Shri Mahalakshmi Puja, The Universal Love

(भारत)

1992-12-30 Mahalakshmi Puja Talk, The Universal Love, Kalwe, India, 43' Download subtitles: EN,ESView subtitles:
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Shri Mahalakshmi Puja. Kalwe (India), 30 December 1992.

[Translation from English to Hindi]

 आपको किसी भी बात की चिंता करना बंद करना चाहिए. । आपके लिए सब व्यवस्था की हुई है। सब प्रबंध किया हुआ है। किसी भी चीज की चिंता करने की जरूरत नहीं है। अगर आप किसी भी बात की चिंता करते रहते हैं तो मुझे तकलीफ होती है। क्या आप सहज योगी नहीं है? हर बात के हर चीज की व्यवस्था की हुई है। किसी भी बात की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। सहज योगियों ने उस स्तर पर गिरना नहीं चाहिए।सहज योगियों ने इतने साधारण स्तर पर गिरना नहीं चाहिए। आखिर आपको क्या हो सकता है?

 मैं कहूंगी कि वे लोग जो हमेशा चिंता करते रहते हैं, उन्हें ध्यान में उतरना चाहिए और समझना चाहिए कि आप अपना ही अपमान कर रहे हैं। आप संत लोग हैं। आपको चिंता क्यों करनी है कि आपको कौन सा प्लेन मिलेगा मिलेगा या नहीं मिलेगा?यह दर्शाता है कि आपका स्तर बहुत कम है। निसंदेह। वे सब जो चिंता करते हैं, आप लोग सब यहां मेरे संरक्षण में आए हो और मेरे ही संरक्षण  में वापस चले जाओगे।आज सुबह मुझे इतना अस्वस्थ लगा कि मैं सोचने लगी आज हम कोई पूजा नहीं करेंगे। आपको पता होना चाहिए कि आप मेरे ही शरीर के अंग प्रत्यंग है। मैंने आपको अपने शरीर में ग्रहण किया है और इसलिए आपको अच्छे से रहना चाहिए।

आज इस शुभ दिन जब हम सब यहां आए हैं   इस महत्वपूर्ण पूजा के लिए, तो मैं कहूंगी कि इसे हमें महाकाली पूजा कहना चाहिए क्योंकि यह इस देश के उद्योग से जुड़ी है, और पूरे संसार के उद्योग से जुड़ी है। जब तक यह सब  इंसान के उद्योग, धंधे परमात्मा से जुड़े ना हो तब तक वह अपना सही दर्जा या प्रतिष्ठा नहीं पा सकते । इसलिए हमें पश्चिमी देशों में अब समस्याएं हैं। बहुत  होशियार और पढ़ने लिखने माने जाने वाले लोग  है पर अब यहां व्यापार  मंद हो गया है और बेरोजगारी बढ़ गई है। क्योंकि इसमें  संतुलन नहीं है। उन्हें पता ही नहीं कि परमात्मा की शक्ति से ही सब काम होता है और जब आप उसे अनदेखा करते हैं तब आपके साथ ऐसा होता है। इस प्रकार के मैं साहसिक और जोखिम भरे काम के लिए हमें  धरती मां से बहुत कुछ  कच्चा माल और सामान लेना पड़ता है।  पर  यदि यह सब  माल्  या सामान किसी अच्छे कार्य के लिए लिया जाए या दूसरों की मदद के लिए हो  तो वह संतुलन में है।  फिर धरती मां सोच सकती है,कि वह और उत्पन्न करें, ऐसे समझदार लोगों के लिए जो परमात्मा से जुड़े  हो। जो सिर्फ पैसे बनाने के लिए  या अपने मतलब के लिए नहीं  पर सबके बारे में सोचते हो।  जिनका समग्र भाव हो। इस प्रकार कोई भी व्यापार बढ़ सकता है।

 मैंने देखा है जापान में, इतना व्यापार बढ़ा है, पर कोई अध्यात्म नहीं है। वे लोग बिल्कुल खुश नहीं है। उनके बच्चे पीड़ित हैं, उनका परिवार पीड़ित है। पैसा इंसान का पूर्ण कल्याण नहीं कर सकता, इसलिए संतुलन लाने की जरूरत है। खासकर हमारे देश में भगवान की कृपा से इतना तेजी से उद्योगीकरण नहीं हुआ है और इसीलिए हम कई परेशानियों से बचे हुए हैं जो पश्चिमी देश भोग रहे हैं, और जिसके बारे में भारतीयों को पता भी नहीं है। उन्हें लगता है आप लोग बहुत आराम से जी रहे हैं वहां।

 उद्योग को दस्तकारी या हस्तशिल्प के साथ में हाथ मिलाकर चलने की जरूरत है। उद्योगों को कलाकारों का ख्याल भी रखना चाहिए नहीं तो कलाकारों की कौन देखभाल करेगा? कला और उद्योग के बीच में संतुलन कैसे आएगा?इतना सुकून देने वाली है हस्तशिल्प लोगों के लिए कि वे लोग दिन भर काम करते हैं और फिर अपनी थकान दूर करने के लिए कुछ संगीत या कला का सहारा लेते हैं। संगीत या कला अत्यंत शांति होती है इस प्रकार संतुलन रहता है इसलिए मैं कहूंगी कि सभी उद्योगों ने कुछ ना कुछ कला का काम भी करना चाहिए या उन्हें कुछ उत्पन्न करना चाहिए। मैं राजेश को कई बार बोलती थी  की तुम्हें इन स्टील के बचे हुए टुकड़ों से कुछ कलात्मक वस्तुएं बनाना चाहिए, और उन्होंने ऐसा कुछ बनाने का प्रयास किया है। पर उद्योग को इस प्रकार से नहीं देखना चाहिए  जैसे हमारे देश में देखा जाता है। जैसे उद्योगपति सबसे बड़े चोर हो और सब  राजनेता  संत हो इस देश में। पर असल में उसका उल्टा है। हमें उद्योगपतियों का आदर करना चाहिए और समझना चाहिए  की  वे बहुत महत्वपूर्ण है और अगर उद्योगपति भी जागृत हो जाए तो  वे बहुत कुछ कर सकते हैं, ना सिर्फ उनके देश के लिए, अपितु  उसके लिए काम करने वाले लोगों के लिए भी। 

महालक्ष्मी तत्व में महालक्ष्मी की कई मुद्राएं हैं, उनमें एक है कि वह अपना दायां हाथ इस प्रकार  रखती है। यह दायां हाथ लोगों को सुरक्षा देने के लिए है। जो लोग दूसरे पैसे  वाले लोगों के नीचे काम करते हैं, या उद्योगपतियों के नीचे काम करते हैं, या कोई दूसरी नौकरी करते हैं।भारत में अगर आप किसी को अमीर आदमी कहे, तो वह उसके लिए अपशब्द बोलने जैसा होता है। किसी को यह पसंद नहीं है। क्योंकि अमीर लोगों को यहां सबसे बुरे लोगों के जैसा दिखाया जाता है जो सही नहीं है। मेरे खुद के अनुभव में ऐसा नहीं है। कोई  गरीब व्यक्ति भी बहुत खराब हो सकता है। हमें बहुत बुरे अनुभव आए गणपतिपुले में, गरीब लोगों के।  कैसे आचरण कर रहे थे बहुत अजीब तरीके से और गरीब चने लाते थे

[Shri Mataji speaks MARATHI]

अब इनको हिंदी में बता रही हूँ। मराठी लोगोंको सच मानना चाहिये की इनकी भाषा बहुत हि बढिया भाषा हें, आत्मानुभूती के लिये, इसमें कोई शक नहीं। इससे ज्यादा किसी भी भाषा में स्पष्ट रुपसे लिखा नही गया। और इसमे गणेश जी का आदर करने की वजह से लोग जो है चरित्रवान है, वैसे देखे जाए तो। उनकी आखें इधर उधर घुमती नही। नॉर्थ इंडिया में मुसलमानोंका राज्य आनेसे वो पडदा के सिस्टम् से, कोई भी गर जा रहा हो तो उसकी और देखने की वहाँ प्रथा हे। मैं तो पहले शुरूमें सोचती थी ये लोग करते क्या है। वो जो भी हो गया, अब सहजयोग में आनेके बाद मराठी भाषा में जो आत्मानुभूति पर अनेक लेख और अनेक चीज़े लिखी है, कमाल के है। उसका एक असर इनके चरित्र पर आया है की इनको औरतों का चक्कर नहीं। उसमें नहीं फसते, इतना, महाराष्ट्रीयन, है हमारे जो ऐसे औरत चक्करवाले थे वो गए सब दिल्ली में बैठे है। पर यहाँ पर जो है वो लोगों में एक विशेषता है, उनका चरित्र है। और नॉर्थ इंडिया में, मै तो हैरान हो गयी की जिन्होंने दत्तात्रेय कौन जाना नहीं उनमें इतनी सजगता कैसे? कोई झगडा नहीं दिखाई देता, कोई वहाँपर कोई परेशानी नहीं। इतना बढ़िया प्रोग्राम हुआ की सबलोग हैरान हो गए।

मराठीत सांगायचं म्हणजे, इकडे फॉरेनचे लोक आले म्हणजे यांच्याकडून पैसे कसे काढायचे याच्याकडे फार लक्ष, तिकडे कही तसं करत नाहीत. और फिर ये सब करके, उन लोगोंने दिखा दिया की किसी भी गर्त में पड़े थे उसे एकदम उठके कमल जैसे हो गए। ये उन्होंने दिखा दिया। अब महाराष्ट्र में क्योकि ये सब चीज़े है और सब लिख गयी है। यहाँपर साधू संतो ने इतनी मेहनत की| तो जहाँ जीतनी मेहनत होती है, मेरे खयालसे वहीं गड़बड़ हो जाती है। इनको सब मालूम है। ये सब मालूम होते हुए भी इतनी सारी गड़बड़ कर डाली। इससे अच्छा तो ये है की, कुछ भी नहीं जानो सिर्फ एक बात जान लो की आपसी प्रेम यही सहजयोग का सबसे बड़ा मुख्य मंत्र है। तो बड़ा काम हो जायेगा। नहीं तो मंत्र पे मंत्र इनसे सुन लीजिये, सबकुछ सुन लीजिये और सारी दुनियाभरकी चीज़ मालूम है और जैसे एक दुसरे को देखे तो गालियाँ बकना शुरु। अब अनुभव से ये सिद्ध हो गया की नॉर्थ इंडिया में लोगोंने इस तरह से सहजयोग लिया है की कमाल की चीज़ है, बहुत कमाल की चीज़ है। और मेरे ख़याल से महाराष्ट्र में भी ये चीज़ हो जाये तो मेरे लिए और क्या चाहिए। इसी छोटेसे हिस्से में हिन्दुस्तान के न जाने कितने साधू संत हो गए और उन साधू संतोको सारे हिन्दुस्थान में लोगों ने माना है। इतनी ऊँची ऊँची बातें लिख गए है की बस देखते ही बनता है। और उन लोगों की महिमा बिलकुल वर्णन नहीं करी जाती। अब यहाँ का जो, यहाँ कि जो संस्कृती है, उसमे वो चीज़ काफी जमी हुई है, रची हुई है। पर सहजयोग में नहीं उतर पा रहे है। सहजयोग में ये बात। सहजयोग कि संस्कृती लेनी चाहिये। और सहजयोग कि संस्कृती में सबसे बड़ी चीज़ है आपसी प्यार। एक दुसरे से हम लोगोपर प्यार महसूस नहीं होता, तो फिर हम सहजयोगी है ही नहीं। एक सहजयोगी जबतक दुसरे सहजयोगी के प्रती प्रेम प्रदर्शित नहीं कर सकता तो हम लोग सहजयोगी हो ही नहीं सकते। गर हम एक दुसरे की गर्दन काटने पर लगे हुये है, हम सहजयोगी हो ही नहीं सकते, किसी भी तरह से। दुसरे की बुराई आपको देखने की जरुरत ही नहीं। उसकी अच्छाई को देखकर के, उसकी अच्छाई का वर्णन करिये, वो भी अच्छा हो जाएगा, मै तो बहुत बार ऐसा करती हूँ। मुझे कोई आकर जब बतायेगा, ये आदमी ऐसा, इसने ऐसी खराबी कर दी, ये करदी। अरे वो तो तुम्हारी तारीफ कर रहा था, तुम क्या उसकी बुराई कर रहे हो| अच्छा, क्या कहा माँ? मैने कहा, इतनी बाते कही, मै तुमसे क्या बताऊँ? तुम जाके देखो तो सही, तो आदमी जाकर के उसके गले पड जाता है। तो इसका मतलब है सारा झूठ है। अब गहनता से बात को सोचो कि, हम किस इस में पैदा हुए। हम उस ज़माने में पैदा हुए है, जहाँ की एक बड़ा महत कार्य हो रहा है, बहुत बड़ा। और इसके बारे में बताया गया है कि ये महत कार्य होगा। और वो महत कार्य करते वक्त जब हम पैदा हुए है। और उसमे हम कार्यान्वित, और उसके हम कार्यकर्ता बन गए, और हमारे ऊपर जब उसका बोझा आ गया, तो हमें क्या करना चाहिए? अगर चार आदमी एक टेबल ही उठा रहे है, उसमे से एक अगर कच्चा पड़ जाये तो टेबल धस्स से निचे गिर जाएगा। या किसी बड़े भारी शिप में अगर एक छोटासा छेद भी हो जाये तो शिप डूब सकती है। क्योकि सब जुटा हुआ मामला है। क्योंकी आप सब जुटे हुए है। आपमें से एक भी आदमी अगर गलत चला जाता है, तो बड़ा नुकसान सहजयोग को हो जाता है। अब उसमें जो बाते आ जाती है वो समझने की ये है की हमें एक नम्रता आनी चाहिये। ईसामसी ने कहा है की, ‘Meek in heart, will inherit Earth’. जरा महाराष्ट्रीयन लोगों में, नम्रता चीज थोड़ी कुछ कम है। कम से कम पता नहीं की उनकी भाषा इतनी सुंदर होते हुए भी जरा बोलते वक्त, उनके यहाँ गाली गलोच तो है नहीं। तो बगैर गाली गलोच के वो भाषा में ही कुछ ना कुछ सुना देते है। एक कॅरेक्टर है।
हे पूर्वी नव्हतं, पहले नही था। आजकल है ये। और ये लेकर के ऐसे बैठ गये है की हर जगह लड़ने को तैयार है। हर जगह संप करेंगे, हर जगह ये करेंगे, वो करेंगे। कुछ समझ में ही नहीं आता। एक लडाका स्वभाव हो गया है। इस लड़ाके स्वभाव को, मनुष्य को है, थोडासा देखना चाहिए, की हम सहजयोग में आये है, इसकी माला हमने पहन ली, अब छोड़ो इसे। पर इसमे नहीं पडनेवाले। उनसे अगर कहा जाये की, आप वारकरी हो जाओ, तो उसमे तंबाखु खाके बदनपे वो ताट पहेनकरके, रास्तेसे भूके मरते हुए महीनाभर जायेंगे, हजारो। पर अगर कहा जाये की आप सहजयोगी हो गये उसका रूप धारण करो तो उसमे बड़ी मुश्किल है। तो सबसे बड़ी चीज़ है सहजधर्ममें, सबसे बड़ी चीज़ है, आपसी नितांत प्रेम, नितांतता। अभी देखो, एक मुसलमान लड़का अल्जेरिया से, अपने माँ बाप से कहने लगा कि तुम कहाँ जा रहे हो भाई मक्का। मक्का तो आजकल बैठा हुआ है लंडन में, वही जाओ। सो उनको लेकरके पहुँच गये। तो जब वो मुझे मिले तो उसके बाद वो कहने लगे, सच्ची बात है मक्के में तो मिलता नहीं है, यहाँ मिल गया। अब कहने लगे की सिर्फ ख़याल से की हम लंडन गए थे, एकदम हमारे मन में आनंद की उर्मी आने लग गयी। इसी तरह से किसी भी सहजयोगी के विचार से ही आनंद आना चाहिये। वो ऐसा सहजयोगी है, आह!

[Shri Mataji speaks MARATHI]