Shri Krishna Puja

पुणे (भारत)

2003-08-10 Krishna Puja Talk, Pratisthana, India, 34' Download subtitles: ENView subtitles: Add subtitles:
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Shri Krishna Puja (Hindi). Pune (India), 9 August 2003.

ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK Scanned from Hindi Chaitanya Lahari हम लोगों को अब यह सोचना है कि सहजयोग तो ऐसा गुण है कि हम बालक बन जाते हैं। बालक बहुत फैल गया और किनारे किनारे पर भी लोग यानि अबोधिता, भोलापन और उस भोलेपन से हमें सहजयोग को बहुत मानते हैं। लेकिन जब तक अपने अन्दर देखना चाहिए और उसी से अपने को ढकना है। अब वो भोलापन बड़ा प्यारा होता है। से प्रकटित नहीं होगा तब तक जैसा लोग सहजयोग आप अगर, आप बच्चों को देखें उनसे जो प्यार को मानते हैं मानेगें नहीं। इसलिए ज़रूरत है कि करते हैं वो इसलिए कि वो भोले हैं । वो चालाकी हम कोशिश करें कि अपने अन्दर झांकें। यही क ष्ण नहीं जानते, अपना महत्व नहीं जानते, कुछ भी नहीं का चरित्र है कि हम अपने अन्दर झांके और देखें जानते। क्या जानते हैं? वो जानते यह हैं कि सब कि हमारे अन्दर खुद कौन सी, कौन सी ऐसी चीजे कोई लोग हमारे हैं। ये हमारे भाई बहन और सब हैं जो हमें दुविधा में डाल देती हैं। इसका पता कुछ हैं। लेकिन ये किस तरह से उन्होंने जाना, यह लगाना चाहिए। हमें अपने तरफ देखना चाहिए. प्रश्न है बच्चों ने जिस तरह से जाना उसी तरह से अपने अन्दर देखना चाहिए और वो कोई कठिन हमने भी भुला दिया कि हम भी एक भोले बालक हैं बात नहीं है जब हम अपनी शक्ल देखना चाहते और एक भोलापन हमारे अन्दर है । बहुत से सहजयोगी हैं तो हम शीशे में देखते हैं। उसी प्रकार जब हमें ऐसे हैं जो आते हैं वो बहुत कपट चालाकी दिखाने। अपनी आत्मा के दर्शन करने होते हैं तो हमें देखना कोई आते हैं और सोचते हैं कि हम बहुत होशियार चाहिए कि हमारे अन्दर वो कैसे देखा जाता है । हैं । कोई आते हैं और सोचते है कि हम माँ को सिद्ध बहुत से सहजयोगियों ने कहा माँ यह कैसे देखा कर देंगे मुझे सिद्ध करने से क्या फायदा। मुझे तो जाएगा कि हमारे अन्दर क्या है, और हम कैसे हैं? मालूम ही है सब कुछ। तो आपको यह करना उसके लिए ज़रूरी है कि मनुष्य पहले स्वयं ही चाहिए कि अपनी ओर नज़र करें। और अपने भोलेपन को पहचानें। वो कहाँ है, कैसा है, और बड़ा मजेदार है ऐसा सोचना चाहिए अब क ष्ण की जो बात है वो यही है कि बचपन में तो बो एकदम भोले हमारे अन्दर सहजयोग पूरी तरह से व्यवस्थित रूप | बहुत नम्र हो जाए क्योंकि अगर आपमें नम्रता नहीं होगी तो आप अपने ही विचार लेकर बैठे रहेंगे। तो क ष्ण के जीवन में पहले दिखाया गया कि एक छोटे लड़के के जैसे वो थे बिलकुल जैसा शिशु होता थे और बड़े होने पर उन्होंने गीता समझाई जो बहुत है, बिलकुल ही अज्ञानी, वैसे वो थे । वो अपने गहन है । ये कैसे हुआ कि मनुष्य उसमें बढ़ गया। को कुछ समझते नहीं थे अपनी माँ के सहारे वो इसी प्रकार हम भी सहज में बढ़ सकते हैं। बढ़ना चाहते थे। इसी प्रकार आप लोगों को भी अपने अन्दर देखते वक्त यह सोचना चाहिए कि बढ़े नहीं। और बढ़ने के लिए चाहिए कि अपने बारे हमने पाया है लेकिन उसमें अभी तक हम हम एक शिशु बालक है। क ष्ण ने बार बार कहा, में जो ख्यालात हैं उसको छोड़ दें। पहले तो बच्चे लेकिन जीसस क्राइसट ने भी कहा हम एक छोटे जैसा स्वभाव होना चाहिए। अब ऐसा किसी को कहें बालक बनें। बालक की जो सुबोध स्वभाव की कि बच्चे जैसा स्वभाव बुनाओ तो बहुत ही कठिन छाया है वो हमको दिखनी चाहिए कि हम क्या बालक जैसी बाते करते हैं? हमारे अन्दर कौन सा छोड़ कर आप बच्चे बन जाओ । लेकिन बच्चों के बात है। ऐसा तो नहीं कर सकते कि जो है उसे ন

Original Transcript : Hindi साथ रहकर, बच्चों के प्रति एक आस्था रखकर, में बहते नहीं है। हम अपने को उससे अलग समझते उनकी बातों को देखकर आप बहुत फर्क कर हैं पर ऐसी बात नहीं है। अगर हम समझ लें कि सकते हैं, और बदल सकते हैं सारी चीजें अपने हमारे अन्दर जो यह प्रवाह है, जो हमें ऐसे रास्ते पर अन्दर की तो सबसे पहले तो जानना चाहिए कि ले जाता है कि जहां हम अपने ही को नहीं पहचान हमारे अन्दर जैसे जैसे हम बड़े होने लगे बहुत से सकते तो फिर आदमी अन्दर की तरफ मुड़ सकता दोष समा गए हैं। उन दोषों को कैसे निकालना है अब कहने से कि तुम अन्दर की तरफ जाओ, चाहिए? कैसे-कैसे दोष हमारे अन्दर आए हैं । ध्यान करो, अपने अन्दर की बहुत सी बातें निकालो, इसको अगर हम सोचे नहीं और उधर ध्यान दें तो सब कहने को तो कह देंगे पर उससे नहीं होगा। हम उसको ठीक कर सकते हैं। ध्यान ऐसे देना कि जैसे हम किसी से जोर, घ ष्टता से बात करें या और हमारे पास ऐसे साधन हैं जैसे क ष्ण का ध्यान हम किसी की ताड़ना करना चाहते हैं या हम करना। क ष्ण के ध्यान से हमारे अन्दर की सफाई सोचते रहते हैं कि दूसरे आदमी को हम कैसे ठीक हो जाती है । पर हम उल्टे हैं और क ष्ण के ध्यान करें। जब हमारा चित्त दूसरों पर जाता है तभी में हम यह सोचते हैं कि हम दूसरों के दोष देखते हम अपने से अलग हट जाते हैं। क्योंकि हमें ठीक होना है इसलिए दूसरों के बारे में सोचने से देता है पर हमें अपना दोष नहीं दिखाई देता। यह क्या फायदा? तो सबसे पहले हमें अपने बारे में ही हमारे साथ बहुत ज्यादती है कि हम अपने दोष नहीं द ष्टिपात करना चाहिए, देखना चाहिए। पर वो सब देख सकते। क ष्ण के दोष तो देख लेंगे बहुत से हो रहा है और वो बताया हमने। वो तो सहजयोगियों लोग हैं, मैंने देखा है कि किताबें लिखी हैं उन्होंने में घटित भी हो रहा है। क्योंकि अन्दर यह कुण्डलिनी कि क ष्ण में क्या क्या दोष थे क्या गलत कार्य जाग त होती है और वो सब रास्तों में दिखा देती है। किए? उनको कैसे रहना चाहिए था? अपने बारे में अब रही बात यह कि हम किस तरह से जो वो नहीं जानते लेकिन जब अपने बारे में भी सोचते मलिनता है उसको ठीक करे। पहली तो बात यह हैं और जब देखा जाता है, तो कभी भी यह द.ष्टि है कि दूसरों के दोष देखने की जो हमारी द ष्टि है नहीं होती कि हमारे अन्दर यह दोष है और यह उसको बदल दें, क्योंकि वही दोष हमारे अन्दर भी चला जाना चाहिए। तो हम दूसरों के दोषों पर हैं। तो दूसरों के दोष देखने से पहले हमारे अन्दर जाकर अटक जाते हैं। यही हमको करना है कि क्या दोष हैं यह देखना चाहिए। अगर यह देखना अपने अन्दर क्या दोष है उसे देखा जाए। क ष्ण से है इसलिए प्यार करने में प्रयत्नशील रहना चाहिए। खुद हैं। जब हम क ष्ण का दोष देखते है तो हमें दिखाई 1. हमें आ जाए तो बहुत कुछ अपने आप ठीक हो बढ़कर मैं कोई योगी मानती नहीं हूँ क्योंकि उन्होंने जाएगा। कोई साधु सन्तों का क्या है कि वो यह रास्ता बताया कि तुम अपने अन्दर की गलतियाँ अपने अन्दर के ही दोष देखते हैं और अपने ही को देखो। अपने अन्दर के दोष देखो। यह बहुत बड़ी सोचते हैं कि ऐसे क्यों हो गए हम? ऐसी कड़वी बात है। उन्होंने सिर्फ कह दिया और करने वाले बात हम क्यों कहते है। ऐसी झूठी बात क्यों कहते बहुत कम हैं। अगर दूसरों के दोष देख लीजिए तो हैं? तो ये अपने को देखने का एक प्रवाह है। सबको याद है। सबको मालूम है। अपने दोष बहुत ज्यादातर हम उसको मानते नहीं हैं और उस प्रवाह कम लोगों को समझ में आते हैं। इसलिए वो ठीक 3 श्ी

Original Transcript : Hindi नहीं हो पाते। अपने दोषों से परिचित होना चाहिए। घटित नहीं होता उसकी क्या वजह है? क्यों हम हंसना चाहिए अपने ऊपर कि हम क्या दोष कर रहे अपने को नहीं देख पाते? बीच में पर्दा क्या है? पर्दा है हमारे अन्दर क्या दोष है । ये हमे सोचना यही कि अहंकार आदि जो दुर्गण है वो खड़े हो चाहिए। बजाय इसके कि हम और लोगों के दोष जाते हैं और उन दोषों को हम देख नहीं पाते। जिनको देखना चाहिए। यह बहुत ज़रूरी चीज़ है। तो होता क्या है कि चित्त हमारे ऊपर नहीं आपने आज की पूजा रखी, मैं बहुत खुश हो गई कि रहता। दूसरों’ के दोषों पर जाता है और उससे क ष्ण की पूजा हो जाएगी तो अन्दर से बहुत से विचलित हो जाते हैं हम लोग और समझ नहीं पाते लोग साफ हो जाएंगे। क्योंकि यह क ष्ण का कार्य कि अरे ये तो हमारे ही दोष थे। हम क्यों दूसरों के है। वो खुद ही इसे करेंगे। पर अगर आप उधर दोष देख रहे थे। उससे क्या हमारे दोष ठीक हो रुचि दिखाएं कि आप चाहते हैं कि आपकी पूरी जाएंगे? बिलकुल नहीं हो सकते। धीरे धीरे जब तरह से सफाई हो जाए। आप जानते नहीं कि म देखें । 1 T।थ यह बात समझ में आ जाएगी तो मनुष्य दूसरों के कितना गहन हमारे यहाँ का यह प्रश्न है। इस प्रश्न दोषों पर लक्षित नहीं होगा। अपने ही दोषों को को ठीक करने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ी । देखकर हैरान होगा कि हमने कितने सारे ये राक्षस लोग पहले तो सब कुछ करते थे, गुरु के आदेशों पाल रखे है अपने अन्दर। हमारे मन के अन्दर कितनी कितनी मन्दी बातें हम सोचते रहते हैं। जब यह सफाई शुरु होती है तो धारण करता है। और वह रूप ये है कि उसके अपने अन्दर झाँकना सीखिये । बड़ा मजा आएगा। पर बहुत कुछ करते थे बेचारे, पर गहनता नहीं आती थी अब आप तो सहजयोगी हैं आपके लिए मनुष्य विशेष रूप मुश्किल नहीं होनी चाहिए। तो मैं यही कहूंगी कि 1 अन्दर शव्तियों आ जाती है और उस शक्ति से वह अभी तक तो ठीक थे पर अभी पता नहीं क्यों इस अनेक कार्य कर सकता है। इसलिए नहीं कि तरह से करने लग गए। आप अपनी तरफ नज़र उसका अहंकार बढ़े पर इसलिए कि उसकी सफाई करिये। ये कैसा चलता है मामला । तो बड़ा मज़ा । अगर उससे सफाई हो गयी तो अपनी आएगा आप देखकर हसेंगे और कहेंगे वाह क्या होगी सफाई का काम हो गया। तो दोष देखने से हम कहने। फिर एक तरह का भोलापन आपके अन्दर अपनी सफाई करते हैं और उन दोषों को छोड़ देते जागेगा यही कष्ण की बाल लीला है। जब यह हैं। पर ग्रह कैसे हो, क्योंकि दोष देखना तो भोलेपन से आप साफ होंगे इसी से नहा लेंगे तो मुश्किल नहीं है, पर उससे छूटना मुश्कल है । आपकी नजर बहुत Steady हो जाएगी। अपने आप इसलिए उसका देखना जो है वो सूक्ष्म होना चाहिए अपने को आप समझने लगेंगे असल में दोष हमारे और चारीक होना चाहिए और उस तरफ नजर ही अन्दर हैं। दूसरों के दोष देखने से हमारे कैसे जानी चाहिए। उससे बहुत कुछ सफाई हो जाएगी। ठीक होंगे? एक सादा सा प्रश्न है-अगर हमारी आज का जो पर्व है उसमें श्री है वह यह है कि आप अपने अन्दर झाँको । और और दूसरों को बुरा कहते चले जाएंगे तो इतनी देखो। यह श्री क छ ने कहा है। पर चो करना अकल तो है हमारे पास। पर वो अकल हम इस्तेमाल लोगों को मुश्किल लगता है। वो होता नहीं है। नहीं करते। किसी को समझ में अगर बात न आई क का जो संदेश साड़ी पर कुछ गिरा है कि और हम इसे हटाते नहीं 4

Original Transcript : Hindi ह क पीड हो तो वो प्रश्न पूछ सकते हैं। चित्त अन्दर जाता है। अब देखिए अपना रहा है? धीरे-धीरे आपकी सफाई हो जाएगी। आज चित्त जा रहा है अन्दर, पर हम डरते ही रहते हैं। का दिन बैसे ही बडा सहत्वपूर्ण है कि श्री के ्ण का पर अब अपने आप होना चाहिए। चित्त को आदत अवतार जो है इसने बहुत हमारी सफाई की है और हो जाएगी कि वो आप अन्दर जाएगा । में जानती हूँ कि आप लोगों के खूब प्रश्न है। और कुण्डलिनी के जागरण में मैं देखती हैं हैं, खुब उलझने हैं इसमें कोई शक नहीं। लेकिन वो क प्ण के आशीर्वाद से बहुत सुन्दर चल रहा है । कि आपका दिमाग कहाँ चल रहा है? अब कहाँ घूम बड़ी मदद की है। उनके आने से फर्क हो गया बहुत है, उसका कोई अर्थ नहीं लगता। उससे आप लोग जरा अपनी और ध्यान दें। एक तो अपने बहुत क्षुद्र उपर उठने की बात होती है हमेशा, पर लोग कहते से नाराज नहीं होना और दूसरों से नाराज़ नहीं है कि माँ कैसे उठा जाए। ध्यान से। ध्यान में आप होना। बड़ा आनन्द आएगा यही क ष्ण की पूजा अपने ऊपर ध्यान करते हैं । अपने ही को देखना है है। 5