Shri Ganesha Puja: Your innocence will save this world

Campus, Cabella Ligure (Italy)

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2000-09-16 श्री गणेश  पूजा टॉक,  केबेला,इटली, डीपी

आज, हम यहाँ एकत्र हुए हैं गणेश पूजा करने के लिए।

मैं भली-भांति जानती हूँ कि गणेश  प्रतीक हैं पवित्रता के, निर्मलता के और पूजा करने के लिए अबोधिता की । जब आप श्री गणेश की पूजा कर रहे होते हैं तो आप को पता होना चाहिए कि वह अवतार हैं अबोधिता का ।

मैं जानने के लिए उत्सुक हूँ कि हम ‘ अबोधिता ‘ का अर्थ समझते हैं या नहीं । अबोधिता एक गुण है, जो अंतर्जात है, जिसे बलपूर्वक स्वीकार नहीं कराया जा सकता है, जिसमें प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता है । यह केवल एक गुण है, सहज गुण, एक मानव के भीतर। जब वह श्री गणेश का अनुयायी बन जाता है तो वह एक अबोध व्यक्ति बन जाता है।

हो सकता है कि आप कहें कि अबोध व्यक्तियों पर चालाक लोगों द्वारा आक्रमण किया जाता है, आक्रामक लोगों द्वारा, किन्तु अबोधिता इतनी महान बात है कि इसे नष्ट नहीं किया जा सकता है। यह गुण है आत्मा का । अबोधिता आत्मा का गुण है; और जब यह आत्मा आपके भीतर जागृत हो जाती है, तो आपको अबोधिता की शक्ति मिलती है, जिसके द्वारा आप उन सभी चीज़ों पर विजयी होते हैं जो नकारात्मक हैं, वो सब जो अनुचित है, वो सब जो हानिकारक है आपके विकास के लिए, आध्यात्मिक समझ के लिए।

इसलिए अबोध होना संभव नहीं है । आपको अबोध होना होगा, इस अर्थ में कि आप अंतर्जात रूप से अबोध हैं । यह होता है सहज योग के बाद, आत्म-साक्षात्कार के बाद । और आपकी लड़ने की शक्ति,  इन सारी अनुचित, नकारात्मक भावनाओं से जो आपके भीतर और आपके बाहर हैं, पूर्ण रूप से समर्थित, संरक्षित है श्री गणेश की माता द्वारा।

इन दिनों कठिन है किसी को बता पाना अबोधिता के बारे में। किन्तु आप ईसा मसीह के जीवन को जानते हैं: वह अबोध, अबोधिता थे । वह नहीं जानते थे कि वह किस प्रकार के लोगों के बीच थे । उन्होंने सोचा कि वे सब अबोध हैं और इसलिए वह उनसे बात कर रहे थे इस तरीके से कि कोई भी जो चालाक हो इस तरीके से नहीं करता क्योंकि चालाक हमेशा दूसरों की चालाकी को समझते हैं। और उन्होंने ऐसी बातें कहीं, जो हो सकता है लोगों के समझ में नहीं आयी हों, किन्तु जो कुछ भी उन्होंने कहा, उसमें चैतन्य था अबोधिता का । उसे इन सभी लोगों को उचित मानसिक संतुलन में रखना चाहिए था, उनके साथ एक उचित सम्बन्ध में| किन्तु किसी कारण से, वह समय नहीं था उन सभी के लिए कदाचित, आत्म साक्षात्कारी बनने का।

तो गणेश की अबोधिता नहीं थी, हमें कहना चाहिए, ‘पराजित’, किन्तु उसने बहुत वातावरण बनाया ऐसी पवित्रता और सुंदरता का जो आप ईसा मसीह के जीवन में देख सकते हैं।

मुझे प्रसन्नता है कि आप सभी ने आपके विवाहों के बारे में सुन लिया है। विवाह क्यों? क्या आवश्यकता है विवाह करने की? आखिरकार इन दिनों लोग बिना विवाह के रह रहे हैं। किन्तु विवाह का अर्थ है विवाह की पवित्रता : पवित्रता आपके शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक एकीकरण की। यदि आपके पास पवित्रता नहीं है और आप एक व्यक्ति के साथ रहते हैं तो यह सही नहीं है। बच्चे जो आप पैदा करेंगे, वे ठीक नहीं होंगे। इसीलिए विवाह आवश्यक है। और, जैसा कि आप जानते हैं, ईसा मसीह एक विवाह में उपस्थित होने के लिए गये थे। उन्होंने इतना ध्यान क्यों दिया विवाह पर? क्योंकि यह पवित्र करता है आपके संबंधों को एक दूसरे के साथ । 

बाकि कुछ भी ठीक है, किन्तु पति और पत्नी के बीच के संबंध को पवित्र होना ही चाहिए| अन्यथा बच्चे जो आप पैदा करेंगे, वे कुछ भी हो सकते हैं। वे लुटेरे हो सकते हैं, वे कपटी हो सकते हैं, वे झूठे हो सकते हैं, वे बहुत, बहुत क्रूर लोग हो सकते हैं यदि विवाह के बारे में कोई पवित्रता नहीं है तो। यही कारण है कि वह विवाह संस्था को पवित्र करने के लिए गये थे। किन्तु यह पूर्णतः अनुचित और निरर्थक बात है कि उन्होंने मदिरा बनायी । उन्होंने जो किया वह था पानी को बदल दिया अंगूर के रस के स्वाद में । मदिरा को हिब्रू भाषा में ‘अंगूर का रस’ कहा जाता है। मेरा तात्पर्य है, आप कह सकते हैं कि इसे कहा नहीं जाता है, किन्तु ‘ वाइन ‘ का अर्थ है ‘ मदिरा ‘ के साथ-साथ ‘ अंगूर का रस ‘ । किन्तु ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि तुरन्त आप मदिरा नहीं बना सकते। मदिरा में समय लगता है, इसे सड़ना, सड़ना और सड़ना पड़ता है, फ़िर यह मदिरा बन जाती है। किन्तु यदि ईसा मसीह ने इसे ऐसे सहज तरीके से बनाया है, स्वाभाविक तरीके से, तो यह एक मदिरा कैसे हो सकती है जो नशा कराती है?

इसलिए, कई लोग, विशेष रूप से ईसाई धर्म में, मानते हैं कि ईसा मसीह ने मदिरा को पवित्रिकृत किया, जो बिल्कुल अनुचित है। उन्होंने कभी मदिरा को पवित्रिकृत नहीं किया। उन्होंने अंगूर के रस को वाइन के स्वाद में बदल दिया । दूसरे दिन, मेरा एक व्यक्ति से मिलना हुआ, जैसा कि आप उसे जानते हैं, रोमानो बटाग्लिया । और उसने कहा, “माँ, आप मुझे आत्म साक्षात्कार  दीजिए!” मैंने कहा, “ठीक है, मुझे थोड़ा पानी दो!”  वह पानी लाया,  मैंने उसमें अपनी उंगलियाँ डाल दी और फ़िर उसने चखा और कहा, ” माँ, इसका स्वाद वाइन की तरह है !” मैंने कहा, “यही बात है! यही ईसा मसीह ने किया है । 

इसलिए मदिरा की कोई पवित्रता नहीं है । आप कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि ईसा मसीह ऐसा कुछ कर सकते हैं, जिसके द्वारा आपकी चेतना पूर्णतया बिगड़ जाती है। वे लोग जो पीते हैं – आप जानते हैं कि वे सामान्य लोग नहीं हैं। उनके मस्तिष्क में कुछ गड़बड़ हो जाता है । जब वे गाड़ी चलाते हैं तो समस्याएं पैदा करते हैं। जब वे किसी से बात कर रहे होते हैं तो आपको  पता लग जाता है कि वे सामान्य नहीं हैं । वे बहुत आक्रामक होने का प्रयत्न करते हैं। कई बार वे बहुत निष्क्रिय भी हो सकते हैं। अधिकतर वे बहुत आक्रामक और बहुत अधिक इस तरह का व्यवहार करते है जो एक इंसान के योग्य नहीं है ।

इसलिए, हमें यह समझना चाहिए कि यह मदिरा, तथाकथित, जिसे कई दिनों तक किण्वित किया जा रहा है, बहुत अनुचित है और आध्यात्मिक जीवन के विरुद्ध है । वे सभी देश, जहाँ मदिरा को एक बहुत ही पवित्र चीज़ के रूप में स्वीकार किया जाता है, विकृत होते जा रहे हैं । यह श्री गणेश के विरुद्ध है। यह अबोधिता के विरुद्ध है। और इसलिए ऐसा व्यक्ति बहुत चालाक, बहुत धूर्त, बहुत हावी हो सकता है – सभी प्रकार की बुरी चीजें उससे आ सकती हैं। और कोई ऐसे व्यक्ति पर विश्वास नहीं कर सकता जो शराब पीता है और शराबी बन जाता है । वह अपनी पत्नी, अपने बच्चों, किसी के भी पीछे पड़ सकता है, और उनके जीवन को नष्ट करने का प्रयत्न कर सकता है क्योंकि वह जानता है कि वह स्वयं नष्ट हो चुका है ।

तो एक बात जो हमें समझनी है: अबोधिता आप को ऐसा कुछ भी लेने की अनुमति नहीं देती, जो आपकी चेतना के विरुद्ध जाता है । आपकी मानवीय चेतना बहुत आवश्यक है। इसका सम्मान किया जाना चाहिए । कुछ भी जो आप लेते हैं जो आपकी चेतना को बिगाड़ता है या आपके स्वास्थ्य को बिगाड़ता है, वह सब अनुचित है, विशेष रूप से सहज योगियों के लिए । आपको अपना स्वास्थ्य ठीक रखना होगा। आप कैसे अपने स्वास्थ्य को ठीक रखते हैं? ऐसी सभी चीज़ों से दूर रह करके जो आपकी सेहत को नष्ट करती हैं।

इसलिए विवाहित जीवन एक पवित्र जीवन है, एक जीवन है जिसे आशीर्वादित किया जा रहा है। अब हमारे पास शांति है, किन्तु मैं कहूँगी, सहज योग में, वे सब मेरे द्वारा आशीर्वादित हैं। तो हरेक को यह समझना चाहिए कि यह बहुत बड़ी चीज़ है जो आपको मिली है। किन्तु कई ऐसे हैं जिन्हें मैं जानती हूँ, जो यह कहते हुए आते हैं ” माँ, हम तलाक चाहते हैं । हम एक अच्छा विवाह बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं”। हर तरह की कहानियाँ वे मुझे बताते हैं । यदि आप जानते हैं कि यह एक पवित्र विवाह है- एक विवाह है जो सहज योग की सभी प्रथाओं के तहत किया गया है – यह एक बुरा विवाह नहीं हो सकता। किन्तु यदि आप बुरे हैं तो कोई भी आपकी सहायता नहीं कर सकता है। यदि आपके पास विवाह को लेकर मूर्खतापूर्ण विचार हैं तो आपको इसे ठीक करने का प्रयत्न करना चाहिए।

यदि आप सहज योग में विवाह करना चाहते हैं तो कृपया देखें कि आप विवाहित जीवन की पवित्रता का सम्मान करते हैं । मैं जानती हूँ कि कई बार महिलाएं बुरी हो सकती हैं, पुरुष बुरे हो सकते हैं, समस्याएं हो सकती हैं । किन्तु जो व्यक्ति ज्ञानी है, वह सब सहने का प्रयत्न करेगा क्योंकि वह विवाह की पवित्रता का सम्मान करना चाहता है या चाहती है।

यह एक बहुत ही अन्तर्विरोधी बात है फ़िर, जो आती है, कि ईसा मसीह का जन्म विवाह के बिना हुआ था और गणेश का जन्म भी विवाह के बिना हुआ था । वे स्वयं पवित्रता हैं। उन्हें बाहर से किसी पवित्रता की आवश्यकता नहीं है। वे अबोधिता हैं और अबोध लोगों के लिए उन्हें किसी प्रकार के अनुष्ठान या एक प्रकार के समारोह की आवश्यकता नहीं है । इसी प्रकार उनका जन्म हुआ है- पूर्णतया पवित्र – अबोधिता से । किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हमें उनका उदाहरण अपने आप में लेना चाहिए । वे दिव्य व्यक्तित्व थे, और वे इसी प्रकार जन्म लेने वाले थे। जबकि हमें पवित्र होना होगा और पवित्र जीवन व्यतीत करना होगा। यह एक अंतर है एक अवतार और एक मनुष्य के बीच।

अवतरणों की आलोचना करना आसान है। उनकी आलोचना करना बहुत सरल है । सभी अवतरणों की आलोचना की गई है मनुष्यों के द्वारा क्योंकि मनुष्य उन्हें समझ नहीं सकते। किन्तु वास्तव में बहुत शुद्ध और अबोध होने का प्रयत्न कीजिए और फ़िर आप समझ जाएंगे कि क्यों उनका जीवन एक अलग दिशा पर था, अलग शैली पर।

अब, यदि आप कहते हैं, “हम अबोधिता का विकास कर सकते हैं, माँ”, आप नहीं कर सकते। कौन सा तरीका है अबोध बनने का? सहज योग में हमारे पास एक उचित तरीका है कि कैसे हम अबोध बन सकते हैं। यह होता है हमारी निर्विचारिता के माध्यम से । यदि आप निर्विचारिता कि स्थिति में होते हैं तो, क्या होता है कि, आप प्रतिक्रिया नहीं करते हैं, आप निहीत नहीं होते हैं अनुचित चीज़ों में, आप निहीत नहीं होते हैं किसी भी चर्चा, तर्कों में, किन्तु आप केवल देखते हैं और अबोधिता आपके भीतर सुंदर तरीके से ऊपर उठती है, जैसे एक कमल ऊपर उठता है एक गंदे तालाब से बाहर।

इसलिए परिस्थितियाँ चाहे जो भी हों, जब आप निर्विचारिता में होते हैं तो आप प्रतिक्रिया नहीं करते। यह अबोधिता की निशानी है । और जो लोग प्रतिक्रिया नहीं करते युवा रहते हैं । वे अपनी उम्र कभी नहीं दिखाएंगे, वह युवा रहते हैं। क्योंकि प्रतिक्रिया करना बहुत अच्छी बात नहीं है, जिससे आप दूसरे व्यक्ति के साथ निहीत हो जाते हैं । किन्तु यदि आप प्रतिक्रिया नहीं करते हैं, यदि आप केवल देख रहे हैं, और आप एक साक्षी हैं, तो आप किसी चीज़ के साथ निहीत नहीं होते हैं, आप इस सबसे दूर हैं । और इस तरह आपकी अबोधिता बढ़ती है और आपको इस पर बहुत विश्वास हो जाता है ।

मैंने एक कहानी पढ़ी थी चीन के एक राजा के बारे में एक जो एक संत के पास गया और उससे पूछा कि वह उससे कुछ वरदान चाहता है । उन्होंने कहा, “क्या?” उसने कहा, “मैं चाहता हूँ कि मेरा बेटा एक ऐसे व्यक्ति के रूप में विकसित हो जो हर प्रकार के लोगों का सामना कर सके। लोग जो भी करें, वह उनका सामना करने में सक्षम होना चाहिए । उन्होंने कहा, “ठीक है, आप अपने बेटे को मेरे पास छोड़ दीजिए” । तो, जब तर्क शुरू हुए, जब लड़ाई शुरू हुई, तो उनका बेटा केवल सीधे खड़ा था, सब कुछ देख रहा था निर्विचारिता में । तो अखाड़े से सभी लोग वापस चले गए, वे सब चले गए। और वे इस लड़के की अबोधिता को सहन नहीं कर सके जो बहुत छोटा था । और राजा आश्चर्यचकित था कि कैसे उसका बेटा उन सभी का सामना कर पाया, उनके सभी तर्क, उनकी सारी आक्रामकता और सभी प्रकार की भयानक बातें जो उन्होंने उससे कही थीं।

यदि कोई आपसे कुछ कहता है तो आपको केवल अबोध होना चाहिए। उस समय आपकी अबोधिता की शक्ति दिखाएगी कि यह व्यक्ति, जो आप पर हावी होने का प्रयत्न कर रहा है, आपको परेशान करने के लिए, बहुत अनुचित है। और वह व्यक्ति हो सकता है स्वयं अनुभव करे कि, “मैं ये सब कर रहा हूँ और यह व्यक्ति, जिस पर मैं हावी होने की प्रयत्न कर रहा हूँ, वह इस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है!” इसलिए वह बहुत निर्बल अनुभव करता है। वह सोचता है कि उसके पास किसी व्यक्ति पर हावी होने की शक्ति नहीं है ।

तो हमारे पास अब सहज योगी के रूप में यह है -हम निर्विचारिता में जा सकते हैं । अपनी प्रतिक्रियाओं को कम करने का प्रयत्न कीजिए , प्रतिक्रिया किसी भी चीज़ पर। लोगों के पास अपने बारे में इतने अजीब विचार होते हैं कि वे प्रतिक्रिया करते हैं। अब उदाहरण के लिए, किसी ने मुझे वह कालीन दिखाए, मैंने देखना शुरू कर दिया, मैं बहुत प्रसन्न थी, और उन्होंने मुझे बताया कि सभी सहज योगिनीयों ने अपने हाथों से इसे बनाया है, इतनी सुंदरतापूर्वक । वाह, यह जानकर वास्तव में बहुत प्रसन्नता हुई कि उन्होंने ऐसा किया है।। किन्तु यदि मैं एक बहुत ही सामान्य व्यक्ति होती तो मैंने कहा होता, ” हे भगवान! क्या रंग है! क्या बात है! “और यह सब; इस तरह से। 

तो उन्होंने जो कुछ भी किया है, मैं उसका आनंद भी नहीं ले सकती। एक बात है आनंद खो जाता है। बच्चे के लिए आनंद पूर्ण होता है। वह जो कुछ भी देखता है, वह उसमें से आनंद प्रदान करने वाली चीज़ बना लेता है । आप बच्चों को देखिए: मैंने बच्चों को देखा है, उन्हें कुछ भी मिल जाए, वे उससे खिलौना बना लेते हैं । एक दिन, हम जेनोवा गये थे और मैंने देखा कि वहाँ बड़े ब्लॉक रखे थे। कुछ बच्चे कहीं से आए, वे बस उन पर चढ़ गए और उनके घोड़े बना दिये और उनका आनंद ले रहे थे । आप देखिएगा, उन्हें कुछ भी मिल जाए, कोई भी जगह मिल जाए, और वे अपने लिए एक आनंददायी चीज़ बना लेते हैं, एक नाटक उनके लिए। उनके लिए जीवन भी एक नाटक है, बस आनंद की चीज़ है। और वे आपको भी हर चीज़ का आनंद दिलाते हैं । यदि आप अच्छी मनोदशा में नहीं हैं, तो वे आएंगे और इस तरह से व्यवहार करेंगे कि आपको बदलना ही पड़ेगा और एक बहुत ही सरल, प्राकृतिक व्यक्ति बनना पड़ेगा ।

इसलिए एक साधारण प्राकृतिक व्यक्ति को देख कर हम हमेशा कहते हैं कि वे बच्चों की तरह हैं। तात्पर्य यह है, वे चालाकी नहीं समझते हैं, वे नहीं समझते हैं लोगों की मूर्खता को और वे अपनी दुनिया में रहते हैं अबोधिता की । इसी तरह सभी सहज योगियों को अपने चारों ओर उस आभा का विकास करना होगा। लोगों को आपको देखने दीजिए, आप कितने अबोध हैं, आप कितने मधुर हैं! कोई तर्क नहीं, कोई झगड़ा नहीं, किसी लड़ाई की आवश्यकता नहीं । यह मात्र आंतरिक संतुष्टि है निर्विचारिता की ।

बहुत से लोग कहते हैं, “माँ, हम निर्विचार नहीं बन सकते!” क्यों? आप निर्विचार क्यों नहीं बन सकते? क्योंकि हर समय, आप जो भी देखते हैं, आप प्रतिक्रिया करना चाहते हैं । यदि आप धीरे-धीरे शुरू करें प्रतिक्रिया को रोकना –  आत्मनिरीक्षण करें। स्वयं के लिए देखें। यदि आप हर समय प्रयत्न कर रहे हैं प्रतिक्रिया करने की तो अपने मन को कहें कि वह ठीक से व्यवहार करे । यदि कोई प्रतिक्रिया हो तो आप कुछ न कहें। चुप रहें। धीरे-धीरे आप चकित और हैरान हो जाएंगे कि आप  कैसे निर्विचार हो जाते हैं, आप कितने सुंदर हो जाते हैं। और जो कोई आपको देखता है उसे पता चल जाएगा कि आप कुछ अलग हैं, आप सामान्य व्यक्ति की तरह नहीं हैं।

किन्तु मनुष्य की सामान्य प्रतिक्रिया यह है कि, यदि कोई झगड़ा चल रहा है, कहिए, सड़क पर, सभी लोग झगड़े में शामिल हो जाएंगे। उन्हें लड़ना पसंद है। वे अभिन्न अंग बनना चाहते हैं उस झगड़े या लड़ाई या जो कुछ भी है, उसका । वे इससे बाहर नहीं निकलना चाहते। उस समय, यदि आप के पास केवल अपनी अबोधिता है, तो यह कार्य करेगी । मैंने आपसे कहा था, अबोधिता आत्मा है, और आत्मा अबोधिता है, जो किसी भी चीज़ से नष्ट नहीं हो सकती है। सच्चाई यह है कि इसे किसी भी चीज़ से नष्ट नहीं किया जा सकता है और इसे फ़िर से स्थापित किया जा सकता है सहज योग के माध्यम से । आप बहुत आक्रामक व्यक्ति रहे होंगे, आप बहुत दुखी व्यक्ति रहे होंगे, आप एक ऐसे व्यक्ति रहे होंगे जो हर समय दूसरों को परेशान कर रहा हो, हो सकता है, किन्तु सहज योग के बाद आप अपने व्यक्तित्व को इतना मधुर और सुंदर बना सकते हैं कि न केवल आप आनंद ले सकते हैं अपितु अन्य लोग भी आनंद ले सकते हैं ।

यह अबोधिता एक ऐसी चीज़ है जो पूर्णतया, सच्ची, बुद्धिमत्ता है । ऐसा नहीं है कि यह किसी उद्देश्य के लिए कार्य करती है, किन्तु यह उद्देश्यहीन है । यह पूर्णतया उद्देश्यहीन है। और इस प्रकार यह आनंद की उस ऊँचाई को प्राप्त करती है क्योंकि किसी भी चीज़  में कोई उद्देश्य नहीं है। यह सभी प्रकार के प्रयासों की निरर्थकता को देखती है जो हमारे पास हैं और यह केवल आनंद देती है। । “क्यों लोग ऊपर नीचे दौड़ रहे हैं? वे क्यों लड़ रहे हैं? बस खड़ी होती है और देखती है कि, “उन्हें  ऐसा क्यों करना चाहिए?” – इस तरह। कुछ लोगों को लग सकता है कि वे ठीक हैं, उन में कुछ भी अनुचित नहीं है, किन्तु ऐसा नहीं है। अबोधिता है कुछ, मैंने आपसे कहा था, एक अंतर्जात गुण है, और आपको स्वयं को यह सोचकर छलना नहीं चाहिए कि आप अबोध हैं । इसके विपरीत आप केवल थोड़ा आत्मनिरीक्षण स्वयं पर कीजिए और स्वयं देखिए, आप अब तक क्या करते रहे हैं जहाँ तक दूसरों का संबंध है, आपका रवैया क्या है।  

मैं पहले ही आपसे बात कर चुकी हूँ भावात्मक बुद्धिमता के बारे में । भावात्मक बुद्धिमता अभिव्यक्ति है अबोधिता की । यह अभिव्यक्ति है श्री गणेश की आपके भीतर । जिन बच्चों को यह उपहार के रूप में मिला है, वे सदैव आपको प्रसन्न करने का प्रयत्न करेंगे, वे जानते हैं कि आप क्या चाहते हैं, आपको किस चीज़ कि आवश्यकता है । वे आपको सारा आनन्द देंगे जो आप चाहते हैं। वे सब चीज़ करेंगे जो आपको अच्छी लगती हैं, केवल आपको प्रसन्न करने के लिए। 

उनके पास अपनी आवश्यकताएं नहीं है । वे अपनी माँगें नहीं उठाना चाहते। वे कभी नहीं कहते, “मैं यह चाहता हूँ”, “तुम मेरे लिए करो”- कभी नहीं! वे केवल यह देखना चाहते हैं कि आप क्या चाहते हैं, आप क्या प्राप्त करना चाहते हैं और वे पूरा प्रयास करते हैं उस चीज़ की आपूर्ति करने का, जो भी चाहते हैं । यह बहुत दिलचस्प है कि बच्चे कैसा व्यवहार करते हैं दूसरों के प्रति, बड़ों के । ठीक वैसे ही जैसे मैं कहूँगी, एक महान समझ, हमें कहना चाहिए, एक बहुत ही बुजुर्ग व्यक्तित्व की तरह । तो, अबोधिता में, आप बहुत बड़े हो जाते हैं, परिपक्व हो जाते हैं। बहुत परिपक्व। उस परिपक्वता के साथ आप जानते हैं कि इस व्यक्ति को क्या चाहिए, और दूसरे व्यक्ति के पास क्या नहीं होना चाहिए। और जिस तरह से वे इसे स्थापित करते हैं, बहुत दिलचस्प है ।

बच्चे सबसे दिलचस्प चीज़ हैं, मुझे लगता है, दुनिया में । मेरे लिए गुलाब बहुत सुंदर हैं किन्तु बच्चे सबसे दिलचस्प हैं। और वे आपको इतनी सारी चीज़ें सिखाते हैं कि आप उनकी अबोधिता पर आश्चर्यचकित हो जाते हैं। बच्चों के बारे में बहुत सारे चुटकुले हैं- वे कैसा व्यवहार करते हैं, कैसे बात करते हैं। 

और वे इतने अबोध हैं कि वे सबको सब कुछ बता देंगे। उनके पास कुछ भी छिपाने का कोई तरीका नहीं है, यह बहुत कठिन है। मुझे एक चुटकुला पता है: जब एक सज्जन घर पर आए रात के खाने के लिए । तो बच्चा उन्हें बहुत ध्यान से देख रहा था। और फ़िर उसने कहा, “माँ, वह घोड़े की तरह नहीं खाता है, जैसा कि आपने मुझसे कहा था!”  तो हर कोई चौंक गया! ” आप देखिए, वह एक घोड़े की तरह नहीं खाता है!” । माँ ने उससे कहा होगा, “वह घोड़े की तरह खाता है”। तो उसने उसे देखा, “वह घोड़े की तरह नहीं खाता!” आप देखिए, वे इतने अबोध होते हैं कभी- कभी, वे ऐसी बातें कह जाते हैं जिनके द्वारा आप पूरी तरह से अनावृत हो सकते हैं ।

इस बारे में बहुत सारे चुटकुले हैं । और यदि आप कुछ किताबें लिखें, बच्चों के चुटकुले लिखते हुए, तो मैं आपको बताती हूँ, लोग इसका इतना आनंद लेंगे क्योंकि इतने भोलेपन से वे ऐसी बातें कहते हैं जो सच के सिवा कुछ नहीं हैं । और वे झूठ नहीं बोल सकते । वे इतने सच्चे होते हैं, यही गुण है अबोधिता का । वे कभी झूठ नहीं बोल सकते । “तुमने यह किया?” ” हाँ, मैंने किया था.” “तुमने ऐसा नहीं किया?” “नहीं, मैंने नहीं किया.” वे कभी झूठ नहीं बोलते। यह हम, वयस्क उन्हें सिखाते हैं कि कैसे झूठ बोलते हैं, कैसे छलते हैं । 

फ़िर हम अपने बच्चों को एक और बुरी बात भी सिखाते हैं, वह है, “आपके पास सब कुछ होना चाहिए”। विशेष रूप से पश्चिम में, यह एक बात वे करते हैं । वे बच्चे से कहते हैं कि, “यह तुम्हारा है, तुम्हें यह किसी को नहीं देना चाहिए, यह तुम्हारा अपना है”। इसके विपरीत, आपको उन्हें कहना चाहिए, ” आप वह कर सकते हैं जो आपको अच्छा लगता है”। इसे उनकी अबोधिता पर छोड़ दें । आप चकित हो जाएंगे, वे सब कुछ छोड़ देंगे जो उनके पास है। इतने सुंदर तरीके से वे व्यवहार करेंगे, कि आप चकित हो जाएंगे कि कैसे वे प्रयत्न करते हैं सभी को प्रसन्न करने का, और प्रयत्न करते हैं कुछ करने का आपका मनोरंजन करने के लिए ।

उनकी सारी क्षमताएं इस की, इतनी महान है कि कई बार आश्चर्य होता है कि कैसे इन छोटी चीज़ों ने इन क्षमताओं का विकास किया है । यह श्री गणेश  का आशीर्वाद है। यह उनका आशीर्वाद है कि बच्चे इतने मधुर हैं और इतने मनोरंजक हैं, और इतने सुंदर हैं । उनकी तरह बनने की प्रयत्न करें। हमें उनके जैसा बनना होगा। 

आपने कई किताबें पढ़ी होंगी, आपको बहुत सारी शैक्षिक उपाधियाँ मिली होंगी, हो सकता है आप कुछ महान हों, किन्तु आप बच्चों की तरह नहीं हैं। आपको एक बच्चों जैसा व्यक्ति बनना होगा अन्यथा कोई भी आपकी संगति को पसंद नहीं करता है। हम उन्हें ‘उबाऊ’ कहते हैं, किन्तु वास्तव में उबाऊपन, उन लोगों के साथ आता है, जिनके हृदय में कोई अबोधिता नहीं है । वे आपको यह बताने का प्रयत्न कर रहे हैं, “आपको यह अवश्य करना चाहिए । यदि आप सफल होना चाहते हैं, तो आप ऐसा करें” । ये सभी भाषण बच्चों के लिए व्यर्थ हैं।

उसी तरह, यह आपकी अपनी समझ के भीतर होना चाहिए कि, “यह सब निरर्थक बातें हैं जो वे कह रहे हैं!” जैसा कि बच्चे परवाह नहीं करते कि आप उन्हें क्या सुझाते हैं, बुरा होना, भयंकर होना, उसी तरह, यदि आप अबोध हैं तो आप इसे स्वीकार नहीं करेंगे। आप कुछ भी सुन सकते हैं, उन्हें आपको कुछ भी बताने दें जो वे चाहते हैं, कोई बात नहीं । आप ऐसा कभी नहीं करेंगे, क्योंकि आप ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि आप अबोध हैं । और अबोधिता आपकी रक्षा करेगी, यह आपको उचित मार्गदर्शन देगी कि क्या किया जाना है, क्या नहीं किया जाना है।

अब आत्ममंथन करने का प्रयत्न करें और स्वयं के लिए देखें: क्या आप अबोध हैं या नहीं? लोग सोचते हैं कि कोई आपको वश में करने का प्रयत्न कर रहा है, आपको नुकसान पहुंचाने का प्रयत्न कर रहा है, आपको नीचा दिखाने का प्रयत्न कर रहा है । कोई भी अबोधिता को नीचा नहीं दिखा सकता । अबोधिता एक ऐसा गुण है जो हर तरह की निरर्थकता से बच जाती है। और इतना ही नहीं, किन्तु उम्र, आपका स्वास्थ्य, आपका मन, आपकी सोच और आपकी भावनाएं अत्यधिक अबोध हैं और आप स्वयं का आनंद लेते हैं ।

आजकल एक बड़ी लहर है, बेशर्मी की, थोड़े समय से। जिन लोगों को मैंने देखा है, उनके पास कोई लज्जा नहीं है। मैं नहीं जानती, कुछ पुरुष महिलाओं को आकर्षित करना चाहते है और कुछ महिलाएं पुरुषों को आकर्षित करना चाहती हैं । बच्चे कभी ऐसा नहीं करते, वे नहीं जानते कि यह क्या है- पुरुषों को आकर्षित करना या महिलाओं को आकर्षित करना, या किसी को आकर्षित करना। वे प्रयत्न करेंगे कुत्ते को प्रसन्न करने का, वे प्रयत्न करेंगे एक घोड़े को प्रसन्न करने का, किन्तु वे कभी, मैंने देखा है, किसी को आकर्षित करने कि अत्यधिक चेष्ठा नहीं करेंगे । इसका कारण यह है – कि उनका आत्मसम्मान पूर्ण है। 

वे स्वयं के बारे में पूरी तरह से जानते हैं। तो उन्हें यह सब निरर्थक चीज़ें क्यों करनी चाहिए महिलाओं के पीछे दौड़ना, पुरुषों के पीछे दौड़ना और अपने लिए समस्याएं पैदा करना? उनका स्वाभिमान पूर्ण है। अबोधिता ऐसी ही है, यह आपको पूर्ण स्वाभिमान देती है। आप किसी के आगे नहीं झुकते और न ही किसी और को झुकने देते हैं। यही अबोधिता की सुंदरता है जो आप के भीतर इतनी अच्छी तरह से कार्य करती है । इसलिए मैं सदैव कहती हूँ कि, “श्री गणेश की पूजा करो!”

मैं एक ऐसे व्यक्ति के बारे में जानती हूँ जो बहुत ऊँचे पद पर थे और अचानक मैं आश्चर्यचकित थी कि वह कैसे लकवाग्रस्त हो गए । क्या हुआ? वह बहुत अच्छे मनुष्य थे, उन्हें लकवाग्रस्त नहीं होना चाहिए था। फ़िर मुझे पता चला कि उनकी महिलाओं के बारे में बहुत बुरी नीयत थी और इस तरह उन्हें यह समस्या हो गई । तो मैंने उनसे कहा, ” अच्छा होगा कि गणेश  की पूजा करें। आप श्री गणेश की पूजा करें! ” । श्री गणेश की पूजा करने से आपके मूलाधार में सुधार होता है, आपकी लज्जा की भावना में सुधार होता है, आपके स्वयं कि मान-मर्यादा में सुधार होता है, स्वाभिमान में। 

आप इस तरह से कपड़े पहनते हैं कि पता चलता है कि आप स्वयं के शरीर का सम्मान करते हैं । आप इस तरह से बात करते हैं जिससे पता चलता है कि आप अपनी जीह्वा का सम्मान करते हैं, अपनी भाषा का । आपके मुख से अपशब्द नहीं निकल सकते यदि आप अबोध व्यक्ति हैं । आपके पास नहीं हो सकता ऐसा मन जो गाली देता हो या भयानक शब्द कह सकता हो । मैंने देखा है अमरीका में, वे इस तरह के अजीब तरीके से बात करते है कि आप स्तंभित हो जाते हैं! कोई आवश्यकता नहीं है इन गंदे शब्दों का उपयोग करने की अपने आप को व्यक्त करने के लिए; इसके साथ, आपकी जीह्वा ख़राब हो जाती है इसलिए अबोधिता आपकी जीह्वा से चली जाती है। यदि आप अपनी जीह्वा से अबोधिता खो चुके हैं, तो आप जो कुछ भी कहेंगे वह कभी सच नहीं होगा, कभी सच नहीं होगा। किन्तु यदि आप अबोध हैं, और आपकी जीह्वा अबोध है और सम्मान करती है….

तो मूलतः, जैसा कि आप देख सकते हैं: हर तरीके से अपनी अबोधिता का सम्मान करें। जैसे, जब आप को किसी पर क्रोध करना हो या कुछ कहना हो तो बस चुप रहना सबसे अच्छा तरीका है । नहीं तो आपको अपनी जीह्वा का सम्मान करना चाहिए, अपनी आँखों का सम्मान करना चाहिए। कुछ लोगों की बहुत बुरी आदत होती है, हर तरफ़ अपनी आँखें घुमाने की,  महिलाओं को देखते रहने की; या कुछ महिलाएं ऐसी होती हैं। आप अपनी आँखों का सम्मान नहीं करते। इसके बाद उनमें आँखों की समस्याएं विकसित होती हैं। इतना ही नहीं किन्तु मस्तिष्क भी,  मस्तिष्क इतना अधिक बर्बाद हो जाता है इस प्रकार के व्यवहार से कि उसे कोई बोध नहीं होता। वह किसी भी चीज़ का आनंद नहीं ले सकता। ऐसा व्यक्ति किसी भी चीज़  का आनंद नहीं ले सकता।

यदि आप एक ऐसे व्यक्ति हैं जो अपनी आँखों, अपनी नाक, अपने कान का सम्मान करते हैं, तो मैं आपको बताती हूँ, आप चकित हो जाएंगे, सब कुछ इतना आनंददायी है। इस विश्व में बहुत सारी चीजें हैं आनंद लेने के लिए, किन्तु लोग कुछ भी अच्छा नहीं सुन सकते । ऐसे पक्षी हैं जो चहकते हैं – वे नहीं सुन सकते। ऐसे पेड़ हैं जो बढ़ रहे हैं – वे नहीं देख सकते। ऐसे फूल हैं जिनमें सुगंध है – वे नहीं सूंघ सकते; क्योंकि वे इतने नीचे हैं अपने आत्मसम्मान में, क्योंकि वे बहुत निम्न स्तर के लोग हैं, मुझे कहना चाहिए, जो आनंद नहीं ले सकते सब कुछ का चारों ओर में ।

और उन्हें आनंद का स्रोत होना चाहिए। आप बच्चों को देखिए, कैसे वे आनंद का स्रोत हैं! जो कोई भी मंच पर आता है और दौड़ता है, और हम कैसे आनंद लेते हैं । क्यों? हम एक बच्चे के दौड़ने में क्यों आनंद लेते हैं? हम यह नहीं कहते कि वह पागल हो गया है या वह नशे में है, किन्तु हम बच्चे का आनंद लेते हैं । क्यों? क्या मिठास है उस बच्चे की जो हमें इतना प्रसन्न करती है? क्योंकि वह अबोधिता है । उसकी शक्ति अबोधिता है। और उस शक्ति के साथ वह बस इतना अच्छा लग रहा है, इतना सुंदर कि यह हमें वास्तविक आनंद देता है हमारे भीतर ।

तो दूसरी बात यह है कि अबोधिता आनंद प्रदान करने वाली है । अबोधिता लोगों को आनंद देती है। कुछ भी कहा अबोधिता से, कुछ भी किया गया अबोधिता से, बहुत, बहुत आनंद प्रदान करता है और, उस में, आप देखते हैं उस व्यक्ति को इतना पारदर्शी, इतना सुंदर, कि आप उस पारदर्शिता का आनंद लेते हैं और उस पवित्र अबोधिता का । इसीलिए सबसे पहले गणेश की पूजा की जाती है, क्योंकि गणेश पहले देवता थे, जिन्हें आदि शक्ति ने बनाया था। क्योंकि, यदि उन्हें कुछ बनाना है, तो उन्हें पता होना चाहिए कि अबोधिता की शक्ति होनी ही चाहिए अन्यथा लोग अनुचित दिशा में चले जाएंगे, वे सभी प्रकार की अनुचित चीज़ें करेंगे। तो पहले उन्होंने गणेश को बनाया, जिनकी अबोधिता – हम ‘चैतन्य लहरियाँ ‘ कह सकते हैं – इतनी शक्तिशाली है कि वह नियंत्रित करती है। 

निसंदेह, ऐसे लोग हैं जिन्होंने पूरी तरह से अपनी अबोधिता छोड़ दी है और उन्हें लगता है कि वह कुछ बहुत महान हैं । उनके बारे में भूल जाइए! किन्तु आम तौर पर, आम तौर पर आप हमेशा अपनी अबोधिता से निर्देशित होते हैं, चाहे आप इससे अवगत हों या नहीं। और यह इतनी मधुर बात है, इतनी मधुर बात है,  कि यह लोगों को उनकी श्रेष्ठता में ऊपर उठाता है, उनकी महानता में । और यही हमें अपने भीतर विकसित करना है, सहज योगियों में । जब सहज योगी कहीं जाएं, कुछ भी करने का प्रयत्न करें, किसी से मिलें, किसी भी सामाजिक कार्य को करें, कुछ भी, लोगों को वह आनन्द अनुभव करना चाहिए जो आपके भीतर है।

यह केवल उस आनन्द के लिए ही आदि शक्ति ने श्री गणेश की रचना की । क्योंकि वह आनन्द आपके भीतर, अबोध आनन्द,  जो किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता, जो कुछ भी अपेक्षा नहीं करता, जो कोई माँग नहीं करता, जो कुछ भी नहीं चाहता, किन्तु केवल सभी जगह आनन्द का उत्सर्जन करता है –  इस तरह का व्यक्तित्व आप का होना चाहिए।

अच्छे कपड़े पहनने में कुछ भी अनुचित नहीं है, अच्छा खाना खाने में कुछ भी अनुचित नहीं है, लोगों से बातचीत करने में कुछ भी अनुचित नहीं है किन्तु इन सब में, इस अबोधिता का सम्मान, अबोधिता की अभिव्यक्ति होनी चाहिए । इस अबोधिता से हम समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। विश्व की सभी समस्याओं का समाधान हो सकता है। यही कारण है कि श्री गणेश बहुत महत्वपूर्ण हैं।

यदि आपको श्री गणेश  की उचित समझ नहीं है और यदि आपके श्री गणेश खतरे में हैं तो मैं नहीं जानती कि आपके साथ क्या हो सकता है। आज, इन दिनों, आप देखते हैं कि कई भयानक बीमारियाँ इसलिए आ रही हैं क्योंकि वे पवित्र नहीं हैं, उनके रिश्ते पवित्र नहीं हैं। हर रिश्ते को पवित्र करना होगा अपनी अबोधिता से । 

जैसे, आपकी एक बहन है, आपकी एक माँ है, आपका एक भाई है, आपके एक पिता हैं, आपके ये सारे रिश्ते हैं । और ये सारे रिश्ते वे इतने अच्छे, इतने सुंदर और पवित्र हैं, क्योंकि वहाँ अबोधिता का रिश्ता है । आप अपने पिता से अबोधिता के कारण प्रेम करते हैं, और आप अबोधिता के कारण अपनी बेटी से प्रेम करते हैं, आप अबोधिता के कारण  अपनी माँ से प्रेम करते हैं । आपको प्रेम क्यों करना चाहिए? कुछ प्रकार के लाभ के लिए? फ़िर यह चालाकी है । किसी प्रकार के प्रभुत्व करने के लिए? तो यह धूर्तता है । यह केवल प्रेम, प्रेम के कारण है । यह संभव है यदि आप अबोध हैं ।

तो अब मैं प्रसन्न हूँ कल आप सब विवाह करने जा रहे हैं । और वे लोग जो विवाह कर रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि यह एक पवित्र विवाह है । यह बहुत महत्वपूर्ण है। यह किसी अन्य विवाह की तरह नहीं है। यह वो विवाह है जो मेरी उपस्थिति में हो रहा । तो सावधान रहिए! अब, यदि आप विवाह नहीं करना चाहते हैं, ठीक है, इसे समाप्त कीजिए! आपको एक मौका दिया गया है उस व्यक्ति को जानने का, उसे समझने का ।

किन्तु बाद में, यदि आप विचित्र व्यवहार करने का प्रयत्न करें, तो यह आप के लिए बहुत कठिन हो जाएगा और मेरे लिए भी । मैं विवाह करवाना छोड़ सकती हूँ । तो मुझे पसंद नहीं है कि लोग पहले ही दिन से तलाक की बात करें किन्तु यदि वास्तव में कोई समस्या है तो ठीक है-सहज योग में हमने तलाक की अनुमति दी है । ऐसे नहीं, कहिए, कैथोलिक चर्च, वे तलाक की अनुमति नहीं देते है । इसलिए पुरुषों के हर तरह के रिश्ते होते हैं और महिलाओं के हर तरह के रिश्ते होते हैं। यह वहाँ नहीं है । इस तरह की निरर्थकता करने के बजाय आप तलाक ले सकते हैं। किन्तु यह बहुत अबोध घटना होनी चाहिए । कि यदि आप एक व्यक्ति को तलाक दे रहे हैं क्योंकि आपकी अबोधिता को चुनौती दी गई है, तो यह ठीक है । वहाँ, मैं आपसे सहमत हूँ कि आपको ले लेना चाहिए ।

इसलिए अपनी अबोधिता को बचाए रखें। इन आधुनिक समय में, अपनी अबोधिता को बचाए रखना बहुत महत्वपूर्ण है, कि श्री गणेश आपके भीतर जागृत होने चाहिए, और अन्य लोगों में भी । वही इस विश्व को बचाएगा । और कुछ नहीं, किन्तु आपके पास जो अबोधिता है, वह विश्व को बचाएगी । आप जो भी जानते हों, आप जो भी कहें, आप जो भी लिखें, कृपया देखें कि आप अपने भीतर की अबोधिता को चोट नहीं पहुँचा रहे हैं । 

यह आवश्यक नहीं है नैतिकता का जीवन व्यतीत करना, ये, वो । जो आवश्यक है, वह है आपकी अबोधिता। अबोधिता ही आपको नैतिक शक्ति देती है, नैतिक समझ । इसके लिए आपको किताबें पढ़नी नहीं पड़तीं, इसके लिए आपको किसी गुरु के पास नहीं जाना पड़ता। अबोधिता आपका मार्गदर्शन करेगी और आपको बताएगी कि, ” यह वही है जो सहज है, यह आपके पास होना ही चाहिए”।

आप सभी को आत्म साक्षत्कार प्राप्त हो गया है । यह एक बहुत बड़ी बात है, जो कि इतने सारे लोगों के साथ हुई है । और मैं हमेशा चाहती हूँ कि आप श्री गणेश की पूजा करें अपने भीतर । श्री गणेश आपकी अबोधिता हैं, यह आत्मा है आपके भीतर । जब आप अपनी आत्मा को जानना चाहते हैं, तो वह श्री गणेश हैं, जिनसे आप एक हो जाते हैं, एक हो जाते हैं श्री गणेश के साथ। यह आपके भीतर है, और यह पूर्णतया संभव है आप सभी के लिए पूरी तरह से प्रबुद्ध होना श्री गणेश की शक्ति से ।

मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि आप ने सभी विवाह स्वीकार कर लिए हैं और आपने विवाह करने का निश्चय किया है। किन्तु, अब भी, यदि आप नहीं कहते हैं, तो इसे समाप्त करना अच्छा है। किन्तु कोई चालाकी करने का प्रयत्न मत कीजिए और अजीब होने का प्रयत्न मत कीजिए क्योंकि यह आपकी किसी भी तरह से सहायता नहीं करेगा अपने विवाह का आनंद लेने के लिए । पहले ही दिन से, यह समझने का प्रयत्न करें कि आपको बहुत दयालु होना होगा, दयालु अपने साथी के प्रति; बहुत सम्मान पूर्ण, बहुत ध्यान रखने वाला, बहुत प्रेममय। यह बहुत महत्वपूर्ण बात है, जो लोगों को समझ में नहीं आती है । और कम महत्त्व मत देना । क्योंकि यह एक सहज विवाह है लोग इसे कम महत्त्व देते हैं । नहीं, इसे कभी कम महत्त्व मत देना । यदि आप वास्तविक आनन्द चाहते हैं तो आप के बीच अबोध प्रेम होना चाहिए और स्वयं का आनंद लें।

आप सबको परमात्मा का अनंत आशीर्वाद।

धन्यवाद