Interview (Holland)

मुलाकात – हिंदुस्तान टिव्ही स्टेशन, वरिक्स्त्रात आश्रम, अॅमस्टरडॅम, हॉलंड ३१.७.१९९४ प्रश्नकर्ता :- श्री माताजी, आप छोटे रुपमें अपना परिचय दे सकती है ? श्री माताजी :- परिचय ऐसे की, शालिवाहन का जो खानदान था, उस खानदान के हम है| हमारे पिता और माता दोनोही गांधीजीके परमभक्त थे| और हमारे पिता अपनी कोंन्स्टीटयुएन्ट असेम्बली और उसके बाद पार्लमेंट वगैरा सबके मेम्बर थे| माता भी हमारी ऑनर्स मैथमेटिक्स में थी| और हमारे एक भाई साहब जो है वो अपने कॅबिनेट के मिनिस्टर भी है| लेकिन असल में अध्यात्मिक रूपसे हमारे माता पिता हमें पहचानते थे, की हममें कोई विशेष बात है| और हमारा विवाह हो गया, एक तो हम मेडिकल कॉलेज में पढ़ते थे, लाहोर में, और लाहोर में गड़बड़ी शुरू हो गयी| तो हमारा विवाह हो गया और जिनसे विवाह हुआ वो भी एक बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति है, उनका नाम है डॉ. सी.पि.श्रीवास्तव| बादमे वो जाकरके लंडनमें स्थित एक यु.एन.का, यु.एन.की एक संस्था है जिसको की आय.एम्.ओ. कहते है, ‘इण्टरनॅशनल मेरीटाइम ऑर्गनाइजेशन’ उसके सेक्रेटरी जनरल चुने गये| १३४ नेशन्सने उनको चुना है| वो हमारे पति है| और फिर उन्होंने रिटायरमेंट ले ली| हमारे दो बच्चे है और एक लड़की जो है उसका बिहार में विवाह हुआ है, वो राजेन्द्र बाबुके रिश्तेदार है| प्रश्नकर्ता :- अच्छा| ज्यादातर हम देखते है की, भारतसे आते है योगी, महर्षि लोग, ज्यादातर ये पुरुष है| आप अकेली एक महिला है, आप इस बातको विशेष देखते है भी? श्रीमाताजी :- हां, क्यों की यह कार्य महिला ही कर सकती है| पुरुषोंके बसका नहीं| श्रीराम आये तो वनवास Read More …

Ardha Matra Volume 5 two interviews or talks (भारत)

अर्धमात्रा वॉल्यूम ५ कथावाचक : अनादिकाल से मानव सत्य की खोज में पर्वतो की बर्फीली चोटियों से ले कर [unclear] कठिन परिश्रम करता रहा| भारत की पावन भूमि सत्य साधको की योगभूमि रही है| उन्होंने पाया की सारे ब्रह्माण्ड को चलने वाले अनगिनत शक्तियाँ एक परा शक्ति का अंश है, इस पराशक्ति को उन्होंने आदिशक्ति का नाम दिया |आदिशक्ति प्रभु के प्रेम की असीम शक्ति है जिसे मानव आपने जीवन में हर पल मह्सूस करता है|  प्रभु के प्रेम में आत्मविभोर होकर मानव प्रभु के प्रति पूर्णता समर्पित हो जाता है, प्रभु के साथ एकाकारिता को ही योग कहते है|  नचिकेता तथा मर्कंद्ये ने कठिन तप कर इस दिव्यज्ञान को बाल्यकाल में प्राप्त किया | योग की हर विधा पर दिया गया भगवान श्री कृष्ण का ज्ञान, आज भी मानव को सत्य की साधना को करने को प्रेरित करता है | मानव जिस आनन्द एवं शांति की खोज में लगा है वह सत्य उसे केवल तार्किक श्रद्धा से प्राप्त हो सकता है, इस बात से कदापि इंकार नही किया जा सकता कीपृथ्वी पर जितने भी अवतरण हुए, जितने भी धर्मं बने , पंथ बने, जितने भी संत-पीर हुए वे मात्र सात्विक श्रद्धा के आविष्कार थे| कर्म-कांड से परे, रिती-रिवाजों से हट कर एवं रुढियों से उठकर [unclear] जिस शक्ति की ओर संकेत करती है वह शक्ति केवल मानवता का प्रतीक है |  महाराष्ट्र के महान संत ज्ञानेश्वरजी ने ज्ञानेश्वरी का छ्ठे अध्याय में दिव्य ज्ञान को सरल एवं सुन्दर मराठी भाषा में व्याख्या कर के जन-जन तक पहुँचने का महान Read More …

ORF Radio Interview Meli Ashram, Vienna (Austria)

[English to Hindi translation]                                                     साक्षात्कार श्री माताजी ने अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में बात की  वियना (ऑस्ट्रिया), 9 जुलाई 1986 रिपोर्टर: क्या हम आपके बचपन से शुरुआत कर सकते हैं? श्री माताजी: हाँ। रिपोर्टर: क्या आप उन परिस्थितियों का थोड़ा-बहुत वर्णन कर सकते हैं जहां आप बड़ी हुईं ? श्री माताजी: मेरा परिवार? रिपोर्टर : हां। श्री माताजी : मैं बहुत प्रबुद्ध लोगों के परिवार से हूँ। मेरे पिता एक भाषाविद् थे और वे चौदह भाषाओं में निपुण थे। वह छब्बीस भाषाओं के बारे में जानते थे और उन्होने कुरान-ए-शरीफ का भी हिंदी भाषा में अनुवाद किया। मेरी माँ उन दिनों गणित में ऑनर्स थीं। इसलिए दोनों ही बहुत पढ़े-लिखे और प्रबुद्ध लोग थे। मेरे जन्म के समय मेरी माँ ने कुछ ऐसा सपना देखा था जिसे वे समझा नहीं सकती थीं, लेकिन उसके बाद उन्हें खुले मैदान में जाकर एक बाघ देखने की बड़ी इच्छा हुई। मेरे पिता एक महान शिकारी थे, क्योंकि जिस क्षेत्र में हम रह रहे थे, वहां बाघ एक खतरा थे। यह छिंदवाड़ा नामक एक हिल स्टेशन था। तो एक राजा थे जो मेरे पिता में बहुत रुचि रखते थे। किसी न किसी तरह एक पत्र आया कि एक बाघ है, एक बहुत बड़ा बाघ है जो प्रकट हुआ है और वे उससे डरते हैं कि वह आदमखोर हो सकता है। सो मेरे पिता मेरी माता को उस स्थान पर ले गए। और वे बैठे थे जिसे हम मचान कहते हैं, जहां उन्होंने कुछ बनाया, ताकि लोग एक पेड़ के ऊपर बैठ सकें, जहां Read More …

Press Conference: The time has come to become the Spirit Vienna (Austria)

परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी, पत्रकार सम्मेलन, वियना, ऑस्ट्रिया, 7 जुलाई, 1986 सहज योगी: क्या समाचार पत्रों से आए लोग कृपया आगे आना चाहेंगे? आगे आ जाइए क्योंकि श्री माताजी से प्रश्न करना आसान रहेगा। श्री माताजी: हां, यह बेहतर होगा अगर आप आगे बैठें। ठीक है!  हम यहां हैं, आप सब अंग्रेजी भाषा जानते हैं, है ना, आप सब लोग जो यहां पत्रकार हैं? अंग्रेजी? ठीक है! हम यहां आप को एक शक्ति के बारे में सूचित करने आए हैं जो हमारे अंदर है। शक्ति जो आप को वो दे सकती है, जिसका आश्वासन सभी संतों, शास्त्रों और सभी अवतरणों ने दिया था।  आज जब आप हर देश में युवाओं को देखते हैं, विशेषकर परदेस में, तो आपको पता चलेगा कि वे अपने वातावरण और अपने जीवन से संतुष्ट नहीं हैं, और उन्हें लगता है कि किसी वस्तु की कमी है, और वह बहुत ही ज्यादा भ्रमित हैं। अब जब वो भ्रमित हैं, तो वे कुछ खोज रहे है, कुछ परे, कुछ जो उनके लिए अज्ञात है। इस खोज में वे किसी भी हद तक जा सकते हैं, मादक   पदार्थ, मदिरा का अत्यधिक सेवन हो सकता है, या कोई अन्य विकृतियां जिन के कारण भयानक रोग, असाध्य रोग होते हैं। उनकी भर्त्सना करने के बजाय हमें ये देखना होगा, कि वे ये सब हरकते क्यों कर रहे हैं! उनका उद्देश्य क्या है? उन में कुछ, कुछ गुरुओं के पास भी गए जो बाजार में हैं। विशेषकर जब वे धार्मिक लोगों और धर्मों को देखते हैं, वो विश्वास Read More …