लगा कि माँ जो कह रही है ठीक बात है।  तब फिर उनकी शादी यहाँ तो होना अश्यक्य है कोईविधवा हो गई तो मतलब  वो तो बिल्कुल ही दुनिया से गई बोती औरत। फिर उनकी शादी अमेरिका में करवा दी। तो उससे उनके बच्चे भी पल गए, बड़े हो गए, अपने-2 ठिकानों पर पहुँच गए।  पर वो लोग भीख माँगेगी पर फिर से शादी नहीं करेंगी। ये भी कोई भगवान ने बताया है?  किसी शास्त्र में लिखा है? कहीं भी नहीं है। ये सब यूँ ही बनाए हुए हैं, औरतों पर आक्रमण करने के लिए। 

हम तो वैधव्य को मानते ही नहीं हैं।  मानते ही नहीं, क्योंकि वैधव्य क्या हुआ, जो पति है तो मतलब मर गए  समझ लीजिये, तो मर गए। अब वो वैधव्य बनके उसके माथे पे बन गया।  ये कोई जरूरी चीज़ है या तो दोनों आदमी साथ ही मरें और नहीं मरें तो औरतों ये यह दुर्दशा करो। ऐसे कोई विधि तो है नहीं कि सब साथ मरना  चाहिए। अगर ये धर्म होता तो सब साथ ही मरते। पर साथ तो मरते नहीं। अगर इतफाकन औरत बच गई तो वो तो बिचारी गई काम से।  इतना दुःख औरतों ने उठाया है कि अब आपको उठाने की जरूरत नहीं है। फिर वो लड़ाका भी हो सकती हैं, गुस्सैली भी हो सकती हैं और घर में बड़ा राजकारण भी करती हैं सब कुछ हो सकता है। लेकिन वो अच्छी औरत नहीं बन सकती।  या तो बहुत ही दुःखी, या बहुत परेशान, तो इसलिए ये एक संस्था छोटे ही पैमाने पर बनी गयी।  और इस पर हम कीशिश करेंगे, पूरी तरह से कि उन लोगों को ऐसे रास्ते पे लगाएं, जिससे वो  अपने पैरों पर खड़े हों और स्वाभिमान से जीए।  और अगर वो विधवाएं हैं और अभी जवान हैं तो उनकी हम अच्छी जगह शादी कर देंगे। आप लोग नहीं करिएगा तो अमेरिका में कर देंगे। आप लोग बैठे रहिए यहाँ, यही बेहतर है। अपने को बहुत समझते हैं तो बैठे रहिए। ये घमण्ड आदमी का जाना चाहिए। मैं

 हमेशा कहती हूँ कि reform औरतों का करने की ज़रूरत नहीं है, आदमियों का reform करो। इतना घमण्ड किस चीज़ का है आपके सिर में?  क्या समझते हैं आप अपने आप को?   अभी कोई बता रहा था कि कोई अगर I.A.S में आ गया तो वो तो सबसे बड़ा दामाद है। तो मैंने कहा भई I.A.S. में है क्या? कौड़ी न धेला।  कुछ कमाई नहीं, कुछ नहीं खास, रोज का रोना मर मैं जानती हूँ न।  क्योंकि ईमानदार है तो, अगर बेईमान है तो भी आफत। और अगर ईमानदार है तो बिलकुल ही आफत।  लेकिन तो भी औरतें उसमें रहती हैं। अपने चार लोगों को देखती हैं, संभालती हैं, प्यार करती हैं। पर मेरी समझ में नहीं आया कि ये खोपड़ी में कैसे आया आदमियों के कि वे अगर I.A.S. में हो गए तो कोई बड़े अफलातून हो गए। कोई भी बात खोपड़ी में  घुस जाती है इंसान के, खासकर हिन्दुस्तान में तो वो वाकई में बैलून (Balloon) के जैसे उड़ने लग जाते हैं। फिर चाहे किसी को लात मारे, किसी को थप्पड़ मारे, किसी को डंडा मारे चाहे  कुछ करें।  उसको लगता नहीं कि ये हम क्या कर रहे हैं?  और ऐसे  तो Vegetarian बनेंगे।  जैन लोग कहते हैं कि मच्छर को मत मारो खटमल को मत मारो।  जो खून पीते रहते हैं हमेशा, उनको मत मारो। पर अपनी बीबी को मार सकते हैं आसान, क्योंकि वो आपकी बीबी है और इसीलिए तो आई है कि मार खाए। अगर मार नहीं खा सकती तो बीबी क्या? 

ये जो हमारी दशा है और हम इतने  निम्न स्तर पे उतरे हैं उसकी भी वजह यह है कि हमारे अंदर के जो मूल्य हैं वो खत्म हो गए हैं।  पहले हमारे यहाँ कहते थे कि जो बडभुँजे होते हैं वे ही अपनी ही बीबी को मारते हैं। मैंने तो देखा यहाँ सभी मारते हैं। ऐसी तो कोई बात नहीं है। कोई इस मामले में किसी को शर्म नहीं, हया नहीं। हाँ ( अष्पष्ट ) शर्मो हया सबको खूब शर्मो हया है पर इस मामले में किसी को शर्मो हया नहीं। बीबी की सबके सामने डाँट देंगे। कोई उनको उसमें हरज नहीं है कि भई हमने क्यों डाँटा, या क्यों ऐसे डाँटना नहीं है।  एक वो पहले ही से शिक्षा नहीं है घर में, यही सिखाया जाता है क्या?  कि इस तरह से आप व्यवहार करो। 

तो जहाँ तक मुझे हो सकता है मैं इस संस्था के लिए पूरी मेहनत करूँगी। और जितना हो सकता है इसमें औरों का उद्धार ( अष्पष्ट)  काम क्या हो रहा है वो कोई नहीं देखता। बच्चे खराब हो रहे हैं।  आप के बच्चे ही दुष्ट हो रहे हैं, चोरी करेंगे ये करेंगे। ये सब आया कैसे? क्योंकि समाज टूट गया, क्योंकि फैमिलीज़ (families)   टूट गई, इसलिए हुआ। तो अपने कुटुंब जो है, बहुत महत्वपूर्ण चीज है। एक-एक कुटुंब से ही समाज बनता है, और समाज से ही देश बनता है। देश की बातें करते हैं, और कुटुंब तो खत्म हो रहे हैं। अपने कुटुंब को इज्जत से रहना, स्वाभिमान से रहना। देशभक्ति से रहना तभी हो सकता है कि घर की औरत ठीक हो, उसकी इज्जत हो। उसको समझने की कोशिश करें। 

हमारे महाराष्ट्र में भी एक दो ऐसी समाज व्यवस्था है जहाँ इधर के जैसा ही मामला बहुओं के साथ किया जाता है। पर वो भी बदल जाएगा, और ये भी बदल जाएगा। इसको बदलना ही पड़ेगा। अगर बदलेंगे नहीं,  तो इनके ही बच्चे उठ के इन्हीं आदमियों को मारेंगे। बीवी  को तो मारने की बात बाद में होगी, पहले इनको मारंगे। तब सबकी खोपड़ी ठीक आएगी। इतना अहंकार मानव में है, मनुष्य में है। आखिर किस चीज़ का इतना अहंकार है, कौन सी ऐसी चीज़ तुमने पाई है जिसका तुम अहंकार कर रहे हो?

अब इस संस्था को चाहिए कि सब लोग पूरी तरह से मदद करें। ये नहीं कि सिर्क पैसा दे दें, पर इसको पनपाने में अब सबसे बड़ा तो प्रश्न ये है कि हमें ऐसी औरतों को खोजना है, उनको खोज कर निकालना है। अब हमें क्या पता कि कहाँ कि औरतें हैं क्या?, हम तो यहाँ रहते भी नहीं। तो इस तरह की औरतें अगर आपको मालूम हैं, जो पीड़ित हैं, दुखित हैं, और जिनका कोई सहारा नहीं।  और जो विधवा बन बहुत कुछ सह रही हैं, ऐसी सब औरतों को आपको इस संस्था में लाना चाहिए। अभी तो ये कह रहे हैं कि 100 औरतों का इंतजाम है। 100 से क्या होगा, पर उसके बाद उनसे बातचीत करके उनको समझा बुझा के, जो लोग अंदर आएंगी वो तो आएंगी ही। लेकिन जो बाहर रहेगी. उनको भी समझाया जा सकता है। उनके पति को भी समझाया जा सकता है। उनके घर वालों को भी समझाया जा सकता है। 

अपना ही देश ऐसा है जहाँ अब भी कुटुंब व्यवस्था चल रही है, बाकी कहीं नहीं है। उसका उत्तरदायित्व औरतों को है, आदमियों को नहीं। ये भारतीय नारी की विशेषता है जिसने इस देश को रोक रखा है, नहीं तो कब के चले जाते। इसलिए अब आप समझ लीजिए कि गर आपने अतिशयता करी तो यही औरतें जो हैं क्रान्ति कर देंगी आपके लिए। वो ठीक नहीं है, वो प्रेम का हनन है, वो अच्छी बात नहीं है। अच्छी बात ये है कि समझदारी रख और अपनी स्त्रियों की अपनी बेटियों की हिफाज़त करें। उनको देखें, सम्भाले, और उनको प्यार दें। और उनको ये पता होना चाहिए कि आप उन्हें प्यार करते हैं, पूरी समय।  उसमें कोई ऐसी बात नहीं है कि वो आपकी खोपड़ी पर बैठ जाएंगी, एकाध होती हैं। लेकिन आदमी गर कमजोर नहीं है तो औरत कभी भी उसकी खोपड़ी पर नहीं बैठ सकती। पर वो इतनी दबी हुई भी नहीं रहना चाहिए कि जिससे बच्चे भी नहीं पनप रहे हैं, जिसमें कुछ फूल ही नहीं खिल सकते। बच्चे तो माँ को मानते ही नहीं। माँ के पैर भी इस तरह से छुएँगै जैसे कि पता नहीं कोई ईंट पत्थर बीच में पड़ा हो। और बाप को फुरसत नहीं, तो बच्चे तो बिगड़ ही जाएंगे। और उससे जो-जो आज दशाएं हुई हैं, जो-जो आप पढ़ते हैं, पेपरो  में देखते हैं।  उसका कारण ही ये है कि हमारी कुटुंब व्यवस्था ठीक नहीं है। वो बहुत जरूरी है कि उसको आप ठीक रखिए। यही, हमारे समाज का ताना बाना है। इसके सहारे आज आप भी यहाँ बैंठे हुए हैं और आगे भी अगर चलाना है। तो कृपया याद रखिए कि औरत, का मान रखना उसका उत्थान करना और लोगों को परिवर्तित करना भी आपको एक परम लक्ष्य की तरह से समझना चाहिए और उधर ध्यान दना चाहिए। ये मेरी आतंरिक इच्छा है।

ऐसे तो आपको सबको मैं हमेशा कहती हूँ कि अनन्त आशोर्वाद। किन्तु उस आशीर्वाद में सबको अपने साथ समेटिए। हमें तो लोगों को जोड़ना है, जब एक कुटुंब ही को आप नहीं जोड़ सकते हैं तो आप किसको जोड़ेंगे?  सबको चाहिए कि प्रेम से आपस में रहें। अब आप सहजयोगी हो गए और ये बड़ी भारी बात आपने प्राप्त करी। ये ज्ञान मार्ग है, इसमें आपको पता है प्रेम क्या चीज है और किस तरह से आदान प्रदान करना चाहिए। आपस में किस तरह से समझना चाहिए। इस चीज़ से आप हैरान होइयेगा कि सारा समाज एकदम बदल जाएगा। अपने को परदेसियों जैसे नहीं होना है, बिल्कुल भी नहीं। वहाँ तो कचहरी करेंगी औरतें, अमेरिका में तो औरतें सात सात, आठ-आठ शादियाँ करती हैं और रईस जाती हैं, पति सब गरीब हो जाते हैं। (अष्पष्ट….) ये सब ठीक नहीं है।  ये हम लोग नहीं चाहते, चाहते क्या हैं?  आपसी प्रेम हो, बच्चे अच्छे से हों और आप देखिए कि बड़ा इसका लाभ होगा, बहुत लाभ होगा। इतना लाभ होगा ऐसे समाज का और ऐसे देश का। इसमें ये आपसी झगडे करना कोर्ट कचहरी करना, कोई जरूरत नहीं है।  अगर ये सबके अच्छे के लिए है तो ये ही क्यों नहीं करते। इस तरह से समझदारी आनी चाहिए। समझदारी में बढ़ना चाहिए। 

यहाँ तो मैं देख रही हूँ बहुत से सहजयोगी बैठे हुए हैं तो उनके लिए एक नई बात अब बता रही हूँ। आप सहजयोगी हैं तो सब लोगों को समझ लेना चाहिए कि ये सहजयोगी हैं। उसी प्रकार सहजयोगी को समझ लेना चाहिए कि जो सहजयोगी हैं वो तो हैं, नहीं हैं तो नहीं हैं। सबको समेटना आना चाहिए। इसी सहज योग के लोगों के स्वभाव से ही आप दुनिया को जीत सकते हैं।  जो बात मैंने कही है उसको आप हृदय में बाँध लें। क्योंकि यह दर्द मेरे अन्दर, और इस दर्द को आप लोग खत्म कर सकते हैं। आप सबको अनन्त आशीर्वाद।