Easter Puja, Purity Is the Basis of Your Existence

Istanbul (Turkey)

Feedback
Share

Easter puja. Istanbul (Turkey), 23 April 2000.

ईस्टर पूजा- इस्तांबुल (तुर्की), 23 अप्रैल 2000

आज हम एक महान घटना का उत्सव मना रहे हैं, जो है ईसा मसीह का पुनरुत्थान। इस प्रकार से आपका भी पुनरुत्थान हुआ है, कि आप दिव्य प्रेम के नए जीवन की ओर बढ़े  हैं। आप सभी को यह ज्ञान था कि कुछ महान होना है और आपका पुनर्जन्म होना है। परन्तु, किसी को नहीं पता था कि यह कैसे क्रियान्वित होना है ? 

आपके अस्तित्व का सूक्ष्म रूप आपको कभी नहीं बताया गया। संतों ने केवल इसी बात पर चर्चा की कि आपको कैसे व्यवहार करना चाहिए। उन्होंने केवल यही कहा कि कैसे आपको बहुत ही शुद्ध जीवन, ईमानदारी से जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए, लेकिन उन्होंने आपको यह नहीं बताया कि यह कैसे क्रियान्वित होगा। निस्संदेह, भारत में लोग इसे जानते थे, बहुत कम लोग, बहुत ही कम। लेकिन, अब यह एक विश्व व्यापी ज्ञान है, आप लोगों के माध्यम से।

अब जब आपकी कुंडलिनी उठती है, वह आपकी माँ है, वह आपकी व्यक्तिगत माँ है और वह आपको दूसरा जन्म देती है। इस प्रकार आप दिव्य स्वर्ग से जुड़ जाते हैं। यह सब, यदि बिना साक्षात्कार के बताया जाए तो इसका कोई अर्थ नहीं है, परन्तु लोगों को इसके बारे में महान विचार दिए गए हैं और उनसे यह भी वचन दिया गया कि एक दिन आपका पुनरुत्थान होगा। यह आपके लिए महानतम संयोग है, यह आपके जीवन की महानतम घटना है और यह अत्यंत सौभाग्य की बात है कि आप इसे प्राप्त कर पाए। यह सब इसलिए संभव हुआ क्योंकि आपने इसकी इच्छा की। आप अनेक जन्मों में दिव्य स्वर्ग की इच्छा करते रहे हैं। लोग पहाड़ियों और घाटियों में जाते रहे हैं, खोजते रहे हैं, हर प्रकार के कार्य करते रहे हैं। यह पहले से ही आपके द्वारा किया जा चुका है। आपको कुछ भी त्यागने की आवश्यकता नहीं है, कुछ भी नहीं! यह ग़लत विचार, मुझे कहना चाहिए, यह अब असामयिक विचार है।

यही वह समय है जब आपको सहज पुनरुत्थान, स्वतः पुनरुत्थान प्राप्त करना है। आपको इसके लिए कुछ भी नहीं करना है, यह इतना सरल है और इतनी अच्छी तरह से क्रियान्वित हुआ है।

मुझे यह देखकर वास्तव में अत्यंत प्रसन्नता हुई कि इतने सारे लोग, विशेष रूप से मुसलमान, जिनके बारे में मुझे इतनी चिंता थी कि आप इन लोगों को कैसे बचा सकते हैं! वह ग़लत विचारों के झमेले में बहुत अधिक फँसे हुए हैं। 

यह समझना होगा कि यह क़ुरान मोहम्मद साहब की मृत्यु के चालीस वर्ष बाद लिखी गई थी। अतः, हो सकता है कि, कुछ शब्द ऐसे हों जिन्हें बदला गया है, हो सकता है, और अर्थ थोड़ा अस्पष्ट हो सकता है। 

इसके अतिरिक्त, ‘सुन्ना’ नामक एक अन्य पुस्तक आई थी, जो उस समय के विषय में थी और एक ऐसे व्यक्ति द्वारा संगृहीत की गई जो इतने महान आत्मा नहीं थे, मुझे कहना चाहिए, क्योंकि वह आत्मसाक्षात्कारी नहीं थे। 

मैं यह नहीं समझ सकती कि आप कविता को सही अर्थ में कैसे समझ सकते हैं और कविता में जो कुछ भी लिखा गया है, आप उसकी सही व्याख्या कैसे कर सकते हैं? यही कारण है कि मैं, मैं एक कवि भी हूँ, मैं इसके बारे में एक कविता लिख ​​सकती थी।  लेकिन मैंने कहा, “नहीं, कविता को घुमाया-फिराया जा सकता है, बदला जा सकता है और लोग इसका अनुचित उपयोग भी कर सकते हैं।” काव्य के साथ यही समस्या है।

भारत में हमारी यही समस्या थी। उदाहरण के लिए, कबीर ने इतनी सुंदर कविताएँ  लिखीं और जिस तरह से लोगों ने व्याख्या की, वह इतनी निरर्थक थी और कबीर के गीतों की भावना से बहुत भिन्न थी। 

मुझे लगा हर चीज़ के बारे में वह शब्दों को अपनी आवश्यकता के अनुसार तोड़ मरोड़ सकते हैं, यदि मैं दिव्यता पर कविता लिखती, ठीक ऐसा ही हुआ होता। सभी धर्मों में मैंने देखा है, जब कविता की बात आती है, तो लोग इसे तोड़ मरोड़ सकते हैं। 

और, जैसे कि बाइबिल में है, इसे अच्छे से माना गया कि “पॉल” ही ईसा मसीह के सम्बन्ध में प्रकाशन की व्यवस्था करने वाला व्यक्ति होगा। और वह पुनरुत्थान के बारे में भी नहीं लिखना चाहता था। वह निष्कलंक गर्भ धारण के बारे में लिखना नहीं चाहता था। 

यह सारी बातें उनके मस्तिष्क में थीं और इसलिए “थॉमस” को भारत भागना पड़ा और “जॉन” ने कुछ भी लिखने से इनकार कर दिया। ऐसे लोग ही कार्यभार संभालते हैं। 

वह प्रभारी बन जाते हैं, उन्हें लगता है कि वह इसके लिए उत्तरदायी हैं, जबकि वह बिल्कुल भी सक्षम नहीं, उन्हें ऐसा करने का अधिकार नहीं है। परिणामस्वरूप, ईसाई धर्म में मानव के आंतरिक विकास के प्रति बहुत ग़लत दृष्टिकोण अपनाया गया। 

आज आप उसका परिणाम देखते हैं। जब आप देखते हैं कि “कैथोलिक चर्च” के साथ क्या हो रहा है, तो आपको आश्चर्य होता है। ऐसा संगठन एक धार्मिक संगठन कैसे हो सकता है जहाँ सभी प्रकार की निरर्थक बातें हो रही हों?

मेरा जन्म भी एक ईसाई परिवार में हुआ था और जिस प्रकार से उन्होंने ईसा मसीह के जीवन की व्याख्या की थी और जिस तरह से उन्होंने इस बारे में बड़े अधिकार के साथ बात की, मैं अत्यंत चकित हुई। अनेक पुस्तकें लिखी गईं जिनमें बड़े-बड़े उपदेश दिए गए! 

मैं सोचती थी कि जो वह कह रहे हैं उसमें कोई सच्चाई नहीं है। यहां तक ​​कि मेरे पिता जी को भी ऐसा ही लगता था, क्योंकि यह सभी पुस्तकें बाद में आईं, क्योंकि इनके लेखक बहुत बाद में आए।

दूसरा, जिन लोगों ने इसे लिखने का प्रयत्न किया, वह ऐसा करने के लिए अधिकृत नहीं थे। वह आध्यात्मिक लोग नहीं थे। वह सभी सत्ता चाहते थे, वह धर्म में प्रभुत्व चाहते थे। धार्मिक शक्ति भीतर होती है और उसे जागृत किया जाना चाहिए। मुझे कहना चाहिए, इस देश और अन्य देशों के सूफ़ियों का धन्यवाद, जिन के कारण लोग अभी भी सोचते हैं कि इन सभी शब्दों और बातों और पुस्तकों से परे भी कुछ है।

यह कुछ ऐसा आशीर्वाद है, कि प्रत्येक देश में ऐसा कोई था जिसने वास्तविकता के बारे में बात की, सत्य के बारे में, जब कि उनको दंडित किया गया, उन्हें यातनाएँ दी गईं और उनमें से अनेकों की हत्या कर दी गई। ऐसा आज भी हो रहा है। 

मुझे लगता है कि लोग वास्तविकता को, सत्य को, सुनना नहीं चाहते। परन्तु मैं कल बहुत प्रसन्न थी, वास्तव में अत्यंत प्रसन्न थी, यह देखकर कि मुसलमान लोग भी, इस्लाम धर्म से, अब एक साथ आ रहे हैं, इस समझ से कि उनके जीवन में दैनिक धार्मिक अनुष्ठानों से भी ऊँचा कुछ है। 

यह सारा कर्मकांडी जीवन जो उन्होंने जिया, जिस तरह से उन्होंने इतना परिश्रम किया, यह चालीस दिनों का उपवास, हज के लिए जाना, सभी प्रकार की चीज़ें करना। लेकिन उनमें आपस में एकता नहीं थी। यहाँ तक कि आपस में कोई एकता नहीं थी और कुछ स्थानों पर मुझे आश्चर्य हुआ कि वह एक दूसरे की हत्या कर रहे थे! ऐसा कैसे हो सकता है? क्योंकि इन तथाकथित प्रथाओं ने उन्हें सामूहिक नहीं बनाया। वह सामूहिक नहीं थे। उन सब की अलग-अलग पहचान थी, अलग-अलग संप्रदाय, पूर्णतः अज्ञानी लोगों द्वारा निर्देशित।

अतः हमें वास्तव में इन लोगों की एकता, इनकी सामूहिकता को सराहना चाहिए, जो सत्य से भटक गए। उन्हें इस बात की कोई समझ नहीं थी कि सत्य क्या है। फिर भी, एक साधक कभी भी संतुष्ट नहीं होता विद्यमान स्थिति से। वह खोजता है, खोजता रहता है, जब तक वह सत्य को प्राप्त नहीं कर लेता। 

परन्तु कई ऐसे साधक भी हैं जो अपना मार्ग खो देते हैं। खोजने में वह खो जाते हैं। उन्हें यह समझाना बहुत कठिन है, “आप अपना मार्ग खो चुके हैं”। परन्तु उन्हें अपने जीवन से देखना चाहिए, उन्हें स्वयं की उपलब्धि से देखना चाहिए। उन्होंने क्या प्राप्त किया है? क्या उन्हें कोई अनुभव हुआ? 

आपको जो मिला है, उसके प्रति आश्वस्त होने के लिए, आपको इसका प्रमाण पाने का प्रयास करना चाहिए। इसकी जांच आप लोगों पर और स्वयं पर कर सकते हैं। आप जैसे भी हैं अपनी उंगलियों पर जान सकते हैं, जैसा कि कहा गया है।

अब, क़ुरान में कहा गया है कि आपके “कियामह” का समय जिसका अर्थ है, पुनरुत्थान का समय। यहाँ दो शब्द हैं, “क़यामत और कियामह”, दो चीज़ें। अधिकतर लोग इन का अंतर नहीं समझते। एक वह है जब पुनरुत्थान का समय आता है और दूसरा वह है जब आपका विनाश का समय आता है। मनुष्य के पुनरुत्थान के लिए “कियामह” है जिसमें कहा जाता है कि आपके हाथ बोलेंगे, आपको अपनी उंगलियों पर चैतन्य का अनुभव होगा। 

मैं कहूंगी, जो वास्तव में मुसलमान हैं, जो समर्पित हैं और जिन्हें परमात्मा के राज्य के महान लोग बनने के लिए चुना गया है, उनके पास ऐसे हाथ होने चाहिए जो बोल सकें। अन्यथा वह मुसलमान नहीं हैं, मैं उन्हें मुसलमान नहीं कहूंगी। वह मनुष्य हो सकते हैं, लेकिन मुसलमान नहीं।

अतः यह अनिवार्य है  हर मुसलमान के लिए, जो स्वयं को मुसलमान समझता है, उसके हाथों में चैतन्य लहरियां होनी चाहिए। उसे चैतन्य लहरियों का अनुभव होना  चाहिए। उसके हाथों को बोलना चाहिए, पुनरुत्थान के समय, जो कि “कियामह” है-“कियामह”, क़यामत नहीं। 

यह दो शब्द लोगों के मस्तिष्क में उलझे हुए हैं। अतः वह लोग जो अपनी उपलब्धियों के बारे में अपने हाथों पर होने वाले चैतन्य के माध्यम से, और अपनी उंगलियों के माध्यम से दूसरों के बारे में भी जांच कर सकते हैं, वही मुसलमान हैं, ‘क़ुरान’ के अनुसार। परन्तु किसी ने उन्हें यह नहीं बताया, वह इसे नहीं जानते। उनके लिए यह अच्छा है- यदि आप मक्का गए और वहां से वापस आए। आप एक हाजी बन गए, बस हो गया।

एक और प्रश्न है जो पूछा जाना चाहिए, जो बहुत महत्वपूर्ण है, कि मोहम्मद साहब पत्थर की पूजा के विरोध में क्यों थे? स्पष्ट रूप से। पर उन्होंने लोगों से उस काले, चौकोर पत्थर के चारों ओर चक्कर लगाने के लिए क्यों कहा? इसका क्या उद्देश्य था? वह पत्थर इतना महत्वपूर्ण क्यों था? 

यदि आप किसी तथाकथित मुसलमान से यह प्रश्न पूछते हैं, वह कहेगा कि यही आदेश था। परन्तु आप प्रश्न पूछ सकते हैं, आख़िर क्यों? वह भी केवल एक पत्थर ही है। तो, मोहम्मद साहब ने क्यों कहा कि आपको उस पत्थर के चक्कर लगाने चाहिए? वहां पत्थर से बनी इतनी सारी मूर्तियां थीं, और लोग सभी तरह की मूर्तियों की पूजा करने लगे थे, जैसा कि वह भारत में भी करते हैं।

परन्तु यह पत्थर एक स्वयंभू था और यह भारतीय शास्त्रों में लिखा गया है कि वहां मक्केश्वर शिव हैं। हमारे यहाँ भारत में हर जगह शिव हैं। यहाँ बारह ज्योतिर्लिंग हैं। अब, यदि मैं आपसे कहती हूँ, आपको मुझ पर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन आप जा कर अपनी चैतन्य लहरियों से जांच सकते हैं कि यह शिव हैं या नहीं।  यही इस काले पत्थर के साथ भी है। 

तो, मोहम्मद साहब ने पाया कि यह मक्केश्वर शिव है और इसलिए शिव के आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए लोगों को इसके चक्कर लगाने पड़ेंगे। परन्तु, यह एक धार्मिक क्रिया बन गयी। सब कुछ एक कर्मकांड जैसा हो गया और कोई भी उस कर्मकाण्ड से आगे नहीं बढ़ पाया।

ईसाई धर्म के साथ भी यही बात है। आज के दिन वह क्यों बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं, पश्चाताप के विषय में और दोषी भाव, स्वयं के कार्य के विषय में? लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों किया? उन्हें प्रभारी होना चाहिए भलाई का, सद्गुणों का। फिर उन्होंने ऐसा क्यों किया? उन्होंने ग़लत कार्य क्यों किए? और अब परमात्मा से क्षमा मांग रहे हैं! क्योंकि वह साक्षात्कारी आत्मा नहीं, वह सहज योगी नहीं थे।

यदि सहज योगी कुछ ग़लत करने का प्रयास करें, तब वह अपनी उंगलियों पर जानेंगे  कि वह ग़लत कर रहे हैं, या हम उन्हें सहज योग से बाहर निकलने के लिए कह सकते हैं। परन्तु यह सहज योगियों के लिए सबसे कठोर दंड है। अगर मैं उन्हें सहज योग से बाहर निकलने के लिए कहती हूँ, तो उन्हें यह अच्छा नहीं लगता। क्यों? क्योंकि उन्हें लगता है कि हम वास्तविकता से अलग हो गए। वास्तविकता के सभी आशीर्वाद उन्होंने खो दिए, वह ऐसा सोचते हैं।

यह कोई दंड नहीं है क्योंकि हम केवल उन्हें सहज योग से बाहर निकलने के लिए ही तो कहते हैं। देखा जाए तो यह कुछ भी नहीं है। परन्तु सहज योग में पूर्ण स्वतंत्रता है, सहज योग पूर्ण आशीर्वाद है, सहज योग पूर्ण शांति और आनंद है। आश्चर्य की बात है कि यदि आप क़ुरान पढ़ें तो आपको आश्चर्य होगा कि मोहम्मद साहब शांति लाना चाहते थे, किन्तु यह ऐसा नहीं है।

मैं कश्मीर के एक व्यक्ति से मिली। उसने कहा कि शांति कहां है? वह सब लड़ाई-झगड़े कर रहे हैं। हम शांति चाहते हैं। परन्तु आश्चर्य की बात यह है कि उसने कहा भारत में आप शांति पाते हैं। परन्तु यह कश्मीर एक विक्षिप्त स्थान है जहाँ सभी को हर समय चुनौती दी जाती है, इस्लाम के नाम पर ही हर प्रकार से आक्रमण होता है! तो, मैंने कहा, यह इस्लाम नहीं! इस्लाम का अर्थ है समर्पण। और उसने कहा, यदि आप समर्पण करते हैं तो वह आपकी हत्या कर देंगे। हम पूर्णतः असुरक्षित हैं।

बहुत आश्चर्य की बात है, बहुत ही आश्चर्य की बात है कि अब मुसलमान कैसे स्वयं अनुभव कर रहे हैं कि यह दिव्य जीवन नहीं हो सकता- यह दिव्य जीवन नहीं हो सकता क्योंकि दिव्य जीवन में लोग एक दूसरे के साथ समान व्यवहार करते हैं। आप देखें कि विश्व भर में “सूफ़ी” हुए। मैंने उनके लेख पढ़े हैं। मैंने तुर्की और अन्य स्थानों के सूफ़ियों को भी पढ़ा है।

भारत में भी हमारे यहाँ सूफ़ी थे, हालांकि वह स्वयं को सूफ़ी नहीं कहते। सूफ़ी का अर्थ है, मैं नहीं जानती कि, आप इसे जो भी सोचें, परन्तु भारतीय विचारधारा के अनुसार, सूफ़ी का अर्थ है ‘साफ़’ और ‘साफ़’ का अर्थ स्वच्छ है, शुद्ध है। 

जो शुद्ध लोग हैं वह सूफ़ी हैं। शुद्धता में उन्हें परमात्मा की कृपा, दिव्य प्रेम, दिव्य शांति के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखता। उन्होंने केवल शांति की बात की, वह युद्ध की बात नहीं कर सकते थे। युद्ध की बात करने वाला ऐसा व्यक्ति नहीं हो सकता जिसे यह करने का अधिकार हो।

युद्ध पूर्णतः पागलपन है। यहां तक ​​कि पशु भी ऐसे नहीं लड़ते। हम पशुओं से भी बुरे होते हैं जब हम युद्ध और एक दूसरे की हत्या करने की सोचते हैं। यह नहीं होना चाहिए और इसे पूर्णतः रोकना होगा। किसी को भी दूसरे की हत्या करने का अधिकार नहीं है जब तक उस पर आक्रमण न हो। 

अतः हम अपने पुनरुत्थान को लेकर जो सुनते हैं वह है कि हम अनेक बातों से परे हैं। हमने उन सभी विनाशकारी स्वभावों को खो दिया है। जैसे कि संस्कृत में इसे कहते हैं, हमारे छह रिपु (शत्रु) हैं – काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ, मोह। 

काम का अर्थ यौन विकृति, क्रोध का अर्थ गुस्सा, मोह का अर्थ आकर्षण, मद का अर्थ अहंकार, मत्सर का अर्थ ईर्ष्या। यह सभी छह, छठा, लोभ है- यह सभी छह चीज़ें जो हमारे मस्तिष्क में हमारी अज्ञानता से, हमारे संस्कारों के कारण, हमारे पढ़ने के कारण थीं, जो भी है, जो कुछ भी हमने अपने अंदर विकसित किया, या हमारे भीतर रहा हो, वह छूट जाते हैं जब कुंडलिनी उठती है और आप परमात्मा के साथ एक होते हैं। तब आपकी नींव पक्की बन जाती है। आप में समझ आती है कि आपने सत्य को पा लिया है और तब आप इन सभी विनाशकारी स्वभावों का आनंद नहीं उठा सकते। वह सब छूट जाते हैं।

तो, आप एक नए राज्य में चले जाते हैं, जो परमात्मा द्वारा निर्मित, आप के भीतर है। यही मनुष्य का वास्तविक पुनरुत्थान है। अब, आप जानते हैं कि कुछ सूक्ष्म चीज़ें अभी भी बनी हुई हैं, जब कि सत्य के विरुद्ध लोगों ने पुस्तकें नष्ट की हैं, चीज़ों के अर्थ को बिगाड़ने का प्रयत्न किया है। फ़िर भी सूक्ष्म चीज़ें बनी रहती हैं।

उदाहरण के लिए, हम “ईस्टर” के अवसर पर अंडे अर्पित करते हैं। अंडे भेंट करने का क्या अर्थ है? हमें अंडे क्यों भेंट करने चाहिए? सर्वप्रथम हम अण्डा भेंट करते हैं क्योंकि एक अंडे का रूपांतरण हो सकता है। यह एक छोटा चूज़ा बन सकता है, यह फिर से जन्म ले सकता है। यह अंडा फिर से जन्म लेने की क्षमता रखता है।

अतः जब आपको “ईस्टर” के प्रतीक के रूप में यह अंडा मिलता है तो इसका अर्थ है कि आप एक भिन्न व्यक्ति, एक दोष रहित व्यक्ति और एक महान, आध्यात्मिक व्यक्ति बन सकते हैं। आप ऐसे बन सकते हैं, इसका यही अर्थ है। हम अंडे क्यों भेंट करते हैं? 

लोग नहीं जानते। मैंने बहुत लोगों से पूछा। मैंने कुछ पादरियों से भी पूछा जिन्हें लगता है कि वह ईसाई धर्म के महान अधिकारी हैं। वह नहीं जानते थे कि वह भेंट में अंडे क्यों देते हैं! 

दूसरा, यदि आप श्री गणेश के जन्म की कहानी पढ़ते हैं और फिर आप आगे बढ़ते हैं, तो आप आश्चर्यचकित होंगे, यह लिखा गया है कि इसे ब्रह्माण्ड कहा जाता था, जिसका अर्थ है ब्रह्मा का अंडा। वह अस्तित्व में आया और उसका आधा भाग महाविष्णु, अर्थात ईसा मसीह, बन गया और आधा अंश श्री गणेश के रूप में रह गया।

और फिर यह कहा जाता है कि जब महाविष्णु बाहर आए तो वह अपने पिता के लिए रोने लगे। ज़रा सोचिए इस विषय में, वह अपने पिता के लिए पूछ रहे थे। अब, यदि आप ईसा मसीह को देखते हैं, तो वह सर्वदा अपनी इन दो उंगलियों का उपयोग करते हैं। 

किसी और अवतार ने इन दो उंगलियों का उपयोग नहीं किया है। इसका अर्थ आप जानते हैं – यह विशुद्धि है और यह नाभि है। इसका अर्थ है कि वह अपने पिता की बात कर रहे हैं जो नाभि के राजा थे। वह कौन हैं? आप इसे अच्छी तरह से जानते हैं। वह विष्णु हैं और श्री कृष्ण, जो उनके अवतार हैं।

तो वह यह संकेत कर रहे हैं कि वह मेरे पिता हैं। कितने स्पष्ट रूप से वह ऐसा करते हैं। कोई अन्य मुद्रा, उंगलियों को पकड़ने की कोई अन्य शैली क्यों नहीं? परन्तु, उन्होंने सदा इन दो उंगलियों को ऊपर रखा, अर्थात् मेरे पिता विष्णु थे और श्री कृष्ण थे। और जैसा कि श्री कृष्ण के जीवन में कहा गया, महाविष्णु आपके पुत्र होंगे। 

इन सभी बातों को एक साथ नहीं बताया गया, जैसा कि मैं आपको अलग से बता रही हूँ। परन्तु यदि आपको अच्छी समझ है, तो आप उन दोनों के बीच के संबंध को समझेंगे, कि ईसा मसीह श्री विष्णु और श्री कृष्ण के पुत्र थे और उन्हें आशीर्वाद दिया गया था कि आप पूरे ब्रह्मांड का आधार होंगे। पूरे ब्रह्मांड का आधार, उन्होंने यह स्पष्ट रूप से कहा। यह कहा गया है कि आप पूरे ब्रह्मांड का आधार बनेंगे।

अब, जो आधा भाग श्री गणेश हैं, वह एक प्रकार से आधार हैं। वह कुंडलिनी को सहारा देते हैं। यह कुंडलिनी की देखभाल करते हैं, यह माता की पवित्रता की रक्षा करते हैं। और दूसरा जो अभिव्यक्त होता है वह ईसा मसीह हैं, जो पूरे ब्रह्मांड को थामे हैं। 

अतः स्वाभाविक रूप से उन्हें नैतिक आधार होना चाहिए, क्योंकि वह श्री गणेश का अंग प्रत्यंग हैं, यही मनुष्य का नैतिक आधार है। केवल नैतिक आधार पर ही आपका समर्थन किया जाएगा, अन्य सभी निरर्थक बातों पर नहीं, परन्तु एक नैतिक आधार, जो ईसाइयों के जीवन से खो गया है। 

सब कुछ की अनुमति है, बहुत आश्चर्य की बात है! आप कुछ भी कर सकते हैं जब तक आप “कैथोलिक चर्च” में तलाक़ न लें और दूसरे गिरजाघरों में भी, जिन्हें आप गैर-कैथोलिक गिरजाघर कह सकते हैं। ऐसे कई “चर्च” हैं। अगर आप विवाहित हैं तो भी आप जो चाहें कर सकते हैं। यहां तक ​​कि “वेटिकन”, में मुझे बताया गया, ऐसी सभी समस्याएं हैं।

यह कैसे हो सकता है, यदि आप बपतिस्मा लिए हुए लोग हैं? मेरा अर्थ है कि इन पादरियों द्वारा बपतिस्मा का एक बड़ा उत्सव मनाया जाता है। और सहस्रार कहां? और कुंडलिनी कहां? और आपका दूसरा जन्म कैसे होता है? 

तो कोई दूसरा जन्म नहीं होता, बस कोई पादरी आपके सिर पर अपना हाथ रखता है। वास्तव में यह साक्षात्कारी आत्माओं के लिए समस्या उत्पन्न करता है, पुजारी जो एक साक्षात्कारी आत्मा नहीं, उसका हाथ रखना। और यह बच्चों के लिए एक समस्या पैदा करता है।

मैंने कई बच्चों को देखा है, वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगते हैं जब उन्हें इन पादरियों द्वारा आशीर्वाद दिया जाता है, क्योंकि वह साक्षात्कारी आत्माएँ हैं और पुजारी नहीं। यह बहुत रोचक है। पर वास्तव में आप देखिए, पुजारी बुरे हैं, ईसा मसीह नहीं। पर क्या उनका एक दूसरे से कोई सम्बन्ध है? ईसा मसीह नैतिकता के लिए खड़े हुए। और उनके बारे में भी, इस आधुनिक समय में, वह सभी प्रकार की गंदी बातें कह रहे हैं। वह एक ऐसे चरित्र को नहीं समझ सकते जो नैतिक है। हम इस सीमा तक पहुंच चुके हैं! नैतिकता का प्रश्न ही नहीं उठता। आप जो चाहें कर सकते हैं, जब तक आप गिरजाघर जाकर अपना पाप स्वीकार करते हैं, तब तक आप एकदम सही हैं।

यही हैं आधुनिक धर्मों की अर्थहीन बातें। हर धर्म में समस्याएं हैं और सबसे बुरा, मुझे लगता है, जब आपको विश्व का समर्थन मिले, अपने नेता के रूप में। 

आप लोगों को ऐसे अनैतिक जीवन की अनुमति कैसे दे सकते हैं? अनैतिकता, आप कैसे सह सकते हैं जब कि आप ईसा मसीह के उदाहरण का अनुसरण करते हैं? प्रश्न ही नहीं उठता! वह नैतिकता की मूर्ति स्वरूप हैं,। वह श्री गणेश हैं और आप लोगों को कैसे गिरजा घरों में, मंदिरों में, आने की और अनैतिक जीवन जीने की अनुमति देते हैं? ऐसे लोगों के लिए क्या प्रायश्चित है? ईसा मसीह के जीवन का आधार, ईसा मसीह का संपूर्ण अस्तित्व नैतिकता है और पवित्रता स्थापित करना है।

अब, श्री गणेश को आदिशक्ति ने सबसे पहले बनाया क्योंकि वह चारों ओर पवित्रता चाहती थीं। वह चाहती थीं कि मनुष्य अपनी पवित्रता और अपने व्यक्तित्व का आनंद ले, जो दूसरों के लिए प्रकाश उत्सर्जित करता है। यदि अपवित्रता है, उदाहरण के लिए, एक गन्दा काँच है और यदि आप उस कांच को प्रकाश के ऊपर रखें, तो प्रकाश कैसे बाहर आएगा? अपवित्र जीवन दूसरों को प्रकाश नहीं दे सकता और न ही आपकी अंतरात्मा के प्रकाश को दिखा सकता है। दोनों बातें अपवित्रता के बारे में पूर्णतया सच हैं।

परन्तु लोग कहते हैं कि हमें स्वीकार करना होगा क्योंकि यदि अपने धर्म के लिए  आपको अधिक लोग चाहिए तो आपको कई चीज़ों को स्वीकार करना होगा और उनमें से एक अपवित्रता है। और ज़रा सोचिए! अब, आज्ञा में जहां ईसा मसीह रहते हैं, यदि  आपकी आँखें अपवित्र हैं, वासना और लालच से भरी हैं, तो आप ईसा मसीह के विरुद्ध हैं, आप मसीह-विरोधी हैं। यदि आपकी आँखें स्वच्छ और शुद्ध हैं, केवल तभी आप परमात्मा के प्रेम का आनंद ले सकते हैं, अन्यथा नहीं। और अन्य सहज योगी या योगिनी के प्रेम का भी पूरी तरह से आनंद ले सकते हैं, यदि आपकी आँखें स्वच्छ हैं। कल्पना करें! परन्तु, यदि आपकी आँखें इधर- उधर घूमती रहती हैं और सब कुछ ऐसा हो, तो मुझे नहीं पता कि आप स्वयं को ईसाई कैसे कह सकते हैं? आप नहीं कह सकते!

आप कोई भी प्रमाण पत्र रख सकते हैं, पर आप (ईसाई) नहीं हैं। क्योंकि जो लोग ईसा मसीह का अनुसरण करते हैं, उन्हें संपूर्णतः नैतिक जीवन जीना होगा। आपके लिए यह अंतरात्मा की एक अनिवार्यता है, कि आप अपनी नैतिकता का आनंद लें, और सर्वोच्च यह कि आप अपनी स्वच्छ आँखों का आनंद लें ।

यही मुझे पश्चिमी जीवन के विषय पता चला है, कि उनकी आँखें स्वच्छ नहीं। वह गिरजाघर जाएंगे, और उनकी आँखें इधर-उधर घूम रही होंगी। ऐसे कैसे हो सकता है? आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? यदि आप सोचते हैं कि ईसा मसीह वही हैं जिनका पुनरुत्थान हुआ था और आपका पुनरुथान होना है, तो सबसे पहले यह देखें कि आपकी आँखों में शुद्ध प्रेम हो। अब, शुद्ध प्रेम सापेक्ष नहीं है, दूषित नहीं हो सकता, उसमें वासना और लालच नहीं होते। इन दो चीज़ों को अपने मस्तिष्क से पूरी तरह से निकालना है।

आजकल लोगों में लोभ है, उनमें बहुत अधिक लालच है।

मुझे नहीं पता कि उनमें क्या है, क्योंकि मैंने मनुष्य की अनैतिकता का इतना अध्ययन नहीं किया है। मैं जिन्हें देखती हूँ वह केवल आप जैसे सुंदर लोग हैं।

परन्तु जब मैं तथाकथित पश्चिमी संस्कृति को समझने का प्रयास करती हूँ, तो मुझे आश्चर्य होता है कि भले ही वह किसी की एक जीवनी बनाना चाहते हैं, जैसे कि “शेक्सपियर” का जीवन मैंने देखा, जो मेरे अनुसार, अवधूत थे, अर्थात्, एक ऐसे व्यक्ति जो सभी मानवीय विनाशकारी प्रवृति से परे थे। अवधूत एक बहुत ही उच्च स्तर के योगी होते हैं। और लोग “शेक्सपियर” को एक मूर्ख व्यक्ति के रूप में दर्शाते हैं, जो एक महिला के पीछे भागता रहता है।

वह ऐसे मनुष्यों की कल्पना नहीं कर सकते जो नैतिक रूप से परिपूर्ण हों, जिन में नैतिक बोध हो, वह कल्पना नहीं कर सकते। क्योंकि जो लोग इस तरह की बातें करते हैं वह साक्षात्कारी आत्माएं नहीं हैं, वह सहज योगी नहीं हैं। अतः नैतिकता का विचार  उनके मस्तिष्क में नहीं आता। वह सोचते हैं, “जैसे हम हैं, वैसे ही दूसरे भी।” वास्तव में, अधिकतर ऐसा वह स्वयं को सही ठहराने के लिए ही करते हैं।

कितना भद्दा, और भयावह है ऐसे महान लोगों के चरित्र का चित्रण, जिन्होंने इतने  महान विषयों पर बात की। यह दर्शाता है कि मनुष्य के नैतिक मूल्यों का वास्तव में कितना पतन हुआ है। वह किसी ऐसे व्यक्ति की कल्पना नहीं कर सकते जो एक आदर्श व्यक्तित्व हो। वह सोचते हैं ऐसा कहकर, वह वास्तविकता से परे कुछ बात कर रहे हैं। वह वास्तविकता नहीं जानते।

कल की सूफ़िआना बातों से मैं बहुत प्रभावित हुई, जब उन्होंने उन चार अवस्थाओं के विषय में कहा जो आप में होती हैं। और उसमें से “हक़ीक़त” का अर्थ है वास्तविकता, आपको वास्तविकता में जाना है। वास्तविकता क्या है? यह कोई धारणा नहीं। इसे देखना नहीं, परन्तु प्राप्त करना है। यदि आप देखना आरम्भ करते हैं, तो आपको कुछ सफ़ेद, लाल, पीला दिखाई दे सकता है, परन्तु आप वह नहीं हैं। जब आप इसे प्राप्त कर लेते हैं, तो आप ही वास्तविकता हो जाते हैं। 

तब आप वास्तविकता उत्सर्जित करते हैं, आप वास्तविकता को देखते हैं, वास्तविकता का आनंद लेते हैं, आप वास्तविकता में रहते हैं। यही वास्तविक जीवन है और आप किसी ऐसी चीज़ में लिप्त नहीं होते जो असत्य, काल्पनिक या प्रतिष्ठा से नीचे है। नहीं, आप नहीं करते। आप वास्तविकता हैं, जैसा कि वह कहते हैं “हक़ीक़त” हैं। आप वास्तविकता हैं और आप अपने व्यवहार में, अपनी बातों में, अपने जीवन में, सब में वास्तविकता का उत्सर्जन कर रहे हैं। यह सब आध्यात्मिकता की महान शक्ति को सामने लाता है। जो कुछ भी असत्य है, जो कुछ भी ग़लत है, जो कुछ भी विनाशकारी है, वह उस व्यक्ति से दूर भाग जाएगा जो वास्तविकता में है। यह स्वचालित है। यह पूर्णतः उसी व्यक्तित्व का अंग प्रत्यंग है जो एक साक्षात्कारी आत्मा है।

अतः, पुनरुत्थान हुआ, इसमें कोई संदेह नहीं है, ठीक है। आपके हाथ बोल रहे हैं, ठीक है। मैं आपको कोई भी आदेश या किसी भी प्रकार का निश्चित पथ नहीं देना चाहती, जिस पर आपको चलना होगा। अब आप स्वतंत्र हैं, क्योंकि आप के पास प्रकाश है। जब आप के पास प्रकाश है तो मैं आपको क्यों बताऊँ कि आपको किस मार्ग पर जाना है। आप स्वयं जानते हैं कि आपके पास प्रकाश है। तो अपने आप को एक ऐसे मार्ग पर ले जाएँ, जो एक आलोकित पथ हो, आप ही के प्रकाश से। कोई आप से नहीं कहेगा, यह मत करो, वह मत करो, ऐसा कुछ भी नहीं। आप नहीं कर सकते, यदि कुछ अनुचित हो, बस आप उसे करेंगे ही नहीं, आप इसे नहीं करेंगे! अगर आप ऐसा कर रहे हैं तो जान लें कि आपको अभी भी इन सब से ऊपर उठना है।

आप वह नबी हैं जिनका ‘क़ुरान’ में वर्णन है। आप ही हैं जो पूरे विश्व का पुनरुथान करेंगे, आप ही हैं जो उन दलित लोगों की सहायता करेंगे जो अनैतिकता की गंदगी में हैं। आपके जीवन में यह दिखना चाहिए। इनमें से कुछ लोगों को देखें, जो सूफ़ी थे, जो बहुत स्वच्छ लोग थे, कैसे उन्होंने दूसरों को एक बेहतर जीवन की ओर प्रवाहित किया। आप भी यही हैं। आपको उनके जीवन में मार्गदर्शन करना है, यही आपका कार्य है। मत सोचिए कि क्या हो रहा है- लोग कैसे मूर्ख, अनैतिक हैं, इसे भूल जाएँ। आपको यह जानना है कि आप क्या हैं।

आपको स्वयं के लिए और अपने उत्तरदायित्व के लिए जागरूक होना होगा, पवित्र से भी पवित्रतम होते हुए। जैसा कि मेरा नाम दर्शाता है। आप मेरे बच्चे हैं और यह निर्मल के बच्चों को दर्शाता है, अर्थात् पवित्रता। पवित्रता आपके अस्तित्व का आधार है। आपको यह देखने का प्रयत्न करना चाहिए कि आप कहाँ और क्या थे, किस भाग में। कला की सराहना करना कोई अनुचित बात नहीं, उन सब की सराहना करना जो सुंदर हैं, सुंदर मस्तिष्क से उत्पन्न की गई सभी चीज़ों की सराहना, परन्तु उस प्रशंसा में कोई वासना और लालच नहीं होना चाहिए।

शुद्ध प्रशंसा, पवित्रता, संदेश है और एक बार आपके भीतर पवित्रता होगी तो आप स्वयं से प्रेम करेंगे। जैसे कि मैं आप से प्रेम करती हूँ, आप भी सबसे प्रेम करेंगे। और तब आप इस शब्द ‘प्रेम’ को समझ पाएंगे, जो पवित्रता से आया है। आपकी पवित्रता का प्रस्फुटन, अपनी पवित्रता की सुगंध, आप हर समय आनंद लेते हैं और आपका जो प्रेम है, वह प्रवाहित है, उन सभी की ओर बहता है जिन्हें प्रेम करना है, जिनकी देखभाल की जानी है।

उन लोगों के विषय में चिंता न करें जो विनाशकारी हैं। यही एकमात्र शब्द है जिसका मैं उपयोग कर सकती हूँ, क्योंकि बहुत सारी बातें हैं जिनके बारे में कोई कह सकता है। उन्हें विनाशकारी होने दें क्योंकि वह स्वयं को नष्ट कर रहे हैं। हम उनकी चिंता क्यों करें? उन्हें लगता है कि वह दूसरों को नष्ट कर रहे हैं, पर वह ऐसा नहीं कर रह हैं, वह स्वयं को नष्ट कर रहे हैं। इसे भूल जाएं, बस भूल जाएं। आप स्वयं को पूरे विश्व के निर्माण के लिए ज़िम्मेदार मानिए, केवल कुछ लोगों के लिए नहीं।

आप अत्यंत बुद्धिमान, ज्ञानी और समझदार हैं। आप ईसा मसीह के शिष्यों जैसे नहीं हैं जो शिक्षित नहीं थे, जो अधिक नहीं समझते थे और जिनका साक्षात्कार तो हुआ परन्तु  वह आपके स्तर के नहीं थे। वह जो कुछ भी कर सके, एक ऐसे बिंदु तक पहुँचे जिस से ईसाई धर्म में इस प्रकार की गंदगी आई है परन्तु आप वैसा नहीं कर सकते। आप एक नया जीवंत धर्म बनाएँगे, जो वैश्विक है।

मुझे यह देखकर बहुत प्रसन्नता हुई कि अब हमारे पास पूरे विश्व से लोग हैं। यह एक विश्वव्यापी आंदोलन है। इसका तथाकथित धर्मों की सीमित धारणाओं से कोई लेना-देना नहीं, जिनसे हर धर्म का नाश हुआ है। इस्लाम नष्ट हो गया, ईसाई धर्म नष्ट हो गया और हिंदू धर्म नष्ट हुआ और बौद्ध धर्म सबसे अधिक हुआ। 

बौद्ध धर्म में आप अपना सब कुछ, अपना सामान, अपनी सारी संपत्ति, गुरु को दे देते हैं, कल्पना करें! और गुरु, आप जानते हैं, बहुत लोभी, भयानक व्यक्ति है। वह पुनरुत्थान कैसे दे सकता है? स्वयं एक लोभी व्यक्ति है, दूसरों को पथभ्रष्ट करते हुए बस सब कुछ छीनता है! फिर वही बात ईसाई धर्म में है, कि आप सभी “नन” बन जाएँ, आप ”फ़ादर” बन जाएँ, आप “ब्रदर” बन जाएँ, और मुझे नहीं पता, सब निरर्थक! परंतु भीतर कोई परिवर्तन नहीं।

कोई मेरे पास आया और मैंने कहा, “आप पुजारी क्यों बनेें?” 

उन्होंने कहा, “क्योंकि मैं बेरोजगार था, मेरे पास कोई नौकरी नहीं थी, इसलिए मैंने एक पुजारी की नौकरी ले ली।” 

क्या आप कल्पना कर सकते हैं? वह किसी भी नौकरी के योग्य नहीं था, इसलिए सब से कम योग्यता की यह नौकरी उसने ली। 

“फिर आपने क्या किया?” 

“उन्होंने मुझे बताया कि मुझे क्या उपदेश देना है और पहले मुझे इसका अभ्यास करना पड़ा और इसे दिल से याद करना पड़ा और फिर मुझे पता नहीं, मैंने यह बात – वह बात  करनी शुरू कर दी।” 

मैंने कहा, “वह बहुत बड़ा भूत ग्रस्त व्यक्ति होगा”। 

उसकी अपनी कोई बुद्धि नहीं थी, उसे पता नहीं था कि वह क्या बात कर रहा है। वह “बाइबिल” से एक वाक्य लेता, और सभी को अरुचिकर बातें कहते हुए बोलता ही जाता था! और मुझे आश्चर्य हुआ कि पंद्रह मिनट के भीतर ही लोग गिरजाघर से बाहर निकलना चाहते थे। जैसे ही उपदेश समाप्त होता था वह बाहर भागते और साँस लेते हुए  परमात्मा को धन्यवाद देते! 

क्या धर्म आपको यही देता है? क्या आपके साथ ऐसा ही होना चाहिए? नहीं! ऐसा नहीं है। ऐसा होता है कि आप स्वयं का आनंद लेते हैं, आप सामूहिकता का आनंद लेते हैं, आप भलाई, नैतिकता का आनंद लेते हैं। यह सब जीवन-अमृत के समान है। तो, यह पूरे दृश्य को परिवर्तित कर देता है।

कर्मकांड तो इतना है, हिंदू धर्म में बहुत अधिक कर्मकांड है। आप दाईं ओर बैठें या आप बाईं ओर बैठें या आप इस समय ऐसा करें। और, मेरे कहने का अर्थ है, ऐसी बहुत सी बातें हैं। 

जैसे कि जब आपकी बहन की मृत्यु हो तो आपको कितने दिन तक भूखा रहना चाहिए। यदि आपके पति की मृत्यु होती है तो कितने दिन…..? जो मर गया, मर गया, समाप्त हो गया, शरीर अब समाप्त हो गया। इसलिए, आप इतने दिनों के लिए उपवास करते हैं, यह बहुत ग़लत है क्योंकि यदि आप उपवास कर रहे हैं तो आपके अंदर भूत आ सकते हैं।

 फिर भी, मैं ऐसा कहूंगी, यह सभी कर्मकांड और ऐसा सब उन मनुष्यों द्वारा बनाया गया जो महान होने का दावा कर रहे थे। वह ऐसे नहीं हैं, किसी भी प्रकार से – नैतिकता के प्रभारी; महान जीवन के प्रभारी वह नहीं हैं। वह एक सामान्य सा, व्यर्थ जीवन जीते हैं! 

मैं श्री गणेश के एक मंदिर गई, जिसे स्वयंभू माना जाता है- आठ मंदिरों में से एक, यह उनमें से एक है। और मुझे आश्चर्य हुआ कि जो व्यक्ति पूजा कर रहा था, वह पुजारी माना जाता था, वह लक़वा से पीड़ित था और उसका भाई भी लक़वा से मर गया था, अब उसका बेटा भी लक़वाग्रस्त था।

 उन्होंने कहा, गणेश हमारे साथ यह क्या कर रहे हैं, माँ? 

मैंने कहा, “आप गणेश के साथ क्या कर रहे हैं? आप इस से कितना पैसा कमाते हैं?” 

उन्होंने कहा, “बहुत अधिक”। 

“और आप इस पैसे का क्या करते हैं? क्या आप समाज के लिए कुछ करते हैं? क्या आप उनके जीवन को बेहतर बनाने का प्रयत्न करते हैं? क्या समाज पर आपका कोई ध्यान है या आप स्वयं की ही देखभाल कर रहे हैं?”

परिणामस्वरूप उन्हें लक़वा हो गया। उनके भाई को भी हो गया, उनके बेटे को भी लक़वा हो गया।

और वह इसके लिए गणेश जी को दोषी ठहरा रहे थे! 

उन्होंने कहा, “क्या यह असली गणेश है?”

मैंने कहा, ”हां, हैं! पर आप नहीं।”

मैंने उनके मुँह पर ही कह दिया, “आप उनके आशीर्वाद के योग्य नहीं हैं।”

उन्होंने कहा, “ठीक है आप जो चाहें कह सकती हैं, लेकिन आप मुझे ठीक करें।”

मैंने कहा, “पहले वचन दें कि इस मंदिर से जो भी पैसा प्राप्त हो, उसे आप लोगों की भलाई के लिए व्यय करेंगे।”

परन्तु, वह ऐसा क्यों करेंगे? वह साक्षात्कारी आत्माएं नहीं हैं। इस तरह के बहुत से  पुजारियों को मैं अजीब वस्त्रों में घूमते हुए देखती हूँ। वह मृत शरीर की तरह हैं, सभी प्रकार के बुरे चैतन्य के साथ आस -पास घूमते हैं। मैं समझ नहीं सकती! 

और अन्य लोग जो बहुत सरल हैं, वह कहते हैं, “हे ईश्वर! देखिए, अब वह एक पुजारी हैं। इसलिए उनका सम्मान करना होगा।”

परन्तु, वह नहीं देखते, वह यह सुनिश्चित नहीं करते कि उस व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर क्या है जो स्वयं को पुजारी कहता है! यह आपका कार्य है। आपको उनसे लड़ना नहीं है, आपको उनकी निंदा करने की आवश्यकता नहीं है, आपको उनका विवरण देने की आवश्यकता नहीं, कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन यह समझें कि आप भिन्न हैं, आपको अधिकार है, आप अधिकारी हैं। तो उस अधिकार और आत्मविश्वास के साथ आप जाएँ और लोगों को बचाएँ। 

आप साक्षात्कारी आत्माएं हैं, आपका पुनरुत्थान हुआ है, आप योगी हैं, मैं मानती हूँ! पर, आपका क्या कार्य है? ऐसा क्यों हुआ है? यह प्रकाश आप में क्यों आया है? आपका  कार्य है कि आप अंधों के हाथ थामें और उन्हें प्रकाश की ओर ले जाएं। 

इसी लिए आपका पुनरुत्थान हुआ है। यह केवल स्वयं की खोज के लिए ही नहीं है, अपितु आपके लिए परमात्मा की कृपा है। जहां तक ​​संभव हो आप पूरे विश्व को दिव्य बनाएं।

आपने कितने लोगों को आत्म साक्षात्कार दिया है? आपने कितने लोगों से बात की है? मैं आपको बताती हूँ कि मैं आश्चर्यचकित थी, जब एक बार मैं विमान से यात्रा कर रही थी और मेरे साथ एक महिला यात्रा कर रही थी जो मुझ से अपने पंथ के बारे में, अपने निरर्थक गुरु के बारे में बात करने लगी। तो देखिए, वह बिना लज्जा के बात कर रही थी! उसकी बात सुन कर मैंने सोचा कि सहज योगी ऐसा नहीं करेंगे, वह सहज योग के बारे में बात नहीं करेंगे।

प्रत्येक व्यक्ति जो एक सहज योगी है, उसे सहज योग के बारे में बात करनी होगी, लेकिन ग़लत लोगों से नहीं, अपितु सही लोगों से। यह एक कार्य है जो आपको करना है। इसलिए आप प्रबुद्ध हैं। आप इसलिए प्रबुद्ध नहीं कि कहीं जंगल में डाल दिए जाएं या पूरे संसार में खो जाएं। 

आप प्रबुद्ध हैं, अन्य लोगों को प्रबुद्ध करने के लिए आपका पुनरुत्थान हुआ है। आप इसी के लिए हैं और आप इसे कर सकते हैं। बहुतों ने यह किया है। आप में से कई लोगों ने यह किया है और मैं कहूंगी कि सभी को, चाहे आप एक पुरुष हों या महिला, यह करना है और यह आपकी माँ का अनुरोध है कि अपने साक्षात्कार का उपयोग करें।

और चित्त केवल साक्षात्कार पर ही होना चाहिए। आप कितने लोगों को आत्म साक्षात्कार  देने जा रहे हैं? आप कितने लोगों को बचाने जा रहे हैं? आपके लिए बहुत ही सरल कार्य  है। आपको केवल कुंडलिनी को उठाना होगा, आप कर सकते हैं, आपको यह देखना चाहिए कि कैसे आप केवल अपने हाथ से दूसरों की कुंडलिनी को उठा सकते हैं और उन्हें  उनका पुनरुत्थान दे सकते हैं।

आपको कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है और जीवन आपके लिए उतना कठिन नहीं है। आपका कार्य अति सरल है। आपको बस अपना हाथ उठाना है, आपके हाथ में शक्ति है, बस आपको अपना हाथ उठाना है और उन्हें आत्म साक्षात्कार देना है, बिना संकोच के।

अतः मैं कहूंगी कि आप सभी का पुनरुत्थान हो गया है, आप सभी साक्षात्कारी आत्मा हैं और आपको इस धरती पर दिव्य स्वर्ग बनाना है।

परमात्मा आपको आशीर्वादित करें।