The Principle of Brahma

Caxton Hall, London (England)

1978-09-11 The Principle of Brahma, Caxton Hall, London, 47' Download subtitles: ZH-HANS,ZH-HANTView subtitles:
Download video (standard quality): Watch on Youtube: Listen on Soundcloud: Transcribe/Translate oTranscribeUpload subtitles

Feedback
Share

                                             ब्रह्म का तत्व

 कैक्सटन हॉल, लंदन (यूके), 11 सितंबर 1978

आज मैं आपको कुछ ऐसा बताना चाहती हूं, शायद मैंने उस बिंदु को पहले कभी नहीं छुआ है। या मैंने इसके बारे में विस्तार से बात नहीं की है। यह ब्रह्म के तत्व के बारे में है: ब्रह्म का तत्व क्या है? कैसे इसका अस्तित्व है? यह कैसे पैदा होता है? यह कैसे अभिव्यक्त होता है? और कैसे, यह निर्लिप्त भी है और संलग्न भी है ।

विवरण में,  ब्रह्म का तत्व स्वयं ब्रह्म से भिन्न है। जैसे, मैं जिन सिद्धांतों का पालन करती हूं, वे मुझ से अलग हैं।

यह एक बहुत ही सूक्ष्म विषय है और इसके लिए वास्तविक ध्यानस्थ चित्त  की आवश्यकता है। तो अपने मन की सारी समीक्षा, कृपया उन्हें बंद कर दें, जैसे आपने अपने जूते उतार दिए हैं।

क्या आप सभी ने अपने जूते उतार दिए हैं? कृपया। और बस मेरी ओर थोड़ा, थोड़ा गहन ध्यान देकर सुनो। क्या आप आगे आ सकते हैं! आप सब आगे आ सकते हैं ताकि जो बाद में आने वाले हैं वो बाद में आ सकें। आगे आओ! मुझे लगता है कि आगे आना बेहतर है, क्योंकि हमारे यहां माइक नहीं है। यहां आगे आना बेहतर है।

जिस प्रका,र आप जिन सिद्धांतों पर आधारित हैं, वे स्वयं आप से भिन्न हैं, उसी तरह, ब्रह्म का तत्व स्वयं ब्रह्म से भिन्न है, लेकिन एक ब्रह्म है और ब्रह्म में निहित है। लेकिन ब्रह्म स्वयं तत्व द्वारा कायम है। आयाम में, आप कह सकते हैं कि ब्रह्म व्यापक है, बड़ा है और, आप इसे और भी गहरा कह सकते हैं – लेकिन तत्व सूक्ष्मतर है।

यह तत्व,  ब्रह्मांड की सृष्टि की शुरुआत से ब्रह्म के साथ मौजूद है। प्रारंभ से ही यह अस्तित्व में है, लेकिन चूंकि यह सृजन, विनाश, और इसके बीच में पालन-पोषण का एक शाश्वत खेल है, और संस्कृत में वे इसे स्थिति कहते हैं: ‘प्रदर्शन की स्थिति’, आप इसे कह सकते हैं।

इन तीनों अवस्थाओं में ब्रह्म तत्त्व अपने पास मौजूद पात्र के अनुसार अपना रूप बदलता है। जिस तरह यहाँ प्रकाश दिखता है, छाया उसे ढँक रहे ग्लोब के आकार की तरह दिखती है।

‘प्रतीत होना’ ही माया है, भ्रम है। कोई चीज़ जो ऐसी दिखी देती है जैसी वह है नहीं : यह घटना माया है, भ्रम है।

तो तत्व कार्य करता है, ब्रह्म को स्पंदित करता है, और ब्रह्म में वे सभी शक्तियां मौजूद हैं जो बाद में सृष्टि को प्रकट करती हैं।

तो तत्व, जो कि दैवीय शक्ति है, उसकी आभा है, या चीज जिसे यह धारण करती है, वह पूर्ण ब्रह्म है और ब्रह्म की तीन शक्तियाँ हैं, अर्थात् – अस्तित्व की, दूसरी सृष्टि की, तीसरी भरण-पोषण की।

 ब्रह्म की स्पंदन शक्ति विशिष्ट तत्व है। और इसे ॐ के रूप में दर्शाया गया है। जब हम कहते हैं, “ॐ”, यह ईसाई प्रार्थना में “आमीन” के रूप में भी इस्तेमाल किया गया था, यह ॐ के समान है, कोई अंतर नहीं है। जब हम कहते हैं, “ॐ,” तब वास्तव में इस तत्व की क्रिया ॐ के रूप में होती है, इस प्रकार से, जो कि आपके कपाल पर लिखा जाता है, अगर आप इसे अंदर देख सकें, उस तरह से, यहाँ। 

 हम कह सकते हैं, यह तत्व भ्रूण है। दैवीय शक्ति का भ्रूण यही तत्व है। फिर वही तत्व, या इसे आप बीज कह सकते हैं, फिर यह तीन नाड़ी में विभाजित हो जाता है और ब्रह्म तत्व की रचनात्मक, धारण करने वाली और अस्तित्व की शक्ति में प्रवेश करता है और उसमें प्रकट होता है – हमारे पास लिखने के लिए कुछ भी नहीं है, अन्यथा मैं आपको दिखा सकती हूँ ।

लेकिन यह व्याप्त होता है, जैसे नदियाँ बहती हैं और मिट्टी में प्रवेश करती हैं और इसका पोषण करती हैं, वैसे ही ब्रह्म का यह तत्व बहता है, व्याप्त होता है, स्पंदित होता है और ब्रह्म के आसपास के क्षेत्र का पोषण करता है।

तो, जब चित्त, जिसे आप महाचित्त या जिसे आप ईश्वर का चित्त कह सकते हैं, इस तत्व पर होता है, तब ब्रह्म इसे नहीं देखते हैं। क्या आप इसे समझ पा रहे हैं? जब चित्त [सर्वशक्तिमान ईश्वर का] तत्व से हटता है, तो वह उस का त्याग नहीं करता है। जब नदी बहती है, तो वह अपने स्रोत को नहीं छोड़ती है। जब यह ब्रह्म में प्रवेश करता है, तो यह सृष्टि करना शुरू कर देता है।

यह तत्व निर्लिप्त है, जिस प्रकार इस ग्लोब के अंदर का प्रकाश या बिजली निर्लिप्त है। लेकिन यह व्याप्त होती है। वह इस के माध्यम से व्याप्त हो सकती है, वह इस कमरे में व्याप्त हो सकती है लेकिन फिर भी वह निर्लिप्त है। मैं यह नहीं कहूंगी कि ब्रह्म के लिए कोई उचित उपमा हो सकती है क्योंकि वह एक निरपेक्ष चीज़ है और एक निरपेक्ष की तुलना नहीं की जा सकती है; जैसा कि वे इसे ‘अतुल’ कहते हैं, इसकी तुलना किसी भी चीज़ से नहीं की जा सकती।

तो अब लोग सोचते हैं, “ईश्वर क्या है?” प्रश्न आता है। “ईश्वर कहाँ है? वह क्या है? उनका ब्रह्म से क्या लेना-देना है और जो ‘तत्व’ ब्रह्म है?” ईश्वर तत्व है, वही चित्त है, वही आनन्द है और वही सत्य है। और ब्रह्म जो उन्हें घेरे हुए है, उनकी शक्ति है, व्याप्त, उनके अस्तित्व से प्रबुद्ध।

उसी ब्रह्म में स्वयं को, सृजनात्मक, धारण करने वाली और, आप इसे अस्तित्व की या विनाशकारी शक्तियों में रूपांतरित करने की क्षमता है।

हम एक छोटा सा बीज देख सकते हैं कि यह कैसे एक पेड़ को प्रकट करता है। हम कभी नहीं सोचते – अंकुर कहाँ से निकलते हैं, जड़ कहाँ से निकलती है, कौन फूल को बनाता हैं, कौन इसे सुगंध देता हैं – क्योंकि बीजों में कोई सुगंध नहीं होती है। लेकिन एक तंत्र जरूर है, जो बहुत सूक्ष्म है, बीज के अंदर, वहां रखा है।

और बीज वह रूप है जहां कोई गति नहीं है, कोई अभिव्यक्ति नहीं है, कोई रचना नहीं है। उसी तरह ब्रह्मा बीज रूप में हो सकते हैं।

तो, हमारे भीतर की पोषक शक्ति या हमारे भीतर रचनात्मक शक्ति, या, जिसे आप कहते हैं, विनाशकारी शक्ति या बाईं ओर की शक्ति – जिसे हम अस्तित्व कहते हैं – अस्तित्व की शक्ति, ये सभी ब्रह्म तत्व द्वारा अभिव्यक्त होते हैं। लेकिन अपने आप में वे कुछ भी नहीं हैं।

तो सत-चित्त-आनंद, सत्य, आनंद और चित्त, ब्रह्म का स्वरूप, जो यह है, ईश्वर है।

“क्यों, फिर शक्ति क्या है?” प्रश्न आता है। शक्ति पूर्ण ब्रह्म तथा ईश्वर की शक्ति है। बीज में बीजपत्र की तरह, बीज में अंकुर, बीजपत्र इसका समर्थन करते हैं। बीजपत्रों के माध्यम से, अंकुर सभी शक्तियों को ले लेता है और सुंदर फूल और सभी सुंदर फल बनाता है। जड़ें भी बनती हैं। भोजन बीजपत्रों द्वारा दिया जाता है: यह उनका पोषण करता है।

इसमें से जो तत्व इसे कार्यान्वित करता है, उत्पन्न करने वाली शक्ति, उसमें निहित जो अंकुरण शक्ति है, वह वह शक्ति है जिसे हम शक्ति कहते हैं।

लेकिन एक बीज में, जो एक भौतिक वस्तु है, ऐसा करने की कोई जागरूकता नहीं है। बहुत बारीक बात है, समझने की कोशिश करो। बीज खुद स्वयं को अंकुरित नहीं कर सकता। इसके भीतर ईश्वर द्वारा रखी गई कोई अन्य शक्ति है, जो इसे अंकुरित करती है। यह अपने आप नहीं कर सकता। वह शक्ति बीज में भी और भूमि में भी ईश्वर है। अंकुरण शक्ति वह शक्ति है, वह शक्ति जो इस से ऐसा करवाती है लेकिन बीज को इसका पता नहीं होता है।

जब आप मानव स्तर पर पहुंच जाते हैं, तो आपको उस शक्ति को जानना होगा, और आपको उस शक्ति के प्रति जागरूक होना होगा, और वह है आत्म-साक्षात्कार।

वह शक्ति जिसने आपको बनाया है, वह शक्ति जिसने आपको ये तीनों शक्तियाँ दी हैं: इड़ा नाड़ी, पिंगला नाड़ी, सारी कुंडलिनी, सब कुछ – वह जो उस सब की इच्छा है।

इसे समझने के लिए हम एक उपमा ले सकते हैं। घर का मालिक… मुझे आशा है कि यह काम करेगा लेकिन, कभी-कभी, आप जानते हैं कि मानव मन कैसे भ्रमित होता है। मान लीजिए कि घर का मालिक घर में आता है और वह अपने पैसे से, सब कुछ जो वह अपने घर के बारे में करना चाहता है,  बनाता है  अब मालिक बाहर चला जाता है, वह वहां नहीं है। अब, जब आप देखते हैं, आप एक निर्मित घर देखते हैं, आप उन सभी कामगारों की शक्ति देखते हैं जिन्होंने काम किया है, और किसी ने सब कुछ स्थापित किया है। लेकिन तुम उसे नहीं जानते जिसकी इच्छा ने यह सब उत्पन्न किया है |

उसी तरह आपने अपने शरीर को बनते देखा है, आप उस मन को भी देखते हैं जो आपके पास है, आप अपनी भावनाओं को देख सकते हैं, वे हैं, बिल्कुल। आप यह भी देख सकते हैं कि आप एक इंसान हैं। आप यह भी देख सकते हैं कि आप जानवरों से बहुत अलग हैं। और यदि आपके पास कुछ विवेक है, तो आप यह भी समझते हैं कि आप अब तक बनाई गई किसी भी चीज़ से अधिक समझदार हैं। और यह भी, अगर आपके पास कुछ दूरदर्शिता है।

लेकिन चाहत की शक्ति, इच्छा शक्ति या हम कह सकते हैं प्रक्षेपण शक्ति या वह जो उस सब का मालिक है, मालकियत की शक्ति, मेरा मतलब है, मुझे नहीं पता कि आप पूरी चीज के मालिक को कैसे समझते हैं। वह परमात्मा है। और फिर उसकी इच्छा की शक्ति – महाकाली की शक्ति, उसकी इच्छा है – फिर देश सब कुछ अभिव्यक्त करती है। उसकी इच्छा, वह प्रकट करता है। उनकी महाकाली की शक्ति जो आप यहाँ बाईं ओर देख रहे हैं, मनुष्य में इड़ा नाड़ी के रूप में प्रकट होती है। शेष ब्रह्मांड और हर चीज़ यह बाद में सब कुछ बनाता है। लेकिन पहले केवल इच्छा है।

लेकिन जो इच्छा करने वाला है वह ईश्वर है। हम में वह इस सारी गन्दगी से दूर हमारे हृदय में विराजमान है। और वह सिर्फ इच्छा करता है। हम उसे नहीं जानते लेकिन वह हमें जानता है। हम एक बात निश्चित रूप से जानते हैं कि वह हमें जानता है। कोई है जो निश्चित रूप से हमारी निगरानी करता  है, जैसा कि भगवद गीता में, वे कहते हैं क्षेत्रज्ञ, वह जो क्षेत्र का ज्ञाता है। क्षेत्र का ज्ञाता वहीं है।

एक बार जब आप अपने क्षेत्र के ज्ञाता बन जाते हैं, तो आप आत्म-साक्षात्कारी होते हैं: यह आत्म-साक्षात्कार है।

जब लोग घटिया तरीके से आत्म-साक्षात्कार के बारे में बात करते हैं! मैं सचमुच स्तब्ध हो जाती हूँ। जिस तरह से लोगों ने ऐसे सम्मानित विषय को केवल धनार्जन के लिए अपने हाथ में ले कर तोडा-मरोड़ा है| जरा इस बारे में विचार तो करें! उस स्तर से इस स्तर तक, यह थोड़ा अधिक ही है! मेरा मतलब है, ऐसा, केवल मनुष्य ही कर सकते हैं, मैं आपको बता सकती हूं। ऐसा इंसान के अलावा कोई नहीं कर सकता। भले ही वे राक्षस हों, वे जानते हैं कि यह दैवीय शक्ति है और आप इसका किसी भी तरह से दुरुपयोग नहीं कर सकते हैं!

तो यह तत्व काम करता है, जैसे, एक प्रकार से … पदार्थों में यह काम करता है। आप कह सकते हैं, विद्युत चुम्बकीय बल के रूप में। लेकिन विद्युत चुम्बकीय बल के रूप में नहीं, यह काम करता है जिससे उसके अंदर विद्युत चुम्बकीय बल लाया जाता है। क्या आप बिंदु समझ पाए हैं? क्या आप? जैसे, यहाँ बिजली है, लेकिन जो बिजली भेजता है वह व्यक्ति है और वह इसके बारे में जानता है।

जब तक आप आत्म-साक्षात्कार के चरण तक नहीं पहुंच जाते, तब तक आप इसके बारे में जागरूक नहीं होते, आप इसे नियंत्रित नहीं कर सकते, आप इसे कार्यान्वित नहीं कर सकते। यह स्वतः काम करता है, और इसलिए डॉक्टर इसे स्वायत्त तंत्रिका तंत्र autonomous nervous system कहते हैं, और मनोवैज्ञानिक इसे अचेतन unconscious कहते हैं।

केवल बोध के बाद ही,  सब कुछ अपना हो जाता है, इस अर्थ में – तुम पक्ष बदल लेते हो। अब तक तुम वहाँ से चीजें देखते रहे हो, अब तुम मेरे साथ बैठ कर और पूरी कहानी देखते हो।

लेकिन ब्रह्म का यह तत्व इसी भाव में रहता है। वह ऐसी मनोदशा में हो सकता है कि उसका कोई कर्तव्य ही नहीं है, उसका कोई कर्तव्य नहीं है, वह बस अस्तित्व में है। इसका कोई कर्तव्य नहीं है। किसी घर के मालिक का 

 इसके बारे में कुछ करना उसका कर्तव्य नहीं है। यह उसकी सनक है: अगर वह करना चाहता है, तो वह करेगा, अन्यथा वह एक वीतरागी की तरह रहेगा। उसका कोई कर्तव्य नहीं है।

मुझे आशा है कि आप “मालिक” का अर्थ समझ गए होंगे, क्योंकि मानव कानून अजीब हैं। आप चाहे जो भी मालिक हों, फिर भी आप बहुत कुछ नहीं कर सकते। लेकिन अगर आप इस जगह के पूर्ण मालिक, पूर्ण मालिक के बारे में सोच सकते हैं …

हाँ, बहुत सच है, आप मुस्कुरा रहे हैं, लेकिन ऑक्सटेड में हमारे पास एक पूर्ण स्वतंत्र घर था लेकिन हम पेड़ नहीं काट सके, हम पेड़ नहीं लगा सके, हम बाड़ लगाने के लिए ऐसा नहीं कर सके।

लेकिन वह पूर्ण स्वामी है, पूर्ण स्वामी है। ‘निरपेक्ष’ शब्द को समझें! जहां कोई कानून नहीं, बल्कि उसके अपने कानून काम करते हैं। उसके कानून काम करते हैं। उस तक किसी के भी नियम नहीं पहुँच सकते।

तब आप कह सकते हैं, प्रश्न आता है, “फिर माँ, ऐसा कैसे कहा जाता है कि, ‘हम आज़ाद हैं, आज़ादी हमें दी गई है?”

केवल उसे चुनने की स्वतंत्रता है: अपनी बेहतरी के लिए, आप उसे बेहतर नहीं करने जा रहे हैं। आप सहज योग में आ कर सहज योग को बेहतर नहीं कर रहे हैं, आप दुखद रूप से गलत हैं [यदि आप ऐसा सोचते हैं]। नहीं! सहज योग का कोई कर्तव्य नहीं है।

यह एक भावना है। इसमें कोई समस्या नहीं है। यह अपनी ही महारत पर खड़ा है; आप यहां आएं या चले जाएं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह निष्प्रयोजन [उद्देश्यहीन] है, यह बिना किसी प्रयोजन (कारण) के है। कारण: यह अकारण है; इसे परवाह नहीं है।

तो, इसे एक रूप लेना होगा जिसमें इसे परवाह करना होगा। फिर यह रचना करता है, जैसे घर के मालिक को किसी चीज की चिंता करने की जरूरत नहीं है। वह मालिक है, उसकी आलोचना कौन करेगा? उसके साथ कौन बहस करने वाला है? कौन उसे चुनौती देने वाला है? कौन उसके खिलाफ कोटा लगाने जा रहा है? वह हर चीज का मालिक है! निरपेक्ष गुरु! परमेश्वर का अर्थ है, वह केवल सर्वशक्तिमान ही नहीं है, बल्कि वह उस सबका स्वामी है जिसे उसने बनाया है। वह मालिक है, वह चाहे तो करेगा, अन्यथा नहीं करेगा। यह उसकी मर्जी है कि उसने यह किया है।

तो, वह परेशान नहीं है, लेकिन फिर कभी-कभार वह एक ऐसे व्यक्ति का रूप लेता है, जो कुछ करना चाहता है। वह परवाह करना चाहता है, अपनी मर्ज़ी से वह खुद को परेशान करता है और वह रचना करना शुरू कर देता है। और वह बनाता है। और वह इस ब्रह्मांड को बनाता है और वह आपको बनाता है। वह बनाता है क्योंकि वह इसे कई आंखों से देखना चाहता है – उसने जो भी किया है। इसलिए वह अपने बच्चों को पैदा करता है, उन्हें बड़ा करता है, उन्हें आंखें देता है ताकि वे जो कुछ उसके पास है उसका आनंद ले सकें। वह उन्हें दुष्टि की शक्ति देता है।

ब्रह्म का यह सार गंगा तत्व है: जैसे, संस्कृत में, उन्हें गंगा तत्व कहा जाता है।

यहाँ से हमें यह समझना होगा कि यह पहला तत्व है और वह है अबोधिता का तत्व।

यह पवित्रता का तत्व है, यही हमारे भीतर शुद्धता का तत्व है। यही वह तत्व है जिसके द्वारा हम अपनी रक्षा करते हैं, जिससे हम स्वयं का सम्मान करते हैं।

वह तत्व इस धरती पर अवतरित हुआ है, जैसा कि मैंने आपको बताया है। उन्होंने गणेश के रूप में बनाया है लेकिन उन्होंने यीशु मसीह के रूप में अवतार लिया है, वह ब्रह्म तत्व है। वह अलग है और इसलिए उसे पुनर्जीवित किया जा सका है। किसी अन्य अवतार को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता था। वह पैदा नहीं हुआ था, यह एक अवधारणा था, इच्छा थी। और इसलिए वह पुनर्जीवित हुआ था। आप सभी शायद यह नहीं जानते होंगे।

परमात्मा के लिए क्या मुश्किल है? मेरा मतलब है, एक भारतीय के लिए यह समझना बहुत आसान है कि गणेश की रचना पार्वती ने की थी,  हाँ! उसने उसे बनाया। हम इसमें कभी संदेह नहीं कर सकते, क्योंकि आखिर वह परमेश्वर है। वह एक संपूर्ण व्यक्तित्व हैं। वह जो चाहे कर सकता है।

बेशक, वह कुछ ऐसा करता है जो आपको मस्तिष्क द्वारा ग्राह्य हो, कोशिश करता है। लेकिन अगर उसने कुछ ऐसा किया है जो आपको समझ में नहीं आता है, तो इसे कुछ पौराणिक, या आसमान से उतरा हुआ मान कर निरस्त  नहीं कर देना चाहिए, जिस पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि अगर आप ऐसा कहते हैं, तो क्या आप उस का आंकलन करने योग्य सम्पूर्ण  लोग हैं?

आइए जाने कि हम वैसे नहीं हैं, हम नहीं हैं, लेकिन हमें होना ही है! वह चाहता है कि आप उसके बारे में जागरूक रहें

और इस सृष्टि में, जब वह सृजन करता है, तो वह स्वयं को एक मूल आदि अस्तित्व स्वरुप बनाता है। वह वैसा बन जाता है, वह एक आदि अस्तित्व होने की स्थिति धारण करता है। और फिर वह अपनी कोशिकाओं का चयन करता है जिन्हें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होती है जिन्हें जागृत किया जाना है।

अब मस्तिष्क की कोशिकाएं वही हैं जो जागरूक हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि – ये मस्तिष्क कोशिकाएं कैसे जानती हैं? कैसे, कैसे… सब कुछ…? इस छोटे लड़के ने मुझसे यह प्रश्न पूछा, क्योंकि वह बहुत अधिक उस स्थिति में है, लेकिन बहुत कम लोग यह प्रश्न पूछते हैं: “गुरुत्वाकर्षण कैसे होता है? यह लाल क्यों हो जाता है? वह हरा क्यों हो जाता है? यह कैसे हुआ है? किसने किया है?”

हम चीजों को हल्के में लेते हैं, हर चीज को हल्के में लेते हैं। मनुष्य के साथ यही एकमात्र परेशानी है, हर चीज को हल्के में लेना। अगर हम सब कुछ हल्के में नहीं लें और पूरी विनम्रता से कहें कि, “हे भगवान, हम आपके बारे में बहुत कम जानते हैं, हम जानना चाहते हैं,” वह आपको ऊपर उठाता है और आपको अपने मस्तिष्क में बैठाता है, ताकि आप उनके मस्तिष्क की, उनके हृदय की,शक्तियों से,जहां से वे आपसे प्रेम करते हैं, जहां वे करुणा के सागर हैं, उनके प्रति जागरूक हो जाएं, आप उस महासागर में एक बूंद बन जाते हैं। और आप भी, अपनी लहरों के साथ, ऊपर और नीचे उछलते हैं और उसकी करुणा का आनंद लेते हैं। बस एक बूंद हो तुम, लेकिन तुम सागर हो।

कबीर जो कहते हैं, वह यही बताता है। आप देखिए, इन महान लोगों ने उनका वर्णन किया है लेकिन आपके लिए यह बिल्कुल अस्पष्ट हो जाता है। मानवीय तार्किकता इन सब बातों की व्याख्या नहीं कर सकती। तो, आपकी तर्कसंगतता का सुधार चैतन्यमय जागरूकता में करना होगा। ईश्वर को समझने के लिए आपको उस स्तर से गुजरना होगा, कम से कम।  वर्तमान  स्तर पर आप उसे नहीं समझ सकते।

तो यहाँ इस विचार के साथ मत आओ कि तुम ईश्वर को कुछ देने जा रहे हो, नहीं! आपको लेना है; तुम उसे कुछ नहीं दे सकते। लेकिन आपकी विनम्रता में, यदि आप अपने आप को व्यक्त करते हैं, तो उसे अच्छा लगता है।

जब एक छोटा बच्चा उसके लिए कुछ फूल लाता है तो गुरु को प्यार होता है। जब एक छोटा बच्चा माँ के लिए फूल लाता है, तो माँ को अच्छा लगता है। ‘पसंद’ नहीं, लेकिन संस्कृत में एक शब्द है, ‘कौतुक ‘। मुझे नहीं पता, इसके लिए अंग्रेजी में कोई शब्द नहीं है, मुझे खेद है। ‘कौतुक’ वह खुशी है, वह खुशी जो इस बच्चे को ऊपर आते देखकर महसूस होती है, जब वह देखता है कि बच्चा अपने प्यार छोटे से रूप में वापस कर रहा है। आखिर बच्चे हैं – वे क्या करने जा रहे हैं, आप देखिए?

इस तरह, आप देखिए, एक दिन वह मेरे लिए 2p लेकर आया। वह कहता हैं, “दादी, आप इससे साड़ी खरीद सकती हैं, हां, बेहतर होगा कि आप इसे अपने पास रखें।” आप देखिए, उन्होंने इसे कहीं पाया, उन्होंने कहा, “मैंने इसे कमाया नहीं है, लेकिन मेरे पास आपके लिए है, इसलिए आप इसे रख सकती हैं और एक साड़ी खरीद सकती हैं।”

फिर जो भावनाएँ मन में आती हैं, वह है कौतुक। माँ के हृदय में उस समय जो भाव आता है, वह है कौतुक, उसकी मिठास, उसका सौंदर्य। आप अपनी शुष्क तर्कसंगतता से नहीं समझ सकते, यह आपको पूरी तरह से शुष्क बना सकता है। जिसमे कोई भावना नहीं है, इसकी कोई संवेदनशीलता नहीं है, कुछ भी नहीं है।

हे भगवान, यह अहंकार, मैं कहती हूँ, यह तथाकथित अहंकार ने, वास्तव में मनुष्य को उन सभी सुंदर चीजों से पूरी तरह से दूर कर दिया है जो उनमें बह रही थी, सारी संवेदनशीलता। और भयानक किताबें और भयानक चीजें जो लोगों ने आपको सिखाई हैं, वास्तव में वह सब खत्म कर दिया है जो आपके भीतर था। इतनी सुन्दर सुगंध से इतने सुन्दर फूल उत्पन्न हुए हैं, जो पूरी तरह से सूख गए हैं, मुझे लगता है, मनुष्य के इस इतने सीमित मूर्ख अहंकार से। यह आपको सिर्फ कुछ चीजों को समझने के लिए दिया गया था लेकिन आपने खुद को पूरी तरह से उस कीचड़ से ढक लिया है और यह इतनी मुश्किल चीज है, इतनी मुश्किल चीज है।

कुछ उदाहरण दिए जा सकते हैं। एक लड़का मुझसे मिलने आया, दूसरे दिन, एक मित्र के साथ जो एक बहुत महान सहजयोगी है, मुझे कहना होगा, वह आज यहाँ नहीं है। और वह है, मैं कहूंगी, केवल सहज योगी को खुश करने के लिए मैंने कहा, “ठीक है, मैं उसे बाहर निकालूंगी।” मैंने पाया कि लड़के के अंदर एक भयानक अपराधबोध था, क्योंकि उसने कुछ भयानक, बिल्कुल भयानक किया था। लेकिन मैंने उससे कहा कि, “तुम्हारे पास एक अपराध बोध है और इसे माफ कर दिया गया है, इसलिए इसे छोड़ दो। कोशिश करो, कोशिश करो। ”

लेकिन उसके साथ कुछ भी कार्यान्वित नहीं करता है, इतना अहंकारी, इतना अहंकारी; और वह इतना अदना सा व्यक्ति था । मेरा मतलब है, अगर वह कहीं भी सत्य के पास होता, तो मैं यह मान भी जाती कि वह सोचता है कि उसे इसे प्राप्त करना चाहिए या करना चाहिए और वह सब। लेकिन ऐसा कुछ नहीं।

वह वापस जाता है और सहज योगी से कहता है, “ओह, मुझे लगता है कि वह सिर्फ एक साधारण गृहिणी है, बस, उसे गंभीरता से न लें।” तब सहज योगी ने कहा, “ओह, वास्तव में, क्या काम है! आपने कितने लोगों को ठीक किया है? मैंने उनके द्वारा ठीक किए गए कैंसर से पीड़ित लोगों को भी देखा है। मैंने देखा है, अपनी आँखों से, कुंडलिनी को उठते हुए, मैंने लोगों को आत्मसाक्षात्कार करते देखा है। बहुत से ऐसे हैं जिन्हें मैंने अपनी आँखों से देखा है। मैं उस सब पर विश्वास नहीं करूँ और तुम पर विश्वास करूँ ?”

मैं कभी नहीं जानता था कि वह इतना सतही था। और यह उसका जवाब है।

लेकिन जैसा कि मैंने आपको बताया था कि जब आप परेशान होंते हो तो आप एक स्थिति को अपना सकते हो। और जब मैं इस तरह की स्थिति लेती हूं, कि मैं तुम्हारे बारे में परेशान हूं, तो मुझे लगता है कि वास्तव में तुम अभी भी बहुत, बहुत अज्ञानी हो। लेकिन कम से कम देखें, कम से कम इस की चाहत करें, और यह किया जाना चाहिए क्योंकि सृष्टि को पूरा करना है, इसे पूरा करना है। और आपको अपने होने का अर्थ जानना होगा, आपको यह जानना होगा कि आपको भगवान ने क्यों बनाया है और आप क्या हो? यह आवश्यक है!

लोग इस और उस में अपना समय बर्बाद करते हैं। अब और बर्बाद करने के लिए समय नहीं है मैं आपको इतना ही बता सकती हूं। पश्चिम में मुझे समय की ऐसी बर्बादी मिलती है। पूर्व में भी यही है, वे वही कर रहे हैं जो आपने पहले किया है, जैसे वे पुल बनाने की कोशिश कर रहे हैं और वे अब  रेलगाड़ियों को भूमिगत करने की कोशिश कर रहे हैं। और जिन्होंने ऐसा किया है वे अब आत्महत्या कर रहे हैं। इन दोनों अति छोरों के बीच कभी-कभी मैं कहां खड़ी हो जाती हूं, मैं अपना चेहरा देखने लगती हूं। इन अतिवादिता के साथ मुझे क्या करना चाहिए?

तो कृपया अपने श्रीमान अहंकार को भी अपने जूते के साथ बाहर रखें, तो यह काम करेगा। अगर यह काम नहीं करता है, तो यह मेरी चिंता नहीं है, न ही मेरी समस्या है। यह आपकी समस्या है कि यह काम नहीं कर रहा है। यदि कोई ऑपरेशन सफल नहीं होता है, तो डॉक्टर को दोषी ठहराया जा सकता है क्योंकि वह इसके लिए पैसे लेता है, लेकिन माताजी को नहीं। इसलिए नहीं कि मैं पैसे नहीं लेती, बल्कि मुझे इसकी परवाह नहीं है। मुझे तो बस इस बात की फिक्र है कि तुम्‍हें अपना बोध हो। लेकिन अगर आपको यह नहीं मिला तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्या आप उस हिस्से को समझ सकते हैं?

मैं सुबह से शाम तक, शाम से सुबह तक आपको आत्मसाक्षात्कार देने के लिए काम करूंगी, लेकिन अगर आप इसे नहीं चाहते हैं, तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, देखिए। न ही अगर यह काम नहीं करता है, मुझे परवाह नहीं है, यह एक साधारण बात है। इस धरती की एक माँ और मुझ में, माताजी में, जिन्हें वास्तव में तुम्हें तुम्हारे साम्राज्य की कुंजियाँ, तुम्हारे आनंद की कुंजियाँ, तुम्हारे सत्य की कुंजियाँ देनी हैं, के बीच यही अंतर है कि: मुझे वह करना है।

और मैं तुमसे कुछ लेकर तुम्हें नहीं देती। इसे समझना चाहिए, क्योंकि अहंकारी लोग तुरंत पहरे पर होते हैं।

सहज योग में आपको क्या देना है? मैं तुमसे कुछ नहीं लेती। मैं तुम्हें देती हूं, क्योंकि मेरे पास यह उपलब्ध है और तुम इसे पा सकते हो, क्योंकि यह तुम्हारा अधिकार है, इसलिए बेहतर है तुम यह पा लो। लेकिन अगर आप इसे नहीं लेना चाहते हैं, तो मैं आपको मजबूर नहीं करने जा रही हूं। और फिर मैं कुछ चालें खेलती हूं, ऐसा मुझे स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि मुझे परवाह  नहीं है और चाल के साथ ही लोग गायब हो जाते हैं, फिर से प्रकट होते हैं फिर गायब हो जाते हैं। तो उस बिंदु पर सावधान रहें।

यह ब्रह्म का तत्व है जो निर्लिप्त है। ब्रह्म का तत्व विरक्त होता है, जो कार्यरत होता है और रूचि को छीन लेता है, रुचि चली जाती है, चित्त हट जाता है। आप इसके बारे में फिक्रमंद नहीं रहते हैं। इस तत्व पर विजय नहीं पायी जा सकती है। यह स्वयं तत्व है। यह समझौता नहीं कर सकता, यही बात है, निरपेक्ष होना। निरपेक्ष चीजें समझौता नहीं कर सकतीं।

उदाहरण के लिए, कुछ लोग हैं जो कह सकते हैं … आप देखते हैं, कुछ लोग हैं जो कहते हैं कि, “माताजी कहते हैं कि आपको एक धार्मिक जीवन जीना है।” दरअसल, आपको करना होगा। मेरा मतलब है कि अगर हिटलर मेरे पास आता है तो मैं उसे आत्मसाक्षात्कार नहीं दे सकती। कुछ ऐसा है जिससे समझौता नहीं किया जा सकता। आपको कुछ करना होगा, आपको इसे प्राप्त करने की स्थिति में होना होगा, और यदि आप इसे उस स्थिति के बिना प्राप्त भी करते हैं, तो इसे पूरा किया जा सकता है।

यह ऐसा तत्व भी नहीं है जो किसी मांग के लिए मार्ग भ्रष्ट हो जाए, नहीं, ऐसा नहीं होता है। केवल एक बिंदु तक, लेकिन ऐसा नहीं होगा।

लेकिन यह एक ऐसा सजीव तत्व है, जिस जीवंत तत्व की सुंदरता मैं आपको बताउंगी। जिसे शायद आप जानते तो हैं लेकिन नहीं जानते।

जब तत्व निर्जीव हो जाता है, जैसे कि यह घर बनाया गया है, इसकी नींव है, फिर इसे बनाया गया है, फिर एक घर लाया गया है और फिर सब कुछ किया जाता है। फिर जो एक बार किया गया वो हो गया है। अगर नींव कमजोर है तो हमेशा के लिए कमजोर है, आप इसे सुधार नहीं सकते।

लेकिन जीवंत तत्व यह है कि, आपकी नींव जो भी हो, वह आपकी नींव में, आपकी पृष्ठभूमि में, हर चीज में प्रवेश करेगा और इसे पूरी तरह से ठीक कर सकता है। आप बस इसके लिए मांग करें। आपके संस्कार कुछ भी हों और आपके दोष जो भी हों, आपकी जो भी समस्याएं हों, जो भी पाप आपने किए हों, जो भी गलत काम आपने किए हों, जीवंत तत्व उसमें प्रवेश कर सकता है और पूरी चीज को सुधार सकता है और उसे रूपांतरित कर सकता है। फल।

तुमने देखा है, एक पेड़ में, मान लीजिए कि एक पेड़ बीमार है, अगर आप इसका इलाज करते हैं, तो आप पूरी तरह से फल प्रकट कर सकते हैं। लेकिन अगर आप इसे चैतन्यित करते हैं, तो आप देखते हैं कि पूरी खूबसूरत चीजें बहुत खूबसूरत हो जाती हैं।

तो, यह जीवंत तत्व है और इसलिए क्राइस्ट ने इसे कहा है, “मैं जीवित परमेश्वर हूं।”

यह जीवंत तत्व के बीच का अंतर है जो आपके मृत चक्रों के हर हिस्से को, आपके मृत मानस के हर हिस्से को जीवंत या जागृत करता है। यह आप में जाग्रृत होता है, यह आप में सुधार करता है, यह आप में शुद्ध करता है, यह गंदगी, गंदगी और कुरूपता को पूरी तरह से बेअसर कर देता है, जिसे पाप कहा जाता है। यह बात नहीं करता है, यह कार्यान्वित होता है, लेकिन आपको बस इसके लिए माँगना है। बस प्रार्थना करें। यही जीवंत तत्व की सुंदरता है।

इसलिए, जब लोग सहज योग से निरोग हो जाते हैं, तो आश्चर्यचकित न हों – यह सिर्फ एक उपोत्पाद है, यह कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है। यहां तक ​​कि जब पागल लोग ठीक हो जाते हैं, कोई आश्चर्य की बात नहीं है, यह सिर्फ एक उपोत्पाद है। क्योंकि यह एक जीवंत तत्व है जो हर चीज में प्रवेश करता है, यह इसके हर हिस्से को तोड़ता है, इसे सुधार करता है, इसे ठीक करता है, सुंदर बनाता है; फूल बना देता है। और यही वादा किया गया है।

लेकिन फिर लोग सहज योग के लिए नीचे उतर आते हैं कि, “माँ, मुझे एक समस्या है।”

 मैंने कहा, “फिर क्या दिक्कत है?” 

“मेरे दोस्त ने मुझे कोई पत्र नहीं लिखा है, क्या आप मेरी मदद करेंगी?

अब कभी-कभी ऐसा होता है, मुझे नीचे कर देता है। यह तो ज्यादा है। यह ठीक है, यहाँ तक कि इन समस्याओं को भी हल किया जा सकता है। आखिर एक माँ को अपने बच्चों की इन छोटी-छोटी समस्याओं का समाधान तो करना ही पड़ता है।

लेकिन सर्वोच्च के लिए प्रार्थना करो, “त्वमेकम शरेणयम, त्वमेकम वरेण्यम – परमात्मा के अलावा कुछ भी नहीं मांगा जाता है।” और कुछ भी मत मांगो। बाकी सब धूल है, वह सब नष्ट हो जाएगा, सब चलायमान है: आ रहा है और जा रहा है, समाप्त हो गया है। शाश्वत के लिए प्रार्थना करो, मांगो जो स्थायी  है, वही मांगो जो सर्वोच्च और शुद्ध है। मुझे उस तक नीचे मत लाओ।

मैं तुम्हारे साथ खेलती हूँ। जब मेरा बच्चा मुझसे कुछ मांगता है, तो मुझे उससे कहना पड़ता है, “ठीक है, लो।” लेकिन जब आप परिपक्व हो जाते हैं तो आपको सर्वोच्च के लिए प्रार्थना करना चाहिए। नौकरी और चीजों के लिए मत मांगो। ठीक है, अगर आपको कोई समस्या है, तो यह काम करता है, लेकिन अब आप समझ सकते हैं कि कहां से कहां तक।

आज के लिए यह ठीक है क्योंकि मैं निष्प्रयोजन की स्थिति में बहुत अधिक हूं। और मैं अभी इन लोगों से कह रही थी, “मुझे नहीं पता कि मैं क्या बात करने जा रही हूं,” लेकिन मैंने कुछ सिखाया है और यदि आपके कोई प्रश्न हैं, तो कृपया मुझसे पूछें। इस बीच, मैं चाहूंगी कि कुछ सहजयोगी इन लोगों को देखें और फिर हम ध्यान के लिए जाएंगे।

मैं कुछ पानी लूंगी अगर कुछ है? क्या आप इसे बंद कर सकते हैं? क्या आप अब इन लोगों को देख सकते हैं? नहीं, बस जाइए और वहां मौजूद एक-दो मरीजों को देखिए।

 तुम लोगों के हाथ में ठंडा का आ गया कुछ? ऐसे रखो हाथ, ऐसा रखो।  आप सभी को ऐसे ही हाथ रख कर बैठना चाहिए। बेहतर? वह कैसे है?बेहतर है?

परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी