Public Program

पुणे (भारत)

1990-12-05 Public Program, Pune, India (Hindi), 81'
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1990-12-05 Music At Public Program, Pune, India (Hindi), 80'
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Sarvajanik Karyakram Date 5th December 1990 : Place Pune Public Program Type Speech Language Hindi

सत्य को खोजने वाले आप साधकों को हमारा प्रणाम ! सत्य के विषय में हमें जान लेना चाहिए कि सत्य जो है वह अपनी जगह है। उसे हम बदल नहीं सकते, उसकी हम धारणा नहीं कर सकते , उसकी हम व्यवस्था नहीं कर सकते। सबसे दुःख की बात यह है कि मानव चेतना से हम उस सत्य को जान नहीं सकते। इसलिए हम देखते हैं कि संसार में भेद -अभेद है। इसलिए लोग अन्धेपन से आपस में लड़-झगड़ रहे हैं । अनेक तरह की नयी- नयी गतिविधियाँ उत्पन्न हो रही हैं और नये-नये विचार भी, नयी-नयी प्रणालियां तथा नये-नये प्रश्न आज हमारे सामने खड़े हैं। यह हमारे भारतवासियों का ही प्रश्न नहीं यह सारी दुनिया का प्रश्न है। सारी दुनिया में एक प्रकार की आशंका मनुष्य के मस्तिष्क में घूम रही है वह आशंका यह है, कि हम कहाँ जा रहे हैं? हमें क्या पाना है? आज जब ये सारी बातें मैं आपसे करुंगी, तो मेरी प्रार्थना है, कि आप वैज्ञानिक ढंग से अपना दिमाग (मस्तिष्क) खुला रखें। बंद मस्तिष्क का व्यक्ति वैज्ञानिक हो ही नहीं सकता। जो कुछ भी बात हम बदा रहे हैं इसे परिकल्पना (हाइपोथीसिज़) समझ कर आप सुनिए। यदि यह सिद्ध हो जाए तो फिर ईमानदारी के साथ इसे मानना चाहिए। जो लोग भारतवर्ष में रहते हैं वे सोचते हैं हमारे देश में बहुत बुरी हालत है क्योंकि वे अभी बाहर नहीं गये। उन्होंने दुनिया देखी नहीं इसलिए यहाँ की आफतें उन्हें ऐसी लगती हैं कि खत्म ही नहीं होंगी । लेकिन प्रगल्भ देश, जिन्होंने विज्ञान में बहुत प्रगति कर ली है , उन देशों में जाइए तो आपको आश्चर्य होगा कि वहाँ किस तरह के प्रश्न खड़े हैं और वो किस आशंका से भयभीत है। अमेरिका, जिसको हम बहुत प्रगल्भ देश समझते हैं, उस देश में ६५ प्रतिशत लोग मानसिक नव्वसनेस से परेशान हैं। आपको बहुत ही कम अमेरिकन ऐसे मिलेंगे जो बात करते समय आँखे न मिचकाएं या नाक ना सिकोड़ें। बहुत मुश्किल है और वहाँ पर | ३० प्रतिशत लोगों को ऐसी बीमारियाँ हो गई हैं कि उसका कोई इलाज नहीं है और कम से कम ४५ प्रतिशत लोग किसी न किसी मादक पदार्थ के सेवन से त्रस्त हैं। उनकी जो समस्याएं हैं आप उन्हें तभी समझ सकते हैं जब उन त्रस्त लोगों से आप मिलें और बातचीत करें । भौतिक दृष्टि और विज्ञान की दृष्टि से भी इन देशों ने बहुत प्रगति की है और जो सबसे प्रगतिशील तीन देश है स्वीडन, स्विटज़रलैण्ड और नॉर्वे। इन देशों के लोगों में आपस में मुकाबला हो रहा है कि कौन सबसे ज़्यादा आत्महत्या करेगा। तो ये लोग जिन्होंने इतनी भौतिक उन्नति कर ली है क्यों ये आत्महत्या कर रहे हैं और क्यों इतने दुःखी हैं? क्या बात है? सोचना चाहिए। हमारे यहाँ तो बहुत ही कम लोग आत्महत्या करते हैं, नहीं के बराबर। इसकी वजह क्या है? दूसरे कभी आप अमेरिका चले जाएं तो आप कभी जेवर पहन कर नहीं जा सकते| रास्ते में कोई भी आपसे जेवर छीन लेगा, पैसे छीन लेगा और देखते ही देखते आप लोगों को मार डालेगा । मैं लॉस एन्जलिस में थी और डा.वरलिकर के साथ मोटर में चल रही थी। उन्होंने मुझसे कहा, ‘माँ, आप बिल्कुल दरवाजा बन्द कर लें, गर्दन झुका लें।’ मैंने कहा, ‘क्यों ? क्या बात है?’ कहने लगे कि इस रास्ते पर पिछले हफ्ते ग्यारह

आदमी मारे गये। मैंने कहा ‘किसलिए?’ तो उन्होंने कहा कि ऐसे ही शौकिया। उठाई बन्दूक और मार दिया ठन से। मनुष्य के जीवन का कोई भी महत्त्व उन देशों में नहीं है। जो लोग इस देश में रहते हैं, मैं यह नहीं कहती, कि वो सुखी लोग हैं, नहीं बहुत दुःखी हैं। गरीब हैं, भ्रष्टाचार है। यहाँ मैं पूना में आई तो जिसे देखो वो यही कहता कि वो पैसा खाता है, वो भी पैसा खाता है। मैंने कहा कि, भाई, यहाँ कोई खाना भी खाता है कि पैसा ही खाते हैं। सब लोग यहाँ पैसा ही खा रहे हैं। भाई, यह होगा कैसे ? वहाँ लोग पैसा नहीं खाते, लेकिन अपनी जान लेने पर आमादा हैं। अपने को नष्ट कर रहे हैं। अन्दर से ही खराब कर रहे हैं। ऐसे तरीके ढूँढ निकालते हैं जिससे वो नष्ट हो जाएं। ऐसी प्रणालियाँ बनाते हैं जिससे वो नष्ट हो जाएं। इसका कारण यह है कि साइंस बहुत एकांगी चीज़ है। एक तरफा चीज़ है। साइंस में प्यार, कविता, घर-गृहस्थी, बाल-बच्चे, समाज का कोई भी विचार नहीं बन सकता। वो लोग कहते हैं कि हम लोग तो यंत्रवत् हो गये। बिल्कुल यंत्र हो गये, बिल्कुल दिमागरहित, और हमें जीने में मजा क्या आयेगा। हमें तो कुछ समझ में नहीं आता। जैसे गन्ने को आप मशीन से निकालें उसी तरह ठूंठ जैसे हम तो शुष्क हो गये। हमारी जिन्दगी में अब रखा ही क्या है? जैसे कि एक पेड़ बहुत ऊँचा हो जाए और उसके स्रोत पर उसकी जड़े ना पहुँचे तो उसका जो हाल हो जाता है वही हाल इन बड़े-बड़े देशों का हो गया है। जब मैं वहाँ देखती हूँ तब एक ही बात मेरी समज में आती है, कि इस देश में अध्यात्म की नींव थोथी है, दुढ़ नहीं है। बगैर साइंन्स के अगर आप अध्यात्म करेंगे तो आपका भी वही हाल हो जाएगा। इसलिए हमें मानना चाहिए, कि किसी मायने में उनमें रईसी हो, मगर हम लोग भी बहुत रईस हैं। खासकर इस महाराष्ट्र में जहाँ साधु-सन्तों ने कितना काम किया है। हम लोगों के बोलने में ही हम उनका उल्लेख करते हैं। इस महाराष्ट्र में ही यह सम्पदा इतनी हमारे पास है। इस सम्पदा को पूरी तरह से समझ करके, उसका पूरी तरह से अवलोकन करके हमें चाहिए कि उसकी सीमा तक पहुँच जाएं और उसमें प्राविण्य प्राप्त करें। अगर हमने यह सम्पदा अपने यहाँ बना ली तो उसके बाद कोई भी प्रगति करे, आप डांवा-डोल नहीं हो सकते, आपमें गड़बड़ नहीं आ सकती, आप गलत काम नहीं कर सकते। इस सम्पदा को खो करके और आप विज्ञान के बलबूते पर खड़े रहिएगा तो जान लीजिए आपने अपनी जड़े अपने हाथों से उखाड़ कर फेंक दीं। उन लोगों का ठीक है कि उनके पास यह सम्पदा थी ही नहीं। और हमारी तो यह धरोहर है हमारा हैरीटेज है। इस सम्पदा का मतलब यह नहीं कि हम किसी भी धर्म-धर्मान्धता की बात करें, क्योंकि जब धर्म का लाभ हो जाता है तो आप स्वयं प्रकाशित हो जाते हैं और इस प्रकाश में आप देख सकते हैं कि धर्मान्धता या अंधश्रद्धा है। यहाँ हमारे भारत में विशेषकर इस महाराष्ट्र में सारे संत-साधुओं ने एक महत्वपूर्ण कार्य किया जो समाज अंधश्रद्धा थी उसे मात करने की कोशिश की। श्री सरस्वती इतने बड़े हो गये कि रास्ते में यदि कोई आदमी पत्थर पर सिंदूर लगाकर पैसा लेता था तो उसे पीट-पीट कर ठीक कर देते थे। उनका अधिकार था। उनकी अंधी श्रद्धा नहीं थी। वो देखी हुई श्रद्धा थी। जिसमें दृष्टि का अर्थ है। जो स्वयं ही अन्धे हैं, इधर शराब पियेंगे, उधर लोगों को पत्थर मारेंगे और फिर कहेंगे कि हम अंधश्रद्धा निर्मूलन करेंगे। कैसे कर सकते हैं? असम्भव। ये तो ऐसा ही हुआ जैसे अनाधिकार चेष्टा करना। अब कम से कम २० साल से हमने अंधश्रद्धा पर इतना ही नहीं जातीयता पर चोट की है, अनेक जातियाँ हैं। हमारे महाराष्ट्र में तो इतनी गड़बड़ है कि अपनी ही जाति में विवाह करेंगे। और अगर किसी ने दसरी जाति में विवाह किया तो उसका सबकुछ बन्द हो जाता है। ऐसा पिछड़ा हुआ हमारा समाज है कि इसमें अभी तक इतनी गलत-गलत धारणाएं हैं और उसी पर सारा

ध्यान है। हमारी जाति क्या? तुम्हारी जाति क्या ? जाति कोई परमात्मा की बनाई हुई चीज़ है क्या? हाँ, इतना कुछ है कि, ‘या देवी सर्वभूतेषु जाति रूपेण संस्थिता’ जाति का मतलब है आपकी तबियत, इसका मतलब है आपका एप्टीट्यूड। किस चीज़ को आप खोज रहे हैं ? जिस चीज़ को आप खोज रहे हैं वो आपकी जाति है। इस पर मैंने पहले आपको बतलाया कि श्रीराम का वर्णन करने के लिए उन्होंने खोज निकाला एक मछुआरा एक डाकू। उन्होंने इसकी कोई जाति देखी नहीं। श्रीकृष्ण का वर्णन जिसने लिखा, इस गीता के लिखने वाले कौन थे ? आप सब जानते हैं गीता को लिखने वाले व्यास एक मछुआरिन के अवैधानिक पुत्र थे। ढूँढ के निकाला उन्होंने ताकि ये जाति-पाति का ढोंग खत्म हो जाए। भिलनी के झूठे बेर खाये। विदुर, दासीपुत्र के घर जागर साग खाया। ये किसलिए किया? दिखाने के लिए कि ये जाति-पाति जन्म से नहीं कर्म से होती है। पर कोई सुने ही नहीं अगर, उसका दिमाग ही बन्द हो जाए, तो उसे क्या कहे। लेकिन सहजयोग में जब आत्मसाक्षात्कार होता है तो ये सब ढकोसलेबाजी एकदम गिर जाती है। सारी जाति अपने आप छट जाती है, सारी अंधश्रद्धाएं एकदम गिर जाती है। केवल हिन्दुस्तान में ही अंधश्रद्धा नहीं है, विलायत में कुछ कम है। इंग्लैण्ड में ऐसी अंधश्रद्धा आई कि आप समझ नहीं पाएंगे अजीब-अजीब सी। लेकिन इसको समझने के लिए आपकी चेतना सूक्ष्म होनी चाहिए। आपको आत्मसाक्षात्कार प्राप्त होना चाहिए। जब तक आपकी चेतना इस उच्च स्तर पर नहीं आती है तब तक आप वो केवल सत्य बता ही नहीं सकते जिसे कैवल्य कहते हैं। सहजयोग में जब आपकी कुण्डलिनी का जागरण होता है तो आपके हाथों में से ठण्डी – ठण्डी लहरें बहती हैं। आदि शंकराचार्य ने इसे सलीलं-सलीलं बड़े सुन्दर शब्दों में वर्णित किया। बाईबल में भी इसे ‘कूल ब्रीज आफ द होली घोस्ट’ कहा गया है। थे सभी धर्मग्रन्थों में एक ही बात लिखी है, कि आप अपना आत्मसाक्षात्कार लीजिए। क्या वे सब लोग झूठ थे जो ऐसा लिख कर गये कि आप अपना आत्मसाक्षात्कार लीजिए। उनकी जीवनी देखिये । वो कोई या निर्बु्ध पैसा खाते थे या किसी को पत्थर मारते थे। उन्होंने कोई गलत काम जिन्दगी में किया ही नहीं। ऐसे लोग कोई न कोई विशेष होने चाहिए। उनको आप सन्त कहें या सूफी कहें। सहजयोग का वर्णन तो कुरान में बहुत साफ तरीके से दिया है कि जब कयामत (उत्थान) का समय आयेगा तब आपके हाथ बोलेंगे। सहजयोग में आपके हाथ बोलते हैं। यानि आपके हाथों में जो ये चक्र हैं इनमें हरकत होने लगती है। आप समझ लेते हैं कि कौन से चक्र में दोष हैं। ये मानना चाहिए, कि हमारे अन्दर तीन तरह की प्रणालियाँ हैं। एक तो वेद, दूसरी भक्ति और तीसरी जो बहुत गुप्त रूप की थी नाथ पंथियों की। महाराष्ट्र के लोग नाथ पंथियों को जानते हैं। सब कुछ जानते भी किताब पढ़ते रहते हुए उससे हैं। उसके सार को समझे बिना ही रट लेते हैं। नाथ पंथियों में एक गुरू केवल एक शिष्य को जागृति देता था, ज़्यादा नहीं। कुण्डलिनी के बारे में किसी से खास बात नहीं करते थे। हालांकि संस्कृत भाषा में आदि शंकराचार्य ने और उनसे भी पहले मार्केण्डेय ने काफी कुण्डलिनी का वर्णन किया, कि कुण्डलिनी की शक्ति से आप आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर सकते हैं । श्री ज्ञानेश्वर जी के समय में निवृत्तिनाथ ने उनसे विनती की कि ‘एक गुरू एक शिष्य की परम्परा तो ठीक है परन्तु मैं आपसे विनम्र विनती करना चाहता हूँ, कि ये विद्या जन – जन तक पहुँचे। निवृत्तीनाथ जानते थे, कि ज्ञानदेव कौन है, कितनी बड़ी हस्ती है। उनकी माँ भी अपनी आत्महत्या से पहले अपने लड़के को समझा गई थी, कि बेटे इसकी बात जरुर सुनना। ज्ञानेश्वर जी ने कहा कि इस गुप्त विद्या को में दुनिया को जरूर बतलाऊँगा। मैं यह जागृति का कार्य नहीं करुंगा। तो ज्ञानेश्वरी के छटे अध्याय में उन्होंने कुण्डलिनी के

जागरण का बहुत सुन्दर वर्णन किया। काव्य में होने की वजह से आप जैसे चाहें उसका कोई भी अर्थ लगा लें। उन्होंने लेकिन छठा अध्याय निषिद्ध माना गया है। ये सब धर्ममार्तण्डेय जिन्होंने हर सन्त को सताया और छला, कहा , कि बिलकुल बेकार है। इसको तो देखना ही नहीं चाहिए क्योंकि उन्हें कुण्डलिनी का ज्ञान ही नहीं था । ये अच्छा तरीका है। किसी को शास्त्रीय संगीत न आता हों, उस पर हँसता रहे बेवकूफ की तरह। इसी प्रकार उन्होंने कहा, कि छठे अध्याय को पढ़ने की जरूरत ही नहीं। इस प्रकार हमारे देश की इतनी बड़ी सम्पदा जो छठे अध्याय में छिपी थी उस पर उन्होंने पर्दा डाल दिया। आज आपके और मेरे भी भाग्य से वो दिन आ गया है कि जो वो (श्री ज्ञानेश्वर जी) जनसमाज को कहना चाहते थे उसका साक्षात आप प्राप्त कर सकते हैं। जिस प्रेम की उन्होंने व्याख्या की थी, जो सत्य स्वयं प्रेम है, जिसे अमृतानुभव में, इतने सुन्दर शब्दों में उन्होंने वर्णित किया था उसका साक्षात आप कर सकते हैं। जो लोग संत ज्ञानेश्वर पर अंगुली उठाते हैं उनसे मेरा कहना है, कि दो लाइन उतने सूक्ष्म विचारों की लिख कर बताओ। लियकत नहीं तुम्हारे अन्दर दो लाइन सूक्ष्म, सुन्दर, मधुर तथा आनन्ददायी विचारों को लिखने की । सुन्दर ग्रामीण भाषा में कितनी सुन्दरता से लिखा है। ऐसे महान् महात्मा जिन्होंने २३ साल की आयु में यह कार्य किया। इस कलयुग में उन पर भी अंगुली उठाने वाले पैदा हो गये हैं। आपको अक्ल कितनी है? आप जानते क्या हैं? अध्यात्म के बारे में आप समझते क्या हैं। उन दिनों श्री एकनाथ महरों के घर खाना खाते थे, पर आज भी महरों धर्ममार्तण्डों ने। क्या बताऊं मैं इनके बारे में? ब्राह्मण जाति के दास गुरू ने को अलग-थलग किया हुआ है, इन कहा कि, ‘हमें लोग ब्राह्मण कहते हैं, हमने ब्रह्म को जाना नहीं, हम कहाँ के ब्राह्मण हैं?’ इनकी गाथाएं पढ़े तो लगता है कि कोई अनूठी बातें लोग कर रहे हैं। बातें तो समझ नहीं आती क्योंकि उसके लिए जो सूक्ष्मता चाहिए वह आत्मसाक्षात्कार के बाद ही मिलती है। अब आपने देखा, कि ये परदेसी लोग यहाँ आये हैं। ये नहीं है कि चार आदमियों को रुपया देकर कहा , कि चिल्लाओ। ये ऐसे लोग नहीं हैं। ये पढ़े लिखे ऊँचे लोग हैं जैसे रजनीश के पास आते हैं ये वैसे लोग नहीं हैं। ये बड़े चुने हुए लोग हैं। श्री शंकराचार्य की ‘सौंदर्य लहरी’ का कोई भाड़ोत्री वर्णन एक भारतीय नहीं कर सकता। जब मैं आईं तो किस सुन्दरता से उसे ये गा रहे थे। इन अंग्रेजों को एक शब्द सिखाना बहुत मुश्किल है। ‘द’ और ‘ज’ तो ये बोल ही नहीं पाते। इतनी दुर्दशा थी इन लोगों के जीभ की । और आज आप देखते हैं कि क्या मराठी, क्या संस्कृत, क्या हिन्दी – सरलता से सब भाषाओं के गाने गाते हैं। हिन्दी के गाने तो लिखते हैं। कितने प्रेम से ये हमारे संगीत को सुनते हैं। कहते हैं भारतीय संगीत ओंकार से आया। इनके अन्दर भी यही ओंकार जागृत हो गया है। निर्विवाद ये लोग ड्रग्ज लेते थे, बुरी तरह शराब पीते थे। एक रात में सब छोड़ कर खड़े हो गये हैं। सहजयोग में मनुष्य एक अतिमानव हो जाता है जो कि इस उत्क्रान्ति का चरम लक्ष्य है। उसको पाते ही आप अपने अन्दर एक नई अनुभूति को जानते हैं। जब हम वेद कहते हैं तो इसका मतलब है ‘विद्’ अर्थात् आप उसे अपने मध्य-नाड़ी तन्त्र पर जानें। जो बोध आपको मध्य -नाड़ी तन्त्र पर हो सकता है उसे विदु कहते हैं, जिसे हम बोध कहते हैं। जैसे नामदेवसाहब ने कहा है, ‘भरी न परडी बोधाची’ अर्थात बोध की टोकरी में भरूंगा ये बुद्धि का काम नहीं। कबीरदास जी ने कहा है ‘पढ़ि-पढ़ि पण्डित मूरख भय ‘ पहले तो मेरी समझ में ही नहीं आता था। परन्तु

अब समझ में आया, कि असल में वो विवेक-बद्धि नहीं है जिससे जान सके, कि चीज़ अच्छी है या बुरी। बुद्धि से परे ये जो चीज़ हमारे अन्दर है, जिसे हम आत्मा कहते हैं ये महान सत्य है। आप शुद्ध आत्मा हैं। यह सिद्ध होना चाहिए। और सिद्ध करना मेरे हाथ में नहीं-आपके हाथ में है। अगर कोई हिटलर आ कर मुझसे कहे कि ‘मुझे आत्मासाक्षात्कार दीजिए’ तो मैं कहँगी कि अभी सौ जन्म और लो। जो साधक जिज्ञासु है, नम्र है और अपना साक्षात्कार चाहता है उसी को हम दे सकते हैं। किसी पर हम जबरदस्ती नहीं कर सकते। ये प्रेम का कार्य है। क्योंकि दूसरा सत्य यह है कि सारी सृष्टि एक ऐसी सूक्ष्म तथा महान शक्ति से प्लावित है जिससे सारे जीवन्त कार्य होते हैं। आप देख रहे हैं कितने सुन्दर फूल लगे हुए हैं। इन्हें देख कर हम सोचते भी नहीं। एक छोटे से पौधे से इतने सुन्दर फूल निकल आये। ये कैसे हुआ। हम सोचते भी नहीं कि आम का पेड़ एक ही ऊँचाई पर जाता है और दुसरे पेड़ अपनी-अपनी ऊँचाई पर रहते हैं। मनुष्य का नाक-मूँह सब अंग , शरीर के परिमाण में ही बनता है। हम लोग सोचते ही नहीं कि ये आँख कितना बड़ा कैमरा है। ये साइन्स से आप नहीं बना सकते। एक भी जीवन्त कार्य आपके साइन्स ने नहीं किया। मरी चीज़ों को फोड़-फोड़ कर आप जो बात करते हैं-एक मरे पेड़ से यदि ये स्टेज आपने बना दी तो आपको लगा कि बहत बड़ा कार्य कर दिया। क्या कोई जीवन्त कार्य आज तक किया ? ये सिर्फ आत्मासाक्षात्कार के बाद आप कर सकते हैं क्योंकि आपका सम्बन्ध उस ब्रह्मचैतन्य से, उस सूक्ष्म शक्ति से हो जाता है। निठल्लु लोगों से कौन सर धुने। जो जिद्दी लोग हैं वो अपनी जिद पर बने रहे । साधक-विचारवान लोग इसके अधिकारी हैं कि वो आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त करें। सबसे बड़ी आफत तो यह आ गई है, कि सहजयोग में शारीरिक, मानसिक, सामाजिक हर तरह का परिवर्तन घटित होता है। यह बात सही है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हम यहाँ सब की बीमारियाँ ठीक करने के लिए बैठे हुए हैं। आज सबेरे से बीमारों को देखते-देखते छ: बज गए। मैं तंग आ गई। ठीक तो हो गए सब। लेकिन बीमारी उसी आदमी की ठीक होनी चाहिए जो बाद में जाकर प्रकाश दे। जो दीपक प्रकाश देने वाला नहीं है उसे कौन ठीक करेगा? डॉक्टर लोग शायद इस चिन्ता में पड़ गये होंगे कि माताजी जब सब कुछ मुफ्त में ठीक करती हैं तो हमारा क्या हाल होगा? लेकिन सहजयोग में आते कितने लोग हैं ? इतनी अक्ल किसके पास है। जितने बेअक्ल हैं वो आपके लिए और जो अक्ल वाले हैं वो मुझे दे दो| निर्बुद्ध लोगों से मैं नहीं भिड़ सकती। लेकिन जिनके पास अक्ल है, जो सूक्ष्म हैं-जो साधक हैं-उनके लिए तो मैं हूँ। उनकी बीमारियाँ भी ठीक हो जाती हैं वो मेरी वजह से नहीं , उनकी अपनी शक्ति कुण्डलिनी के जागरण से ठीक हो जाती है। मैं ही क्यों , अब सहजयोगी लोग सबको ठीक करते हैं । शारीरिक बीमारी ठीक होना भी कोई विशेष बात नहीं क्योंकि बहुत से पहलवान भी आकर मेरे पैर छूते हैं कि, माँ हमको शान्ति दो। तो जान लेना चाहिए कि हम शान्ति और प्रेम की बात करते हैं और बात तो बात ही रह जाती है। इसका साक्षात होना चाहिए। आपको आश्चर्य होगा , कि जो आत्मा आपके हृदय में है इसका प्रकाश अभी तक आपके चित्त में नहीं आया। वही स्रोत है शान्ति का और प्रेम का। वही स्रोत है आनन्द का। जो साधु- सन्तों ने बात बताई है वो सिद्ध करने के लिए हम आये हुए हैं। परमात्मा है या नहीं, ये सिद्ध करने के लिए हम आये हुए हैं। जो लोग कहते हैं परमात्मा नहीं है, बिल्कुल अवैज्ञानिक लोग हैं। क्या उन्होंने पता लगाया, कि परमात्मा है या नहीं? या ‘परमात्मा नहीं है’ इसकी आड़ में, वे नशा, व्यभिचार, भ्रष्टाचार करते हैं। इन धन्धों के लिए वे भगवान को हटा कर रख देते हैं। जब जरूरत हो तो समाज को दिखाने के लिए भगवान के पैर छू लो। ऐसे ढोंगी

और दाम्भिक लोगों के लिए सहजयोग नहीं है। यह उनके लिए है जो अपना हित और कल्याण चाहते हैं। इससे बड़ा हित और कोई नहीं। इससे हमारी सभी गलत धारणाएं टूट जाती हैं। परमात्मा ने हमारे कल्याण की पूरी व्यवस्था कर दी है। इतनी सुन्दर व्यवस्था हमारे अन्दर की हुई है कि क्या कहा जाए? कैसे ये हमारा बनाने वाला है | कि जिसने हमारे अन्दर इतने सुन्दर रूप से यह चीज़ बना दी। और कुण्डलिनी, आपकी वैयक्तिक माँ, जागृत हो होकर इस व्यष्टि को समष्टि में समा देती है। जिस दिन ये हो जाता है उस दिन हमारे अन्दर सामूहिक चेतना हो जाती है । तब छोटे-छोटे बच्चे भी आपको हाथ की अंगुलियों पर बता सकते हैं कि आपको क्या तकलीफ है- जागृत शारीरिक, मानसिक, घरेलू हर तरह की तकलीफ को। ये मोहम्मद साहब ने कहा था, कि आपके हाथ बोलेंगे- तो हाथ कैसे बोलेंगे? आपकी अंगुलियों तथा हाथों पर के सातों चक्र, इसे आपने पाना है क्योंकि ये आपके, आपके बच्चों के, शहर के, समाज के, भारतवर्ष ही नहीं सारे विश्व के हित के लिए है। लेकिन समझदारी बहुत जरुरी है। पूना नगरी को पुण्टपट्टनम कहा जाता है। तो मैंने सोचा यही घर बना कर रहो। पर जिस दिन से हमने पैर रखा है न जाने सब तरह के भूत खड़े हो गए। और बेकार में ही परेशान कर दे रहे हैं। उस पुण्यनगरी में न जाने कितने भूत बस गए हैं। लेकिन मैं जानती हूँ सबका एक दिन बस्ता उठने वाला है। एक तो बड़ा भारी चला ही गया यहाँ से। और चले जाएंगे- इसकी मुझे चिन्ता नहीं। लेकिन इस पुण्यभूमि में अजीब – अजीब तरह के लोग दिखाई देते हैं। आप पूना के लोगों को कहने में संकोच नहीं, कि यहाँ कुछ लोग तो यह कहते हैं कि, ‘हम भगवान पर विश्वास ही नहीं करते।’ मैं कहती हैँ, ‘क्यों?’ चलो दूसरों को तो ऐसा करने को मत कहो । आपने क्या विशेष पाया है? आप शराब पीते हैं, हर तरह के बुरे कार्य करते हैं और ऊपर से कहते है कि भगवान नहीं। आप ऐसे कौन से उज्ज्वल चरित्र के मनुष्य हैं। किसी भी उज्ज्वल-चरित्र के मनुष्य ने यह कभी नहीं कहा। महात्मा गांधी ने कभी नहीं कहा। किसी साधु-सन्त ने नहीं कहा कि, भगवान है भी कि नहीं है । ये अपने को बुद्धिवादी कहते हैं पर ये बुद्धि की पहुँच है कहाँ? उस बुद्धि से क्या विशेष कार्य आपने कर लिया ? क्या विशेष चीज़ आपने पाईं? आइनस्टाइन को हम मानते हैं। उन्होंने कहा कि, ‘मैं सापेक्षता के सिद्धांत को (थियरी ऑफ रिलेटीविटी) खोजते-खोजते थक कर अपने बगीचे में लेट गया। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं? तो साबुन के बुलबुले निकालते-निकालते एकदम न जाने कहाँ से यह सापेक्षता का सिद्धांत मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। नम्र थे न साफ-साफ कह दिया कि ‘न जाने कहाँ से मेरे सामने आ गया। जब इतने बड़े-बड़े लोग बातें करते हैं तो ये टूटपुंजे लोग कहते हैं कि, ‘भगवान नहीं है। १ दूसरी तरह के लोग पाश्चिमात्य हो गए-अर्थात औरतों के बाल कटा दो, बिनबाजू के वस्त्र पहन लो, लगाओ और लड़कों को भी कपड़े पाश्चिमात्य पहनाओ। वैसे गाने गाओ । सोचते हैं हमारी प्रगति हो गई। अरे चश्म भाई, उन देशों में ठीक है जहाँ बहुत ज़्यादा कपड़े बनते हैं। आपके देश में कहाँ इतने कपड़े हैं। फिर कोई फैशन बदल जाता है फिर आप क्या करिएगा? यहाँ लोगों के पास कपड़े नहीं हैं, तो आपके ये नखरे कहाँ से आते हैं? और आपको शर्म भी नहीं आती, कि ऐसे लोगों में रहते हुए इस तरह के कपड़े पहनकर आप अपना रोब झाड़ रहे हैं। पूना में सबसा ज्यादा बाल कटी औरते हैं। मुझे बड़ा आश्चर्य होता है। ब्यूटीपार्लर में जाना और शक्लें सबकी एक जैसी है, बाल भी एक जैसे हैं। अच्छा भाई, सबके बाल एक जैसे क्यों हैं? आजकल यही फैशन है। कल गंजा |

होने का फैशन हो जाएगा तो वो भी हो जाएंगे। आपको अक्ल है या नहीं? जो फैशन चल गया उसमें आप कूदे जा | रहे हैं, मेमसाहिब बने हुए। खासकर औरतों पर मुझे बहुत आश्चर्य होता है। अब तो वह अन्धश्रद्धा में भी डूबी हुई हैं। इस तरह की बेअर्थ आधुनिकता में फँसी हैं। अपनी संस्कृति की महानता का वर्णन जितना भी किया जाए कम है। इस देश की औरतें हैं जिन्होंने इसे सम्भाला, आदमियों ने नहीं। अपना समाज आज भी बहुत उन्नत है। अपने समाज में आज भी कुटुम्ब व्यवस्था है। आज भी हमारी आपसी रिश्तेदारी, आपसी प्रेम बहुत है। आपको अगर विदेश के किस्से मैं सुनाऊं तो आप हैरान हो जाइएगा। मैं आठारह वर्ष से इन लोगों को देख रही हूँ। कोई मर जाये तो भी ये लोग शैम्पैन पिएंगे। उसे गाड़ के आने के बाद बड़ा भारी भोज होगा , सब लोग हसेंगे, नाचेंगे और शाम तक पी पी कर झूम जाएंगे| ईसामसीह जन्मदिवस पर तो आप किसी के घर जाइये ही नहीं । कोई आपको नजर ही नहीं आयेगा, सब पलंग पर लोटते हुए। ये उनका क्रिसमस है। ईसामसीह इतने महान आत्मा थे। उनका ये मान ये लोग कर रहे हैं। और हम उन लोगों से कम नहीं है बेवकूफियों में। तो धर्म के प्रति हमारी जो एक भावना है वो भी बहुत ही गलत और बहुत ही भटकी हुई है। आप किसी के घर में जाइए तो, सप्ताह चल रहा है, सत्यनारायण। अरे भाई, जब नारायण स्वयं सत्य हैं तो उनके साथ सत्य क्यों लगा रहे हों? ‘तुम अगर इतना रुपया दे दो तो तुम्हारी माँ को स्वर्ग मिल जाएगा।’ ये क्या मनिआर्डर से मिलने वाले हैं? एक गाँव में गये। एक व्यक्ति को कहा कि माँ, पैसे नहीं लेती हैं। उसने मुझे पच्चीस पैसे दे दिये। मना करने पर कहने लगा अच्छा माँ को यदि पसन्द हो तो मैं एक रुपया दे देता हूँ। दिमाग में भरा है, कि आप भगवान को पैसा दे सकते हैं। भगवान क्या पैसा जानते हैं या बैंक जानते हैं। इतनी हमारे यहाँ अक्षर शून्यता है, अज्ञान है। धर्म में गए, तम्बाकू खाते हुए । विशुद्धि चक्र पर श्रीकृष्ण का स्थान है, यदि आप तम्बाकू खाएंगे तो श्रीकृष्ण को तो बिल्कुल पसन्द नहीं। वहाँ जाकर वो दुष्ट लोग आपका सिर फोड़ देंगे। फिर कहेंगे कि क्या इनकी स्थिति हो गई, पागलों जैसे घूम रहे हैं। नहीं इनको ‘मनी’ लग गया है। मनी (ध्यान) का अर्थ जानते भी हैं? पागलों जैसे घूम रहे हैं भीख मांगते हुए। ये लोग जो हरे रामा, हरे कृष्ण करते फिर रहे हैं ये भी भीख मांगते हैं। जो कुबेर हैं उसके शिष्य होकर के भीख मांगते हो, शर्म नहीं आती तुमको। ये श्रीकृष्ण का स्थान है। समझ में नहीं आता। मुझे तो रामदास स्वामी जैसी गालियाँ भी नहीं आती। उन जैसे शब्द भी नहीं है मेरे पास। पर उन्होंने इन चीज़ों पर इतना आघात किया है तब से करते आ रहे हैं। पर उसका कोई असर नहीं। कोई भी बाबाजी, गुरुजी आ गया तो बैठ गए उसके साथ। ऐसे लोग हैं जो धर्म के नाम पर सोचते हैं, कि मन्दिर में घण्टा बजा दं, बस हो गया खत्म। आपकी सारी अध्यात्म की प्यास खत्म हो गई। या किसी दिन अच्छे-अच्छे कपड़े पहनकर कोई पूजा-वूजा करा दी तो हो गई आपकी इतिश्री, इसके बाद क्या जरुरत है। हम तो बहुत धर्म करते हैं। कौन सा धर्म करते हैं? रोज मैं पढ़ता हूँ। कर गुरु- महात्म्य और पेट सोचता भी नहीं। जब मेरे पास आएंगे तो-माँ हमने इतने मन्दिर बनवाये, ये किया, तो भी हम इतने कष्ट में हैं। लेंगे में तकलीफ। गुरु का स्थान तो पेट में है फिर आपको तकलीफ क्यों ? इस पर कोई कितना गलत काम कर दिया आपने। अभी तो आपका कनैक्शन ही नहीं हुआ। बिना सम्बन्ध जोड़े हम चाहते हैं, कि जो हम परमात्मा से कहें वो सुने और फौरन दे दे जैसे कोई हमारी जेब में रखा है भगवान। लेकिन जब आपका परमात्मा से सम्बन्ध हो जाता है तो आप जान जाते हैं कि आपमें क्या दोष हैं और दूसरों में क्या दोष हैं। पर आप

दोष इस तरह नहीं कहते कि ये पागल हैं या ये बड़े मुंह जोर हैं या बदतुमीज हैं। ऐसा न कहकर आप कहते हैं, कि इनका आज्ञा चक्र पकड़ा है। खुद आप आकर मुझे कहेंगे कि माँ, मेरा आज्ञा चक्र पकड़ा है इस ठीक करो। खुद आकर आप कहेंगे क्योंकि आप अपने बारे में जानने लगते हैं। अपने बारे में जानना ही आत्मज्ञान है, यही आत्मप्रकाश है। इसके साथ ही साथ आप औरों के बारे में भी जानने लगते हैं। इतना महान प्रचण्ड कार्य ये है। आश्चर्य की बात है, कि भारत में कुण्डलिनी के बारे में नानक साहब, वर्लभाचार्य, कबीर साहब ने बहुत कुछ कहा-वो सब कुछ मटिया मेट हो गया। और रूस जैसी जगह जब मैं पहुँची, जहाँ कुण्डलिनी का तो नाम छोडो भगवान का भी कोई नाम नहीं लेता, न कोई जाति न पाति, न धर्म न कुछ। आप हैरान होंगे कि चौदह-सोलह हज़ार से कम लोग नहीं आए। वहाँ चार सौ डाक्टर सहजयोग कर रहे हैं। आप पता कर लीजिए । दो सौ वैज्ञानिक कहने लगे, माँ, विज्ञान नहीं बताना, बहत हो गया विज्ञान। उन्होंने सारी मर्यादाएं लांघ ली। पराकोटी को चले गये थे। वो कहते हैं कि इस दहलीज़ से हमें हटाओ और हमें ले चलिए वहाँ जहाँ पर अध्यात्म का प्यार व मिठास हो। इसको पाते ही आपको किसी तरह की शारीरिक, मानसिक व्याधि नहीं हो सकती। जब आपकी गृहस्थी, बच्चे और सारा संसार जिससे ठीक हो सकता है, जिसके लिए आपको न तो को कोई प्रयत्न करना है न पैसा देना है, तब आप इसे क्यों नहीं प्राप्त करना चाहते ? मनुष्य की बुद्धि समझना बहुत मुश्किल है। उन रूस के लोगों ने बस एक बार पाया और जम गए। अब हमें शान्ति मिल गई, सकून मिल गया। इस शान्ति में हमें बैठना है और कुछ नहीं चाहिए | इस कुण्डलिनी का जागरण क्या में ही पहली बार कर रही हैूँ? औरों ने भी किया लेकिन तब में और अब में एक ही फर्क है, कि ये जागरण पहले एक या दो लोगों का होता था । क्योंकि इस जीवन के वृक्ष में एक दो ही फूल लगते थे। आज हजारों फूल लगे हुए हैं। हजारों फूल बन सकते हैं ऐसा समा है। इसके विषय में पहले ही भविष्यवाणियाँ हैं। तो क्यों न इसे प्राप्त किया जाये? इसमें पीछे हटना, मेरे ख्याल से समय को चूकना है। बहुत महत्त्वपूर्ण आन्दोलन हमारे अन्दर पहले ही घटित होने वाला है। उसके बाद देखिये, कि क्या मजा आता है और आप क्या हो जाते हैं। कितने शक्तिशाली, कितने प्रभावी और उतने ही स्नेहमय। उतने ही प्रेममय । सारी शंकाएं एक साथ गिर जाती हैं। आप बहुत बड़ी चीज़ हैं। विदेशों से आये ये लोग मानते हैं कि महाराष्ट्र में पैदा हुआ आदमी कोई बड़ा पुण्यात्मा होगा। अभी हम देहात में गये थे तो उन्होंने देहातियों का बहुत मान किया । जैसे कि वे महान पुण्यात्मा हैं। में तो | देखती रही, कि अपने देशवासियों की बुराई क्या करना। मैंने पूछा, ये सब आपको क्यों लगता है? कहने लगे, माँ, यह तो महाराष्ट्र है। यहाँ तो पूरे विश्व की कुण्डलिनी है। इस देश में जन्म लेने के लिए तो इन्होंने बड़े पुण्य किये होंगे । लेकिन हमने इतने पुण्य नहीं किये इसलिए तो गन्दे देशों में जन्म लिया । मैं कहँगी, कि हम लोगों को अपनी पूरी पहचान नहीं है। अपने को जानना है। टेलीविजन यदि किसी गाँव में ले जायें और कहें कि इसमें गाने और तस्वीर आयेगी तो लोग मानेंगे ही नहीं। इसी तरह से तो हम अपने बारे में सोचते हैं, कि हम एक इन्सान है। बस, और क्या। लेकिन जब उसका कनैक्शन लग जाता है तो आप देखते हैं क्या कमाल चीज़ बनाई है। जब मनुष्य इतने कमाल की चीज़ बनाता है तो उसने अआपको कितनी कमाल की चीज़ बनाई होगी। अपने को पहचानो। अपनी शक्ति को जानो। सहजयोग में मेरे भाषण में तो हजारों लोग आ जाते हैं लेकिन उसके बाद पनपते नहीं। ईसामसीह ने

जो कहा है कि कुछ बीज तो पत्थर में ही पड़े रहे और कुछ दलदल में पनप कर खत्म हो गये। लेकिन कुछ बीज ऐसे हैं जो अंकुरित हैं और उनसे वृक्ष तैयार हुए । सहजयोग में कुछ ऐसे भी आधुनिक लोग है जो गुरु-शापिंग करते हैं। आज माताजी के यहाँ तो कल किसी और के यहाँ । अरे भाई, हर जगह अपने लिए कुँआ खोदते रहोगे ? गुरु इसलिए भी अच्छे लगते हैं लोगों को क्योंकि गुरु कुछ कहते नहीं। जैसे भी चलना है चलो। पैसे आप मुझे दे दो। गुरु पैसे खाते हैं और क्या? परमात्मा के में नाम पर पैसा लेने वाला व्यक्ति किसी भी हालत परमात्मा का कार्य नहीं कर सकता। प्रबन्ध आदि पर पैसा लग सकता है लेकिन यदि कोई कहे कि पैसे लेकर कुण्डलिनी जागृत कीजिए तो ऐसा हुआ जैसे पैसे गाड़ दीजिए और आपका खेत हरा भरा हो जाएगा। पृथ्वी माँ आपको इतना देती है, ये क्या लेती है आपसे? जो डालियेगा वो पनप जायेगा। ऐसा ही प्रेम सर्वशक्तिमान प्रभु का चारों तरफ है। इन लोगों के झांसें में मत आना, कि कुछ आप परमात्मा नहीं है। परमात्मा के नाम पर पैसा खाने वाले ढोंगी लोगों के पास मत जाना। अन्धता से हमारे अन्दर बनी धारणाओं का भी पड़ताला होना चाहिए, कि ठीक है या नहीं। इसके लिए हमारे अन्दर दैवी शक्ति जागृत होनी चाहिए ताकि हम सत्य-असत्य को जान सकें। हंस और बगुला दोनों सफेद हैं। परन्तु हंस को नीर-क्षीर विवेक होता है। जब तक आपके पास नीर-क्षीर विवेक नहीं आ जाता आप कुछ भी कें माफ। अपनी गलतियों के लिए अपने को पापी मान कर कोसे नहीं। मानव से गलती होती हैं। यदि आप पापी होते तो यहाँ कैसे बैठे होते। तो अपने दोषों को नहीं सोचना । माँ के लिए सब बच्चे समान होते हैं। ये सारा प्रेम का कार्य है और बड़े सुचारू रूप से हो जाता है। जिस प्रकार चकोर धीरे-धीरे चन्द्रमा के कण खींच लेता है वैसे ही यह सुक्ष्म ज्ञान आपके अन्दर स्थित हो जाता है। आपको फिर सवाल या शंका रह ही नहीं जाती। पहले निर्विचार समाधि प्राप्त होगी फिर निर्विकल्प समाधि । हमारे देश के सारे सार और सत्य को आप सहजयोग में पाइयेगा । जितनी झूठी बातें हैं वो आप छोड़ दीजिए । अत: पहले आप अपने साक्षात्कार को पा लीजिए।