Birthday Puja New Delhi (भारत)

जन्म दिवस पूजा दिल्ली मार्च 21, 1992 हमारे देश में बहुत से सन्त हुए हैं हमने सिर्फ उनको मान लिया क्योंकि वो ऊंचे इन्सान थे। अब किसी भी धर्म में आप जाईए, कोई भी धर्म खराब नहीं है। जैसे अभी बताया कि बुद्ध धर्म है। मैंने बुद्ध धर्म के बारे में, पड़ा तो बड़ा आश्चर्य हुआ कि मध्य मार्ग बताया गया था लेकिन उस के बाद लोग उसको left (बाएँ) में और right (दाएँ) में ले गए। जो दाएँ मे ले गए वो पूरी तरह से सन्यासी हो गए, ascetic (त्यागी) हो बुद्ध गए। फिर उन्होंने बड़े बड़े कठिन मार्ग और उपद्रव निकाले। उन्होने सोचा कि क्योंकि सन्यासी हो गऐ थे, बहुत कठिन मार्ग से उन्होंने इसे प्राप्त किया। इसलिए हमें भी उसी मार्ग पर चलना चाहिए। पर उसकी इतनी कठिन चीजें उन्होने कर दीं, कि ज़मीन पर सोना, ठंड उसी में बहुत से लोग खत्म हो गए। एक ही मरतबा खाना में रहना आदि। उन्होंने अपनी जो कुछ भी निसर्ग में दी हुयीं जरूरतें थीं, उन्हें पूरी तुरह से, दबा. दिया। इस. तरह के दबाव डालूने से मनुष्य का स्वभाव बहुत उत्तेजित सा हो जाता है। इतना ही नहीं aggressive (आततायी) भी हो जाता है । उस में बहुत क्रोध समा जाता है ।क्रोध को दबाने से क्रोध और बढ़ता है और ऐसे लोग कभी कभी supra conscious (ऊपरी चेतना) में चल पड़ते हैं और उन्हें कुछ-कुछ ऐसी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं जिससे वो दूसरे लोगों पर अपना असर डाल सकते हैं। हिटलर के साथ यही हुआ। हिटलर Read More …

Birthday Puja मुंबई (भारत)

Birthday Puja Date 17th March 1992 : Place Mumbai Puja Type Hindi & English Speech Language [Original transcript Hindi talk, scanned from Hindi Chaitanya Lahari] सहज” सहज समाधी लागो। सहज में ही आपके अन्दर ये भावना आ जाती है। हिन्दुओं में अब जो बताया गया है कि सबव में आत्मा है, एक ही आत्मा का वास है। फिर हम जात-पात हमारे देश में बहुत से सन्त हुए हमने सिर्फ उनको मान लिया क्याोंकि वा ऊँचे इंसान थे। किसी भी धर्मं में आप जाईये काई भी धर्म खराब नहीं। मैंन बुद्ध धर्म के वारे में पढ़ा तो बड़ा आश्चर्य हुआ कि मध्य मार्ग बताया गया था। लेकिन उसके कैसे कर सकते है? पहली बात तो यह सोचनी चाहिये कि वाद लोग उसको बायें में और दायें में ले गये जो दायें में ले गये वो पूरी तरह से सन्यासी हो गये, त्यागी हो गए। फिर डाकू भी था और बह एक मछुआरा था। उससे रामायण राम उन्होंने बड़े-बड़े कठिन मार्ग और उपद्रव निकाले। उन्होंने सोचा ने लिखा दिया। भीलनी के झूठे बेर खा के दिखा दिया। और कि बुद्ध सन्यासी हो गए थे तो उन्होंने भी सन्यास ले लिया। गीता का लेखक व्यास कोन था? वो भी एक भीलनी का अपनी सभी इच्छाओं का दमन कर लिया उन्होंने।इस तरह का स्वभाव व्यक्ति का अति उग्र, इतना ही नही आतताई भी बना देता हैं। उसमें बहुत क्रोध समा जाता है। क्रोध को दबाने से क्रोध और बेढ़ता रामायण जिसने लिखा वी कौन था? बाल्मीकी एक डाक था, नाजायज पुत्र था। ये सब Read More …

Public Program, Sahajayog ka arth कोलकाता (भारत)

  1992 -02-05 पब्लिक प्रोग्राम, सहज योगा का अर्थ कोलकाता इण्डिया कल जैसे बताया की सत्य है वो निर्धारित है | अपनी जगह स्थित है | हम उसकी कल्पना नहीं करते, उसके बारे में हम कोई भी  उपमा वर्णन नहीं दे सकते, ना ही उसको हम बदल सकते है  और बात तो ये है की इस मानव चेतना में हम उस सत्य को जान नहीं सकते | ये तो मानना चाहिए की साइन्स अब अपनी चरम सीमा पर पहुच गया है और उससे उसको फायेदा जो भी किया, किन्तु उसके साथ ही साथ आएटटम बोअम, हाइड्रोजन बोअम, प्लास्टिक के पहाड़ तैयार कर दिए है | प्लास्टिक रूप में जो कुछ भी हुआ वो इस तरह सीमा के बाहर लाहांग गया की आप जानते है की आप जानते है की कलकत्ता शहर में भी इस कदर पोल्यूशन है | ये सब होने का कारण ये ऐसा की मनुष्या अपना संतुलन  खो बैठता है| वो ये नहीं जनता है कि कितने दूर जाना है और कहा उसे रोकना है |  इस वजह से जो कुछ भी मनुष्य करता है वो बाद में किसी को नहीं बताता मानव की जो सारी चेतना आज हमने प्राप्त की है | ये हमारे उत्क्रांति में, हमारे एवोल्यूशन में हमें सहज ही मिली हुई है | हमने कोई ऐसा विशेष कार्य नहीं किया कि जिससे हम मानव बने | सहज में ही आप ने इसे प्राप्त किया, जो चीज़ आप ने सहज में प्राप्त की है वो बड़ी ऊंची चीज़ श्रेष्ठ चीज़ है की आप मानवरूप है | Read More …

Shri Ganesha Puja (भारत)

(श्रीमाताजी निर्मला देवी, श्री गणेश पूजा, कलवे (भारत, 31 दिसम्बर 1991) मैं उनको बता रही थी कि श्री गणेश की पूजा करना कितना महत्वपूर्ण है। आप सब फोटोग्राफ्स ( माइरेकल फोटोग्राफ्स) आदि के माध्यम से जानते ही हैं कि वे जागृत देवता हैं और उनका निवास स्थान मूलाधार पर है। वास्तव में वह सभी विश्वविद्यालयों के कुलपति हैं … मैं कहना चाहती हूं कि वह तो सारे चक्रों पर विराजमान हैं। उनके बिना कुछ भी कार्यान्वित नहीं हो सकता क्योंकि वह तो स्वयं साक्षात्  पवित्रता हैं। अतः जहां भी हमारी कुंडलिनी जाती है वह वहां वहां पवित्रता की वर्षा करते हैं और उनकी स्वच्छ करने की शक्ति के कारण श्री गणेश आपके चक्रों को स्वच्छ करते हैं। अतः श्री गणेश के गुणों को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि किस तरह से वह आपके चक्रों पर कार्य करते हैं और किस तरह से वह आपकी सहायता करते हैं। हम उनकी कितनी ही पूजा करें, कितना ही उनका गुणगान करें लेकिन हमें  यह भी देखना है कि हमने उनकी पवित्रता, पावनता और विवेकशीलता जैसे गुणों में से कितने गुणों को आत्मसात् किया है। हमें यह समझना है कि विवेक कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे किसी के अंदर जागृत किया जा सके या इसे सूझ-बूझ से किसी के अंदर स्थापित किया जा सके। ये तो एक ऐसा अंतर्जात गुण है जिसे परिपक्वता से ही प्राप्त किया जा सकता है और इस परिपक्वता को कुंडलिनी पर चित्त डालकर ही प्राप्त  किया जा सकता है ….. कुंडलिनी को परमात्मा की सर्वव्याप्त शक्ति से जोड़कर Read More …

Shri Ganesha and Christmas Puja Ganapatipule (भारत)

Christmas Puja IS Date 24th December 1991 : Ganapatipule Place : Type Puja Speech [Original transcript Hindi talk, scanned from Hindi Chaitanya Lahiri] आज का याग अति विशेष है। इस विशेष दिन को अंगार की चतुर्थी अथवा कृष्णपक्ष की चतुर्थी कहते हैं। प्रत्येक चतुर्थों को, जो कि महीने के चौथे दिन पडती है, को श्री गणेश का जन्मदिन मनाया जाता है। मंगलवार के दिन आयो इस चतुर्थी का विशेष महत्व हाता है। आज यही दिन है। हम सब मंगलवार, अंगार की चतुर्थी के दिन गणपति पुल में आये हैं। आज के दिन श्री गणेश की पूजा के लिए हजारा लोग यहाँ आते हैं। कि क्या करें। नम्रता तथा विवेक श्री गणेश जी को विशेषताएं हैं। ये दोनों गुण ग्णेश तत्व की देन हैं । सुन्दर चाल से चलने वाली स्त्री को भी गज गामिनी कहते हैं। हाथी केवल घास खाते हैं फिर भी अत्यंत शक्तिशाली होते हैं, वड़े-बड़े वजन ढाते हैं फिर भी बड़े शान्त स्वभाव के होते हैं। किसी भी चीज के लिए वे जल्दी नहीं करते। उनकी स्मरणशक्ति भी बहुत तीव्र होती है। जब भी आप की बायों और दुर्बल हा जाती है तो आपकी स्मरण शक्ति धुंध्रला जाती है। ऐसा इसलिए हाता है क्योंकि आपके अन्दर गणेश तत्व कम हो गया है। जब आप बहुत अधिक दायों ओर को झुक जाती है तो बायीं ओर का गणेश तत्व कम हो जाता है। अति कर्मी लोगों की स्मरण शक्ति भी वृद्धावस्था में समाप्त हो जाती है। सहजयोगियों को समझना चाहिए कि जा भी कुछ घटित हाता है, उसे Read More …

Shri Mahalakshmi Puja (भारत)

Shri Ganesha Puja 21st December 1991 Date : Kolhapur Place Type Puja Speech Language English, Hindi & Marathi आप लोग इतनी दिल्ली से यहाँ पर पहुँचे हैं और सब का प्यार है जो खिंच के लाया आपको यहाँ पर। मैं दूर समझा नहीं सकती कि मुझे कितना आनन्द हुआ है कि आप लोग सब यहाँ हैं। दिल्ली में तो मुलाकात होती ही रहती है और बहुत लोगों से मुलाकात होती रही और सब को देखते रहे हम और आप लोगों ने बहुत प्रगति कर ली है। बड़े आश्चर्य की बात है, दिल्ली जैसा शहर जिसको की मैं हमेशा बिल्ली कहती थी। मैं कभी दिल्ली कहती नहीं थी। क्योंकि वहाँ के लोग, जिस वक्त मैं वहाँ रही, जब मेरी वहाँ शादी हुई तो सिवाय पॉलिटिक्स के कुछ बात ही नहीं करते थे । लेकिन शुरू के जमाने में वहाँ बहुत बड़े बड़े लोग हो गये। और जब वो पॉलिटिक्स की बात करते थे, तो यही कि, ‘हमारे देश की हालत कैसे ठीक होगी?’ क्योंकि मेरे पिताजी कॉन्स्टिट्यूट असेम्ब्ली के मेंबर थे, तो कैसा कॉन्स्टिट्यूशन बनना चाहिए? मतलब बहुत गहरी बाते करते थें। था तो पॉलिटिक्स ही, लेकिन उस पॉलिटिक्स में और आज कल के पॉलिटिक्स में बहुत ही ज्यादा फर्क हैं। और फिर उसके बाद पता नहीं कहाँ से सब लोग वहाँ पे पहुँच गये खटमल जैसे। सारे देश का खून चूसने वाले वहाँ पहुँच गये। और उन्होंने जिस तरह से | वहाँ पर राजकारण जमाना शुरू कर दिया, अनीति शुरू कर दी। तो मैं खुद ही सोचती थी, कि दिल्ली Read More …

Public Program Day 1 (भारत)

Public Program [Hindi]. Hyderabad, Andhra Pradesh (India), 11 December 1991. सत्य को खोजने वाले आप सभी साधकों को हमारा नमस्कार। हम जब सत्य की बात कहते हैं तो यह पहले ही जान लेना चाहिए कि सत्य अपनी जगह अटल और अटूट है। उसे हम बदल नहीं सकते उसे हम अपने दिमाग से परिवर्तित नहीं कर सकते और उसके बारे में हम कल्पना भी नहीं कर सकते। सबसे तो दुख की बात यह है कि इस मानव चेतना से हम जान भी नहीं सकते कि सत्य क्या है। हम लोगों को यह सोचना चाहिए कि परमेश्वर ने यह इतनी सृष्टि सुंदर बनाई है, इतने सुंदर पेड़ हैं, फूल है, फल है, हमारा हृदय स्पंदित होता है यह सारी जीवित क्रिया कैसे होती है। हम कभी विचार भी नहीं करते यह हमारी आंख है देखिए कितना सुंदर कैमरा है। हम कभी विचार भी नहीं करते कि यह इतना सुंदर कैमरा, इतना बारीक, इतना नाजुक, किसने बनाया है और कैसे बनाया है। हम तो इसको मान लेते हैं, बस है हमारी आंख है, लेकिन यह आपके पास आई कैसे, इसके बनाने वाली कौन सी शक्ति है। यही शक्ति है जिससे कि पतंजलि योग में ऋतंभरा प्रज्ञा कहा गया है और उसे परम चैतन्य, ब्रह्मचैतन्य, रूह, ऑल परवेडिंग पॉवर ऑफ़ गोड्स लव कहते हैं। यह सब उसी एक शक्ति के नाम है, वही जीवंत शक्ति सभी कार्य करती है। उसी ने हमें अमीबा से इंसान बना दिया लेकिन अब हमें यह जानना चाहिए कि अगर इंसान बनाना है, आखिरी कार्य था तो इंसान तो Read More …

Birthday Puja मुंबई (भारत)

जन्म दिवस पूजा मुम्बई मार्च 21, 1991 सारे विश्व में आज हमारे जन्म दिवस की खुशियां मनाई जा रही हैं। यह सब देखकर जी भर आता है कि क्या कहें आज तक किसी भी बच्चों ने अपनी माँ को इतना प्यार नहीं किया होगा जितना आप मुझे देते हैं। ये श्री गणेश की महिमा है जो अपनी माँ को सारे देवताओं से भी ऊंचा समझते थे और उनकी सेवा में लगे रहते थे। इसलिए वह सर्व सिद्धि प्राप्त कर गये यह तो नैसर्गिक है कि हर माँ को अपने बच्चों से प्यार होता है और वह अपने बच्चों के लिए हर तरह का त्याग करती है। और उसे उनसे कोई अपेक्षा भी नहीं होती। लेकिन हर माँ चाहती है कि मेरा बेटा चरित्रवान हो, नाम कमाये, पैसा भी कमाये। इस तरह की एक सांसारिक माँ की इच्छाएं होती हैं। लेकिन आध्यात्मिक माँ का स्थान जो आपने मुझे दिया है मुझे तो कोई भी इच्छा नहीं । मैं सोच रही थी कि मैं कौन सी बात कहूं क्योंकि मुझे कोई इच्छा नहीं। शायद इस दशा में कोई इच्छा न रह जाये लेकिन बगैर इच्छा किए ही सब कार्य हो जायें, इच्छा के उदभव होने से पहले ही आप सब कुछ कर रहे हैं, तो मैं किस चीज़ की इच्छा करुं? जैसा मैंने चाहा था और सोचा था, मेरे बच्चे अत्यंत चरित्रवान, उज्जवल स्वभाव, दानवीर, शूरवीर, सारे विश्व का कल्याण करने वाले- ऐसे व्यक्तित्व वाले महान गुरु होंगे। सो तो मैं देख रही हूं कि हो रहा है। किसी में कम हो Read More …

Public Program Day 2, Atma Kya Hai New Delhi (भारत)

Atma Kya Hai Date 3rd March 1991 : Place New Delhi Public Program Type : Speech Language Hindi [Original transcript, scanned from Hindi Chaitanya Lahari] सत्य को खोजने बाले आप सभी साधकों को हमारा नमस्कार । डाक्टर साहब ने अभी आपको सभी चक्रों के बारे में बता दिया है । उसी प्रकार कल मैने आपको तीन नाड़ियों के बारे में बताया था ये थी ईड़ा, पिंगला और सुष्म्ना नाड़ी । ये सब नाड़ियां, ये सारी व्यवस्था, परमात्मा ने हमारे अन्दर कर रखी है । इस उत्क्रान्ति के कार्य में, जबकि हमारा विकास हुआ है, तब धीरे – धीरे एक अन्दर प्रस्फुटित हुआ । किन्तु सारी योजना करने के बाद, पूरी तरह से इसकी व्यवस्था करने के बाद भी एक प्रश्न था कि हमारे अन्दर ये जो परमेश्वरी यंत्र बनाया हुआ है इसको किस तरह उस परमेश्वरी तत्व से जोड़ा जाय । मैने आपको कल बताया था चारों तरफ ब्रहुम चैतन्य रूप ये परमात्मा का प्रेम, उनकी शुद्ध इच्छा कार्य कर रही है । लेकिन ये ब्रहम चैतन्य अभी तक कृत नहीं था इसलिए जब कलयुग घोर स्थिति में पहुंच गया तो उसी के साथ-साथ एक नया युग शुरू हुआ है जिसे हम कृतयुग कहते हैं और एक चक्र हमारे रा युग आ सकता है । है । इसी कारण सहजयोग में हजारों लोग पार होने लगे हैं अर्थात् सहस्रार का खोलना बहुत जरूरी था । इस कृतयु ग के बाद ही सत्य इस कृतयु ग मैं ये ब्रहृम चैतन्य कार्यान्वित हो गया जब से सहस्रार खुला है, कृतयुग शुरू हो Read More …

Public Program Day 1 New Delhi (भारत)

Sarvajanik Karyakram Date 2nd March 1991 : Place New Delhi Public Program Type : Speech Language Hindi [Original transcript Hindi talk, scanned from Hindi Chaitanya Lahari] सत्य को खोजने की जो सत्य को खोजने वाले आप सभी साधकों को हमारा नमस्कार । आवश्यकता हमारे अंदर पैदा हुई है, उसका क्या कारण है ? आप क हैं गे कि इस दुनियां में हमने अनेक कलयु ग में मनुष्य भ्रांति में पड़ गया है, परेशान हो गया है । उसे समझ नही आता कि ऐसा क्यों हो रहा है । तब एक नए तरह के उसको विल्यिम ब्लेक ने ‘मैन । चारों तरफ हाहाकार दिखाई दे रहा है । कष्ट उठाए तकलीफें उठाई मानव की उत्पत्ति हुई है, एक सुजन हुआ है । उसे साधक कहते हैं ऑफ गाड’ कहा है । आजकल तो परमात्मा की बात करना भी मुश्कल है फिर धुम की चर्चा करना तो ही कठिन है क्योंकि परमात्मा की बात कोई करे तो लोग पहले उंगली उठा कर बताएँ गे कि जो में, मस्जिदो में चर्चों में गुल्द्वारां में घूमते है, उन्हंने कोन से बड़े इन्होंने कोन-सी बड़ी शांति से सन्मार्ग से चलते हैं । किसी भी धर्म में कोई भी मनुष्य हो किसी भी धर्म का बहुत लोग बड़े परमात्मा को मानते हैं, मन्दिरों भारी उत्तम कार्य किए है ? आपस में लड़ाई, झगड़ा, तगाशे खड़े किए हैं । दिखाई है ? ये कोन पालन करता है, परमात्गा को किसी तरह से भी मानता हो, लेकिन हर एक तरह का पाप वो कर सकता है । उस Read More …

Holi Celebrations New Delhi (भारत)

होली पूजा २८ फेब्रुवारी १९९१, दिल्ली आम् प तो इतिहास जानते हैं और पौराणिक बात भी जानते हैं कि होलिका को जलाने पर ही होली जलाई जाने लगी और इसमें किसानों के लिए भी उनका सब काम-वाम खत्म हो गया और ये सोच करके कि अब सब कुछ जो बोया था उसका फल मिल गया था। उसको बेच-बाच कर आराम से बैठे हैं, तो थोड़ासा उसका आनन्द भोगना चाहिए, पर इससे भी पहली बात ये है कि होली की शुरुआत जो थी हालांकि ये होलिका का दहन जो हुआ उसी मुहूर्त में बिठायी हुई बात है। ये काम श्रीकृष्ण ने किया क्योंकि श्रीराम जब संसार में आये तो श्रीराम ने मर्यादायें बाँधी। अपने, स्वयं अपने जीवन से, अपने तौरतरीकों से, अपने आदर्शों से, अपने व्यवहार से कि मनुष्य जो है मर्यादा पुरुषोत्तम की ओर देखे। ये मर्यादा पुरुषोत्तम जो है ये एक चरित्र, ये एक महान आदर्श हम लोगों के सामने रखा गया कि जो राज्यकर्ता है, जो राजा हैं वो हितकारी होने चाहिए, जिसे सॉक्रेटिस ने ‘बिनोवलेंट किंग’ कहा है। वो आदर्श स्वरूप श्रीराम हमारे इस संसार में हैं और इतना बड़ा आदर्श उन्होंने सबके सामने रखा कि लोगों के हित के लिए, जनमत के लिए उन्होंने अपनी पत्नी तक का त्याग कर दिया, हालांकि उनकी पत्नी साक्षात महालक्ष्मी थीं । वो जानते थे कि उन्हें कुछ नहीं हो सकता। तो भी लोकाचार में, दुनिया के सामने उन्होंने अपने पत्नी को त्याग दिया कि जिससे लोकमत हमारे प्रति विक्षुब्ध न हो और लोकमत का मान रखें। लेकिन वर्तमान काल Read More …

Christmas Puja Ganapatipule (भारत)

Christmas Puja 25th December 1990 Date : Ganapatipule Place Type Puja आपमें से लोग मेरी बात इंग्लिश में नहीं समझ पाये होंगे। ईसामसीह का आज जन्म दिन है और मैं कुछ समझा रही थी कि ईसामसीह कितने महान हैं। हम लोग गणेश जी की प्रार्थना और स्तुति करते हैं क्योंकि हमें ऐसा करने को बताया गया है। पर यह है क्या? गणेशजी क्या चीज़ हैं? हम कहते हैं कि वो ओंकार हैं, ओंकार क्या है? सारे संसार का कार्य इस ओंकार की शक्ति से होता है। इसे हम लोग चैतन्य कहते हैं, जिसे ब्रह्म चैतन्य कहते हैं। ब्रह्म चैतन्य का साकार स्वरूप ही ओंकार है और उसका मूर्त-स्वरूप है या विग्रह श्री गणेश हैं। इसका जो अवतरण ईसामसीह हैं। इस चीज़ को समझ लें तो जब हम गणेश की स्तुति करते हैं तो बस पागल जैसे गाना शुरू कर देते हैं। एक-एक शब्द में हम क्या कह रहे हैं? उनकी शक्तियों का वर्णन हम कर रहे हैं। पर क्यों? ऐसा करने की क्या जरूरत है? इसलिए कि वो शक्तियाँ हमारे आ जायें और हम भी शक्तिशाली हो जायें । इसलिए हम गणेश जी की स्तुति करते हैं। ‘पवित्रता’ उनकी सबसे बड़ी शक्ति है। जो चीज़ पवित्र होती है वो सबसे ज़्यादा शक्तिशाली होती हैं। उसको कोई छू नहीं सकता। जैसे साबुन से जो मर्जी धोइए वो गन्दा नहीं हो सकता। एक बार साबुन भी गन्दा हो सकता पर यह ओंकार अति पवित्र और अनन्त का कार्य करने वाली शक्ति है। इस शक्ति की उपासना करते हुए हमें याद रखना है Read More …

Shri Mahalakshmi Puja Kolhapur (भारत)

Shri Mahalakshmi Puja Date 21st December 1990 : Place Kolhapur Type Puja Speech Language Hind मैं आपसे बता चुकी हूँ कि महाराष्ट्र में त्रिकोणाकार अस्थि और उसमें कुण्डलाकार में शक्ति विराजती है । महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती और आदिशक्ति इस तरह से साढ़े तीन कुण्डलों में बैठी हुई है। माहुरगढ़ में महासरस्वती हैं जिन्हें रेणुका देवी भी कहते हैं। तुलजापुर में भवानी है जिन्हें महाकाली कहते हैं और कोल्हापुर में महालक्ष्मी का स्थान है। यहाँ से आगे सप्तश्रृंगी नाम का एक पहाड़ है जिस पर आदिशक्ति की अर्धमात्रा है। इस प्रकार ये साढ़े तीन शक्तियाँ इस महाराष्ट्र में पृथ्वी तत्व से प्रकट हुई हैं। और यहीं पर श्री चक्र भी विराजता है। आप सब जानते हैं कि महालक्ष्मी ही मध्यमार्ग है जिससे कुण्डलिनी का जागरण होता है। इसलिए हजारों वर्षों से इस महालक्ष्मी मन्दिर में ‘उदे अम्बे’ कहा जाता है। क्योंकि अम्बा ही कुण्डलिनी है और कुण्डलिनी की शक्ति महालक्ष्मी में ही जागृत हो सकती है। इसलिए महालक्ष्मी के मन्दिर में बैठ कर अम्बा के गीत गाये जाते हैं। इसी स्थान पर अम्बा ने कोल्हापुर नामक राक्षस को मारा था, इसलिए इसका नाम कोल्हापुर पड़ा। कोल्हा का अर्थ है सियार। सियार के रूप में आये राक्षस का वध देवी ने किया। लेकिन जहाँ भी मन्दिरों में पृथ्वी तत्व ने ये स्वयंभू विग्रह तैयार किये हैं वहाँ लोगों ने बुरी तरह से पैसा बनाना शुरू कर दिया है । मन्दिरों की तरफ कुछ भी ध्यान नहीं दिया गया। इसलिए कभी-कभी लगता है इन मन्दिरों में चैतन्य दब सा जाएगा। अब आप लोग Read More …

Public Program Day 1 कोलकाता (भारत)

1st Public Program C Date 10th April 1990 : Place Kolkata Public Program Type Speech Language Hindi [Original transcript Hindi talk, scanned from Hindi Chaitanya Lahari] सत्य के बारे में जान लेना चाहिए कि सत्य अनादि है और उसे हम मानव बदल नहीं सकते। सत्य को हम इस मानव चेतना में नहीं जान सकते । उसके लिए एक सूक्ष्म चेतना चाहिए। जिसे आत्मिक चेतना कहते हैं। आप अपना दिमाग खुला रखें वैज्ञानिक की तरह, और अगर सत्य प्रमाणित हुई तो उसे अपने इमानदारी में मान लेना चाहिए। एक महान सत्य यह है कि सृष्टि की चालना एक सूक्ष्म शक्ति करती है जिसे परम चैतन्य कहते हैं। ये विश्व व्यापी है और हर अणु-रेणु में कार्यान्वित है । हमारे शरीर के स्वयं चालित ( ओटोनौमस संस्था ) को चलाती है। जो भी जीवित- कार्य होता है वो उससे होता है पर अभी हममें वो स्थिती नहीं आई है जिससे हम परम चैतन्य को जान लें। दूसरा सत्य यह है कि हम यह शरीर,बुध्दी, अहंकार और भावनाफँ आदि उपादियां नहीं हैं। हम केवल आत्मा हैं। और ये सिध्द हो सकता है। तीसरा सत्य यह है कि हमारे अन्दर एक शक्ति है जो त्रिकोना- कार असती में स्थित है, और यह शक्ति जब जागृत हो जाती है तो हमारा सम्बन्ध उस परम चैतन्य से प्रस्थापित करती है। और इसी से हमारा मसा आत्म दर्शन हो जाता है। फिर हमारे अन्दर एक नया तरह का अध्याम तैयार हो जाता है, जो हमारे नसँ पर जाना जाता है। जो नस नस में जानी जाए वोही Read More …

Shri Adi Shakti Puja कोलकाता (भारत)

Shri Adi Shakti Puja, 9th April 1990, Kolkata ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK Scanned from Hindi Chaitanya Lahiri कलकल्ता की आप लोगों की पूरगति देखकर बडा आनन्द आया। और में जानती हैं कि इस शहर में अनेक लोग बड़े गहन साधक हैं। उनको अभी मालू म नहीं है कि ऐसा समय आ गया है जहाँ बो जिसे रखोजते हैं, को उसे पा लें। आप लोगों को उनके तक पहुँचा चाहिए, और ऐसे लोगों की सोज बीन रखनी चाहिए जो लोग सत्य को खोज रहे हैं। इसलिप आवश्यक है कि हम लोग अपना किस्तार चारों तरफ करें। अपना [भी जीवन परिवर्तत करना चाहिए। अपने अपनी भी शवती बढ़ानी चाहिए। लेकिन उसी के साथ हमे जीवन को भी एक अटूट योगी जैसे प्रज्जलित करना चाहिए जिसे लोग देखकर के पहचानेंगे कि ये कोई बिशेष क्यवित है। ध्यान धारणा करना बहुत ज़रूरी है। कलकत्ता एक बड़ा व्यस्त शहर है और इसकी व्वस्तता में मनुष्य डूब जाता है। उसको समय कम मिलता है। ये जो समय हम अपने हाथ में बाँधे हैं, ये समय सिर्फ अपने उत्धान के लिए और अपने अ्दर पुगति के लिए है। हमें अगर अन्दर अपने को पूरी तरह से जान लेना है तो आवश्यक है कि हमें थोडी समय उसके लिएट रोज ध्यान धारणा करना है। शाम के कात और सुबह चोड़ी देर। उनमें जो करते हैं और जो नहीं करते, उनमें बहुत अन्तर आ जाता है। विशेषकर जो लोग बाहयता बहुत कार्य कर रहे हैं, सहजयोग के लिए वहुत महनत कर रहे है और इधर उधर जाते हैं, लोगों Read More …

Public Program (भारत)

Sarvajanik Karyakram Date 31st March 1990 : Place Yamaunanagar Public Program Type Speech Language Hindi सत्य को खोजने वाले आप सभी साधकों को हमारा नमस्कार! सबसे पहले हमें ये जान लेना चाहिये कि सत्य जहाँ है, वहीं है, उसे हम बदल नहीं सकते| उसे हम मोड़ नहीं सकते। उसे तोड नहीं सकते। वो था, है और रहेगा। अज्ञानवश हम उसे जानते नहीं, लेकिन हमारे बारे में एक बड़ा सत्य है कि हम ये शरीर, बुद्धि आत्मा के सिवाय और कुछ नहीं। जिसे हम शरीर, बुद्धि और अहंकार आदि उपाधियों से जानते हैं वो आत्मा ही है और आत्मा के बजाय कुछ भी नहीं। ये बहुत बड़ा सत्य है जिसे हमें जान लेना चाहिए । दूसरा सत्य है कि ये सारी सृष्टि, चराचर की सृष्टि एक सूक्ष्म शक्ति है, जिसे हम कहेंगे कि परमात्मा की एक ही शक्ति है। कोई इसे परम चैतन्य कहता है और कोई इसे परमात्मा की इच्छाशक्ति कहता है। परमात्मा की इच्छा केवल एक ही है कि आप इस शक्ति से संबंधित हो जायें, आपका योग घटित हो जायें और आप उनके साम्राज्य में आ कर के आनंद से रममाण हो जाए। वो पिता परमात्मा, सच्चिदानंद अत्यंत दयालू, अत्यंत प्रेममय अपने संरक्षण की राह देखता है। इसलिये ये कहना की हमें अपने शरीर को यातना देनी है या तकलीफ़ देनी है ये एक तरह की छलना है। कोई भी बात से जब आप नाराज़ होते हैं तो आप कहते हैं कि अच्छा है,’ इससे कुछ पा कर दुःखी होता है, सुख तो होने वाला नहीं। सो, सिर्फ Read More …

Mahashivaratri Puja पुणे (भारत)

Mahashivaratri Puja 23rd February 1990 Date : Place Pune Type Puja Speech Language Hindi आज शिवरात्री है और शिवरात्री में हम शिव का पूजन करने वाले हैं। बाह्य में हम अपना शरीर है और उसकी अनेक उपाधियाँ, मन, अहंकार बुद्धि आदि हैं और बाह्य में हम उसकी चालना कर सकते हैं, उसका प्रभुत्व पा सकते हैं। इसी तरह में जो कुछ अंतरिक्ष में बनाया गया है, वह हम सब जान सकते हैं, उसका उपयोग कर सकते हैं। उसी प्रकार इस पृथ्वी में जो कुछ तत्व हैं और इस पृथ्वी में जो कुछ उपजता है उन सबको हम अपने उपयोग में ला सकते हैं। इसका सारा प्रभूत्व हम अपने हाथ में ले सकते हैं। लेकिन ये सब बाह्य का आवरण है। वो हमारी आत्मा है, शिव है। जो बाह्य में है वो सब नश्वर है। जो जन्मेगा, वो मरेगा। जो निर्माण होगा उसका विनाश हो सकता है। किन्तु जो अन्तरतम में हमारे अन्दर आत्मा हैं, जो हमारा शिव है, जो सदाशिव का प्रतिबिम्ब है, वो अविनाशी है, निष्काम, स्वक्षन्द। किसी चीज़ में वो लिपटा नहीं, वो निरंजन है। उस शिव को प्राप्त करते ही या उस शिव प्रकाश में आलोकित होते ही हम भी धीरे-धीरे सन्यस्त हो जाते हैं। बाह्य में सब आवरण है। वो जहाँ के तहाँ रहते हैं। लेकिन अन्तरतम में जो आत्मा है वो अचल, अटूट और अविनाशी है वो हमेशा के लिए अपने स्थान पर प्रकाशित होते रहता है। तब हमारा जीवन आत्मसाक्षात्कार के बाद एक दिव्य, एक भव्य, एक पवित्र जीवन बन जाता है। इसलिए मनुष्य Read More …

Public Program, Sakshi Swaroop (भारत)

साक्षी स्वरूप हैद्राबाद, ७.२.१९९० सत्य के बारे में बताया था कि सत्य अपनी जगह अटूट, अनंत है और उसे हम अपने बुद्धि से, मन से, किसी भी तरह से बदल नहीं सकते। और सत्य क्या है? सत्य ये है कि हम, जो आज मानव स्वरूप हैं वो वास्तविक में आत्मास्वरूप है। एक आज ऐसी स्थिति पर हम खड़े हैं जहाँ हम स्वयं को एक मानव रूप में देख रहे हैं। और इससे एक सीढ़ी चढ़ने से ही हम जान लेंगे कि हम इस मानव स्वरूप से भी एक ऊँचे स्वरूप में उतर सकते हैं जहाँ हम आत्मास्वरूप हो जाते हैं। ये एक महान सत्य है। लेकिन परम सत्य ये है कि ये सारी चराचर सृष्टि, सारी दुनिया, मनुष्य, प्राणीमात्र, जड़ चेतन सब जीव है। एक ब्रह्मचैतन्य के सहारे जी रही है, पनप रही है, बढ़ रही है। और ये परम चैतन्य चारों तरफ सूक्ष्मता से फैला हुआ है जो कि सब चीज़ों को बनाता है, सब चीज़ों को सृजन करता है, बढ़ाता है और जो कुछ भी आज हम इन्सान बने हैं वो भी इस परम चैतन्य के कृपा से ही बने हैं। इस परम चैतन्य में ऐसी शक्ति है कि जिससे वो हमें ज्ञान दे सकता है, ऐसा ज्ञान कि जो एकमेव ज्ञान है। जिसे कि हम ये जान सकेंगे कि हम क्या है? हमारे अन्दर क्या स्थिति है? हम कहाँ हैं? और हमारा लक्ष्य क्या है? वो ज्ञान देता है कि जिससे हम अन्दर से ही महसूस करते हैं, अन्दर से ये हमें ज्ञात होता है कि हम Read More …

Makar Sankranti Puja (भारत)

Shri Surya puja. Kalwe (India), 14 January 1990. [Hindi Transcript] 1990-0114 मकर सक्रांति पूजा, कलवे,  आज के इस शुभ अवसर पे, इस भारतवर्ष में, हर जगह खुशियां मनाई जा रही हैं। इसका कारण यह है कि, सूर्य, जो हमें छोड़ कर के, भारत को छोड़कर और मकर वृत्त पे गया था, वह अब लौट के आया है। और पृथ्वी और सूर्य के युति के साथ, जो जो वनस्पतियां खाद्यान्न आदि चीजें होती हैं, वह सब होने का अब समय आ गया है। और जो पेड़ सर्दी में पुरे पत्तों से दूर हो गए थे, पूरी तरह से ऐसा लग रहा था कि जैसे वह मर गए हैं, वह सारे पेड़ फिर से जागृत हो गए। फिर से हरियाली आने लग गई और इसलिए इस समय का जो विशेष है कि पृथ्वी फिर से हरी भरी हो जाएगी सारे और फिर से कार्यक्रम शुरू हो जाएंगे और विशेषकर उत्तर हिंदुस्तान में जहां ठंड बहुत ज़ोर से की पड़ती है, वहां तो इसका विशेष रूप से उत्सव माना जाता है। सूर्य का आगमन हुआ और सूर्य के कारण जो भी हमारे कार्य हैं वह अब पूरी तरह से होने वाले हैं इसलिए आज की बड़ी शुभेच्छा, हम यहाँ के सब लोगों को  कहते हैं और सोचते हैं कि आज के इस शुभ अवसर पर आप सब लोगों से यहां मिलना हुआ यह भी एक बड़ी आनंद की बात है। जैसे सूर्य का आना हम लोग बहुत ऊंचा मानते हैं, उससे भी कहीं अधिक सहज योग का सूर्य इस पृथ्वी पर आना महत्वपूर्ण Read More …

Devi Puja: Who is the God and Who Is the Goddess Ganapatipule (भारत)

[Hindi from 17 :44] आप  लोगों  को  अंग्रज़ी  तो  काफी  समझ  में  आती होगी , जो  मैंने  बात  कही  है  आपको  सबको  मालूम है,  के  जो  हमारे  अंदर  बैठे  हुए  देवी-देवताएँ  हैं  वो आपकी  पूजा  से  बहुत  प्रसन्न  हो  जाते  हैं  और  बहुत ज़ोरों  में  वाईब्रेशन्स  छोड़ना  शुरू  कर  देते  हैं , कभी  तो  ज़रुरत  से  ज़्यादा ।  चाहे   आप  उसको  अब्सॉर्ब  करें  चाहे  नहीं  करें।   अगर  आपने  उसको अब्सॉर्ब  नहीं  किया  तो  मुझको  ही  तकलीफ  होने लग  जाती  है।  इसलिए  सबको  बहुत  खुले  दिमाग  से, खुले  हृदय  से  पूरी  आर्थतानगनना [UNCLEAR text]  करके  पूजा  में  बैठना  चाहिए।  जिसमे  जितनी  ही  आर्थता  होगी  उतना  ही  उसको  फायदा  होगा।   इसीलिए  शुद्ध  इच्छा  होनी  चाहिए।  इसलिए  अंदर  शुद्ध  इच्छा  करके और  माँ  हमारे  अंदर  आप  ऐसा  कुछ  रंग  भर  दो  की  वो  उतरे  ही  ना,  एक  बार  जो  रंग  भर  गया  तो  वो  उतरे  ही  ना,  ऐसा  ही रंग  भरो।   ऐसी  मन में इच्छा  कर  के  आपको  बैठना  चाहिए।   अच्छा,  अब  काफी  देर  हो  चुकी  है  और  यह  सब  बेकार  में   इन लोगों  ने  पुलिस  वाले  लगा  दिए  हैं  इनके  साथ बैठे-बैठे  भी  टाइम  गया  फिर  उसके  बाद  ये  हुआ , जो  भी  हो  अभी  ठंडी  हवा  चल  रही  है  तो अच्छा  है  कि  इस  वक़्त  पूजा  हो  रही  है।  

Public Program, Kundalini Ke Jagran Ke Bad Labh (भारत)

Kundalini Ke Jagran Ke Bad Labh Date 16th March 1989 : Noida Place Public Program Type Speech Language Hindi सब से पहले तो कहना है कि नोएडा का कुछ ऐसा नसीब है, कि कितनी भी कोशिश करिये आप जल्दी (अस्पष्ट)। कब से वही इंतजार कर रहा था नोएडा, मुझे भी और आप को भी। क्योंकि बिना वजह की देर हो गयी। रास्ते में कोई वीआयपी साहब अगर दिल्ली में आ जाये तो सब रस्ते बंद हो जाते हैं। फिर कोई आदमी हिल नहीं सकता। इसी प्रकार न जाने कितने लोगों को अपना समय बर्बाद करना पड़ता है। आप लोग भी बहुत देर से इंतजार कर रहे थे और मैं भी, कि कब हम पहुँच रहे हैं, कब हम पहुँच रहे हैं। पर कुछ ऐसा ही नसीब है कि नोएडा में आने में एक इंतजार का भी मजा उठाना पड़ता है। आप लोगों की भी कमाल है कि आप इतनी देर से बैठे रहे। और अपनी माँ को मिलने के लिये तो सभी बहुत लालायित होते हैं, पर कलियुग में ऐसा ही सुना था कि बच्चे तो माँ की परवाह ही नहीं करेंगे। मैं तो उल्टा ही हाल देख रही हूँ। इसका मतलब कलियुग भी खत्म हो गया, कृतयुग भी खत्म हो गया और ये सत्ययुग आ गया है। कृतयुग में परम चैतन्य जो है वो कार्यान्वित होता है। ये तो आप जानते हैं कि परम चैतन्य का कार्य शुरू हो गया है। अगर परम चैतन्य कार्य न करते तो हम इतने लोगों को पार नहीं करते। उनके कार्यान्वित होने में Read More …

Public Program, Satya aatma ke prakash men hi jana ja sakta hai (भारत)

Sarvajanik Karyakram 12th March 1989 Date : Noida Place Public Program Type Speech Language Hindi सत्य को खोजने वाले सभी साधकों को हमारा प्रणाम ! सब से पहले तो बड़ी दुःख की बात है, कि इतनी देर से आना हुआ और एरोप्लेन ने इतनी देरी कर दी और आप लोग इतनी उत्कंठा से और इतनी सबूरी के साथ सब लोग यहाँ बैठे हये हैं। और हम, असहाय माँ, जो सोच रही थी कि किस तरह से वहाँ पहुँच जायें? आप लोगों को देख कर ऐसा लगता है, कि ये दुनिया बदलने के दिन आ ही गये हैं। आपकी उत्कंठा बिल्कुल जाहीर है। और आपकी इच्छा यही है, कि हम सत्य को प्राप्त करें। सत्य के बारे में एक बात कहनी है, कि सत्य जैसा है वैसा ही है। अगर हम चाहें कि उसे हम बदल दें, तो उसे | बदल नहीं सकते। और अगर हम चाहे कि अपने बुद्धि या मन से कोई एक धारणा बना कर उसे सत्य कहें, तो वो सत्य नहीं हो सकता। तो सत्य क्या है? सत्य एक है कि हम सब आत्मा है। हम आत्मास्वरूप है। इतनी यहाँ सुंदरता से आरास की हुई है और इतने दीप जलायें हैं, जिन्होंने प्रकाश दिया है। जिससे हम एकद्सरे को देख रहे हैं और जान रहे हैं। पर अगर यहाँ अज्ञान का अंधेरा हों, अंधियारा छाया हुआ हो और हम उस अज्ञान में खोये हये हैं, तो एक ही बात जाननी चाहिये, कि हम सब प्रकाशमय हो सकते हैं और हमारे अन्दर भी दीप जल सकता है। और Read More …

Akshaya Tritiya Puja Talk पुणे (भारत)

Akshaya Tritiya Puja Talk Pune लेकिन इस मामले में अनादि काल से, इस दिन के शुभ अवसर पर, परमात्मा से लोगो ने बहुत चीज़े मांगी। जैसे कि, बहुत से लोग आज के दिन ये मांगते हैं कि प्रभु, महाराष्ट्र में बरसात हो जाए। बरसात हो जानी चाहिए, जिससे हमारी खेती आ जाए। ठीक है, वो मांगना ठीक है, कि खेती की उपज होनी चाहिए, बरसात होनी चाहिए, लोगो को खाने-पीने को मिलना चाहिए। उससे आगे क्या? ये कोई अक्षय बात तो मांगी नही। बरसात होगी, लोगों को खाने-पीने को मिलेगा, लेकिन ये बात कोई ऐसी तो नही कि जो अटल है, जो टलेगी नही, और फिर से यहाँ आपको दुष्काल के दिन ना देखने पड़ें। ऐसा तो कोई कह नही सकता। और फिर बरसात होने पे क्या होगा? वही काम करेंगे कि जिससे फिर से परमात्मा कि अवकृपा हो जाए और फिर से बरसात रुक जाए। मनुष्य का दिमाग ऐसा ही होता है। परमात्मा से जो मांगते हैं उसमे ये नही सोचते हैं कि हमें ये दशा क्यों आई, हमने कौन सी गलती की।  अब महाराष्ट्र में यहां बड़ी समृद्धि आ गई, और साखर (शक्कर) कारखाने बन गए, उसमे बहुत सारी चीनी तैयार होने लगी। फिर उसके बाद शराब बनाना शुरू कर दिया। ये नही विचार किया कि शराब बना कर के हम पैसे तो कमा लेंगे, लेकिन परमात्मा के विरोध में हम कार्य कर रहे हैं। और अब इस कलजुग में, जब से कृत-युग शुरू हो गया है, तो अब ये चीज़ें ज़्यादा दिन चलने नही वाली। उन्होंने शराब Read More …

Sahaj Yogiyon Ko Upadesh Ganapatipule (भारत)

सहजयोगियों को उपदेश ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK सबसे पहले एक बात समझ लेनी चाहिए कि यहाँ जो बंबई वाले और दिल्ली वाले लोग आये हैं ये मेहमान नहीं हैं। मेहमान जो लोग बाहर से आये हैं वो हैं। बसेस उनके पैसे से आयी हैं। आप तो एक पैसा भी नहीं दे रहे उसके लिए। एक कवडी भी नहीं दे रहे हैं। बसेस उनकी हैं, वो सब बसेस मार कर आप लोग यहाँ आ गये। यहाँ | बसेस छोड़ दिये, वो लोग रास्ते में लटक के खड़े हुए हैं। बजाए इसके कि आप उन लोगों का खयाल करें, आप हैं और यहाँ बसेस आराम से यहाँ पहुँच गये। आके आराम से यहाँ बैठ गये हो । और आधे लोग रस्ते में बैठे हुए सड़ रही हैं। आप लोग यहाँ मेहमान के रूप में नहीं आयें, कृपया ध्यान दीजिए । ये अपनी आदतें आप बदलिये। आप यहाँ पर आये हैं सेवा करने के लिए और ये बाहर के जो लोग आये हैं ये मेहमान हैं। आप जिस चाहे बस में चढ़ जाते हैं, जैसे कि आपने बस ली है किराये से। पिछली मर्तबा ४५,००० रू. मैंने भरा आप लोगों के बस में | चढ़ने का। बेहतर है आप सब लोग पैदल आईये और नहीं तो एक चीज़ हो सकती है कि एक बस है सिर्फ आप के लिए। किसी भी टाइम में आप लोग निकलते हैं। आपको कोई टाइम नहीं है, कुछ नहीं है, एक ही बस आयेगी और | वो बस दो मर्तबा आयेगी और उसी बस में आपको बैठने को Read More …

Birthday Puja मुंबई (भारत)

Birthday Puja Date 21st March 1987 : Place Mumbai Puja Type Speech Language Hindi आप लोगों ने मुबारक किया आपको भी मुबारक। सारी दुनिया में आज न जाने कहाँ कहाँ आपकी माँ का जन्मदिन मनाया जा रहा है। उसके बारे में ये कहना है कि वो भी आप लोगों में बैठे हुये मुबारक बात देते हैं। इस सत्रह साल के सहजयोग के कार्य में, जब हम नजरअंदाज करते हैं, तो बहुत सी बातें ऐसी ध्यान में आती हैं, कि जो बड़ी चमत्कारपूर्ण हैं। ये तो सोचा ही था शुरू से ही कि इस तरह का अनूठा कार्य करना है। उसके लिये तैय्यारियाँ बहुत की थी। बहुत मेहनत, तपस्या की थी। लेकिन हमारे घर वालों को इसका कोई पता नहीं था। किसी तरह से चोरी-छिपे अकेले में, ध्यान-धारणा की और विचार होते थे कि किस तरह से मनुष्य जाति का उद्धार हो। सामूहिक रूप से हो जायें । जब ये कार्य शुरू हुआ, तब भी इतने जोरों में ये कार्य फैल सकता है ऐसा मुझे एहसास नहीं हुआ। लेकिन ये एक जीवंत क्रिया है और जीवंत क्रिया किस तरह, कहाँ होगी, उसके बारे में कोई भी अंदाज पहले से लगा नहीं सकते। इस तरह से सामूहिकता में ये कार्य अचानक नहीं हुआ। सर्वप्रथम बहुत कम लोग पार ह्ये। लेकिन जब पूरी कार्य का हम सिलसिला ढूँढते हैं और सोचते हैं कि इतने सत्रह साल में सहजयोग में हमने क्या कमी देखी। तो पहली बात ये ध्यान में आती है, कि मनुष्य के स्वभाव को, हमें कल्पना भी नहीं थी और सहजयोग Read More …

Conversation with Dr. Talwar मुंबई (भारत)

26, 27 फरवरी 1987, शिव पूजा के सुअवसर पर मुंबई में माताजी श्री निर्मला देवी की डॉ. तलवार से बातचीत। सहयोग का ज्ञान मुझे सदा से था। इस अद्वितीय ज्ञान के साथ ही मेरा जन्म हुआ। परंतु इसे प्रकट करना आसान कार्य न था। अतः इसे प्रकट करने की विधि मैं खोजना चाहती थी।सर्वप्रथम मैंने सोचा कि सातवें चक्र (सहस्त्रार) का खोला जाना आवश्यक है और 5 मई 1970 को मैंने यह चक्र खोल दिया। एक प्रकार से यह रहस्य है। पहले ब्रह्म चैतन्य अव्यक्त था, इसकी अभिव्यक्ति न हुई थी। यह स्वतः स्पष्ट न था। जो लोग किसी प्रकार आत्म साक्षात्कार प्राप्त करके ब्रह्म चैतन्य के समीप पहुंच जाते तो वे कहते कि “यह निराकार का गुण है। व्यक्ति एक बूंद की तरह से है जो सागर में विलीन हो जाती है।”इससे अधिक कोई भी न तो वर्णन कर पाता और न ही लोगों को बता पाता। ब्रह्म चैतन्य के सागर में अवतरित महान अवतरणो ने भी अपने गिने चुने शिष्यों को यह रहस्य समझाना चाहा, उनका परिचय ब्रह्म चैतन्य से करवाने का प्रयत्न किया। परंतु ब्रह्म चैतन्य के अव्यक्त रूप में में होने के कारण यह अवतरण स्वयं “इसी में लुप्त हो गए।” ज्ञानेश्वर जी ने समाधि ले ली। कुछ लोगों ने कहा कि वे उसकी बात नहीं कर सकते। यह तो अनुभव की चीज है। अतः बहुत कम लोग इसे प्राप्त कर सके। कोई भी अपनी उंगलियों के सिरों पर, अपनी नाड़ियों पर, अपने मस्तिष्क में इसका अनुभव करके या अपनी बुद्धि से समझ कर आत्मसाक्षात्कार के Read More …

Diwali Puja पुणे (भारत)

Diwali Puja 1st November 1986 Date : Place Pune Type Puja Speech Language Hindi दिवाली के शुभ अवसर पे हम लोग यहाँ पुण्यपट्टणम में पधारे हैं। न जाने कितने वर्षों से अपने देश में दिवाली का त्यौहार मनाया जाता है। लेकिन जब से सहजयोग शुरू हुआ है, दिवाली की जो दीपावली है वो शुरू हो गयी । दिवाली में जो दीप जलायें जाते थे , वो थोड़ी देर में जाते हैं। बुझ फिर अगले साल दूसरे दीप खरीद के उस में तेल डाल कर, उस में बाती लगा कर दीपावली मनायी जाती थी। इस प्रकार हर साल नये नये दीप लाये जाते थे। दीप की विशेषता ये होती थी, कि पहले उसे पानी में डाल के पूरी तरह से भिगो लिया जाता था| फिर सुखा लिया जाता था। जिससे दीप जो है तेल पूरा न पी ले और काफ़ी देर तक वो जले। लेकिन जब से सहजयोग शुरू हुआ है तब से हम लोग हृदय की दिवाली मना रहे है। हृदय हमारा दीप है। हृदय में बाती है, शांत है और उसमें प्रेम का तेल डाल कर के और हम लोग दीप जलाते हैं। इस तेल को डालने से पहले इस हृदय में जो कुछ भी खराबियाँ हैं उसे हम पूरी तरह से साफ़ धो कर के सुसज्जित कर लेते है। ये प्रेम हृदय में जब स्थित हो जाता है, तब उसको हृदय पूरी तरह से अपने अन्दर शोषण नहीं कर लेता। जैसे पहले कोई आपको प्रेम देता है, माँ देती है प्रेम, पिताजी देते हैं प्रेम और भी लोग Read More …

Sahajyog ke Anubhav कोलकाता (भारत)

Sahajyog ke Anubhav Sahajyog Ke Anubhav31st March 1986Place KolkataPublic ProgramSpeech Language Hindi ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK सत्य को खोजने वाले सभी साधकों को हमारा प्रणिपात! सत्य क्या है, ये कहना बहुत आसान है। सत्य है, केवल सत्य है कि आप आत्मा हैं। ये मन, बुद्धि, शरीर | अहंकारादि जो उपाधियाँ हैं उससे परे आप आत्मा हैं। किंतु अभी तक उस आत्मा का प्रकाश आपके चित्त पर | आया नहीं या कहें कि आपके चित्त में उस प्रकाश की आभा दृष्टिगोचर नहीं हुई। पर जब हम सत्य की ओर नज़र करते हैं तो सोचते हैं कि सत्य एक निष्ठर चीज़ है। एक बड़ी कठिन चीज़ है। जैसे कि एक जमाने में कहा जाता था कि ‘सत्यं वदेत, प्रियं वदेत।’ तो लोग कहते थे कि जब सत्य बोलेंगे तो वो प्रिय नहीं होगा। और जो प्रिय होगा वो शायद सत्य भी ना हो। तो इनका मेल कैसे बैठाना चाहिए? श्रीकृष्ण ने इसका उत्तर बड़ा सुंदर दिया है। ‘सत्यं वदेत, हितं वदेत, प्रियं वदेत’ । जो हितकारी होगा वो बोलना चाहिए। हितकारी आपकी आत्मा के लिए, वो आज शायद दुःखदायी हो, लेकिन कल जा कर के वो प्रियकर हो जाएगा। ये सब होते हुए भी हम लोग एक बात पे कभी-कभी चूक जाते हैं कि परमात्मा प्रेम है और सत्य भी प्रेम ही है। जैसे कि एक माँ अपने बच्चे को प्यार करती है तो उसके बारे में हर चीज़ को वो जानती है। उस प्यार ही से उद्घाटन होता है, उस सत्य को जो कि उसका बच्चा है। और प्रेम की भी Read More …

Navaratri, Shri Gauri Puja पुणे (भारत)

Shri Gauri Puja 5th October 1986 Date : Place Pune Type Puja Speech Language Hindi & Marathi पूना शहर का नाम वेदों में, पूराणों में सब जगह मशहूर है । इस को पुण्यपट्टणम कहते है। पुण्यपट्टणम और इस जगह जो नदी बहती है उसका नाम है मूल नदी | जो यहाँ से मूल बहता है, ऐसी ये नदी | यहाँ पर हजारों वर्षों से बह रही है और इस भूमी को पूरण्यवान बना रही है। हम लोगों को पुण्य के बारे में पूरी तरह से मालूमात नहीं है । बहुत से लोग सोचते है अगर हम गरीबों को कुछ दान दे दें या कोई चीज़ किसी को बाँट दें या कभी हम सच बोले या थोडी बहुत कुछ अच्छाई कर लें तो हमारे अन्दर पुण्य समा जाता है। इस तरह का पुण्य संचय होता तो होगा लेकिन वो एक बुँद, बुँद, बुँद बनकर के न जाने कब सरोवर हो सकता है। पुण्य का जो अर्थ है, उसको जैसा जाना गया है कि ऐसे कार्य करना कि जिसे परमात्मा संतोषित हो, जिसे परमात्मा खुष हो ऐसे कार्य हमें करने चाहिए । और जो आदमी ऐसे कार्य करता है वही पुण्यवान आत्मा होता है क्योंकि जब वो परमात्मा को खुष कर देता है, उस पर जो आशीर्वाद परमात्मा के आते है वो उसको पुण्यवान बना देते है। परमात्मा की शक्तियाँ उसके अन्दर आ जाती है वो उसके अन्दर एक नयीं चेतना कहिए या नया व्यक्तित्व कहिए, एक नयी हैसियत कहिए प्रगट करती है। उस हैसियत में मनुष्य ऐसा हो जाता है कि Read More …

Public Program, About all chakras कोलकाता (भारत)

Samast Chakra Date 2nd April 1986 : Place Kolkata Public Program Type Speech Language Hindi सहजयोग की शुरुआत एक तिनके से हुई थी जो बढ़कर आज सागर स्वरूप हो गया है। लेकिन इससे अभी महासागर होना है। इसी महानगर में ये महासागर हो सकता है ऐसा अब मुझे पूर्ण विश्वास हो गया है। आज आपको मैं सहजयोग की कार्यता तथा कुण्डलिनी के जागरण से मनुष्य को क्या लाभ होता है वो बताना चाहती हूँ। माँ का स्वरूप ऐसा ही होता है कि अगर आपको कोई कड़वी चीज़ देनी हो तो उसपे मिठाई का लेपन कर देना पड़ता है। किंतु सहजयोग ऐसी चीज़ नहीं है । सहजयोग पे लेपन भी मिठाई का है और उसका अंतरभाग तो बहुत ही सुंदर है। सहजयोग, जैसे आपने जाना है, सह माने जो आपके साथ पैदा हुआ हो। ऐसा जो योग का आपका जन्मसिद्ध हक्क है, वो आपको प्राप्त होना चाहिये। जैसे तिलक ने कहा था, बाल गंगाधर तिलक साहब ने भरी कोर्ट में कहा था, कि जनम सिद्ध हक्क हमारा स्वतंत्र है। उसी तरह हमारा जनम सिद्ध हक्क ‘स्व’ के तंत्र को जानना है। ये ‘स्व’ का तंत्र परमात्मा ने हमारे अन्दर हजारो वर्ष संजोग कर प्रेम से अत्यंत सुंदर बना कर रखा हुआ है। इसलिये इसमें कुछ करना नहीं पड़ता है। सिर्फ कुण्डलिनी का जागरण होकर आपका जब सम्बन्ध इस चराचर में फैली हुई परमात्मा की प्रेम की सृष्टि से, उनके प्रेम की शक्ति से एकाकार हो जाती है तब योग साध्य होता है और उसी से जो कुछ भी आज तक वर्णित Read More …

Birthday Puja कोलकाता (भारत)

Shri Mahakali Puja Date 1st April 1986: Place Kolkata Type Puja २१ मार्च से हमारा जन्मदिवस आप लोग मना रहे हैं और बम्बई में भी बड़ी जोर-शोर से चार दिन तक जन्म दिवस मनाया गया और इसके बाद दिल्ली में जनम दिवस मनाया गया और आज भी लग रहा है फिर आप लोग हमारा जन्म दिवस मनाते रहे। इस कदर सुंदर सजाया हुआ है इस मंडप को, फूलों से और विविध रंगों से सारी शोभा इतनी बढ़ाई हुई है कि शब्द रुक जाते हैं, कलाकारों को देख कर कि उन्होंने किस तरह से अपने हृदय से यहाँ यह प्रतिभावान चीज़ बनाई इतने थोड़ी समय में। आज विशेष स्वरूप ऐसा है कि अधिकतर इन दिनों में जब कि ईस्टर होता है मैं लंदन में रहती हूैँ और हर ईस्टर की पूजा लंदन में ही होती है। तो उन लोगों ने यह खबर की, कि माँ कोई बात नहीं आप कहीं भी रहें जहाँ भी आपकी पूजा होगी वहाँ हमें याद कर लीजिएगा और हम यहाँ ईस्टर की पूजा करेंगे उस दिन। इतने जल्दी में पूजा का सारा इन्तजाम हुआ और इतनी सुंदरता से, यह सब परमात्मा की असीम कृपा है जो उन्होंने ऐसी व्यवस्था करवा दी। लेकिन यहाँ एक बड़ा कार्य आज से आरंभ हो रहा है। आज तक मैंने अगुरुओं के विषय के बारे में बहुत कुछ कहा और बहुत खुले तरीके से मैंने इनके बारे में ये कितने दुष्ट हैं, कितने राक्षसी हैं और किस तरीके से ये सच्चे साधकों का रास्ता रोकते हैं और उनको बताया; गलतफहमी में Read More …

Public Program, Sahajyog Ke Anubhav कोलकाता (भारत)

1986-0331- सार्वजनिक कार्यक्रम हिंदी कोलकाता भारत  सत्य को खोजने वाले  सभी साधकों को हमारा प्रणिपाद है।  सत्य को खोजना  यह स्वाभाविक मनुष्य का धर्म है।  जहां भी उसकी रूची जाती है  या उसकी चेतना मुड़ती है  वहां वह सत्य को ही खोजता है।  और उसी मार्ग को अवलंबन करता है  जिसमें उसे सत्य प्राप्त होगा।  किन्तु जैसे श्री कृष्ण ने कहा है  कि मानवी चेतना  अधोगती के और दोड़ती है।  उसके मूल, उसके मस्तिष्क में  उसके ब्रेन में होते हैं  और जब मनुष्च अपनी चेतना को स्वयं बढ़ाता है  तो वह अधोगामी होता है।  किस तरह से हम लोग अधोगामी होते गए हैं  इसका अगर दिग्दर्शन  करना है  तो आप पाशची मात्य देशों में जाकर देखोगे  कि वास्तविक्ता मैं लोग नर्क में ही पहुँँच गए हैं  मुझे पहले कहा गया था कि आप अंग्रेजी में भाषण दें  तो मैंने ये कहा कि अंग्रेजी भाषा में  बहुत भ्रांतिया है  जिसके कारण कभी कभी बड़ी दिक्कत हो जाती है  किसी बात को सपश्ट रूप से कहना  जो की साइंस की बात नहीं है  लेकिन बहुत बड़ा साइंस है  परमात्मा का साइंस अचूक है  उसके कायदे’ पूरे पूरी तरह से  अपने अमल पे जाग्रत हैं।  उनका कोई भी आसन ऐसा नहीं है  जहां बैठने पर आप इस तरह से महसूस करें  कि इस में से आप डोल जाएंगे  लेकिन उस स्तिथि में पहुँँचने के लिए  जैसे श्री कृष्ण ने कहा है  हमें ऊर्ध्वगामी होना चाहिए  ऊर्ध्वगामी होने के लिए  कोई व्यवस्था परमात्मा ने की हो गी या नहीं  या सभी सब व्यवस्था हमी लोग कर रहे हैं  आज अमीबा के स्थिति से  इस  स्थिती तक हम किस शक्ति के द्वारा पहुँचें  और अगर इस स्थिती में ही हमारा अंतिम उत्थान है  और इसी स्थिती में पहुँचकर  अगर हम  अपने लछ्य पे आ गए हैं  तो फिर Read More …

Dharma Ki Avashyakta – Why is Dharma needed (Evening) Sir Shankar Lal Concert Hall, New Delhi (भारत)

Dharma Ki Avashyakta Aur Atma Ki Prapti 23rd February 1986 Date : Place Delhi : Public Program Type : Speech Language Hindi आत्मा को खोजने वाले सभी साधकों को हमारा प्रणिपात! आज का स्वर्गीय संगीत सुनने के बाद क्या बोलें और क्या न बोलें! विशेषकर श्री. देवदत्त चौधरी और उनके साथ तबले पर साथ करने वाले श्री गोविंद चक्रवर्ती, इन्होंने इतना आत्मा का आनन्द लुटाया है कि बगैर कुछ बताये हये ही मेरे ख्याल से आपके अन्दर कुण्डलिनी जागृत हो गई है। सहज भाव में एक और बात जाननी चाहिए कि भारतीय संगीत ओंकार से निकला हुआ है। ये बात इतनी सही है, इसकी प्रचिती, इसका पड़ताला इस प्रकार है कि विदेशों में जिन्होंने कभी भी कोई रागदारी नहीं सुनी, जो ये भी नहीं जानते कि हिन्दुस्तानी म्युझिक क्या चीज़ है या किस तरह से बनायी गयी है। जिनके बजाने का ढंग और संगीत को समझने का ढंग बिल्कुल फर्क है। ऐसे लोग भी जब पार हो जाते हैं और गहन उतरते हैं, तो आपको आश्चर्य होगा कि बगैर किसी राग को जाने बगैर, ताल को जाने बगैर, कुछ भी जानकारी इसके मामले में न होते | हुए, बस, खो जाते हैं। और जैसे आपके सामने आज चौधरी साहब ने बजाया, जब लंदन में बजा रहे थे, तो घण्टों लोग अभिभूत उसमें बिल्कुल पूरी तरह से बह गये। मैं देखकर आश्चर्य कर रही थी कि इन्होंने कोई राग जाना नहीं, इधर इनका कभी रुझान रहा नहीं, कभी कान पर वे उनके ये स्वर आये नहीं, आज अकस्मात इस तरह का Read More …

Public Program (भारत)

॥ जय श्री माता जी ।। धर्मशाला 31-03-85 धर्मशाला के मातृभक्तों को मेरा प्रणाम ! यहाँ के मन्दिर की कमेटी ने ये आयोजन किया, जिसके लिए मैं उनका बहुत धन्यावाद मानती हूँ। असल में इतना सत्कार और आनंद, दोनों के मिश्रण से हृदय में इतनी प्रेम की भावना उमड़ आयी है कि वो शब्दों में ढालना मुश्किल हो जाता है। कलियुग में कहा जाता है कि कोई भी माँ को नहीं मानता । ये कलयुग की पहचान है कि माँ को लोग भूल जाते हैं। लेकिन अब ऐसा कहना चाहिए कि कलियुग का समय बीत गया, जो लोगों ने माँ को स्वीकार किया है । माँ में और गुरू में एक बड़ा भारी अन्तर मैंने पाया है, कि माँ तो गुरू होती ही है, बच्चों को समझाती है, लेकिन उसमें प्यार घोल – घोल कर इस तरह से समझा देती है कि बच्चा उस प्यार के लिए हर चीज करने को तैयार हो जाता है । ये प्यार की शक्ति, जो सारे संसार को आज ताजगी दे रही है, जो सारे जीवन्त काम कर रही है, जैसे ये पेड़ का होना, उसकी हरियाली, उसके बाद एक पेड़ में से हो जाना और फूल में फूल से फल हो जाना, ये जितने भी कार्य हैं, जो जीवन्त कार्य हैं, ये कौन करता है? ये सब करने वाली जो शक्ति है वो परमात्मा की प्रेम की शक्ति है। उसी को हम आदि शक्ति कहते हैं। परमात्मा तो सिर्फ नज़ारा देखते हैं कि उनकी शक्ति का कार्य कैसे हो रहा है? जब उनको Read More …

Devi Puja (भारत)

देवी पूजा धर्मशाला, ३०.३.१९८५ आज के शुभ अवसर पर यहाँ आए हैं। आज देवी का सप्तमी का दिन हैं। सप्तमी के दिन देवी ने अनेक राक्षसों को मारा, अनेक दुष्टों का नाश किया, विध्वंस कर डाला। क्योंकि संत -साधु जो यहाँ पर बैठे हुए तपस्या में संलग्न हैं उनको ये लोग सताते थे। हम लोग सोचते हैं कि माँ ये क्यों, क्यों इन्होंने इतनी तपस्या की। इनको क्या जरूरत थी इतना तप करने की, इतनी तपस्या करने की। वजह ये कि तब मनुष्य का तपका बहुत नीचा था। लेकिन आँख बहुत उन्नत थी। वो सोचते थे कि हम इस शरीर से उस आत्मा को प्राप्त कर लें। इसलिए उन्होंने इतनी मेहनत की और इस स्थान में बैठ करके इतनी तपस्विता की। आज उन्हीं की कृपा से हम लोग आज इतने ऊँचे स्थान पर बैठे हुए हैं। उन्हीं की कृपा से हमने पाया। इसका मतलब ये नहीं कि हम लोग इस सहजयोग को समझ लें कि हमारे लिए एक बड़ी भारी देन हो गयी , कोई हमे बड़े महान लोग हैं जिनको कि भगवान ने वरण कर लिया, हम लोग चुने हुए मनुष्य हैं और इस तरह की बातें सोचने वाले लोगों को मैं बताती हूँ बड़ा धक्का बैठेगा। ये देखेंगे की जो लोग यहाँ स्वभाव से अत्यन्त सुन्दर हैं, वे सबसे पहले आकाश की ओर उठेंगे और बाकी सब यही धरातल पर बैठे रहेंगे। जितनी जड़ वस्तु है सब यहीं रह जाएगी। इसलिए सिर्फ आपका साक्षात्कार होना पूरी बात नहीं है। मैं यही बात अंग्रेजी में कह रही थी, वही Read More …

Birthday Puja New Delhi (भारत)

जनम दिवस पूजा प्रवचन सहज मंदिर, नई दिल्ली, २६.३.१९८५ आज आप लोग हमारा जन्मदिवस मना रहे हैं। यह एक बड़ी सन्तोष की बात है क्योंकि इस कलियुग में कौन माँ का जन्मदिन इस उम्र में मनाता है। इसलिय यह द्योतक है कि आप लोग इस कलियुग में जन्म लेकर के भी अपने मातृधर्म से परिचित ही नहीं लेकिन उसका अवलम्बन भी करते हैं। से इस उम्र में तो जन्म दिन मनाना माने एक-एक साल घटता ही जा रहा है। और बहुत काम करने के बचे हैं। बहुत से अभी कार्य मुझे दिखाई दे रहे हैं जो कि अधूरे से हैं। उन पर मेहनत करनी होगी, ध्यान देना पड़ेगा, तभी वो पूरी तरह से होंगे। हुए दिल्ली में जो काम मैंने कल कहा था कि हमें अपनी सभ्यता की ओर ध्यान देना चाहिए । हमारी सांस्कृतिक स्थिति भी ठीक करनी चाहिए। और तीसरी बात जो बहत महत्वपूर्ण है वो ये कि हमारी जो आत्मिक उन्नति है, उसकी ओर हमें ध्यान ही नहीं देना चाहिए, पर जैसे कोई एक शहीद सर पर कफन बाँध करके किसी कार्य में संलग्न होता है, उसी प्रकार हमें ‘सरफरोशी की तमन्ना’ ले करके सहजयोग करना चाहिए। जब तक हमारे अन्दर ये बात नहीं आती, तब तक सहजयोग सिर्फ हमारे ही लाभ के लिये है। इससे हमें क्या फायदे हुए, इससे हमने क्या-क्या सुख उठाया, यही सब मैं सुनती रहती हूँ। इससे हमारा जो कुछ भी लाभ हुआ है, जो भी हमारा अच्छा हुआ है, वो एक वजह से, एक कारण से हुआ है कि हमने अपनी Read More …

Public Program Jaipur (भारत)

जयपुर के सर्व सत्य शोधकों को हमारा प्रणाम। जीवन में हर मनुष्य अपनी धारणा के बूते पर रहता है। जो भी धारणा वो बना लेता है उसके सहारे वह जीता है। लेकिन एक कगार ऐसी ज़िन्दगी में आ जाती है, जहाँ पर जा कर वह यह सोचता है, कि, “मैंने आज तक जो सोचा, जो धारणाएं लीं, वो फलीभूत नहीं हुईं। उससे मैंने आनंद की प्राप्ति नहीं की, उससे मुझे समाधान नहीं मिला, उससे मैंने शांति प्राप्त नहीं की।” जब वो कगार मनुष्य के सामने खड़ी हो जाती है, तब वो अपनी धारणाओं के प्रति शंकित हो जाता है। और उस वक़्त वो ढूँढने लग जाता है कि इससे परे कौन सी चीज़ है, इससे परे कौन सी दुनिया है, जिसे मुझे प्राप्त करना है। ये जब शुरुआत हो जाती है, तभी हम कह सकते हैं, कि मनुष्य एक साधक बन जाता है। वो सत्य के शोध में न जाने कहाँ-कहाँ भटकता है। कभी-कभी सोचता है कि, बहुत सा अगर हम धन इकठ्ठा कर लें, तो उस धन के बूते पे हम आनंद को प्राप्त कर लेंगे। फिर सोचता है कि हम सत्ता को प्राप्त कर लें – सत्ता को प्राप्त करने से ही हम आनंद को प्राप्त कर लेंगे। फिर कोई सोचता है कि अगर हम किसी मनुष्य मात्र को प्रेम करें, तो उसी से हम सुख को प्राप्त कर लेंगे। उससे आगे जब वो विशालता पे उठता है, तो ये सोचता है कि, हम प्राणी मात्र की सेवा करें, उनकी कुछ भलाई करें, उनके उद्धारार्थ कोई कार्य करें, Read More …

Public Program Jaipur (भारत)

परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी, सार्वजनिक कार्यक्रम, 23 मार्च, 1985 जयपुर, राजस्थान, भारत श्री माताजी के आगमन पूर्व का दृश्य बहुत सारे साधकों से हॉल भरा हुआ है।  एक सहज योगी भाई नए लोगों को अंग्रेजी भाषा में संबोधित कर रहे हैं। उसके पश्चात श्रीमती सविता मिश्रा भजन प्रस्तुत करती हैं। भजन समाप्ति की उपरांत श्री योगी महाजन दर्शकों को संबोधित कर रहे होते हैं।  तभी श्री माताजी का आगमन होता है, और वे स्टेज पर तेजी से चढ़ते हुए हम सब को दर्शन देती हैं। सब को प्रणाम कर के वे अपनी सिंहासन पर विराजमान होती हैं। योगी महाजन  श्री माताजी का स्वागत कर के सहज योग के विषय में संक्षिप्त में बोलते हैं। तत्पश्चात उनके आमंत्रण पर डॉक्टर वारेन भी सहज योग का संक्षिप्त परिचय देते हैं। श्रीमती सविता एक और भजन प्रस्तुत करती हैं। श्री माताजी को माल्यार्पण किया जाता है और उनके साथ उपस्थित सज्जन को भी। (वे अंग्रेजी में कहती है की – आई विल स्टैंड एंड स्पीक) (श्री माताजी खड़ी हो गई हैं, और सब पर दृष्टि डालते हुए अपना भाषण आरंभ करती हैं) जयपुर के साधकों को हमारा प्रणाम। श्री कृष्ण ने तीन तरह के लोग संसार में बताए हुए हैं, जिन्हे के वे तामसिक, राजसिक और सात्विक कहा करते थे।  तामसिक वो लोग होते हैं, कि जो अच्छा और बुरा, शुभ अशुभ कुछ भी नहीं पहचानते, पर अधिकतर अशुभ की ही ओर दौड़ते हैं, अधिकतर गलत चीजों की ओर ही दौड़ते हैं। जब वो अति इस में घुस जाते हैं, तो Read More …

Sahasrara – Atma New Delhi (भारत)

Sahastrar – Atma Date : 16th February 1985 Place Delhi Туре Public Program Speech Language Hindi ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK Scanned from Hindi Nirmala Yog सत्य के खोजने वाले सभी साध्कों को हमारा प्रणाम । जीवित रहेंगे? यह हृदय का जो स्पन्दन है- अनहदू, हर आज का मधुर संगीत आज के विषय से बहत सम्बन्धित घड़ी अपने आप ही कार्यान्वित रहता है उसको चलाने के है जिसके लिए मैं देब चौधरी को बहुत-बहुत घन्यवाद देती लिए अगर हमें बाहुय से कोई उपचार करना पड़ता तो हूँ। सभी सहज व्यवस्था हो जाती है और आज संगीत में जो कितने लोग इस संसार में जीवित पैदा होते? ऐसी अनेक आपने सात स्वरों का खेल देखा, हमारे अंदर भी ऐसा ही चीजें जो जीवन्त हैं, हम देखते हैं। फल खिलते हैं अपने आप सुन्दर संगीत नि्माण हो सकता है। यह जो कण्डलिनी के और इनके फल भी हो जाते हैं अपने आप। यह ऋतम्भरा सात चक्र आप देख रहे हैं वे हैं मूलाधार चक्र, मलाधार, स्वाधिष्ठान, नाभि, हृदय, विश्द्धि, आज्ञा और सहस्रार। इसके अलावा हमारे अन्दर सूर्य और चन्द्र के भी चक्र हैं। ब्रहमरन्ध्र को छेदने के बाद भी तीन और चक्र हमारे अन्दर हैं और कार्य करते हैं जिन्हें हम अर्धबिन्द, बिन्दू और वलय कहते हैं। यह सार हमारे अन्दर स्वर हैं। जैसे “स” से शुरू करें तो “सा र गा मा पा धा नी” सहलार पर “नी” जाकर पहुँचता है। इसी प्रकार इन सब चक्रों को शक्ति देने वाले ऐसे ग्रह भी हैं। जैसे मूलाधार पर मंगल, स्वाधिष्ठान पर बुद्ध, नाभि Read More …

Public Program पुणे (भारत)

Public Program Sarvajanik Karyakram Date 4th December 1984 : Place Pune Public Program Type Speech Language Hindi CONTENTS | Transcript 02 – 14 Hindi English Marathi || Translation English Hindi Marathi ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK सत्य को खोजने वाले सर्व आत्माओं को मेरा प्रणिपात! आज मैं सोच रही थी कि कौन सी भाषा में आप से वार्तालाप किया जाय ? यही सोचा की मराठी में, में पूना बहुत बार भाषण हुआ था। आज हिंदी में ही भाषण दिया जाय। क्योंकि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है और मेरी मातृभाषा मराठी है किंतु हिंदी भाषा सीखना मैं सोचती हँ परम आवश्यक है और इसलिये आप लोग, मराठी प्रेमी लोग मुझे उदार अंत:करण से क्षमा करें और हिंदी बोलने वाले लोग, जो साहित्यिक हैं, वो भी मुझे क्षमा करें अगर कोई त्रुटियाँ हो जायें तो! किंतु सब से पहले जान लेना चाहिये, कि भाषा तो हृदय की होनी चाहिये। जहाँ भाषा हृदय से न होते हये शब्दजाल होती है, तब हर तरह के जंजाल खडे हो जाते हैं । इसलिये कोई भाषा जो हृदय से निकलती है, वही मार्मिक होती है। इसी का असर भी होता है। हम लोग सत्य को खोज रहे हैं अनेक वर्षों से । आज ही की ये बात नहीं है, अनेक वर्षों से हम सत्य को खोज रहे हैं। और उसकी खोज होते होते काफ़ी लोग भटक भी गये हैं । इसका कारण हमें समझ लेना चाहिये, क्योंकि आज की जो स्थिति है, आज का जो माहौल है, वातावरण है, उस वातावरण में ये समझ में नहीं आता है, Read More …

Talk on Holi day New Delhi (भारत)

Talk on Holi Day Date 17th March 1984 : Place New Delhi : Puja Type English & Hindi Speech Language contents Hindi [Original transcript Hindi talk, Scanned from Hindi Nirmala Yog] आप लोग रूपया तक देने भई सुबह चार बजे उठो, अगर कानफन्स है तो। से घबराते है । यह गलत वात जो जरूरी चोज है वह है ध्यान करना। जो बड़ा है। यह सुनकर तो मुझे बड़ा goal (उद्देश्य) है उसे देखना चाहिये। जो चीज आ्चय हुआ कि बम्बई के लोग है, बह है ज्यान करना। Conference (सभा) ह जो औ जरूरी चीज है, वो है ध्यान करना जो बड़ा यह goal सब में ककषमकश लगी रहेगी कि है उसे देखना चाहिए। दफ्तर थोड़ा सा आपने नहीं किया तो भी कुछ नहीं जायेगा, क्योंकि lower मंगिना पडता है। रूपया तो क भी बम्बई में goal (निम्न उदश्य) है । ऐसे हजारों दफ्तर वाले कम नहीं होता। आपको माजूम है कि वम्बई मैंने देख लिये जो कि फाइलों पर फाइल लाद के में लोग हज़ारों रुपया खर्च करते हैं और अपने मर गये लेकिन कोई पूछता भो नहीं कि कहां गये और यहाँ उन्होंने बना रखा है कि इतना रूपया हम कहाँ खत्म हो गए हजारों को में जानती है क्योंकि भगवान के माम पर रखेंगे। यह वड़ी शमें की बात मैंने जिन्दगी भर इन्हीं लोगों के साथ जिन्दगी काटी है कि इन लोगों को आपसे रूपया माँगना पड़ता है । तो दपतर की जो महत्ता है वो मैं अंब जानती हैं और इस तरह की चीजें नहीं होतो चाहिए Read More …

Public Program, Hridhay Aur Vishuddhi Chakra New Delhi (भारत)

Hridaya Aur Vishuddhi Chakra Date 16th March 1984 : Place Delhi : Public Program Type : Speech Language Hindi [Original transcript Hindi talk, Scanned from Hindi Nirmala Yog] शान्त-चित्त, धार्मिक और बहुत सरल, शुद्ध और सादे परादमी हैं। वो मेरे पर पर गिरके रोने लगे । कहने लगे, “माँ, ये सब मैंने किया। लेकिन मैं बड़ा सत्य को खोजने वाले सारे भाविक, सात्विक साधकों को मेरा अशान्त हो गया है। मैंने कहा, क्यों, क्या बात है ? श्रपने तो बहुत कुछ पा लिया। यहाँ सबकी सुभत्ता अ्र गयी कहने लगे, मैंने एक बात नहीं जानी प्रणाम । कल आपको मैंने आ्रपने अन्दर बसा हुआ जो नाभि चक्र है उसके वारे में बताया या कि ये नाभि चक् हमारे अन्दर जिससे हम अपने क्षेम थी कि इस सभत्ता से दुनिया इतनी खराव ही जायेगी। हमारे यहाँ लोग जो हैं इतने आदततयी को गये हैं । यहाँ शराब इस कदर ज्यादा चलने लग गयी है। यहां पर बच्चे बिलकुल वाहियात हो गये सर्वसे बड़ी शक्ति देता है को पाते हैं। जैमे कि कृष्ण ने कही था ” योग क्षेम वहाम्यहम । पहले योग होना चाहिए, फिर अ्षम होगा । योग के बगैर क्षम नहीं ही सकता औोर है। यहां पर कोई किसी की सुनता नहीं । औरतें ी पपने को पेसे में ही तोलने लग गई हैं। ये सब देखक र के मुझे लगता है कि ये मैने क्या कर क्योंकि हमने इस देश में पहले योग को खयोजा नहीं इसलिए हमारा देश क्षेम को प्राप्त नहीं। क्षेम के बारे में मैंने Read More …

Public Program New Delhi (भारत)

श्री माताजी: आज हिंदी में मैं भाषण दूँगी। परमात्मा को खोजने वाले सभी भाविक, सात्विक साधकों को हमारा प्रणाम। आज दो तरह के गाने आपने सुने हैं। पहले गाने में एक भक्त विरह में परमात्मा को बुलाता है – इसे अपरा-भक्ति कहते हैं, और जब परमात्मा को पा लेता है, जैसे कबीर ने पाया था, तो उसे परा-भक्ति कहते हैं। दोनों में ही भक्ति है। इसे कृष्ण ने अनन्य भक्ति कही हुई है, जहाँ दूसरा कोई नहीं होता – जहाँ साक्षात् परमेश्वर अपने सामने होते हैं। उस वक्त जो हम लोगों का भक्ति का स्वरुप होता है, उसे उन्होंने परा भक्ति कही हुई है – अनन्य भक्ति। किन्तु जब हम परमात्मा को याद करते हैं, उनको स्मरण करते हैं, तब उसकी आदत सी हो जाती है। जब इंसान को इस चीज़ की आदत सी हो जाती है, तो उस आदत से छूटने में उसे बड़ा समय लग जाता है। वो यह मानने को तैयार ही नहीं होता है कि उसकी ये जो साधना है ये ख़त्म होने की बेला आ गई है। और इसी वजह से भक्तों ने भी दृष्टों को, संतों को, मुनियों को पहचाना नहीं। आप जानते हैं इतिहास में हमेशा संतों को कितनी परेशानियों उठानी पड़ीं हैं। ये नहीं कि सबने उनको सताया, लेकिन जिन्होंने सताया उनको किसी ने रोका नहीं और उनको समझाया नहीं कि ये संत हैं, ये साधु हैं। अब हमारे समाज में, खासकर के शहरों में, विविध विचारों के लोग रहते हैं। कुछ तो, क्योंकि परमात्मा में विश्वास करते हैं – इस तरह Read More …

New Year Puja, Who Is A Sahaja Yogi? New Delhi (भारत)

1984-01-03, New Year Puja: Who Is A Sahaja Yogi?, Delhi Nav Varsh Puja – S. Sahajyogi Ki Pahechan 3rd January 1984 Date : Place Delhi : ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK Scanned from Hindi Nirmala Yog लेकिन माँ की व्यवस्था और है कि पहले चैतन्य को पा लो. जान लो कि परमात्मा है, उस पर विश्वास करो जो अन्धविश्वास नहीं है, सत्य के रूप हर साल नया साल आता है और पुराना साल खत्म हो जाता है। सहजयोगियों के लिए हर क्षण एक नया साल है, क्योंकि वो वर्तमान में रहते है। न तो वो भविष्य में रहते हैं, और न ही वो बीते हुए भूत में और अब थोड़ी सी मेहनत से भी बहुत बड़ा काम हो सकता है। जैसे कि किसी को पहले सिखाया जाये कि देखो पानी से डरना नहीं। लैक्चर दिया जाए। पहले अपने को जमीन पर ही तैरा के देखो। वहीं काल में रहते हैं। हर क्षण उनके लिए एक नया साल है, एक नई उमंग है, एक नई लहर है। तुम पर हाथ मारो दो-चार। और काफी दिन से मेहनत की जाए और फिर धीरे-धीरे पानी में लाया जाए। जैसे पानी देखा फिर भाग गए। जैसे कि समुद्र पर तैरते हुए हर क्षण कोई समुद्र के प्यार से उछाला जाय, उसी प्रकार हरेक सहजयोगी को आनन्द, प्रेम, शान्ति का आहुलाद मिलते रहता है। बस बात ये है कि क्या हम तैरना सीख गये हैं या नहीं। सहजयोंग में जिसने तैरना और एक होता है पानी में ढकेल दो, फिर सिखाते रहेंगे। इसी तरह आप लोग आनन्द Read More …

Parent’s day celebrations New Delhi (भारत)

माता-पिता का बच्चों के साथ सहज मन्दिर, दिल्ली, १५ दिसम्बर १९८३ स आज मैं आपको एक छोटी-सी हजयोग क्या है और उसमें मनुष्य क्या-क्या पाता है, आप जान सकते हैं। लेकिन बात बताने वाली हूँ कि माता-पिता का सम्बन्ध बच्चों के साथ कैसा होना चाहिए। सबसे पहले बच्चों के साथ हमारे दो सम्बन्ध बन ही जाते हैं, जिसमें एक तो भावना होती है, और एक में कर्तव्य होता है। भावना और कर्तव्य दो अलग-अलग चीज़ बनी रहती हैं। जैसे कि कोई माँ है, बच्चा अगर कोई गलत काम करता है, गलत बातें सीखता है, तो भी अपनी भावना के कारण कहती है, “ठीक है, चलने दो। आजकल बच्चे ऐसे ही हैं, बच्चों से क्या कहना । जैसा भी है ठीक है।” दूसरी माँ होती है कि वो सोचती है कि वो बच्चों को कर्तव्य परायण बनाए। कर्तव्य परायण बनाने के लिए वो फिर बच्चों से कहती है कि “सवेरे जल्दी उठना चाहिए आपको। पढ़ने बैठना चाहिए। फिर आप जल्दी से स्कूल जाइए। ये समय से करना चाहिए। वहाँ बैठना चाहिए। यहाँ उठना चाहिए, ऐसे कपड़े पहनना चाहिए।” इन सब चीज़ों के पीछे में लगी रहती है। अब इसे कहना चाहिए कि ये सम्यक नहीं है, integrated (सम्यक) बात नहीं है। इसमें integration (समग्रता) नहीं है और आज का सहजयोग जो है वह integration (समग्रता) है । दोनों चीज़ों का integration (विलय, एकीकरण, समग्रीकरण) होना चाहिए न कि combination (एकत्रीकरण) होना चाहिए। समग्रता और एकत्रीकरण में ये फर्क हो जाता है कि हमारी जो भावना है वो कर्तव्य होनी चाहिए और Read More …

Sahasrara Puja, Above the Sahasrar मुंबई (भारत)

सहस्रार पूजा बम्बई, ५ मई १९८३ आप सबकी ओर से बम्बई के सहजयोगी व्यवस्थापक जिन्होंने यह इन्तजामात किये हैं, उनके लिये धन्यवाद देती हूँ, और मेरी तरफ से भी मैं अनेक धन्यवाद देती हूँ। उन्होंने बहुत सुन्दर जगह हम लोगों के लिये ढूँढ रखी है। ये भी एक परमात्मा की देन है कि इस वक्त जिस चीज़़ के बारे में बोलने वाली थी, उन्हीं पेड़ों के नीचे बैठकर सहस्रार की बात हो रही है। चौदह वर्ष पूर्व कहना चाहिये या जिसे तेरह वर्ष हो गए और अब चौदहवाँ वर्ष चल पड़ा है, यह महान कार्य संसार में हुआ था, जबकि सहस्रार खोला गया। इसके बारे में मैंने अनेक बार आपसे हर सहस्रार दिन पर बताया हुआ है कि क्या हुआ किस तरह से ये घटना हुई, क्यों की गई और इसका महात्म्य क्या है? था, लेकिन चौदहवाँ जन्मदिन बहत बड़ी चीज़ है। क्योंकि मनुष्य चौदह स्तर पर रहता है, और जिस दिन चौदह स्तर वो लाँघ जाता है, तो वो फिर पूरी तरह से सहजयोगी हो जाता है। इसलिये आज सहजयोग भी सहजयोगी हो गया। अपने अन्दर इस प्रकार परमात्मा ने चौदह स्तर बनाए हैं। अगर आप गिनिये, सीधे तरीके से, तो भी अपने अन्दर आप जानते हैं सात चक्र हैं, एक साथ अपने आप। उसके अलावा और दो चक्र जो हैं, उसके बारे में आप लोग बातचीत ज़्यादा नहीं करते, वो हैं ‘चन्द्र’ का चक्र और ‘सूर्य’ का चक्र। फिर एक हम्सा चक्र है, इस प्रकार तीन चक्र और आ गए। तो, सात और तीन-दस। उसके ऊपर और चार Read More …

Public Program मुंबई (भारत)

सार्वजनिक भाषण मुंबई, ४ मई १९८३ परमात्मा को खोजने वाले सभी साधकों को मेरा प्रणाम ! मनुष्य यह नहीं जानता है कि वह अपनी सारी इच्छाओं में सिर्फ परमात्मा को ही खोजता है। अगर वह किसी संसार की वस्तु मात्र के पीछे दौड़ता है, वह भी उस परमात्मा ही को खोजता है, हालांकि रास्ता गलत है। अगर वह बड़ी कीर्ति और मान-सम्पदा पाने के लिए संसार में कार्य करता है, तो भी वह परमात्मा को ही खोजता है। और जब वह कोई शक्तिशाली व्यक्ति बनकर संसार में विचरण करता है, तब भी वह परमात्मा को ही खोजता है। लेकिन परमात्मा को खोजने का रास्ता ज़रा उल्टा बन पड़ा। जैसे कि वस्तुमात्र जो है, उसको जब हम खोजते हैं-पैसा और सम्पत्ति, सम्पदा-इसकी ओर जब हम दौड़ते हैं तो व्यवहार में देखा जाता है कि ऐसे मनुष्य सुखी नहीं होते। उन पैसों की विवंचनायें, अधिक पैसा होने के कारण बुरी आदतें लग जाना, बच्चों का व्यर्थ जाना आदि ‘अनेक’ अनर्थ हो जाते हैं। जिससे मनुष्य सोचता है कि ‘ये पैसा मैंने किसलिये कमाया? यह मैंने वस्तुमात्र किसलिये ली?’ जिस वक्त यहाँ से जाना होता है तो मनुष्य हाथ फैलाकर चला जाता है। लेकिन यही वस्तु, जब आप परमात्मा को पा लेते हैं, जब आप आत्मा पा लेते हैं और जब आप का चित्त आत्मा पर स्थिर हो जाता है, तब यही खोज एक बड़ा सुन्दर स्वरूप धारण कर लेती है। परमात्मा के प्रकाश में वस्तुमात्र की एक नयी दिशा दिखाई देने लग जाती है। मनुष्य की सोौंदर्य दृष्टि एक गहनता से हर Read More …

Holi Puja New Delhi (भारत)

होली पुजा, २९।३।१९८३ , दिल्ही, इंडिया दिवाली के सुभ अवसर पे (सहजयोगी : होली श्री माताजी ) हा होली ! में यही सोचा कुछ गरबड़ कह दिया। लेकिन  कल दिवाली की बात कही थी ना यही ख्याल बना। फिर  होली के शुभ अवसर पे आज दिवाली मनाई जाएँगी।  होली के दिन आप जानते है की होलिका को जलाया गया। अग्नि का बड़ा भारी दान है कार्य है क्योंकि अग्नि देवता ने होलिका को वरदान दिया था की किसी भी हालत में तुम जल नहीं सकती।  और किसी भी कारण से मृत्यु आ जाए पर तुम जल नहीं सकती। और वरदान दे करके वो फिर बहोत पछताए। क्योकि प्रह्लाद को लेकर वो गोद में बैठी। और अग्नि देवता के सामने प्रश्न पड़ा , धर्मं का प्रश्न, की मैंने उनको वचन दे दिया इनको तो में जलाऊंगा नहीं और इस वचन को अभी में कैसे भंग करू ? और प्रह्लाद तो स्वयं साक्षात् अबोधिता है , स्वयं साक्षात् गणेश का पादुर्भाव है।  और इनको किस तरह से जलाया जाए ।  इनको तो कोई नहीं जला सकता। वो मेरी भी शक्ति से परे है। ये तो मेरी शक्ति से भी बड़े है। तो उन्होंने विचार ये किया की, “ये  अहंकार कैसा है की इतनी बड़ी शक्ति के सामने  में अपनी शक्ति की कौनसी बात कर रहा हूँ ? मेरी ऐसी कोई सी भी शक्ति नहीं है जो इनके आगे चल सके। इनकी शक्ति इतनी महान है । तो इनको तो में जला सकता ही नहीं चाहे जो कुछ भी करुलू । लेकिन इस Read More …

Public Program Gandhi Bhawan, New Delhi (भारत)

क्योंकि बहुत लोगों ने इस पर लिखा है (अस्पष्ट) और बहुत से लोग सोचते रहे हैं कि इस मामले में कुछ करना चाहिए कि सत्य को खोजने का है। (अस्पष्ट) अब जब मानव (अस्पष्ट) तो उसकी ऐसी स्तिथि होती है कि वो सिर्फ इस चीज़ को मानता है (अस्पष्ट) और उसके पास कोई माध्यम नहीं है। जैसे कि साइंस की उपलब्धि जो हुई है, यह हमने सिर्फ बुद्धि के ही माध्यम से देखा है। लेकिन बुद्धि जो है, वो दृश्य जो संसार में है, उसी के बारे में बातें करता है। जो अदृश्य है उसे नहीं बता सकता। और सत्य और अदृश्य में क्या अंतर है यही नहीं बता सकता। तब पहले यह सोचना चाहिए, कि जब सत्य की खोज की इंसान बात करता है, तो सर्वप्रथम उसको यही विचार करना होगा कि जो कुछ हमने बुद्धि से जाना, कुछ भी नहीं जाना, तो भी हम भ्रम में बने रहे। बुद्धि से जानी हुई बात, जितनी भी हमने आज तक जानी है, उससे इतना ज़रूर हुआ, जो दृश्य में है उससे हमने ज्ञात (अस्पष्ट) लेकिन जो कुछ अदृश्य में है वो भी नहीं जाना और ये भी नहीं जान पाए कि वो आखिर जो हमने दृश्य में जानना है यह परम सत्य है या नहीं। अब साइंस की उपलब्धि जब हमारी है, तो साइंस के हम अपने सिर हुए, साइंस में हमने बहुत सारी बातें जानी। अणु परमाणु तक हम पहुँच चुके। गतिविधियों को जो समझा है, वो भी सब जो कुछ भी जड़ है, उसके बारे में। ….. हरएक Read More …