Shri Mahalakshmi Puja, The Universal Love

(भारत)

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30 /12/ 1992  महालक्मी पूजा, सर्वव्यापी प्रेम, कल्वे, भारत 

सहज योगियों को ऐसे साधारण सांसारिक लोगों के स्तर तक नहीं गिरना चाहिए। अंत में आपके साथ क्या होगा? जो लोग इस प्रकार की चिंता कर रहे हैं, मैं उन्हें कहूँगी कि वह गहन ध्यान में जाएं, यह समझने के लिए कि आप स्वयं का अपमान कर रहे हैं। आप संत हैं। आप इस बात की चिंता क्यों करें कि आपको कौन सा विमान मिलने वाला है, कौन सा नहीं? यह दर्शाता है कि आपका स्तर बहुत नीचा है – निश्चित रूप से। आप सभी जो चिंतित हैं, आप मेरे संरक्षण में यहां आए हैं, और मेरी सुरक्षा में ही वापस जाएंगे। 

आज सुबह मैं ईतनी बीमार हो गई कि मुझे यह विचार आया, आज हम कोई पूजा का आयोजन नहीं करेंगे। आपको यह पता होना चाहिए कि आप सब मेरे अंग प्रत्यंग है। आपको अपने शरीर में स्थान दिया है, और आप आपना आचरण सुधारें ! 

ऐसे शुभ दिन में हम सभी यहां आए हैं, यह विशेष पूजा करने के लिए। मैं कहूँगी की इसे महालक्ष्मी पूजा कहना चाहिए क्योंकि इसका सम्बन्ध हमारे देश के और सारे संसार के उद्योग से है। 

जब तक मनुष्य के सभी प्रयासों को परमात्मा के साथ जोड़ा न जाए, वह अपने उत्तम स्थिति और पद को प्राप्त नहीं कर सकते। इस कारण पश्चिम के देशों में अब हमें समस्याएं आती हैं। तथाकथित अत्यंत समझदार, अति चुस्त, संपन्न और शिक्षित लोग – अब यहाँ हमें आर्थिक मंदी जैसी स्थिति दिखती हैं, क्योंकि उनमें कोई संतुलन नहीं । वह नहीं जानते कि परमात्मा की शक्ति ही है जो सब कार्य कार्य करती है, और जब हम उसकी अवहेलना करते हैं, तो आपके साथ यही होता है। 

अब जब भी हम ऐसे किसी प्रकार के प्रयास करते हैं, सर्वप्रथम हमें धरती माँ से अनेकों सामग्री का प्रयोग करना पड़ता है। पर यदि यह उचित उद्देश्य के लिए हो, रचनात्मक वस्तुओं के लिए, दूसरों की सहायता के लिए, तथा संतुलन के साथ, तो धरती माता सोच सकती हैं, वह अधिक से अधिक उत्पादन कर सकती हैं। उन्होंने पहले भी ऐसा उत्पादन किया है। वह उन लोगों के लिए उत्पादन कर सकती हैं जो समझदार हैं, जो परमात्मा के अनुरूप हैं, ना कि केवल अपने लिए पैसा कमा रहे हैं या अपने उद्देश्य के लिए, बल्कि समग्रता से सोच रहे हैं। यह भी सोच रहे हैं कि हम ऐसा करके क्या प्राप्त करेंगे। और इस प्रकार से उद्योग बढ़ सकता है। 

अब हम जापान में देखते हैं कि उद्योग बहुत बढ़ गए हैं, पर कोई आध्यात्मिकता नहीं है। वह किसी भी प्रकार से प्रसन्न लोग नहीं हैं। उनके बच्चे पीड़ित हैं, परिवार पीड़ित हैं। पैसा मनुष्य की सम्पूर्ण भलाई नहीं कर सकता। इसलिए एक संतुलन बनाना होगा।

विशेष रूप से हमारे देश में, परमात्मा का धन्यवाद है, कि हमारा औद्योगिकीकरण इतनी तीव्रता से नहीं हुआ और इसलिए हम बहुत सारी समस्याओं से बच गए, जिनसे पश्चिमी लोग पीड़ित हैं, जिनके बारे में भारतीय अनभिज्ञ है। 

उन्हें लगता है कि वहाँ सभी बहुत ही आरामदायक जीवन जी रहे हैं। उद्योग और हस्तशिल्प को साथ-साथ चलना होगा, और उद्योगपतियों को भी कलाकारों की देखभाल करनी होगी, अन्यथा उनकी देखरेख कौन करेगा? वह कला और उद्योग के बीच संतुलन कैसे स्थापित करेंगे? और कला इन परिश्रमी लोगों के लिए बहुत ही सुखद है। वह दिन भर काम करते हैं, फिर किसी प्रकार का संगीत, कला, उन्हें सांत्वना, शांति, आराम देता है और एक संतुलन प्रदान करता है। 

इसलिए मैं कहूंगी कि सभी उद्योगों को कुछ कलात्मक कार्य भी करने चाहिए, या उन्हें ऐसे वस्तुओं का उत्पादन भी करना चाहिए। मैंने राजेश से अनेक बार कहा कि उन्हें चरों ओर  बिखरे हुए कबाड़ में जाने वाले स्टील से कुछ कलात्मक उत्पादन करने का प्रयत्न करना चाहिए। यह एक अच्छा विचार होगा और उन्होंने ऐसा ही कुछ प्रयास किया भी है । परन्तु उद्योग को नीची नज़र से नहीं देखना चाहिए, जिस प्रकार हमारे देश में इसे देखा जाता है। मेरा अर्थ है, जैसे कि इस देश में उद्योगपति सबसे बड़े चोर हों, और सभी राजनेता, संत! 

मेरे विचार से यह विपरीत है। इसे सम्मान की दृष्टि से देखना होगा, और यह समझना चाहिए कि यह बहुत महत्वपूर्ण है, और उद्योगपति, यदि वह भी प्रबुद्ध हो जाएं, तो वह बहुत कुछ कर सकते हैं, न केवल अपने देश के लिए, बल्कि उन लोगों के लिए भी जिनकी वह  देखभाल कर रहे हैं। 

तो महालक्ष्मी तत्व में, महालक्ष्मी की विभिन्न मुद्राएँ हैं। एक मुद्रा में  वह अपना दाहिना हाथ इस प्रकार रखतीं हैं। अब यह दाहिना हाथ उन लोगों को संरक्षण देने के लिए है जो उनके संरक्षण में हैं, या वह जो किसी धनवान व्यक्ति या उद्योगपति, जिसे हम कह सकते हैं, उनके नीचे कार्य करते हैं। 

भारत में यदि आप किसी को धनी व्यक्ति कहते हैं तो यह उसे गाली देने जैसा है। कोई भी इसे पसंद नहीं करता है, क्योंकि धनवानों को सर्वदा सबसे बुरा व्यक्ति दर्शाया जाता है, जो है नही। मेरे अनुभव में ऐसा नहीं है। यदि कोई व्यक्ति गरीब हो, वह भी भयानक हो सकता है। गणपतिपुले में हमें बहुत बुरा अनुभव हुआ, बहुत ही गरीब लोगों द्वारा किया गया व्यवहार जो बहुत भद्दा था – तथाकथित गरीब लोग । 

इसलिए एक उचित संतुलन होना चाहिए। इसे उचित संतुलन पर लाना होगा – गरीबों और अमीरों और अमीरों और गरीबों के बीच के संतुलन को समझने के लिए। कुछ समय बाद आप पाएंगे कि लोग गरीबी या अमीरी को इतना महत्वपूर्ण नहीं मानेंगे, लेकिन आत्मा की समृद्धि बहुत महत्वपूर्ण हो जाएगी। यही सहज राष्ट्र हो जायेंगे, जहाँ हृदय की समृद्धि, आध्यात्मिकता, दिव्य के साथ एकाकार, सभी के लिए सर्वोत्तम वरदान बनेगा। 

परन्तु अभी भी हम संघर्ष कर रहे हैं उस अवस्था में पहुंचने के लिए, कई लोग कर रहे हैं। और फिर भी हम भौतिकवादी नखरे या मूर्खतापूर्ण चिंता में पड़ जाते हैं। इन सभी को ध्यान से देखाना चाहिए। 

यदि आप नवीन प्रगति के इस रथ को तीव्रता से आगे बढ़ाते हैं तो हम एक नया संसार  बनायेंगे जो पूर्ण सामन्जस्य, पूर्ण शांति, आनंद और प्रेम से परिपूर्ण होगा। लेकिन आपको ही यह सब करना होगा, मैं यह नही कर सकती। यदि मैं ऐसा कर सकती, तो आपको सहज योग में जुड़ने के लिए नहीं कहती। 

यह घोड़ों और सारथी जैसा है। घोड़ों से रथ खिंचवाया जाता  है, सारथी रथ नहीं खींचता। उसी प्रकार आपको अपना उत्तरदायित्व समझना होगा कि यही सबसे उत्तम कार्य है जो हम कर रहे हैं। केवल उद्योग, या श्रम और पूंजी की बात मैं नहीं कर रही हूँ। पर मैं बात कर रही हूँ पूर्ण कल्याण की। निसंदेह, यह सब उसी का अंग प्रत्यंग है, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन संतुलन समग्रता के साथ होना चाहिए। 

इसलिए हमें संपूर्ण कल्याण के बारे में सोचना होगा। एक बार जब हम समस्त कल्याण के बारे में सोचना आरम्भ करते हैं – तब पहली बात जो हमें जाननी है वह है, “क्या हम ऐसा समग्र कल्याण करने में सक्षम हैं? क्या हम हैं? क्या समग्र कल्याण अपने भीतर है या नहीं?  हमारे पास है?”

हम अभी भी चिंतित हैं कि विमान आ रहा है या नहीं, मेरा अर्थ है कि हम अब भी सांसारिक हैं। इतने तुच्छ, इतने छोटे। एक बंधन द्वारा आप किसी भी विमान, किसी भी वातावरण को नियंत्रित कर सकते हैं, और आप हैं कि अभी भी उन चीजों के विषय में चिंतित हैं जो आपके नियंत्रण में हैं।

इसलिए इस समग्रता पर विचार करना होगा। यह कौन सी समग्रता है जिसके बारे में माँ बात कर रही हैं। इस समग्रता में, लोगों के लिए, लोगों के द्वारा ऐसे विश्व का निर्माण किया जाना है जिसमें कोई भय नहीं। इस भय को छोड़ना होगा। इस निरर्थक घबराहट के पीछे भय है। तो उसके लिए, वह क्या करती हैं, वह अभयदान देती हैं। उनकी सुरक्षा मे आप भय से परे हैं, आप सुरक्षित हैं। 

पर यदि आप स्वयं पर विश्वास नहीं करना चाहते, और आप उनकी सुरक्षा में विश्वास नहीं करते हैं, तो कोई भी आपकी सहायता नहीं कर सकता, क्योंकि सब कुछ आपके लिए काल्पनिक है। 

कोई भी प्रयास हो जिसे हम करते हैं, उसमें कोई भय नहीं होना चाहिए, क्योंकि परमात्मा आपके साथ हैं। यह एक तथ्य है, सत्य है। आप केवल प्रयास करें। पर जब आप अपने अहंकार से ऐसा प्रयास करते हैं तो आप भय के जाल में फंस जाते हैं। मैंने देखा है कि अहंकारी लोग सबसे अधिक भयभीत होते हैं, घबराते हैं क्योंकि वह दूसरों को भयभीत करते हैं और इसलिए उन्हें लगता है कि वह स्वयं भी किसी दिन भयभीत हों सकते हैं । 

जब अंग्रेज़ यहाँ भारत में थे, हम सभी उनसे भयभीत थे। अब मैं देखती हूँ कि इंग्लैंड में हर अंग्रेजी परिवार दूसरों से डरता है।

वह दरवाजे का केवल एक झरोखा खोलेंगे यह देखने के लिए कि कौन है और बंद कर देते हैं। वह इतने भयभीत हैं। मुझे आश्चर्य है, वह वही अंग्रेज हैं जिन्होंने हमारे यहाँ शासन किया। और हम उनसे चिढ़ते थे और अब वह ही हैं जो हमसे डरते हैं। 

क्योंकि जब अहंकारी व्यक्ति दूसरों पर हावी होने का प्रयास करता है तो वह स्वयं को आईने में देखता है और सोचता है कि दूसरा व्यक्ति उस पर हावी हो जाएगा। इस प्रकार  यह भय हमारे मस्तिष्क में प्रवेश करता है, और हम मूर्खतापूर्ण व्यवहार करने लगते हैं, इस काल्पनिक भय के कारण।

भय हमारे अहंकार द्वारा ही निर्मित है। एक व्यक्ति जो अहंकारी नहीं, उसे कोई डर नहीं होगा क्योंकि उसने किसी को क्षति नहीं पहुंचायी। उसे डरने की क्या आवशयकता है? और ऐसा पुरुष, या ऐसी महिला, की देखभाल परमात्मा द्वारा की जाएगी क्योंकि परमात्मा उसे संभालते हैं।

जब आप अपना अहंकार ईश्वर को समर्पित कर देते हैं तो वह आपकी देखभाल करते हैं। लेकिन जिन में अहंकार है, उन्हें वह कहते हैं, “ठीक है, जाएं, अपने अहंकार का उपयोग करें! अपनी रक्षा स्वयं करें, अपना गला काटें।” यही होता है। 

तो जब मैं सम्पूर्ण कल्याण की बात करती हूँ तब मैं आपके सम्पूर्ण कल्याण की बात करती हूँ। तो सबसे पहले है भय जिसे आपके मस्तिष्क से पूर्णतः बाहर निकलना होगा, यदि आप सर्वशक्तिमान ईश्वर में विश्वास करते हैं तो।

हम कहते हैं, “परमात्मा आप सर्वशक्तिमान हैं, आप सर्वशक्तिमान हैं।” 

यह सब दिखावटी प्रेम है। 

यदि आप मानते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं, और आप ईश्वर से जुड़े हुए हैं, तो आपको किसी भी चीज़ का भय क्यों हो? 

पर जब हम कहते हैं, “हमें किसी का डर नहीं है,” एक और अतिशयता सामने आती है। “हमें डर नहीं है, हम जो चाहें कर सकते हैं, हम सब कुछ स्वयं कर सकते हैं, हमें किसी को बताने की आवशयकता नहीं है।” 

आपको परमात्मा को बताना है कि आप क्या कर रहे हैं। आपको अनुमति लेनी होगी, आपको उनके दरबार में सूचित करना होगा कि, “प्रभु, हम ऐसा कार्य करने की सोच रहे हैं।” 

पर आपको लगता है कि आप ही परमात्मा हैं। आप नहीं हैं। इसीलिए निडरता का दूसरा पहलु, मनमानी करना है, जो सहज योग के लिए बहुत हानिकारक है, आपके लिए, और हर किसी के लिए। 

दूसरा डर जो मुझे है वह यह है कि यदि मैं आपको कुछ भी बताती हूँ, तो आपमें से ९९ प्रतिशत लोग समझते हैं कि यह उनके हित के लिए है, उनके भलाई के लिए है। लेकिन एक प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो केवल प्रतिक्रिया कर सकते हैं, क्योंकि उनमें इतना अधिक अहंकार है और वह इसे नहीं समझते, क्योंकि वह स्वयं के हित के विषय में नहीं सोचते। वह यह नहीं समझते हैं कि यदि मैं उनको कुछ भी बता रही हूँ, तो यह केवल उन्हें पूर्णता, समग्रता देने के लिए है। लेकिन, इसके विपरीत, वह बहुत ही अनुचित व्यवहार करते हैं। यह एक और मूर्खता है। 

तो आप उन व्यक्तियों को अनदेखा करने योग्य बनें जो अनावश्यक ही स्वयं के विनाश की दूसरी सीमा तक जाते हैं। और यह नहीं देखना चाहते कि जो मैं आपको बता रही हूँ उसमें क्या महत्वपूर्ण है। केवल मैं ही आपको बता सकती हूँ। और कौन कहेगा? मुझे आपको बताना है कि आप में क्या ठीक नहीं, आपने क्या ठीक नहीं किया, और फिर आपको उसे बदलना होगा। 

यह एक और प्रकार की प्रतिक्रिया है जिसका अर्थ है कि वह स्वयं की भलाई में रुचि नहीं रखते हैं। वह अपने बच्चों की भलाई में रुचि नहीं रखते हैं, वह अपने देश या पूरे विश्व की भलाई में रुचि नहीं रखते हैं। अब आप सहज योग में क्यों आए हैं? बस एक सवाल पूछें। निश्चित रूप से अपने उत्थान के लिए। लेकिन उत्थान किस लिए? 

मान लीजिए कि हम एक ट्यूब लाइट लाते हैं। किस लिए? हमें यह ट्यूब लाइट लेते है, पर किस लिए? हमें प्रकाश के लिए चाहिए। पर यदि यह “ट्यूब लाइट” प्रकाश नहीं दे, ऐसा कुछ भी न हो, तो इस “ट्यूब लाइट” का क्या लाभ? उसी प्रकार, सहज योग में आने का क्या लाभ यदि आप दिव्य प्रकाश नहीं बन सकते?

तो आप सभी, आप में से प्रत्येक, कोई भी एक छोटा व्यक्ति नहीं। कोई नहीं है। लेकिन आप में समझ नहीं है कि आप क्या हैं! 

अभी भी कुसंकारों के कारण आपको लगता है कि आप किसी काम के नहीं हैं। आप सभी उत्थान कर सकते हैं। और अनेक लोगों का मार्गदर्शन कर सकते हैं, यदि वह अपने भीतर की सम्पूर्ण कल्याण पर कार्य करते है तो वह बाहर स्वयं ही प्रकट होगा। पूर्ण रूप से! यह एक तथ्य है। 

अब चित्त भी बहुत महत्वपूर्ण है। चित्त स्वयं की निपुणता पर होना चाहिए और अपनी सम्पूर्ण कल्याण पर। यह एक और बात है जिसे लोग अनदेखा करते हैं। वह दूसरों मे दोष ढूंढते हैं स्वयं मे नहीं। परिणाम स्वरुप, यदि आप दूसरों को देखें तो आपको इससे क्या मिलेगा? मैं इसे बिलकुल भी नहीं समझ सकती।  

यदि कोई सही नहीं, वह कुछ बुरा कर रहा है, वह बुरा है। भले ही आप उस पर ध्यान दें, आप इसके बारे में क्या कर सकते हैं? पर यदि आप में कुछ सही नहीं है, तो आपके पास पूर्ण अधिकार है, आपके पास पूर्ण नियंत्रण है, और स्वयं का सुधार कर सकते हैं। यह विशेष रूप से भारतीय गुण है, कि वह दूसरों मे दोष खोजते हैं। वह कभी नहीं देखेंगे कि स्वयं में क्या दोष है। हर समय चित्त दूसरों के दोष खोजने में लगा रहता है। फिर हम कैसे स्वयं को सुधार सकते हैं? 

इसके विपरीत, यदि आप दोष देखना आरम्भ करें, तो आप में ही बहुत अधिक दोष आएंगे। यह मानव की नकल करने की प्रकृति है। वह किसी को ऐसे करते देखते हैं, “ओह माँ, वह एक सहज योगी हैं, वह ऐसा करते हैं, इसलिए यदि मैं भी ऐसा करूं तो क्या हानि होगी?” 

परन्तु कौन कहता है कि वह सहज योगी है? 

तो ‘सहज योगी’ एक “ब्रांड” नहीं है, यह एक प्रमाण पत्र नहीं है, यह एक तरह का संगठन नहीं है। यह आपकी स्वयं की उपलभ्दी है जिसे आपने प्राप्त किया है। कोई भी कह सकता है, “मैं एक सहज योगी हूँ।”  

पर मैं उसे ऐसा कहने से नहीं रोक सकती। मैं ऐसी नहीं हूँ। 

यहां तक कि मैंने कुछ पागल लोगों को देखा है, वह सहज योगी हैं। वर्षों से वह पागल हैं, पर वह सहज योगी हैं। आपको स्वयं देखना होगा, “क्या मैं सहज योगी हूँ या नहीं?” अपने आप को प्रमाणित करने से पहले, आप यह पता क्यों नहीं लगाते?

फिर भी मुझे यह कहना होगा कि यह बहुत ही संतोषजनक है। कभी भी मैंने यह आशा नहीं की थी कि इतने सारे लोगों को उनका साक्षात्कार मिलेगा। कभी नहीं! 

मेरा अर्थ है, मुझे पता था कि यह जन सामूहिक कार्य प्रणाली है जो मैंने विकसित की है, लेकिन मैंने कभी इसकी आशा नहीं किया। पर ऐसा हुआ! और अब भी मुझे आशा है कि आप सभी सर्वोच्च, उच्चतम पदों को प्राप्त करेंगे, परमपद, जैसा कि 

कहा जाता है।  

उत्तरी ध्रुव के समान, या मेरु के समान, बिल्कुल अटल ‘जिसे अस्थिर नहीं किया जा सकता’। तो यह मेरी आशा है, और में आश्वस्त हूँ कि आप सभी इसका अनुपालन करेंगे।

(हिंदी / मराठी भाग)

मैं आपको अंग्रेजी में बताऊंगी। मैंने आपको कई बार बताया है नामदेव और गौराकुंभार के बारे में। कैसे गौराकुंभार ने, जब नामदेव को देखा……नामदेव ने देखा कि गौराकुंभार अपने मिट्टी के बर्तनों के लिए मिट्टी गूंध रहे थे। वह जाकर उनके सामने खड़े हो गए। स्तब्ध, और क्या कहते हैं, “मैं यहाँ निराकार को देखने आया हूँ, जो कि चैतन्य है, पर निराकार का तो  यह एक आकर है।“

इस प्रकार का आदर व्यक्ति में होना चाहिए, एक सहज योगी में दूसरे के प्रति होना चाहिए। हर सहज योगी एक रत्न है। यहां तक कि एक रत्न का विचार ही आपके लिए आनंदायक होना चाहिए। हर जीव में, हर शैली में, हर क्षेत्र में, हर आयाम में, हर एक में ऐसी भावना होनी चाहिए। 

मुसलमान, हिंदू, ईसाई, हम स्वीकार नहीं करते। हम सभी सहज योगी हैं, और हमारा सभी धर्मों में विश्वास है।केवल सम-भाव नहीं, हम प्रत्येक में विश्वास रखते हैं। जैसे हम राम की पूजा करते हैं, वैसे ही हम मुहम्मद साहब की भी पूजा करते हैं। उसी प्रकार से, कम नहीं!

जिस प्रकार से हम ब्रह्मदेव की पूजा करते हैं। या जैसा कि हम पूजा करते हैं। जैसे कि दत्तात्रेय की, हम “जोरोस्टर” की भी पूजा करते हैं। कोई अंतर नहीं है, सब समान हैं!

इसमें बड़ा अंतर है, जिसे आप सब के प्रति एक जैसा सम्मान कहते हैं। यह वैसा नहीं है। हम तो एक ही प्रकार से सभी को पूजते हैं। 

तो एक दूसरे मे भेद भाव करने का कोई प्रश्न ही नही है, न ही किसी देश के प्रति, ऐसा कुछ भी नहीं। 

और हमारे अंदर जो भी दोष हैं, हम देखते हैं कि यह हमारे देश से ही आये हैं। जैसा कि मैंने देखा है कई सहज योगियों ने मुझे बताया, “यह विशेषतः अंग्रेजी है, यह ठेठ फ्रेंच है, यह ठेठ इतालवी है।” वह लोग स्वयं ही मुझे बताते हैं। 

लेकिन मुख्य रूप से जो समझना है वह यह है कि सहज योग में हमने इन सभी सीमाओं को समाप्त कर दिया है। कुछ नहीं है। 

हम उस अवस्था में पहुंच गए हैं, जहाँ हम सब एक हैं। और कोई भी सहज योगी हो, एक अकेला सहज योगी या सहज योगियों के समूह, इनके विचार मात्र से आपके अंदर आनंद और एक प्रकार की आनंद की लहर भर जानी चाहिए, जो लगातार उठती रहे। क्योंकि वह आनंद और शांति के स्वरुप हैं। 

जब यह समझ आ जाए, तभी कह सकते हैं कि आप सहज योगी हैं। और मैंने देखा है कि यह एक प्रकार की जांच है। 

आप सब मुझे बहुत प्रेम करते हैं, मै जानती हूँ। आप सभी! परन्तु जब तक आप एक-दूसरे से प्रेम नहीं करते तब तक मैं कैसे प्रसन्न हो सकती? 

तो विशेष रूप से आज जब यह महालक्ष्मी तत्व आपके भीतर जागृत हो गया, आप उस लक्ष्मी तत्त्व से बाहर आते हैं, जो थोड़ा स्वार्थी, संभवतः आत्म-केंद्रित बना सकता है। और आप पहुँचते हैं खोज के एक नए आयाम पर, उच्च मूल्य प्रणाली की खोज। उससे भी आगे। 

और वैसे देखें तो यह महालक्ष्मी तत्व का सार वास्तव में कुछ भी नहीं। कुछ भी नहीं, केवल आपकी सर्व-व्यापी प्रेम की खोज है।उसका सार यही है।  

हम लोगों से केवल इसलिए प्रेम नहीं करते हैं कि वह किसी देश के हैं, या वह इस तरह दिखते हैं। तो यह बस इतना ही है कि हम उन्हें प्रेम करते हैं, क्योंकि वह हमारे अंग प्रत्यंग हैं, हम उनके साथ एक हैं। 

इसलिए जो लोग आज महालक्ष्मी की पूजा कर रहे हैं, उन्हें अनुभव करना चाहिए कि यहाँ महालक्ष्मी के कितने उपासक हैं, और वह सभी हमारे अपने हैं। यह इतनी महान अनुभूति है। 

अन्यथा विशेष रूप से महाराष्ट्र में, मुझे कहना होगा, यह भयानक था।एक सहज योगी और किसी जिले में प्रचार करने जाता, जिला नेता लड़ना शुरू करता, ठीक ऐसी तेज़ आवाज़ में, “आप कौन हैं, यहाँ आने वाले? मैं यहाँ का नेता हूँ।“ 

बजाए उनका सम्मान करना और एक अतिथि जैसे स्वागत करना, या उनसे पूछना कि आप की क्या सहायता कर सकते हैं, वहां लड़ाई होती है। यह वास्तव में आश्चर्यजनक है, ऐसा कैसे हो सकता है? 

जब नामदेव पंजाब गए, तो गुरु नानक साहिब ने उनका सम्मान किया। केवल इतना ही नहीं, बल्कि उनसे कहा, “अब आप पंजाबी भाषा में भी लिखें।” 

मैंने नामदेव की लिखी हुई इतनी बड़ी पुस्तक देखी है। आप कल्पना कर सकते हैं?  गुरु नानक ने महाराष्ट्र के सभी महान संतों को अपने ग्रन्थ साहिब में शामिल किया, क्योंकि वह जानते थे कि वह साक्षात्कारी आत्माएं हैं, वह उच्च आत्माएं हैं। लेकिन यह सिख केवल इसे पढ़ते हैं, उनकी समझ में कुछ भी नहीं आता है। आप क्या कर सकते हैं?

तो उस समय, यदि यह संत एक दूसरे से प्रेम कर सकते थे, आपस में अपने आप को इस प्रकार से व्यक्त कर सकते थे, तो हम विश्व भर के सहज योगी ऐसा क्यों नहीं कर सकते? तो मैं अब कहूँगी कि अभी रास का एक बहुत अच्छा कार्यक्रम होगा, जिसमे सभी भारतीय और विदेशी सहज योगी एक साथ होंगे और नृत्य करेंगे। ऐसी सभी चीजें हैं। इसलिए गुटों में न बैठें, अपितु दूसरों के साथ घुलें-मिलें, उन्हें जानें। हम जानेंगे विश्व भर के हर एक सहज योगी को। मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है कि आप एक-दूसरे से प्रेम करें। यह वास्तव में मुझे अत्यधिक प्रसन्न करेगा। यह मुझे बहुत आनंद देगा, सबसे बड़ी उपलब्धि और मेरे जीवन को पूर्णता देगा। 

यदि कोई व्यक्ति वास्तव में सही नहीं तो आप केवल मुझे लिखें और मुझे पता चल जाएगा, क्योंकि तुरंत ही मुझे चैतन्य से पता चल जाएगा। कोई भी मेरे साथ चालाकी नहीं कर सकता, यह निश्चित है। 

कुछ लोगों कहते हैं कि, “किसी ने यह बात माँ को बताई है।“ 

माँ को कुछ भी नहीं बताया जा सकता, आप नहीं जानते मैं इस सब के लिए बहुत चालाक हूँ। कोई भी मुझे कुछ नहीं बता सकता है, मैं हर एक को जानती हूँ … मैं थोड़ा-बहुत खेलती हूँ, लेकिन मैं प्रत्येक व्यक्ति को जानती हूँ। कुछ समय के लिए मैं उन्हें खुली छूट देती हूँ। 

लेकिन कभी यह मत मानिए कि कोई भी मुझे मूर्ख बना सकता है, और कुछ भी कह सकता है। मैं हर किसी की बात सुनती हूँ, और आप भी ऐसा प्रयास कर सकते हैं। 

यदि आप दूसरे सहज योगी से प्रेम करते हैं तो यह प्रेम की प्रक्रिया ही आनंद देने वाली है।

जब आपने पहली बार मुझे इस मंच पर देखा तो आपने ऐसा अनुभव किया क्योंकि प्रेम करने की यह प्रक्रिया अत्यधिक आनंद देने वाली है। इसलिए प्रसन्न रहें, आनंदमय रहें। यदि कुछ लोगों का विमान छूट जाए तो बहुत अच्छा होगा, आप अन्य सहज योगियों के साथ रहेंगे। अंततः,आप इस संसार में ही हैं, आप खोए नहीं। यहां तक कि यदि आप समुद्र में हैं, तो आप वहां हैं, यदि आप विमान में हैं, तो आप हैं। क्या अंतर है? 

यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है कि यह विमान आरक्षित होना चाहिए, और आपको इस विमान के बारे में चिंता करनी चाहिए, “इतने बजे मुझे निकलना ही है।” इसकी कोई आवश्यकता नहीं है।

आप जहां भी हैं, सहज योगियों के साथ हैं, तो चिंता क्यों करें? आप हैं, बात यही है। 

जैसे कई लोग मुझसे पूछते हैं, “माँ आप बहुत यात्रा करती हैं, क्या आप थकती नहीं हैं?” क्योंकि मैं कभी नहीं सोचती कि मैं यात्रा कर रही हूँ, मैं बस यही सोचती हूँ कि “मैं हूँ”, बस इतना ही। चाहे विमान में या इधर, या उधर, मैं वहीँ हूँ। मैं स्वयं को बताती हूँ कि मैं यात्रा कर रही हूँ, फिर मैं भूल जाती हूँ। 

तो आप भी चाहे यहां हैं या इंग्लैंड में, या कहीं भी, तो चिंता क्यों करें? विशेष रूप से विमान में – मुझे लगता है कि पाश्चात्य आनुवांशिकी में गड़बड़ है – विमान उनकी कुंडलिनी में प्रवेश कर जाता है, मुझे लगता है। और वह इतने विचित्र हो जाते हैं हवाई जहाज को लेकर। यह कुछ ऐसा है, जो मैं नहीं समझ सकी। 

मैंने उन्हें बहुत सारे सबक दिए हैं यह दिखाने के लिए कि यह सब निरर्थकता कार्य न करे, फिर भी वह ऐसा करते रहते हैं। पर यदि मैं उनसे कहती हूँ तो वह दोषी अनुभव करते हैं, लेकिन फिर से वह ऐसा करते हैं। 

अगली बार अगर आपका विमान आठ बजे का है, तो नौ बजे जाइए, विमान दस बजे तक आपकी प्रतीक्षा करेगा, आप मेरी बात मान लीजिए। ऐसा हो चुका है, अनेक लोग यह बता सकते हैं। इतने अनुभव हैं, मेरा अर्थ है, इनको हमने लिखा नहीं है, लेकिन लोग जानते हैं कि हमारे लिए विमानों में किस प्रकार देरी हुई। मेरे पूरे जीवन में एक भी विमान कभी भी छूटा नहीं, और जब छूटा, तो उसके पीछे कारण था। बड़ी घटनाएं हुईं! इसलिए यह महत्वपूर्ण है, यह एक लीला है। 

चिंता केवल एक ही होनी चाहिए, “मैं हर किसी से वैसा प्रेम क्यों नहीं करता जैसा मैं स्वयं से करता हूँ?”  

मैं आपको यह कह सकती हूँ कि केवल यह सर्वव्यापी प्रेम ही आपको वह आत्मविश्वास और उच्च स्थिति प्रदान करेगा। इन संतो ने आपके लिए क्यों कष्ट सहे? ईसा मसीह ने आपके लिए क्यों कष्ट सहा? मुहम्मद साहब ने आपके लिए क्यों कष्ट सहा? धर्म के विषय में आपसे किसी ने बात क्यों की? ज्ञानेश्वर ने ज्ञानेश्वरी क्यों लिखी? क्यों? उन्हें क्या मिला? उस सर्वव्यापी प्रेम की अभिव्यक्ति की उनकी यह संतुष्टि। 

सभी महान कवि, “विलियम ब्लेक” या कोई भी, जो कुछ भी उन्होंने किया है, यह केवल इस कारण कि उनमें यह सर्वव्यापी प्रेम है और वह इसे व्यक्त करना चाहते हैं। तो आप ऐसा क्यों नहीं करते? 

यदि आप चाहते हैं कि आपका महालक्ष्मी तत्त्व हर समय ज्वलंत रहे, तो कृपया देखें कि आप प्रत्येक सहज योगी से प्रेम करें। आज यही संदेश है। मुझे आशा है कि आप समझ जाएंगे।

परमात्मा आप सबको आशीर्वादित करें ।