Shri Ekadasha Rudra Puja

Moedling (Austria)

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1988-06-08 Ekadasha Rudra Puja, Meodling, Austria

[English to Hindi translation]

आध्यात्मिकता के इतिहास में आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। सभी पैगम्बरों ने एक रुद्र अवतरण की भविष्यवाणी की। उन्होंने कहा कि एकादश अवतार आएंगे और सारी असुरी शक्तियों तथा सारी परमात्मा विरोधी गतिविधियों को नष्ट करेंगे। वास्तव मैं एकांदश तत्व की रचना भवसागर मे होंती हैं क्योंकि जब अंतरिक्ष अपनी ध्यान धारणा के माध्यम से भ्रम सागर को पार करने के लिए तैयार होते हैं तो असुरी शक्तियाँ उन्हें सताती हैं, कष्ट देती हैं, उनका मार्ग में बाधा डालती हैं तथा उनका वध करती हैं| ये नकारात्मक शक्तियाँ मानवीय असफलताओं क॑ कारण पनपी। मनुष्य जब असफल हुआ तो उसकी द्रष्टि अपने से बेहतर लोगों पर पड़ी और उसे लगा कि वह तो उन मनुष्यों क॑ मुकाबले कहीं भी नहीं है। कई बार क्रोध एवं ईर्ष्या के कारण उसमें दुष्ट स्वभाव जाग उठा जिसने भवसागर मैं परमात्मा विरोधी नकारात्मकता की सृष्टि की। इस प्रकार भवसागर में दुष्टता को आकार प्रदान किया गया। जैसा आप सहजयोग मे देखते हैं, बहुत्त बार हमने ऐसा देखा होगा, जब आप किसी गलत गुरू या गलत व्यक्ति के पास जाते हैं या कोई अनधिकारी पूजा करते है तो आपका दायां भवसागर पकड़ता है। बाए भवसागर में गे सारी विध्वंसक शक्तियां कार्य करती हैं। विकास प्रक्रिया में भी बहुत से पौधे, पशु आदि मध्य में न होने के कारण नष्ट हो गए, क्योंकि वे अत्यन्त अहंकारी और चालाक थे | कुछ बहुत बड़ें थे, कुछ बहुत छोटे थे। उन सबको बाहर फैंक दिया गया और बाहर फेंक दिए जाने पर उन्हें लगा कि उन्हें अवश्य प्रतिकार करना चाहिए। ये सभी सामूहिक अवहेलना में चले गए और कलात्मक लोगों को हानि पहुँचाने के लिए सूक्ष्म रूप धारण करके आ गए जैसे आजकल विषाणु (viruses) हम पर आक्रमण करते हैं। ये वो पौधे (तत्त्व) हैं जो संचरण से बाहर चले गए थे। कुछ समय पश्चात‌ हम देखेंगे कि तम्बाकू का परिसरण समाप्त हो जाएगा, बहुत से नशीले पदार्थों का परिसरण भी समाप्त हो जाएगा। ये सभी तत्व हमारे अन्दर एक प्रकार के क्रोध, विकास विरोधी एवं स्वतन्त्रता विरोधी शक्तियों का रूप धारण कर सकते हैं। अतः भवसागर क्षेत्र में इन सभी भयानक नकारात्मक शक्तियों का उद्भव आ | 

इसी प्रकार बहुत से मनुष्य जिन्होंने जन्म लिया और इसी प्रकार जन्म लेकर जिन मनुष्यों ने अपने अहंकार का बल  खाने प्रयत्न किया, जो अहंकार प्रणालियों में चले गए और सोचा कि वे अन्य लोगों को नियंत्रित कर सकते है तथा सभी मनुष्यों पर शासन कर सकते है, पूरे विश्व पर नियंत्रण स्थापित कर सकते है, ऐसे सभी लोग इतिहास में शक्तिशाली संस्थाएं बन गए। आज भी ऐसी बहुत सीं शक्तियाँ पनप रहीं हैं। हर क्षण ये शक्तियाँ बन रही हैं और नष्ट हो रही है। हमारे भवसागर में ये बनती हैं और फिर नष्ट हो जाती हैं। ये लोग यदि दाईं ओर से (दाएं भवसागर से) पनपते हैं तो हम उन्हें परा चेतन (Supra Conscious) कहते हैं और जो बाई ओर से आते हैं उन्हें अवचेतन तत्व कहते हैं। ये सभी तत्व जीवित रहते हैं क्योंकि मानव को परमात्मा के रूप में बनाया गया है। ये तत्व सर्वशक्तिमान परमात्मा के सामूहिक अवचेत्तन में तथा उनके पराचेतन में रहते हैं। ये शक्तियाँ तब तक रहती हैं जब तक ये नर्क में नहीं चली जाती। इसी प्रकार मानव में भी ये शक्तियाँ विद्यमान रहती हैं और हम पर काबू पाने का प्रयत्न करती रहती हैं। ये बहुत अच्छी बात है कि ये पूजा हम आस्ट्रिया में कर रहे हैं क्योंकि विश्व के भूगोल में यूरोप भवसागर है और आस्ट्रिया वह स्थान है जहाँ असुरी शक्तियों का मुकाबला करने के लिए हमें नकारात्मक विरोधी शक्तियाँ प्राप्त होनी चाहिए। 

इस पूजा के लिए यह स्थान अत्यन्त उपयुक्त है| मैं उन सब सहजयोगियों की धन्यवादी हूँ जिन्होंने एकादश रुद्र पूजा के लिए यह स्थान चुना। आधुनिक काल में, जैसा हम देखते हैं, ये सारी शक्तियाँ अत्यन्त सूक्ष्म रूप से कार्य कर रहीं हैं, ऐसे तरीके से जिसे मानव समझ नहीं सकते और इसमें फंसे रहते हैं। आप यदि देखें कि जिस प्रकार हमें व्यर्थ की चीज़ें लुभातीं हैं या आकर्षित करती हैं, जिस प्रकार भयानक रोग हर कदम पर हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं, हमें लगता है कि हम उस दल दल के किनारे पर खड़े हैं जिसमें फँसने के बाद सम्भवत हम कभी न निकल सकें, उससे कमी छुटकारा न पा सकें। अतः हमें समझना चाहिए कि हमारे अन्दर ऐसा क्या है जो प्रकृति के विकास विरोधी, उत क्रान्ति विरोधी और सृजनात्मक विरोधी स्वभाव को सदा के लिए नष्ट कर सके। प्रकृति में यदि आप देखें तो हर चीज नियमित रूप सें प्रसारित होती है। 

उदाहरण के रूप॑ में सर्दियों में पत्तों को झड़ना होता हैं क्योंकि पेड़-पौधों का पोषण करने के लिए उन पत्तों की नाइट्रोजन को पृथ्वी माँ में जाना होता है। इतना ही नहीं पृथ्वी माँ को सूर्य की किरणें भी मिलनी आवश्यक हैं, इसलिए पतझड़ होना आवश्यक है ताकि किरणें पृथ्वी माँ में प्रवेश करके इसका पोषण कर सकें। पोषण प्राप्त करके पेंड पुनः हरें-भरे हो उठते हैं ताकि सूर्य का प्रकाश प्राप्त करके वे क्‍लोरोफिल(Chlorophyll) बना सकें। पृथ्वी माँ से जल चूसकर वे इसे वातावरण में वाष्पित करते हैं और वर्षा के लिए उत्प्रेरक(Catalyst) का कार्य करते हैं। वर्षा ऋतु में वर्षा होती है, जल का पोषण प्राप्त करके पुनः पेड़ों के सारे पत्ते झड़ जाते हैं और इस प्रकार अत्यन्त सुन्दरता पूर्वक ये सारा चक्र चलता रहता है। इसमें कोई विपर्यय (Reversion) नहीं है, यह तो एक निरन्तर चक्र है जो सृजन और पुनः सृजन करने के लिए सुन्दर ढंग से चलता रहता है | परन्तु मानव के हस्तक्षेप से प्रकृति गड़बड़ा जाती है। प्रकृति को हम समृद्ध भी कर सकते हैं। आप प्राकृतिक तरीकों से प्रकृति को विनाश से बचा सकते हैं। परन्तु जब आपको आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हो जाता है तो अपनी चैतन्य लहरों से आप उन सभी प्राकृतिक चीज़ों की रक्षा कर सकते हैं जो आधुनिकता के दुष्प्रभाव के कारण सड़ रही हैं। अतः सर्वप्रथम हम आंत्मसाक्षात्कार का प्रभाव देखते हैं कि किस प्रकार यह एकादश रुद्र के रूप में कार्य करता है। इस रूप में ये उन सारी असुरी शक्तियों को नष्ट कर देता है जो प्रकृति को नष्ट करने में लगी हुई हैं। 

मुझे विश्वास है कि (एक दिन आप सब ऐसी अवस्था तक उन्नत हो जाएंगे कि आपका एक कटाक्ष पेड़ों को हराभरा करने, फलों में मिठास मरने तथा फूलों को सुगंधित करने के लिए काफी होगा। ऐसा होना सम्भव है क्योंकि हमारी उत क्रान्ति के परिणाम निकल रहे हैं। क्षण क्षण यह परिणाम दर्शा रही है ताकि आप बौखला न जाएं, आपको आघात न पहुँचे, ताकि आप स्वयं देख सकें कि आप क्या हैं और क्या प्राप्त कर रहे हैं। इस शक्ति को अपने अन्दर उन्नत होते देने के लिए सर्वप्रथम हमें अत्यन्त अन्तर दर्शी होना चाहिए। ये देखने का प्रयत्न करना चाहिए कि हमारे साथ क्या घटित हो रहा है। अपनी गतिविधियों को देखना चाहिए। क्या हम उत क्रान्ति की ओर बढ़ रहे हैं या विनाश की और? हम क्या कर रहे हैं? हमारे अन्तःस्थित एकादश रुद्र शक्ति इतनी शक्तिशाली है, इतनी शक्तिशाली है कि यह न केवल प्रकृति में बल्कि मानव में भी कार्य करती है। इस प्रकार से ये कार्य करती है कि आप॑ स्तब्ध रह जाते हैं, आश्चर्य चकित हो जाते हैं। 

जिस सज्जन को मैंने आत्मसाक्षात्कार दिया हैं वह अत्यन्त समर्पित हैं परन्तु वह उस स्थान में नहीं है जहाँ वह सहजयोग में आ सके। कुछ लोगों नें उसे बहुत कष्ट देने का प्रयत्न किया और उसने मुझे बताया कि वे सब दुर्घटना के शिकार हो गए और अस्पताल में पड़े हैं। मैंने कहा मैंने त्तो कुछ नहीं किया, अपने ही कारनामों से उन्होंने सारी सीमाएं लाँघी और जब व्यक्ति अच्छाई की सीमाएं लाँघता है तो स्वाभाविक रूप से वह एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाता है जिसे हम असुरी अवस्था कहते हैं। इस स्थिति के खड्ड में यदि आप पड़ जाते हैं तो आपको कष्ट उठाना पड़ता है। इसका प्रभाव सहजयोगियों पर भी पड़ता है। मैं एक ऐसे सहजयोगी को भी जानती हूँ जिसने पैसों के मामले में गड़बड़ करने का प्रयत्न किया। मैनें नहीं सोचा था कि उसे दण्ड मिलना चाहिए। मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा था कि उसे दण्ड मिलें। परन्तु उन शक्तियों ने कार्य किया। उसकी अपनी शक्तियों ने उसके विरुद्ध कार्य किया और वह इतना बीमार हुआ, इतना अधिक बीमार हुआ कि मेरे सम्मुख वह सूखें पत्ते की तरह से कांपता था। मैंने उसे कभी नहीं बताया कि मैं उसके कारनामे जानती हूँ। सहजयोग में, जब आप आते हैं तो, आपको जान लेना चाहिए कि धीरे परन्तु निरन्तर आप एक सीधी खड़ी पगडंडी पर चढ़ रहे हैं। यह सब क्योंकि बहुत शीघ्रता से करना होता हैं इसलिए चढ़ाई बहुत खड़ी है और उसे चढ़ाई को चढ़ते हुए आपको ध्यान रखना होगा कि यदि आप ऊपर को नहीं बढ़ते तो नीचे को फिसल जाएंगे और यदि किनारों की ओर जाएंगे तो आप॑ खड्डे में गिर जाएंगे। आप कह सकते हैं कि श्री माताजी हम इधर उधर बढ़ रहे हैं। इसलिए आडोलन है। 

पतन के कारण भी व्यक्ति इस आडोलन (Movement) को महसूस कर सकता हैं। यह विनाश का आडोलन है। अतः आपको अपने विषय में आवश्यक विवेक होना चाहिए | हम उत्थान की ओर जा रहे हैं या पतन की ओर? क्‍या हम पथभ्रष्ट हो रहे हैं या हमारे कदम ऊँचाई की ओर बड़ रहें हैं? कभी-कभी हमें महसूस नहीं होता कि ब्रह्माण्ड के इतिहास में हम विश्व की भयानकतम नकारात्मकता के बीच में हैं। प्राचीन काल में एक समय पर कोई एक राक्षस होता था, जिसे संभालना होता था। एक राक्षस को नियंत्रित करता आसान कार्य था। परन्तु इतने अधिक राक्षसों को संभालना के लिए बहुत अधिक कार्य की आवश्यकता है। सबसे बुरी बात तो ये है कि आधुनिक समय में ये राक्षस लोगों के मस्तिष्क में प्रवेश कर गए हैं। उनकी शिक्षाओं और उनके द्वारा बनाए गए भ्रमों के कारण लोगों ने उन्हें स्वीकार कर लिया है। इन्हें स्वीकार करने वाले सभी लोग मेरे बच्चे हैं, ये जिज्ञासु हैं, सत्य साधक हैं। ये ऐसा हुआ मानों घन ऐंठने के लिए बच्चों को उठा लिया जाए। ये लोग बच्चों को मेरे सामने कर देते हैं और मेरी समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूं? मैं राक्षसों को मारने का प्रयत्न करती हूँ परन्तु मेरे बच्चे सामने आकर खड़ें हो जाते हैं। तो आधुनिक काल में इन्हें नष्ट करने का कौन सा सर्वोत्तम उपाय है? निस्संदेह, उनका वध किया जा सकता है, वे मर सकते हैं | परन्तु जिन लोगों को उन्होंने भ्रमित किया है, जिन्हें हानि पहुँचाई हैं उनकी रक्षा मैं किस प्रकार करूँ? यह अत्यन्त कठिन और नाजुक कार्य है। 

एक मात्र ये है कि इन राक्षसों को एक ऐसी अवस्था तक ले आया जाए जहाँ इनका पर्दाफाश हो जाए, ये अनावृत हो जाएं और पूरा विश्व इन्हें पहचान जाए कि ये कैसे लगते हैं। इसलिए बाहर से इनसे लड़ने या यम से इनका वध करने के लिए कहने की अपेक्षा इन्हें एकादश रुद्र के शिकंजे में फँसा देना उत्तम है ताकि अपने दुष्कर्मों के कारण लोगों के सम्मुख ये नग्न हो जाएं। झूठ के इस घिनौने खेल का यह एक लाभ है | असत्य सदैव गा हों जाता है। उनके मुख पर आप उनके पाखण्ड, दुराशय और शैतानी योजनाएँ स्पष्ट लिखे देख सकते हैं। आधुनिक समय में ये आक्रमण पराकाष्ठा पर हैं। हमें अधिक चुस्त, अधिक सावधान और अधिक सूझ-बूझ वाला होना होगा। आप सब इसके लिए अच्छी तरह से तैयार हैं। परन्तु सदैव हम ये भूल जाते हैं, कि हमारे अन्दर चैतन्य लहरियाँ है कि चैतन्य लहरियों की नई चेतना हमें प्राप्त हो चुकी है तथा हमारे अन्दर चैतन्य चेतना है। चैतन्य चेतना एक प्रकार का दूत है जो कि पूर्ण है, जो सूचित करती है और हमें बताती है कि हमारे अन्दर क्या कमी है तथा अन्य लोगों में क्या दोष हैं? परन्तु यदि आप मानसिक या भावनात्मक उद्यमों से अपने निर्णय लेने आरम्भ कर दें त्तो निश्चित रूप से आप श्रम में फँस जाएंगे क्योंकि ये सारे प्रश्न एक तरफ होते हैं। जैसे कोई भी मानसिक प्रक्षेपण, रेखीय दिशा (Linear way) में चलता हैं और फिर आप ही पर उसका प्रभाव होता हैं। भावनात्मक प्रक्षेपण का भी ऐसा हीं परिणाम होता है और शारीरिक प्रक्षेपण का भी। परन्तु जब आप चैतन्य लहरियों के माध्यम से देखने लगते हैं तो आप अपनी आत्मा से कहते हैं कि वह आपको सूचित करें और आत्मा ‘पूर्ण ज्ञान’ (Absolute Knowledge) हैं। तब आप न तो अपने अहम्‌ के सम्मुख, न अपने बच्चों के सम्मुख, न किसी संस्कार के सम्मुख और न हीं किसी गुरु के सम्मुख घुटने टेकते हैं। आप केवल स्वयं पर निर्भर करते हैं। अतः आप सबके लिए ये समझना आवश्यक है. कि हम मानसिक स्तर पर निर्णय न लेकर चैतन्य लहरियों के माध्यम से निर्णय लेंगे। 

बहुत से लोग सोचते हैं कि जब मैं किसी व्यक्ति के विषय में कुछ कहती हूँ तो संभवतः किसी अन्य ने मुझे सूचना दी होगी। परन्तु कल्पना कीजिए कि मैं यदि चैतन्य लहरियों का स्रोत हूँ तो मुझे सूचना देने के लिए क्‍या रह जाता हैं? कोई भी व्यक्ति आकर मुझे क्यों सूचना दे? लोग यदि सूचना देना चाहें तो बेशक दें परन्तु मैं तो जानती हूँ. कि वास्तव में परिस्थिति क्या है। एक बार राहुरी के एक अतिथि गृह में मैं प्रतीक्षा कर रही थी। वहाँ पाँच-छः प्राध्यापक अपनी साइकिलों पर आए | उन्होंने आकर मुझे बताया कि श्री माताजी हम आपको एक व्यक्ति विशेष के विषय में चेतावनी देने आए हैं| मैंने कहा, यह सज्जन कौन है? उन्होंने उस व्यक्ति का नाम बताया और कहां उससे सावधान रहें, वह राजनीति करता है। मैंने कहा उसके विषय में आप बस इतना ही जानते हैं? उन्होंने कहा, हाँ, आपको उससे बहुत सावधान होना होगा। मैंने कहां, अब मैं आपको उस व्यक्ति के विषय में बताती हूँ। इस व्यक्ति की पत्नी इसकी विवाहिता नहीं है, वह किसी अन्य की पत्नी है और वह व्यक्ति उस स्त्री को भगा कर ले आया है। बच्चा इसका हैं। परन्तु इसने उस महिला का बलात्कार किया था जिसके कारण यह बच्चा उत्पन्न हुआ। जब मैंने ये बातें बतानी शुरू कीं तो उन लोगों की आँखें फटी सी रह गई। कहने लगे, श्री माताजी आप ये सब कैसे जानती हैं? मैंने कहा आप जाकर पत्ता लगाएं कि मैं जो कुछ कह रही हूँ वह सत्य है या नहीं। वे पूर्णतः स्तब्ध थे। वो वापिस चले गए और फिर मुझे सूचित किया कि श्री माताजी आश्चर्य की बात है आपने जो कुछ भी बताया या वह सब सत्य था! अतः चैतन्य लहरी पर आप सभी कुछ जान सकते हैं। परन्तु जो लोग बिना चैतन्य लहरी के निर्णय लेने का प्रयत्न करते हैं वे गलतियाँ कर सकते हैं, जब त्तक आप उस अवस्था तक नहीं पहुँच जाते जहाँ बिना हाथ फैलाए आप सब कुछ जान जाते हैं। परन्तु उस अवस्था त्तक पहुँचने के लिए सर्वप्रथम आपको अपनी बुद्धि लहरियों के सम्मुख झुकानी होगी। 

कुछ लोगों की चैतन्य लहरियाँ ठीक नहीं होती. सम्भवतः खराब विशुद्धि के कारण ऐसा हो। उन्हें चाहिए कि अपनी विशुद्धि का ध्यान रखें उन्हें यदि विशुद्धि का कोई रोग नहीं है तो वे अपने अन्दर महसूस कर सकते है कि कौन से चक्र पकड़ रहे हैं और फलां व्यक्ति क्री स्थिति क्‍या हैं? प्रायः क्योंकि हम आधुनिक काल में हैं. सुन्दर दिखाई देने वाले लोग उन लोगों की अपेक्षा अधिक भूतबाधित होते हैं जो सुन्दर नहीं दिखाई देते। एक बार एक महिला हमारे कार्यक्रम में आई वह पूरी तरह से भूत-बाधित थी। छड़ी की तरह से पतली थी। सहजयोग का आरम्भ था। सभी लोगों को लगा कि कितनी सुन्दर महिला सहजयोग में आ गई है! मैने उन्हें कहा कि फिलहाल इसे सभागार से बाहर बिठाओ। उनकी समझ में नहीं आयां। जब वह ठीक हो गई तो बिल्कुल भिन्न दिखाई देने लगी। मेरे लिए तो वो बहुत ही सुन्दर है। जो सौन्दर्य उस समय देखा गया था संभवतः वह नकारात्मकता का वेश था जिसे लोगों ने देखा। जैसे आप सिनामे के नायक, नायिकाओं और विदूषकों को देखते हैं जो राष्ट्रपतियों तथा बड़े-बड़े लोगों की भूमिकाएं करते हैं। उनके मुख पर आप स्पष्ट लिखा हुआ देख सकते हैं कि वे कितने भयानक है? जब तक आप उस स्तर के तथा निष्कपट नहीं हैं आप ये बात नहीं समझ सकेंगे। आज हमे अपने अन्दर एकादश रुद्र शक्ति को जागृत करनें के लिए पूजा कर रहे हैं। ये शक्ति आपके अन्दर की नकारात्मकत्ता तथा पूरे विश्व की नकारात्मकतां से निपटने में सहायता करेगी। अब हमारे बहुत से हाथ हैं, हमारे यहाँ बहुत से लोग हैं जिनके पास भिन्न आयुध, साधन और हथियार हैं| 

ये सभी हथियार आपके पास हैं, आपके अन्दर हैं और निश्चित रूप से आप इन्हें उपयोग कर सकते हैं। परन्तु सर्वप्रथम आपको ये जानना होगा कि आपके पास कौन से हथियार हैं और किस प्रकार उनका उपयोग करना है। आज भयानक अंधे विश्वास है. भयानक गलत धारणाएं हैं। लोगों ने असंख्य संस्था रूपी किले बना लिए हैं, विश्व में  सभी प्रकार के मूर्खतापूर्ण कार्य होते हैं। ये सब समाप्त हो जाएंगे। उनके विषय में किसी को कुछ भी ज्ञान न होगा। लोग उन्हें इस पृथ्वी पर असुरी जीवों के रूप में जानेंगे। अन्ततः जीवन्त शक्ति ही जीवित रहेगी। हमें ये जानना होगा कि हमें जीवन्त शक्ति का ज्ञान है। इसके विषय में हमें अत्यन्त विश्वस्त होना होगा और इस बात पर हमें गर्द करना होगा कि हमें जीवन्त शक्ति का ज्ञान है। तब हमारे अन्दर एकादश रुद्र अत्यन्त सशक्त हो जाता है। आपको कष्ट देने वाले व्यक्ति को कठोर दण्ड मिलेगा| सहजयोग को झुकाने या हानि पहुँचाने वाली किसी भी संस्था को परिणाम भुगतने होंगे। जैसा आप जानते हैं, में मफ बिफिन शो (Muf Biffin Show) देखने के लिए गई। उसने मुझसे दुर्व्यवहार किया। अगले सप्ताह वह शो बन्द हो गया। भारत में एक समाचार पत्र नें मुझ पर बेहूदे लेख लिखने शुरू किए थे। कई महीनों के लिए वह समाचार पत्र ही बन्द हो गया। ऐसा होता है। मैं ऐसी कोई बात नहीं कहती, परन्तु जिस तरह से घटनाएं घटती हैं वह आश्चर्य चकित करने वाली होती हैं। ये एकादश रुद्र अब किस प्रकार कार्यशील॑ है? सबसे अहम बात तो ये है कि ये एकादश केवल कलियुग में, आधुनिककाल में ही कार्य करेगा। इससे पूर्व ये गतिशील न था। क्योंकि उस समय कोई एक-आघ ही गुरु होता था| आज जो राक्षस गुरु रूप में आए हैं। पूर्व काल में वो शैतान रहे होंगे। कहीं कोई एक आध-राक्षस होता था, उसका वध करना बहुत आसान था। 

कंस का वध करने में श्रीकृष्ण को कोई लम्बा समय नहीं लगा और रावण का वध करने में श्रीराम को । राक्षसों का वध एक बार जब उन्होंने कर दिया तो सारा वातावरण शुद्ध हो गया। परन्तु ये लोग मच्छरों की तरह से हैं। एक के बाद एक बेशुमार संख्या में उत्पन्न हों जाते हैं। इनका कोई अन्त नहीं। ये लोग मानव शरीरों में प्रवेश कर गए हैं और उन्हें भयानक रोग, समस्याओं तथा कष्ट से भर दिया हैं। अतः समस्या कहीं अधिक जटिल एवं गम्भीर है। तो ये एकादश रुद्र हैं जिनकी ग्यारह विध्वंसक शक्तियाँ है। हम कहते हैं कि दसे दिशाएं हैं और यह ग्यारहवीं है। दस बाहर से और एक अन्दर से। इनका प्रकोप उन सभी लोगों पर पड़ सकता है जो सहजयोग की उन्नति में बाधक बनने का प्रयत्न करते हैं। इसके विरोध में कार्य करते हैं या जो मेरे और आपके विरोध में कार्य करते हैं। कोई भी यदि आपको कष्ट  देने का प्रयत्न करेगा तो यह शक्ति कार्य करेगी। शारीरिक स्तर पर यह आपके मस्तक पर विराजमान है। एकादश रुद्र आपके मस्तक पर दिखाई देता हैं और इसकी खराबी के कारण यहाँ पर (मस्तक पर) सूजन आ जाती है। कुछ लोगों में यहाँ एक घुमाव और गूमड् (उठाव) सा देखा होगा। कैंसर के रोगियों को यदि आप देखें तो उनके बाएं मस्तक से दाई ओर को ये उठाव होता है। काफी बड़ा; दाई तरफ़ एक गूमड़ सा। कुछ लोगों को ये उठाव बाईं तरफ को होता है| अत्त: बाई तरफ से उठकर यह दाईं तरफ को जाता है और दाईं तरफ से उठने वाला बाईं तरफ जाता. है| दाईं तरफ को जाने वाले गूमड़ अधिक भयानक होते हैं क्‍योंकि ये अत्यन्त गुप्त होते हैं, छुपे हुए, जिन्हें देखा नहीं जा सकता। परन्तु व्यक्ति को ये बहुत्त हानि पहुँचातें हैं।  

ये जितनी भी भयानक शक्तियाँ आज कार्यरत हैं इन्हें पूरी तरह से नष्ट किया जा सकता है यदि हम अपने अन्दर एकादश रुद्र शक्ति विकसित कर लें। ये इतनी अधिक शक्तिशाली नहीं है। एक सहजयोगी ऐसी हजारों असुरी शक्तियों का वध कर सकता है जबकि ये एक सहजयोगी को हानि नहीं पहुंचा सकतीं | वास्तव में आपके सम्मुख ये शक्तिहीन हैं। आपको कष्ट देने का इनके पास कोई मार्ग नहीं हैं। आप यदि शक्तिशाली हैं तो ये लुप्त हो जाएंगी, स॒दा सर्वदा के लिए लुप्त हो जाएंगी। स्मरण रखें कि भारत में एक स्थान पर तीन सहजयोगी गाँव की एक विशेष सड़क से जाया करते थे। एक बार एक कार्य-क्रम में एक महिला भूतबराधित हो गई और ‘हो हो हो हो’ करने लगीं। उससे पूछा कि वह वहाँ क्‍यों है? उसने उत्तर दिया कि इस महिला में हम आपको ये बताने के लिए आए हैं कि आप उन तीनों सहजयोगियों को बता दें कि वे इस मार्ग से न जाएं। सारे गाँव तो हम वैसे ही छोड़ चुके हैं और अब इस क्षेत्र में रहते हैं। सारी रात अगर सहजयोगी इस मार्ग से आते रहेंगे तो हम इधर-उधर भागते रहेंगे। अत: उन तीनों सहंजयोगियों को कह दें कि वे उस मार्ग से न जाएं ताकि हमारे रहने के लिए कुछ स्थान तो बच जाए | ये सभी विकास प्रणाली से बाहर हो चुके हैं। ये मृत लोग हैं और ये मृत लोग अपने सूक्ष्म शरीर में हमारे अन्दर प्रवेश कर सकते हैं और तत्वों की रचना कर सकते हैं। ये तत्व हमें काबू कर सकते हैं और हमें बाधित कर सकते हैं| इस तरह के भूतबाघित लोग बिल्कुल सामान्य प्रतीत होते हैं। जैसा आज मैं बता रही थी सम यौन लैंगिकता, अति लैंगिकता या लैंगिकता का पूर्ण अभाव, कलात्मकता का पूर्ण अभाव या अति कलात्मक प्रवृत्तियाँ, बहुत अधिक खाना या बिल्कुल न खाना, व्रत करना, बहुत अधिक डरना या बिल्कुल न डरना, हर बात में ये कहना कि इसमें क्या दोष है, परमात्मा का भी भय न खाना या चींटी से भी डरना। कुछ लोग हर समय दोष भाव ग्रस्त रहते हैं और कुछ लोग दूसरों को बेकार बताकर उन्हें दोष भाव में ढकेलते हैं। कुछ लोग अत्यन्त क्रूर होते हैं, अन्य लोगों के मामलों में हस्तक्षेप करकें वे उन्हें दास बना सकते हैं, कुछ भी कर सकते हैं, अपने भाषणों से भयानक युद्ध करवा सकते हैं और कुछ अन्य ऐसे हो सकते हैं जो स्वयं को इन असुरी लोगों के सम्मुख झुकाकर इनकी वास्ता स्वीकार कर लेते है और इन नियंत्रक व्यक्तियों के गौरव में अन्य लोगों को भी नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं।  इसके पश्चात‌ सहजयोग का क्षेत्र आता है। जहाँ ऐसी शक्तियाँ प्रवेश नहीं कर सकते। यहाँ घर आप बहुत प्रसन्न हैं| आपके मस्तक पर चहूँ ओर इस क्षेत्र की देखभाल करने के लिए एकादश रुद्र खड़े हैं। वे सब देख रहें हैं, वें प्रहरी हैं। कोई आपको हानि नहीं पहुँचा सकता। अत्यन्त शान से आप अपने सहस्रार में स्थापित हैं। कुछ भी आपको छू नहीं सकता, कोई भी आपको कलंकित नहीं कर सकता | 

एकादश रुद्र बहुत चुस्त हैं और उनके बहुत्त से पक्ष हैं। हर देवता के बहुत से पक्ष होते हैं. और ये सारे पहलू इस क्षेत्र को हर समय प्रकाशमान करते रहते हैं ताकि कोई भी बाहय शक्ति इसमें प्रवेश न कर सके।

आपके अन्दर भी यही शक्ति विद्यमान है। सहस्रार के इस क्षेत्र में जब भी कोई बाहय शक्ति प्रवेश करने का प्रयत्न करती है तो तुरन्त ये गतिशील हो उठते हैं और उस व्यक्ति को इतनी हानि पहुँचा सकते हैं कि आप स्वयं हैरान रह जाते हैं। आपको पता भी नहीं चलता कि यह सब कैसे हो गया। परन्तु इस शक्ति को विकसित करने के लिए पूर्ण निष्ठा एवं सूझ-बूझ पूर्वक ध्यान धारणा करनी आवश्यक है। केवल इतना भर नहीं कि मेरे फोटो के सामने बैठकर आप कहें, “श्री माताजी मैं स्वयं को आपके सम्मुख समर्पित करता हूँ. आदि आदि।” निष्कपटता पूर्वक, क्योंकि देवता जानते हैं कि सत्यनिष्ठ कौन हैं, गहनता में कौन है और कौन वास्तव में उन्नत होना और उत क्रान्ति को प्राप्त करना चाह रहा है। एक प्रकार से यह संघर्ष है। ये संघर्ष है परन्तु ऐसा संघर्ष नहीं जिसका कोई फल न मिले। संसार का कोई अन्य संघर्ष आपको कोई भी फल नहीं देता फिर ये संघर्ष तो इतना साधारण है, इसका इतना वर्णन किया जा चुका है, इसे इतना कार्यान्वित किया जा चुका है कि आपको अधिक चिन्ता करने के लिए कुछ शेष नहीं है।  तो आज हमें इस कलियुग में नकारात्मकता को पूर्णतः नष्ट करने के लिए इन एकादश रुद्र शक्तियों का आह्वान करना है और ये प्रार्थना भी करनी है कि यदि हमारे अन्दर कोई नकारात्मकता है तो यह नष्ट हो जाएं। सहजयोंग विरोधी कोई नकारात्मकता यदि है तो वह नष्ट हो जाए। हमारे चरित्र में, हमारी सूझ-बूझ में कोई नकारात्मकता है तो वह नष्ट हो जानी चाहिए। एकादश रुद्र के विषय में-आज का यही सन्देश है। 

परमात्मा आपको धन्य करें।