Shri Krishna Puja पुणे (भारत)

Hindi Transcript of Shri Krishna Puja. Pune (India), 9 August 2003. हम लोगों को अब यह सोचना है कि सहजयोग तो बहुत फैल गया और किनारे किनारे पर भी लोग सहजयोग को बहुत मानते हैं। लेकिन जब तक अपने अन्दर सहजयोग वायवास्तीह रूप से प्रकटित नहीं होगा तब तक जैसा लोग सहजयोग को मानते हैं वो मानेगें नहीं। इसलिए ज़रूरत है कि हम कोशिश करें कि अपने अन्दर झांकें। यही कृष्ण का चरित्र है कि हम अपने अन्दर झांके और देखें जाने की कौन सी ऐसी चीजे हैं जो हमें दुविधा में डाल देती हैं। इसका पता लगाना चाहिए। हमें अपने तरफ देखना चाहिए, अपने अन्दर देखना चाहिए और वो कोई कठिन बात नहीं है जब हम अपनी शक्ल देखना चाहते हैं तो हम शीशे में देखते हैं। उसी प्रकार जब हमें अपनी आत्मा के दर्शन करने होते हैं तो हमें देखना चाहिए हमारे अन्दर ,वो कैसे देखा जाता है । बहुत से सहजयोगियों ने कहा माँ यह कैसे देखा कर जायेगा कि हमारे अन्दर क्या है, और हम कैसे हैं? उसके लिए ज़रूरी है कि मनुष्य पहले स्वयं की और नम्र हो जाए क्योंकि अगर आपमें नम्रता नहीं होगी तो आप अपने ही विचार लेकर बैठे रहेंगे। कृष्ण के जीवन में पहले दिखाया गया कि एक छोटे लड़के के जैसे वो थे बिलकुल जैसा शिशु होता है बिलकुल ही अज्ञानी वो इसी तरह थे , वो अपने को कुछ समझते नहीं थे | उनकी माँ थी एक और वो अपनी माँ के सहारे वो बढ़ना चाहते थे। इसी प्रकार Read More …

Inauguration of Vishwa Nirmal (भारत)

Udghatan – Vishwa Nirmala Prem Ashram Date 27th March 2003 : Noida Place : Seminar & Meeting Type [Original transcript Hindi talk, scanned from Hindi Chaitanya Lahari]  अपने देश में जो अनेक प्रश्न हैं, उसमें सबसें बड़ा प्रश्न है कि यहां पर औरतों को और आदमियों को अलग-अलग तरीके से देखा जाता है। पता नहीं ये कैसे आया, क्योंकि अपने शास्त्रों में तो लिखा नहीं है। कहते हैं शास्त्रों में कि: यत्र पूज्यन्ते नार्या, नारियां जहां पूजनीय होती है तत्र रमन्ते देवता।  तो पता नहीं कैसे हमारे देश में इस तरह की स्थिति सम्पन्न हुई है, जिससे औरतों के प्रति कोई भी आदर नहीं है। विशेषतः मेरा विवाह यू.पी. में हुआ और मैं देखकर हैरान हुई कि यू.पी. में घरेलू औरतों का कोई स्थान ही नहीं है। उनमें और नौकरानियों में कोई फर्क ही नहीं है। ये इस प्रकार क्यों हुआ, और क्यों हो रहा है?  क्योंकि लोग उस ओर जागृत नहीं हैं और कभी-कभी देख कर के तो रोना आता है। जिस तरह से औरतों को छला है, घर से निकाल दिया, कोई वजह नहीं है, यूही घर से निकाल दिया। और ऐसे बहुत सारे हमने जीवन में अनुभव लिए और जिसकी वजह से अत्यन्त व्यथित हो गए। समझ में नहीं आता था कि इस तरह से क्यों औरतों को सताया जा रहा है और इनके रहने की भी व्यवस्था नहीं है। जब घर से निकल गई तो उनको देखने वाला भी कोई नहीं है। बाल बच्चे ले करके निकल आएंगी बेचारी। वो लोग तो हैं निराश्रित पर बच्चों को भी विल्कुल बुरी तरह से निकाल देते हैं। ये अपने यहाँ की व्यवस्था किस तरह से बंदल सकती है, इसका कोई इलाज है या नहीं?     Read More …

Public Program New Delhi (भारत)

Sahaja Yogi – Ek Adarsh Hindustani   Date: March 24, 2003   Place Delhi    Type: Public Program   आप लोगों का ये हार्दिक स्वागत देख करके हृदय आनंद से भर आता है और समझ में नहीं आ रहा है कि क्या कहूँ और क्या न कहूँ। आप न जाने कितनी जगह बैठे हैं,  मैं तब से देख रही हूँ कि कहाँ-कहाँ सब लोग बैठे हैं। शायद इस स्टेडियम में मैं पहली मर्तबा आयी हूँ और आप लोग इतने बिखरे-बिखरे बैठे हैं।  आपसे आज के मौके पर क्या कहना चाहिए और क्या बताना चाहिए, ये ही समझ में नहीं आता है कि आप लोग अधिकतर सहजयोगी हैं। और जो नहीं भी हैं वो भी हो ही जायेंगे, हर बार ऐसा ही होता है। जीवन में सहजयोग प्राप्त होना एक जमाने में बड़ी कठिन चीज थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब तो बहुत सहज में ही आपकी कुण्डलिनी जागृत हो सकती है। और सहज में ही आप उस स्थान को प्राप्त कर सकते हैं जो कहा जाता है कि आप ही के अन्दर आत्मा का वास है। और आप ही के अंदर वो चमत्कार होना चाहिए जिससे आपको अपने आत्मा से परिचित किया जा सके। ये चीज़ एक जमाने में बड़ी कठिन थी। हजारों वर्षों की तपस्चर्या जंगलों में घूमना, ऋषियों-मुनियों की सेवा उसके फलस्वरूप कुछ लोग, बहुत कुछ लोग, इसे प्राप्त करते थे। पर आजकल ऐसा ज़माना आ गया है कि गर मनुष्य को ये गति नहीं मिली तो न जाने वो किस ठौर उतरेगा, उसका क्या हाल होगा?  शायद इसीलिए इस कलियुग में भी ये सहजयोग इतना गतिमान है। इसमें तो आप लोगों का भी योगदान है। हजारों सहजयोगी हो गए हैं और सब लोग आपको खुद पार करा सकते हैं। ये कितना बड़ा कार्य हो गया है, क्योंकि मेरे अकेले के बस का इतना था क्या?  लेकिन इसको संवारा है आपने, इसको उठाया है आपने और इसके लिए मेहनत की है आपने।  मैं आपको कितना धन्यवाद दूँ ये मैं नहीं समझ पाती। कितनी बड़ी Read More …

Mahashivaratri Puja पुणे (भारत)

[Original transcript Hindi talk, scanned from Hindi Chaitanya Lahari] Translation  अंग्रेजी प्रवचन – अनुवादित आज हम श्री शिव-सदाशिव की पूजा करेंगे। उनका गुण यह है कि वे क्षमा की मूर्ति हैं। उनकी क्षमाशीलता क्षमा के गुण के कारण ही हम आज जीवित हैं, अन्यथा ये विश्व नष्ट हो गया होता। बहुत से लोग खत्म हो गए होते क्योंकि मानव की स्थिति को तो आप जानते ही हैं। मनुष्य की समझ में ही नहीं आता कि उचित क्या है और अनुचित क्या है। इसके अतिरिक्त वे क्षमा भी नहीं कर पाते। गलतियों पर गलतियाँ करते चले जाते हैं। परन्तु वो अन्य लोगों को क्षमा नहीं कर सकते। इसलिए हम लोगों को यही गुण श्री शिव-सदाशिव से सीखना हैं। Transcription   हिन्दी प्रवचन  आज हम लोग श्री सदाशिव की पूजा करने वाले हैं। इनका विशेष स्वभाव यह है कि इनकी क्षमाशीलता इतनी ज्यादा है कि उससे कोई इन्सान मुकाबला नहीं कर सकता। हर हमारी गलतियों को वो, माफ करेंगे। वो अगर न करते तो ये दुनिया खत्म हो सकती थी।  क्योंकि उनके अन्दर वो भी शक्ति है जिससे वो इस सृष्टि को नष्ट कर सकते हैं। इतने क्षमाशील होते हुए भी ये शक्ति उनके यहां जागृत है और बढ़ती ही रहती है। इसी शक्ति से जिससे वो क्षमा करते हैं। उसी परिपाक से या कहना चाहिए अतिशयता से फिर वो इस संसार को नष्ट भी कर सकते हैं।  तो पहले तो हमें उनकी क्षमाशीलता सीखनी चाहिए। छोटी-छोटी चीजों को लेकर के हम झगड़ा करते हैं छोटी-छोटी बातों पर हम झगड़ा करते हैं। पर Read More …

Shri Hanumana Puja पुणे (भारत)

Shri Hanuman Puja, Pune,  India 31 March 1999 [Hindi Transcript] आज हम लोग श्री हनुमान जी की जयन्ती मना रहे हैं। हनुमान जी के बारे में क्या कहें कि वो जितने शक्तिमान थे, जितने गुणवान थे, उतने ही वो श्रद्धामय और भक्तिमय थे। अधिकतर मनुष्य, जो बहुत बलवान हो जाता है और जिसके पास शक्ति आ जाती है, जिसे हम लोग कहें कि वह राईट साईडेड (right sided) हो जाता है और वो अपने को इतना ऊँचा समझता है कि अपने आगे किसी को भी नहीं मानता। पर हनुमान जी एक विशेष देवता हैं, एक विशेष गुणधारी देवता। कि  जितने वो बलवान थे, जितने वो शक्तिशाली थे, उतनी ही उनकी भक्ति, शक्ति के संतुलन में; जितनी  शक्ति थी उतनी उनके अंदर भक्ति थी। ये संतुलन उन्होंने किस प्रकार पाला और उसमें रहे, ये एक बड़ी समझने की बात है। जब हम सहजयोग में पार हो जाते हैं ,और सहजयोग में हमारे पास अनेकविध शक्तियां आ जाती है, उसके साथ में हमें संतुलन भी आ जाता है।  हम प्यार करते हैं और प्यार के सहारे, प्यार की शक्ति के सहारे, हम अपने कार्य में रत रहतें हैं, वो कार्य करते रहते हैं। इसी प्रकार श्री हनुमान जी अत्यंत शक्तिशाली थे। और उनके अंदर दैवी शक्तियां थी। उनके अंदर नवधा शक्तियां थी। जैसे कहते है गरिमा, लघुमा… वो चाहे जितना बड़ा हो सकते थे, चाहे जितना छोटा हो सकते थे, अणिमा – छोटे, बिलकुल बारीक़ हो सकते थे। ये सारी शक्तियां उन्होंने अपने भक्ति से पायी है। इसका मतलब ये है की Read More …

Adi Shakti Puja, The Shakti of Satya Yuga (Hindi with English live translation) New Delhi (भारत)

Shakti Puja 5th December 1995 Date : Place Delhi Type Puja  आज हम सत्य युग में शक्ति की पूजा करेंगे  क्योंकि सत्य युग की शुरुवात हो गई है।  और इसी वातावरण के कारण शक्ति का रूप भी प्रखर हो गया है। शक्ति का  पहला स्वरुप है कि वो प्रकाशमान है, तेजस्वी है, तेजपुंज है  ये शक्ति जब प्रकट होगी,  पूर्णतया इस सत्य युग में,  वो हर  एक गलत किसम के लोग सामने उपस्थित हो जायेंगे।  उनकी सारी कारवाहियां सामने आ जाएँगी।   उनकी जो कार्यप्रणाली आज तक चोरी छुपे चल रही थी और उसमे वो मगन थे,  वो सब खुल जायेगा। हर तरह की बुराइयां, वो चाहे नैतिक हो चाहे मानसिक हों, आतंकवादी हो या किसी तरह की भी, सत्य को पसंद न हों।  ऐसी कोई सी भी संस्था, ऐसी कोई सी भी व्यवस्था बच नहीं सकेगी क्योंकि उस पर सत्य का प्रकाश पड़ेगा।  इस सत्य के प्रकाश में शक्ति की विशेष प्रकृति देखियेगा, उसकी एक विशेष आकृति देखियेगा।  कारण, मैने आपसे पहले बताया था कि अब कृत-युग शुरू हो गया और इसके बाद सत्य-युग आयेगा और यह भी बता दिया था कि अब सत्ययुग का सूर्य क्षितिज पर आ गया है। इसकी प्रचीति आपको मिलेगी,  इसका प्रूफ (Proof) आपको मिलेगा कि सत्य के मार्ग में जो भी असत्य लायेगा वो पकड़ा जायेगा, फिर वो सहजयोगी ही क्यों न हो। वो अपने को सहजयोगी कहलाता है और गलत काम अगर करता है, तो वो बच नहीं सकेगा। उसको आज तक सत्य ने बचाया, सम्भाला, उसकी रक्षा करी। लेकिन अब इसके Read More …

Navavarsha, Hindi New Year New Delhi (भारत)

1995-10-25 Navavarsha (Hindi New Year) Delhi (Part 1) आज नया साल का शुभ दिवस है | आप सब को शुभ आशीर्वाद! हर साल, नया साल आता है और आते ही रहता है | लेकिन नया साल बनाने की जो भावना थी, उसको लोग समझ नहीं पाते, सिवाय इसके कि नए साल के दिन नए कपड़े पहनेंगे, ख़ुशी मनाएंगे | कोई ऐसी बात नहीं सोचते हैं कि नया साल आ रहा है, इसमें हमें कौन सी नयी बात करनी है | जैसा ढर्रा चल रहा है, वही चल रहा है और उसी ढर्रे के सहारे हर साल नया साल सब को मुबारक हो | सहज योग में हम लोग जब इतने सामूहिक हैं, ये सोचना चाहिए कि अब कौन सी नयी बात सहज योग में करें? ध्यान में आप लोग काफी गहरे उतर गए हैं | ध्यान आप समझते हैं और एक आपने स्थिति भी अपनी प्रस्थापित कर ली | पर नए साल में कौन सी नयी बात करनी चाहिए, इस ओर हमारा ध्यान जाना ज़रूरी है | असल में पहले तो हमें ये भी सोच लेना चाहिए कि हमारे देश के क्या प्रश्न हैं और सारी दुनिया के कौन से प्रश्न हैं और उन प्रश्नों को हम किस तरह से नतीजे पर ला सकते हैं? उसके लिए मैं सोचती हूँ कि जिन सहज योगियों का जहाँ interest (रुझान) हो, उसे वो ध्यानपूर्वक देखें | ऐसे तो बहुत सी चीज़ें सहज योग में नयी-नयी शुरू हो  गयी | आप जानते हैं, कि इस बार हमने सोचा है कि शिया मुसलमानों को Read More …

Easter Puja, Crucify Yourself कोलकाता (भारत)

1995-04-14 ईस्टर पूजा प्रवचन, स्वयं को क्रूसारोपित करें, कलकत्ता, भारत (अंग्रेजी, हिंदी) । [अंग्रेजी में प्रवचन] आज वह दिन है जब हम ईस्टर मना रहे हैं । ईस्टर पूर्णतया प्रतीकात्मक है, केवल ईसा मसीह के लिए नहीं, बल्कि हम सभी के लिए भी। उस में सबसे महत्वपूर्ण दिन पुनरुत्थान का है। ईसा मसीह के पुनरुत्थान में ईसाई धर्म का संदेश है, क्रॉस का नहीं। पुनरुत्थान के माध्यम से  ईसा मसीह ने दिखाया था कि कोई भी व्यक्ति अपने शरीर के साथ पुनर्जीवित हो सकता है और उनके पुनरुत्थान के बिना, हम आज्ञा चक्र को पार नहीं कर सकते थे, इसमें कोई संदेह नहीं है। उनका जीवन बहुत कम था, हम कह सकते हैं मात्र साढ़े तीन वर्ष , वह वहां रहे । वह भारत आए और शालिवाहन से मिले और शालिवाहन ने उनका नाम पूछा । उन्होंने बताया कि उनका नाम ईसा मसीह है । लेकिन उन्होंने कहा, मैं उस देश से आ रहा हूँ, जहां म्लेच्छ, मल–इच्छा । इनमें मल की इच्छा है, मलिन बने रहने की इच्छा है और मैं नहीं जानता कि वहाँ कैसे रहना है । मेरे लिए, यह मेरा देश है । लेकिन शालिवाहन ने कहा कि, आप वापस जाकर अपने लोगों को बचाएं और उन्हें परम निर्मल तत्व प्रदान करें। इसलिए वह वापस चले गए, और जैसा कि है, साढ़े तीन साल के भीतर उन्हें क्रॉस पर चढ़ाया गया था। अपनी  मृत्यु के समय उन्होंने क्षमा के लिए बहुत सारी सुंदर बातें बताई, लेकिन अंततः उन्होंने कहा माँ को निहारें अर्थात आपको मां के Read More …

Interview (Holland)

मुलाकात – हिंदुस्तान टिव्ही स्टेशन, वरिक्स्त्रात आश्रम, अॅमस्टरडॅम, हॉलंड ३१.७.१९९४ प्रश्नकर्ता :- श्री माताजी, आप छोटे रुपमें अपना परिचय दे सकती है ? श्री माताजी :- परिचय ऐसे की, शालिवाहन का जो खानदान था, उस खानदान के हम है| हमारे पिता और माता दोनोही गांधीजीके परमभक्त थे| और हमारे पिता अपनी कोंन्स्टीटयुएन्ट असेम्बली और उसके बाद पार्लमेंट वगैरा सबके मेम्बर थे| माता भी हमारी ऑनर्स मैथमेटिक्स में थी| और हमारे एक भाई साहब जो है वो अपने कॅबिनेट के मिनिस्टर भी है| लेकिन असल में अध्यात्मिक रूपसे हमारे माता पिता हमें पहचानते थे, की हममें कोई विशेष बात है| और हमारा विवाह हो गया, एक तो हम मेडिकल कॉलेज में पढ़ते थे, लाहोर में, और लाहोर में गड़बड़ी शुरू हो गयी| तो हमारा विवाह हो गया और जिनसे विवाह हुआ वो भी एक बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति है, उनका नाम है डॉ. सी.पि.श्रीवास्तव| बादमे वो जाकरके लंडनमें स्थित एक यु.एन.का, यु.एन.की एक संस्था है जिसको की आय.एम्.ओ. कहते है, ‘इण्टरनॅशनल मेरीटाइम ऑर्गनाइजेशन’ उसके सेक्रेटरी जनरल चुने गये| १३४ नेशन्सने उनको चुना है| वो हमारे पति है| और फिर उन्होंने रिटायरमेंट ले ली| हमारे दो बच्चे है और एक लड़की जो है उसका बिहार में विवाह हुआ है, वो राजेन्द्र बाबुके रिश्तेदार है| प्रश्नकर्ता :- अच्छा| ज्यादातर हम देखते है की, भारतसे आते है योगी, महर्षि लोग, ज्यादातर ये पुरुष है| आप अकेली एक महिला है, आप इस बातको विशेष देखते है भी? श्रीमाताजी :- हां, क्यों की यह कार्य महिला ही कर सकती है| पुरुषोंके बसका नहीं| श्रीराम आये तो वनवास Read More …

Shri Ganesha Puja New Delhi (भारत)

Shri Ganesha Puja. Delhi (India), 5 December 1993. आज हम श्री गणेश पूजा करने है | इस यात्रा की शुरूआत हो रही है और इस मौके पर जरूरी है कि हम गणेश पूजा करें खासकर दिल्ली में गणेश पूजा की बहुत ज्यादा जरूरत है। हालांकि सभी लोग गणेश के बारे में बहुत कम जानते हैं। और क्योंकि महाराष्ट्र में अष्ट विनायक हैं और महा गणपति देव तो गणपति पूले में हैं। इसलिए लोग गणेश जी को बहुत ज्यादा मानते हैं। लेकिन उनकी वास्तविकता क्या है? गणेश जी हें क्या? इस बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। अब जो भी बात हम आपको बता रहे हैं यह सहजयोगी होने के नाते आप लोग समझ सकते हैं। आम दुनिया इसे नहीं समझ सकती। एक हद तक आम दुनिया, विशेषकर बढ्धि परस्त लोग सहजयोग को देख सकते हैं। किन्तु इस योग के घटित होने में कोई देवी देवता मदद करते है ये नहीं मानते और परमचैतन्य को भी अनेक तरह के नाम दे कर के वो समझाते है की ये कॉस्मिक एनर्जी है | पता नहीं लोग समझते है या नहीं |सबसे पहले इस पृथ्वी की रचना होने से पहले समझ लीजिये परमात्मा ने यही सोचा आदिशक्ति ने यही सोचा इस पृथ्वी पर पवित्रया आना चाहिए पवित्रत्रता आणि चाहिए | और पवित्ररता जब यहाँ फ़ैल जाएगी उसके बाद सृष्टि में चैतन्य चारो और कार्यान्वित हो जायेगा जैसे समझ लीजिये परमचैतन्य चारो और फैला हुआ है लेकिन उसका असर तो तभी आता है जब आपके अंदर पवित्ररता आती है अगर आपके अंदर पवित्रता Read More …

Shri Saraswati Puja कोलकाता (भारत)

Shri Saraswati Puja 3rd February 1992 Date : Place Kolkata Type Puja Speech Language Hindi Type: Puja Speech Language: Hindi आप लोगों के प्रेम की गहराई देख कर दिल जी भर आता है। इस कलियुग में माँ को पहचानना बहुत कठिन है। क्योंकि हम अपनी माँ को ही नहीं पहचानते, तो फिर हमें पहचानना तो और भी कठिन हो जाता है। लेकिन इस योग भूमि की गहराई आप लोगों में काम कर रही है।  इसलिए मैं देखती हूँ कि जो भी यहाँ से सहजयोगी आता है वो बड़ा गहरा बैठता है। बड़ी गहराई में उतरता है और बड़ा आश्चर्य होता है कि जहाँ मैंने बहुत कुछ दिन बिताये, बहुत कार्य किया, वहाँ लोग तो बहुत हैं, लेकिन इतनी गहराई नहीं है। और आपस का मेल भी इतना सुन्दर नहीं है, जैसे यहाँ पर है।   ये भी एक योग इस भूमि की मैं कहती हूँ बड़ी विशेशता है। कि आपसी मेल और आपसी प्यार, बिल्कुल निरवाज्य, निस्वार्थ इस तरह से देखा जाता है। ये सब देख कर के अब आप को पता नहीं मुझे इतना आनंद क्यों आता है। और अब चाहती हूँ कि आप लोगों का कार्य और बड़े, और जन-जन में ये जागृत हो। क्योंकि ये भूमि आप जानते हैं कि माँ को बहुत प्यारी है। आज आपने कहा था कि सरस्वती का पूजन होगा, ये बहुत नितांत आवशयक है। कि बंग देश में सरस्वती का पूजन हो क्योकि यहाँ देवी की कृपा रही। और देवी के प्यार की वजह से ही आप ये आज सश्य श्यामलाम भूमि Read More …

Dyan Ki Avashakta, On meditation New Delhi (भारत)

Dhyan Ki Avashayakta   ध्यान की आवश्यकता  Date:27th November 1991 Place: Delhi    Seminar & Meeting Type: Speech Language Hindi  [Original transcript, scanned from Hindi Chaitanya Lahari]  आज आप लोगों से फिर से मुलाकात हो रही है और सहज योग के बारे में हम लोगों को समझ लेना चाहिए।  सहज योग,  ये सारे संसार के भलाई के लिए संसार में उत्तपन्न  हुआ है, कहना चाहिए और उसके आप लोग माध्यम हैं।  आपकी जिम्मेदारियाँ बहुत ज़्यादा हैं क्योंकि आप लोग इसके माध्यम हैं, और कोई नहीं है इसका माध्यम।    कि  हम अगर पेड़ को वाईब्रेशन्स (Vibrations) दें या किसी मन्दिर को वाईब्रेशन्स दें या कहीं और भी वाईब्रेशन्स दें तो वो चलायमान नहीं हो सकते,   वो कार्यान्वित नहीं हो सकता।  आप ही की धारणा से और आप ही के कार्य से यह फैल सकता है।  फिर हमें यह सोचना चाहिए कि सहजयोग में एक ही दोष है। ऐसे तो सहज है, सहज में प्राप्ति हो जाती है। प्राप्ति सहज में होने पर भी उसका संभालना बहुत कठिन है क्योंकि हम कोई हिमालय पर नहीं रह रहे हैं। हम कहीं ऐसी जगह नहीं रह रहे हैं, जहाँ और कोई वातावरण नहीं है, बस सब  आध्यात्मिक वातावरण है। हर तरह के वातावरण में हम रहते हैं। उसी के साथ-साथ हमारी भी उपाधियाँ बहुत सारी हैं जो हमें चिपकी हुई हैं। तो सहजयोग में शुद्ध बनना,  शुद्धता अंदर लाना ये कार्य हमें करना पड़ता है। जैसे कि कोई भी चैनल (Channel)हो वो अगर शुद्ध न हो, तो उसमें से जैसे बिजली का चैनल है उसमें से बिजली नहीं गुज़र सकती। अगर पानी का नल है उसके अंदर कुछ चीज़ भरी हुई है उसमें से पानी नहीं गुज़र सकता। इसी प्रकार ये चैतन्य भी जिस  नसों में बहता है उनको शुद्ध होना चाहिए। और इन नसों को शुद्ध करने की जिम्मेदारी आप लोगों की है । हालांकि आपने कितनी बार कहा है कि माँ हमें भक्ति दो। माँ हमें निताँत आपके प्रति श्रद्धा दो किन्तु ये चीज आपको खुद ही समझदारी में जानना है। पहली तो बात है कि शुद्ध जब नसे हो जाएँगी तो आप आनंद में आ जाएंगे। आपको लगेगा ही नहीं कि आप कोई कार्य कर रहे हैं। आप काई सा भी कार्य करते जाएंगे उसमें आप यश प्राप्त करेंगे। बहुत सहज में Read More …

New Year Puja (भारत)

New Year Puja. Kalwe (India), 1 January 1991. [Shri Mataji speaks in Hindi] आज हम लोग बम्बई के पास ही में ये पूजा करने वाले हैं। बम्बई का नाम, मुम्बई ऐसा था। इसमें तीन शब्द आते हैं मु-अम्बा और ‘आई’। महाराष्ट्रियन भाषा में, मराठी भाषा में, माँ को ‘आई’ ही कहते हैं। वेदों में भी आदिशक्ति को ‘ई’ कहा गया है। सो जो आदिशक्ति का ही प्रतिबिम्ब है, reflection है, वो ही ‘आई’ है। इसलिए मां को आई, ऐसा कहते हैं और बहुत सी जगह माँ भी कहा जाता है। इसलिए पहला शब्द, उस माँ शब्द से आया है, मम। अम्बा जो है, वो आप जानते हैं कि वो साक्षात कुण्डलिनी हैं। सो ये त्रिगुणात्मिका- तीन शब्द हैं। और बम्बई में भी आप जान्ते हैं कि महालक्ष्मी, महासरस्वती, महाकाली ये तीनों का ही एक सुन्दर मन्दिर है। जहाँ पर पृथ्वी से ये तीन देवियाँ निकली हैं। हलाकि, यहाँ पर बहत गैर तरीके लोग उपयोग में लाते हैं पर तो भी ये तीनों देवियाँ यहाँ जागृत हैं। सो बम्बई वालों के लिए एक विशेष रूप से समझना चाहिए कि ऐसी तीनों ही मूर्तियाँ कहीं भी पाई नहीं जाती। वैसे तो आप जानते हैं कि ही माहूरगढ़ में महासरस्वती हैं, और तुलजापुर में भवानी हैं महाकाली हैं, और कोल्हापुर में महालक्ष्मी। और वरणी में अर्धमात्रा जो है उसे हम आदिशक्ति कहते हैं, वो हैं। लेकिन यहाँ तीनों ही मूर्तियाँ जागृत हैं। लेकिन जहाँ सबसे ज्यादा मेहनत होती है, और जहाँ पर चैतन्य सबसे ज्यादा अपना कार्य करता है। उसकी वजह भी कभी- Read More …

Shri Ganesha Puja मुंबई (भारत)

Shri Ganesha Puja 18 sept 1988 Mumbai परमात्माकी सृष्टिकी रचनाकारकी शुरुआत जिस टंकारसे हुई उसीको हम ब्रम्हनाद तथा ओमकार कहते है। इस टंकारसे जो नाद विश्वमे फैला वो नाद पवित्रताका था। सबसे प्रथम परमात्माने इस सृष्टीमे पवित्रताका संचारण किया। सर्व वातावरणको पवित्र कर दिया। पहले उन्होंने पुनीत किया जो चैतन्य स्वरुप आज भी आप लोग जान सकते है। उसे महसूस कर सकते है, उसकी प्रचिती आपको मिल सकती है। वही ओमकार आज चैतन्य स्वरुप आपकोभी पवित्र कर रहा है। श्री गणेश की पूजा हर पूजामे हमलोग करते है और आज तो उन्हीकी पूजा का बड़ा भारी आपलोगोंने आयोजन किया है। लेकिन जब हम किसी भी चीज की पूजा करते है तो उनमे बोहोत सारी विविध स्वरुप की मांगे होती है। कुछ लोग होते है कामार्थी होते है, कुछ लोग पैसा मांगते है, कुछ लोग कहते है हमारा कार्य ठीक से हो जाय, कुछ कहते है की हमारी दुनियामे बड़ी शोहरत हो जाय, सब दूर हमें मान मिले। कोई कहता है की हमारी नौकरी अछेसे चली तो अच्छा है, कोई कहता है हमारा बिज़नस चलना चाहिए , कोई कहता है हमारे मकान बनने चाहिए। ये सब कामार्थी बाते है। और इसी तरहसे मनुष्य की मांगे होते होते वोह गणेश की पूजन करता है। यहाँ पर जो सिद्धि विनायक है उसकी भी जागृति मैंने बहोत साल पहले की थी। सब लोग उस सिद्धिविनायक के पास जा करके हमें ये चीज देदो हमें वो चीज देदो मांगते है। लेकिन ये सिद्धिविनायक है। ये चीज देनेवाला नहीं है , ये वस्तु देनेवाला नहीं है। Read More …

Shri Mahalakshmi Puja New Delhi (भारत)

महालक्ष्मी पूजा दिल्ली, ३/११/१९८६ इस नववर्ष के शुभ अवसर पर दिल्ली में हमारा आना हआ और आप लोगों ने जो आयोजन किया है ये एक बड़ी हुआ महत्त्वपूर्ण घटना होनी चाहिए। नववर्ष जब शुरू होता है तो कोई न कोई नवीन बात, नवीन धारणा, नवीन सूझबूझ मनुष्य के अन्दर जागृत होती है। वो स्वयं होती है। जिसने भी नवीन वर्ष की कल्पना बनाई है वो कोई बड़े भारी द्रष्टा रहे होंगे कि ऐसे अवसर पर प्रतीक रूप में मनुष्य के अन्दर एक नई उमंग, एक नया विचार, एक नया आन्दोलन जागृत हो जाए । ऐसे अनेक नवीन वर्ष आये और गये, नई उमंगे आयी, नई धारणाऐं आयी और खत्म हो गयी। मनुष्य की आज तक की जो धारणाऐं रही है, एक परमात्मा को छोड़कर बाकी सब मानसिक क्रियाऐं या बौद्धिक परिक्रियाऐं थी। मनुष्य अपनी बुद्धि से जो भी ठीक समझता था उसका आन्दोलन कुछ दूर तक जा के फिर न जाने क्यों हटा और उसी विशेष व्यक्ति को और उसी समाज को या उस समय में रहने वाले लोगों पर आघात पहुँचा । इसका कारण क्या था ये लोग नहीं समझ सके। लेकिन आज हमें इसका साक्षात बहत ज्यादा अधिक स्पष्ट रूप से हो रहा है। जैसे कि धर्म की व्यवस्था हुई। धर्म की व्यवस्था में मनुष्य ने जब भी बुद्धि और मानसिक शक्तियों का उपयोग किया, तो बुद्धि के दम से वो एक वाद- विवाद के क्षेत्र में बंध गया और अनेक वाद-विवाद शुरू हो गये। गर सत्य एक है…. तो पन्थ इतने क्यो हुए? इतने धर्म क्यों हुए? Read More …

Public Program कोलकाता (भारत)

1986-10-12 Calcutta Public Program (Hindi) और आप सबसे मेरी विनती है, कि जो लोग परमात्मा की खोज में भटक रहे हैं, उन्हें भी पहले संगीत का आश्रय लेना पड़ेगा – उसके बगैर काम नहीं बनने वाला। क्योंकि अपने भारतीय संगीत की विशेषता यह है कि यह अत्यंत तपस्विता से और मेहनत से ही मिलती है। उसकी गंभीरता, उसकी उड़ान, उसका फैलाव, उसकी गहराई, उसकी नज़ाकत, सब चीज़ों में परमात्मा के दर्शन मनुष्य को हो सकते हैं। और सारा ही संगीत उस ओम(ॐ) से निकला है, जिसे लोग रूह के नाम से जानते हैं। इसलिए, जब इस संगीत से मनुष्य तल्लीन हो जाता है, उसके लिए आसान है कि वो परमात्मा को पाए। शायद आपको मेरी बात कुछ काव्यमय लगे और कुछ यथार्थ से दूर प्रतीत हो, शायद ऐसा अहसास हो कि मैं कोई बात को इस तरह से कह रही हूँ, जैसे कि संगीत कलाकारों को आनंद आये, किन्तु यह बात सच नहीं है। अपने अंदर भी सात चक्र हैं और सब मिला कर के बारह चक्र हैं, उसी प्रकार संगीत में भी सात स्वर और पांच और स्वर मिला कर के पूरा एक स्केल बन जाता है। हमारे चक्रों में जब कुण्डलिनी गति करती है, और जो स्वर उठाती है, वही स्वर हमारे संगीत में माने गए हैं। हमारा भारतीय संगीत बड़े दृष्टों ने, ऋषियों ने, मुनियों ने पाया हुआ है। वह चाहे किसी भी धर्म के रहे हों, वह किसी भी देश के हिस्से में पैदा हुए हों, उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम वह कहीं भी उनका जन्म हुआ Read More …

Public Program, Satya मुंबई (भारत)

1986-01-21 को सत्य, मुंबई (हिंदी) में जनसभा: सत्य का स्वरूप, मुंबई बंबई शहर के सत्यशोधकों को हमारा प्रणिपात। सत्य की खोज के बारे में अनादि काल से इस देश में अनेक ग्रंथ लिखे गए हैं। इसकी वजह यह है, कि इस भारत वर्ष की जो भूमि है, इस भूमि में बहुत से आशीर्वाद छिपे हुए हैं, जिसके बारे में हम जानते नहीं। यहां की आबोहवा इतनी अच्छी है, कि आप जब घर से निकलते हैं, आपको जैसे लंदन में लबादे लबादे लादने पड़ते हैं और निकलने से पहले 15 मिनट तैयार होना पड़ता हैं, ऐसी कोई आफत नहीं। बाहर आते ही प्रच्छन्न ऐसी सुंदर प्रच्छन्न हवा बहती रहती है। यहां एक इंसान जंगलों में भी, पहाड़ी में भी, झरनों के पार, नदियों के किनारे, बड़े आराम से अपना जीवन बिता सकता है। यह हालत किसी भी देश में इतनी अच्छी नहीं है। या तो देश बहुत ज्यादा गर्म है, या बहुत ज्यादा ठंडे हैं। अतिशय्ता की प्रकृति होने की वजह से वहां पर लोगों को हर समय प्रकृति से झगड़ना पड़ता है, और ये संग्राम करते करते लोगों की वृत्ति आक्रमक; आक्रमण करने वाली हो जाती है। आप आक्रमणकारी हो जाते हैं।  जब पहली मर्तबा मैं लंदन गई थी, तो मैं सोचती थी कि यहां कोई प्रकोप है परमात्मा का कि श्राप है, कि आप बाहर एक मिनट भी खड़े नहीं हो सकते। शुद्ध हवा आप एक मिनट भी नहीं ले सकते। घर से निकलीये तो बंद, मोटर में बैठिए दौड़ कर और फिर जहां भी जाइए वहां से दौड़कर आप Read More …

Chaitra Navaratri Puja New Delhi (भारत)

सहजयोगियों के लिये भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का महत्त्व दिल्ली , २५/३/१९८५ आज नवरात्रि के शुभ अवसर पर सबको बधाई ! सहजयोग के प्रति जो उत्कण्ठा और आदर प्रेम आप लोगों में है वो जरूर सराहनीय है, इसमें कोई शंका नहीं। क्योंकि जो हमने उत्तर हिन्दुस्तान की स्थिति देखी है वहाँ पर हमारी परम्परागत जो कुछ धारणाएँ हैं उसी प्रकार शिक्षा प्रणालियाँ हैं, सब कुछ खोई हुई हैं । बहुत कुछ हम लोगों का अतीत मिट चुका है और हम लोग एक उधेड़बुन में लगे हुए हैं कि नवीन वातावरण, तीन सौ साल की गुलामी के बाद स्वतन्त्रता पाने पर तैयार हुआ, वो एक बहुत विस्मयकारी जरूर है, लेकिन विध्वंसकारी भी है । माने कि जैसे कि हम अपने मूलभूत तत्त्वों से उखड़ से गए हैं। उनका सिंचन नहीं हुआ, ये बात जरूर है, लेकिन जो कि हमारा भी रुझान ज्यादा बाह्य की ओर रहा। ये उत्तर हिन्दुस्तान पर एक तरह का शाप सा है। उत्तर प्रदेश में मैं सोचती हूँ कि सीताजीके साथ जो दुर्व्यवहार किया गया उसके फलस्वरूप अब मेरे ख्याल से धोबियों का ही राज शुरू हो गया है। और बड़ी दुःख की बात है कि जब आप उत्तर प्रदेश में सफर करते हैं तो देखते हैं कि लोगों में उथलापन, अधूरापन, अश्रद्धा, अनास्था आदि इतने बुरे गुण आ गये हैं कि लगता नहीं है कि वहाँ कभी सहजयोग पनप सकता है। बड़ा दूसरी बात बिहार, पंजाब, हर जगह ये पाया जाता है कि हम अपने को कहलाते हैं कि हिन्दू या भारतीय हैं, लेकिन हम अपनी Read More …

Mahashivaratri Puja New Delhi (भारत)

महाशिवरात्रि पूजा तिथि: 17 फरवरी 1985 स्थान: दिल्ली प्रकार: पूजा भाषण भाषा: हिंदी मूल प्रतिलिपि हिंदी बातचीत वाचन की गई है, हिंदी चैतन्य लहरी से स्कैन किया गया।  आज शिवरात्रि के इस शुभ अवसर पे हम लोग एकत्रित हुए हैं और ये बड़ी भारी बात है कि हर बार जब भी शिवरात्रि होती है मैं तो दिल्ली में रहती हूँ। हमारे सारे शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार, सारे चीजों में सबसे महत्वपूर्ण चीज है आत्मा और बाकी    के सब कुछ बाह्य के उसके अवलम्बन है। आत्मा में हम अपने पिता प्रभु का प्रतिबिम्ब देखते हैं। कल आपको आत्मा के बारे में मैंने बताया था। वही आत्मा शिव स्वरूप है। शिव माने जो बदलता नहीं, जो अवतरित नहीं होता, जो अपने स्थान में पूरी तरह से जमा रहता है, जो अचल, अटूट, अनंत , ऐसा वर्णित है उस शिव की आज हम अपने अन्दर पूजा कर रहे है वो हमारे अन्दर प्रतिबिम्बित हैं कुण्डलिनी के जागरण से हमने उसे जाना है और उसका प्रकाश जितना-जितना प्रज्जवलित होगा उतना हमारा चित्त भी प्रकाशमय होता जाएगा। लेकिन इस शिव की ओर ध्यान देने की बहुत जरूरत है। शिव के प्रति पूर्णतयां उन्मुख होने के लिए इस तरफ पूरी तरह से ले  जाने के लिए. हमें जरूरी है कि ये समझ लेना चाहिए कि उसकी तैयारी क्या हो? जैसे एक कंदिल में आपने ज्योत बाल  दी लेकिन कंदिल इस योग्य न हुआ कि उस ज्योत को अपने अन्दर समा ले तो ये सब व्यर्थ है, ये सारा कार्य व्यर्थ हो जाएगा। वो चीज़ जो Read More …

Dinner Party New Delhi (भारत)

1984-0315 का Nabhi चक्र [हिंदी] नई दिल्ली (भारत) नाभि चक्र की तारीख 15 मार्च 1984: स्थान दिल्ली: सार्वजनिक कार्यक्रम प्रकार: भाषण भाषा हिंदी [मूल प्रतिलिपि हिंदी बातचीत, हिंदी निर्मल योग से स्कैन किया गया] परमात्मा को खोजने वाले सभी सत्य साधकों को हमारा प्रणाम! आज दो तरह के गाने आपने सुने हैं, पहले गाने में एक भक्त विरह में परमात्मा को बुलाता है। इसे अपराभक्ति कहते है और जब परमात्मा को पा लेता है, जैसे कबीर ने पाया था, तो उसे पराभक्ति कहते हैं। दोनों में ही भक्ति है। इसे कृष्ण ने अनन्य भक्ति कहा है- जहाँ दूसरा कोई नहीं होता, जहाँ साक्षात् परमेश्वर अपने सामने होते हैं, उस वक्त जो हम लोगों का भक्ति का स्वरूप होता है उसे उन्होंने पराभक्ति कहा-अनन्यभक्ति।  किन्तु जब हम परमात्मा को याद करते हैं. उनको स्मरण करते हैं, तब उसकी आदत-सी हो जाती है। जब इन्सान को इस चीज की आदत-सी हो जाती है, तो उस आदत से छूटने में उसे बड़ा समय लगता है।  वह यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि उसकी यह जो साधना है, यह खत्म होने की बेला आई है । और इसी वजह से भक्तों ने भी दृष्टाओं को, सन्तों को, मुनियों को पहचाना नहीं। आप जानते हैं इतिहास में हमेशा सन्तों को इतनी परेशानियाँ उठानी पड़ीं। यह नहीं कि सबने उनको सताया, लेकिन जिन्होंने सताया उनको किसी ने रोका नहीं और समझाया नहीं कि ये सन्त है, ये साधु है। अब हमारे समाज में, खासकर के शंहरों में, विविध विचारों के लोग रहते हैं । Read More …

Public Program New Delhi (भारत)

सहज योग जो है, यह अंतर विद्या है, अंदर की विद्या है. यह जड़ों की विद्या है,  इसलिए आँख खोलने की ज़रुरत नहीं। आँख बंद रखिये। अंदर में घटना घटित होती है, बाह्य में कुछ नहीं होता, अंदर  में होता है। अब इसी को, इस हाथ को आप ऊपर हृदय पर रख के कहें कि , ”मैं स्वयं आत्मा हूँ’। आप परमात्मा के अंश हैं। आप ही के अंदर उसकी रूह जो है, वह प्रकाशित होती है।  इसलिए कहिये कि ”मैं आत्मा हूँ’। बारह मर्तबा कहिये क्योंकि हृदय के चक्र पे बारह कलियाँ हैं।  जिनको हार्ट अटैक आदि आता है, उनके उनके लिए यही मंत्र है कि  ‘मैं आत्मा हूँ’। आत्मा जो है, निर्दोष है । उसमे कोई दोष नहीं हो सकता. निर्दोष है। अधिक तर लोग आदमी को जीतने के लिए ऐसे कहते हैं कि ‘तुम ऐसे खराब हो, ‘तुमने यह पाप किया, तुम फलाने हो, तुम किसी काम के नहीं हो और तुम को परमात्मा माफ़ नहीं करेंगे और तुम बड़े दोषी हो और तुम मानो के तुम दोषी हो’। उलटे हम कहते हैं ‘आपने कोई दोष नहीं किया। आप परमात्मा के बनाये हैं. परमात्मा के आगे, उनकी रहमत के आगे, उनकी अनुकम्पा के आप कोई दोष नहीं कर सकते क्योंकि  उनकी अनुकम्पा एक बड़े भIरी दरिया जैसी है।’  वह सब कुछ धो डाल सकती है।  इसलिए इस हाथ को फिर से ऊपर उठा कर के अपनी लेफ्ट साइड में विशुद्धि में रखें और कहें कि ‘माँ, मैं दोषी नहीं हूँ।  मैं निर्दोष हूँ, मैं आत्मा हूँ। मैं Read More …

Public Program New Delhi (भारत)

“1981-02-17 सार्वजनिक कार्यक्रम, शंकर रोड 1981: ब्रह्म तत्त्वों का स्वरुप, दिल्ली” सार्वजनिक प्रवचन – ब्रह्म तत्व का स्वरूप नई दिल्ली, १७ फरवरी १९८१  आदर से और स्नेह के साथ आपने मेरा जो स्वागत किया है यह सब देख करके मेरा हृदय अत्यन्त प्रेम से भर आया। यह भक्ति और परमेश्वर को पाने की महान इच्छा कहाँ देखने को मिलती है ? आजकल के इस कलियुग में इस तरह के लोगों को देख करके हमारे जैसे एक माँ का हृदय कितना आनन्दित हो सकता है आप जान नहीं सकते| आजकल घोर कलियुग है, घोर कलियुग। इससे बड़ा कलियुग कभी भी नहीं आया और न आएगा। कलियुग की विशेषता है कि हर चीज़ के मामले में भ्रान्ति ही भ्रान्ति है इन्सान को। हर चीज़ भ्रान्तिमय है। इन्सान इतना बुरा नहीं है जितनी कि यह भ्रान्ति बुरी है।हर चीज़ में, अंग्रेजी में जिसे अजीब (chaos) कहते हैं, हर चीज़ में जिसे समझ में नहीं आता कि यह बात सही है कि वो बात सही है, कोई कहता है यह करो और कोई कहता है वो करो, कोई कहता है इस रास्ते जाओ भाई, तो कोई कहता है उस रास्ते जाओ। तो कौन से रास्ते जायें? हर मामले में भ्रान्ति है पर सबसे ज़्यादा धर्म के मामले में भ्रान्ति है। पर जो सनातन है, जो अनादि है, वो कभी भी नष्ट नहीं हो सकता, कभी भी नष्ट नहीं हो सकता, क्योंकि वो अनन्त है। वो नष्ट नहीं हो सकता। उसका स्वरूप कोई कुछ बना ले, कोई कुछ बना ले, कोई कुछ ढकोसला बना ले, Read More …

What To Do After Self-realisation and Sahasrara Chakra, Delhi New Delhi (भारत)

“1981-0210 स्वयं-उपलब्धि के बाद क्या करें, सहस्रार चक्र [हिंदी] नई दिल्ली (भारत)” “स्वयं-प्राप्ति के बाद क्या करें, सहस्रार चक्र [हिंदी] नई दिल्ली (भारत)” सहजयोग में प्रगति नई दिल्ली, १० फरवरी १९८१ यहाँ कुछ दिनों से अपना जो कार्यक्रम होता रहा है उसमें मैंने आपसे बताया था कि कुण्डलिनी और उसके साथ और भी क्या-क्या हमारे अन्दर स्थित है। जो भी मैं बात कह रही हूँ ये आप लोगों को मान लेनी नहीं चाहिए लेकिन इसका धिक्कार भी नहीं करना चाहिए। क्योंकि ये अन्तरज्ञान आपको अभी नहीं है। और अगर मैं कहती हूैँ कि मुझे है, तो उसे खुले दिमाग से देखना चाहिए, सोचना चाहिए और पाना चाहिए। दिमाग जरूर अपना खुला रखें । पहली तो बात ये है कि सहजयोग कोई दकान नहीं है। इसमें किसी प्रकार का भी वैसा काम नहीं होता है जैसे और आश्रमों में या और गुरुओं के यहाँ पर होता है कि आप इतना रुपया दीजिए और सदस्य हो जाइए। यहाँ पर आप ही को खोजना पड़ता है, आप ही को पाना पड़ता है और आप ही को आत्मसात करना पड़ता है।  जैसे कि गंगाजी बह रही हैं। आप गंगाजी में जायें, इसका आदर करें, उसमें नहाएं- धोएं और घर चले आएं। अगर आपको गंगा जी को धन्यवाद देना हो तो दें, न दें तो गंगाजी कोई आपसे नाराज नहीं होती। एक बार इस बात को अगर मनुष्य समझ ले, कि यहाँ कुछ भी देना नहीं है सिर्फ लेना ही है, तो सहजयोग की ओर देखने की जो दृष्टि है उसमें एक तरह की गहनता Read More …

Seminar for the new Sahaja yogis Day 3 Cowasji Jehangir Hall, मुंबई (भारत)

1980-01-30, Seminar for the new Sahaja yogis Day 3, Bordi 1980 (Hindi) और जाते समय, आप सब लोगों को, यहाँ पर छोड़ के, इतनी प्यारी तरह से, इन्होंने, अपने हृदय से निकले हुये शब्द कहे, जिससे, चित्त बहुत खिच सा जाता है। आजकल के जमाने में, जब प्यार ही नहीं रह गया, तो प्रेम का खिंचाव और उससे होने वाली, एक आंतंरिक भावना भी संसार से मिट गयी है। मनुष्य हर एक चीज़ का हल बुद्धि के बूते पर करना चाहता है। बुद्धि को इस्तेमाल करने से मनुष्य एकदम शुष्क हो गया। जैसे उसके अन्दर का सारा रस ही खत्म हो गया और जब भी कभी, कोई भी आंतरिक, बात छिड़ जाती है तो उसके हृदय में कोई कंपन नहीं होता, क्योंकि हृदय भी काष्ठवत हो गया। न जाने आज कल की हवा में ऐसा कौनसा दोष है, कि मनुष्य सिर्फ बुद्धि के घोड़े पे ही चलना चाहता है, और जो प्रेम का आनन्द है उससे अपरिचित रहना चाहता है। लेकिन मैं तो, बहुत पुरानी हूँ, बहुत ही पुरानी हूँ और मैं मॉडर्न हो नहीं पाती हूँ। इसलिये ऐसे सुन्दर शब्द सुन के, मेरा हृदय बहुत ही आंदोलित हो जाता है । लेकिन आज कल की, बुद्धि भी, अब हार गयी। अपना सर टकरा टकरा के हार गयी है। और जान रही है कि उसने कोई सुख नहीं पाया, कुछ आनन्द नहीं पाया। उसने जो कुछ भी खोजा, जिसे भी अपनाया, वो सिर्फ उसका अहंकार था। उससे ज्यादा कोई उसके अन्दर अनुभूति नहीं आयी। धीरे धीरे मनुष्य, इससे परिचित हो Read More …

Do Sansthaye – Man Aur Buddhi , Seminar for the new Sahaja yogis Day 2 Cowasji Jehangir Hall, मुंबई (भारत)

१९८०-०१-२९, नए सहज योगियों के लिए सेमिनार दिन २, कोवासजी जेहांगीर हॉल, मुंबई (भारत) १९८०-०१-२९, नए सहज योगियों के लिए सेमिनार दिन २, बोर्डी [हिंदी अनुलेख] कल आपको प्रस्तावना मैं मैंने बताया, कि जो आप हैं वो किसलिये संसार में आये हैं। परमात्मा ने आपको इतनी मेहनत से क्यों इन्सान बनाया? और इस इन्सान का क्या उपयोग है? इसके लिये परमात्मा ने हमारे अन्दर जो जो व्यवस्था की है वो अतीव सुन्दर है। और बड़ी मेहनत ले कर के बड़ी व्यवस्था की गयी। और सारी तैय्यारियाँ अन्दर जुट गयी। लेकिन जिस वक्त मनुष्य को स्वतंत्रता दी गयी, जब मनुष्य ने अपनी गर्दन ऊपर उठायी और जो पूर्ण मानव हो गया। तो उसने अपनी स्वतंत्रता को भी पा लिया था। उसके अन्दर दोनों शक्तियाँ जिसके बारे में मैने कल बताया था, इड़ा और पिंगला की शक्ति। इड़ा जिससे की हमारा अस्तित्व, एक्झिस्टन्स बनता है, और पिंगला की जिससे हम सृजन करते हैं, क्रियेटिव होते हैं, ये दोनों ही शक्तियाँ कार्यान्वित होने के कारण हमारे अन्दर मन और बुद्धि या मन और अहंकार नाम की दो संस्थायें तैय्यार हो गयी। ये संस्थायें आप अगर देखें तो सर में दो बलून की जैसे हैं। जो कि आपको यहाँ दिखायी देगी। ये सर में दो बलून के जैसे हमारे अन्दर बन गयीं इसे अंग्रेजी में इगो और सुपर इगो कहा जाता है । ये संस्थायें तो वहाँ पे घनीभूत होने के कारण वहाँ की जो तालु की जो …. कर लें, बिल्कुल बीचोबीच …. हड्डी हैं, जिसे फॉन्टनेल बोन कहते हैं, वो कॅल्शियम से Read More …

5th Day of Navaratri Celebrations, Guru Tattwa (Mahima) and Shri Krishna मुंबई (भारत)

  [हिंदी प्रतिलेख] 1979-0926-गुरू तत्व और श्रीकृष्ण शक्ति २६ सितम्बर १९७९, मुंबई  गुरू का स्थान हमारे अंदर काफी ऊंची जगह है। गुरु का स्थान हमारे अंदर स्थित है, कोई इसमें नई चीज करने की नहीं है। परमात्मा ने ये जो साधन बनाया हुआ है, यह जो इंस्ट्रूमेंट है इसको बहुत ही सुंदरता से बनाया गया है। इसका एक एक चक्र जोकि हमारे लिए अद्रश्य ही हैं और हमारे अंदर स्थितः है जिससे ये विश्व जगत हमें जान पड़ता है बहुत सुंदरता से रचित है; किन्तु मनुष्य अति मैं रहता है, हमेशा अति पे जाने से उसने अपने इस साधन को बिगाड़ लिया है। उसी प्रकार गुरु का जो स्थान है उसे भी मनुष्य ने बिगाड़ लिया है. गुरु का स्थान हमारे अंदर इस पूरी जगह इस फ्रांस मैं है, इस पूरे देश मैं गुरु का स्थान है। पेट के अंदर चारों ओर नाभि चक्र से जुड़ा हुआ है। अभी तीन दिन पहले मैने नाभिचक्र पर आपसे बात की थी, इस नाभिचक्र पर श्री विष्णु  का स्थान है। विष्णुशक्ति के कारण ही मानव अमीबा से इंसान बने हैं। और उसी शक्ति से ही आप मानव से  अतिमानव बनने वाले हैं। । अब ये जो गुरु की शक्ति हमारे अंदर परमात्मा ने पहले से ही विकसित की हुई है इसके लिए अनेक गुरुओं के पहले अवतरण हुए हैं। अब पहले देखें की यह गुरूतत्व बना कैसे  है इसके लिए समझना चाहिए की गुरुतत्व अनादि है और उसको कैसे बनाया गया। हमारे अंदर  अदृश्य रूप से तीन  शक्तियां कार्यान्वित रहती हैं। प्रथम  शक्ति Read More …

Evening prior to departure for London, Importance of Meditation पुणे (भारत)

Evening prior to Her departure for London (Marathi & Hindi). Pune, Maharashtra, India. 30 March 1979. [Hindi Transcript]  ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK आप लोग सब इस तरह से हाथ कर के बैठिये। इस तरह से हाथ कर के बैठे और आराम से बैठे। इस तरह से बैठिये। सीधे इस तरह से आराम से बैठिये। कोई स्पेशल पोज़ लेने की जरूरत नहीं है। बिल्कुल आराम से बैठिये। सहज आसन में। बिल्कुल सादगी से। जिसमें कि आप पे कोई प्रेशर नहीं। न गर्दन ऊपर करिये, नीचे करिये। कुछ नहीं। मुँह पर कोई भी भाव लाने की जरूरत नहीं है और कोई भी जोर से चीखना, चिल्लाना, हाथ-पैर घुमाना, श्वास जोर से करना, खड़े हो जाना, श्वास फुला लेना ये सब कुछ करने की जरूरत नहीं। बहुत सहज, सरल बात है और अपने आप घटित होती है। आपके अन्दर इसका बीज बड़े सम्भाल कर के त्रिकोणाकार अस्थि में रखा हुआ है। इसके लिये आपको कुछ करना नहीं है। आँख इधर रखिये। बार बार आँख घुमाने से चित्त घूमेगा। आँख इधर रखिये। चित्त को घुमाईये नहीं। आँख घुमाने से चित्त घूमता है। आँखे बंद कर लीजिये, उसमें हर्ज नहीं । उल्टा अच्छा है, आँख बंद कर लीजिये। अगर आँख बंद नहीं हो रही हो या आँखें फड़क रही हो तो आँख खोल दीजिये। सब से पहली चीज़ है यह घटना घटित होनी चाहिये। लेक्चर सुनना और सहजयोग के बारे में जानना इसके लिये बोलते बोलते मैं तो थक गयी हूँ। और एक बहोत बड़ी किताब भी लिखी गयी है, अंग्रेजी में । उसकी कॉपीज Read More …

Chakro Per Upasthit Devata Bharatiya Vidya Bhavan, मुंबई (भारत)

1979-0117 सभी चक्रों पर देवताओं का प्रोग्राम [हिंदी] भारतीय विद्या भवन, मुंबई (भारत) सार्वजनिक कार्यक्रम, “सभी चक्रों पर देवताओं का प्रोग्राम” (हिंदी). भारत विद्या भवन, मुंबई, महाराष्ट्र, भारत. 17 जनवरी 1979। (एक आदमी से बातचीत) ‘आ रहे हैं अब? नहीं आ रहे है न? सिगरेट पीते थे आप?’ ‘कभी नहीं! ‘कभी नहीं पीते थे ? या मंत्र कोई बोले होंगे?’ ‘पहले बोलता था अब विशेष नहीं। ‘वहीं तो है न ! आप देखिये, आप मंत्र बोलते थे, आपका विशुद्धि चक्र पकड़ा है। विशुद्धि चक्र से आपको अभी मैं दिखाऊँगी, आपको अभी मैं बताऊँगी। ये देखो, ये दो नसें यहाँ चलती हैं, विशुद्धि चक्र में ही ये विशेषता है और किसी चक्र में नहीं। ये दोनों नसें यहाँ से चलती हैं। नाड़ियाँ हैं ये दोनों। इसलिये जब आप हाथ मेरी ओर करते हैं तो हाथ से जाता है। हाथ में ही दो नाड़ियाँ हैं । तो ये नाड़ियाँ गायब हो गयी। जिस आदमी में विशुद्धि चक्र पकड़ा होगा तो आपको फील ही नहीं होगा हाथ में। बहुत लोगों की ये गति हो जाती है, कि वो बहुत पहुँच जाते हैं, उनको अन्दर से सब महसूस भी होता है, शरीर में महसूस होता है, हाथ में महसूस ही नहीं होता। अन्दर महसूस होता है। यहाँ है अभी कुण्डलिनी, यहाँ है, सर में है, ये सब महसूस होगा, पर हाथ में होता ही नहीं। ‘माताजी, गहन शांति जब होती है तब कैसे मालूम हो कि कुण्डलिनी कहाँ पर है? आप जब दूसरों की ओर हाथ करेंगे ना तब आपको खुद ही अन्दर पता Read More …

Public Program, Brahmajana New Delhi (भारत)

Brahama Ka Gyan (Knowledge of Bramh) Date : 1st February 1978 Place Delhi Type Public Program ORIGINAL TRANSCRIPT HINDI TALK कुछ चक्रों के बारे में बता चुकी हूँ। और इसके आगे के चक्रों के बारे में भी आज बताऊंगी। जैसे कि पहले चक्र का नाम मैंने आपसे बताया मूलाधार चक्र है। जो नीचे स्थित यहाँ पर चार पंखुड़ियाँ वाला होता है। और इस चक्र से क्योंकि ये सूक्ष्म चक्र है और इसका जो जड़ अविभाव है, इसका जो ग्रोस एक्सप्रेशन है, उसे पेल्व्हिक प्लेक्सस कहते हैं। और इसमें श्रीगणेश के बहुत ही पवित्र चरण रहते हैं। और उससे ऊपर जो | त्रिकोणाकार यहाँ पर बना हुआ है, इसमें कुण्डलिनी का स्थान है और ये बड़ा भारी महत्वपूर्ण बिंदु मैंने आपसे बताया था की श्रीगणेश नीचे होते हैं और कुण्डलिनी उपर होती है। ये बहुत समझने की बात है। इसी चीज़ को ले कर के लोगों ने बड़ा उपद्व्याप किया हुआ है। कहना कि गणेश जी मूलाधार चक्र में होते हैं, जिसे सेक्स का संबंध से हैं। या तो बिल्कुल ही सेक्स से दूर हटा कर के और कहना कि सेक्स से दूर हट के और सारे ही कार्य करते रहना, ये परमात्मा है। इस तरह की दो विक्षिप्त चीज़ें चल पड़ती हैं । सेक्स का आपके उत्क्रांति (इवोल्यूशन) से कोई भी संबंध नहीं है। कोई भी संबंध नहीं । लेकिन सेक्स से भागने की भी सहजयोग में कोई भी जरूरत नहीं । एक जीवनयापन की वो भी एक चीज़ है। पर इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं जिसे लोग समझते हैं। और एक Read More …

Sahajyog, Kundalini aur Chakra मुंबई (भारत)

Sahajyog, Kundalini aur Chakra, Mumbai, India 30-01-1978 सहजयोग, कुण्डलिनी और चक्र मुंबई, ३० जनवरी ७८  ये सहज क्या होता है? आप में से बहुतों को मालूम भी है । नानक साहब ने बड़ी मेहनत की है और सहज पर बहुत कुछ लिखा है । यहाँ आप लोगों पर बड़ा वरदान है उनका। लेकिन उनको कोई जानता नहीं है, समझता नहीं। सहज’ का मतलब होता है स ह ज। ‘सह’ माने साथ, ‘ज’ माने पैदा होना। आप ही के साथ पैदा हुआ है। यह योग का अधिकार आपके साथ पैदा हुआ है। हर एक मनुष्य को इसका अधिकार है कि आप इस योग को प्राप्त करें। लेकिन आप मनुष्य हो तब! अगर आप जानवर हो गये तो इस अधिकार से वंचित हो जाते है या आप दानव हो गये तो भी इस अधिकार से वंचित हो जाते है। अगर आप मनुष्य है साधारण तरह से तो आप को अधिकार है कि इस योग को आप प्राप्त करें। यही एक योग है बाकी कोई योग नहीं। बाकी जितने भी योग है इसकी तैय्यारियाँ। सहजयोग के और दूसरे माने यह भी लगाते हैं हम लोग कि सहज माने सीधा, सरल, effortless, spontaneous, अकस्मात घटित होनेवाली चीज़ क्योंकि ये एक जिवन्त घटना है।  तो ऐसे गुरू जो पालना चाहते हैं उनका यह स्थान नहीं है । सीधा हिसाब हैं मैं हाथ जोड़़ती हैँ। चाहें मेरे पास दो ही शिष्य रहें मुझे कोई हर्ज नहीं। जिसको सत्य चाहिए वो यहाँ आए। पहली चीज़ जीसको सत्य नहीं चाहिए और असत्य के पिछे भागना चाहते हैं वो Read More …

Sab Chijo me Mahamantra ho (भारत)

Sab Chijo me Mahamantra ho, India, 16-03-1977 सब चीज़ों में महामन्त्र हो भारत, १६ मार्च १९७७  कल आपसे मैंने बताया था ध्यान के वक्त कि आप इस तरह से हाथ कर के मेरी ओर बैठें और आपके अन्दर चैतन्य धीरे-धीरे बहता हुआ आपकी कुण्डलिनी को जागृत कर देगा। ये सारी प्रक्रिया ऐसी लगती है जैसे कोई बच्चों का खेल है। और आप लोगों ने इन लोगों को देखा भी होगा जो यहाँ पर सहजयोगी लोग थे कि वो अपने हाथ को घूमा-घूमा कर के और आपको कुछ चैतन्य दे रहे थे और कुछ कार्य कर रहे थे। मामूली तौर से ये चीज़ अगर देखी जाये तो एक बच्चों का खेल लगता है।  जिस वक्त मोहम्मद साहब ने लोगों को नमाज पढ़ने के लिए बताया था तो लोग उनका मज़ाक करते थे और जिस वक्त अनादिकाल में ही होम-हवन आदि हमारे देश में शुरू किये गये थे तब भी ऐसे लोग थे जो सोचते थे कि ये क्या महामूर्खता है? ये क्यों करें? और जब वो बातें रूढ़ीगत हो जाती हैं तब मनुष्य इसको इस तरह से मान लेता है मानो ऐसे कि ये आपके जीवन का एक अंग है। जैसे नमस्कार करना। हम लोग, हिंदुस्तानी आदमी किसी को देखते ही नमस्कार कर लेते हैं। उसके बारे में ये पूछा नहीं करते कि इस तरह से दो हाथ जोड़ के हमने क्यों नमस्कार किया? और पूजा के समय हम इस तरह से आरती क्यों करते हैं और अपना हाथ इस तरह से क्यों घुमाते हैं? साथ में हम दीप ले कर Read More …

Samarpan Bharatiya Vidya Bhavan, मुंबई (भारत)

1977-01-08 Samarpan: Kuch bhi nahi karnahai (Surrender) यह निष्क्रियता है | क्या आप अपने विचारों, जो सहज नहीं हैं, के द्वारा कह सकते हैं कि यह कैसे हो सकता है? आप पीछे जाकर यह नहीं कह सकते कि मैंने कुछ नहीं किया है । आप हमेशा आगे बढ़ते हैं, आगे बढ़ते जाते हैं यह कहते हुए कि कैसे? कैसे आगे जाने का? इसी को स्वीकार कर लेना कि यह घटना चेतना की ओर होती है और चेतना ही इसको घटित करती है। हमें पूरी तरह से प्रयत्न को छोड़ देना है । जब हम अकर्म में उतरते है तब यह चेतना घटित होती है। इसका मतलब है कि आपको कुछ भी नहीं करना है। यह बहुत कठिन काम है मनुष्य के लिए । कुछ नहीं तो विचारही करता रहेगा। लेकिन यह घटना जब घटित होती है तो विचार भी डूब जाते हैं क्योंकि अभी तक जो भी आपने साधना देखी है उसमें आपको कुछ न कुछ करना पड़ता है । यह सब साधना आपको अपने से बाहर ले जाती है । सहजयोग घटना है वह अन्दर ही घटित होती है । जब लोग पुछते है कि समर्पण कैसे करना है? सीधा हिसाब है, आपको कुछ नहीं करना है। समर्पित हो गया। मनुष्य इस गति में, इस दिशा में आज तक चला नहीं इसलिए उसके लिए यह नई चीज़ है और नया मार्ग है । इसमें मनुष्य कुछ नहीं करता। अपने आप चीज़ घटित हो जाती है | क्योंकि उसने बहुत कुछ कर लिया है, बहुत कुछ दूर चला गया है Read More …

Parmatma Ka Prem, Type: Public Program, Place: Bal Mohan Mandir, Mumbai Language: Hindi Balmohan Vidyamandir, मुंबई (भारत)

1975-12-23 सत्य के खोजने वाले आप सब को मेरा वंदन है। कल आप बड़ी मात्रा में भारतीय विद्या भवन में उपस्थित हुए थे। और उसी क्षण के उपरान्त जो भी कहना कुछ है, आज आप से आगे की बात मैं करने वाली हूँ। विषय था, ‘एक्सपिरिअन्सेस ऑफ डिवाईन लव’ (experiences of divine love) परमात्मा के प्रेम के अनुभव । इस आज के साइन्स के युग में, पहले तो परमात्मा की बात करना ही कुछ हँसी सी लगती है और उसके बाद, उसके प्रेम की बात तो और भी हँसी सी आती है। विशेषकर हिन्दुस्तान में, जैसे मैंने कल कहा था, कि यहाँ के साइंटिस्ट अभी तक उस हद तक नहीं पहुँचे हैं जहाँ वो जा कर परमात्मा की बात सोचें। ये दुःख की बात है लेकिन और विदेशों में साइंटिस्ट वहाँ तक पहुँच गये हैं, जहाँ पर हार कर कहते हैं कि इससे आगे न जाने क्या है?  और वो ये भी कहते हैं कि ये सारा जो कुछ हम जान रहे हैं, ये साइन्स के माध्यम में बैठ रहा है, ये बात सही है। लेकिन ये कुछ भी नहीं है। ये जहाँ से आ रहा है वो एक अजीब सी चीज़ है, जिसे हम समझ ही नहीं पाते। जैसे कि केमिस्ट्री के बड़े-बड़े साइंटिस्ट हैं, वो कहते हैं कि ये जो पिरिऑडिक लॉ (periodic laws) जो बनाये गये हैं, ये समझ में ही नहीं आते कि किस तरह से बनाये गये होंगे। एक विचित्र तरह की रचना कर के इतनी सुन्दरता से एक-एक अणु-रेणु को इस तरह से रचा गया है। एक-एक अणू में एक ब्रह्मांड किस तरह से समाया गया है, ये कुछ समझ में नहीं आता। वो कहते हैं कि इनके रचना का Read More …

Public Program Bharatiya Vidya Bhavan, मुंबई (भारत)

Updesh – Bhartiya Vidya Bhavan- 1, 17th March 1975 Date : Place Mumbai Seminar & Meeting Type Speech Language Hindi ( … अस्पष्ट) उन सब के बारे में काफ़ी विशद रूप से मैने आपको बताया है। और जिस चैतन्य स्वरूप की बात हर एक धर्म में, हर समय की गयी है उससे भी आप में से काफ़ी लोग भली भाँति परिचित हैं। उस पर भी जब मैं कहती हूँ कि आप गृहस्थी में रहते हो और आप हठयोग की ओर न जायें, तो बहुत से लोग मुझसे नाराज़ हो जाते हैं। और जब मैं कहती हूँ कि इन संन्यासिओं के पीछे में आप लोग अपने को बर्बाद मत करिये और इनको चाहिये की गृहस्थ लोग दूर ही रखें। तब भी आप लोग सोचतें हैं कि माँ, सभी चीज़ को क्यों मना कर रहे हैं।  ऐसे तो मैं सारे ही धर्मों को संपूर्ण तरह से आपको बताना चाहती हूँ। इतना ही नहीं, जो कुछ भी उसमें आधा-अधूरापन भापित होता है उसको मैं पूर्ण करना चाहती हूँ। मैं किसी भी शास्त्र या धर्म के विरोध में हो ही नहीं सकती। लेकिन अशास्त्र के जरूर विरोध में हूँ और अधर्म के। और जहाँ कोई चीज़ अधर्म होती है और अशास्त्र होती है, एक माँ के नाते मुझे आपसे साफ़-साफ़ कहना ही पड़ता है। बाद में आपको भी इसका अनुभव आ जायेगा  कि मैं जो कहती हूँ वो बिल्कुल सत्य है, प्रॅक्टिकल है। जब आप अपने हाथ से बहने वाले इन वाइब्रेशन्स को दूसरों पे आजमायेंगे, आप समझ लेंगे, कि मैं जो कहती हूँ Read More …

Public Program, Sharirik bimariya Vibration se thik ho sakti hai Bharatiya Vidya Bhavan, मुंबई (भारत)

Bimariya Chaitanya Se Thik Ho Sakti Hai Date 16th February 1975 : Place Mumbai Seminar & Meeting Type Speech Language Hindi आज के लिये एक माँ के स्वरूप से मैं इस …. आयी हूँ, जिसका नाम बहुत अदुभुत है। पर हो सकता है, कि आपको विश्वास ही न हो, कि एक साधारण स्त्री, आप ही के जैसी, घर गृहस्थी में रहने वाली इस तरह की….. में कैसे आयी ? उस … का नाम है सहज मोक्ष। पहले कि हम ये जानें कि सहज क्या चीज़ है, ये जान लेना चाहिये की मोक्ष क्या है? सॅल्वेशन किसे कहते हैं? हम इस संसार में किसलिये आये? मनुष्य की उत्पत्ति क्यों हुई ? मनुष्य विशेष रूप में क्यों बनाया गया?  परमेश्वर ने एक विशेष कलाकृति से इस सुंदर जीव को क्यों इतनी सारी शक्तियाँ दी ? ये समझने के बाद ही आप जान पायेंगे कि आपका सारा अस्तित्व, आपका पूरा एक्सिसटेन्स  ही आपको अत्यंत आनंद में डुबोने के लिये हुआ है। उसके लिये परमात्मा ने बड़ी मेहनत की। अब आप में ऐसे भी लोग हो सकते हैं, कि जो ये कहेंगे कि माताजी, परमात्मा कहाँ है ? हमको उनसे मिलवाएँ  …. पहली सीढ़ी से ही शुरू करना पडता है। परमात्मा है या नहीं ये बात बहुत आसानी से समझ आती है, अगर आप साइन्स टीचर है। साइन्स में ही अब सिद्धता हो गयी हैं, कि परमात्मा हैं। आप किसी केमिस्ट्री वाले आदमी से जाकर पूछिये कि दुनिया भर के जितने भी एलिमेंट्स हैं, उनको किस प्रकार व्यवस्थित रूप से परमात्मा ने एक के Read More …

Dhyan Aur Prathna, Second Talk मुंबई (भारत)

Dhyan Aur Prathna, Second Talk सहजयोग में सबसे आवश्यक बात ये है, कि इसमें अग्रसर होने के लिये, बढ़ने के लिये आपको ध्यान करना पड़ेगा| ध्यान बहुत ज़रूरी है|  आप और चाहे कुछ भी न करें लेकिन अगर आप ध्यान में स्थित रहें, तो सहजयोग में प्रगति हो सकती है| जैसे कि मैंने आपसे कहा था कि एक ये नया रास्ता है| नया आयाम है, dimension है; नई चीज़ है जिसमें आप कूद पड़े है| आपके अचेतन मन में, उस महान सागर में आप उतर गये हैं, बात तो सही है| लेकिन इसकी गहराई में अगर उतरना है, तो आप को ध्यान करना पड़ेगा| मैं बहुत से लोगों से ऐसा भी सुनती हूँ कि “माता जी, ध्यान के लिए हमको time (समय) नहीं मिलता है|” आज का जो आधुनिक मानव है, modern man है, उसके पास घड़ी रहती है, हर समय time बचाने के लिये, लेकिन वो ये नहीं जनता है कि वो time किस चीज के लिए बचा रहा है? उसने घड़ी बनाई है वो सहजयोग के लिये बनाई है, ये वो जानता नहीं है| एक साहब मुझ से कहने लगे कि “मुझे लंदन जाना बहुत ज़रूरी है और इसी plane (हवाई जहाज) से जाना ही है और किसी तरह मेरा टिकट बुक होना ही चाहिये और कुछ कर दिजिये आप, और Air-India वालों से कह दिजिये और कुछ कर दिजिये…|” मैंने कहा ऐसी कौन-सी आफत है? आप लंदन क्यों जाना चाहते हैं? ऐसी कौन सी आफत है? क्या विशेष कार्य आप वहां करने वाले हैं? कौन सी चीज Read More …

Seven Chakras and their Deities, Paane ke baad New Delhi (भारत)

1973-11-25 Seven Chakras and their Deities (Paane ke baad) 1973, Mumbai कि आपको कुछ भी नहीं करने का है सहज में हो जाता है । सहज शब्द का अर्थ रोजमर्रा भाषा में सहज माने आसान। लेकिन सहज शब्द जहाँ से आया वो ‘सह’ और ‘ज’ के साथ मिले हुए सहज से आया। माने आसान है । मतलब जो हमारे साथ जो पैदा हुई आँख है, हमारे साथ जो पैदा हुई  हमारी नाक है, इसका हमें कुछ देखना नहीं पड़ता।[अस्पष्ट]  इस कारण इसमें कोई भी प्रतिबिम्ब पूरा नहीं पड़ता। अगर कोई ऐसा सरोवर हो कि जिसके अन्दर कोई भी लहर उठ नहीं रही। तो उसके चारों तरफ फैला हुआ उसका सौन्दर्य पूरा का पूरा अन्दर प्रतिबिंबित होता है । इतना ही नहीं पर पूरा तादात्म्य होता है। इसी तरह से जब आप किसी भी सुन्दर दृश्य को देखेंगे परमात्मा की रचना की ओर दृष्टि करेंगे आप निर्विचार हो जाएंगे। निर्विचार होते ही उसके अन्दर की जो आनन्द-शक्ति है वो आपके अन्दर पूरी प्रतिबिम्बित होगी I  इतना ही नहीं आप ने उसमें पूरी तरह से तादात्म्य पा लिया है।  इसी तरह से [अस्पष्ट] अनेक विधि परमात्मा ने आपके लिए श्रृंगार सजाए हैं, अत्यन्त सौन्दर्य चारों तरफ फैला हुआ है। उस सौन्दर्य के सूत्र ही में उतरने से ही आपके अन्दर आनन्द की उत्पत्ति हो जाती हैं। उस आनन्द को आप देखने के लिए ही पैदा हुए हैं, अपने को बेकार में दुखी बनाने की कोई ज़रूरत नहीं। [अस्पष्ट] बहुत लोगों ने ये भी पूछा है कि हमें अब आगे क्या करना होगा। Read More …

Public Program New Delhi (भारत)

 1973/11/17 Public Program, New Delhi   जानवर में, जो प्रश्न होते ही नही है, जो मनुष्य में होते है। जानवर के लिए तो कोई प्रश्न ही नही होता है, वो सिर्फ जीता है। जिस शक्ति के सहारे वो जीता है, उसकी ओर भी, उसका कोई प्रश्न नही होता है कि  वो कौन सी शक्ति है, कि जिसके सहारे मैं जीता हूँ। उसकी वजह ऐसी है, कि ये चैतन्य शक्ति है , क्योंकि सारी सृष्टी की रचना करती है, उसकी चालना करती है उसकी व्यवस्था करती है। वो प्राणीमात्र में बहती हुई और गुजर जाती है। क्योंकि इंसान ने उसके एक विशेष कारण , उसके एक विशेष तरह के जीवन, से संबंधित ऐसी कुछ रचनाऍ हो जाती है कि जिससे मनुष्य उस शक्ति से वंचित हो जाता है। इसको अगर हम समझे तो साधारण शब्दो में इस तरह से कहा जाएगा कि मनुष्य में जो अहंकार हो जाता है वो प्राणीमात्र में नही होता। मनुष्य की दिमागी, हार जो है वो बहुत ही और तरह की है| उसका दिमाग एक त्रिकोणाकार है और इस त्रिकोण में जब ये शक्ति, बच्चा तीन महीने के माँ के गर्भ में होते समय अंदर की ओर गुजरती है, तो वो एक रिफरेकशन (अपवर्तन) जिसे अंग्रेजी में कहते है, विलिनीकरण जिसे कहते है, विकेंद्रिकरण कहते है उससे तीन हिस्सो में बट जाती है। एक तो हिस्सा जो कि सर के माथे के पीछे सीधा ही नीचे गुजर के जाता है और बाकी दो हिस्से जो कि सर के दो कोणो में से नीचे गुजर के और घुम करके पीछे की ओर चला जाता [है]। इस तीन Read More …

Unidentified Talk (extract on Swadishthana) (भारत)

1979-0101 Unidentified Hindi Talk (extract on Swadishthana) स्वाधिष्ठान चक्र।  इस चक्र का तत्व है कि आप सृजनशाली, सृजनशाली हो जाते हैं, आपकी सृजनता बहुत बढ़ जाती है। ऐसे लोग जिन्होंने कभी एक लाइन भी स्वतंता नहीं लिखी, वह काव्य लिखने लग जाते हैं। जिन लोगों ने कभी भाषण नहीं दिया वह बड़े भाषण देने लग जाते हैं और जिन लोगों ने कभी पेंटिंग नहीं करी, कुछ कला नहीं देखी वो कलात्मक हो जाते हैं। बहुत सृजन हो जाते हैं। हमारे आर्किटेक्टस लोग हैं, वह कहां से कहां पहुंच गए। तो इंसान में सृजनता आ जाती है, क्योंकि वह अपनी सृजनता को बड़ी ऊंची सी चीज समझता है। फिर उसको पैसे की परवाह नहीं होती कि पैसा जो है उसको देखो और सृजनता कैसे भी करो। और ना ही बहुत से लोग चाहते हैं कि हमारा बड़ा नाम हो जाए, तो कोई न कोई बड़ी विक्षिप्त सी चीज बनाकर रख दो, कुछ विचित्र चीजें जैसी आजकल बनती हैं, इसलिए कि हमारा बड़ा नाम हो जाएगा, लोग हमें बहुत याद करेंगे, पर उसमें कला नहीं है। तो कला का जो महान अंश है उसको प्राप्त करते हैं आप, जब आपका यह दूसरा वाला चक्र है स्वाधिष्ठान यह ठीक होता है। और इसके कारण, स्वाधिष्ठान के कारण ही हम बहुत जब सोचते हैं तो हमारा जो मस्तिष्क है, उसके अंदर जो ग्रे सेल्स हैं उसकी शक्ति इस्तेमाल करते हैं। तो ये उस शक्ति को पूरित करता है, ये चक्र। तो तो जो लोग बहुत सोचते हैं उनको दुनिया भर की बीमारियां हो जाती Read More …