How We Should Behave (two talks) पुणे (भारत)

1989-12-27 India Tour – How We Should Behave FIRST SPEECH It was very interesting I was thinking about you all and about the people who have done so much for Sahaja Yoga. It is impossible really to say how many have worked for Sahaja Yoga with such interest and dedication. And this dedication is directed by divine force that’s why I think you people are not even aware how much you have worked so hard without getting any material gain out of it. And the joy has no value. We cannot evaluate in any human terminology nor can we describe it as to how we feel the joy of oneness together. This togetherness is very much felt in Ganapatipule. I see the leaders from all over the world have become great friends – there’s no jealousy, there’s no quarrelling, there’s no fighting, there’s no domination, there’s no shouting, nothing. Such beautiful brothers and sisters such a beautiful family we have created out of this beautiful universe. Now we have to maintain the beauty individually and collectively. Some people think that individually if you do something that is alright, but if it is not related to the collective it cannot be sahaj. Anything that you do has to be related to the collective. Now to be individualistic is a trend in the modern times and in that how far we have gone into nonsense that we know very well. Individuality is a personality within yourself which has to be of different Read More …

The International Situation (Location Unknown)

                                        अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति  1989-0901 [एक सहज योगी के अनुरोध के जवाब में दी गई वार्ता। स्थान अज्ञात। संभवतः यूके] हमारे ग्रह, या धरती माता की स्थिति बहुत ही नाज़ुक है। एक तरफ हम इंसानों के हाथों महान विनाश के संकेत देखते हैं और इसलिए ये हमारा खुद का कृत्य हैं। विनाश का प्रबल प्रभावशील विचार मनुष्य के अंदर काम कर रहा है, लेकिन यह विनाश बाहर पैदा करता है। जरूरी नहीं की यह विनाशशीलता जानबूझकर है, लेकिन अंधी और बेकाबू है। इसी अंधेपन और अज्ञानता को ज्ञान प्रकाशित कर दूर करना है। भारत के प्राचीन पुराणों के अनुसार यह आधुनिक समय निश्चित रूप से कलियुग के काले दिन हैं जो बड़े पैमाने पर आत्म-साक्षात्कार या आत्मज्ञान का युग भी हैं। लेकिन, हमारे पास अभी भी हमारे अतीत या हमारे इतिहास की कई समस्याएं हैं जिन्हें पहले ही सुलझाना होगा। इनका अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति पर प्रभाव पड़ता है, तो पहले देखते हैं कि किस समस्या या किन समस्याओं का समाधान करना है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में, हाल के वर्षों में कई मूलभूत समस्याएं रही हैं। विश्व युद्ध के बाद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक विकास साम्यवाद और लोकतांत्रिक विचार के बीच संघर्ष रहा है। इन राजनीतिक विचारों के स्वरुप और सरकार के बीच एक मौलिक दरार थी, और इसके परिणामस्वरूप पूर्व और पश्चिम के बीच लगातार तनाव बना रहा। यह मानवता के भविष्य के लिए हमारे समय के बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक बन गया। हाल के वर्षों में, हालांकि, एक बड़ा बदलाव शुरू हुआ, सबसे पहले चीन में श्री डेंग (देंग जियानपिंग) Read More …

Advice for Effortless Meditation London (England)

         निष्क्रिय ध्यान के लिए सलाह लंदन (यूके), 1 जनवरी 1980। जीवन में उसी तरह से चैतन्य, वायब्रेशन आ रहे हैं, वे प्रसारित हैं। आपको जो करना है, वह खुद को उसके सामने खुला छोड़ देना है। सबसे अच्छा तरीका है की कोई प्रयास नहीं करें। आपको क्या समस्या है इस पर चिंता न करें। जैसे, ध्यान के दौरान कई लोग, मैंने देखा है कि अगर उन्हें कहीं रुकावट हैं तो वे उसकी देखभाल करते रहते हैं। आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है। आप बस इसे होने दें और यह अपने आप काम करेगा। यह बहुत आसान है।इसलिए आपको कोई भी प्रयास नहीं लगाना पड़ेगा। यही ध्यान है। ध्यान का अर्थ है स्वयं को ईश्वर की कृपा के सामने उघाड़ देना । अब कृपा ही जानती है कि तुम्हें कैसे ठीक करना है। यह जानता है कि आपको किस तरह से सुधारना है, कैसे स्वयं को तुम्हारे अस्तित्व में बसाना है, आपकी आत्मा को चमकाना है। यह सब कुछ जानता है। इसलिए आपको चिंता करने की ज़रूरत नहीं है कि आपको क्या करना है या आपको क्या नाम लेना है, आपको कौन से मंत्र करने हैं। ध्यान में आपको बिल्कुल प्रयास रहित होना है, खुद को पूरी तरह से उजागर करना है और आपको उस समय बिल्कुल निर्विचार होना है। माना की कोई संभावना है, आप शायद निर्विचार नहीं भी हो पायें। उस समय आपको केवल अपने विचारों को देखना है, लेकिन उनमें शामिल न हों। आप पाएंगे की जैसे क्रमशः सूर्य उदय होता है, अंधेरा दूर हो जाता है Read More …

Nabhi Chakra London (England)

                                                      नाभी चक्र  लंदन 1978-02-20 जिस तरह से इसे हमारे भीतर रखा गया है. नाभी चक्र के भी दो पहलू हैं- बायां और दायां। नाभी चक्र के बायीं ओर एक केंद्र के रूप में स्थित है या आप इसे चक्र या उप-चक्र कहते हैं जिसे चंद्र का अर्थात चंद्रमा कहा जाता है। बायीं ओर चंद्र केंद्र और दाहिनी ओर सूर्य केंद्र है और वे बिल्कुल चंद्र रेखा और सूर्य रेखा यानी पहले इड़ा और पिंगला पर स्थित हैं। ये दो केंद्र वे दो बिंदु हैं जिन तक हम जा सकते हैं और बाएं से दाएं जा सकते हैं। उससे आगे जब हम जाने लगते हैं तो आप हदें पार कर जाते हैं. अब ये दोनों केंद्र जब स्थानीयकृत होते हैं, तो देखिए कि उनमें ऊर्ध्वाधर स्पंदन प्रवाहित होते हैं, लेकिन जब वे उस बिंदु पर स्थानीयकृत होते हैं तो हम उन्हें कैसे बिगाड़ देते हैं। हमें समझना होगा. बायीं नाभी और दाहिनी नाभी एक दूसरे पर निर्भर हैं। यदि आप बायीं नाभी से बहुत अधिक खींचते हैं या बायीं नाभी पर बहुत अधिक काम करते हैं तो दाहिनी नाभी भी पकड़ सकती है। लेकिन कहते हैं हम एक-एक करके लेंगे. अब बाईं नाभी पकड़ी गई है, आम तौर पर यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति के घर पर खाना खाते हैं जो किसी एक प्रकार का अध्यात्मवादी है या जो सत्य साईं बाबा की तरह  प्रसाद दे रहा है, यह भयानक व्यक्ति है, उसकी वे विभूतियाँ हैं जैसा कि वे इसे कहते हैं क्योंकि यह श्मशान से आती है देखिये, उस राख Read More …

Deeper Meditation London (England)

                                               “गहन ध्यान”  लंदन, 20 फरवरी 1978 कुली (टोनी पानियोटौ) क्या आपने इसे लिखा है? श्री माताजी: नमस्ते, आप कैसे हैं? योगी: बहुत अच्छा, धन्यवाद। श्री माताजी: परमात्मा आप को आशिर्वादित करें ! आप कुर्सी पर बैठ सकते हैं। आराम से रहो। योगी: ओह, यह आप की बहुत कृपा है! श्री माताजी: कुली से कहो कि वह स्वयं के लिए लिख ले। योगी: वह कर रहा है। नमस्कार! डगलस आप कैसे हैं? क्या हाल है? डगलस फ्राई: बहुत अच्छा! श्री माताजी: बहुत बढ़िया लग रही है! एक फूल की तरह सुंदर! देखो, मेरे पास कितने सुंदर बच्चे हैं, बिलकुल यहाँ फूलों की इन पंखुड़ियों की तरह। क्या आप थोड़ी देर के लिए एक खिड़की खोल सकते हैं। बस पांच मिनट के लिए खिड़की खोलें। आराम से बैठो। इस तरह सहज रहें। मेरा मतलब। हां, बहुत सहज रहें। एक को बहुत, बहुत सहज, बहुत सहज होना पड़ता है। मुझे मिलने से पहले ही उसे यह प्राप्त हो गया था ! क्योंकि इससे पता चलता है कि यह हवा में लहरा रहा है। आज मैं आपको आगे के ध्यान के बारे में बताना चाहती हूं कि: हमें कैसे बढना है और कैसे खुद को समझना है। आप देखिए अभी तक चीज़ों से व्यवहार करने की आप की आदतें अथवा तौर-तरीके रहे हैं : जिस भी तरह से आपने अपनी सांसारिक,व्यक्तिगत, भौतिक और, शरीर की समस्याओं निपटा है, लेकिन अब जैसे ही आपने परमात्मा के राज्य में प्रवेश किया है और ईश्वर की शक्ति आपके माध्यम से बह रही है, आपको पता होना चाहिए Read More …

Atma Ki Anubhuti मुंबई (भारत)

Atma Ki Anubhuti, 28th December 1977 [Hindi Transcription]  ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK आपसे पिछली मर्तबा मैंने बताया था, कि आत्मा क्या चीज़ है, वो किस प्रकार सच्चिदानंद होती है, और किस प्रकार आत्मा की अनुभूति के बाद ही मनुष्य इन तीनों चीज़ों को प्राप्त होता है। आत्मसाक्षात्कार के बगैर आप सत्य को नहीं जान सकते। आप आनन्द को नहीं पा सकते। आत्मा की अनुभूति होना बहुत जरूरी है। अब आप आत्मा से बातचीत कर सकते हैं। आत्मा से पूछ सकते हैं। आप लोग अभी बैठे हुए हैं, आप पूछे, ऐसे हाथ कर के कि संसार में क्या परमात्मा है? क्या उन्ही की सत्ता चलती है? आप ऐसे प्रश्न अपने मन में पूछे। ऐसे हाथ कर के। देखिये हाथ में कितने जोर से प्रवाह शुरू हो गया। कोई सा भी सत्य आप जान नहीं सकते जब तक आपने अपनी आत्मा की अनुभूति नहीं ली। माने जब तक आपका उससे संबंध नहीं हुआ। आत्मा से संबंध होना सहजयोग से बहुत आसानी से होता है। किसी किसी को थोड़ी देर के लिये होता है। किसी किसी को हमेशा के लिये होता है। आत्मा से संबंध होने के बाद हम को उससे तादात्म्य पाना होता है। माने ये कि आपने मुझे जाना, ठीक है, आपने मुझे पहचाना ठीक है, लेकिन मैं आप नहीं हो गयी हूँ। आपको मैं देख रही हूँ और मुझे आप देख रहे हैं। इस वक्त मैं आपकी दृष्टि से देख सकूँ, उसी वक्त तादात्म्य हो गया। आत्मा के अन्दर प्रवेश कर के वहाँ से आप जब संसार पे दृष्टि डालते Read More …