Shri Mahalakshmi Puja, The Universal Love

Kalwa (India)


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Shri Mahalakshmi Puja. Kalwe (India), 30 December 1992.

[Shri Mataji speaks English]

[Shri Mataji speaks MARATHI]

अब इनको हिंदी में बता रही हूँ। मराठी लोगोंको सच मानना चाहिये की इनकी भाषा बहुत हि बढिया भाषा हें, आत्मानुभूती के लिये, इसमें कोई शक नहीं। इससे ज्यादा किसी भी भाषा में स्पष्ट रुपसे लिखा नही गया। और इसमे गणेश जी का आदर करने की वजह से लोग जो है चरित्रवान है, वैसे देखे जाए तो। उनकी आखें इधर उधर घुमती नही। नॉर्थ इंडिया में मुसलमानोंका राज्य आनेसे वो पडदा के सिस्टम् से, कोई भी गर जा रहा हो तो उसकी और देखने की वहाँ प्रथा हे। मैं तो पहले शुरूमें सोचती थी ये लोग करते क्या है। वो जो भी हो गया, अब सहजयोग में आनेके बाद मराठी भाषा में जो आत्मानुभूति पर अनेक लेख और अनेक चीज़े लिखी है, कमाल के है। उसका एक असर इनके चरित्र पर आया है की इनको औरतों का चक्कर नहीं। उसमें नहीं फसते, इतना, महाराष्ट्रीयन, है हमारे जो ऐसे औरत चक्करवाले थे वो गए सब दिल्ली में बैठे है। पर यहाँ पर जो है वो लोगों में एक विशेषता है, उनका चरित्र है। और नॉर्थ इंडिया में, मै तो हैरान हो गयी की जिन्होंने दत्तात्रेय कौन जाना नहीं उनमें इतनी सजगता कैसे? कोई झगडा नहीं दिखाई देता, कोई वहाँपर कोई परेशानी नहीं। इतना बढ़िया प्रोग्राम हुआ की सबलोग हैरान हो गए।

मराठीत सांगायचं म्हणजे, इकडे फॉरेनचे लोक आले म्हणजे यांच्याकडून पैसे कसे काढायचे याच्याकडे फार लक्ष, तिकडे कही तसं करत नाहीत. और फिर ये सब करके, उन लोगोंने दिखा दिया की किसी भी गर्त में पड़े थे उसे एकदम उठके कमल जैसे हो गए। ये उन्होंने दिखा दिया। अब महाराष्ट्र में क्योकि ये सब चीज़े है और सब लिख गयी है। यहाँपर साधू संतो ने इतनी मेहनत की| तो जहाँ जीतनी मेहनत होती है, मेरे खयालसे वहीं गड़बड़ हो जाती है। इनको सब मालूम है। ये सब मालूम होते हुए भी इतनी सारी गड़बड़ कर डाली। इससे अच्छा तो ये है की, कुछ भी नहीं जानो सिर्फ एक बात जान लो की आपसी प्रेम यही सहजयोग का सबसे बड़ा मुख्य मंत्र है। तो बड़ा काम हो जायेगा। नहीं तो मंत्र पे मंत्र इनसे सुन लीजिये, सबकुछ सुन लीजिये और सारी दुनियाभरकी चीज़ मालूम है और जैसे एक दुसरे को देखे तो गालियाँ बकना शुरु। अब अनुभव से ये सिद्ध हो गया की नॉर्थ इंडिया में लोगोंने इस तरह से सहजयोग लिया है की कमाल की चीज़ है, बहुत कमाल की चीज़ है। और मेरे ख़याल से महाराष्ट्र में भी ये चीज़ हो जाये तो मेरे लिए और क्या चाहिए। इसी छोटेसे हिस्से में हिन्दुस्तान के न जाने कितने साधू संत हो गए और उन साधू संतोको सारे हिन्दुस्थान में लोगों ने माना है। इतनी ऊँची ऊँची बातें लिख गए है की बस देखते ही बनता है। और उन लोगों की महिमा बिलकुल वर्णन नहीं करी जाती। अब यहाँ का जो, यहाँ कि जो संस्कृती है, उसमे वो चीज़ काफी जमी हुई है, रची हुई है। पर सहजयोग में नहीं उतर पा रहे है। सहजयोग में ये बात। सहजयोग कि संस्कृती लेनी चाहिये। और सहजयोग कि संस्कृती में सबसे बड़ी चीज़ है आपसी प्यार। एक दुसरे से हम लोगोपर प्यार महसूस नहीं होता, तो फिर हम सहजयोगी है ही नहीं। एक सहजयोगी जबतक दुसरे सहजयोगी के प्रती प्रेम प्रदर्शित नहीं कर सकता तो हम लोग सहजयोगी हो ही नहीं सकते। गर हम एक दुसरे की गर्दन काटने पर लगे हुये है, हम सहजयोगी हो ही नहीं सकते, किसी भी तरह से। दुसरे की बुराई आपको देखने की जरुरत ही नहीं। उसकी अच्छाई को देखकर के, उसकी अच्छाई का वर्णन करिये, वो भी अच्छा हो जाएगा, मै तो बहुत बार ऐसा करती हूँ। मुझे कोई आकर जब बतायेगा, ये आदमी ऐसा, इसने ऐसी खराबी कर दी, ये करदी। अरे वो तो तुम्हारी तारीफ कर रहा था, तुम क्या उसकी बुराई कर रहे हो| अच्छा, क्या कहा माँ? मैने कहा, इतनी बाते कही, मै तुमसे क्या बताऊँ? तुम जाके देखो तो सही, तो आदमी जाकर के उसके गले पड जाता है। तो इसका मतलब है सारा झूठ है। अब गहनता से बात को सोचो कि, हम किस इस में पैदा हुए। हम उस ज़माने में पैदा हुए है, जहाँ की एक बड़ा महत कार्य हो रहा है, बहुत बड़ा। और इसके बारे में बताया गया है कि ये महत कार्य होगा। और वो महत कार्य करते वक्त जब हम पैदा हुए है। और उसमे हम कार्यान्वित, और उसके हम कार्यकर्ता बन गए, और हमारे ऊपर जब उसका बोझा आ गया, तो हमें क्या करना चाहिए? अगर चार आदमी एक टेबल ही उठा रहे है, उसमे से एक अगर कच्चा पड़ जाये तो टेबल धस्स से निचे गिर जाएगा। या किसी बड़े भारी शिप में अगर एक छोटासा छेद भी हो जाये तो शिप डूब सकती है। क्योकि सब जुटा हुआ मामला है। क्योंकी आप सब जुटे हुए है। आपमें से एक भी आदमी अगर गलत चला जाता है, तो बड़ा नुकसान सहजयोग को हो जाता है। अब उसमें जो बाते आ जाती है वो समझने की ये है की हमें एक नम्रता आनी चाहिये। ईसामसी ने कहा है की, ‘Meek in heart, will inherit Earth’. जरा महाराष्ट्रीयन लोगों में, नम्रता चीज थोड़ी कुछ कम है। कम से कम पता नहीं की उनकी भाषा इतनी सुंदर होते हुए भी जरा बोलते वक्त, उनके यहाँ गाली गलोच तो है नहीं। तो बगैर गाली गलोच के वो भाषा में ही कुछ ना कुछ सुना देते है। एक कॅरेक्टर है।
हे पूर्वी नव्हतं, पहले नही था। आजकल है ये। और ये लेकर के ऐसे बैठ गये है की हर जगह लड़ने को तैयार है। हर जगह संप करेंगे, हर जगह ये करेंगे, वो करेंगे। कुछ समझ में ही नहीं आता। एक लडाका स्वभाव हो गया है। इस लड़ाके स्वभाव को, मनुष्य को है, थोडासा देखना चाहिए, की हम सहजयोग में आये है, इसकी माला हमने पहन ली, अब छोड़ो इसे। पर इसमे नहीं पडनेवाले। उनसे अगर कहा जाये की, आप वारकरी हो जाओ, तो उसमे तंबाखु खाके बदनपे वो ताट पहेनकरके, रास्तेसे भूके मरते हुए महीनाभर जायेंगे, हजारो। पर अगर कहा जाये की आप सहजयोगी हो गये उसका रूप धारण करो तो उसमे बड़ी मुश्किल है। तो सबसे बड़ी चीज़ है सहजधर्ममें, सबसे बड़ी चीज़ है, आपसी नितांत प्रेम, नितांतता। अभी देखो, एक मुसलमान लड़का अल्जेरिया से, अपने माँ बाप से कहने लगा कि तुम कहाँ जा रहे हो भाई मक्का। मक्का तो आजकल बैठा हुआ है लंडन में, वही जाओ। सो उनको लेकरके पहुँच गये। तो जब वो मुझे मिले तो उसके बाद वो कहने लगे, सच्ची बात है मक्के में तो मिलता नहीं है, यहाँ मिल गया। अब कहने लगे की सिर्फ ख़याल से की हम लंडन गए थे, एकदम हमारे मन में आनंद की उर्मी आने लग गयी। इसी तरह से किसी भी सहजयोगी के विचार से ही आनंद आना चाहिये। वो ऐसा सहजयोगी है, आह!

[Shri Mataji speaks MARATHI]

[Shri Mataji speaks English]