Shri Bhoomi Devi Puja

New Delhi (भारत)

2000-04-07 Bhoomi Devi Puja Talk, NGO Foundation, New Delhi, India, Hindi, 44'
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Nirmal Dham Bhoomi Pujan Date 7th April 2000 : Noida Place Public Program Type

[Original transcript Hindi talk, scanned from Hindi Chaitanya Lahari]

सत्य को खोजने वाले आप सभी साधकों आई कि हमारे देश में इतनी संस्कृति है इसकी को हमारा प्रणाम। मैंने तो इतनी आशा नहीं की पवित्रता भी है और औरतें अपने चरित्र को एक बहुत ऊँची चीज समझती हैं। सब कुछ होते हुए भी हमारे देश में इतनी दुर्दशा क्यों हैं? तो ये ख्याल आया कि जहाँ की माताएँ ही इस प्रकार पीड़ित होंगी तो उनके बच्चों का क्या था रास्ते में गाडी खराब हो गई। सहज में ही हाल होगा? चे किस तरह से अपने बच्चों को गाड़ी खराव हो गई। सो उतर के देखा को बहाँ पाल सकती हैं और उनका कौन सी शिक्षा दे सी औरतें सौ से भी अधिक, अपने बच्चों सकती हैं? तब मेरे मन में ये विचार आया कि थी कि आप इतने लोग इतनी बड़ी तादाद में इस जगह आएंगे और इस कार्य को समझेगे। एक बार एक प्रोग्राम में हम जा रहे थे। दौलताबाद जगह का नाम हैं, उससे गुज़र के सामने जाना बहुत समेत। बहुत से बच्चे उनसे कई गुना ज्यादा। ऐसी कम से कम एक संस्था बननी चाहिए कि वहाँ एक नल फुटा था उससे पानी ले रहीं। जहाँ इस तरह की औरतें जिनका कोई सहारा इतनी धूप, बड़े फटे से कपड़े पहने हुए किसी नहीं, जो किसी तरह से जी रही हैं, उनके लिए तरह सर पे चुन्नी लिए हुए। मुझे समझ में नहीं कुछ न कुछ सहारा बनाना चाहिए। अब इसे आया कि क्या ही रहा है। तो मैने उनसे पूछा कि आप लोग यहाँ क्या कर रहे हो? यहाँ कैसे काफी मैं व्यस्त रही। उत्तर प्रदेश तो मेरा ससुराल आए? तो उन्होंने कहा कि हम सब मुसलमान हैं और वहाँ जो मैंने देखा कि औरतों की कोई औरतं काफी साल हो गए, लेकिन सहजयोग में भी हैं और हमारा तलाक हो गया और ये हमारे बच्चे हैं जो महर थी वो बहुत ही थोड़ी हावी अगर कोई औरत जबरदस्त है तो वो ही इज्ज़त नहीं। औरतों को काई मानता नहीं, सब तो एक महीना भी चलना मुश्किल था लेकिन किसी तरह से हमें यहाँ काम मिल गया थी। उसमें जो सकती है। जो Domimate कर सकती है वो ही जो सकती है और जो सीधी सरल है उसे तो हम यहाँ गिट्टी फोडते हैं। और रहते कहाँ खूब दबाया जाता है। हर तरह से। उसका हो? तो कहने लगी सामने जो घर है। कुछ कपड़े विल्कुल ख्याल नहीं। बो मरे चाहे जिए। अगर मर गई तो लोग उनको दावतें देंगे कि फिर से शादी करों। सब देख के मैं तो हैरान हो गई क्योंकि महाराष्ट्र में ऐसी हालत नहीं है। और जो बैठ कर मैं रोने लगी। मेरे अंदर एक भावना विधवा हो गई तो विधवा ही वनी रही बैचारी। थे। टूटा फूटा सा एक मकान तो नहीं कह सकते, उसी मं. हम सब रहते हैं। वहीं पता नहीं क्यों, मुझे बहुत रोना आया और एक पत्थर पर ন

बस उसकी कोई खैर नहीं। तो पहले त मैंने कहा कि सहजयोग में कोई विधवा गर आए तो उसका विवाह जरूर करवाना चाहिए। पर अपने सौ तो मेरे अनुभव की बात थी तो मैंने कहा कि ऐसी संस्था सबसे पहले उत्तर प्रदेश में बनना चाहिए और बड़े आनंद की बात है कि उत्तर प्रदेश में ही यह संस्था शुरु हो रही है। इसमें तो देश में कौन करेगा और करेगा भी तो उसे सत्रह हर हालत ये चाहेंगे कि जो औरतें अपने पैर पर खड़ी नहीं हैं और मोहताज हैं हर चीज़ के लिए, विशेष रूप के अधिकारी हैं कि जो चाहे सो उनमें एसी शिक्षा देनी चाहिए कि वे अपने पैर कहें। लेकिन ये नहीं जानते कि यह नर्क की पर खड़ी हो जाए और अपने बच्चों का पालन पोषण कर सकें। उनको इक्जत मिलें। पर इसी के साथ दुष्टता करना ही बुरी बात हैं। परन्तु से सब कुछ होने वाला नहीं। ये समझ लीजिए अपनी पत्नी, जो कि आपक सारे सुख का कि ये एक बहुत छोटे पैमाने की बात है लेकिन साधन है उसके साथ इस तरह से व्यवहार ये तभी होगा जब यहाँ के समाज में स्त्री का करना, तो अपनी संस्कृति का नहीं है यह काम। स्थान बनेगा। यहाँ के पुरुष इस बात को समझेंगे भारतीय संस्कृति में यह कहा जाता है “यत्र कि उनका अपने बर की, औरतों की तरफ, बच्चियों की तरफ क्या कर्त्तव्य है और क्या उन्हें पूजनीय हो वहाँ पर देवता निवास करते हैं। करना चाहिए। उनका जीवन बहुत एकोँगी है इतना ही नहीं। पर स्त्री को भी पूजनीय होना उसको बदलना चाहिए। और उनको अपनी Family अपने बाल-बच्चे अपनी पत्नी, माँ सबको बहुत हमारे देश को नारी है, उसी वजह से हमारे देश प्यार से देखना चाहिए और समझना चाहिए। में कभी अच्छा सामराज्य आ नहीं सकता। कुछ बातें सुनाएगा। पुरुष होना ही वी सोचते है कि गति है। ये बहुत बुरी बात है. दुष्टता है। दूसरां नारयाः पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवता” जहाँ ्री चाहिए। इतने विपत्ति में, इतने तकलीफ में आज यहाँ आप सब इतने लोग हैं। सब पुरुषों ने रर ये कसम ले ली कि हम औरतों की इज्जत करंगे आजकल नवरात्री भी हैं, ऐसी बातों से बहुत और कोई विधवा हो जाता है। आदमी तो कभी नाराज हैं। होता हो नहीं विधवा। लेकिन गर कोई औरत आपको। लक्ष्मी से ले कर हर एक देवी कोई भी विधवा हो जाए तो उसकी दुर्दशा है। इतनी आशीर्वाद नहीं देंगी आपको, गर आप अपनी बेचारो को दुर्दशा कर देते है । औरतें ही खुद पत्नी का ख्याल उनको कहती हैं। औरतें ही उनको कहती हैं कि ये तो तुम्हारा दुर्भाग्य है. तुम्हारा ही कुछ है और तरह की परेशानी है। मैं तो सोंचती हूँ कि गर ये यहाँ तक कि तुमने अपने पति को खा लिया है । ऐसा भी कहती हैं। ये तो मैंने अपने कान से परेशानियाँ ठीक हो जाएँ क्योंकि साक्षात् लक्ष्मी सुना है। इसीलिए पहले शायद औरतें घबराहट से सतो हो जाती थीं। और अगर कोई युवती को जो नहीं मानते तो उनको क्या अधिकार है विधवा हो जाए और देखने में वह सुन्दर हो तो अच्छा हो ही नहीं सकता। क्योंकि सारी देवियां बो कोई भी आशीर्वाद नहीं दंगी न करें और उसको सम्मान से न रखें। इसीलिए हमारे देश में इस कदर हर चौज ठीक हो जाए तो हमारी हर तरह की का वरदान इसी से मिलता है। घर की गृहलक्ष्मी कि लक्ष्मी के आशीर्वाद से वो प्लावित हों? अब

इस मामले पर और मैंन Video पर देखा था कि उन्होंने विधवाओं को दिखाया था जो बृंदावन में में और देश में इसलिए नहीं हैं कि उनमें और उधर गोकुल में रहती हैं। कृष्ण तो सोच रहे होंगे कि पता नहीं कहाँ से बेचारियों के साथ ज्यादती हो रही है। वो विधवाएँ हैं और उनकी और कोई कारोबार ढूंढ लेगी। ये अपना ऐसा देश बेचारियों की इतनी दुर्दशा है कि सारे दिन वे गाना गाएं और एक रुपया उनको मिलता है और कुण्ड में कूद पड़ीं उनको हर तरह से वहाँ के लोग इस्तेमाल करते लिए, अपनी इज्जत बचाने के लिए। इस देश में हैं। पर ऐसी फिल्म देखने से किसी में जागृति फिर औरतों के लिए कौन सा मार्ग बचा हुआ तरह की आफते। हर तरह की आफत. इस देश नैतिकता नहीं है। कोई गर औरत विधवा हो तो वो घूमघाम के अपना पति ढूंढ लेगी नहीं तो है कि पदमिनी के साथ 32000 औरतें होम अपनी आवरू वचाने के कृण्ड में नहीं आई! बहाँ पाँच लाख औरतें हैं इस तरह है? अपनी इज्जत से बी रह ही नहीं सकती। की। किसी के मन में धारणा नहीं आई, कि उनकी तो इतनी बुरी दशा है कि इससे मैं सोचती हूँ कि किसी को गर कोई रोग हो जाए इतना पैसा कमा रहे हैं, ये कर रहे हैं, वो कर रहे हैं, कि जा करके उनका कुछ कल्याण करें, तो कम से कम वो किसी अस्पताल में जा उनके लिए कोई चीज़ बनाए? माने मनुष्य इस कदर संवेदनशील नहीं, विल्कुल उल्टा ही है। उसके मन में ये भी भावना नहीं आई। इस सकता है। उसके लिए कोई न कोई व्यवस्था हो सकती है। पर ये बताइये कि इस तरह की औरतों की जो पीड़ा है वो किस तरह से आप फिल्म को बहुत दिखाया गया। फिर मैंने कहा ऐसी फिल्म को दिखाने से कोई फायदा नहीं। सहानुभूति तक नहीं। यहाँ तक कि एक विधवा अब एक थी वा वाकई यहाँ आई थीं, वो दिखाने स्त्री को गर आपने देख लिया तो बड़ा अपशगुन के लिए कि बो तो सिर्फ बदनाम करने के लिए हो गया। एक विधवा स्त्री है तो उसके हाथ का आई थीं। उनकी पब्लिसिटी बहुत हो गई, बो फिल्म दिखाने से क्या होगा। इन लोगों के पास जानता कि ये इतने पैसे हैं तो क्यों न ये विधवा के आश्रम कम कर सकते हैं? इतना दु:ख और कोई खाना नहीं खाने का। ये अपना समाज ये नहीं कहीं शास्त्रों में लिखा नहीं है । श्री राम ने स्वयं मंदोदरी का विवाह विभीषण से आदि कायदे के बनाएं? आज हैं दो चार लेकिन करा दिया। श्री राम ने (अनेक उदाहरण हैं) वो कायदे के नहीं है। तो एसे आश्रम क्यों न जिनको आप इतना मानते हैं। वो जब विधवा हो वनाए जाएँ जहाँ इन औरतों का पालन पोषण तो कम से कम। बहुत सी औरतें तो इसोलिए अपनी आत्महत्या कर लेती हैं कि ऐसे जीने से गई तो उसका विवाह उन्होंने विभीषण से करा दिया। तो फिर कहेंगे कि हाँ यहाँ तक ठीक है हो और नहीं तो इससे आगे कहीं नहीं शादी कर अच्छा हम आत्महत्या कर लें। एक तो स्त्री के सकते। अब आप ही सोचिये कि गर आपकी लिए विवाह करना ही चाहिए और विवाह के माँ, बहन, बेटी, उनकी दुर्दशा हो रही है तो ऐसे समाज से तो भगवान बचाए। बेहतर है कि ऐसा कोई समाज ही न हो और अगर है तो सबको बाद उसके पति गर नहीं रहे तो गए काम से। फिर उसका जीना मुश्किल और उस पर हर

औरतों ने सीख लिया है कि वेहतर है हम लोग जीने का, आनंद से रहने का पूर्ण अधिकार हो। सो मैं चाहूँगी कि जिन्होंने कभी भी अपने जबरदस्त बन जाएँ। पर इसमें कोई फायदा नहीं। घर में या बाहर में औरतों को सताया हो, औरत का तो कार्य ही है कि सब चीज़ को उनको विल्कुल बदल जाना चाहिए। और अपने को दोषी समझना चाहिए कि हमने शक्तियाँ हैं। किन्तु अपनी शक्तियों की जगाएं एक अनाथ असहाय औरत को सताया है और उससे सृजन करें और अपने दम पर करें अपनी पत्नी को भी जिसने सताया है। अपनी और स्वाभिमान से रहें । किसी तरह की भी बातें बेटी को जिसने सताया है वो सब बहुत बड़े करने से यह कार्य नहीं होगा। इसको घूरी तरह दोषी हैं और मैं ये नहीं बता सकती कि उनका आत्मसात करे क्योंकि पृथ्वी जैसी उसकी अपनी से समझ लेना चाहिए कि ये महापाप है और ऐसे गलत काम करने नहीं देने चाहिएँ। तभी क्या हाल होगा। क्योंकि अब सत्ययुग की शुरूआत होगी हमारे देश में परिवर्तन आ सकता है। सिर्फ और हरेक के लिए जरूरी है कि वो धर्मपथ पर सहजयोग में आने से कोई फायदा नहीं है। सब रहे। धर्म में सबसे बड़ी चीज है प्रेम। और जो लोगों को, सहजयोगी हों या नहीं हों, आपके अपनी पत्नी को ही प्रेम नहीं कर सकता तो वो पड़ोस में ही यदि कोई औरत का मार रहा है तो किसको प्रम करेंगा? अपनी बेटो से ही प्रेम नहीं आपको उसे छुड़ाना चाहिए। कोई शराब पी कर घर में दंगा मस्ती कर रहा कर सकता बी किसको प्रेम करेगा? उसका दीष है तो उसकी ठिकाने यही है कि वो स्त्री है। और अगर दुनिया में स्त्री लगाना चाहिए। ये आपका सामाजिक कर्त्तव्य ही न होती तो आपकी माँ कहाँ से आती और और जब तक ऐसी जागृति आप लोगों में नहीं आप कहाँ से आते? इसके प्रति बहुत तीव्र आएगी तब तक ये कार्य नहीं हो सकता। दूसरी संवेदना आनी चाहिए। अच्छा महाराष्ट्र में भी बात खुद औरतीं की ऐसी है कि इनमें इतना काफी बाल विधवा का प्रभाव था। इतना नहीं तो ज्यादा स्वाभिमान है कि ये हर हालत सह लेगी भी। पर वहाँ पर ऐसे-2 लोग हो गए जैसे किन्तु इनसे किसी विधवा से कही कि तुम शादी तिलक थे, गोखले थे. रानाडे थे। इन्होंने सबने कर लो तो हो गया बस। हमारे यहाँ एक विधवाओं से विवाह किया और उन्होंने वहाँ पर सहजयोगिनी थी। देखने में बहुत सुन्दर थी और बहुत चंतना लाई। Reforms किए। वहाँ पर पूना तीन बच्चे में जैसे औरतों की शिक्षा एकदम नि:शुल्क है स्नातक तक उन्हें एक पैसा नहीं देना पड़ता। कोई भी काम करे, बस आदमी उसके पीछे उससे भी ज्यादा यहाँ कार्य करने की जरूरत है क्योंकि यहाँ उससे कहीं ज्यादा दुर्दशा है। यहाँ की बीबी और वो विधवा है तो चलो उसके के लोगों में जागृति लाना और उनमें चेतना लाना बहुत जरूरी है। उसी की जगह अगर औरत के, मैंने कहा कि, मेरे ख्याल से ये जो आपके जबरदस्त है तो उसका राज होता है। बहुत सी थे। बड़ा लड़का कोई 15-16 साल का होगा अब वो कमाने के लिए कहीं भी जाए. पागल। अपनी बीबी के पीछे में नहीं है। दूसरे पीछे । तो उनसे मैंने कहा कि, बहुत गाल घुमा प्रश्न है इसके लिए अच्छा है कि आप शादी

औरतों की यह दुर्दशा करो। ऐसे कोई विधि तो है नहीं कि साथ मरना चाहिए. गर यह धर्म होता कर लीजिए। तो बा तो बेहाश हो गई। सुनते के साथ ही बेहोश हो गई कि माँ आपने एसी बात कैसे कही? जब उन्हें होश आया तो उसने कहा तो सब साथ ही मरते। पर साथ तो मरते नहीं। “माँ कीन सा मुझमें ऐसा दोष पाया जो आपने इतनी कड़ी सजा सुनाई। अरे भाई ये कौन सी से। इतना दुःख औरतों ने उठाया है कि अब तुम्हें में सजा सुना रही ज्यादा हमारे अंदर संस्कार और Conditioning है लड़ाका भी हो सकती हैं, गुस्सैली भी हो सकती औरतों में, विधवा हो गए। ये हमारे समाज की हैं। घर में बड़ा राजकारण भी करती हैं सब कुछ देन है। विधवा हो गए तो गए इसके बाद हम हो सकता है। लेकिन वो अच्छी औरत नहीं बन विवाह नहीं कर सकते, कुछ नहीं कर सकते हम करेंगे तो बस बेकार। कौन समझाए। तब फिर मैंने उनके लड़के को समझाया कि तुम बनाई गई और इस पर हम कीशिश करेंगे कि अपनी अम्मा की समझाओं। वो कहीं नहीं रह सकती थी क्योंकि दिखने में सुन्दर थी और अपने पैरों पर खड़े हों तथा स्वाभिमान से जीए। शायद विधवा थी। तो एक साथ बाद उनकी और गर बो विधवाएं हैं और अभी जवान हैं तो खोपड़ी में बात आई, जब उन ये काफी आफतें उनकी हम अच्छी जगह शादी कर दें। आप लोग आ गई तब एक साल बाद उनकी समझ में आई नहीं करियेगा तो अमेरिका में करवा देंगे। आप कि माँ जो कह रही है ठीक बात है। फिर शादी लोग बैठे रहिए यहाँ। यही बेहतर है। अपने को की। यहाँ तो होना आवश्यक है, फिर कोई बहुत समझते हैं तो बैठे रहिए। ये घमण्ड आदमी विधवा हो गई तो बिल्कुल ही दुनिया से गई बोती औरत। उनकी शादी फिर अमेरिका में औरतों का करने की ज़रूरत नहीं आदमियों का गर इतफाकन औरत बच गई तो वो तो गई काम हूँ। माने ये भी इतना आपको उठाने की जरूरत नहीं। फिर वो बड़ी सकती। वो या तो बहुत दुःखी, या बहुत परेशान, तो इसलिए यह एक संस्था छोटे ही पैमाने पर . इसमें उन लोगों को ऐसे रास्ते पर लगाएं कि वी का जाना चाहिए। मैं हमेशा कहती हैँ कि reform करवा दी तो उनके बच्चे भी पल गए, बड़े हो गए, अपने-2 ठिकानों पर पहुँच गए। वो लीग आपके सिर पर। क्या समझते हैं आप अपने भोख माँगेगी पर फिर से शादी नहीं करेंगी। ये reform करो। इतना घमण्ड किस चीज़ का है आप को। अभी कोई बता रहा था कि कोई गर भी कोई भरावान ने बताया है? किसी शास्त्र में L.A.S में आ गया तो वो तो सबसे बड़ा दामाद लिखा है? कहीं भी नहीं है। ये सब यूँ ही बनाए है। तो मैंने कहा 1.A.S. में है क्या? कौड़ी न हुए हैं, औरतों पर आक्रमण करने के लिए। हम तो वैधव्य को मानते हो नहीं हैं। मानते ही नहीं जानती हूँ न। गर ईमानदार हैं। क्योंकि वैधव्य क्या हुआ, जो पति, मर गए. धेला। कुछ कमाई नहीं, कुछ नहीं खास । मैं है तो । गर बेईमान है। तो भी आफत और गर ईमानदार है तो भी तो मर गए। अब वो वैधव्य बन कर उनक माथ आफत। फिर भी औरतें उसमें रहती हैं । अपने पर बन गया। क्या कोई जरूरी चीज़ है? या तो चार लोगों को देखती हैं संभालती हैं प्यार करती दोनों आदमी साथ ही मरें और नहीं मरें तो हैं। पर मेरी समझ में नहीं आया कि ये खोपड़ी.

शक्तिहीन गर दें तो किस काम का है देश किस में कैसे आया आदमियों की कि वे अगर ।A.S. हो गए तो बड़े अफलातून हो गए। कोई भी बात काम का है? लगड़ा है देश आपका पूरी तरह खोपड़ी में घुस जाती है अगर इंसान के. वो भी से। बड़ी- 2 बातें करने से और L.ecture से कुछ नहीं होगा, फिल्म दिखाने से, नाटक दिखाने से के जैसे उड़ने लग जाते हैं । फिर चाहे किसी के अपने खासकर हिन्दुस्तान में तो वे वाकई में Balloon कुछ नहीं होगा। कर के दिखाता होगा। जीवन में और अपने समाज के जीवन में खडे मारे। चाहे कुछ भी करें, उसको लगता नहीं कि हो जाएँ कुछ लोग कि हाँ हम तो हैंreformist। अब बेकार की चीजें फैंका इसकी। इसकी कोई जरूरत नहीं। ऐसे बंध गए हैं कि वा भी अपनी मारो। खटमल को मत मारो, जो खून पीते रहते दुष्टता से छुटकारा नहीं पाते और औरतें एसी बन गई हैं कि बो उसको सहते ही जाती हैं। लात मारे। किसी के थप्पड़ मारे किसी को डंडा हम ये क्या कर रहे हैं। वैसे तो Vegetarian बनेंगे। जैन लोग कहते हैं कि मच्छर को मत हैं हमेशा, उनको मत मारो। पर अपनी बीबी को मार सकते हैं, आसान क्योंकि वो आपकी बीबी है और इसीलिए तो आई है कि मार खाए। अगर अब इसका परिणाम क्या हो रहा है वों कोई नहीं रहे हैं। आपक बच्चे ही दुष्ट हो रहे हैं। चोरी करेंगे ये करेंगे। ये सब आया कैसे? क्योंकि समाज टूट गया. क्योंकि amily टूट गई, इसलिए हुआ। ती अपने कुटुंब मूल्य हैं वे खत्म हो रहे है। पहले हमार यहाँ जो है, बहुत महत्वपूर्ण चोज है। एक-एक कहते हैं कि जो है और समाज से ही बीबी को मारते हैं। मैंने तो देखा यहाँ सभी मारते कुटुंब। देखता बच्चे खराब हो मार नहीं खा सकती तो वो बीबी क्या? ये जो हमारो दशा है और जो हम इस निम्न स्तर पर है उसकी भी वजह यह है कि हमारे अंदर के जो बडभुँजे होते हैं वे ही अपनी कुटुव से ही समाज बनता देश बनता है देश की बातें करते हैं और हैं, ऐसी कोई बात नहीं। कोई इस मामले में कुटुंब तो खत्म हो रहे हैं । अपने कुटुंब को पज किसी को शर्म नहीं, दया नहीं। हाँ बाकी मामले इज्जत से रहना, स्वाभिमान से रहना. देशभक्ति से रहना तभी हो सकता है जब घर की औरत ठीक हो। उसकी इज्जत हो। उसकी समझने की कोशिश करें। हमारे महाराष्ट्र में भी ऐसी एक दो में सबको खूब शर्माहया है परन्तु इस मामले में किसी को शर्मोहया नहीं। बीबी की सबके सामने डाँट देंगे। कोई उनको उसमें हरज नहीं कि भई हमने क्यों डाँटा। एक वो पहले ही से शिक्षा नहीं समाज व्यवस्था है जहाँ इधर से जैसा ही मामला घर में यही सिखाया जाता है क्या कि इस तरह बहुओं के साथ किया जाता है। पर वो भी बदल से आप व्यवहार करो? तो जहाँ तक मुझे हो सकता है मैं इस संस्था के लिए पूरी मेहनत ही पड़ेगा। अगर बदलेंगे नहीं, उनके बच्चे उठ करूँगी और जितना हो सकता है इसमें औरों का जाएगा और ये भी बदल जाएगा। इसको बदलना कर इन्हीं आदमियों को मारेंगे। बौबी को मार की बात तो बाद में होगी। पहले इनको मारंगे। तब सबकी खोपड़ी ठीक आएगी। इतना अहंकार मानव में है. मनुष्य में है। आखिर किस चीज़ उद्धार करना चाहिए। गर आज हमारे देश में 65 फीसदी औरतें हैं, उससे भी ज्यादा. तो उस एक पूरे समाज के एक महत्त्वपूर्ण अंग को आप

का इतना अहंकार है? कौन सी ऐसी चीज़ तुमने पाई है जिसका तुम इतना अहंकार कर रहे हो? अब इस संस्था को चाहिए कि सब लोग पूरी तरह से मदद करें। ये नहीं कि सिर्क पैसा दे दें, पर इसको पनपाने में अब सबसे बड़ा प्रश्न तो ये है कि हमें ऐसी औरतों को खोजना है, उनको खोज कर निकालना है। अब हमें क्या पता कि कहाँ कि औरतें हैं, यहाँ रहते भी नहीं। तो इस तरह की औरतें अगर आपको मालूम हैं, जो पीड़ित हैं, दु:खी हैं और जिनका कोई सहारा नहीं, और जो विधवा बन कि आप उन्हें प्यार करते हैं । पूरी समझ, इसमें कोई ऐसी बात नहीं कि वो आपकी खोपड़ी पर बैठ जाएंगी। एकाध होती हैं। लेकिन आदमी गर कमजोर नहीं है तो औरत कभी भी उसकी खोपड़ी पर नहीं बैठ सकती। पर बो इतनी दबी हुई भी नहीं रहना चाहिए कि जिससे बच्चे भी नहीं पनप रहे हैं, जिसमें कुछ फूल ही नहीं खिल सकते। बच्चे तो माँ को मानते ही नहीं। माँ के पैर भी इस तरह से या क्या अब हम तो छुएँगै जैसे कोई ईंट पत्थर बीच में पड़ा हो। और बाप को फुरसत नहीं। तो बच्चे तो विगड़ ही जाएंगे। और उससे जो जो आज दशाएं हुई हैं. जो-जो आप पढ़ते हैं. पेपर में देखते हैं, उसका कारण ही ये है कि कर बहुत कुछ सह रही हैं, ऐसो सब औरतों को आपको इस संस्था में लाना चाहिए। अभी तो ये कह रहे हैं कि 100 औरतों का इंतजाम है। 100 हमारी कुटुंब व्यवस्था ठीक नहीं है। वो बहुत जरूरी है कि उसको आप ठीक रखिए| यही करके, उनको समझा बुझा के, जो लोग अंदर हमारे समाज का ताना बाना है। इसके सहारे आज आप भी यहाँ बैंठे हुए हैं और आगे भी अगर चलाना है तो कृपया याद रखिए कि औरत को भी समझाया जा सकता है, उनके घर बालों का मान रखना उसका उत्थान करना और लोगों से क्या होगा, पर उसके बाद उनसे बातचीत आएंगी वो तो आएंगी ही लेकिन जो बाहर रहेगी. उनको भी समझाया जा सकता है। उनके पति को भी समझाया जा सकता है। अपना ही देश को परिवर्तित करना भी आपको परम लक्ष्य की ऐसा जहाँ अब भी कुटुंब व्यवस्था चल रही तरह से समझना चाहिए और उधर ध्यान दना है। बाकी कहीं नहीं है। उसका उत्तरदायित्व चाहिए। ये मेरी आतंरिक इच्छा है। ऐसा वो औरतों को है, आदमियों को नहीं। ये भारतीय आपको सबको मैं हमेशा कहती हूँ कि अनन्त नारी की विशेषता है जिसने इस देश को रोक आशोर्वाद। किन्तु उस आशीर्वाद में सबको अपने रखा है, नहीं तो कब के चले जाते। इसलिए साथ समेटिए। हमें तो लोगों को जाड़ना अब आप समझ लीजिए कि गर आपने अतिशयता एक कुटुंब ही को आप नहीं जोड़ सकते तो करी तो यही औरतें जो हैं क्रान्ति कर देंगी आपके लिए। वो ठीक नहीं है, वो प्रेम का हनन है, अच्छी बात नहीं। अच्छी बात ये है कि ये बड़ी भारी बात आपने प्राप्त करी। ये ज्ञान समझदारी रख कर अपनी स्त्रियों की अपनी मार्ग है और इसमें आपको पता है प्रेम क्या चीज बेटियों की हिफाज़त करें। उनको देखें, सम्भाले. है और किस तरह से आदान प्रदान करना उनको प्यार दें। और उनको ये पता होना चाहिए चाहिए। आपस में किस तरह से समझना चाहिए। जब आप किसको जोड़ेंगे? सबको चाहिए कि प्रेम से आपस में रहें। अब आप सहजयोगी हो गए और . ০

इस चीज़ से आप हैरान होइयेगा कि सारा समाज आनी चाहिए। समझदारी में बढ़ना चाहिए। यहाँ तो मैं देख रही हूँ बहुत से सहजयोगी एकदम बदल जाएगा। अपने को परदेसियों जैसे नहीं होना है। बिल्कुल भी नहीं। वहाँ तो कचहरी बैठे हुए हैं तो उनके लिए एक नई बात अब करेंगी औरतें, अमेरिका में तो औरतें सात सात, वता रही हूँ। आप सहजयोगी हैं तो सब लोगों को समझ लेना चाहिए कि ये सहजयोगी हैं। उसी जाती हैं तो पति सब गरीब हो जाते हैं। ये हम प्रकार सहजयोगी समझ लेना चाहिए कि जो लोग नहीं चाहते। चाहते क्या हैं? आपसी प्रेम हो, सहजयोगी हैं वो हैं जो नहीं हैं ता नहीं आठ-आठ शादी करती हैं। औरतें और रईस हो हैं। बच्चे अच्छे से हों और आप देखिए, इससे सबको समेटना आना चाहिए। इसी सहज योग बड़ा लाभ होगा। बहुत लाभ होगा। इतना लाभ के स्वभाव से ही आप दुनिया को जीत सकते होगा ऐसे समाज का और ऐसे देश का। इसमें ये हैं। जो बात मैंने कही है उसको आप हृदय में आपसी झगडे करना कोर्ट कचहरी करना, कोई बाँध लें। यह दर्द है मेरे अन्दर। इस दर्द को जरूरत नहीं। गर ये सबके अच्छे के लिए है तो ये ही क्यों नहीं करते। इस तरह से समझदारी आप लोग खत्म कर सकते हैं। आप सबको अनन्त आशीर्वाद।