Birthday Puja

Mumbai (India)

Feedback
Share

जनम दिवस पूजा २१ मार्च १९८५ , मुंबई

आज के ६३वें जन्मदिवस पर आपने जो समारोह रचा है उसके लिए एक माँ को क्या कहना चाहिए? क्योंकि जो कुछ भी है सब आपके लिए ही है। ये सारी उम्र भी आपके लिए है इसलिए इसके लिए यदि आप इस समारोह को मानते हैं तो इतना ही कहना है कि यह अपनी चीज़ है। और इसका आपको पूरा उपयोग करना चाहिए। क्योंकि जिन्दगी बहुत महत्वपूर्ण है । आज तक परमात्मा ने अनेक लोगों को संसार में भेजा। उन्होंने भी कार्य किया है । उस कार्य की ही स्वरूप आप लोगों ने सहजयोग पाया है। लेकिन अभी तक आप लोग शायद इसका महत्व नहीं जान पाए। पहले तो लोग पहाड़ों में घूमते थे, बहुत तपश्चर्या करते थे, परमात्मा की खोज में रहते थे । अब फलश्रुति हो रही है। आज उसी कार्य के आशीर्वाद आपने सहज में ही आज अपनी आत्मा को प्राप्त किया, इतना सहज और सरल मिला है, और उससे इतना क्षेम प्राप्त हुआ है। इस कदर आपने शक्तियों को प्राप्त किया है, उसमें कभी भी ऐसा आपको लगा नहीं कि इस चीज़ को मिलने में कितना प्रयत्न करना पड़ा, कितने जन्म लेने पड़े, कितनी जिन्दगियाँ बितानी पड़ीं, उसके बाद आज आप सहजयोग को प्राप्त हुए । और इस दशा में आये हो कि आज आप एक साधु स्वरूप हैं। बहुत लोग सोचते हैं कि सहजयोग में आने से हमारी घर की सांपत्तिक स्थिति ठीक हो गयी या हमारे बच्चे ठीक हो गये। लड़कियों की शादियाँ हो गयीं, लड़कों को नौकरियाँ मिल गयीं। हर तरह का क्षेम हो गया। यह सब देखते हुए भी, जानते हुए, आपको उन लोगों के लिए सोचना चाहिए जिन्होंने अभी तक इसमें से कुछ भी नहीं पाया है, जो अमान के सागर में डूबे हुए हैं। इस पर हमेशा चर्चा होनी चाहिए, इस पर हमेशा विचार होना चाहिए। आप तो जानते हैं मुझे किसी भी चीज़ की जरूरत नहीं है। मैं पूरी तरह से तृप्त जीव हूँ। लेकिन मुझे सम्पूर्ण संसार को बचाना है। सारे संसार के लोगों को बचाना है। उसके लिए बहुत मेहनत करनी है। सालों बीत गये। पहले तो मेहनत की कि किस तरह से सहजयोग एक सामूहिक चेतना का कार्य करे। बहुत मेहनत की। हर एक आदमी की ओर ध्यान देकर के और उसको अभ्यास करके और समझा कि इस आदमी के कैसे दोष हैं फिर उसका वर्गीकरण किया, अलग-अलग उसको बिठाया, फिर उसका विश्लेषण किया । हज़ारो लोग जो जीवन में आये, जिनके बारे में मैं पढ़ती थी, मैं जब छोटी थी हमेशा लोगों की जीवनी पढ़ती थी। स्कूल में लड़कियों को बड़ी हंसी आती थी ये अभी प्राइमरी स्कूल में है और सबकी जीवनी पढ़ती रहती है। कोई आस्ट्रेलिया में आदमी हो गया, उसको पढ़ रहे हैं, कोई जापान में हुआ उसकी पढ़ रहे हैं, कोई अमेरिका में हुआ उसकी पढ़ रहे हैं, हमेशा हम जीवनियाँ पढ़ते थे। पिछले जीवन में इसको कौन से प्रश्न आए? इसका हल उसने कैसे निकाला? ये आदमी कैसा होगा? इसकी प्रकृति कैसी होगी? फिर इसकी इस जन्म में प्रकृति क्या रहेगी? इस प्रकार अनेक जीवनी मैं पढ़ती रहती थी। और मैं कुछ खास पढ़ती नहीं थी। मेरा मुख्य उद्देश्य था सबकी जीवनी पढ़ें। जब भी लाइब्ररी जाऊं तो जीवन निकाली। अब मैं जानती हूँ कि मनुष्य कैसा है । उसके कितने तरीके हैं? और उसमें क्या-क्या दोष हैं? और जब मैं ये पढ़ने लगी और देखने लगी तब मैंने सोचा कि मैं जिस कार्य के लिए संसार में आयी हूँ वह मुश्किल न होगा। सामूहिक चेतना संसार में आनी चाहिए और लोगों की कुण्डलिनी सहज जागृत होनी चाहिए । ये कार्य मैं संसार में करके जाऊंगी। लेकिन बड़ा कठिन काम था। अब इतनी मेहनत करने के बाद, आप लोग इतने पार होने के बाद आज आपके सामने जब मैं बैठी हूँ, मुझे एक प्रश्न लगता है कि आप लोगों को ये कैसे समझाया जाय कि सहजयोग कितनी महत्वपूर्ण चीज़ है । ये आपके घर द्वार के सम्भालने की चीज़़ नहीं है या आपके बीवी-बच्चों को सम्भालने की चीज़ नहीं है क्योंकि ये सब अस्थाई है। आपके न जाने कितने बच्चे हो चुके, कितनी बीवियाँ हो चुकीं, क्या-क्या हो चुका और अब कितने राजनीतिक जीवन आपने बिताए? कितना क्या-क्या किया ? अब जो सबसे बड़ी चीज़ ये है कि इन सहजयोगियों को कैसे समझाया जाये कि ये बहुत ही महत्वपूर्ण चीज़ है। और संसार का कोई सा भी कार्य इससे ऊँचा नहीं है। बहुत से लोग कहते हैं सहजयोग बहुत बड़ी चीज़ है, बहुत से कहते हैं अब हम सहजयोग के बगैर रह नहीं सकते। कोई कहते हैं कि सहजयोग से हमको बड़ा लाभ हुआ। लेकिन अब ये कैसे समझाया जाए कि हमारे लिए तो सहजयोग ही सब कुछह और इसका कार्य करना ही हमारा जीवन है। हमें जो नया जन्म मिला है सिर्फ सहजयोग के कार्य में संलग्न रहना, हर समय सहजयोग के बारे में सोचना है। मैं हर समय सोचती रहती हूँ अब ये जो बच्चे आए हैं जो कि हमारे यहाँ पैदा हये हैं ये सब पार हुए आत्मा हैं, बहुत तेजस्वी बच्चे हैं। अब इन बच्चों को एक स्कूल में रखना चाहिए। अब जिन माँ-बाप के पास बच्चे हैं वे इसमें रुचि रखते हैं, बाकी नहीं। नहीं तो दूसरे ऐसे लोग हैं जिनके लिए हमने कहा कि चलो, हम ऐसा कुछ कार्य करें कि जहाँ पर हिन्दुस्तान के कला के

द्वार खुलें। हम विदेश के लोगों को बुलाए। मुझे कला से कोई मतलब नहीं है। वैसे देखा जाय तो कला तो मैं कैसे भी हो बना ही सकती हूँ और चला ही सकती हूँ। लेकिन इस कला के माध्यम से हम औरों को आकर्षित कर सकते हैं, इस देश में ला सकते हैं। उनको पार कर सकते हैं। उसको महत्वपूर्ण तरीके से करना है। जिनको कला के क्षेत्र में रुचि है वे लोग कहते हैं, ‘माँ, ये आप बड़ा अच्छा काम कर रही हैं!’ इसकी ओर देखने की दृष्टि न तो इतनी गहन है और न विशाल। आदमी जितना गहन होगा उतना विशाल होगा। सहजयोग व्यक्तिगत नहीं, समाज के लिए नहीं, सहजयोगी के लिए नहीं, यह तो संसार के लिए है। मैं मानती हूँ कि मेरा विचार बहुत बड़ा है। लोग कहेंगे कि, ‘माँ बहुत महत्वाकांक्षी हैं। ऐसा कैसे हो सकता है?’ हो सकता है। मैं जब छोटी थी तो मैंने अपनी माँ से कहा, ‘मैं तो ऐसा चाहती हूँ माँ दुनिया के हर आदमी का परमत्मा से एकाकार हो जाए, कम से कम कुछ तो हो जाए।’ तो मेरी माँ मुझसे कहती थी, ‘बेटी तू अगर एक से दूसरा भी बना ले तो मैं तुमको धन्य समझेंगी।’ और मेरे पति मुझसे शुरु में यही कहते थे, ‘तुम तो अवलिया हो, लेकिन तुम दूसरों को अपने जैसा बनाने का यत्न न करो। ये बड़े पत्थर लोग हैं। कोई नहीं बन सकता।’ तो पहली तो हमारी स्थिति आ गयी। पहली स्थिति में हम ठीक हैं। इस स्थिति में हम पहुँच गए कि हम सहजयोगी हैं। ये हमें विश्वास हो गया और माँ आदिशक्ति है ये भी विश्वास हो गया। इसमें कोई शंका नहीं। परन्तु इस पर दूसरी शक्ति आनी है कि सहजयोग आज एक महायोग है, और सबसे महत्व का काम है। आप देखते हैं कोई आदमी भागा जा रहा है, भागा जा रहा है, ‘भई क्या?’ ‘मैं एक बड़ा भारी प्रोजेक्ट बना रहा हूँ।’ खास कर सरकारी नौकरों को तन्ख्वाह उतनी ही मिलती है चाहे प्रोजेक्ट बनाओ, नहीं बनाओ। गधे हो चाहे घोड़े हो, एक ही तनख्वाह मिलने वाली है। उनका कुछ बढ़ता नहीं। तो वो भी जुटे रहते हैं। ‘भाई क्यों ? काहे मरे जा रहे हो ? तुमको क्या मिलेगा?’ ‘नहीं, नहीं, ये मेरा कर्तव्य है।’ ‘तनख्वाह तो तुमको इतनी ही मिलने वाली है।’ ‘पैसे के लिए थोड़े कर रहा हूँ। मैं तो तनख्वाह के लिए नहीं कर रहा हूँ। ‘तो काहे के लिए कर रहे हो?’ ‘मैं तो कर्तव्य के लिए कर रहा हूँ।’ इस कर्तव्य को कितने महत्व से करना चाहिए? हम हर आदमी एक महान गुरुस्वरूप हो गए, ये भी आप नहीं जानते। आप करके देख लीजिए, आप अपनी शक्ति को इस्तेमाल करके देख लीजिए कि आप हैं कि नहीं हैं। इसमें कोई अहंकार की बात नहीं, आप हैं सो हैं । इसमें काहे का अहंकार। आप हो ही गए हैं बड़े, आप हैं ही ऊँचे । लेकिन इतने ऊँचे होकर भी आप जिन चीज़़ों को महत्व देना चाहिए उनको नहीं देते हैं। अब जो भी कार्य करें इस दृष्टि से करें कि इसका सहजयोग में फायदा हो, सहजयोग के लिए ही कर रहे हैं। और हमें कुछ करने का नहीं। अब ये समझाना बड़ा कठिन है। कुण्डलिनी जागृति आसान है। उसका बिठाना ठीक है। राक्षसों को मारना ठीक है। भूतों को भगाना ठीक है। वो तो हमारे काम ही हुए। लेकिन जो साधु सन्त हो गए, जो स्वयं ही प्रकाशमान हो गए, उनसे ये बताया जाए कि | तुम्हारा प्रकाश बहुत महत्वपूर्ण है और वो उनके सर में टिक जाय। यह कैसे किया जाय? आज कल मेरा मनन इन सब बातों पर हो रहा है कि इन सहजयोगियों में ये बात भर जाय कि इससे महत्वपूर्ण दुनिया की दूसरी कोई चीज़ नहीं। जितना करना था कर लिया मैंने। कोई साहब है कि मेरी बीवी नहीं मानती। कितनी उम्र है आपकी ? सिर्फ साठ साल की है। जिन्दगी भर उस बीवी की गुलामी की और अब भी करते रहो। अन्त में तुम्हारा क्या हाल होगा? अगले जन्म में तुम उसकी बीवी बनोगे कि क्या होगा? ऐसा ही लगता है। क्योंकि गुलामी तुमने की तो उसके फलस्वरूप तुमको भी तो कुछ मिलना चाहिए। आप समझ नहीं रहे हैं। इस तरह अपना समय बर्बाद करने से आप परमात्मा की शान में कुछ नहीं कर रहे हैं। सभी काम इतनी सुन्दरता से होते हैं। इसके साथ में ऐसे बन जाते हैं कि आश्चर्य की बात। लेकिन सहजयोग में ध्यान धारणा लोग इसलिये करते हैं कि मेरे भूत भाग जाये, अधिकतर। सहजयोग में लोग पैसा थोड़ा बहुत देते हैं कि मेरे पास धन आ जाय । या तो उसके आगे लोग सोचते हैं कि सहजयोग में आने से मुझे कोई पद मिल जाएगा। सहजयोग में आने से आप आकाश, पाताल और पृथ्वी तीनों लोक के राजा हो जाते हैं। अब इसके आगे क्या होने का? आप पूछियेगा, अब तो हो गया पूरा, अब आगे क्या होना? इसके आगे तुम्हें दाता होना चाहिए। जो राजा है तो उसको राजा बनाकर बिठा दिया तो वो देख रहा है कितने उच्चासन पर मैं बैठा हूँ। वाह! वाह! कितनी बढ़िया चीजें रखी है माँ की कृपा से! बड़ा अच्छा सब बना हुआ है। भाई , तुम राजा हो, देने की बात करो। और राजा हो तो थोड़े बहुत भिखारी अभी हो ही। लेकिन समझ लो , थोड़े हो तो कोई हर्ज नहीं, लेकिन देने की बात करो। मेरा मतलब पैसे से कभी भी नहीं होता, आप जानते हैं। अपना पूरा चित्त सहजयोग में देना चाहिए। पूरी तरह से सहजयोग को समझना चाहिए। (यहाँ से मराठी भाषण का अनुवाद) हिन्दी जरा पॉश भाषा है। …..मैं हंस कर टाल रही हूैँ, लेकिन आज का विषय गम्भीर है। अब जरा मराठी में बता रही हूँ कि

रामदास स्वामी अपने यहाँ हुए, ज्ञानेश्वर हो गये। नाम लेते ही चैतन्य लहरियाँ शुरु होती हैं। केवल नाम से ही सारी सप्तशती कहने जैसे एक नाम में ही सब कुछ है। ये किससे ? सारे चक्र एकदम उत्तेजित होते हैं। किसलिये ? साईनाथ का केवल नाम लेने से ही मेरा सारा शरीर डोलने लगता है। किस कारण ? क्योंकि वे थे ही बहत बड़े! आप भी हो सकते हैं। आपको वह बनना है इस तरह की कुछ महत्वाकांक्षा रखिये। नहीं तो अब हो गया, हम आ गये, हमारा सब कुछ ठीक-ठाक है। ये जो सहजयोगी की स्थिति है इसे बदलना है, ये मेरा विचार है। बीवी-बच्चों की बहुत सेवा की। ये हुआ, वह हुआ, बहू की चार बातें सुन लीं। अब आगे का हमें किस तरह से प्राप्त होगा ये देखना चाहिए। अब भी हमारा दिमाग कहाँ जा रहा है ? किस तरफ बहे जा रहे हैं? क्या स्थिति है? हर मनुष्य को अपने आपसे प्रश्न पूछना है, ‘मैंने क्या किया सहजयोग के लिये?’ ये प्रश्न किसी और का नहीं, क्योंकि अब मैं बोल रही हूँ। तो कहेंगे, ‘श्री माताजी उनके बारे में कह रही हैं, मेरे बारे में नहीं कह रही हैं। वे तो मेरे बारे में कुछ नहीं कहतीं । हमेशा औरों के बारे में कहती हैं। मैं तो बहुत ही अच्छा हूँ।’ लेकिन ये सब मैं हर एक को कह रही हूँ। सबको देखना है इस साल हम माँ को कुछ करके दिखायेंगे। अब मैं लन्दन जा रही हूँ। मुझे पुरण पोली बनाकर खिला दी तब हो गया काम, ऐसा औरतें समझती हैं। श्रीमाताजी को हमने पुरण पोली बनाकर खिलाई, नहीं तो श्रीखंड ज़्यादा से ज़्यादा। मुझे क्या करना है पुरण पोली और श्रीखंड से और क्या करनी है साड़ी? मेरा सब कुछ विश्व है। उसकी जो महत्वपूर्ण चीज़ है उसका कुछ कीजिए । पिछला जो हुआ बस हुआ। जो कुछ देवी की स्तुति हुई वो सब आपने कर ली। हमने स्वीकार कर लिया, करना ही पड़ता है, क्या करें? जो भुगतना है वह भुगतना ही पड़ता है। अब देवी होकर आये हैं। तो वह सब ताम-झाम चाहिए ही और वे सब हम करते ही हैं। परन्तु इतना सब करके भी आप कहाँ जा रहे हैं? केवल पंडितजी बनकर बैठोगे क्या? हमको भी कुछ सहजयोग में करके दिखाना है, हर एक को। हर एक लड़की को, हर एक माँ को, हर पिता को और हर एक लड़के को, सभी को। | | तुम्हारी कोई चार सहेलियाँ हैं। उन्हीं को हल्दी -कुंकुम के कार्यक्रम में बुलाकर सहजयोग बताओ । कितनी बार कहा है । हल्दी – कुंकुम का समारोह करो और औरतों को बुलाओ| उन्हें सहजयोग के बारे में बताओ, श्रीमाताजी के बारे में बताओ । सहजयोग इस तरह से फैलाना चाहिए। नये तरीकों से फैलाना चाहिए। गहन होने के लिये आप लोगों को ध्यान- धारणा करना जरुरी है। कुछ लोगों ने किया है, थोड़ा-बहुत। परन्तु इसका कोई अन्त है क्या? मैंने अगर कहा कि, अब मैंने बहुत कर लिया, अब बस हो गया, बहुत हो गया, अब कल से मेरा मुँह नहीं देखना। मान्य है आपको? है मान्य? इतनी उम्र हो गई है फिर भी किसी को नहीं लगता कि मेरी उम्र हुई है। अभी मेरे सारे प्रोग्राम लिखकर आये हैं। अब वहाँ जाने के बात मुझे शटलकॉक गेंद की तरह वे इधर-उधर घुमायेंगे। अब हमें | क्या करना है? मैंने किया वह बहुत कुछ है। आज मेरा जन्मदिन है। लेकिन अब साठ साल के बाद जो जन्म दिन आता है वह ढलती दिशा का होता है। ध्यान देना है कि ये समय आपातकाल का है। और माँ को कुछ करके दिखाना है। अब प्रधान साहब चल बसे तो मुझे लगा कितना बड़ा मेरा नुकसान हो गया। सारे प्रधान कितने काम के आदमी थे। उन्होंने क्या मेहनत की उस उम्र तक! इतना ही नहीं, सारे जजों को मेरे बारे में बताया, वकीलों को बताया। उन्हें ले आये मेरे पास। वह तो किया ही। मेरे अमेरिका जाने पर मेरे लिये अपना खर्चा करके आते थे । एक बार मैं अपना खर्चा करके उन्हें ले गई थी। फिर वे हमेशा अपने पैसे खर्च करके मेरे पास आते थे। उनका इतना प्यार था। कोई भी सरकारी काम हो, कानूनी काम हो, मुझे आकर बताते थे, ‘देखिये , श्रीमाताजी, मैंने ये काम लिया है। यहाँ इसमें खोट है।’ फिर मैं उन्हें कहती थी, ‘इसे इस तरह से आप कीजिए ।’ तो वे हमेशा कहते थे, ‘श्रीमाताजी, आप से बड़ा वकील मैंने नहीं देखा है।’ कोई भी उन्हें काम दो। लड़कियों की शादी करनी है, आर्य समाज में जाकर पता निकालकर लायेंगे। हॉल बुक करो, कर लिया। पत्नी का उन्हें कुछ सहाय्य था, पर वह जरा कमजोर औरत है। जब वे चल बसे उससे पहले मैंने तीन बार यत्न किया, मैं उनके यहाँ जाऊं, पर न जा सकी। तभी मैंने सोचा अब यम की कोई इच्छा नहीं है, मैं जाऊं। इसलिये मेरा वहाँ जाना नहीं हुआ। पर वह मनुष्य कितने काम के थे । बार-बार मुझे उनकी याद आती है। बीच में ही कहती हैँ, प्रधान से पूछ लीजिए सब ठीक है कि नहीं। बिल्कुल अपने पास का कुछ खो गया है, इस तरह लगता है। एकदम सूज्ञ और विवेकी मनुष्य थे। उनका लड़का कैसा है, उसमें कभी उनका चित्त नहीं। सुज्ञ व्यक्ति कभी ज़्यादा बड़बड़ नहीं करते। कभी भी गरम शब्द नहीं उनके मुँह में , कभी भी गरमी से उस मनुष्य ने बात नहीं की। ‘अजातशत्रु’ । एक भी मनुष्य प्रधान जी का दुश्मन नहीं होगा, अजातशत्रु। गरम शब्द कभी बोलते ही नहीं थे। कभी भी बड़प्पन नहीं दिखाते थे । अत्यंत गुणवान मनुष्य थे। कभी भी उन्होंने पैसों की गड़बड़ नहीं की। किसी चीज़ में कोई गलती नहीं। उनसे छोटी उम्र वाले लोग उन्हें जवाब देते थे। मुझे बताते थे। उनकी आँख में आँसू आ जाते थे। फिर मुझे भी रोना आता था। उनसे कहा, ‘प्रधान जी, सह लीजिए, क्या करें? सहजयोगी ही हैं। उन लोगों से कुछ कहेंगे तो उन्हें लगेगा श्रीमाताजी आपका पक्षपात करती हैं।’ हमने उनके |

लिए कुछ भी नहीं किया। कुछ करने लगते तो उनके बच्चे कहते, ‘हमारे पास पैसे हैं, आप मत कुछ कीजिए।’ पर अब उनकी तरह के लोग कहाँ से आएंगे ? कुछ भी काम हो, प्रधान को फोन करें, सबकी सूची बनी रहेगी। कोई आया गया, सबकी चिन्ता रखते थे। हवाई अड्डे आते तो सबका ख्याल रखते। कौन-कौन आया? कहाँ गया? कहाँ बैठा? सब कुछ। और कुछ भी दिखावा नहीं, मैं कर रहा हूँ, मैं कुछ हूँ। अब ऐसे परिपक्व लोग दुनिया से जाएंगे और आप अगर वैसे परिपक्व नहीं बनोगे तो ये बीच का रिक्त स्थान कैसे भरेगा? अजातशत्रु थे वे। कभी भी किसी को उन्होंने डाँटा नहीं। कभी भी उन्होंने किसी के विरोध में मुझे नहीं कहा। केवल किसी ने यदि उनका अपमान किया तो बताते थे, इसने मेरा बहुत अपमान किया है। आज बड़ा खुशी का दिन है, मेरा जन्म दिन है। पर आज मुझे उनकी बहुत याद आ रही है। हमसे जो कुछ होगा वह हम उनके लिए करेंगे । | परन्तु आज आप निश्चय करिये कि जिस तरह प्रधानजी ने श्रीमाताजी की मदद की उस तरह हम भी करेंगे। कभी पत्नी का रोना नहीं, बेटे का नहीं, कभी भी नहीं। उनकी पत्नी ऐसी पकड़ वाली थी, परन्तु उन्हें कभी भी पकड़ नहीं आयी, मुझे बड़ा आश्चर्य होता था। उनका कोई सा भी चक्र कभी भी नहीं पकड़ता था। आपको आश्चर्य होगा, कभी आज्ञा भी उनका नहीं पकड़ता था। कोई भी चक्र नहीं पकड़ता था, आश्चर्य की बात है। अपने यहाँ जिसकी पत्नी पकड़ वाली हो उसका पति उससे भी ज़्यादा पकड़ा हुआ रहता है। ऐसे लोग हुए हैं। और लोगों ने अपमान किया तो भी उनका कभी भी मेरे साथ वाद-विवाद नहीं। उन्होंने मेरा अपमान किया, कभी नहीं। उलटा ‘मेरा अपमान किया, जाने दो,’ उतना ही। हमारे यहाँ बहुत से लोग सहजयोग में आते हैं। और क्षेम भी बहुतों को मिला है। जिन्हें नौकरियाँ नहीं थीं उन्हें अच्छी-अच्छी नौकरियाँ मिल गई, पैसा बना, किसी का व्यापार अच्छा हुआ, बहुत कुछ बन गया। परन्तु प्रधान जी का ऐसा कुछ नहीं हुआ। उनके सारे बच्चों की अच्छी नौकरियाँ थी। और पैसों की उन्हें चिन्ता नहीं थी, उम्र के हिसाब से भी कहिये। लेकिन पहले से थोड़ी अच्छी स्थिति थी। परन्तु वह कभी भूले नहीं। ‘श्रीमाताजी, कुछ चाहिये तो कहिये। कुछ कहना है तो कहिये।’ अगर मैंने कहा, ‘प्रधान जी, पाँच बजे आइये।’ तो मैं कही भी रहूँगी तो भी वे वहाँ पहुँचते थे। इतने वृद्ध गृहस्थ, पर समय से पहुँचते थे । मेरी लड़की का मकान इतनी दूर था। वहाँ भी बिल्कुल समय से पहुँचते थे। कहीं भी बुलाओ, एकदम समय से ! कभी भी उन्होंने मोटर की माँग नहीं की, गाड़ी की माँग नहीं की। ‘मेरे घर खाना खाने आइये’, ये भी आग्रह नहीं किया। केवल एक – दो बार कहा होगा। तो मैंने कहा, जी, वैसा कुछ मत कहिये।’ तो कहते, ‘अच्छा श्रीमाताजी, नहीं कहूँगा।’ मेरे लड़के को देखिये, बहू को देखिये , उसके ससुर को देखिये, ऐसा कुछ नहीं। कभी पैसों का रोना-धोना नहीं। अमेरिका आये तो मैंने पूछा, ‘प्रधानजी, आपको कुछ पैसा चाहिये?’ ‘नहीं श्रीमाताजी, मेरे पास बहुत है। मेरे बेटे कमाते हैं।’ जरा सा उनके लिये कुछ किया तो कितना उन्हें याद रहता था। | | ‘प्रधान एक बार लंदन आये थे, तो मैं उन्हें पैरिस ले गई। वहाँ पर खर्चा मैंने किया । तो सौ बार कहते थे , ‘माताजी, आपके कारण सबकुछ हुआ। मैंने कहा, ‘पैरिस ले गयी तो ऐसा क्या हुआ?’ अब ऐसे सुज्ञ लोग कहाँ हैं? हर समय मेरे सामने आते ही, ‘मेरे बेटे का ऐसा करिये, बेटी का फलाना करिये।’ मुझे बोरियत हो गयी है इन बातों से। आपको पता नहीं कैसे नहीं होती ? परन्तु सभी लोग इस तरह नहीं हैं। बहुत से लोग अत्यन्त अच्छा कार्य करने वाले है। और हर एक को ऐसा कहना चाहिये, माँ हमें सहजयोग के लिए क्या करना है? इतना ही कहिये आप। जो कहिये वह करने के लिए हम तैयार हैं। अब एक प्रधान जी चले गये तो सौ आदमी उनकी जगह तैयार होने चाहिये। तो आप सहजयोगी हैं। एक रक्तबीज का एक सिपाही मरा, तो उसके खून की एक बूद एक राक्षस, इस से | हिसाब से राक्षस बने। अब इन सहजयोगियों का क्या होने वाला है? सौ आदमी खड़े होने चाहिये। और जो काम करते हैं वे गरम लोग हैं। गरम नहीं तो अखडू लोग हैं। अखडू नहीं, तो कुछ कामचोर है। अब बिल्कुल ध्यान में रखना है कि हम श्री माताजी के हाथ के ऐसे कुछ साधन बनेंगे, ऐसे सूत्र बनेंगे कि माताजी को लगेगा कि हम ये सारा विश्व जीत लेंगे । आपको आश्चर्य होगा, अभी हम पठानकोट गये थे, वहाँ से धर्मशाला। कुछ भी नहीं पढ़े हुए, एकदम अनपढ़ लोग, गाँव के लोग। उन्हें कहा गया, ‘देवी आने वाली है।’ मेरा चेहरा देखा, पहचान गये, ‘हम तो देवी जागरण के लिये आएंगे।’ ढाई हजार लोग | प्रोग्राम में आए और तुरन्त पार हो गये। कितनी उन्हें देवी की श्रद्धा। सारी शक्तियाँ उनमें बहने लगीं। हमें तो देवी जागरण करना था। क्या उनके वे तेजस्वी चेहरे और क्या! सब कुछ देखने लायक था! मुझे लगा अब मैं अपने घर में आ गई हूँ। बिल्कुल नन्दनवन देवी का वर्णन! वह स्वत: मणीपुर (चक्र) रहती हैं। ऐसे लगा हम अपने घर आये हैं। सब लोग नये -नये कपड़े पहन कर आये थे। यहाँ तो पूजा में फटे कपड़े पहन कर आते हैं। कहीं बैठकर साड़ी गन्दी हो गई तो! (आज मेरी भी साड़ी फटी है।) जैसे अनिच्छा से सब कुछ

करते हों। उन लोगों का वर्णन नहीं कर सकते, इतना उनमें उल्लास था। इतना सब वातावरण आल्हाददायी था, मैं आपसे कह नहीं सकती। मुझे लगा यहाँ से कहीं जायें ही नहीं । वे कहते थे ‘शेरांवाली’, ‘पहाड़ों वाली’। मुझे लगता ही नहीं था कि मेरी उम्र हो गईहै। में वहाँ ऊपर चढ़ती थी, कहीं से भी उतरती थी, कुछ नहीं लगता था। क्या वे लोग! और क्या वहाँ का सारा वातावरण! मेरे दिमाग में घूम रहा है कि उन्हें ही अपने साथ में लेना चाहिए! यहाँ पर महाराष्ट्र वर्गैरा में ताला लगा दें और वहीं चले जायें, वही अच्छा होगा। और फिर उन्हें यहाँ पर लाना चाहिए। आप लोग नौकरियाँ सम्भालते रहिये। इतने सीधे-सरल, पहुँचे हुए वे लोग हैं। सारा आनन्द ही आनन्द, बहुत मज़ा आया, उन लोगों को भी और हमें भी। उन्हें कुछ बताना भी नहीं पड़ा। बीस-बीस मीलों से लोग पैदल आये थे। ‘यहाँ हम नहीं आ सके माताजी, क्योंकि हमें टैक्सी नहीं मिली। वातानुकलित गाड़ी चाहिए तब हम आएंगे । नहीं तो कैसे आयें? बीस-बीस मीलों से लोग छोटे-छोटे बच्चे लेकर के आये थे सवेरे से निकले होंगे। प्रोग्राम दस बजे था। बस देखने लायक था! स्वर्ग जमीन पर उतरा था। वहाँ पर कोई इतनी अच्छी व्यवस्था नहीं थी। खुला आंगन। उसके पीछे एक बड़ा पहाड़ था । इतनी चैतन्य लहरियाँ थी कि मुझे ठण्ड लगने लगी। इतनी जोरों से चैतन्य की लहरें आ रही थीं। पीछे एक पहाड़ जैसा था। उससे टकरा कर आ रही थीं। सबको ठण्ड लगने लगी। धूप में बैठे थे, तब भी ठण्ड लग रही थी। एक पत्ता भी नहीं हिल रहा था। लग रहा था हम ‘आदिशक्ति’ हैं। यहाँ पर मुझे शक हो जाता है कि हूँ या नहीं? वहाँ सचमुच लगा कि हम आदिशक्ति हैं। वहाँ भयंकर बारिश हो रही थी। तीन दिन से सतत बारिश हो रही थी। बाहर निकलने की मुश्किल थी। बिजली कड़क रही थी। ऐसे में वहाँ के एक व्यक्ति ने मुझे कहा, ‘माँ, ऐसी कृपा करें जो बादल छट जाय और सारा वातावरण शुद्ध हो जाय, तो बहुत जनता आयेगी।’ मैंने कहा, ‘हाँ वह सब मैं कर दूँगी।’ फिर एकदम निरभ्र आकाश था उस दिन, बिल्कुल निरभ्र। उस दिन वहाँ मेरी पूजा हुई और मुझे कुछ नहीं हुआ। ये सब हो गया। यहाँ तो पूजा के बाद मुझे इतनी परेशानी होती है। पूजा के बाद लगता है अब क्या करूं। लेकिन वहाँ कुछ नहीं, सब साफ हो गया। उसके बाद ही सारा सफर किया। कुछ नहीं हुआ। और यहाँ पूजा के बाद मोटर तक जाने की हिम्मत नहीं रहती और कब घर जाकर आराम करूंगी, ऐसी हालत होती है। उसका कारण है कि आप शुद्ध भी हो गये हैं तब भी | | उस शुद्धता का क्या अर्थ है, उसका क्या महात्म्य है, उसका कितना प्रकाश हम संसार में दे सकते हैं, उसकी कल्पना आपको नहीं है। दिये बगैर आपमें बहेगा कैसे? हवा का बहाव कैसे होता है? एक तरफ से ही दरवाजा खोला तो दूसरी तरफ से कैसे आयेगा ? केवल अपने लिए एक नाला रख दिया और उसी में घूमते रहे तो उसकी गन्दगी फिर मेरी तरफ आती है। परन्तु कुछ देने के मन से आप बैठेंगे तो आज से निश्चय करिये, जो कुछ हमें माताजी ने दिया है वह सब हम बाँट देंगे। तब आपके पास आयेगा और मुझे तकलीफ नहीं होगी। पहले ही आपके प्याले में गन्दगी होगी तो मैं उससे क्या भरूं? यहाँ से भरने बैठी थी, वह तो उसमें जाता नहीं और मेरी ही तरफ फिर से आ जाता है। अब कहना है कि अब अपना प्याला खाली कर दीजिये और उस खाली प्याली में अमृत भर लीजिये। अमृत भर-भर के देना पड़ता है। इतना जम कर सब बैठा है, वह सब निकाल दीजिये। वे देवी के पिता हैं। अब वहाँ होकर आने के बाद लगता है न जाये दिल्ली और न जायें मुम्बई। और लन्दन तो उनसे भी गया बीता है। किसलिये परमात्मा ने बनाया है पता नहीं। परन्तु फिर से आप लोगों को देखने के बाद, माँ का हृदय! कैसे भी हो, तो क्या ? अपने ही तो हैं। मेरे ही हैं सब। माँ को क्या? कैसे भी हो, खून भी बेटे ने किया तो कहेगी, ‘तू अब मेरा भी एक खून कर दे।’ वैसे ही हैं सब। अब आपको इतना बड़ा किया, इतने पद पर बिठाया। अब मेरी भी उम्र हो गई है। तब इस उम्र के हिसाब से आपको भी समझ लेना चाहिए और कार्यान्वित होना चाहिए। कार्य करना चाहिए। चार लोग काम कर रहे हैं, दो इधर जा रहे हैं, दो उधर देख रहे हैं। पूरी तरह जुट जाना उसमें हम धर्मशाला गये थे । उसका नाम है धर्मशिला-धर्म की शिला। और हिमालय के पैरों तले। आपको पता है, है। ये हम माँ को करके दिखायेंगे। अब मराठी में ही कहती हूँ। मराठी भाषा अत्यन्त प्रेम की, सौष्ठवपूर्ण व सुन्दर भाषा है। परन्तु की जितनी कठोरता है वही हम सीखे हैं। अत्यन्त सुन्दर भाषा है। परमात्मा की भाषा है कहना चाहिए। संस्कृत के इतनी निकटतम, इतनी अच्छी, निव्व्याज! इसमें (मराठी में) आपको कुछ कहना है । हमें तो उससे आपसे हमें कुछ भी लेना ही नहीं। है । बस बह रही है। अस्खलित, इतनी सुन्दर है। और उस भाषा में रहकर भी आपको अभी प्यार से बोलना नहीं आता। उस मराठी भाषा का दूसरा उपकार ये है कि पूरी कुण्डलिनी उस मराठी भाषा में लिखी है। नाथपंथ (मराठी ग्रंथ) के इतने उपकार हैं आप पर, बड़े-बड़े सन्त- साधुओं के, माने सिक्खों के दसवें गुरु वे भी यहाँ नांदेड में आकर शिवाजी महाराज से मिले थे । शिवाजी महाराज जैसा राजा हमारे यहाँ हो गया। पूरी दुनिया में ऐसा राजा नहीं मिलेगा। ऐसे हमारे शिवाजी, दूसरा नहीं मिलेगा ऐसा। इसका दु:ख होता है। तो एक नाले में दो कमल उग आये और वे कहने लगे, ‘हम कमल हैं, हम कमल हैं।’ उससे कुछ नहीं बनने वाला। हम कमल हो सकते हैं, यह ध्यान में रखकर कमल बनकर दिखाना है। मैं फिर से विनती करती हूँ क्योंकि अब में कल |

जा रही हूँ। अब तक जो कुछ हुआ वह बहुत हुआ। अब इसके आगे हर-एक को कमर कसकर तैयारी में जुट जाना है। इसके आगे है। युद्ध बहुत बड़ा युद्ध है। उसे लड़ना है। सारा समय खुद की सफ़ाई में मत लगाओ। मैं अब यहाँ बात कर रही हूँ, तब भी लोग यहाँ पर बन्धन दे रहे हैं। आपको कौन पकड़ेगा? बन्धन काहे को डाल रहे हो? जहाँ आप बैठोगे वहाँ बन्धन पड़ेंगे, इतनी आप में शक्ति है, जानते हैं? जहाँ नजर जाएगी वहाँ बन्धन पड़ेंगे। किसलिये अपने आपको बन्धन दिये जा रहे हो ? डरे-डरे से क्यों हैं? तलवार नहीं है ऐसी बात नहीं है। सब कुछ है। आपके पास केवल इच्छा चाहिए। अब डरपोक स्वभाव नहीं रहना चाहिए, विशेषत: औरतें। और पुरुषों की ज्यो ज्यादती है वह खत्म होनी चाहिए । सहजयोग का एक प्रतिष्ठावान व्यक्ति बनकर मैं आचरण करूंगा, ऐसा एक निश्चय मन में रख कर अब चलना है। अगली बार जब मैं आऊंगी तब मुझे दिखना चाहिए कि एक-एक मनुष्य ने हजार-हजार लोग खड़े किये हैं। आपको मैं विश्वास दिलाती हूँ, आप भाषण दे सकते हैं। सहजयोग सारा आप सीखे हैं। आपको सब कुछ मालूम है। ये सारा केवल दिमाग में रखकर शमशान में भस्म होने के लिये नहीं है। उसका प्रकाश सब तरफ जाना चाहिए, उसके लिये ही आपके मस्तिष्क में हमने प्रकाश डाला है। कल जैसे सब के सर शमशान में फुकते हैं वैसे आपके नहीं हैं। उसका प्रकाश जब सारी दुनियाँ में फैलेगा तब आपको मालूम होगा। सहजयोग के योगी को कभी भी जलाते नहीं हैं। प्रधान जी को आपने जला दिया, ये मुझे अच्छा नहीं लगा। परन्तु मैं कुछ नहीं बोली। उनकी हमको समाधी बनवानी चाहिए थी। अभी तक उसकी कुछ व्यवस्था नहीं हुई है। वह व्यवस्था करनी चाहिए। परन्तु सहजयोगी उस प्रकार का होना चाहिए। उसकी समाधि से चैतन्य लहरियाँ आयेंगी। उस पर कितनी भी चद्दरें चढ़ाने के बाद भी उन फूलों की सुगन्ध आएगी। इस तरह आपकी स्थिति है। परन्तु कैसे कहा जाय ? हीरे को कहना, ‘तू हीरा है, गन्दगी में मत लेटो।’ श्रीमाताजी महान हैं, पर आप भी कुछ कम नहीं। ये याद रखना है। परन्तु उसकी केवल अहंकारी वृत्ति रखने से कोई अर्थ नहीं है। सचमुच अगर माताजी में इतनी शक्ति है, तो हममें भी है । सब कुछ शक्तियाँ आपके पास हैं। उस छोटे से अंडे में आप छिपे हो, निकलो बाहर। तो उससे बाहर निकल कर आकाश की तरफ आपको समष्टि डालनी है तब ही कुछ होगा। अब कल जा रही हूँ। परन्तु मेरा ध्यान इधर रहता है। मुंबई वालों पर सबसे ज़्यादा जिम्मेदारी है क्योंकि मैंने मुंबई में सबसे ज़्यादा काम किया है और मेहनत की है। और ससी मुंबई में महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती का उद्भव हुआ है। तो आपको ये दिखाना है, आराम चोड़कर औ राजकारण छोड़कर सुज्ञ बनकर हम सहजयोग में क्या कर सकते हैं। ये सभी को दिखाना है। और मुझे आशा है ये सब आप गुलामी छोड़ दीजिए । मैं इस बार मुजे एक अनुभव आया। उससे मुझे आश्चर्य हुआ। जिन लोगों पर मैंने इतनी मेहनत की है वे लोग एकदम बेकार के निकले। क्यों इतनी मेहनत करें ऐसे लोगों पर? बेकार लोग हैं एकदम! तो आज मेरा जन्म दिन मना रहे हैं। आज मेरा पूजन है। तो आज मेरा पूजन कृपया हृदय से कीजिये। यह मैं इस उम्र में माँग रही हूँ। इतना मुझे दीजिये। हृदय में एक ही बात कहना है, श्रीमाताजी हम वीरों की माता हैं, भगेड़ओं की नहीं। गांधीजी ने केवल स्वतन्त्रता की लड़ाई लड़ी तो हमारे पिता जी जैसे लोग सारा घर द्वार छोड़कर जंगल- जंगल घूमे हम राजमहलों में पले लोग! कितना सहन किया! आपको तो आश्चर्य होगा। हमारे पढ़ाई के लिये पैसे नहीं थे, कुछ भी नहीं । घर के जेवरात बेचकर हमारी माँ ने हमें पढ़ाया। ऐसी स्थिति में हम रहे। औ ये सहजयोग उससे कितना बड़ा है। सारे विश्व की स्वतन्त्रता की ये बात है। और उस हिसाब से हम कर क्या रहे हैं? राजकारण अभी तक मैने इतना कुछ नहीं कहा था, परन्तु आज कह रहो हूँ। क्योंकि अब उम्र होने लगी है। तो दिमाग में रखिये , हमें कुछ करके दिखाना है, हमारे होते हुए करके दिखाना है। बाद में किया तो नहीं होने वाला। दूसरा ये है कि इस साल ‘क्रोधन’ नाम का संवत्सर है । इसलिये थोड़े से क्रोध को काम में लाना पड़ रहा है । शालीवाहन ने ही लिखा है कि इस समय जो साल है वह क्रोध में जाएगा। कहने का तात्पर्य है कि आज मैंने लम्बा-चौड़ा भाषण किया, सहजयोगियों को समजाने के लिये। आप क्या हो, ये जान लीजिये। वह जानकर हमने क्या करना है, ये भी देखिये । हम अपने गाँव गये थे, वहाँ क्या किया? बैठे थे क्या आप? नहीं। मन्दिर में गये, खरीददारी की, सबसे गाढ़ भेंट की, फिर आ गये वापस।| अच्छा, आप कौन हो? आप क्या बैलगाड़ी हैं, किसी भी गाँव में जाकर वहाँ से खरीददारी करके चीज़ें लाने के लिये? जाकर बोजा भर कर लाते हैं। आप साधु-सन्त हैं। अपने देश में ऐसे सन्त और सन्तणी हो गये। नामदेव की बात लीजिए, एक दर्जी थे। कितना बड़ा काम किया उन्होंने। तुकाराम क्या थे? चोखा मेला कौन थे ? सजन कसाई कौन थे ? कितना काम किया उन्होंने? उनका कोई भी साथ देने वाला नहीं था। जनाबाई कौन थी? मैनाबाई कौन थी ? कितना काम किया उन्होंने परमात्मा का ? ज्ञानेश्वर इतनी छोटी उम्र में कितना काम कर गये? आपने क्या काम किया ? उनको कुण्हलिनी जागृति तो नहीं आती थी, नहीं तो वह भी उन्होंने किया होता। वह भी आपको हमने दिया है। गणपति के स्थान पर आपको बिठाया है। अब कुछ करके दिखाइये । आपको दिखाना ही है । अगली बार मैं आकर देखूँगी किसने क्या किया है? औरतों ने हल्दी-कुंकुम करना और औरतों को अपने घर बुलाना। सबको ठीक से, तौर |

तरीके से रहना है। अब भी ऐसे सहजयोगी हैं जो व्रत रखते हैं। कहां भी व्रत नहीं रखना है, तत्व भी रखते हैं। पता नहीं क्यों रखते हैं। जो मर्यादायें हमने बनाई हैं और जो विश्वधर्म की मर्यादायें हैं उसमें रहना ही पड़ेगा । और उन मर्यादाओं में आप नहीं रहे और उनसे बाहर गए तो आप पर आपत्ति आएगी। आपके साथ कुछ तो गुजरेगी। कल ही एक सज्जन मिले थे । कह रहे थे मैं बिल्कुल ठीक हो गया था, पर फिर से तकलीफ शुरू हो गई है। क्या किया आपने? फिर से उसी मार्ग पर गये थे क्या? हाँ, थोड़े से, ज़्यादा नहीं। अच्छा! तो वहाँ भूत बगल में ही बैठे हैं, आपको पकड़ कर काने के लिये| तो विश्वधर्म की मर्यादाओं में रहना पड़ेगा। शादी में दहेज लिया तो ज़्यादा नहीं थोड़ा सा बस हो गया। उस मर्यादा में ही रहना है। विश्वधर्म की मर्यादा परमात्मा की मर्यादा है। उसे नहीं लाँघना है। अब आप मराठी, गुजराती कुछ नहीं रहे, आप हिन्दू, अंग्रेज कुछ नहीं हैं। आप विश्वव्यापी निर्मला धर्म के अनुयायी बहुत बड़े हो गये हैं।