New Year’s Day Talk before Havan (भारत)

                नववर्ष दिवस पर चर्चा, हवन से पहले   भारत, 1 जनवरी 1978 [कुछ लोग धीरे-धीरे भी आगे बढ़ रहे हैं।] सहज योगी: आसन [कुर्सी] की आवश्यकता है। श्री माताजी: आसन चाहिए? किसके पास है ? अब जरा उसके वायब्रेशन को देखिए, क्या आप ठीक हैं? वह बिलकुल ठीक है. राधा कृष्ण का नाम लो. हाँ, अभी ठीक है। ठीक है, चलो जिसे भी धोना है, जल्दी से धो लो, आराधना खड़ी है, थोड़ा नमक ले लो, वो पानी में नमक डाल देगी, तुम सीधे हाथ से ले लेना। श्री माताजी: आप इन सभी चीजों को एक साथ क्यों मिलाना चाहते हैं? सहज योगी: क्योंकि एक और भी है, माँ। [अस्पष्ट बातचीत] श्री माताजी: वास्तव में, लेकिन एक और समूह होना चाहिए | हमें कहना चाहिए  कि हमें शराब पीने के लिए पैसे की आवश्यकता क्यों है? पब जा रहे हैं? आप उसमें कटौती क्यों नहीं करते? मेरा मतलब है कि हड़ताल पर थोड़ा नियंत्रण है, [अस्पष्ट। एक सहज योगी कुछ समझा रहे हैं] श्री माताजी: लेकिन किसी को कुछ पकड़ना होगा, मैं जो कह रही हूं, आप एक चीज को पकड़ रहे हैं, एक उंगली उस तरफ नहीं जा रही है और दूसरी उस तरफ नहीं जा रही है, आप देखिए कि क्या आप विरोधाभास पर हैं [अस्पष्ट] का उपयोग किया जाना चाहिए इस तरह से, भले ही उंगलियां अलग-अलग हों, आप उसी चीज़ को पकड़ सकते हैं। और जब वे सभी एक साथ मिल जाती हैं तभी वे इसे पकड़ सकती हैं। लेकिन क्यों ना शराब पीना छोड़ दें, जो Read More …

You are to become Prophets, Guru Nanak’s Birthday Puja Temple of All Faiths, Hampstead (England)

                  “तुम्हें पैगंबर बनना है”  गुरु नानक जयंती पूजा   हैम्पस्टेड मंदिर, लंदन (यूके), २३ नवंबर १९८०। आज गुरु नानक के जन्मदिन का विशेष दिन है। हमने एक गुरु पूजा मनाई है और जैसा कि आप जानते हैं कि गुरु नानक भी आदि गुरु के अवतार थे। वही आत्मा इस पृथ्वी पर आई। और वह वही है जिसने मोहम्मद के काम को फिर से स्थापित करने की कोशिश की। मोहम्मद उसी आत्मा के अवतार थे – आदि गुरु। वह इस धरती पर धर्म की स्थापना के लिए आए थे। इस्लाम उस धर्म का नाम है, हर सहज योगी का, हर ईसाई का, हर हिंदू का धर्म है। हम सभी एक धर्म के हैं जो सामूहिकता की नई धारणा के प्रति हमारी जागरूकता का विस्तार करने में विश्वास करता है। मानव स्तर से उच्च स्तर तक जहां आप दिव्य शक्ति को अनुभव कर सकते हैं और अभिव्यक्त कर सकते हैं। यही वह धर्म है जिसका हम पालन कर रहे हैं। इस धरती पर सभी धर्मों की स्थापना साधकों को उत्पन्न करने के लिए हुई है। आप साधक हैं। आप “भगवान के व्यक्ति ” हैं। अब तुम सबको पैगंबर बनना है। और पैगंबर बनने के लिए आज का सहज योग महायोग का रूप ले चुका है। आप सभी को पैगंबर बनना है। पैगंबरों के पास दो विशेष गुण हैं, जैसा कि सभी पैगंबरों के पास थे: सबसे पहले, उन्हें आध्यात्मिक शिक्षा के बारे में बात करनी होगी। उन सभी ने ऐसा किया। मोहम्मद साहब ने किया, राजा जनक ने किया, नानक ने किया, मूसा Read More …

How To Know Where You Are Chelsham Road Ashram, London (England)

                      सलाह, कैसे पता करें कि आप कहां हैं       चेल्सीम रोड आश्रम, क्लैफम, लंदन (यूके) , 7 सितंबर 1980 … तस्वीरों के सम्मुख चैतन्य, जो की, बहुत महत्वपूर्ण है। जहां तक परमात्मा का संबंध है, कैसे जाने की आपकी स्थिति कहाँ है। यह मुख्य बात है, क्या ऐसा नहीं है? हम इसी के लिए यहां हैं: ईश्वर से एकाकारिता के लिए, उसकी शक्ति के साथ एकाकार  होने के लिए, उसका उपकरण बनने के लिए। , हमें इसे समझने की कोशिश करनी चाहिए की हमारे कनेक्शन कैसे ढीले हो जाते हैं, और हम इसे कैसे ठीक कर सकते हैं। सबसे पहले, हमें समझना चाहिए कि आपको इसके बारे में सोचना नहीं हैं। यदि आप इसके बारे में बहुत अधिक सोचने लगते हैं, तो आपने देखा है कि आप कुछ अजीब करते हैं जो आपको नहीं करना चाहिए था। इसके बारे में बहुत अधिक योजना न करें, क्योंकि, इस देश में, यदि लोग योजना बनाना शुरू करते हैं, तो वे सभी पूर्ण नियोजन कर लेंगे। उदाहरण के लिए, यदि उन्हें टहलने जाना होगा: तब फिर उनके पास उचित जूते होना चाहिए, उनके पास उचित छड़ें होनी चाहिए, उनके पास यह होना चाहिए, उनके पास वह होना चाहिए, और उनके पास दस्ताने होना चाहिए, और उनके पास सब कुछ होना चाहिए, और वे कभी बाहर नहीं जाएंगे ! योजना के साथ वे बहुत थक गए हैं। (हँसी) उसी तरह, यह सहज योग के साथ होता है। सहज योग के साथ भी ऐसा ही होता है, मैंने देखा है कि, यद्यपि मैंने आपसे Read More …

The Meaning of Puja Pamela Bromley’s house, Brighton (England)

                                              “पूजा का अर्थ”  ब्राइटन (इंग्लैंड), 19 जुलाई 1980। अब पूजा के लिए यह समझना होगा कि बिना आत्म-बोध के पूजा का कोई अर्थ नहीं है, क्योंकि आप अनन्य नहीं हैं। ऐसा है कि, आपको अपने पूरे के प्रति जागरूक होना होगा। कृष्ण द्वारा प्रतिपादित भक्ति का वर्णन है “अनन्य”। वे कहते हैं, “मैं तुम्हें अनन्य भक्ति दूंगा”, वे अनन्य भक्ति चाहते हैं, अर्थात जब दूसरा कोई नहीं हो, अर्थात जब हमें आत्मसाक्षात्कार हो जाता है।  अन्यथा वे कहते हैं “पुष्पम, फलम तोयुम” (भगवद गीता श्लोक 26) “एक फूल, एक फल और एक पानी: तुम जो कुछ भी मुझे देते हो, मैं स्वीकार करता हूं” लेकिन जब देने की बात आती है, तो वे कहते हैं, “तुम्हें मेरे पास अनन्य भक्ति से आना होगा,” जिसका अर्थ है: जब तुम मेरे साथ एक हो गए हो, ऐसी तुम्हें भक्ति करनी चाहिए, उससे पहले नहीं। इससे पहले, आप जुड़े नहीं हैं।  अब पूजा बाईं ओर का प्रक्षेपण है। यह दायें पक्ष की अति का निष्प्रभावीकरण है, । विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो बहुत दाहिने पक्ष वाले हैं, ऐसा वातावरण जो बहुत दाहिने पक्ष का है, पूजा उनके लिए आदर्श है। यह भक्ति है, भक्ति है… जो आप प्रोजेक्ट करते हैं। अब वास्तव में क्या होता है जब आप इस पूजा को प्रक्षेपित करते हैं?  यह पता चला है, और अब जैसा कि मैं आपको बता रही हूं कि पहले आपको अपने भीतर सोए हुए देवताओं को उनकी पूजा कर के जगाना होगा। लेकिन चूंकि ये देवता, मूल देवता, मेरे साथ Read More …

Guru Tattwa Caxton Hall, London (England)

कैक्सटन हॉल, लंदन (यूके), 23 जून 1980। सार्वजनिक कार्यक्रम (लघु) और सहज योगियों से बात यह एक तथ्य है। यह एक ऐसी चीज है जिसे आप देख सकते हैं। यह एक वास्तविकीकरण है। और हम अपनी कल्पनाओं में, अपने मतिभ्रम और पथभ्रष्टता में इस कदर खोए हुए हैं कि हम विश्वास नहीं कर सकते कि ईश्वर के बारे में कुछ तथ्यात्मक हो सकता है। लेकिन अगर ईश्वर एक तथ्य है, तो यह घटना भी हमारे भीतर होनी ही है, अन्यथा उसका कोई अस्तित्व नहीं है। अगर कोई नास्तिक है तो एक तरह से बेहतर है। क्योंकि उन्होंने आंखों पर पट्टी बांधकर कुछ भी स्वीकार नहीं किया है। लेकिन अगर किसी ने खुले दिमाग से ईश्वर को स्वीकार कर लिया है और किन्ही अटकलो का पालन नहीं किया है, तो यह और भी अच्छा है। लेकिन अगर आप इस तरह की किसी भी अट्कल का पालन करते हैं, कि भगवान होना चाहिए – कुछ लोगों ने मुझसे कहा, “हां मां। भगवान मेरी बहुत मदद करते हैं।” मैंने कहा, “सच में? वह आपकी कैसे मदद करता है?” तो वह महिला मुझसे कहती है “मैं सुबह उठी और मैंने भगवान से प्रार्थना की, ‘हे भगवान, मेरे बेटे की देखभाल करो!”, वह बस इतना ही सोच सकती थी! कि भगवान केवल उसके बेटे की देखभाल में व्यस्त हो, जैसे उनके पास और कोई काम नहीं है! “तो फिर क्या हुआ?” “तब मेरा बेटा हवाई जहाज से आ रहा था और विमान में कुछ परेशानी हुई, लेकिन वह बच गया। भगवान ने वहां मेरी मदद Read More …

Subtlety London (England)

                                                 “कुशाग्रता”  डॉलिस हिल आश्रम, लंदन (यूके), 8 जून 1980। यह केवल उन लोगों के लिए संभव है जिनके स्वभाव में,  इस खंडित दुनिया में सहज योग के मूल्य को समझने,  सहज योग के मूल्यों को धारण करने,  और इसे बनाए रखने के लिए कुशाग्रता हैं। दुनिया खंडित है और हर कोई अपने स्वयं के विनाश की ओर काम कर रहा है। लोग जिन सारे मूल्यों का अनुसरण करते हैं वे सतही मूल्य हैं। अधिकांश मूल्य बिल्कुल स्थूल हैं। तो सहज योग के लिए हमारे पास ऐसे लोग होना चाहिए हैं जो अपनी कुशाग्रता से न्याय करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे कुशाग्र लोग हमेशा सांसारिक भीड़ से थोड़ा अलग होते हैं; और ये लोग हमेशा अपने आप को इस तरह से व्यक्त करते हैं कि उनका अस्तित्व ही यह बताता है कि वे पूरी दुनिया को शक्ति प्रदान करने की कोशिश कर रहे हैं। आप ऐसा महसूस कर सकते हैं। जो लोग महसूस कर सकते हैं कि हमारे भीतर एक तत्व है जो हमें दूसरों की मूर्खता पर हँसाता है, ऐसे लोग जो शायद खुद की दृष्टी में बहुत गंभीरता से कुछ चीजों को करते लग रहे हों। लेकिन हमें ऐसा लगता है जैसे कि यह उनके जीवन को बर्बाद करने वाली मूर्खता है। ऐसी एक क्षमता अलग ही लोगों की होती है। पहले ये लोग, उनके अंदर ऐसी क्षमता और गतिशीलता रखने वाले, सहज योग में जमेंगे, न कि सामान्य सतही प्रकार के। लेकिन चूँकि हमारे दरवाजे सभी के लिए खुले हैं, क्योंकि कोई शुल्क या कुछ भी Read More …

Attention London (England)

                                    चित्त  डॉलिस हिल, लंदन (इंग्लैंड)  26 मई 1980  आज मैं आपसे चित्त के बारे में बात करने जा रही हूं: चित्त क्या है, चित्त की गतिविधि क्या है और हमारे चित्त के उत्थान की क्या विधि और तरीके हैं। इसे व्यापक तरीकों से रखें। ठीक है? लेकिन जब मैं ये सारी बातें कह रही हूं तो आपको पता होना चाहिए कि मैं आपसे व्यक्तिगत रूप से बात कर रही हूं – यह दूसरों के बारे में नहीं है। व्यक्ति हमेशा सबसे पहले ऐसा करता है, की जब मैं आपसे बात कर रही  होती हूं, तो आप यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि माताजी किस के बारे में बोल रही हैं! यह अपने चित्त को भटकाने का सबसे अच्छा तरीका है। यदि आप अपना चित्त स्वयं पर लगाऐ कि, “यह मेरे और मेरे लिए और केवल मेरे लिए है,” तो इसका प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि [ये मेरे शब्द] मंत्र हैं। परन्तु इस प्रकार इसे व्यर्थ कर दिया जाता है क्योंकि जो कुछ भी आपको दिया जाता है उसे आप उसे किसी दूसरे व्यक्ति पर डाल देते है। तो, आपके पास जो चित्त है,  वह वास्तविकता को जानने का एकमात्र तरीका है। आपका अपना चित्त महत्वपूर्ण है, न कि दूसरों का चित्त या दूसरों पर आपका चित्त! यह स्पष्ट रूप से समझा जाना चाहिए। यदि आप इस बात को समझ जाएँ कि पूरी चीज का उपभोग अपने चित्त के माध्यम से अपने उच्च अवस्था तक उत्थान के लिए आपके द्वारा किया जाना है,  तो, यह काम करेगा। अन्यथा, यह ऐसा हुआ Read More …

The Real Becoming, Seminar Old Arlesford Place, Arlesford (England)

                                               “वास्तविक बन जाना”  ओल्ड आर्लेसफोर्ड , नियर विनचेस्टर, हैम्पशायर, इंग्लैंड  18 मई, 1980 … इन सभी मिश्रणों के साथ, अब इसके बारे में सोचो। यह केवल इसलिए है क्योंकि मैंने तुम्हें जन्म दिया है। इससे पहले कोई नहीं कर सका था, मैं आपको बताती हूं। आप दूसरों का इलाज कर सकते हैं; आप सहज योग पर भाषण दे सकते हैं। आप अपनी समस्याओं को जान सकते हैं; आप अपने माता-पिता का इलाज कर सकते हैं। आप अपने खुद के परिवेश को ठीक कर सकते हैं। आप खुद को और दूसरों को साफ कर सकते हैं। केवल आत्मसाक्षात्कार के साथ यह शुरू होता है। यह सब एक साथ एक गठरी में है। यह पहली जागरूकता से जब यह केवल एक इच्छा मात्र थी से क्या छलांग है और यहां आपने सब कुछ शुरू किया। लेकिन ये सभी चीजें जो शुरुआत में जब आप इच्छुक थे, काफी मज़ेदार लग रही थीं,  आप में एक बहुत ही सूक्ष्म,सुंदर स्वरूप बना कर वे आप में आ जाती हैं। इस समय, आप अपने चक्रों, उनकी समस्याओं को महसूस करते हैं। आप फिर से उनका विश्लेषण करना शुरू करते हैं। पश्चिम में सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे विश्लेषण करना शुरू करते हैं। आप उन्हें एक केक देते हैं, वे इसका विश्लेषण करेंगे। उन्हें कुछ भी दें, वे इसका विश्लेषण करेंगे। उन्हें लगता है कि विश्लेषण सबसे बड़ी बात है और यह कि यह विश्लेषण व्यवसाय उनके लिए कितना दीवानापन है। यहाँ वे अपने आत्मसाक्षात्कार पर निर्भर हैं, दूसरी तरफ सब कुछ का विश्लेषण कर Read More …

Preparation for Becoming, Evening Seminar Old Arlesford Place, Arlesford (England)

                   बनने की तैयारी  ओल्ड आर्ल्सफोर्ड (इंग्लैंड) में शाम का सेमिनार,  17 मई 1980। बनने के लिए खुद का सामना करें। तब कुछ बनने की तैयारी की जाती है और समग्र रूप से, जब आप जानते हैं कि यह आपका अहंकार और प्रति-अहंकार है जो आप पर बोझ डाल रहा है, तो आपको उन्हें वाइब्रेशन की जागरूकता से जाँच लेना होगा। अब हमें दो तरह से चित्त देना होगा। पहले एक निरंतर चित्त है जो एक सहज योगी की दिनचर्या है, और दूसरा आपातकालीन चित्त है। मैं कहती रही हूं कि सभी सहज योगियों को अवश्य अपनी डायरी लिखना शुरू करना होगा: पहली, हर दिन के अनुभवों के साथ, यदि आप जानते हैं कि आपको एक डायरी लिखना है, तो आप अपने दिमाग को सतर्क रखेंगे, और दूसरी,जब भी आपको कोई विशेष विचार मिलेगा अतीत या भविष्य का, इसे भी संक्षेप में बताने के लिए। तो, इस तरह, आपके पास दो डायरी होनी चाहिए। अपने निरंतर चित्त के लिए, आपको कुछ निश्चित बिन्दुओं पर अपने दिमाग को स्थित करना होगा। पहला, जैसा कि मैंने कहा, कि अगर आप एक डायरी रखेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि आपको याद रखना है कि, क्या महत्वपूर्ण बातें हुई हैं। तो आपका चित्त सतर्क हो जाएगा और आप ऐसे बिंदुओं की तलाश में होंगे, जहां, जो चीज आप देख रहे हैं। और आप आश्चर्यचकित होंगे, यदि आप अपना चित्त सतर्क रखते हैं, तो कितनी नई चीजें आप तक आती हैं – बहुत ही शानदार सुझाव, और जीवन के चमत्कार और भगवान की सुंदरता और Read More …

What is a Sahaja Yogi, Morning Seminar Old Arlesford Place, Arlesford (England)

आपको पता होना चाहिए कि सहज योग एक जीवंत क्रिया है। ठीक उसी प्रकार की क्रिया जिससे एक बीज़, वृक्ष में अंकुरित होता है। यह एक जीवंत क्रिया है। तो यह परमात्मा का काम है। मेरा मतलब है, यह उन्हें करना है। यह आपका कार्य नहीं है । बीज को अंकुरित करना उनका काम है।  लेकिन समस्या इसलिए आती है क्योंकि इस अवस्था में जहां मनुष्य एक बीज़ है, उसके पास स्वतंत्रता है। उनके पास स्वतंत्रता है। इस स्वतंत्रता के साथ, वह ईश्वर की अभिव्यक्ति को, उनके कार्य को बिगाड़ सकता है।  तो पहली चीज जो हमें याद रखनी चाहिए कि इसके बारे में हमें विवेक होना चाहिए। तो पहली बात विवेक की यह है कि यह परमात्मा है जो यह कार्य करेंगे। हम यह नहीं कर सकते। आप बीज़ अंकुरित नहीं कर सकते, फिर आप अपना बीज भी कैसे अंकुरित करेंगे? और इस विवेक में हमें एक चीज़ याद रखनी और  जाननी चाहिए, अपने अंदर, कि आप पूरी क्रिया के अंग प्रत्यंग हैं। हालांकि आपके पास अपनी ‌स्वतंत्रता है, स्वतंत्रता भी इस क्रिया का अंग प्रत्यंग हैं। आप परमात्मा से अलग नहीं है, आपका कोई दूसरा अस्तित्व नहीं है। आप उस पूरी क्रिया के अंग प्रत्यंग हैं । ठीक है ?  तो यह सोचना कि आपको इसके बारे में भी कुछ तय करना है- यह भी गलत है। आप उसी मशीनरी में हैं जहां आप इस अवस्था में लाए गए हैं जहां आप को पूर्ण स्वतंत्रता है अपनी उत्क्रांति के लिए।‌ तो इस स्तर पर जहां आप को पूर्ण Read More …

The Egg and Rebirth Caxton Hall, London (England)

परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी ”अंडा पुनर्जन्म से कैसे संबंधित है?” कैक्सटन हॉल, यू.के. 04-10-1980 अभी हाल में ही मैंने आश्रम में आपको ईस्टर, ईसा मसीह के जन्म, उनके पुनरुत्थान और ईसाई धर्म का संदेश जो की पुनरुत्थान है, के बारे में बताया था।  एक अंडा बहुत ही महत्वपूर्ण है और भारत के एक प्राचीन ग्रंथ में लिखा है, कि अंडे के साथ ईस्टर क्यों मनाया जाना चाहिए। यह बहुत आश्चर्यजनक है। यह बहुत स्पष्ट है वहां अगर आप देख सके कि किस प्रकार ईसा मसीह को अंडे के रूप में ‌प्रतीकत्व किया गया है। अब, अंडा क्या है? संस्कृत भाषा में ब्राह्मण को  द्विज: कहते हैं। द्विज: जायते अर्थात जिसका जन्म दो बार हुआ हो। और पक्षी, कोई भी पक्षी द्विज: कहलाता है अर्थात दो बार जन्मा। क्योंकि पहले एक पक्षी एक अंडे के रूप में जन्म लेता है और फिर पक्षी के रूप में उसका पुनर्जन्म होता है। इसी प्रकार मनुष्य पहले एक अंडे के रूप में जन्म लेता है और फिर एक आत्मसाक्षात्कारी के रूप में उसका पुनर्जन्म होता है। अब आप देखें कि कितनी महत्वपूर्ण बात है कि दोनों एक ही नाम से जाने जाते हैं। कोई भी अन्य जानवर द्विज: नहीं कहलाता जब तक कि उसका पहला निर्माण अंडे के रूप में ना हो और बाद में फिर किसी और रूप में। उदाहरण के लिए कोई स्तनधारी, कोई भी स्तनधारी द्विज: नहीं कहलाता सिवाय मनुष्यों के। यह उल्लेखनीय है जीव विज्ञान में अगर आप पड़ें, कि स्तनधारी अंडे नहीं देते। वह सीधे अपने बच्चों Read More …

The Value of Marriage Dollis Hill Ashram, London (England)

                                            “विवाह का आदर्श” डॉलिस हिल आश्रम, लंदन (यूके), 8 मार्च 1980 ..तो सहज योग सबसे पहले आपका अंकुरण शुरू करता है, फिर विकास करता है। उस वृद्धि में, आपको एक व्यापक, अधिक व्यापक व्यक्तित्व बनना होगा। शादी के साथ आप एक और भी बेहतर इंसान बनते हैं, और आप एक बेहतर व्यक्तित्व का विकास करते हैं। अब, सहज योगियों के लिए शादी क्यों जरूरी है? सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात, शादी करना सबसे सामान्य बात है। भगवान ने आपको  शादी करने की इच्छा किसी उद्देश्य से दी है। लेकिन, उसी इच्छा का उपयोग , यदि आप उस उद्देश्य के लिए नहीं करते, जिसके लिए इसे दिया जाता है, तो यह विकृति बन सकता है, यह एक बुरा काम बन सकता है। यह आपके विकास के लिए बहुत हानिकारक हो सकता है। तो हमारे भीतर शादी करने की इस इच्छा को समझना चाहिए। शादी का मतलब एक पत्नी है, जो आपके अस्तित्व का अंग-प्रत्यंग है। एक पत्नी जिस पर आप निर्भर हो सकते हैं। वह आपकी मां है, वह आपकी बहन है, वह आपका बच्चा है, वह सब कुछ है। आप अपनी सारी भावनाओं को अपनी पत्नी के साथ साझा कर सकते हैं। इसलिए यह ज़रूरी है कि पत्नी ऐसी होनी चाहिए, जो यह समझे कि उपरोक्त यह सब बातें, शादी की ज़रूरत है। अब, सहज योग में, जैसा कि आपने देखा है, आप सभी को या तो बाईं या दाईं ओर समस्या है। अब, जब ये विवाह होंगे, ज्यादातर अनायास, यह प्रकृति की योजना से ही होगा, कि आप एक Read More …

Seminar for the new Sahaja yogis Day 3 Cowasji Jehangir Hall, मुंबई (भारत)

1980-01-30, Seminar for the new Sahaja yogis Day 3, Bordi 1980 (Hindi) और जाते समय, आप सब लोगों को, यहाँ पर छोड़ के, इतनी प्यारी तरह से, इन्होंने, अपने हृदय से निकले हुये शब्द कहे, जिससे, चित्त बहुत खिच सा जाता है। आजकल के जमाने में, जब प्यार ही नहीं रह गया, तो प्रेम का खिंचाव और उससे होने वाली, एक आंतंरिक भावना भी संसार से मिट गयी है। मनुष्य हर एक चीज़ का हल बुद्धि के बूते पर करना चाहता है। बुद्धि को इस्तेमाल करने से मनुष्य एकदम शुष्क हो गया। जैसे उसके अन्दर का सारा रस ही खत्म हो गया और जब भी कभी, कोई भी आंतरिक, बात छिड़ जाती है तो उसके हृदय में कोई कंपन नहीं होता, क्योंकि हृदय भी काष्ठवत हो गया। न जाने आज कल की हवा में ऐसा कौनसा दोष है, कि मनुष्य सिर्फ बुद्धि के घोड़े पे ही चलना चाहता है, और जो प्रेम का आनन्द है उससे अपरिचित रहना चाहता है। लेकिन मैं तो, बहुत पुरानी हूँ, बहुत ही पुरानी हूँ और मैं मॉडर्न हो नहीं पाती हूँ। इसलिये ऐसे सुन्दर शब्द सुन के, मेरा हृदय बहुत ही आंदोलित हो जाता है । लेकिन आज कल की, बुद्धि भी, अब हार गयी। अपना सर टकरा टकरा के हार गयी है। और जान रही है कि उसने कोई सुख नहीं पाया, कुछ आनन्द नहीं पाया। उसने जो कुछ भी खोजा, जिसे भी अपनाया, वो सिर्फ उसका अहंकार था। उससे ज्यादा कोई उसके अन्दर अनुभूति नहीं आयी। धीरे धीरे मनुष्य, इससे परिचित हो Read More …

Do Sansthaye – Man Aur Buddhi , Seminar for the new Sahaja yogis Day 2 Cowasji Jehangir Hall, मुंबई (भारत)

१९८०-०१-२९, नए सहज योगियों के लिए सेमिनार दिन २, कोवासजी जेहांगीर हॉल, मुंबई (भारत) १९८०-०१-२९, नए सहज योगियों के लिए सेमिनार दिन २, बोर्डी [हिंदी अनुलेख] कल आपको प्रस्तावना मैं मैंने बताया, कि जो आप हैं वो किसलिये संसार में आये हैं। परमात्मा ने आपको इतनी मेहनत से क्यों इन्सान बनाया? और इस इन्सान का क्या उपयोग है? इसके लिये परमात्मा ने हमारे अन्दर जो जो व्यवस्था की है वो अतीव सुन्दर है। और बड़ी मेहनत ले कर के बड़ी व्यवस्था की गयी। और सारी तैय्यारियाँ अन्दर जुट गयी। लेकिन जिस वक्त मनुष्य को स्वतंत्रता दी गयी, जब मनुष्य ने अपनी गर्दन ऊपर उठायी और जो पूर्ण मानव हो गया। तो उसने अपनी स्वतंत्रता को भी पा लिया था। उसके अन्दर दोनों शक्तियाँ जिसके बारे में मैने कल बताया था, इड़ा और पिंगला की शक्ति। इड़ा जिससे की हमारा अस्तित्व, एक्झिस्टन्स बनता है, और पिंगला की जिससे हम सृजन करते हैं, क्रियेटिव होते हैं, ये दोनों ही शक्तियाँ कार्यान्वित होने के कारण हमारे अन्दर मन और बुद्धि या मन और अहंकार नाम की दो संस्थायें तैय्यार हो गयी। ये संस्थायें आप अगर देखें तो सर में दो बलून की जैसे हैं। जो कि आपको यहाँ दिखायी देगी। ये सर में दो बलून के जैसे हमारे अन्दर बन गयीं इसे अंग्रेजी में इगो और सुपर इगो कहा जाता है । ये संस्थायें तो वहाँ पे घनीभूत होने के कारण वहाँ की जो तालु की जो …. कर लें, बिल्कुल बीचोबीच …. हड्डी हैं, जिसे फॉन्टनेल बोन कहते हैं, वो कॅल्शियम से Read More …

Seminar for the new Sahaja yogis Day 1 Cowasji Jehangir Hall, मुंबई (भारत)

सहज योगियों के लिए सेमिनार  बोर्डी शिबिर, महाराष्ट्र, भारत, 28 जनवरी 1980, मुझे बताया गया था कि, मुझे संबोधित करना चाहिए, जनसमूह को, अंग्रेजी भाषा में। मैं आशा करती हूँ, यह संतोषजनक होगा, कुछ लोगों के लिए, यदि मै संबोधित करूँ, आपको अंग्रेज़ी में। मैं सोचती हूँ की, समय हो गया है, हमारे लिए, कि सोचें, क्यों परमात्मा ने सृजन किया है, इस सुंदर मानव का, मनुष्य का। क्यों उन्होंने इतना कष्ट उठाया, कि विकास करें हमारा, अमीबा से इस स्तर तक। हमने सब कुछ, महत्वहीन समझा है। यहाँ तक की, बात करना परमात्मा के बारे में, ऐसे आधुनिक समय में, यह असंभव है। क्योंकि बुद्धिजीवियों के अनुसार, वे अस्तित्व में नहीं हैं। वे कदाचित कुछ भी कह सकते हैं, जो चाहे, परन्तु वह हैं, और बिलकुल हैं। अब समय आ गया है, सर्वप्रथम, हमारा यह जानने के लिए, हम यहाँ क्यों है? हमारी सिद्धि किस में है? क्या हम आए हैं, इस संसार में, केवल पैदा होने के लिए, अपना भोजन करें, बच्चे पैदा करें, उनके लिए धन उपार्जित करें, और इसके बाद मर जाएँ? अथवा कोई विशेष कारण है, कि परमात्मा हमसे इतना प्रेम करते हैं, और उन्होंने सृजन किया, एक नवीन संसार, मनुष्य का?  साथ ही, समय आ गया है, हमारे जानने के लिए, कि परमात्मा विद्यमान हैं। और यह कि उनके प्रेम की शक्ति विद्यमान है। और केवल यह नहीं, परन्तु यह व्यवस्थित करती है, समायोजित करती है, यह गतिशील है। कि वे प्रेम करते हैं, और उनके प्रेम में, वे चाहते हैं, हमें प्रदान करना, Read More …

Joy Dhule (भारत)

[Hindi translation from English]                        आनंद  धुले, भारत 1980-01-28 … और उनकी खुशी। इसलिए, वास्तविक अर्थों में आत्मा के साथ कोई तालमेल, जो सिर्फ एक आनंद देने वाला गुण है स्थापित नहीं किया जा सकता है,। तो इस प्रकार आत्मा की आनंद प्रदान करने वाली गुणवत्ता को इतना कम कर दिया गया है, इतना कम कर दिया गया है, कि बुद्धिजीवियों का आनंदित हो पाना असंभव है। आपको यह प्रमाणित करना होगा कि, “अब खुश रहो!” आप समझ सकते हैं। भले ही आप प्रमाणित करें, भले ही पूरी दुनिया प्रमाणित करे, कि यह हर्षित होने का तरीका है, वे स्वीकार नहीं करेंगे। और वे सोचते हैं कि ऐसा स्वीकार कर लेने का अर्थ है, जैसे कि वे स्वर्ग छोड़ रहे हैं, वे अपनी सभी जायदाद को छोड़ रहे हैं, वे अपना सब कुछ छोड़ रहे हैं! वे इस हद तक उस पर टिके रहेंगे! मेरा मतलब है, अगर आपको तैराकी सीखनी है, और अगर आपको तैराकी का आनंद लेना है, तो आपको उस बाहर की रिंग पर जो आप की पकड़ है उसको छोड़ना होगा। लेकिन आप रिंग को पकड़ेंगे, और कहेंगे, “नहीं, यह रिंग है, मैं नहीं छोड़ सकता! “इसलिए बुद्धिजीवियों का इस तरह का रवैया उनकी खुशी को मार देता है, और इसीलिए वे हर्षोल्लास का आनंद नहीं उठा पाते हैं। और इसी वजह से सब कुछ किसी न किसी बहाने, या किसी तरह का डर, या शायद किसी तरह के वर्चस्व से कार्यान्वित होती है। तो पूरी चीज को इतने कृत्रिम रूप से प्रबंधित किया जाता है की, Read More …

Powers Bestowed upon Sahaja Yogis Bordi (भारत)

                        सहज योगीयों को प्रदत्त शक्तियां   बोर्डी (भारत)  27 जनवरी, 1980 मैंने कल आपसे कहा था, कि हमें अपनी पहले से उपलब्ध शक्ति, और वे शक्तियाँ जो हमें मिल सकती हैं उनके बारे में जानना होगा, । सबसे पहले हमें यह जानना चाहिए कि हमें कौन सी शक्तियां मिली हैं, और हमें यह भी पता होना चाहिए कि हम उन शक्तियों को कैसे संरक्षित करने जा रहे हैं और कौन सी शक्तियां हम बहुत आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।  पहली शक्ति जो आत्मसाक्षात्कार के बाद आपको मिलती है, वह पृथ्वी की सबसे बड़ी शक्ति है। यह श्री गणेश की शक्ति है। केवल वह ही यह काम कर सकते है जो आप लोग आज कर रहे हैं, और वह शक्ति कुंडलिनी को उठाने की है। अध्यात्म के इतिहास में अब तक किसी ने भी कुंडलिनी को इतने कम समय में नहीं उठाया है जितना आप लोग कर रहे हैं। यह आपकी उंगलियों के अधीन चलती है; यह बिल्कुल श्री गणेश की शक्ति है जो आपको दी गई है। उस समय जब आप आत्मसाक्षात्कार दे रहे हों, भले ही आप अपने चक्र में से किसी एक में फंस गए हों, या आपको कोई समस्या हो, भले ही आप थोड़ा सा बाधित भी हो, भले ही आप इतने अच्छे सहज योगी न हों, भले ही आप माताजी के सामने इतने समर्पण नहीं कर रहे हैं, भले ही आपको सहज योग के बारे में अधिक समझदारी न हो, फिर भी कुंडलिनी आपकी उंगलियों के अधीन उठती है।  गणेश की यह विशेषता स्वयं श्री गणेश Read More …

Transformation, Morning Advice at Bordi seminar Bordi (भारत)

                    रूपांतरण   बोर्डी (भारत) सेमिनार में सुबह की सलाह   27 जनवरी, 1980 जब सभी यहां आये तब हर कोई बहुत अच्छा महसूस कर रहा था, खुश था और उन्हें लगा, उनके चैतन्य बिल्कुल ठीक थे। लेकिन ऐसा नहीं था। इसलिए सतर्क रहें, आप देखें – एक-दूसरे से इसे परखने को कहें कि कृपया आप जाँच करें, इसके बारे में विनम्र रहें। आपको परखते रहना चाहिए। जब तक आप खुद की जांच नहीं करते, तब तक आप कैसे जानेंगे कि आप क्या चीज पकड़ रहे हैं? दूसरों को आपकी जाँच करने के लिए निवेदन करें और विनम्र रहें, इसके बारे में बहुत विनम्र हों | चीजों को हल्केपन में न लें,  जब तक हम खुद को बदल नहीं देते,सहज योग का आपके लिए कोई मतलब नहीं है। आप देखें, इस रेडियो, ट्रांजिस्टर या, लाउडस्पीकर की ही तरह सहज योग की अभिव्यक्ति का भी बहुत भौतिक तरीका हो सकता है। हमें यह जानना होगा कि सहज योग हमारे माध्यम से ऊर्जा प्रवाहित करने मात्र के लिए नहीं है, जैसे कि अन्य सभी भौतिक चीजें ऊर्जा पारित कर रही हैं।यह माइक ऊर्जा को प्रसारित कर रहा है, यह ट्रांजिस्टर ऊर्जा को फैला रहा है और इस तरह की अन्य सभी चीजें ऊर्जा को प्रसारित कर रही हैं।उन के अंदर कुछ नहीं जाता।जैसे … एक कलाकार गा रहा है और, उसकी आवाज का रेडियो में से  गुजरना होता है। उसी तरह,चूँकि किसी तरह कुंडलिनी को शक्ति के स्त्रोत्र से जोड़ा गया है, यदि हमारी शक्ति बहने लगती है ; ना तो इसने अपना काम किया, Read More …

Advice for Effortless Meditation London (England)

         निष्क्रिय ध्यान के लिए सलाह लंदन (यूके), 1 जनवरी 1980। जीवन में उसी तरह से चैतन्य, वायब्रेशन आ रहे हैं, वे प्रसारित हैं। आपको जो करना है, वह खुद को उसके सामने खुला छोड़ देना है। सबसे अच्छा तरीका है की कोई प्रयास नहीं करें। आपको क्या समस्या है इस पर चिंता न करें। जैसे, ध्यान के दौरान कई लोग, मैंने देखा है कि अगर उन्हें कहीं रुकावट हैं तो वे उसकी देखभाल करते रहते हैं। आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है। आप बस इसे होने दें और यह अपने आप काम करेगा। यह बहुत आसान है।इसलिए आपको कोई भी प्रयास नहीं लगाना पड़ेगा। यही ध्यान है। ध्यान का अर्थ है स्वयं को ईश्वर की कृपा के सामने उघाड़ देना । अब कृपा ही जानती है कि तुम्हें कैसे ठीक करना है। यह जानता है कि आपको किस तरह से सुधारना है, कैसे स्वयं को तुम्हारे अस्तित्व में बसाना है, आपकी आत्मा को चमकाना है। यह सब कुछ जानता है। इसलिए आपको चिंता करने की ज़रूरत नहीं है कि आपको क्या करना है या आपको क्या नाम लेना है, आपको कौन से मंत्र करने हैं। ध्यान में आपको बिल्कुल प्रयास रहित होना है, खुद को पूरी तरह से उजागर करना है और आपको उस समय बिल्कुल निर्विचार होना है। माना की कोई संभावना है, आप शायद निर्विचार नहीं भी हो पायें। उस समय आपको केवल अपने विचारों को देखना है, लेकिन उनमें शामिल न हों। आप पाएंगे की जैसे क्रमशः सूर्य उदय होता है, अंधेरा दूर हो जाता है Read More …

How to go beyond the ego and know yourself, Meditation London (England)

                         अहंकार के पार जाकर और स्वयं को कैसे जानें डॉलिस हिल आश्रम, लंदन (यूके) में सलाह, 18 नवंबर 1979 लेकिन सहज योग, उस महान घटना की उत्प्रेरणा है जिस के माध्यम से ईश्वर की रचना अपनी परिपूर्णता को प्राप्त करने वाली है और उसका अर्थ जानने वाली है  – यह इतना महान है! शायद हमें इसका एहसास नहीं है। लेकिन जब हम कहते हैं, “हम सहजयोगी हैं,” तो आपको यह जानना होगा कि, एक सहज योगी होने के लिए, आपका सहज योग के सत्य के साथ कितना तादात्म्य होना चाहिए, और इतनी सारी गलत पहचान जो आप पर छायी हुई हैं, आपको इस से छुटकारा पाना चाहिए।  लोग इसे एक त्याग कहते हैं। मुझे नहीं लगता कि यह बलिदान है। अगर आपको लगता है कि कुछ आपके रास्ते में बाधा डाल रहा है तो आप उस बाधा को दूर करने का प्रयास करेंगे। उसी तरह यदि आप अपने अवरोधों से अलग खड़े हो जायेंगे, तब आप समझ पाएंगे कि ये रुकावटें आपके रास्ते में खड़ी हैं और ये आपकी नहीं हैं और आपकी प्रगति को रोक रही हैं। तो, आपको इस गलत पहचान को अपने दिमाग से पूरी तरह से निकाल देना चाहिए और अधिक से अधिक स्व बनने का प्रयास करना चाहिए, न कि गलत पहचान। यह एक समस्या है, मुझे लगता है, यहाँ के लोगों की है। जब भी मुझे कोई शिकायत या कुछ भी मिलता है, मैं समझती हूं कि सहज योग के बारे में अभी भी समझ का स्तर उस बिंदु तक नहीं है। यह एक Read More …

The Meaning of Yoga London (England)

The Meaning Of Yoga Date : 11th November 1979 Place : London Туре Public Program Speech [Translation from English to Hindi, Scanned from Hindi Chaitanya Lahari] सहजयोग आपके अन्दर जीवाणु की तरह आड़ोलन एक के बाद एक क्रिया आदि एक से विद्यमान है । यह आपके अन्दर जन्मी हुई दूसरी तरह के आड़ोलन के माध्यम से होता चीज है। व्यक्ति के अन्दर ये अन्तर्जात होती है जो अवययों में मौजूद है जैसे पेट स्वतः स्वतः इसका अंकुरण होता है अभिव्यक्ति होती है। बिल्कुल वैसे ही जैसे सब आपके मस्तिष्क से आता है । अनुकंपी आप छोटे से बीज को अंकुरित होकर वृक्ष नाडीतन्त्र और पराअनुकम्पी नाड़ी तन्त्र बनते (Sympathetic, और खाए हुए पदार्थ को नीचे को धकेलता है। ये देखते हैं। यही सहजयोग है। अन्य Parasympathetic) हुए सभी योग जो इसके साथ-साथ चलते हैं, वे गतिशील हो उठते हैं और इसे कार्यान्वित सब सहजयोग के ही अंग-प्रत्यंग हैं। इन्हें करते हैं। ये एक बहुत बड़ी प्रणाली है और इससे अलग नहीं किया जा सकता। मुझे एक बहुत बड़ी संस्था है जो ये कार्य कर लगता है कि लोगों में कुछ गलत-फहमी है। रही है। आप यदि इसे पृथक करना चाहें तो योग के चार अंग होते हैं। ये सोचना भी पाचन प्रणाली भिन्न है मस्तिष्क प्रणाली । भिन्न है, स्नायु प्रणाली भिन्न है । आप इन्हें गलतफहमी न होगी कि वे अलग- अलग हैं जब हम कहते हैं कि हमने खाना खाया है इस तरह से अलग नहीं कर सकते कि तो इसका अर्थ ये नहीं होता कि बोल्ट की Read More …

Talk to Sahaja Yogis: When in darkness London (England)

                     “जब अँधेरे में हों”  डॉलिस हिल आश्रम, लंदन, इंग्लैंड। 20 जून 1979। …फिर वो लोगों का इलाज शुरू करता है, फिर वो नकारात्मकता को ज्यादा पास करता है। और यह कुछ अच्छा लगने लगता है, आप देखिए। कभी-कभी उसे यह भी लगता है कि उसने अधिक शक्तियाँ प्राप्त कर ली हैं, क्योंकि ये प्रेतात्माएँ बहुत चालाक हैं और वे उस तरह का वातावरण स्थापित करती हैं। इसलिए व्यक्ति को सावधान रहना होगा। एक नियमित युद्ध चल रहा है। और इसलिए हमें बस अपने हौसले को ठीक रखना है। और इस युद्ध में कायरता का कोई स्थान नहीं है। अगर लोगों की पहचान सत्य के साथ हो जाए तो यह पूरी बात बहुत अच्छी तरह से काम करेगी। लेकिन सत्य, जैसा कि आप जानते हैं, के साथ पहचान करना बहुत कठिन है; मनुष्य के लिए बहुत कठिन, बिल्कुल असंभव के समान है। यदि आप उन्हें बेवकूफ बनने को कहेंगे, तो वे आपको स्वीकार करेंगे। यदि आप उन्हें मूर्ख बनने को कहते हैं, तो वे आपको स्वीकार करेंगे। किसी भी तरह का काम जिस को करके वे बिल्कुल गधे जैसे दिखें, वे करेंगे। यदि आप उन्हें फरेबी बनने को कहें, तो वे ऐसा करेंगे। असत्य का कोई माहौल बनाएंगे तो वे आपको स्वीकार करेंगे। लेकिन सच्चाई? बहुत कठिन। बहुत कठिन। आपको भी पता चलेगा कि कुछ लोग हैं जो मेरी तस्वीर देखते हैं और उन्हें ठंडी हवा मिलती है, लेकिन फिर जब वे मुझे पूरा देखते हैं, तो वे नहीं कर सकते। क्योंकि जब वे फोटो देखते हैं तो उनमें अभी भी Read More …

Seminar Day 1, tricks of false gurus London (England)

डॉलिस हिल सेमिनार दिवस 1, “झूठे गुरुओं की युक्तियां”, लंदन (यूके) 27 मई 1979. ऑडियो (टीएम, झूठे गुरु, औद्योगिक क्रांति, मसीह) श्रीमाताजी: आपके लिए यह कहना ठीक है, क्योंकि वह इसके लिए ही वहां आए थे। वह तो परिपक्व था ही। वह मेरे पास आया, और उसे प्राप्त हुआ।  सहजयोगी: मैंने पाया कि उसे बहुत सरलता से प्राप्त हो गया। जिस क्षण मैंने आपके चित्र को देखा, मैंने। …. मेरा मतलब है, मैं था…. । ….. टीएम। श्रीमाताजी: मैं इच्छा है कि उन सभी में कम से कम उतना हो जितना आपके पास है तो यह कार्यान्वित हो जायेगा। सहजयोगी: ठीक है। …  श्रीमाताजी: हाँ….  सहजयोगी: और चौबीस घंटे के भीतर …..  श्रीमाताजी: हाँ ….  सहजयोगी: यह अकस्मात चैतन्य की लहर है। ….  श्रीमाताजी: हमें उन्हें बचाना है। आप देखिए, टीएम पर…., मेरा ध्यान उस ओर बहुत अधिक है, बहुत अधिक। पिछली बार हमने उस “दिव्य प्रकाश” की समस्या का समाधान किया था। “दिव्य प्रकाश” अब चला गया है। केवल उसका भाई….! आप देखते हैं? मैं “जिनेवा” गयी थी। मैं टीएम से मिलना चाहती थी, किंतु, आप देखिये, यह वर्षा आरम्भ हुई और वह सब हुआ रात्रि में, हम नहीं गए। हम उस स्थान तक जा सकते थे, यह बेहतर होता, किंतु कोई बात नहीं। तो, उसका, उसका  भाई, मुझे जिनेवा में केंद्र तक ले गया, और कहा, “वह यही है, आपको पता है।”  मैंने कहा, “ठीक है।” मैंने बंधन डाल दिया। एक सप्ताह के भीतर ही…., वह अब जेल में है, और अब चौदह वर्ष के लिए! परमात्मा का Read More …

Give up Misidentifications London (England)

                   “गलत पहचान छोड़ें”  डॉलिस हिल आश्रम, लंदन (यूके)। 22 अप्रैल 1979। … और ईसा-मसीह के पैरों की सफाई होने के कारण उन्होंने कहा, “हम इतना तेल क्यों बर्बाद करें? आप इसे बेच सकते हैं और गरीबों को दे सकते हैं।” और क्राइस्ट ने कहा – अब देखो उन्होंने क्या कहा – कि क्राइस्ट ने खुद ये शब्द कहे हैं और अगर उन्हें उसी तरह वर्णित किया गया है। आप बस अर्थ देखें और जो आपको समझना चाहिए। उनका कहना है कि, “ये गरीब तो हमेशा के लिए हैं, लेकिन मैं थोड़े समय के लिए ही हूं।” आप समझ सकते हैं? उन्होंने कितने स्पष्ट रूप से कहा है कि इसमें परोपकार का कोई कार्य शामिल नहीं है। लेकिन लोग दूसरा ही अर्थ लेते हैं! मुझे नहीं पता कि आपको दूसरा अर्थ कहाँ से मिलता है? कि आपको गरीबों की देखभाल करनी चाहिए। यह तुम्हारा काम बिल्कुल नहीं है! ठीक है, अतुल? गरीबों की देखभाल करना आपका काम नहीं है। हमें जो काम करना है वह मध्य में है। जिससे हम दाएं और बाएं दोनों को किनारों पर खींच सकते हैं। आपको मध्य पथ पर ही रहना होगा! जब हम मध्य में होते हैं, तो हम सबसे पहले अपने आप को अच्छी तरह से व्यवस्थित कर लेते हैं, और फिर बाएँ और दाएँ को समाया जा सकता है। गरीब और अमीर। अति-अमीर भयानक लोग हैं! वे धूम्रपान करते हैं, वे शराब पीते हैं, वे मनहूस लोग हैं। जुआ, यह, वह, हर तरह की चीजें वे करते हैं। वे अपना जीवन बर्बाद करते Read More …

Evening prior to departure for London, Importance of Meditation पुणे (भारत)

Evening prior to Her departure for London (Marathi & Hindi). Pune, Maharashtra, India. 30 March 1979. [Hindi Transcript]  ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK आप लोग सब इस तरह से हाथ कर के बैठिये। इस तरह से हाथ कर के बैठे और आराम से बैठे। इस तरह से बैठिये। सीधे इस तरह से आराम से बैठिये। कोई स्पेशल पोज़ लेने की जरूरत नहीं है। बिल्कुल आराम से बैठिये। सहज आसन में। बिल्कुल सादगी से। जिसमें कि आप पे कोई प्रेशर नहीं। न गर्दन ऊपर करिये, नीचे करिये। कुछ नहीं। मुँह पर कोई भी भाव लाने की जरूरत नहीं है और कोई भी जोर से चीखना, चिल्लाना, हाथ-पैर घुमाना, श्वास जोर से करना, खड़े हो जाना, श्वास फुला लेना ये सब कुछ करने की जरूरत नहीं। बहुत सहज, सरल बात है और अपने आप घटित होती है। आपके अन्दर इसका बीज बड़े सम्भाल कर के त्रिकोणाकार अस्थि में रखा हुआ है। इसके लिये आपको कुछ करना नहीं है। आँख इधर रखिये। बार बार आँख घुमाने से चित्त घूमेगा। आँख इधर रखिये। चित्त को घुमाईये नहीं। आँख घुमाने से चित्त घूमता है। आँखे बंद कर लीजिये, उसमें हर्ज नहीं । उल्टा अच्छा है, आँख बंद कर लीजिये। अगर आँख बंद नहीं हो रही हो या आँखें फड़क रही हो तो आँख खोल दीजिये। सब से पहली चीज़ है यह घटना घटित होनी चाहिये। लेक्चर सुनना और सहजयोग के बारे में जानना इसके लिये बोलते बोलते मैं तो थक गयी हूँ। और एक बहोत बड़ी किताब भी लिखी गयी है, अंग्रेजी में । उसकी कॉपीज Read More …

Advice at Bordi Shibir (English part) Bordi (भारत)

Sarvajanik Karyakram Date : 22nd March 1979 Place : Mumbai Туре Public Program [ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK Scanned from Hindi Chaitanya Lahari] आप एक बहुत सुन्दर प्रकृति की रचना हैं। बहुत मेहनत से, तो आखें हैं नहीं हम इसे कैसे जानेंगे और हमारे लिए भी यह नजाकत के साथ, बनाया है। आप एक बहुत विशेष अनन्त योनियों में से घटित होकर इस मानव रुप में स्थित हैं। आप इसलिए इसकी महानता जाएगी। इस प्रकार आपके अन्दर भी कोई चीज ऐसी ही बनी नहीं जान पाते क्योंकि, ये सब आपको सहज में ही प्राप्त हुआ हुई है। पूरी तरह से तैयारी कर परमात्मा ने रखी हुई है। उसको है। यदि इसके लिए मुश्किलें करनी पड़तो, आफते उठानी पड़ती जगाना मात्र है। जब आप आलौकित हो जाते हैं तो सारी की और आप इसको अपनी चेतना में जानते तो आप समझ पाते सारी चीज आपको आसानी से समझ आ जाती है। पर अगर कि आप कितनी महत्वपूर्ण चीज हैं। मनुष्य को जानना चाहिए कि परमात्मा ने हमें क्यों बनाया, इतनी मंहनत क्यों की? हम किस लिए संसार में आये और हमारा भविष्य क्या है ? हमारा कैसे बना, तो सब कुछ गड़बड़ हो जाता है। लेकिन आधुनिक अर्थ क्या है? जैसा कि कल मैने कहा था कि अगर हम मशीन बनायें पर इसको इस्तेमाल नहीं करें तो कोई भी अर्थ नहीं फिर उसको हटाए। उनको कोई चीज आसानी से मिल जाए तो निलकता। लेकिन जब तक ये मेन स्रोत से नहीं लगाया जाता बड़े आश्चर्य से पूछता है हमने तो कुण्डलिनी के Read More …

Advice to Delhi Yogis New Delhi (भारत)

Advice to Delhi Yogis (Hindi). Delhi (India), 15 March 1979. हर जगह के अपने वाइब्रेशन्स होते है दिल्ली, १५.३.१९७९ देलही के निवासियों ने सहजयोग में जो मेहनत की है वो बहुत प्रशंसनीय है क्योंकि आप जानते हैं कि सहजयोग में हमारे कोई भी मेंबरशिप नहीं है, कोई रूल्स नहीं है, कोई रेग्युलेशन्स नहीं है, ना ही कोई हम लोग रजिस्टर रखते हैं और ऐसी हालात में कुछ लोग इससे इतने निगडित हो जायें और इसके साथ इतने मेहनत से काम करें और ये सोंचे कि एक जगह ऐसी होनी चाहिए जहाँ सब लोग आ सके। अभी तो इनके घरों में ही प्रोग्राम होते हैं। तो इन्होंने मुझसे कहा था। मैंने कहा, ‘अच्छा देखो भाई, अगर कोई मिल जाये तुमको कोई जगह तो ठीक है। सबके दृष्टि से जो भी होना है वो अच्छा ही है।’ पर मेरे विचार से देहली के लोगों में ही ज्यादा परमात्मा का आशीर्वाद कार्यान्वित हुआ है। क्योंकि इस तरह से इन लोगों ने बहुत काम किया है कि देख कर बड़ा आश्चर्य होता है और जगह में तो बहुत कोशिश करने पर भी कुछ नहीं हो पाया है। ये सब आप ही का अपना है। आप ही के लिये जगह बनी हुई है और आप ही वहाँ रहेंगे और आप ही उसको इस्तेमाल करें, उसका उपयोग करें। लेकिन ये जरुरी है कि एक उसका न्यूक्लिअस होना चाहिए, एक जगह होनी चाहिए जहाँ गणेश जी की स्थापना होनी चाहिए। इस तरह की एक जगह होना जरूरी होती है। क्योंकि हर जगह के अपने- अपने वाइब्रेशन्स होते Read More …

Shri Mataji commenting on Early SY Experiences New Delhi (भारत)

Sarvajanik Karyakram Date : 14nd March 1979 Place : Mumbai Туре Public Program [ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK Scanned from Hindi Chaitanya Lahari] आप एक बहुत सुन्दर प्रकृति की रचना हैं। बहुत मेहनत से, तो आखें हैं नहीं हम इसे कैसे जानेंगे और हमारे लिए भी यह नजाकत के साथ, बनाया है। आप एक बहुत विशेष अनन्त योनियों में से घटित होकर इस मानव रुप में स्थित हैं। आप इसलिए इसकी महानता जाएगी। इस प्रकार आपके अन्दर भी कोई चीज ऐसी ही बनी नहीं जान पाते क्योंकि, ये सब आपको सहज में ही प्राप्त हुआ हुई है। पूरी तरह से तैयारी कर परमात्मा ने रखी हुई है। उसको है। यदि इसके लिए मुश्किलें करनी पड़तो, आफते उठानी पड़ती जगाना मात्र है। जब आप आलौकित हो जाते हैं तो सारी की और आप इसको अपनी चेतना में जानते तो आप समझ पाते सारी चीज आपको आसानी से समझ आ जाती है। पर अगर कि आप कितनी महत्वपूर्ण चीज हैं। मनुष्य को जानना चाहिए कि परमात्मा ने हमें क्यों बनाया, इतनी मंहनत क्यों की? हम किस लिए संसार में आये और हमारा भविष्य क्या है ? हमारा कैसे बना, तो सब कुछ गड़बड़ हो जाता है। लेकिन आधुनिक अर्थ क्या है? जैसा कि कल मैने कहा था कि अगर हम मशीन बनायें पर इसको इस्तेमाल नहीं करें तो कोई भी अर्थ नहीं फिर उसको हटाए। उनको कोई चीज आसानी से मिल जाए तो निलकता। लेकिन जब तक ये मेन स्रोत से नहीं लगाया जाता बड़े आश्चर्य से पूछता है हमने तो कुण्डलिनी के Read More …

Talk about Gandhi New Delhi (भारत)

Talk about Gandhi. Mumbai, Maharashtra, India. 11 March 1979. बिल्कुल सामने आ रहा है ,जो बताया गया है ,  विशुद्धि चक्र के बारे में I अब इसी विशुद्धि चक्र से ही collective conciousness की  सीढ़ी है Iमैंने कहा था कि कृष्ण को पूर्ण अवतार माने क्योंकि ये विराट है विराट वो शक्ति है जिसमें संपूर्ण समावेश है ह्रदय में शिव जी की शक्ति है और पेट में गुरुओं की शक्ति है और स्वाधिष्ठान चक्र में ब्रह्मा देव शक्ति है ब्रेन में ब्रह्मा देव की शक्ति है आप कह सकते हैं और जब विराट जागृत हो जाता है जब  विराट का सहस्त्रार खुलता है तब इसके अंदर बसे हुए अनेक cell का पेशियों का भी सहस्त्रार खुलता है I Bible मैं कहा जाता है  परमात्मा ने मनुष्य को अपने जैसा बनाया अपना इमेज बनाया है और ये बात सही है जैसे विराट हैं वैसे ही संपूर्ण आप हैं, फर्क इतना ही है कि वो करता है और आप बनाए गए हैं इतना ही अंतर है उन्होंने बनाया और आप बनाए गए हैं Iअब वो चाहते हैं कि आप उनसे परिचय करें उनकी चाह  है उनकी चाहत में आपको बनाया है Iऔर आप को बनाने के बाद वो चाहते हैं कि आप उन्हें जाने उनकी इच्छा है जब ये उनकी इच्छा है तो वो होकर रहेगी उसके लिए भी उन्होंने पूरी व्यवस्था करके रखी है अपने अंदर पूरा Instrument बनाया है पूरी चीज बनाई है Iमैंने आपको बताई थी आज सवेरे और अब सिर्फ इतना करने का है कि आपको उनसे संबंधित Read More …

Seminar Day 2 New Delhi (भारत)

Seminar in Delhi (India), 10 March 1979. भारतवर्ष योगभूमि , सेमिनार दिल्ली, १०/३/१९७९ आज सबेरे मैंने आपसे बताया था अंग्रेजी में कि परमात्मा ने हमें जो बनाया है, आप इसे माने या न माने, उसका अस्तित्व आप समझे या न समझे वो है। और उसने हमें जिस प्रकार बनाया, जिस तरह से बनाया है वो भी | एक बड़ी खूबी की चीज़ है। मैंने सबेरे बताया था कि कैसे बहुत थोड़े से समय में एक अमीबा जैसे प्राणी से मनुष्य बनाया गया। और आप को मनुष्य बनाया गया सो क्यों? और आगे इसका क्या होने वाला है या ऐसे ही भटकता रहेगा? मैंने बताया कि आपको भगवान ने स्वतंत्रता दे दी है। चाहे तो आप परमात्मा को पायें और चाहे तो आप शैतान के राज्य में जायें। ये आपकी स्वतंत्रता है। इसके लिए कोई भी आप पर, कोई भी आप पर परमात्मा का बंधन नहीं । अगर आप गलत रास्ते जाएंगे तो आप पर वहाँ के जो कुछ भी कृपायें हैं वो होंगी। और जो आप सही रास्ते जाएंगे तो सही रास्ते का जो भी आशीर्वाद है वो आपको मिलेगा । गलत और सही जानने के लिए भी बहुत बड़ी-बड़ी हस्तियाँ संसार में आयीं, उनको हम ‘अवतार ‘ कहते हैं, अवतरित हैं। बड़े-बड़े गुरु इस संसार में आयें जो असली गुरु थे। वो जब भी आये उन्होंने सही रास्ता, धर्म का रास्ता बताया कि आप कायदे से रहिये, बीचो-बीच रहिये, अति न करिये। धर्म के नाम पर जब -जब कोई-कोई संकट आये और जब ये देखा गया कि संसार से Read More …

Seminar (भारत)

Seminar (Hindi). Dheradun, UP, India. 4 March 1979. परमात्मा सब से शक्तिशाली है देहरादून, ४ मार्च १९७९ आज मैंने आपसे सबेरे बताया था कि कुण्डलिनी के सबसे पहले चक्र पे श्री गणेश जी बैठते हैं, श्री गणेश का स्थान है और श्री गणेश ये पवित्रता के द्योतक हैं। पवित्रता स्वयं साक्षात ही है। वो तो पहला चक्र हुआ। और ये चक्र जो है कुण्डलिनी से नीचे है वो कुण्डलिनी की रक्षा ही नहीं करता है, लेकिन वो लोग जो कुण्डलिनी में जाते हैं उनसे पूरी तरह से सतर्क रहते हैं। इस रास्ते से कोई भी कुण्डलिनी को नहीं छू सकता है। आज सबेरे मैंने आपसे बताया था कि इस रास्ते से जो लोग कोशिश करते हैं वो बड़ा ही महान पाप करते हैं। हालांकि उससे थोड़ा बहुत रुपया-पैसा कमा सकते हैं। लेकिन अपने लिए जो पूँजी इकठ्ठी करते हैं, वो सारी ही एक दिन बहुत कलेशकारी हो जाती है। जो दूसरा चक्र है, जिसे मैंने स्वाधिष्ठान चक्र आपसे बताया था । इससे हम विचार करते हैं क्योंकि जब हम बुद्धि से विचार करते हैं, जब हम अपने दिमाग से विचार करते हैं, उस दिमाग की जो मेध है इसे फैट ग्लैड्यूस कहते हैं, जो चर्बी है, वो चर्बी पेट की चर्बी से बनती है। पेट की चर्बी को ये चक्र सर की च्बी बनाता है इसलिए विचार करते वक्त, इस चक्र पर बहुत जोर पड़ जाता है। और जब विचार करने की आपको आदत लग जाती है, जैसे की आजकल के आधुनिक लोगों को विचार करने की आदत एक बीमारी Read More …

Christmas Message: Thankfulness London (England)

                         कृतज्ञता  लंदन 1978-12-24 लंदन … केवल यह कार्य करना कि, एक इंसान के रूप में आना, एक इंसान की तरह जीना, और एक इंसान की तरह कष्ट उठाना। और वह इस पृथ्वी पर अवतरित हुए, अभी जानने के लिए, उस संसार को जानने के लिए जिसे उन्होने बनाया, भीतर-बाहर से। इस तरह वह हमें बचाने के लिए वे आये थे। लेकिन मेरा मतलब है, वह व्यक्ति बात कर रहा था और उसकी आज्ञा पर इतनी बड़ी पकड़ थी कि मैं बस यही कह रही थी कि, वह जिस बारे में बात कह रहा है वह खुद उसी में लक्षित हो रही है- कि उसमें नम्रता का कोई भाव नहीं बचा है! वह जिस तरह से उसके लिए ईसा-मसीह का उपयोग कर रहा था! साथ ही एक बहुत ही भयानक आज्ञा! और मैंने इसे साफ कर दिया। और सब कुछ इस प्रकार हुआ…मैं सोच रही थी कि वह कोई नाटक कर रहा है। और फिर सबसे दयनीय बात बाद में हुई जब उन्होंने कहा कि, “यहां स्थित अन्य समुदायों के लोगों के लिए आपका क्या संदेश है और आप क्या कहते हैं?” उन्होंने कहा, “हमें अपने पड़ोसी से प्यार करना चाहिए और इसी तरह हमें आपसे प्यार करना चाहिए। और यह भलाई के लिए है, और इसलिए हमने एक ऐसा काम शुरू किया है जिसके द्वारा हम लोगों को नौकरी देते हैं और उनकी देखभाल करते हैं।” और सब कुछ एक परोपकारी कार्य के साथ शुरू हुआ, और फिर यह एक संघ, एक श्रमिक संघ बन गया, और फिर वह एक Read More …

Seminar Day 1, Bija Mantras, Shri Lalita, Shri Chakra Easthampstead Park Conference Centre, Wokingham (England)

सेमिनार प्रथम दिवस ,बीज मंत्र,श्रीललिता,श्रीचक्र (ईस्ट हैम्पस्टेड पार्क कॉन्फ्रेंस सेंटर,वर्किंगघम, ब्रैकनैल, इंग्लैंड) 14 अक्टूबर 1979 जब कुंडलिनी जागृत होती है,वह ध्वनि उत्पन्न करती है।और जो ध्वनि विभिन्न चक्रों में सुनाई देती है निम्न रूप में उच्चारित की जा सकती है-ये उच्चारण देवनागरी की ध्वन्यात्मक भाषा में प्रयुक्त किये गए हैं,जिसका अर्थ होता है ‘देवों के द्वारा बोली गई भाषा‘। मूलाधार पर जहाँ चार पंखुड़ियाँ हैं,ध्वनियाँ हैं ÷ व् श् ष् स् जिसमें से अंतिम ‘ष’ और ‘स्’ ध्वनियाँ काफी समध्वनि हैं,परन्तु अंतर है -जब साँप फुफकारता है तो यह ‘ष’ -तीसरी ध्वनि बनती है, तो व् श् ष् स् । स्वाधिष्ठान पर, जहाँ छः पंखुड़ियाँ हैं, यह ध्वनि निर्मित करती है। छः ध्वनियाँ- ब् भ् म् य् र् ल्  मणिपुर -इसकी दस पंखुड़ियाँ हैं, यह ध्वनि निर्मित करती है- ड् ढ् ण् त् थ् द् ध् न् प् फ् अनाहत पर बारह पंखुड़ियाँ हैं, यह ध्वनियाँ निर्मित करती है- क् ख् ग् घ् ङ् च् छ् ज् झ् ञ् ट् ठ्  विशुद्धि पर, जहाँ सोलह पंखुड़ियाँ हैं, यह सभी स्वरों की ध्वनि निर्मित करती है- अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ अं अः आज्ञा पर यह निर्मित करती है- ह् क्ष् सहस्रार पर व्यक्ति निर्विचार हो जाता है और कोई ध्वनि नहीं निर्मित होती, लेकिन शुद्ध अनहद अर्थात् शुद्ध स्वरुप में धड़कन जैसे कि हृदय में होती है {लब डब लब डब लब डब} जब ये सभी ध्वनियाँ एक साथ ध्वनित होती हैं और देह की कुंडली से गुजरती हैं,अगर देह एक Read More …

Talk to Sahaja Yogis: Dharma London (England)

                                                            धर्म सहज योगियों से बातचीत   लंदन (यूके), 5 अक्टूबर, 1978 वह, मध्य वाली वही पोषण करने वाली शक्ति है अर्थात वह शक्ति है जिसके द्वारा हम विकसित होते हैं, अर्थात हमें अनायास ही सहज रूप से अपना भरण-पोषण मिलता है। यह पोषण जो हमें एक मनुष्य के रूप में प्राप्त है, जब इसे हमारे भीतर मौजूद पांच तत्वों पर अभिव्यक्त होना होता है, तो स्रोत तो वहीं होता है लेकिन हमें इसके विभिन्न तत्वों के माध्यम से उस तक पहुंचना होता है। जब यह आदान-प्रदान होता है या, हम कह सकते हैं, जब हमें इस बल को बाहर लगाना होता है, तो वह इन पर धर्म की स्थापना के माध्यम से किया जाना है। किसी योग की तरह या, आप कह सकते हैं, कनेक्शन। जैसे आप कह सकते हैं, मान लीजिए कि सूर्य है। सूर्य प्रकाश का स्रोत है और प्रकाश का स्रोत इस पृथ्वी पर आया है जो पाँच तत्वों से बनी है। तो सूरज की किरणें तो आनी ही हैं, लेकिन जब वे अंदर आती हैं, इस आने की क्रिया में, तो क्या करती हैं? वे इस संसार को प्रकाशित करते हैं। लेकिन यह तभी संभव है जब धर्म हो, अर्थात प्रकाश हो, किरणें हों। किरणें कई चीजों से बाधित हो सकती हैं। यदि किरणें बाधित होती हैं, तो अ-धर्म होता है। तो धर्म का स्रोत, धर्म का प्रसार और अंततः पांच तत्वों पर अभिव्यक्ति एक पूर्ण चीज़ है जो भवसागर है। यह खेल हमारे भीतर चलता रहता है। हमारी उत्क्रांती की शक्ति जो प्रारंभ से ही कार्यरत Read More …

Spirit, Attention, Mind Finchley Ashram, London (England)

                                                                “आत्मा, चित्त, मन”  फिंचली आश्रम, लंदन (यूके), 20 फरवरी 1978 … और वह हमें एक साधन के रूप में उपयोग कर रहा है। साथ चलो! जैसा की मैंने कहा। अब क्रिस्टीन ने मुझसे पूछा था, “हमारा समर्पण क्या है?” और उसने मुझसे पूछा है कि क्या हमारे पास एक स्वतंत्र इच्छा है या नहीं। ठीक है? आपके पास अपनी एक स्वतंत्र इच्छा है। खासतौर पर इंसानों के पास है, जानवरों के पास नहीं। हम कह सकते हैं, आपके पास चुनने की स्वतंत्र इच्छा है, अच्छा और बुरा, सत्यवादिता और असत्यवादिता। अब, आप उसकी मर्जी के सामने समर्पण करने या ना करने के बीच चुन सकते हैं,;अथवा अपनी ही इच्छाओं के दबाव में आने के लिए। अब, उसने मुझसे पूछा, “समर्पण क्या है?” समर्पण, जैसा कि मैं कह रही हूं, यह तीन चरणों में किया जाना है। विशेष रूप से यहाँ इस देश में जहाँ लोग सोचते हैं, युक्तिसंगत बनाते हैं, विश्लेषण करते हैं; चूँकि यह आसान नहीं है। अन्यथा यदि आप इसे कर पाते, तो आप इसे स्वचालित रूप से कर सकते हैं  ईश्वर को मानना, स्वयं, एक प्रकार से आपकी निश्चित धारणाओं पर आधारित है। मुझे नहीं पता कि भगवान के बारे में आपके पास किस तरह की धारणाएं हैं, लेकिन माना कि कुछ निश्चित अवधारणाएं हैं, व्यक्तिगत। सभी के पास ईश्वर के लिए अलग-अलग अवधारणाएँ हैं। और हो सकता है कि आप देखें कि वह इतना सर्वशक्तिमान है और वह इतना महान है और आप बिना सोचे समझे उस के सामने नतमस्तक हो जाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं Read More …

Nabhi Chakra London (England)

                                                      नाभी चक्र  लंदन 1978-02-20 जिस तरह से इसे हमारे भीतर रखा गया है. नाभी चक्र के भी दो पहलू हैं- बायां और दायां। नाभी चक्र के बायीं ओर एक केंद्र के रूप में स्थित है या आप इसे चक्र या उप-चक्र कहते हैं जिसे चंद्र का अर्थात चंद्रमा कहा जाता है। बायीं ओर चंद्र केंद्र और दाहिनी ओर सूर्य केंद्र है और वे बिल्कुल चंद्र रेखा और सूर्य रेखा यानी पहले इड़ा और पिंगला पर स्थित हैं। ये दो केंद्र वे दो बिंदु हैं जिन तक हम जा सकते हैं और बाएं से दाएं जा सकते हैं। उससे आगे जब हम जाने लगते हैं तो आप हदें पार कर जाते हैं. अब ये दोनों केंद्र जब स्थानीयकृत होते हैं, तो देखिए कि उनमें ऊर्ध्वाधर स्पंदन प्रवाहित होते हैं, लेकिन जब वे उस बिंदु पर स्थानीयकृत होते हैं तो हम उन्हें कैसे बिगाड़ देते हैं। हमें समझना होगा. बायीं नाभी और दाहिनी नाभी एक दूसरे पर निर्भर हैं। यदि आप बायीं नाभी से बहुत अधिक खींचते हैं या बायीं नाभी पर बहुत अधिक काम करते हैं तो दाहिनी नाभी भी पकड़ सकती है। लेकिन कहते हैं हम एक-एक करके लेंगे. अब बाईं नाभी पकड़ी गई है, आम तौर पर यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति के घर पर खाना खाते हैं जो किसी एक प्रकार का अध्यात्मवादी है या जो सत्य साईं बाबा की तरह  प्रसाद दे रहा है, यह भयानक व्यक्ति है, उसकी वे विभूतियाँ हैं जैसा कि वे इसे कहते हैं क्योंकि यह श्मशान से आती है देखिये, उस राख Read More …

Deeper Meditation London (England)

                                               “गहन ध्यान”  लंदन, 20 फरवरी 1978 कुली (टोनी पानियोटौ) क्या आपने इसे लिखा है? श्री माताजी: नमस्ते, आप कैसे हैं? योगी: बहुत अच्छा, धन्यवाद। श्री माताजी: परमात्मा आप को आशिर्वादित करें ! आप कुर्सी पर बैठ सकते हैं। आराम से रहो। योगी: ओह, यह आप की बहुत कृपा है! श्री माताजी: कुली से कहो कि वह स्वयं के लिए लिख ले। योगी: वह कर रहा है। नमस्कार! डगलस आप कैसे हैं? क्या हाल है? डगलस फ्राई: बहुत अच्छा! श्री माताजी: बहुत बढ़िया लग रही है! एक फूल की तरह सुंदर! देखो, मेरे पास कितने सुंदर बच्चे हैं, बिलकुल यहाँ फूलों की इन पंखुड़ियों की तरह। क्या आप थोड़ी देर के लिए एक खिड़की खोल सकते हैं। बस पांच मिनट के लिए खिड़की खोलें। आराम से बैठो। इस तरह सहज रहें। मेरा मतलब। हां, बहुत सहज रहें। एक को बहुत, बहुत सहज, बहुत सहज होना पड़ता है। मुझे मिलने से पहले ही उसे यह प्राप्त हो गया था ! क्योंकि इससे पता चलता है कि यह हवा में लहरा रहा है। आज मैं आपको आगे के ध्यान के बारे में बताना चाहती हूं कि: हमें कैसे बढना है और कैसे खुद को समझना है। आप देखिए अभी तक चीज़ों से व्यवहार करने की आप की आदतें अथवा तौर-तरीके रहे हैं : जिस भी तरह से आपने अपनी सांसारिक,व्यक्तिगत, भौतिक और, शरीर की समस्याओं निपटा है, लेकिन अब जैसे ही आपने परमात्मा के राज्य में प्रवेश किया है और ईश्वर की शक्ति आपके माध्यम से बह रही है, आपको पता होना चाहिए Read More …

Triguna New Delhi (भारत)

Trigun – Bhartiy Sanskruti Ka Mahatva IV Date 3rd February 1978 : Place Delhi : Public Program Type : Speech Language Hindi [Original transcript Hindi talk, Scanned from Hindi Chaitanya Lahari] जिस शक्ति को आप इस्तेमाल कर रहे हैं उसे चल रहा है, माताजी थोड़ा म्यूजिक कर दें? हमने Refill कर लेते हैं हम। Modern बीमारी एक और कहा कर दो भाई। ऐसे ही बैठेगें आराम से। हमारे जिसे हम Tension कहते हैं। Tension’ मुझे तो Vibrations चलते रहते हैं, आप Receive करते Tension आ गया, पहले किसी को Tension नहीं रहिए। अब उन्होंने ज़रा लम्बा चौड़ा कर दिया जरा Music, तो लोग कहने लगे अब जरा जल्दी खत्म आता थी। तब तो Tension आना ही हुआ कि आप निकले पुरानी दिल्ली से माताजी के Programme करो, जल्दी खत्म करो। मैंने कहा क्यों भई तुमको में जाने के लिए। अब 6.30 बजे पहुँचना ही चाहिए, मेरा Lecture सुनने का है पर मेरी तो आज तबियत पहले सीट पर बैठना ही चाहिए। देर से जाएंगे, नहीं कर रही। अपने तो तबीयत से चलते हैं, कोई हर्ज नहीं, देर से भी आ सकते हैं। वो समय Temperamental आदमी हैं, अभी आज तो भई आप के आने का था आप आ गए कोई बात नहीं। ऐसी कौन सी आफत मची हुई हैं? भाई मुझे कहाँ भी सुनो मेरे साथ। आराम से क्यों नहीं सुनते? जाने का है और आपको कहाँ जाने का है? आराम अच्छा म्यूजिक चल रहा है, भई सुनो। ऐसी कौन तबीयत हो नहीं रही। तो म्यूजिक ही सुनने दो, तुम Read More …

Sahajyog, Kundalini aur Chakra मुंबई (भारत)

Sahajyog, Kundalini aur Chakra, Mumbai, India 30-01-1978 सहजयोग, कुण्डलिनी और चक्र मुंबई, ३० जनवरी ७८  ये सहज क्या होता है? आप में से बहुतों को मालूम भी है । नानक साहब ने बड़ी मेहनत की है और सहज पर बहुत कुछ लिखा है । यहाँ आप लोगों पर बड़ा वरदान है उनका। लेकिन उनको कोई जानता नहीं है, समझता नहीं। सहज’ का मतलब होता है स ह ज। ‘सह’ माने साथ, ‘ज’ माने पैदा होना। आप ही के साथ पैदा हुआ है। यह योग का अधिकार आपके साथ पैदा हुआ है। हर एक मनुष्य को इसका अधिकार है कि आप इस योग को प्राप्त करें। लेकिन आप मनुष्य हो तब! अगर आप जानवर हो गये तो इस अधिकार से वंचित हो जाते है या आप दानव हो गये तो भी इस अधिकार से वंचित हो जाते है। अगर आप मनुष्य है साधारण तरह से तो आप को अधिकार है कि इस योग को आप प्राप्त करें। यही एक योग है बाकी कोई योग नहीं। बाकी जितने भी योग है इसकी तैय्यारियाँ। सहजयोग के और दूसरे माने यह भी लगाते हैं हम लोग कि सहज माने सीधा, सरल, effortless, spontaneous, अकस्मात घटित होनेवाली चीज़ क्योंकि ये एक जिवन्त घटना है।  तो ऐसे गुरू जो पालना चाहते हैं उनका यह स्थान नहीं है । सीधा हिसाब हैं मैं हाथ जोड़़ती हैँ। चाहें मेरे पास दो ही शिष्य रहें मुझे कोई हर्ज नहीं। जिसको सत्य चाहिए वो यहाँ आए। पहली चीज़ जीसको सत्य नहीं चाहिए और असत्य के पिछे भागना चाहते हैं वो Read More …

Atma Ki Anubhuti मुंबई (भारत)

Atma Ki Anubhuti, 28th December 1977 [Hindi Transcription]  ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK आपसे पिछली मर्तबा मैंने बताया था, कि आत्मा क्या चीज़ है, वो किस प्रकार सच्चिदानंद होती है, और किस प्रकार आत्मा की अनुभूति के बाद ही मनुष्य इन तीनों चीज़ों को प्राप्त होता है। आत्मसाक्षात्कार के बगैर आप सत्य को नहीं जान सकते। आप आनन्द को नहीं पा सकते। आत्मा की अनुभूति होना बहुत जरूरी है। अब आप आत्मा से बातचीत कर सकते हैं। आत्मा से पूछ सकते हैं। आप लोग अभी बैठे हुए हैं, आप पूछे, ऐसे हाथ कर के कि संसार में क्या परमात्मा है? क्या उन्ही की सत्ता चलती है? आप ऐसे प्रश्न अपने मन में पूछे। ऐसे हाथ कर के। देखिये हाथ में कितने जोर से प्रवाह शुरू हो गया। कोई सा भी सत्य आप जान नहीं सकते जब तक आपने अपनी आत्मा की अनुभूति नहीं ली। माने जब तक आपका उससे संबंध नहीं हुआ। आत्मा से संबंध होना सहजयोग से बहुत आसानी से होता है। किसी किसी को थोड़ी देर के लिये होता है। किसी किसी को हमेशा के लिये होता है। आत्मा से संबंध होने के बाद हम को उससे तादात्म्य पाना होता है। माने ये कि आपने मुझे जाना, ठीक है, आपने मुझे पहचाना ठीक है, लेकिन मैं आप नहीं हो गयी हूँ। आपको मैं देख रही हूँ और मुझे आप देख रहे हैं। इस वक्त मैं आपकी दृष्टि से देख सकूँ, उसी वक्त तादात्म्य हो गया। आत्मा के अन्दर प्रवेश कर के वहाँ से आप जब संसार पे दृष्टि डालते Read More …

Prem Dharma मुंबई (भारत)

Prem Dharma Date : 23rd March 1977 Place Mumbai Type Seminar & Meeting Speech Language Hindi [Hindi Transcript] ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK बहुतों को ऐसा लगता है जब वो पहली मर्तबा देखते हैं कि ये कोई बच्चों का खेल है कि कुण्डलिनी जागरण है? कुण्डलिनी जागरण के बारे में इतना बताया है दुनिया भर में कि सर के बल खड़ा होना, दुनिया भर की आफ़त करना , और इतने सहज में कुण्डलिनी का जागरण कैसे हो जाता है ? आप में से जो लोग पार हैं, यहाँ अधिक तर तो पार ही लोग बैठे हये हैं, उनकी जब कुण्डलिनी जागरण हुई तब तो आपको पता ही नहीं चला की कैसे हो गयी! लेकिन अब जब दूसरों की होती देखते हैं तो पता चलता है कि हाँ, भाई, हमारी हो गयी। क्योंकि आप एकदम से ही चन्द्रमा पर पहुँचते हैं। कैसे पहुँचे, क्या पहुँचे पता नहीं चला। उसका कारण तो है ही और उसका उद्देश्य भी है। | फलीभूत होने का समय जब आता है तभी फल लगते हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं की बाकी जो होता रहा वो जरूरी नहीं था। वो भी था जरूरी और अब फल होना भी जरूरी है । कोई कहता है कि दस हजार वर्ष हो गये तब से तो कोई पार नहीं हुआ , अभी कैसे हो गये ? भाई, दस हजार वर्ष पहले तो चन्द्रमा पर कभी गये नहीं थे अब क्यों जा रहे हैं? और अगर जा रहे हैं तो उसमें शंका करने की क्या बात है? रामदास स्वामी ने बताया Read More …

Advice at Bharatiya Vidya Bhavan मुंबई (भारत)

परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी सार्वजनिक प्रवचन, भारतीय विद्या भवन, बंबई, भारत 22 मार्च 1977 भारतीय विद्या भवन में सलाह (प्रश्न और उत्तर) यह प्रकाश आप को इसलिए प्रदान किए गया है, क्योंकि आप दूसरों को प्रकाश देते हैं। यदि आप इसे दूसरों को नहीं देते हैं, तो धीरे-धीरे यह प्रकाश फीका पड़ जाता है। आपको यह प्रकाश ऐसे रास्ते पर रखना चाहिए, जहां लोग अंधकार में भटक रहे हों। इस प्रकाश को मेज के नीचे ना रखें, जहां ये बुझ जाए। आप लोग यहां आएं, अगर आप को कोई समस्या है, कोई बीमार है तब हम इस के (उपचार) बारे में भी बताएंगे, और इसी प्रकार ये लोग आप को सहज योग के विषय में बताएंगे। (श्री माताजी मराठी भाषा में – फड़के और अन्य सहज योगी वहां जाइए। उन्हे कुंडलिनी और सहज योग के बारे में बताइए। ये दो दिन में समाप्त नहीं होगा। इस में समय लगेगा। अब हमारे साथ लोग हैं जो वास्तव में बहुत ही अच्छे हैं। वे कुंडलिनी के विषय में सब कुछ जानते हैं।) उन्होंने कुंडलिनी पर पूरी तरह से महारत हासिल कर ली है। कुछ लोग हैं, आप जानते हैं, लेकिन कुछ हैं जिन्हे पांच वर्ष पूर्व आत्म साक्षात्कार प्राप्त हुआ था, पर वो एक शब्द भी नहीं जानते। उसके विपरीत, वे ऐसे ही आ कर हम से पूछते हैं, ”मेरी मां बीमार हैं। कृपया उनका उपचार कीजिए। मेरे पिता बीमार हैं। मेरा उपचार कीजिए। मेरा ये बीमार है।” बस इतना ही। इसलिए वे किसी काम के नहीं हैं। तो इसलिए Read More …

Sab Chijo me Mahamantra ho New Delhi (भारत)

Sab Chijo me Mahamantra ho, India, 16-03-1977 सब चीज़ों में महामन्त्र हो भारत, १६ मार्च १९७७  कल आपसे मैंने बताया था ध्यान के वक्त कि आप इस तरह से हाथ कर के मेरी ओर बैठें और आपके अन्दर चैतन्य धीरे-धीरे बहता हुआ आपकी कुण्डलिनी को जागृत कर देगा। ये सारी प्रक्रिया ऐसी लगती है जैसे कोई बच्चों का खेल है। और आप लोगों ने इन लोगों को देखा भी होगा जो यहाँ पर सहजयोगी लोग थे कि वो अपने हाथ को घूमा-घूमा कर के और आपको कुछ चैतन्य दे रहे थे और कुछ कार्य कर रहे थे। मामूली तौर से ये चीज़ अगर देखी जाये तो एक बच्चों का खेल लगता है।  जिस वक्त मोहम्मद साहब ने लोगों को नमाज पढ़ने के लिए बताया था तो लोग उनका मज़ाक करते थे और जिस वक्त अनादिकाल में ही होम-हवन आदि हमारे देश में शुरू किये गये थे तब भी ऐसे लोग थे जो सोचते थे कि ये क्या महामूर्खता है? ये क्यों करें? और जब वो बातें रूढ़ीगत हो जाती हैं तब मनुष्य इसको इस तरह से मान लेता है मानो ऐसे कि ये आपके जीवन का एक अंग है। जैसे नमस्कार करना। हम लोग, हिंदुस्तानी आदमी किसी को देखते ही नमस्कार कर लेते हैं। उसके बारे में ये पूछा नहीं करते कि इस तरह से दो हाथ जोड़ के हमने क्यों नमस्कार किया? और पूजा के समय हम इस तरह से आरती क्यों करते हैं और अपना हाथ इस तरह से क्यों घुमाते हैं? साथ में हम दीप ले कर Read More …